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Full text of "वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद"

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वाल्मीकि रामायण 


तथा 


आयुर्वेद 


डॉ. प्रेरणा माथुर 
प्राच्य संस्कृत विभाग, 
लखनऊ विश्वविद्यालय 
लखनऊ 


पीयूष प्रकाशन 


दिल्‍ली-0094 


॥58९ 
सर्वाधिकार 
प्रकाशक 


संस्करण 


978-8-88622-20-6 

लेखिका 

पीयूष प्रकाशन 

ए-40 कबीर नगर, गली नं.-8 
शाहदरा, दिलली-0094 

202 

500.00 

शिवानी आर्ट प्रेस, वेस्ट गोरख पार्क 
शाहदरा, दिल्ली-0032 





समर्पण 





परमपूजनीय 
पिताश्री आचार्य मुक्तेश माथुर 
तथा ४ 
माता श्रीमती चन्द्रकान्ति माथुर 


प्रेरणा 

















दूरभाष : का. 223925॥ 


डॉ. राकेशधर त्रिपाठी 
मंत्री सी. एच. नं. : 3279 


मंत्री 


उच्च शिक्षा, उ.प्र. विधान भवन : लखनऊ 





“सन्देश” 


मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि आप द्वारा रचित पुस्तक “वाल्मीकि 
रामायण तथा आयुर्वेद” का प्रकाशन किया जा रहा है। जिसमें सामाजिक, 
सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं आदि काल से ही “आयुर्वेद” का अमूल योगदान 
समाज के व्यक्तियों के स्वस्थता के विकास में अग्रणी रहा है। 

आप द्वारा रचित इस पुस्तक में अन्य विशिष्ट विषयों पर विद्वत्तापूर्ण 
आलेख निश्चित रूप से योग के महत्व को चरितार्थ करेगी। यह निर्विवाद है कि 
आयुर्वेद समाज की आदि-आदि काल से सेवा करता आ रहा है। आपके 
अतुलनीय सहयोग से लोगों को प्राचीन काल में प्रचलित आयुर्वेदिक पद्धति. से 
परिचित कराने में उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक समाज के लिये उन्नति एवं 
प्रगति के नये आयाम उपलब्ध कराते हुए उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने के लिए 
प्रेरित करेगी। 

मैं पुस्तक के सफल प्रकाशन की कामना करता हूँ। 


डॉ. राकेशधर त्रिपाठी 
डॉ. प्रेरणा माथुर, 
प्रवक्‍ता, 
प्राच्य संस्कृत विभाग, 
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ 
उत्तर प्रदेश । 

















ज््कः 





प्रो. राजेन्द्र मिश्र दूरलेख : “श्रुतम्‌' 


पूर्व - कुलपति कार्यालय : (0542) 2204089 

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ४ (0542) 220423 

खवाराणसी-22002 निवास : (0452) 220667 
( 


: (0452) 2207457 
फैक्स : (0452) 220667 
छिनाक्षों: ४९०5५५५_शा5६)$89/क्षावाल,ी 


नान्दीवाक्‌ 


संस्कृत कविता का जन्म प्रकृति की गोद में हुआ, यह मेरी दृढ़ आस्था है। 
दार्शनिक पदावली में कहूँ तो कविप्रतिभा कविता का यदि निमित्त कारण है तो 
प्रकृति उसका 'अपादान कारण”। इस सत्य के दर्शन हमें वेदमंत्रों में ही होते हैं 
जब उपषस्‌-सूक्त में ऋषि उषा के विलक्षण-सौन्दर्य को नाना प्रतिमानों एवं अप्रस्तुत 
विधानों से आँकता है। सुन्दरी उषा का अनुगमन करता तरुण सूर्य उसे वरमण्डप 
का 'दूल्हा' दिखाई पड़ता है। मण्ड्कसुक्त में वर्षागम से आहलादित टरटराते मेढक 
उसे वेदपाठी व से प्रतीत होते हैं। 

प्रकृति-रस से अभिषिक्त यह कविता आर्षकाब्यों में पहुँचते ही पूर्ण समरस 
हो उठती है निसर्ग से। संस्कृत के अदिकाव्य रामायण में तो प्रकृति जड़ता का 
कब्चुक उतार, पूर्ण चेतन बन जाती है। महर्षि वाल्मीकि को लाल रंग वाली, 
आकाश से विलीन होती तथा समदित-तारका संध्या एक सुन्दरी नायिका सीही 
परिलक्षित होती है जो नायक के रुंस्पर्शमात्र से पुलकित एवं शिधिलवसना हो 
उठती है- 

चब्चच्चन्द्रकरस्पर्शा हर्षोन्मीलिततारका। 

अहो रागवती सन्ध्या जहाति स्वयमम्बरम्‌ ।। 

वाल्मीकि-कविता में कन्दलित प्रकृति की यहीं नित्वचेतना” 


8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


महाकवि कालिदास के कवित्व का आभूषण बन जाती है। 

डॉ. प्रेरणा माथुर ने वाल्मीकिरामयण में निहित आयुर्वेदिक सामग्री को केन्द्र 
में रखकर विगत शताब्दी के अन्तिम दशक (994 ई.) में एक प्रशंसनीय 
शोधकार्य सम्पन्न किया था जिसके अवलोकन का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था। 
आज यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि विदुषी अनुसन्धात्री का वह शोधश्रम 
ग्रन्थरूप में प्रकाशित हो रहा है। अतिशय विलम्ब से निर्व्यूढ इस सारस्वत उपक्रम 
का मैं हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ तथा डॉ. प्रेरणा माथुर को साधुवाद एवं आशीः 
प्रदान करता हूँ। 

वाल्मीकि रामायण लौकिक संस्कृत-कविता का उत्स है। वह रामकथा की 
प्रस्तुति के बहाने, भारत राष्ट्र की समूची आध्यात्मिक आधिदैविक एवं अधिभीतिक 
उपलब्धियों को समेट कर, आगे प्रवृत्त होता है। अरण्य में बिखरी प्रकृति रामायण 
में मात्र उद्दीपन-विभाव के रूप में टहीं प्रत्यत “अलड्कार्य” के रूप में, आंलम्बन 
के भी रूप में अवतीर्ण होती है" आर, *क वैशिष्ट्य तो उस अनेकान्त प्रकृति का 
मात्र एक 'अन्त' (पक्ष ०556) मूग जा “कता है। 

डॉ. प्रेरणा माथुर त्ण यह प्रष्ट जिस दृष्टि से लिखा गया है, उसकी 
उपादेयता, प्रासंगिकता 7”प युफ्धर्णिटा को कथमपि नकारा नहीं जा सकता। 
हमारे चारों ओर बिखरी एक्रति ऐें कित्तना 'जीवनामृत” भरा है यह आयुर्वेद बताता 
है। उस भूले-बिसरे अग्युर्देद ल्‍्मी नये सिरे से प्राणप्रतिष्ठा में आज राष्ट्र के अनेक 
मनीषी दत्तचित्त हैं। ऐप स्थिति पें विदुधी लेखिका का प्रकाशन एक “सन्दर्भग्रंथ 
की प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा, यह मेरी शुभाशंसा है। 

शिमला सस्नेह 

24 दिसम्बर, 200 ई. अभिराज राजेन्द्र मिश्र 





डॉ. सनत्कुमार शास्त्री 
पूर्व ऐसोसिएट प्रोफेसर एवं 
अध्यक्ष-संस्कृत विभाग 
ने.मि.शि.ना. दास कॉलेज, बदायूँ 
पत्राचार : मारुति निलयम, विजयनगर कॉलोनी, 
बदायूँ-24360/उ.प्र. 
मो. 940428876 
पुराण भारतीय साहित्य के गौरव ग्रन्थ है। बिना पुराण के अध्ययन के कोई 
भी व्यक्ति विचक्षण एवं शास्त्र कुशल नहीं हो सकता। पुराण तो हमारे सनातन 
धर्म के प्रामाणिक तथा प्राचीन ग्रन्थ हैं। वेद का उपबृंहण करने वाला पुराण 
इसीलिए वेद का पूरक माना जाता है। 
प्राचीन भारत का काल और विज्ञान, पशु तथा पक्षी विज्ञान, वनस्पति, 
आयुर्वेद सब एकत्र कर पुराणों में भर दिया गया है। इसका परिणाम यह है कि 
पुराण विश्वविद्या का कोष हैं। अग्नि, नारद, भरुड़ पुराणों की रचना ज्ञान-विज्ञान 
को लोकप्रिय बनाने के लिये की गई है। पुराण जनता का ग्रन्थ है विद्वानों का 
नहीं। पुराण सरल भाषा में रचित ग्रन्थ है शास्त्रीय भाषा में नहीं। आजकल के 
पापूलर-एजूकेशन की दृष्टि इस विषय में पौराणिक दृष्टि का अनुगमन करती है। 
पुराण वास्तविक अर्थ-प्राचीन या पुराना है, इसमें प्राचीन कथानक, इतिहास, 
भूगोल, ज्ञान-विज्ञान आदि सभी प्रांचीन तत्त्वों का समवेश है, अतः इसे पुराण नाम 
दिया गया। प्राचीन परम्परा के प्रतिपादक ग्रन्थों को पुराण, विश्वरचना के इतिहास 
को भी पुराण ही कहा है। 
इनकी रचना काल के अन्तर्गत पुराणों की पूर्व सीमा 600 ईं. पूर्व के लगभग 
और अन्तिम सीमा 500 ई. के लगभग मानी जा त्तकती है। 
पुराणों में मुख्य काल रूप से प्रतिपाद्य विषयों का विवरण इस प्रकार मिलता 
है यथा-() किसी देव या देवी की उपासना एवं उसी को सबसे बड़ी शक्ति 
मानना तथा देवों से बड़ा मानना। (2) ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किसी एक को 
इष्टदेव मानना (3) सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का वर्णन करना (4) देवों, 
ऋषियों और महर्षियों की वंशावली तथा उनका जीवनवृत्त देना (5) प्रत्येक मनु 
का नाम उसका समय तथा प्रमुख घटनाएं (6) नन्द, मौर्य-शुंग, आन्ध्र और गुप्त 
आदि सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी राजाओं का वर्णन (7) तीर्थों, भौगोलिक स्थानों एवं 
तीर्थ यात्राओं का वर्णन (8) व्रत, जप, उपवास, प्रार्थना उपासना एवं विविध 
इष्टियों का अनुप्ठान सहित वर्णन (9) अवतारवाद, मूर्ति पूजा एयं देवी ऐशशाएँं 
में अतिशय श्रृद्धा की स्थापना (0) सगुणोपासना एवं भक्ति मार्ग को प्रमुखता 
का वर्णन (॥) दार्शनिक, धार्मिक, राजनीति एवं आचार शास्त्रीय विषयों का 
0 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 








विश्लेषण (2) व्याकरण, काव्यशास्त्र, ज्योतिष, शरीर-विज्ञान, आयुर्वेद आदि 
_ शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बद्ध तथ्यों का संकलन। 
पुराणों के ग्राह्म विषयों में सर्वप्रथम धार्मिक विषय आते हैं, सनातन धर्म 
इनको वेदों के तुल्य ही अप्राप्त एवं प्रामाणिक मानता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, 
गणेश, सूर्य की उपासना पद्धति का प्रमाणिक बोध पुराणों से ही ग्राह्म है। 
राजा परीक्षित से लेकर पद्दनन्द तक का अज्ञात इतिहास पुराणों से ही 
मिलता है। मौर्य वंशावली के लिये विष्णु पुराण, आन्ध्रवंशावली के लिये मत्स्य 
पुराण, गुप्त वंशावली के लिये वायु पुराण अत्यन्त प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं। इनके 
अन्त में आभीर गर्दनभ, शक, यवन, तुषार हृण आदि राजवंशों की वंशावली 
इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रकट करते हुए साहित्य के लिये ग्राह्म विषय माने 
जा सकते हैं। 
पुराणों में चतुर्दीपा वसुमती, सत्पद्वीपा वसुधा 8 द्वीप 4 भुवन, क्षीर सागर 
आदि भू-विभाजन, तीर्थों, समुद्रों-नदियों पर्वतों एवं भौगोलिक महत्व के स्थानों का 
यत्र-तत्र वर्णन मिलता है जिससे काव्यों में इनका वर्णन साहित्य श्री वृद्धि को ही 
प्रकट करता है। 
पुराणों में वर्णाश्रम के गुण-कर्म विविध संस्कार आश्रम पारिवारिक सम्बन्ध 
गुरु-शिष्य परम्परा एवं धर्म राजधर्म आदि का महत्वपूर्ण विवेचन पुराणों के ही 
ग्राह्म विषय हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण छन्द ज्योतिष, धर्मशास्त्र, दर्शन, 
आयुर्वेद शरीर-विज्ञान आदि शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विषयों का महत्वपूर्ण विवेचन 
उपलब्ध है। 
पुराणों का एक और ग्राह्म विषय है अवतारवाद- जिसका अर्थ पुराणों में 
आविर्भाव का प्रयोग पाया जाता है। अवतार की बात किसी अलौकिक शक्ति से 
सम्पन्न व्यक्ति भगवान विष्णु, शंकर या इन्द्र आदि के लिये ही उपयुक्त मानी 
जाती है। कार्यवंश व भगवान का बिना रूप परिवर्तन किये ही आविर्भाव होना 
अवतार के भीतर ही माना जाता है। 
पुराणों ने सभी वर्णो के लिये लोक-परलोक में आनन्द से जीवन प्राप्त करने 
का सबसे सुगम उपाय बतलाया है। पुराणों में प्रतिपादित एकादशी व्रत का 
अनुष्ठान सुखपूर्वक अल्प-धन से तथा स्वल्प क्लेश से किया जा सकता है। फल 
की महानता हेतु यमलोक से निवृत्ति पाने की अभिलाषा से प्रत्येक मनुष्य को 
यावज्जीवन एकादशी व्रत करना चाहिये। 
जनता के कल्याण के लिये, नाली, कूप, तालाब का खुदवाना, मन्दिर का 
निर्माण करना, याचकों को अन्न प्रदान करना पूर्द कहलाता है। और इसी धर्म का 
अनुष्ठान पुराणों के द्वारा बहुशः पतिष्ठित है। परोपकार को ही मुख्य धर्म बतलाने 
वाले कतिपय मुख्य दृष्टव्य एवं ग्राह्म है। पुराणों में ती्थों का महत्व एवं महिमा 


का विपुल वर्णन मिलता है। तीर्थ यात्रा के पौराणिक प्रसंगों को भूगोल का पूरक 
मानना चाहिये । किसी स्थान पर किसी विशिष्ट द्वारा की गई तपश्चर्या से परिप्रृत 
स्थान विशेष की संज्ञा तीर्थ है। 

अतः यह सर्वविदित है कि पुराण बहुविद्या के आकर-प्रन्थ हैं। वाल्मीकिरामायण 
का वर्ण्य भी विविधिवर्णी है। भूगोल, राजधर्म, राजनीति, लोकनीति, समाज-धर्म 
पारिवारिक-दायित्व मानव-मूल्य, देव-माहात्म्य, स्वास्थ्य-रक्षा, आयुर्वेद सहित ऐसा 
कौन सा विषय है जो इसमें सविस्तार वर्णित न हो। 

मेरी अतिशय प्रिय डॉ. (श्रीमती) प्रेरणा माथुर ने कठोर श्रम करके इस ग्रन्थ 
का आयोजन किया है। मेरा विश्वास है कि यह ग्रन्थ भारतीय-चिकित्सा शैली एवं 
भारतीय चिकित्सकों का पाथेय बनेगा। इस ग्रन्थ के माध्यम से हमारी वर्षों पुरानी 
मान्यता “जीवेमः: शरद शतम्‌” का परिपाक हो ऐसी माँ वागेश्वरी से मैं याचना 
करता हूँ। 

और अन्त में ग्रन्थकर्त्री डॉ. प्रेरणा माथुर को अनगिन आशीष देते हुए उनके 
शुभ की कामना करता हूँ। 

इत्यलम्‌ 

दिनांक : 5-2-200 सस्नेह 

डॉ. सनत्कुमार शास्त्री 


2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


















































छः 











































दो शब्द 


वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वाल्मीकि रामायण के आभ्यन्तर निर्हत आयुर्वेदिक सामग्री के मूल्यांकन का चिर- 
प्रतीक्षित प्रयास है। संस्कृत वाड्मय में “वाल्मीकि रामायण” का एक महत्त्वपूर्ण 
स्थान है। महाकाव्य के सभी लक्षणों के अतिरिक्त इसमें अनेक विषयों का 
समावेश है। “रामायण” भारतीय साहित्य का पहला महाकाव्य और विश्व साहित्य 
के प्राचीनतम महाकाव्यों की तुलना में भाषा भाव व छन्द रचना विधान एवं रस 
व्यंजना सभी दृष्टियों से एक उत्कृष्ट कृति प्रमाणित हो चुकी है। यदि कवि के इस 
असामान्य व्यक्तित्व का परिचय “रामायण” एक ऐसी कृति है, जिसकी प्रत्येक 
बात, अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई है। उसकी सर्वांगीण भावना का परिचय 
उसके कलेवर में ही परोक्ष रूप से मिलता है उसकी इस सर्वाज्लीण भावना को लक्ष्य 
करते हुए स्थान-स्थान पर कभी उसे “काव्य” कभी “आख्यान” कभी “गीता” और 
कभी “संहिता” कहकर स्मरण किया गया है। 

रामायण सम्बन्धी आख्यान काव्यों की वास्तविक रचना वैदिक काल के 
बाद इक्ष्वाकु वंश के सूतों ने आरम्भ की। इन्हीं आख्यान काव्यों के आधार पर 
वाल्मीकि ने “रामायण” की रचना की इस “रामायण में अयोध्याकाण्ड से लेकर 
युद्धकाण्ड तक की कथावस्तु का वर्णन था और उसमें सिर्फ 2000 श्लोक यै। 

महामुनि वाल्मीकिकृत “रामायण” के कलेवर का मूल रूप क्या था और 
उसमें कितने श्लोक थे, इस सम्बन्ध में प्राचीन ग्रन्थों से लेकर आधुनिक विद्वानों 
तक अलग-अलग स्थापनाएँ देखने को मिलती हैं। यह प्रवाद है कि वाल्मीकि मुनि 
ने रामायण कथा को 00 करोड़ श्लोकों में निवृत्त किया था। 'रामायण” के बाल 
काण्ड में रामायण” के कलेवर के सम्बन्ध में जो 500 सर्गों और 24000 श्लोकों 


4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


का उल्लेख है वह भी प्रक्षिप्त अंश होने से- विश्वास योग्य नहीं है। 'पद्मपुराण' 

के शेषांश है- 

ततः स वर्णयामास राघवं-ग्रन्थकोटिभिः 

महामुनि वाल्मीकि के नाम से उपलब्ध “रामायण” की वर्तमान प्रति सात 
खण्डों में एवं 24,000 श्लाकों में मिलती है। “रामायण” की जो प्राचीन हस्तलिखित 
प्रतियाँ उपलब्ध हुई हैं उनके साथ मिलान करने पर वर्तमान प्रति का कलेवर-विस्तार 
ठीक-ठीक नहीं मिलता। “रामायण” के संप्रति चार प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध 
एवं प्रचलित हैं : 

. औदीच्च : गुजराती प्रिंटिंग प्रेस बंबई, और निर्णय सागर प्रेस बंबई से 
प्रकाशित है। यह पाठ अधिक प्रचलित एवं प्रामाणिक है। इसी पर नागेश 
भट्ट की “रामीया व्याख्या" टीका है। 

2. गौडीय : दूसरा संस्करण डॉ. जी. गोरेसियो ने 848-67 के बीच कलकत्ता 
संस्कृत सीरीज से प्रकाशित किया और उन्होंने ही इटेलियन में अनुवाद कर 
उसको पेरिस से भी प्रकाशित किया। 

3. पश्चिमोत्तीय : इसको काश्मीरी संस्करण कहा जाता है, जिसका प्रकाशन 
928 ई. में डी. ए. वी. कॉलेज लाहौर से हुआ। इसका प्रचलन उत्तर-पश्चिम 
में है। 

4. दाक्षिणात्त्य : चौथा दाक्षिणात्त्य संस्करण माध्यविलास बुक डिपो कुमकोवम, 
मद्रास से 929-80 के बीच दो जिल्दों में प्रकाशित हुआ। बम्बई के 
संस्करण से यह अभिन्‍न है। 

“रामायण' जैसे लोकप्रिय ग्रन्थ पर अनेक टीकाएं लिखी गयीं, जिनमें से कुछ 
ही सम्प्रति उपलब्ध हैं। इन टीकाओं में रामवर्मन्‌ “तिलक” टीका अधिक प्रमाणित 
एवं विख्यात है। रामवर्मन से पहले भी “रामायण” पर एक टीका लिखी गयी थी, 
जिसका नाम 'कतक' था और जिसको बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अपनी 
वतिलक' टीका में उद्धृत किया है; किन्तु वह आज प्राप्त नहीं है। 

इसके अतिरिक्त माहेश्वरी तीर्थ कृत “रामायण-तत्त्व-दीपिका; श्री राम कृत 
“अमृत-कटक; गोविन्द राज कृत “श्रृंगांर' (भूषण), रामानन्द तीर्थ-कृत “रामायण-कूट' 
अहोबल कृत “वाल्मीकि हृदय; अप्पय-दीक्षित कृत “रामायण-तात्पर्य संग्रह; 
ज्यम्बक मा्खिन कृत “धर्माकूत; विश्वनाथ कृत “वाल्मीकि-तात्पर्य तरणि:! और 
वरदराज मैथिल भट्ट कृत “विवेक तिलक” उल्लेखनीय टीकाएं हैं। नागेश भट्ट ने 
भी “रामायण” पर '“रामीया व्याख्या -नामक एक सुंदर टीका लिखी। 

प्रस्तुत ग्रन्थ का आधार “वाल्मीकि रामायण” का दाक्षिणात्य संस्करण 

दो शब्दू-/ 5 


(औदीच्य भी वही है) है। इसी का सर्वत्र प्रचार तथा प्रामाण्य है। गीता प्रेस, . 
गोरखपुर का तीसरा संस्करण (सं. 2033) जो दाक्षिणात्य संस्करण तथा औदीच्य 
संस्करण पर पूर्णतया आधारित है, इस ग्रन्थ का प्रमुख मार्ग-दर्शक है। 

“वाल्मीकि-रामायण” के सभी संस्करणों में आयुर्वेद विषयक सामग्री प्रायः 
समान ही है। महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष, तन्त्र, आयुर्वेद शकुन आदि शास्त्रों की 
प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। यथा त्रिजय्‌ के स्वप्न, श्री राम का यात्रा 
कालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकानों का प्रतिपादन (लंका 
कांड 0 वां सर्ग) आदि ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञापक तथा समर्थक हैं। श्री राम जब 
अयोध्या से चलते हैं तब नौ ग्रह एकत्र हो जाते हैं-इससे लंका युद्ध होता है। 
दशरथ जी श्री राम से ज्योतिषियों द्वारा अपने अनिष्ट फलादेश की बात बतलाते 
हैं। (अयो.4/8 )) युद्ध काण्ड 02/32-34 के श्लोकों में रावण-मरण के समय 
की गृह स्थिति भी ध्येय है। युद्ध काण्ड सर्ग में आयुर्वेदविज्ञान की बातें हैं। युद्ध 
8 वें सर्ग तथा 65/2 से 25 श्लोक तक राजनीति है। यु. कां. 73/24-28 में 
तन्त्र शास्त्र की भी प्रक्रियाएँ हैं। इसमें रावण तथा मेद्यनाद को भारी तान्त्रिक 
दिखलाया गया है। मेद्वनाद की सब विजय तन्‍्त्र मूलक है। जब वह जीवित 
कृष्णछाग की बलि देता है, तब तप्तकाञ्चन के तुल्य अग्नि की दक्षिणावर्त 
शिखाएँ उसे विजय सूचित करती हैं-'प्रदक्षिणावर्त-शिखस्तप्तकाञ्वचन संनिभः ।' 
(6/73/28) रावण भी भारी तान्त्रिक है। उसकी ध्वजा पर (कौल-चिन्ह) 
नरशिरकपाल-मनुष्य की खोपड़ी का चिन्ह था। (6/00/4) किंतु उसके पराभव 
आदि द्वारा ऋषि वाम-मार्ग के इन बलि मांस-सुरादि क्रियाओं की असमीचीनता ही 
प्रदर्शित करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी “तजि श्रुति पंथ बाम मग 
चलही'-अयो. 68/7-8, 'कौल काम बस कृपन बिमूढा (लंका) आदि से इसी बात 
का समर्थन किया है, भगवान श्री राम समयमार्ग के उपासक दीखते हैं। इस प्रकार 
हमें महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष, तन्त्र आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रों की प्राचीनता 
एवं समीचीनता ज्ञात होती है। 

प्रस्तुत ग्रन्थ 0 परिवर्तों में विभाजित किया गया है। 

प्रथमः परिवर्त शीर्षक “विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 
है” जिसमें संस्कृत साहित्य की विशालता, वाल्मीकि रामायण का स्वरूप, साहित्यिक 
ग्रन्थों का आयुर्वेद दृष्टि से महत्त्व, आयुर्वेद का स्वरूप एवं अष्टाइ़, आयुर्वेद का 
साहित्य-विभाजन एवं वाल्मीकि रामायण के समक्ष विद्यमान आयुर्वेद आदि विषयों 
पर विचार किया गया है। 


द्वितीय परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामाग्रण में शरीर-विज्ञान प्रकरण” है 
जिसमें आयु और उसका आधार, आत्म-तत्त्व, शरीर की रचना, प्रणिभाग अन्तःकरण 
6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


इन्द्रियां, प्रकृति भेद, प्रशस्त सामुद्रिक लक्षण, स्वास्थ्य का महत्त्व, स्वास्थ्य को 
प्रभावित करने वाले तत्त्व माँस तत्त्व, स्वस्थवृत्त एवं सदवृन्‍्त आदि विषयों पर 
विचार किया गया है। 

तृतीय परिवर्त का शीर्षक “शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थ वृत्त की सामग्री 
है जिसमें दिनचर्या, सन्ध्योपासना, सामाजिक स्वस्थवृत्त, सदृवृत्त या आचार-परक 
स्वस्थवृत्त भक्ष्याभक्ष्विचार, आहार, भोजन के गुण, प्रकार, षट्रस पेय-भोजन, 
भोजनोत्तर कर्म, माध्यनिन्दनीयकर्म, रात्रिचर्या मधुपान, मदिरापान, ऋतुचर्या आदि 
विषयों पर विचार किया गया है। 

चतुर्थ परिवर्त का शीर्षक वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध-परिचय एवं 
द्रव्य-गुण शास्त्र की सामग्री है। इसके अन्तर्गत भौतिक एवं प्राकृतिक औषधियों 
यथा पृथ्वी, जल अग्नि, वायु आदि वानस्पत्य औषधियों यथा अगर, अर्जुन, 
अनार, अश्वत्थ आदि, धातुज औषधियों यथा हिरष्य पिज्ञाः नमः वज़ः आदि पर 
विचार किया गया है। 

पज्चम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण” है 
इसके अन्तर्गत शारीरिक कारण यथा वात-पित्त-कफ आंदि, मानसिक कारण यथा 
काम, क्रोध, मोह आदि, आगन्तुक कारण-आधघातजन्य, ऋतु सम्बन्धी, स्थान 
सम्बन्धी आदि विषयों पर विचार किया गया है। 

षष्ठ परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका 
निदान” है इसके अन्तर्गत शारीरिक रोग यथा अतिसार ज्वर, अंग-भेदन, शिरो-रोग, 
राज यक्ष्मा, कुष्ठ, गुल्म व्रण आदि, मानसिक रोग-मूर्चर्छा उन्‍्माद अपस्मार आदि, 
आगन्तुक रोग अर्दित-आघात, वमन विरेचन आदि, स्त्री रोग एवं गर्भावक्रान्ति 
यथा रजस्वला, गर्भहास॑ गूढ़ गर्भ आदि उदर-पाटन द्वारा गर्भ निकालना। आदि 
विषयों पर विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त विष-विधान यथा सर्प विष 
कन्द विष एवं कृत्रिम विष आदि पर भी विचार किया गया है। 

सप्तम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा 
विधान” है जिसमें अग्नि द्वारा, चिकित्सा जल द्वारा, मृत्तिका द्वारा एवं वायु द्वारा 
चिकित्सा आदि विषयों पर विचार किया गया है। 

अष्टम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में तान्त्रिक चिकित्सा एवं 
भूत-विद्या विषयक सामग्री” है। इसमें मणि बन्धन अभिमार्जन, कृत्या आशीर्वाद 
तंत्र-मंत्र, अपमृत्यु निवारक उपचार, शकुन-विज्ञान, स्वप्न विज्ञान आदि का वर्णन 
किया गया है। 

नवमू परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में शल्य-चिकित्सा विधान” है 


दो शब्द / ॥7 


जिसके अन्तर्गत शल्य अवस्था उपकरण, विधियाँ, रोगीः परिचर्या, मेषवृषण आदि 
विषयों पर विचार किया गया है। 

दशम परिवर्त अंतिम परिवर्त है। इसका शीर्षक “उपसंहार-निष्कर्ष एवं 
मूल्यांकन” है। इसमें ग्रन्थ का सार दोहन कर उपलब्धियों की उपस्थापना की गई 
है। इसी में परिशिष्ट भी वर्णित किया गया है। 

6 परिशिष्टों में रामायण-उपन्यस्त वनस्पतियों, औषधियों, रोगों, खनिज 
द्रव्यों, जाइ्षम द्रव्यों शरीर विशेषज्ञों एवं शरीरावयवों आदि की ससन्दर्भ तालिका 
भी प्रस्तुत की गयी है। 

प्रस्तुत अध्ययन परिपूर्ण हो जाने पर मेरा अपना यह नम्र निवेदन है कि 
साहित्य-काव्य में कुछ एक काव्यग्रन्थों के अतिरिक्त रामायण ही प्रमुख काव्यग्रन्थ 
है जिसमें आयुर्वेद की प्रचुर सामग्री विद्यमान है। यह केवल आयुर्वेद के विभिन्‍न 
ग्रन्थों के विशिष्ट अंश का संग्रह मात्र ही नहीं है अपितु लुप्त-गुप्त एवं अद्यावधि 
अप्रकाशित आयुर्वेद के तथ्य पर भी प्रकाश डालने वाला है। इस काल में 
शल्य-चिकित्सा की उपलब्धि हो गयी थी तथा संजीवनी विशल्यकरणी जैसी 
अचूक औषधियाँ भी प्राप्त होती थीं। 

वाल्मीकि रामायण का राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अन्य विविध दृष्टि 
कोणों से सम्बन्धित अध्ययन किया जा चुका है, किन्तु इसमें निहित आयुर्वेदिक 
तत्त्वों की ओर किसी भी विद्वज्जन का ध्यान नहीं गया है। 

मेरी बाल्य-काल से ही वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद दोनों के प्रति विशेष 
रूचि थी। इसी कारण मैं इसी क्षेत्र में कुछ शोध-पूर्ण कार्य करना चाहती थी, 
किन्तु दो अलग-अलग तथा व्यापक क्षेत्र होने के कारण निर्णय नहीं कर पा रही 
थी किन्तु पिताश्री का आयुर्वेद के प्रति लगाव एवं माता जी की धार्मिक प्रवृत्ति 
ने शीघ्र ही मुझे प्रस्तुत विषय प्रदान किया। अतः परिवार में आयुर्वेद का 
वातावरण होने के-कारण “वाल्मीकि रामायण' में आयुर्वेदिक सामग्री को खोजने के 
प्रति किया गया प्रयास विद्वानों के सम्मुख प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया जा 
रहा है। इस आधार पर आयुर्वेदिक सामग्री को संकलित कर उनका भारतीय 
इतिहास के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करना भारतीय साहित्य, आयुर्वेद और इतिहास 
दोनों के लिये बहुमूल्य है। इसी आधार पर मुझे “वाल्मीकि रामायण' में प्रतिपादित 
आयुर्वेदिक सामग्री पर कार्य करने की प्रेरणा मिली। रामायण का आयुर्वेदिक दृष्टि . 
से समीक्षात्मक- अध्ययन करना अधिक उपयोगी है, क्योंकि अभी तक उसकी 
आयुर्वेदिक सामग्री का समीक्षात्मक दृष्टि से कहीं भी सर्वाज्ञीण. अध्ययन नहीं हुआ 
है। 


8 / वाल्मीकिं रामायण तथा आयुर्वेद 


इस ग्रन्थ का वैशिष्टय इस प्रकार है- 

. “रामायण में उपन्यस्त आयुर्वेदिक विषयों के पाठों को तत्तत्‌ स्रोत विषयों से 
तुलना कर उनकी पाठ शुद्धि की गयी है तथा यह पाठ शुद्धि अभी तक 
रामायण के किसी भी प्रकाशित संस्करण या उस पर किये गये किसी भी 
अध्ययन ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है। 

2. चरक, सुश्रुत, अष्टाइसंग्रह, अष्टाइ हृदय, भाव प्रकाश आदि में उपलब्ध 
अनेक विषयों का परीक्षण रामायण के प्रकाश में किया गया है। 

3. परिशिष्ट में आगामी शोध कार्यकारणार्थ विभिन्‍न वनस्पतियों, धातु उपधातुओं, 
खनिजों, रत्नों, खादूयद्रव्यों, शरीरावयव-पर्यायों, रोगों एवं स्नोतोभूत समान 
श्लोकों की तुलनात्मक तालिका ससन्दर्भ प्रस्तुत कर दी गयी है ताकि 
सम्बन्ध क्षेत्र के तद्‌विद, विद्वान उनका लाभ उठा सकें। 

4. रोगो में वैदिक एवं तान्त्रिक प्रक्रियाओं का उपस्थापना 
इस ग्रन्थ की पूर्णता हेतु- मैं सर्व प्रथम अपने श्रेष्ठ गुरुदेव डॉ. सनत्कुमार 

शास्त्री जी के प्रति कृतज्ञता पूर्वक आभार प्रकट करती हूँ कि उन्होंने अपने 

व्यस्ततम जीवन में मुझे सदैव अमूल्य समय दिया तथा मुझ निरुत्साहित को सदा 
उत्साह प्रदान करते हुए कार्य पथ पर चलने की प्रेरणा दी तथा समय-समय पर 
मेरा मार्ग प्रशस्त किया- गूढ़ रहस्य युक्त तथ्यों एवं गुत्थियों को सुलझाने में भी 
मेरी सहायता की। आज उन्हीं के चिराशीष से मैं इसको विद्वानों के समक्ष इस 
भावना से प्रस्तुत कर रही हूँ कि इस विषय पर विशेष कार्य करने की इच्छा अभी 
भी मुझमें है। 

इस ग्रन्थ को लिखने में जिन-जिन स्वनामधन्य महानुभावों से सहयोग मिला 
उनमें मेरे परम पूजनीय पिता श्री आचार्य मुक्तेश माथुर का नाम सर्वाग्रणी है, 
उन्हीं के प्रयासों एवं आशीर्वाद से मैं आज सफलता की इस सीपान पर पहुँची हूँ। 
मेरे पूर्व जन्मों में किये गये सत्कर्मों का ही यह परिणाम है, जो मैंने उन्हें पिता के 
रूप में पाया। जीवन के जिस क्षेत्र में और इस प्रबन्ध को लिखते समय जहाँ भी 
मैं उत्साहहीन या परेशान होती दिखाई दी, उन्होंने सदैव मुझे समझाया तथा 
कर्त्तव्यबोध कराया उनकी यहाँ प्रशंसा करते हुए आज मुझे अत्यन्त हर्ष हो रहा 
है। 

इस ग्रन्थ की पूर्ति में मेरी प्रेरणास्रोत माता श्रीमती चन्द्रकान्ति माथुर का 
वरदहस्त भी सदा मुझे प्राप्त होता रहा है जिन्होंने मेरे कार्य में होने वाली त्रुटियों 
का सूक्ष्म अवलोकन कर मुझे सदैव श्रेष्ठ कार्य के लिये प्रेरित किया और इस कार्य 
की पूर्ति में मेरा सहयोग किया। सरस्वती स्वरूपा माँ को प्राप्त कर आज मैं स्वयं 


दो शब्द / 9 


को सर्वाधिक भाग्य-शालिनी अनुभव कर रही हूँ। 

मैं अपने परम आदरणीय गुरु श्री बी. बी. एल. अग्रवाल प्राचार्य, सम्माननीय 
अंकल डॉ. यू. सी. सक्‍्सैना (एलोपैथिक चिकित्सक) गुरु तुल्य सम्माननीय 
बाबा-वैद्य श्री तेज पाल शर्मा (आयुर्वेदिक चिकित्सा) के प्रति हृदय से कृतज्ञता 
ज्ञापन करना अपना परम कर्त्तव्य समझती हूँ, जिन्होंने समय-समय पर अपने 
बहुमूल्य सुझावों से मेरा पथ-प्रदर्शन किया। 

कर्त्तव्य-पथ का बोध कराने में सदैव अग्रणी अपनी नानी जी श्रीमती 
आनन्दी देवी को विस्मृत कर देना मेरी महान मूर्खता ही होगी, जिन्होंने सदा अपने 
आशीर्वाद एवं स्नेह से मेरा मार्ग प्रशस्त किया। 

गुरु परिवार के प्रेम की मैं चिरऋ्णी रहूँगी। गुरु पत्नी श्रीमती राकेश शर्मा, 
प्रणव शर्मा, सोनी (पीयूष) एवं बहिन प्रत्यूषा एवं पल्‍लवी का स्नेह एवं सम्मान 
भाव सदैव मुझे सत्कार्य के लिये प्रेरित करता रहेगा, जिन्होंने सदैव मुझे बड़ी बहिन 
के समान सम्मान एवं सत्कार दिया। 

इस ग्रन्थ को अंतिम चरण तक पहुँचाने में जिन आदरणीय महानुभवों से 
सहयोग मिला उनमें, जहाँ मुझे स्वयं से एक पल भी न दूर कर पाने वाले 
अपरिमित प्रेम वर्षक श्रद्धेय एवं पूजनीय पतिदेव “श्री राजीव माथुर” का 
नामोल्लेख करते हुए सौभाग्य का अनुभव हो रहा है, वहीं अपने आदरणीय पिता 
श्री (श्वसुर) श्री राम किशोर जी माथुर एवं माता जी (सास) श्रीमती कृपा माथुर 
की कृपा, स्नेह एवं पथ-प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए भी अपार हर्ष हो रहा है। 
इस कार्य की पूर्ति हेतु मेरी छोटी बहिन पूनम (नन्द) एवं छोटे भाई संजीव (देवर) 
भी धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने इस कार्य को पूरा कराने में मेरी सहायता की। 

मेरे कार्य में अनेक अवरोध और प्रतिरोध उत्पन्न हुए जिनसे मैं कई बार 
किंकर्त्तव्यविमूढ जैसा आचरण करने लगी, किंतु उनके निवारण में मेरे छोटे भाई 
मयंक माथुर ने मुझे अविस्मरणीय प्रेरणा दी तथा मेरे कार्य में हर सम्भव मेरी 
सहायता की। मेरा आशीर्वाद एवं शुभ कामनाएँ सदैव उसके साथ रहेंगी। 

इस ग्रन्थ की पूर्ति के लिये मैं अपने मौसेरे भाई स्व. श्री योगेश माथुर की 
भी हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने विविध पुस्तकालयों एवं चिकित्सालयों आदि में 
मुझे स्वयं ले जाकर मेरी विविध प्रकार से सहायता की। 

इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु मैं अब उन नये लोगों की भी हृदय से आभारी 
हूँ जो इसके लेखन काल में नहीं थे, पर प्रकाशन में उन्होंने मेरा हर सम्भव 
सहयोग किया जिनमें सर्वप्रथम-मैं अपने दोनों पुत्रों 'मेधज माथुर” एवं 'शिवांग 
माथुर” को अनेकशः आशीष देना चाहूंगी क्योंकि उन्हीं के समय में से समय लेकर 


20 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मैं इस कार्य का प्रकाशन करा सकी। मैं अपने छात्र डॉ. शिवशंकरं, डॉ. बिन्दु की 
भी आभारी हूँ। अन्त में मैं भैया सुरेश चौधरी जी का भी हृदय से आभार व्यक्त 
करती हूँ जिन्होंने अत्यन्त अल्प समय में इसका सुन्दर प्रकाशन किया। 

इस ग्रन्थ में मानव सुलभ अनेक न्यूनताओं का रह जाना स्वाभाविक है 
अतः मैं उसके लिये क्षमाप्रार्थी हैँ। आशा है इस दिशा में मुझसे उत्तरकालीन 
व्यक्तियों द्वारा और भी सुन्दर कार्य सम्पन्न हो सकेंगे। 


“प्रेरणा माथुर 


दो शब्द / 2 





संकेत सूची 


संकेत 
च. सू. 
आ. सं. सू. 
सु. सू. 
अ. ह. 
च. सू. नि. 
च. सू. वि. 
सु. सू. पू. 
सु. सू. उ. 
शा. सं. 
* वा. रा. कि. 
- बा. 20/30 
- अयो. 
आर. 
- कि. 
+-यँं; 
.. प्र. 7/2 
.. 8 / प्रा. 
* नया. सू. 
- आ. वै. इ. 


9 फफका कछ ए के ७ ७ 


शक कु हा कक पाक 5७: 03.५ कह 8 ० उस. हक ४ 
४ ह#& छ ७ 3 9 छ ७ छ 5 ८४8 


22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


विस्तृत रूप 

चरक सूत्र 

अष्टाड़ संग्रह सूत्र 

चुश्ुत सूत्र 

अष्टाड हृदय 

चरक सूत्र निदान 

चरक सूत्र विमान 

सुश्रुत सूत्र (संहिता) पूर्वाद्ध 
सुश्ुत सूत्र (संहिता) उत्तरार्द्ध 
शारइ्धर संहिता पु 
वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा 
बालकाण्ड 20 वाँ सर्ग 30 वाँ श्लोक 
अयोध्या काण्ड 

अरण्य काण्ड 

किष्किन्धा काण्ड 

सुन्दर काण्ड 

युद्ध काण्ड 

उत्तर काण्ड 

प्रक्षिप्त सर्ग |/2 

3वें सर्ग का. प्रारम्भ 

न्याय सूत्र 

आयुर्वेद का वैज्ञानिक इतिहास 


अनुक्रम 


प्रथम परिवर्त- विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन. -92 
द्वितीय परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण ' 938-60 
तृतीय पंरिवर्त-शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थ वृत्त की सामग्री 6-229 
चतुर्थ परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध-परिचय एवं 

द्रव्य गुण शास्त्र की सामग्री 280-554 
पंचम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण 255-874 
षष्ठ परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान 375-455 
सप्तम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान 456-467 
अष्टम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं 

भूत विद्या विषयक सामग्री 468-490 
नवम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में शल्य-चिकित्सा विधान 49-506 
दशम परिवर्त-उपसंहार-निष्कर्ष एवं मूल्यांकन 507-564 





























न 











प्रथम परिवर्त 


विषयावतरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 


प्रथम परिच्छेद 
संस्कृत साहित्य की विशालता 

संस्कृत भारत की प्राचीनतम भाषा है और इसका देव-वाणी नाम इसकी इसी 
पुरातनता को द्योतित करता है। संस्कृत भाषा के वाजइमय में हम भारत के 
साहित्यिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं राजनीतिक जीवन 
की समग्र झाँकी पा सकते हैं। 

प्राचीन काल में संस्कृत का प्रयोग केवल पठन-पाठन में ही नहीं होता था, 
वरन्‌ जन सामान्य अपने दैनिक व्यवहार में भी इस भाषा का प्रयोग करते थे। 
रामायण में इल्वल राक्षस ने ब्राह्मण का रूप धारण कर ब्राह्मणों को निमंत्रित करने 
के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग किया था। अशोक वाटिका में पहुँचकर बहुत 
सोच-विचार कर हनुमान जी ने सीता से संस्कृत भाषा में ही बोलने का निश्चय 
किया।' ह 

यास्क ने वैदिक संस्कृत से इतर संस्कृत को भाषा कहकर उसका जन 
साधारण द्वारा प्रयुक्त होना सूचित किया है। पाणिनी ने भी संस्कृत को लौकिक 
भाषा कहा है। संस्कृत का प्रचार ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्णों में भी पाया 
जाता था। महाभाष्य में एक सारथि के द्वारा एक वैयाकरण से सूत शब्द की 
व्युत्यति पर विवाद किया जाना दिखाया गया है। उस समय संस्कृत बोलने वालों 
को शिष्ट कहा जाता था, किन्तु उसे न बोलने वाले भी उसे समझते अवश्य थे। 
उस समय राज-कार्य में संस्कृत का ही व्यवहार होता था। 

भारत के प्राचीन इतिहास का पर्यवेक्षण करने के लिए संस्कृत साहित्य का 
अध्ययन नितान्त अपेक्षणीय है। 

संस्कृत साहित्य में कालिदास, माघ, भारवि आदि की चुनी हुई रचनाएँ ही 
नहीं हैं, वरन्‌ वह तो विस्तृत क्षेत्र में लौकिक एवं पारलौकिक सभी विषयों का 
सूक्ष्म एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। क्‍या दर्शन, क्या ज्योतिष, क्या 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / । 


आयुर्वेद, क्या विज्ञान, क्या व्याकरण, क्या धर्म, क्या संगीत और क्या अन्य, 
अनेकों विषय-सभी की चर्चा संस्कृत साहित्य में सर्वाह्ररूपेण की गयी है। खोज 
करने पर पता चला है कि संस्कृत साहित्य के ग्रन्थों की संख्या ग्रीक और लेटिन 
के ग्रन्थों की मिली हुई संख्या से भी बहुत अधिक है। यदि किसी देश का साहित्य 
उस के समाज एवं संस्कृति का दर्पण कहा जा सकता है तो संस्कृत साहित्य 
भारतीय समाज एवं संस्कृति का वह विमल दर्पण है जिसमें अपने अतीव गौरव 
की झाँकी देखकर हम आज भी गर्व से अपना सिर ऊँचा कर सकते हैं। संस्कृत 
साहित्य की सहस्र वर्षो की अजस्र रचना के समक्ष अंग्रेजी साहित्य की अजस्नता 
अत्यधिक अल्प ही है। 
* इन्हीं सब कारणों से हमारे प्राचीन महर्षियों ने संस्कृत भाषा को देवीवाक्‌ 

अर्थात्‌ देवताओं की वाणी कहा था। दे 

संस्कृत साहित्य में काव्य की प्रथम झलक ऋग्वेद में देखने को मिलती है। 
पुनश्च ब्राह्मण-ग्रन्थों के कतिपय प्रसंगों तथा इतिहास, पुराण काल में काव्य की 
रचना का कूछ अधिक परिपाक हुआ। परन्तु महाकाव्य की रचना की दृष्टि से यह 
काल भी विवेचनीय नहीं है। वस्तुतः वाल्मीकि कृत रामायण ही हमें आदि 
महाकाव्य के रूप में उपलब्ध होती है। 
संस्कृत साहित्य दो भागों में विभक्त है 

. वैदिक साहित्य 

2. लौकिक साहित्य 

चैदिक वाड्मय प्राचीनता, उत्कृष्टता एवं साहित्यिक तथा सांस्कृतिक वैभव 
की दृष्टि से न केवल भारतीय साहित्य का उत्तमांश है, अपितु इसे भारतीय 
साहित्य का प्राचीनतम अवशेष और विश्व साहित्य की अमूल्य निधि माना जा 
सकता है। भारतीय प्रज्ञा और सारस्वत साधना का परमोज्ज्वल रूप वैदिक 
साहित्य में प्रतिष्ठित है। इसे न केवल भारतीय वाड्मय का मूर्धन्य होने का श्रेय 
है अपितु यह विश्व-साहित्य की उपलब्ध सर्वथा प्राचीन एवं महान रचना है। इसे 
भारतीय प्रतिभा एवं पाण्डित्य का महासागर कहा जा सकता है। 

वेद और वैदिक साहित्य दो भिन्‍न एवं निरपेक्ष अर्थों के द्योतक हैं। वेद से 
केवल चार मंत्र-संहिताओं का बोध होता है-कऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद 
इस प्रकार वैदिक साहित्य वेद विषयक समस्त वाड्मय का द्योतक है, जिसके 
विस्तृत परिवेश में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्‌ एवं वेदांग समाविष्ट हो 
जाते हैं। संहिता भाग.में मंत्रों का संग्रह है, जिसमें कान्तदृष्टा ऋषियों द्वारा की 
गयी स्तुतियों का संकलन है। इनमें विभिन्‍न ऋषियों-मुनियों के अनुभव लि 
आध्यात्मिक विचार संगृहीत हैं। संहिता भाग के चार खण्ड हैं-ऋक्‌, साम, यजुः 
एवं अथर्व। कालान्तर में कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड तथा ज्ञानकाण्ड के आधार 
चर ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्‌ ग्रन्थों का निर्माण हुआ। 
2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


ब्राह्मण ग्रन्थों में विधि-भाग का वर्णन किया गया है आरण्यक उन व्यक्तियों 
के लिये उपयोगी है जो वीतराग होकर, अरण्य का सेवन करते हुए शांत वातावरण 
में भगवद्‌ उपासना में लीन रहते हैं। इनमें ब्राह्मण-ग्रन्थों में वर्णित वैदिक कर्मों या 
याज्ञिक कर्मों के आध्यात्मिक पक्ष का उद्घाटन किया गया है। उपनिषद्‌ वेद के 
अन्तिम भाग हैं और वे ज्ञान-काण्ड से सम्बद्ध हैं, इनमें वैदिक मंत्रों की दार्शनिक 
व्याख्या हुई है। 

वेदांग की संख्या छः है-शिक्षा, कल्प, व्याकरण निरुक्त, छन्‍्द और ज्योतिष । 
वेदों की भाषा की शुद्धता एवं उच्चारण को सुरक्षित रखने के लिए शिक्षा ग्रन्थों 
की रचना हुई है। कल्प के चार विभाग हैं-श्रौत सूत्र, गृद्य सूत्र, धर्म सूत्र तथा 
शुल्व सूत्र । 

प्रत्येक वेद के अलग-अलग कल्प सूत्र हैं। श्रौत सूत्रों में विविध यज्ञों का 
विधान तथा गृद्य सूत्रों में सामाजिक संस्कारों-विवाह, उपनयन, श्राद्ध आदि का 
वर्णन है। धर्म सूत्रों में चारों वर्णों एवं आश्रमों के कर्तव्य-कर्म का विवेचन एवं 
शुल्व सूत्रों में वेदिका मापन विधि का वर्णन या अनुचिंतन है। व्याकरण के 
अन्तर्गत वेदों का व्याकरण प्रस्तुत किया गया है। सम्प्रति वैदिक व्याकरण उपलब्ध 
नहीं है, पाणिनी व्याकरण में ही वेदों का व्याकरण निर्मित हुआ है। निरुक्त में 
वैदिक शब्दों की व्युत्पति दी गयी है, निघण्टु की टीका का नाम निरुक्त है और 
निघण्टु में चुने हुए वैदिक शब्द हैं। छन्द के अन्तर्गत वैदिक छन्दों का विवेचन 
हुआ है। वेदों की रचना छन्दोबद्ध है। इसमें कई प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ 
है, जिनका विश्लेषण प्रतिशाख्यों तथा पिज्ललकृत “छन्द सूत्र” में किया गया-है। 
यज्ञ सम्पादन के लिये काल ज्ञान की आवश्यकता को देखकर ज्योतिष ग्रन्थों की 
रचना हुई है। इनमें रात, दिन, ऋतु, माह, वर्ष, नक्षत्र आदि का सम्यक्‌ अनुशीलन 
किया गया है। 

ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना गद्य में हुई है और प्रत्येक वेद के पृथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मण 
हैं। इनका प्रधान विषय है-कर्मकाण्ड, जिसमें यज्ञीय कमों तथा मंत्रों का 
यज्ञ-सम्बन्धी विनियोग वर्णित है तथा अनेकानेक लौकिक एवं आध्यात्मिक 
आख्यानों का कथन किया गया है। आरण्यक तो ब्राह्मण-प्रन्थों के परिशिष्ट हैं 
और इनमें दर्शन सम्बन्धी विचार भरे पड़े हैं। वेद के अन्तिम भाग को उपनिषद्‌ 
कहा जाता है जिसका प्रधान प्रतिपाद्य ब्रह्म-विद्या है। इनकी संख्या 08 से भी 
अधिक है, जिनमें ] प्रधान हैं-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्ड, माण्डूक्य, तैतिरीय, 
ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर। 


मौलिक अर्थ में वेद ज्ञान का प्रत्यापक है किन्तु “विद्या” शब्द से विद के 
इसी धातु से उत्पन्न होने के कारण मूलतः विद्या और वेद शब्द समानार्थक हैं। 
“आश्वलायन गृह्य-सूत्र' नें (0-7) वेद शब्द अनेक विद्याओं के साथ प्रयुक्त हुआ 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3 


है। 'यजुर्वेदोवेदः, 'अथर्वाणोवेद:, 'असुरविद्यावेदः, 'पुराणविद्यावेदः, 'इतिहासोवेद:” (' 
प्राचीन वाइमय में भी वेद, ब्रह्म और विद्या तीनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते 
रहे हैं। अनेक स्थलों पर तीनों वेदों के लिये “त्रयं ब्रह्म”, “त्रयीविद्या” तथा 
“त्रयोवेदाः” तीनों ही प्रकार के प्रयोग उपलब्ध होते हैं। 'शतपथ ब्राह्मण” (4/6/7/) 
में त्रयी के साथ विद्या शब्द भी. प्रयुक्त हुआ है- 
“नत्रयी वै विद्या ऋचो यजूंषि सामानि।” 
“ब्रयं ब्रह्म सनातनम्‌............. अग्यजु: सामलक्षणम्‌” ।-मनुस्मृति /28 
“शवं त्रयीधर्ममनुप्रपनना''-गीता-9/श* 
वेद विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ तथा भारतीय .संस्क्रृति के प्राण हैं। 
प्राचीन धर्म, साहित्य, सभ्यता तथा दर्शन सभी की आधारशिला वेदों के राजप्रासाद 
पर अधिष्ठित है। “वेद” का व्याकरण लब्ध अर्थ है 'ज्ञान' | मनु के अनुसार “वेद” 
पितृगण, देवता तथा मनुष्यों का सनातन तथा निरन्तर विद्यमान रहने वाला चक्ु 
है। सायण के अनुसार प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा दुर्बोध तथा अज्ञेय उपाय का ज्ञान 
कराने में वेद की वेदता है। 
वेद का प्रयोग मंत्र और ब्राह्मण के लिए हुआ है जिसका मनन किया जाये 
उसे मंत्र कहते हैं। इनके द्वारा यज्ञानुष्ठान एवं देवता की स्तुति का विधान होता 
है-मननात्‌ मंत्र: । ब्राह्मण शब्द ग्रन्थ विशेष का द्योतक है, ब्रह्मन के कई अर्थ होते 
हैं, उनमें एक अर्थ यज्ञ भी है। अतः ब्राह्मण ग्रन्थ उन्हें कहा जायेगा जिनमें यज्ञ 
की विविध क्रियाओं का वर्णन हो। 
ब्राह्मण के तीन विभाग किये जाते हैं 
. ब्राह्मण। 
2. आरण्यक। 
3. उपनिषद्‌ । 
वेदों के रूप में भारत वर्ष की अखण्ड साहित्यिक परम्परा छः सहस्र वर्षों से 
सतत प्रवाहमान है वैदिक युगीन ऋषियों ने प्रकृति के वाह्य सौन्दर्य पर मुग्ध होकर 
अपने हृदय की भावधारा की जो तीव्र अभिव्यक्ति की है, वह वैदिक साहित्य की 
ही नहीं, विश्व वाडूमयं की अपूर्व निधि है। 
वेद का समय-निरूपण 
भारतीय परम्परा वेदों को अपौरुषेय, अनादि, नित्य तथा कालावच्छिन्न , 
मानती है। इस दृष्टि से इसके अनुसार वैदिक-काल-निर्णय का प्रश्न ही नहीं 
उठता। वेद ब्रह्म की वाणी के रूप में समावृत हैं, अतः इनकी प्राचीनता सृष्टि की 
प्राचीनता से अनुस्यूत है। पर, आधुनिक युग के विद्वान वैज्ञानिक आधार पर उक्त 
विचार को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और वे प्राचीन भारतीय आचार्यों के काल 
सम्बन्धी मतों के प्रति श्रद्धा नहीं रखते। वे वेदों को ऋषि प्रणीत या उनकी कृति 
मानकर उन्हें पीरुषेय स्वीकार करते हैं। उन्होंने इन्हें मनुष्यकृत कहकर इनक़ी जो 
4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सीमा निर्धारित की उसमें निष्पक्षता का भाव अनुगुंजित नहीं होता और वह 
पूर्वाग्रहग्रस्त दीख पड़ते हैं। इनके निष्कर्षों को अन्तिम सत्य नहीं माना जा सकता, 
पर इनकी शोधात्मक पद्धति एवं निष्कषों को सर्वथा निर्मूल एवं.उपेक्षणीय नहीं 
कहा जा सकता और न इनके मतों का अवमूल्यन किया जा सकता है। 

पाश्चात्य पण्डितों में सर्वप्रथम मैक्समूलर ने इस प्रश्न की छान-बीन में 
जीवन-पर्यन्त शोध-कार्य किया। उन्होंने 859 ई. में अपने ग्रन्थ 'प्राचीन संस्कृत 
साहित्य में सर्वप्रथम ऋग्वेद” का निर्माण काल खोजने का प्रयतत किया और 
अपना निर्णय दिया कि इसकी रचना ईस्वी पूर्व बारह सौ वर्ष हुई है। उन्होंने अपने 
निर्णय का “केन्द्रीय तिथि बिन्दु बौद्ध-धर्म के उदय को मानकर'ं बताया कि उस 
समय तक सभी वैदिक साहित्य (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्‌ एवं वेदाड़) 
का निर्माण हो चुका था, ब्राह्मणों और श्रौत सूत्रों में वर्णित यज्ञानुष्ठान का ही 
बुद्धदेव द्वारा घोर विरोध किया गया था। मैक्समूलर ने समस्त वैदिक वाइमय को. 
चार युगों या भागों में विभक्त किया-छन्दकाल, मन्त्रकाल, ब्राह्मणकाल एवं 
सूत्रकाल तथा प्रत्येक काल के लिये दो-दो सौ वंषों का समय निश्चित करते हुए 
सूत्रकाल को छः सौ वर्ष ईस्वी पूर्व ब्राह्मण को छः सौ-से आठ सौ ईस्वी पूर्व और 
मन्त्रकाल को एक हजार ईस्वी पूर्व स्वीकार किया। उनके विचारानुसार वैदिक 
संहिताओं का रचनाकाल बारह सौ ईस्वी पूर्व माना गया।' 

पाश्चात्य विद्वानों को मैक्समूलर के इस अवैज्ञानिक और भ्रम पूर्ण निर्णय का 
भान हुआ और उन्होंने उनके विचारों का खण्डन किया। हिटनी ने उनकी इस 
अंध परम्परा की निंदा की तथा श्रेडर ने अपनी खोजों के आधार पर संहिताकाल 
को 500 ईस्वी पूर्व से 2000 ईस्वी पूर्व पहुँचाने का प्रयास किया, उसी समय 
हर्मन याकोबी ने ज्योतिष विज्ञान की गणना के आधार पर वेदों का समय चार 
सहस्र वर्ष ईस्वी पूर्व निर्धारित किया तथा भारतीय विद्याविद्‌ लोकमान्य तिलक ने 
ज्योतिष विज्ञान के साक्ष्य पर वेदों का रचनाकाल 6000 वि० पू० से 2500 विक्रम 
पूर्व तक निश्चित किया। तिलक के पूर्व प्रसिद्ध महाराष्ट्री विद्वान शंकर बालकृष्ण 
दीक्षित ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ भारतीय ज्योतिष” में (पूना 896) ज्योतिष गणना 
के आधार पर क्रग्वेद का काल 3500 वर्ष विक्रम पूर्व निर्धारित किया। जर्मन 
विद्वान हर्मन याकोबी ने कल्पसूत्रा के विवाह प्रकरण में वर-वधू को ध्रुव दिखाने 
के वर्णन “ध्रुव इव स्थिरा भव” का काल 2600 ईस्वी पूर्व माना है। याकोबी ने 
ऋग्वेद का काल 4000 ईस्वी पूर्व निश्चित किया है। 

भारतीय पण्डितों में डॉ> अविनाश चन्द्र व्यास ने “ऋग्वेदिक इण्डिया” नामक 
ग्रन्थ की रचना भौगोलिक तथा भूगर्भ सम्बन्धी घटनाओं के आधार पर. की और 
बताया कि वैदिक सभ्यता का आविर्भाव ईसा पूर्व 25000 वर्ष हुआ था। उनके 
इस मन्तव्य की खिल्ली उड़ाते हुए पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने इसे अवैज्ञानिक एवं 
भावुक ऋषियों की कल्पना की उक्ति प्रदान की। एक अन्य विद्वान पण्डित 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5 


दीनानाथ शास्त्री चुलेट” ने 'वेद उग्र गिर्श4' नामक ग्रन्थ में ज्योतिष शास्त्र को 
आधार ग्रहण करते हुए वेदों का निर्माण काल आज से तीन लाख वर्ष पूर्व सिद्ध 
. किया है। 

“इस प्रकार वेदों के रचना काल के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी 
मत प्रचलित हैं जिनमें समन्वय स्थापित करना सम्भव नहीं है। डॉ. विण्टरनिट्स 
ने भी इस विषय में अपने विचार रखे हैं। 

ऋग्वेद या वैदिक संहिताओं के काल-निर्णय के सम्बन्ध में पाश्चात्य पण्डितों 
के ये ही विचार हैं, जो वेदों का निर्माण काल ईस्वी पूर्व 2500 वर्ष से अधिक 
स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं, पर इस सम्बन्ध में अभी अनुसंधान अपेक्षित है। 
अनेक भारतीय विद्वानों के मतों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ईसा से 
4000 वर्ष पूर्व वैदिक संहिताओं का निर्माण काल निश्चित करना अधिक 
समीचीन प्रतीत होता है फिर भी इस सम्बन्ध में प्रामाणिक साक्ष्य के आधार पर 
कुछ भी “इदमित्थं” नहीं कहा जा सकता। 
वेदों के भाष्य 

वेद के अर्थ को स्पष्ट करने के लिये अथवा इसके निगूढ़ तत्वों की विवृति 
के लिये भाष्यों की रचना हुई है। जब वेद मन्त्रों की दुरूहता स्पष्ट होने लगी तब 
सभी वैदिक ग्रन्थों का आधार ग्रहण कर वेद भाष्यों का निर्माण होने लगा। प्रसिद्ध 
भाष्यकारों में स्कन्द स्वामी, वेंकट माधव, आनन्द तीर्थ, भट्ट भास्कर, नारायण, 
माधव भटूट, धानुष्कयज्वा, आत्मानन्द तथा सायण के नाम उल्लेखनीय हैं। 

. स्कन्द स्वामी 

ये ऋग्वेद के भाष्य कर्ता हैं। इनका समय 625 ईस्वी है। इन्होंने 'निरुक्त” पर 
भी टीका की रचना की थी। 
2. नारायण 

स्कन्द स्वामी, नारायण तथा उद्गीथ ने क्रमशः सम्मिलित रूप से ऋग्वेद 
भाष्य का प्रणयन किया है। 

3. उदगीथ 

उद्‌गीथ ने ऋग्वेद के अन्तिम भाग का भाष्य किया है। 
4. माधव भट्ट 

ऋग्वेद के माधव नामक चार भाष्यकारों का उल्लेख प्राप्त होता है। इनमें 
एक का सम्बन्ध सामवेद से तंथा शेष का सम्बन्ध ऋग्वेद से है। एक माधव तो 
सायणाचार्य ही हैं और दूसरे .वेंकट माधव। तीसरे मद्रास के हैं जिन्होंने प्रथम 
अष्टक की टीका की। 

5. वेंकट माधव + 
इन्होंने सम्पूर्ण ऋग्संहिता पर भाष्य की रचना की है। 


6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


6. धाजुष्कयज्वा 

यह 3800 वि. सं. के पूर्ववर्ती हैं। इन्होंने तीन वेदों पर भाष्य की रचना की 
है। 
7. आनन्द तीर्थ 

प्रसिद्ध द्वैतवादी आचार्य मध्व का नाम ही आनन्द तीर्थ था। इन्होंने ऋग्वेद 

. के प्रथम मण्डल के चालीस सूक्तों पर पद्यबद्ध व्याख्या लिखी है। 

8. आत्मानन्द 

इन्होंने ऋग्वेद के अन्तर्गत “अस्यवामीय” सूक्त पर भाष्य की रचना की है। 
9. सायणाचार्य हि 

वेदार्थानुशीलन के विचार से सायणाचार्य के भाष्यों का अत्यधिक महत्व है 
इसके भाष्यों को <वेदार्थ प्रकाश” के नाम से अभिहित किया जाता है। 
साम-भाष्य | 

सायण द्वारा सामवेद का भाष्य लिखने से पूर्व दो भाष्यों का उल्लेख मिलता 
है। इसके प्रथम भाष्य-कर्ता के रूप में माधव () का नाम माधव आतां- है। 
इन्होंने सामवेद के दोनों ही खण्डों-छन्द आर्चिक तथा उतरार्चिक पर अपने भाष्य 
की रचना की थी। इनके भाष्य को क्रमशः (छन्दसिका विवरण) एवं (उतर 
विवरण) कहा जाता है। 
2. भरत स्वामी छ 

इन्होंने भी सामसंहिता पर भाष्य की रचना की थी, जो प्रकाशित नहीं हुआ 
है। इन्होंने सामवेद की सभी ऋचाओं का भाष्य लिखा है, इन्होंने साम संहिता के 
अतिरिक्त साम ब्राह्मणों पर भी भाष्य लिखा है। 
3. गुणविष्णु 

इन्होंने 'साम-मन्त्र व्याख्यान” नामक सामवेद का भाष्य लिखा है। इनका 
“छन्दोग्य-मन्त्र-भाष्य” कलकत्ता से प्रकाशित हो चुका है, जो सामवेद की कौशुमशाखा 
पर है। 
शुक्ल-यजुर्वेद भाष्य 
माध्यन्दिन संहिता 

इसके दो भाष्यकार थे- 

. उब्बट। 

2. महीधर। 
4. उब्बट 

माध्यन्दिन संहिता के अतिरिक्त इनकी अन्य रचनाएँ इस प्रकार 
हैं--“ऋक्प्रतिशाख्य की टीका', यजुः प्रतिशाख्य की टीका', 'ऋक्‍्सर्वानुक्रमणी' पर 





विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ./ 7 


भाष्य तथा ईशावास्य उपनिषद्‌ पर भाष्य। 
2. महीधर 

इन्होंने 'वेददीप” नामक भाष्य की रचना की है जो कि उव्वट भाष्य की छाया 
से छायान्वित है। इन्होंने तन्‍्त्र विषयक “तन्त्र महोदधि” नामक ग्रन्थ की रचना 
की। 
काव्य संहिता भाष्य 
. हलायुध 

इनके भाष्य का नाम ब्राह्मण सर्वस्व” है। इन्होंने काण्व संहिता के उत्तरार्द्ध 
पर भाष्य की रचना की है। 
कृष्णयजुर्वेद की तैतिरीय संहिता 

इस पर सर्व-प्रथम सायण ने भाष्य लिखा। कुण्डिन ने भी 'तैतिरीय संहिता” 
पर भाष्य की रचना की है। 
अवस्वामी-ने तैतिरीय संहिता पर भाष्य की- रचना की। 
गुहदेव-देवराज्यज्वा के निघण्टुभाष्य में गुहदेव को तैतिरीय संहिता का 
भाष्यकार कहा गया है। 
खझुर-इन्होंने भी तैतिरीय संहिता पर भाष्य की रचना की। 
“संहिता ऋग्वेद' 

वैदिक ग्रन्थों पर भाष्य लिखने के बाद संहिता युग आया जिसमें प्रत्येके वेद 
पर संहिता ग्रन्थ लिखे गये। 
“ब्राह्मण युग? 

वैदिक संहिताओं के पश्चातू संस्कृत या वैदिक साहित्य के इतिहास में एक 
ऐसा युग आया जो वर्ण्य-वेषय या शैली की दृष्टि से सर्वथा भिन्न शा। प्रत्येक 
वेद. के पृंथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मण हैं जैसे-ऋग्वेद के ब्राह्मण ऐतरेय तथा शांखायन, 
शुक्लयजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण, क्ृष्णयजुर्वेद के-तैतिरीय ब्राह्मण, सामवेद के 
ताण्ड्य, षडविंश, सामविधान, आर्षेय, दैवत, उपनिषद्‌ ब्राह्मण, संहितोपनिषद्‌ तथा 
जैमिनीय ब्राह्मण । अथर्ववेद का-गोपथ ब्राह्मण है। 
“आएरण्यक! 

आरण्यक ब्राह्मण-ग्रन्थों के परिशिष्ट माने जाते हैं। इनमें ब्राह्मणों से सर्वथा 
भिन्न विषयों. का चिंतन किया जाता है। सायणाचार्य:न्रे अरण्य में पठ्यंमान होने 
के कारण इनकी संज्ञा आरण्यक दी है।....' 

आएरण्यकों का आध्यात्मिक तत्व: उपनिषदों. के. तत्व चिंतन का पूर्वरूप है, « 
जिसका पूर्ण-विकास उपनिषयों में प्रदर्शित होता है। प्रत्येक वेद में पृथक्न्पृथक - 
आएरण्यक हैं। ऋग्वेद के तीन: आरण्यक्‌ हैं+- 

. एतरेय 


8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुवंद 


2. शांखायन 

3. तैत्तिरीय 

अथर्ववेद का कोई आरण्यक प्राप्त नहीं होता है। 

सामवेद का आरण्यक “'तलवकार' है। 

“उपनिषद्र $ 

भारत के आध्यात्मिक इतिहास में उपनिषदों का महनीय योग है, जिनसे यहाँ 
का साहित्य, दर्शन और धर्म सहस्नावधियों से शासित होता रहा है। 

उपनिषदों की संख्यां के विषय में पर्याप्त मत भेद हैं। साधारणतः उनकी 
संख्या 08 मानी जाती है। जिनमें 0 या 2 उपनिषद्‌ प्रधान हैं + 'मुक्तिकोपनिषद्‌" 
में उनकी संख्या 08 दी गयी है, जिनमें 0 का सम्बन्ध ऋग्वेद से है, 9 का 
शुक्ल यजुर्वेद से, 2 का कृष्ण यजुर्वेद से, ।6 का सामवेद से तथा 8 का 
अथर्ववेद से है। 

आचार्य शंकर ने दस उपनिषदों पर भाष्य की रचना की है--ईश, केन, कठ, 
प्रश्न, मुण्ड, माण्डूक्य, तैतिरीय, एतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक। इनके अतिरिक्त 
कौषीतकि, श्वेताश्वतर तथा मैत्रायणीय उपनिषद्‌ भी प्राचीन हैं। 
वेदाइ! ह 
वैदिक संहिता एवं उनसे सम्बद्ध साहित्य के विधिवत्‌ अध्ययन के क्रम म 
जिस साहित्य का विकास हुआ उसे वेदाइ् के नाम से जाना जाता है। वेदाज्ञ नाम 
इस बात का द्योतक है कि वेदानुशीलन के अंग रूप में, इस साहित्य का प्रणयुन 
हुआ या वेद का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिये वेदाजञों की रचना हुई, जिसके 
द्वारा वस्तु के स्वरूप का परिज्ञान होने में सहायता मिले, उसे “अंग” कहा जाता है। 
वेद के अर्थ की दुरूहता को दूर करने तथा कर्मकाण्ड सम्बन्धी तथ्यों के प्रतिपादन 
में वेदाज्लों की उपयोगिता असंदिग्ध है। ऐसे ग्रन्थों के छः वर्ग हैं। 

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। 

“अनुक्रमणी? 

“अनुक्रमणी” का अर्थ सूची है प्रत्येक वेद की पृथक्‌-पृथक्‌ अनुक्रमणियों की 
रचनां हुई। शौनक एवं कात्यायन अनुक्रमणी के प्रसिद्ध लेखकों में हैं। शौनक ने 
ऋग्वेद की रक्षा के लिये 0 अनुक्रमणियों की सृष्टि की है। . आर्षानुक्रमणी, 2. 
2. उन्दोज्नुक्रमणी, 3. देवतानुक्रमणी, 4. अनुवाक्‌, 5. सूक्तानुक्रमणी, 6: ऋग्विधान, 
7- पादंविधान, 8. वृहद्देव्ता, 9. प्रातिशाख्य एवं 0. शौनकस्मृति। 

कात्यायन ने . बृहदुदेवता,- 2. सर्वानुक्रमणी 3. सामवेदीय अनुक्रमणी 
4. वृहत्सर्वानुक्रणणी की रचना की। 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन. / ५ 


इस प्रकार संक्षेप में वैदिक साहित्य का सार प्रस्तुत किया गया। 

वैदिक संस्कृत साहित्य की पूर्ण जानकारी संक्षेप में करने के पश्चात्‌ लौकिक 
संस्कृत साहित्य का प्रारम्भ रामायण से करते हैं- 
रामायण 

रामायण भारत का राष्ट्रीय महाकाव्य एवं सम्पूर्ण जातीय जीवन की महागाथा 
है। भारतीय साहित्य में वाल्मीकि “आदि कवि' के रूप में प्रतिष्ठित हैं और उनका 
काव्य “रामायण” “आदि काव्य” के नाम से अभिहित किया जाता है। वैदिक 
साहित्य' के समापन के पश्चात्‌ संस्कृत में जिस साहित्य की अवधारणा हुई उसे 
क्लासिक या श्रेण्य साहित्य कहते हैं और उसका विभाजन इतिहास, काव्य, पुराण के 
अन्तर्गत किया गया है। ऐसे काव्यों में रामायण सर्वाधिक महनीय रचना के रूप में 
समादृत है। वस्तुतः वाल्मीकि रामायण से ही संस्कृत में कवित्वमय सर्जनात्मक 
काव्यधारा का प्रवर्तन हुआ; जो साहित्यिक संवेदनशीलता से अभिप्रेरित था। 

इसमें राम रावण के दुर्घोष एवं भीषण युद्ध का वर्णन है और राम के चरित्र 
का काव्यात्मक वर्णन किया गया है। वाल्मीकि रामायण को भारत का गौरव 
मानकर इसे बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। यह लौकिक 
संस्कृत साहित्य की सर्वप्रथम रचना है, जिसमें कवि का मुख्य अभिप्रेत केवल राम, 
रावण के युद्धों एवं विजयों का ही वर्णन नहीं है अपितु यह अलंकृत भाषा के 
माध्यम- से समस्त मानव जीवन का चित्रण प्रस्तुत कर उसे प्रकृति की रमणीय 
पृष्ठभूमि में सजाता है। 

वस्तुतः रामायण के द्वारा ही संस्कृत साहित्य में वैदिक शैली से सर्वथा भिन्‍न 
'एक नई काव्य शैली का सूत्रपात हुआ, जिसमें सर्वप्रथम मानव चरित्र का अंकन 
किया गया था। वाल्मीकि रामायण का आधार-फलक अत्यन्त विस्तृत एवं मानव 
की विराट तथा प्रबुद्ध सांस्कृतिक चेतना से परिपुष्ट है। यह लौकिक साहित्य की 
प्रथम काव्य-धारा है जिसने अनन्त कांल तक मानव मन को आप्लावित किया है, 
और भविष्य में भी करता रहेगा। इसमें निषाद के बाण से बिद्ध क्रौंज्व पक्षी की 
करुणावस्था देखकर कवि का भावाकुल हृदय द्रवीभूत होकर काव्य के माध्यम से 
प्रस्फुटित हुआ है या यह कवि की करुणा विगलित भावों की द्रवणशील अभिव्यक्ति 
है, जिसमें न केवल राम के जीवन को अंकित किया गया है अपितु यह भारतीय 
संस्कृति, समाज, धर्म, एवं चिंतन पद्धति का आकर ग्रन्थ है। इसमें भारतीय 
जीवन-पद्धति एवं सांस्कृतिक चेतना को भावात्मक रूप प्रदान किया गया है 
अर्थात्‌ रामायण भारतीय जीवन का मंजुल उद्गीथ है। 

रामायण 'चतुर्विशति संहिता” के नाम से विख्यात है, क्योंकि इसमें 24000 
श्लोक हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार आदि कवि ने त्रेता-युग के प्रारम्भ में, राम 
के जन्म के पूर्व ही रामायण की रचना की थी। 

सम्पूर्ण रमायण सात काण्डों में विभक्त है-बालकाण्ड, अयोध्या काण्ड, 

0 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अरण्य काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्ध काण्ड एवं उत्तर काण्ड। 
महाभारत . 

महाभारत भारत का राष्ट्रीय ऐतिहासिक काव्य तथा आर्य-जीवन की विराट 
और सार्व-भौमिक महत्त्व से युक्त महागाथा है। इसके विशाल कलेवर का इस 
प्रकार निर्माण किया गया है, जिसमें पुराण, इतिहास, महाकाव्य, धर्म-शास्त्र तथा 
नीति दर्शन का मिश्रित स्वरूप प्रतिबिम्बित होता है। प्रसिद्ध विद्वान भारतीय 
विद्याविद्‌ डॉ. विन्टरनिट्स ने इसे अत्यन्त सीमित अर्थ में इतिहास और काव्य 
कहा है, किन्तु वास्तव में वे इसे अपने में एक पूर्ण साहित्य मानते हैं। भारतीय 
मनीषा ने शतादियों से प्रवहमान जिस ज्ञान एवं विचारणा का अन्वेषण किया था 
और युगनयुग से भारत ने सुचिंतित ढंग से जीवन की जो व्याख्या प्रस्तुत की थी 
उन सब का अखण्ड रूप एक प्राण होकर महाभारत में उत्कीर्ण है। यह,ऐसा:ज्ञान 
कोश है जिसमें मानव मस्तिष्क की समस्त चिंतन परम्परा एवं सांस्कृतिक चेतना 
आकर समाहित हो गयी है। एक शब्द में यह एक महान विश्व कोश है। इसमें 
ज्ञान के प्रत्येक पक्ष का केवल संस्पर्श ही नहीं किया गया है अपितु यह अपने 
सर्वागीण कलेवर में विभिन्‍न विषयों की सर्वोच्च मान्यताओं और चिंतन सरणियों 
को गुम्फित कर भारत का ज्ञान सर्वस्व होने के कारण आर्ष-ग्रन्थ या पंचम वेद 
के रूप में प्रतिष्ठित है। 

भारतीय परम्परा के अनुसार महाभारत धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थों 
को देने वाला, समस्त कार्यों का साधक एवं कोकिल के मधुर स्वर की भांति 
शीतल एवं ताप नाशक है। इसे कौरवों एवं पाण्डवों की केवल युद्ध गाथा ही नहीं 
कहा जा सकता, यह सनातन धर्म के समस्त स्वरूप का निरूपक पवित्र धर्म-ग्रन्थ 
भी है और गीता के रूप में इसने भारतीय-तत्व-चिंतन का नवनीत प्रस्तुत किया 
है। भारतीय जीवन-मूल्य को समझने में महाभारत के द्वारा अत्यन्तं सुविधा प्राप्त 
होती है। संस्कृति को विद्वानों ने किसी जाति -के जीवनगत वैशिष्ट्य की संज्ञा दी 
है। “संस्कृति से तात्पर्य व्यक्तित्व की वे विशेषताएँ हैं, जिनका उपयोग वांछित 
मूल्यों के प्रकाशन व उत्पादन से होता है ”* 

महाभारत के अन्तर्गत हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का समेकित 
रूप प्राप्त होता है-विशेषतः इसकी सांस्कृतिक गरिमा अत्यन्त प्रौढ़ >है। * 

महाभारत में एक लाख श्लोक प्राप्त होते हैं, उसकी पुष्टिः गुप्तकालीन एक 
शिलालेख से होती है जहाँ इसके लिये “शतसाहस्नी-संहिता” कां प्रयोग हुआ है। 

महाभारत का प्रणयन 8 पव्ों में हुआ है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-आदि, 
सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौष्तिक, स्त्री, शान्ति, 
अनुशासन, अश्वमेध, आश्रमवासी, भौसल, महाप्रस्थानिक तथा स्वेगरिहण | 

महाभारत के रचयिता व्यास जी हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार महर्षि 
व्यास ही महाभारत के प्रणेता हैं और इसके प्रमाण ग्रन्थ में उपलब्ध होते हैं। ये 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 


कृष्णद्वैपायन व्यास महाभारत के रचविता. होते हुए भी उसके एक प्रधान पात्र के 
रूप में चित्रित हैं और कौरवों तथा पाण्डवों के दादा कहे गये हैं। 
पुराण 
पुराण भारतीय संस्कृति और साहित्य के महत्त्वपूर्ण अंग हैं इनमें कवित्वपूर्ण 
रचनात्मकता के साथ ही साथ भारतीय इतिहास का गौरवमय अंग उपन्यस्त है।, 
पुराणों में कुल चार लाख श्लोक हैं और उनकी संख्या 8 मानी गयी है तथा उतने 
ही उप-पुराण हैं। इनमें महाकाव्यीय पुराकथाओं का बृहत्‌ भण्डार संचित है तथा 
धर्म, दर्शन, इतिहास, भूगोल, मानव-सृष्टि और संहार के अतिरिक्त मनुष्यों के 
उत्तरदायित्वों के सिद्धान्त की शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं। उप-पुराणों में महाकाव्यीय 
स्वरूप की मंदतां और याज्ञिक तत्व की सर्वाधिक प्रधानता दिखाई पड़ती है। 
आधुनिक युग के विद्वान्‌ सम्प्रदायिकता के वैशिष्ट्य के कारण पौराणिक साहित्य 
को विशेष महत्त्व नहीं देते, पर परम्पराओं तथा ऐतिहासिकता के विचार से ये 
भारतीय वाड्मय के अत्यधिक उपादेय अंग सिद्ध होते हैं। 
पुराणों को पंचलक्षण समन्वित माना जाता है। स्वयं पुराणों में भी इस बात 
का उल्लेख है कि पुराणों के प्रतिपाद्य विषय हैं-सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, वंश, 
मन्व॒न्तर, और वंशानुचरित। सर्ग का अभिप्राय सृष्टि की रचना या उत्पति से है। 
संसार या उससे सम्बद्ध नाना प्रकार के पदार्थों की उत्पत्ति ही सर्ग है। 
पुराणों की संख्या 
पुराण और उप-पुराण के नाम से दो प्रकार के पौराणिक ग्रन्थ हैं। “देवी 
भांगवत' में पुराणों के आद्य अक्षर कें अनुसार 8 प्रकार कहे गये हैं। मकरादि से 
दो मत्स्य तथा मार्कण्डेय-पुराण, भकरादि से दो-भागवत्‌ तथा भविष्य ब्र अक्षर से 
तीन-ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त तथा ब्रह्माण्ड पुराण। व.अक्षर से चार-वामन, विष्णु, वायु तथा 
चबाराह पुराण। अ, ना, पदूम, लिं, ग, क, स्क, के अनुसार-अग्नि, नारद, पदूम, 
लिंग, गुण, कूर्म तथा स्कन्द-पुराण। 
विष्णु तथा भागवत में एक विशेष क्रम से ये ही नाम. प्राप्त होते हैं-ब्रह्म, 
प्रदूम, विष्णु, शिव, भागवत, नांरदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैव्र्त, लिंग, 
बराह्, स्कन्द, -वामन; कूर्म, मत्स्य, गरुण तथा ब्रह्माण्ड। 
, जैन दर्शन 
* .« आदिकालः से ही-भारतीय-विचारधारा हमें दो रूपों में विभक्त हुई मिलती-है। 
पहली. परम्पसमूलक, ब्राह्मण्य या ब्रह्मवादी, जिसका विकास वैदिंक साहित्य. के 
बृहत्स्वरूप मैं प्रकट हो चुकाः था और दूसरी पुरुषार्थ मूलक, प्रगतिशील, श्रामण्य 
या श्रमण-प्रधान, जिसमें आचरण को प्रमुखता दी गयी है। 
जैन साहित्य * है 
श्वेतांम्बर संप्रदाय के अंग-पग्रन्थ 
*, 3्वेताम्बर संप्रदाय के आचार्यों ने ।2 आगमिक या अंग-ग्न्धों का संग्रह 
2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


किया था उनके नाम इस प्रकार हैं- 
- आचारांग सुत। 

2. सूयगडंग। 

3. थाणंग। 

4. समवायांग। 
5. भगवती सूत्र । 
6. 

प्र 

8. 

9. 


* नायाधम्मकहाओ। 

'. उवासग दसाओ। 

अन्तगड दसाओ। 

'. अणुतरोव वाइय दसाओ। 
40. पण्हावागरणि आइ। 
. विवाग-सुयं। 

2. दिढ़ठिवाय। 

प्रकीर्ण ग्रन्थ 

- चतुःशरणं। 

- आतुएप्रत्याख्यान। 

« भक्ति-परिज्ञा। 

- संस्तार। 

* ताण्डुलवैतालिक। 

. चंद्रवेध्यक | 

' देवेन्द्रस्तव । 

8. गणित-विद्या। 

9. महाप्रत्याख्यान। 

0. वीरस्तव। 

यापनीय सम्प्रदाय और उसका साहित्य 

प्रमुख आचार्य ग्रन्य का नाम : 

. उमास्वाति तत्वार्थाधिगम सूत्र । 

2. शिवाचार्य आंराधना। 

3. शाकटायन शब्दानुशासन, अमोघवृति, सिद्धिमुक्ति 

4. स्वयंभू पउमचरिउ, रिट्ठणेमि चरिड।..._ 

5. त्रिभुवन स्वयंभू 'पउमचरिउ, रिट्ठणेमि पंचमिचरिउ। 

6. वादि राज पार्श्वनाथ चरित, यशोधरचरित, 
एकीभावस्त्रोत, न्याय विनिश्चय, विवरण, 
प्रमाण निर्णय 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3 री 


कफ एफ फ्रे ७ ७ 


पंचस्तूपान्चय और उसका साहित्य 

जैन साहित्य के प्रसिद्ध आचार्य वीरसेन, जिनसेन और गुणभद्र पंचस्तूपान्वय 
सम्प्रदाय के प्रमुख विद्वांन हुए, उनका साहित्य इस प्रकार है। 
वीरसेन 

इन्होंने तीन ग्रन्थ लिखे थे, जिनमें धवल टीका, जयधवल टीका दो ही 
उपलब्ध हैं। 
जिनसेन 

संयुक्त कृति 'जयधवला” के अतिरिक्त जिनसेन ने 'पाश्व्युदय” और “आदि 
पुराण” की भी रचना की है। 
गुणभद्र 

इन्होंने “उत्तर पुराण” एवं “आत्मानुशासन” नामक दो ग्रन्थ लिखे। 
आवक धर्म एवं उसकी आचार्य परम्परा 

जैन धर्म में श्रावकाचार की आचार्य परम्परा बहुत पुरातन है। इस उपलब्ध 
आचार्य परम्परा का क्रम इस प्रकार है-आचार्य कुन्द-कुन्द, स्वामी कार्तिकेय, 
आचार्य उमास्वाति, आचार्य यतिवृषभ, स्वामी समन्तभद्र, आचार्य जिनसेन, आचार्य 
सोमदेव, आचार्य देवसेन, आचार्य अमितगति, आचार्य अमृतचन्द्र, आचार्य वसुनन्दि 
और पं. आशाधर। 
बौद्ध युग 
बौद्ध धर्म-प्राचीन भारत का राजधर्म 

भगवान तथागत के जीवन-दर्शन के दो ही प्रमुख आधार रहे हैं : 

एक व्यष्टिमय और दूसरा समष्टिमय। 

प्राचीन भारंत के राजवंशों में मौर्य साम्राज्य का प्रतापी सम्राट अशोक बौद्ध 
धर्म का सबसे बड़ा अनुयायी और आश्रयदाता रहा है। 
बौद्ध साहित्य 
पालि 

पालि साहित्य की रचना तथागत से लेकर आज तक अंबाध गति से हो रही 
है। पालि के इन १500 वर्षों के इतिहास को बौद्ध साहित्य के दिग्गज विद्वान्‌ श्री 
अरत सिंह उपाध्याय ने दो मोटे भागों में विभाजित किया है। 

. पालि या पिटक साहित्य 

2. अनुपालि या अनुपिटक साहित्य 
त्रिपिटक साहित्य 

भगवान के बुद्धत्व प्राप्त करने से लेकर परिनिर्वाण प्राप्त करने के बीच 
उन्होंने जो कुछ भी कहा उसी का संग्रह-संकलन त्रिपिटक में है। त्रिपिटक अर्थात्‌ 
तीन पिटारियाँ। जिनका नाम है-सुतपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक। 

4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद [ 


. विनय पिटक 
इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं-- 


. पतिमोक्ख 2. सुक्तविभंग 
3. खंधकस 4. परिवार 
सुतपिटक हि 
इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं- 
. दिघनिकाय 2. मज्झिम निकाय 
3. संयुक्त निकाय 4. अज्जतर निकाय 
5. खुदूदक निकाय 
इनमें भगवान बुद्ध के प्रवचन संग्रहीत हैं। 
अभिधम्म पिटक 
इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं- 
. धम्म संगनी 2. विभंग 
3. कथा-वत्थु 4. पुग्गल पनती 
5. धातु कथा 6. यमक 
7. पत्थनि 
अनुपिटक साहित्य पु 
पिटक साहित्य के बाद अनुपिटक साहित्य की रचना हुई, जिसकी स्थिति 
आज तक बनी हुई है। 


प्रथम 'प्राग्वुद्धघोषयुग” में रचे गये अनुपिटक-साहित्य के ग्रन्थों में 'नेतिप्रकरण' 
"पेटकोपदेश', 'सुतसंग्रह', 'मिलिचन्दपञ्ह” और इतिहास प्रसिद्ध 'दीपवंश” का 
नाम प्रमुख है। दूसरे 'बुद्धघोषयुग' का आरम्भ आचार्य बुद्धघोष के ग्रन्थ विशुद्धिभग्ग 
तथा उनके द्वारा रचित “आर्थकथाओं' से होता है। इसके अतिरिक्त बुद्धदत, 
धम्मपाल की “अर्थकथाएँ” लंका में रचित बृहदूग्रन्थ 'महावंश” 'कच्चान व्याकरण” 
और अनिरुद्ध का 'अभिधम्मत्थ” संग्रह, आदि की गणना की जाती है। तीसरा 
उत्तर बुद्धघोष युग” बृहद्‌ अर्थकथा-साहित्य की टीकाओं एवं अनुटीकाओं का युग 
है, जिसमें रचे गये ग्रन्थों में आचार्य बुद्धघोष कृत 'अर्थ-कथाओं' का मगध भाषा 
में लिखित टीका कार्य प्रथम है जिसका निर्माण लंका के राजा पराक्रमबाहु के 
समय बारहवीं शताब्दी में हुआ। बारहवीं, तेरहवीं शताब्दी में सिंहल के भिक्षु 
सारिपुत एवं उनके शिष्यों ने भी इस दिशा में कार्य किया। “महावंश” का 
“चूलवंश” भाग भी इसी युग में निर्मित हुआ। बरमी भिक्षुओं ने अनिरुद्ध के 
“अभिधम्मत्थ” संग्रह की परम्परा में अनेक ग्रन्थों की रचना इसी समय की। 
वर्तमान सदी में रचे गये आचार्य धर्मानन्‍्द कोशाम्बी के “विशुद्धिमग्गदीपिका” 
और “अभिधम्मत्थ संग्रह-टीका” भी उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। 
निष्कर्ष यह है कि पालि साहित्य के इस तीसरे युग में बर्मा, आदि देशों में 
विषयावतरण-संस्क्ृृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5 


अनेक अच्छी कृतियों का निर्माण हुआ। 
संस्कृत के ग्रन्थकार 
जिस प्रकार बौद्ध धर्म की स्थविरवादी शाखा के प्रायः सम्पूर्ण ग्रन्थ १; 
भाषा में लिखिंत हैं उसी प्रकार सर्वास्तिवादी शाखा के प्रवर्तक और अनुवर्तक 
विद्वानों की प्रायः समग्र कृतियाँ संस्कृत भाषा में लिखी हुई मिलती है। बौद्ध 
विद्वानों की यह एक बड़ी दूरदर्शितां थी कि उन्होंने अपनी कृतियों का प्रणयन 
पालि को छोड़कर संस्कृत भाषा में किया। 
अश्वघोष 
इस प्रकार के संस्कृतानुरागी बौद्ध-विद्वानों में पहला नाम अश्वघोष का है।. 
अश्वघोष संस्कृत साहित्य के एक सुपरिचित महाकवि एवं बौद्ध न्याय के प्रकाण्ड 
दार्शनिक भी थे। संस्कृत साहित्य में उनकी गणना भास एवं कालिदास जैसे 
उच्चकोटि के ग्रन्थकारों से की जाती है। 
नागार्जुन 
बौद्ध-न्याय के यशस्वी निर्माता होने के कारण बौद्ध-साहित्य के इतिहास में 
एवं शीर्ष-स्थानीय भारतीय दर्शनकारों की कोटि में आचार्य नागार्जुन के बहुमुखी 
व्यक्तित्व एवं उनकी असामान्य प्रतिभा को आदर के साथं स्मरण किया जाता है। ४ 
कृतियाँ 
- माध्यमिक कारिका। 
दशभूमिविभाषा शास्त्र। 
महाप्रज्ञापारमिता सूत्र कारिका। 
उपाय-कौशल्य । 
प्रभाव विध्वंसन। 
विग्रह व्यावर्तिनी। 
चतुःस्तव। 
युक्ति षष्ठिका। 
शून्यता-सप्तति । 
0. प्रतीत्यसमुत्पादहदयमू। 
. महायान विंशक। 
2. सुहल्लेख। 
असंग 
“महायान-संपरिग्रह”, “प्रकरण आर्यवाचा”, “योगाचार भूमि-शास्त्र” 
“महायानसूत्रलंकार' । 
वसुबन्धु 
हीनयान संप्रदाय विषयक कृतियां- 
'सद्धर्भपुण्डशीकटीका' । 
“महापरिनिर्वाणसूत्र-टीका' । 


6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


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“*वज्छेदिका-प्रज्ञापारमिता टीका” । 
“विज्ञप्ति मात्रता सिद्धि! । 

आचार्य दिडूनाग 

आचार्य दिड्नाग ने न्याय-दर्शन पर लगभग 00 पुस्तकें लिखीं। 
चन्ध गोमिन्‌ 

इन्होंने 'शिष्यलेख-धर्मकाव्य', आर्यसाधन-शतक, आर्य-तारान्तर-वलिविधि, 
लोकानंद, चांद व्याकरण लिखीं। 
धर्मकीर्ति 

'प्रमाण-विनिश्चय”, “न्याय-बिन्दु', 'संबंध-परीक्षा', हेतुबिंदु', 'वाद-न्याय', 
'समानान्तर सिद्धि” आदि लिखीं। 
दर्शन शास्त्र 

भारतीय दर्शनों की विकास परम्परा को अभ्युदय, भाष्य और वृति, इन तीन 
कालों में विभक्त किया जा सकता है। सूत्रकाल दर्शनों का अभ्युदय युग है, 
जिसकी सीमा ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी तक पहुँचती है। तदन्‍्तर लगभग 
प5वीं शताब्दी तंक सूत्र ग्रन्थों की निरन्तर व्याख्या होती रही। यही उनका 
भाष्य-काल है। भाष्य-काल का कुछ भाग और उसके बाद की कुछ शताब्दियाँ 
उनके बृतिकाल की सूचक हैं। 

भारतीय दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण युग उनका भाष्य युग है। इस युग में 
भारतीय दर्शनों पर जो व्यापक प्रकाश डाला गया, उसके कारण उसका महत्व 
विश्वविश्रुत हुआ। पारलौकिक जीवन की श्रेष्ठता के सम्मुख ऐहिक जीवन की 
निष्क्रियताओं की हेय बताने वाले भारतीय दर्शन मानव की बौद्धिक पराकाष्ठा के 
उज्ज्वल प्रमाण इसी समय सिद्ध हुए 
नास्तिक दर्शन 

नास्तिक वादियों ने वेदों को भाँड, धूर्त और निशाचरों की रचनाएँ बताया है 
तथा उन पर चलने या विश्वास करने वाले लोगों को अज्ञानी कहा है। चार्वाक्‌-दर्शन 
घोर जड़वादी दर्शन है। नास्तिक दर्शन की पंचतत्वों के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण 
बात ध्यान देने की है।.पंचतत्व की जिन सूक्ष्मताओं का विश्लेषण और वैज्ञानिक 
अध्ययन. द्वारा उनक़े मौलिक पक्षों का प्रतिपादन इन आचारयों ने किया है वह 
सचमुच अदूभुत एवं विचारणीय है। 
चार्वाक्‌ दर्शन 

यह षड़्‌ नास्तिक दर्शनों में शीर्षस्थानीय है। 
सांख्य दर्शन 

इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल हुए। 
योग दर्शन 

योग दर्शन के प्रवर्तक आचार्य पतंजलि हुए। 

विषयावतरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ४ 7 


न्याय दर्शन 

पदार्थ-मीमांसा के प्रणेता महर्षि गौतम तथा उनकी कृति न्याय-सूत्र है। 
प्रमाण मीमांसा का अभ्युदय मिथिला के सुप्रसिद्ध नैयायिक गंगेश उपाध्याय ने 
(१2वीं श.) में 'तत्व चिन्तामणि' ग्रन्थ को लिखकर किया। 
वैशेषिक दर्शन 

इसके प्रवर्तक महर्षि कणाद्‌ हुए, जिनका नाम उलूक तथा कणभुक्‌ भी था, 
इनके कणादू-सूत्र को औलूक्य दर्शन भी कहते हैं। 
मीमांसा दर्शन 

इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनी हैं। 
व्याकरण शास्त्र 

भाषा और विचारों के तारतम्य के इतिहास को बाँधने वाली भाषा व्याकरण 
है। व्याकरण एक शास्त्र है, जिसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और जो अपने 
आप में सवांगपूर्ण है। 
व्याकरण शास्त्र के आदिम सृष्टा वक्ता एवं प्रवक्ता 

संस्कृत साहित्य का यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है कि सभी विद्याओं एवं सारे 
शास्त्रों के आदिम वक्ता महाज्ञानी ब्रह्मा थे। यद्यपि यह “ब्रह्मा” शब्द कर्तृत्व के 
कारण अनेक व्यक्तियों का अभिधान वाची रहा है। किन्तु यह प्रायः निश्चित सा 
हो गया है कि सर्व-विद्या-विद्‌ महा-मेधावी आदि में ब्रह्मा नाम से एक ही व्यक्ति 
था और वह ऐतिहासिक व्यक्ति था। 

ब्रह्मा के बाद व्याकरण शास्त्र के प्रवक्ता बृहस्पति हुए, ब्राह्मण ग्रन्थों में जिन्हें 
देवों का पुरोहित कहा गया है। वह अर्थशास्त्रकार थे और अगद-तन्त्र का रंचयिता 
भी उन्हें ही कहा जाता है। 

इन्द्र भी व्याकरण के प्रवक्ता थे, उन्होंने बृहस्पति से प्रतिपदपाठ द्वारा 
शब्दोपदेश का विशेष ज्ञान प्राप्त किया था, किन्तु उनके सम्बन्ध में एक विशेष 
बातं यह है कि उन्होंने पदों के प्रकृति प्रत्यय विभाग द्वारा तथा शब्दोपदेश प्रक्रिया 
की कल्पना द्वारा परम्परागत व्याकरण ज्ञान का संस्कार भी किया। उन्होंने पूरा 
आगत अव्याकृत वाणी को प्रकृति प्रत्यादि संस्कार युक्त किया। व्याकरण के लिये 
इन्द्र की यह विशेष देन थी। 

इस दृष्टि से व्याकरण के आदिम बक्ता ब्रह्मा हुए तथा प्रवक्ता बृहस्पति, इन्द्र, 
भारद्वाज आदि ऋषि एवं ब्राह्मण । 

वर्तमान उपलब्ध साहित्य में पाणिनी की अष्टाध्यायी सर्व-विदित है। कुछ 
आचार्यों का उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है किन्तु कुछ उससे पूर्व के भी हैं, 
जिनमें वायु, भारद्वाज, भूगुरि, पौष्करसादि आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। 
ज्योतिष शास्त्र 

ज्योतिष-शास्त्र अपने मूल रूप में बहुत प्राचीन है, उसकी व्यापकता और 


8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


प्रभाव-वेदमंत्रों तक विस्तृत है। ज्योतिष का अस्तित्व वेदों में जितना पुराना है। 
वेद-मंत्रों और वैदिक साहित्य में हमें उसके सूत्र बिखरे हुए मिलते हैं। इन सूत्रों 
की व्याख्या और उन पर आगे के विचारकों द्वारा किये गये अनुसंधान के ही 
फलस्वरूप इतने वृहद्‌ शास्त्र का निर्माण हुआ। 


काल-विभाजन 
. अंधयुग आदिकाल से 0000 ईस्वी पूर्व तक 
2. उदयकाल 0000-500 ईस्वी पूर्व तक 
3. आदिकाल 500 ईस्वी पूर्व से 500 ईस्वी तक 
4. पूर्वमध्यकाल «... 500-000 ईस्वी तक 
5. उत्तरमहमध्यकाल 000-600 ईस्वी तक 
6. आधुनिककाल 600 ईस्वी से अब तक 


भारतीय ज्योतिष के क्षेत्र में महाराज सवाई जयसिंह का नाम आदर के साथ 
लिया जाता है। जयसिंह का जन्म 686 ईस्वी में हुआ और 699 ईस्वी के , 
लगभग ॥3 वर्ष की उम्र में ही वे गदूदी पर बैठे। उनके प्रोत्साहन से भारतीय 
ज्योतिष में अन्वेषण की नवीन दिशाएँ प्रकाश में आयीं। 

भारतीय ज्योतिष का प्रचार-प्रसार अरब तथा अरब से यूरोप और फिर 
अमेरिका आदि देशों में हुआ। 
शब्दांकों का प्रयोग 

भारत में शब्दांकों को प्रयोग का प्रचलन वैदिक युग में ही विद्यमान था। 
अक्षर संकेतों का प्रयोग 

अंकों की संख्या को सूचित करने के लिये शब्द संकेतों के अतिरिक्त अक्षर 
संकेतों या वर्ण संकेतों का भी प्रचलन भारतीय ज्योतिष में सर्वत्र मिलता है। शब्द 
संकेतों की पद्धति कुछ जटिल, विस्तृत और दुःसाध्य होने के कारण ही सम्भवतः 
अक्षर संकेतों का प्रयोग हुआ। 
आयुर्वेद शास्त्र 

आयुर्वेद के महान ज्ञान का इतिहास बहुत लम्बा है। आयुर्वेद शास्त्र के पहले 
उपदेष्टा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हुए। युगक्रम के अनुपात से बुद्धि विवेक को दृष्टि में 
रखकर बाद में इन्द्र से भारद्वाज, धन्वन्तरि आदि ने जो ज्ञान प्राप्त किया थौं, वह 
अष्टाज़् पूर्ण होता हुआ भी किसी एक अंग पर अधिक केन्द्रित था। उदाहरणार्थ 
धन्वन्तरि ने भिषक्‌ क्रिया पर अधिक बल दिया, तो पुनर्वसु ने काग्र-चिकित्सा पर - 
और कश्यप ने केवल कौमार-भृत्य पर। 

एक जीवनोपयोगी शास्त्र होने के नाते आयुर्वेद ने यथेष्ट लोकप्रियता और 
प्रसिद्धि प्राप्त की । उसने अपना स्वतन्त्र सर्वाज्नीण विकास किया और दूसरे शास्त्रों 
का प्रपूरक होने के कारण बड़ी मान्यता प्राप्त की। स्मृतियों और पुरांणों की 
विधियों में शरीर शास्त्र की पर्याप्त चर्चाएँ मिलती हैं। साँख्य एवं योग प्रभृति 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 9 


दर्शन के सम्प्रदायों से आयुर्वेद विषय का बौद्धिक पक्ष प्रभावित है। इसी प्रकार 
वेदांत दर्शन ने उसको आद्यात्म बल दिया। 

आयुर्वेद में यद्यपि शरीर-विज्ञान की विधियाँ बतायी गयी हैं तथापि उसकी 
आयु सहतसरों वर्ष प्राचीन है। ऋग्वेद में आयुर्वेद के जन्मदाता दिवोदास, भारद्वाज 
और अश्विनी कुमार आदि आचार्यों और परमर्षियों का उल्लेख मिलता है। 
काश्यप संहिता में आयुर्वेद का उद्भव “अथर्व-उपनिषद्‌” के रूप में कहा गया है। 
आयुर्वेद के उपयोगी ज्ञान से संस्कृत के सभी प्रमुख ग्रन्थकारों की कृतियाँ 
प्रभावित हैं। 
धर्म-शास्त्र 

स्मृतियों का निर्माण हिन्दू धर्म की चरमोन्‍नति का सूचक है। “श्रुति! और 
स्मृति” ये दोनों शब्द व्यापक अर्थ के पर्यायवाची शब्द हैं। श्रुति से जिस प्रकार 
बेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्‌ आदि ग्रन्थों का बोध होता है, उसी प्रकार 
स्मृति शब्द के अन्तर्गत घड़वेदांग, धर्म-शास्त्र, इतिहास, पुराण, अर्थ-शास्त्र और 
नीति-शास्त्र इन सभी विषयों का अन्तर्भाव हो जाता है। श्रुति और स्मृति का यही 
व्यापक अर्थ-बोध है। विशिष्ट रूप से स्मृति शब्द को, बाद के ग्रन्थकारों ने 
धर्म-शास्त्र का पर्यायवाची मान लिया, किन्तु “श्रुति! के साथ जहाँ भी “स्मृतिः 
शब्द को संयुक्त करके कहा जाता है, वहाँ उसका अर्थ धर्म-शास्त्र तक सीमित न 
रहकर वह व्यापक अर्थ का बोध कराता है। धर्म-शास्त्र उस शास्त्र को कहते हैं, 
जिसमें राजा-प्रजा के अधिकार, कर्तव्य, सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था, 
वर्णाश्रमधर्म, नीति, सदाचार और शासन-सम्बन्धी नियमों की व्यवस्था का वर्णन 
होता है। 

स्मृतियों के निर्माता हुए हैं-मनु, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विष्णु, हारीत, उशसनू, 
अंगिरा, यम, कात्यायन, पराशर, व्यास, दक्ष, गौतम, वशिष्ठ, नारद, भृगु। 

“मानव-धर्म-शास्त्र” इस विषय का सर्वाधिक प्राचीन अंग था। मनु को मानव 
जाति के आदि पुरुष के रूप में संहिता और ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में स्मरण क्रिया 
जाता है। इस दृष्टि से यह प्रतीत होता है कि बहुत सम्भव है कि वर्तमान मनु 
स्मृति की रचना “मानव-धर्म-शांस्त्र' के सूत्रों के आधार पर की गयी हो। 
संगीत शास्त्र हि 

भारतीय संगीत के पहले आचार्य भरत, हुए। भरत के नांट्य-शास्त्र में 
ज़ातियों का जो वर्णन दिया गया है, प्रकारान्तर से वह राग-रागनियों का सूचक 
है। राग“रांगनियों की चर्चा सर्वप्रथम नारदकृत “संगीत मकरन्द” में मिलती है। 
तत्पश्चात्‌ शिवमत, कृष्णमत, भरतमत औरं हन्मुन्मत का आविर्भाव हुआ। इन 
सबके पश्चात्‌ संगीत रत्नाकर” इस दिंशां का उल्लेखनीय ग्रन्थ है। 
शब्द कोश मु 

_ प्राचीन समय में व्याकरण और कोश का विषय लगभग एक ही श्रेणी में 
20./ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गिना जाता था। यही कारण था कि जिन पुरातन आचारयों ने व्याकरण की रचना 
की, वही प्रायः कोशकार भी थे। व्याकरण और कोश, दोनों एक ही शब्द शास्त्र 
* के अंग थे। 

सभी प्राचीन कोश प्रायः विलुप्त हैं। 
वैदिक शब्दकोश 

निघण्टु और निरुक्त, प्राचीन वैदिक शब्द कोशों के सम्बन्ध में यथा स्थान 
उल्लेख किया जा चुका हैं। निधण्दु और निरुक्त का एक संस्करण डॉ.. लक्ष्मण 
स्वरूप ने लाहौर से प्रकाशित कराया था। 'वेदार्थ-शब्दकोश” नाम से भी चमूपति 
ने एक सुन्दर शब्दकोश तीन भागों में लाहौर से प्रकाशित कराया था। 
लौकिक शब्दकोश 

लौकिक संस्कृत में कोश ग्रन्थों के निर्माण का प्रारम्भ, बैंदिक शब्द कोश 
निघण्टु के ही आधार पर एवं उसी की शैली अनुसार हुआ। लौकिक संस्कृत के 
शब्दकोश एक ही प्रकार के नहीं हैं। कुछ कोशों में तो संज्ञा शब्दों एवं धातु शब्दों 
का ही संग्रह है और कुछ शब्द कोंश संज्ञा शब्दों तथा अवयवों को ही लेकर रचे 
गये। ऐसे शब्द कोशों का क्रम अकारादि वर्णों से न होकर पद्यबद्ध रूप से हुआ 
है। इन शब्द कोशों में समानार्थक और नानायिक, दो प्रकार के शब्दों पर विचार 
किया गया है। 
आधुनिक कोश 

कोश-प्रन्थों का कार्य आज भी उत्कर्ष पर है। आधुनिक कोश ग्रन्थों में 
तारानांथ तर्कवाचस्पति का वाचस्पत्यं, राधाकांत देव का “शब्द कल्पद्ठुम, 
विजयराजेन्द्रसूरि का 'अभिधान राजेन्द्र-कोश', सुखानन्द नाथ का 'शब्दार्थचिन्तामणि/ 
आदि विश्व-कोश के स्तर के वृहद्‌ ग्रन्थ हैं। 
नाटक 

संस्कृत-साहित्य में नाटकों की अपनी एक विशिष्ट परम्परा रही है। ऋग्वेद 
के निर्माण तक, जो कि वैंदिक साहित्य का प्राचीनंतम भाग और विश्व-साहित्य के 
क्षेत्र में पहला ज्ञान संग्रह है, नृत्यकला पर्याप्त प्रकाश में आ चुकी थी। संस्कृत के 
नाटकों की अति प्राचीनता के सम्बन्ध में ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद में भी कुछ 
विस्तार से चर्चा की गयी है। यजुर्वेद की 'वाजसनेईसंहिता” के एक प्रसंग से 
अवगत होता है कि वैदिक युग में एक शैलूष नामक जाति के लोग व्यावसायिक 
रूप से नाटकों का आयोजन कर जीविकोपार्जन किया करते थे। 

सेंस्कृत साहित्य में नाटकों की व्यवस्थित परम्परा का अनुवर्तन भास से होता 
है। आधुनिक विद्वानों को भास का परिचय यंद्यंपि हाल ही में प्राप्त हुआ है, किन्तु 
उनके व्यक्तित्व की महिमा बाण, दण्डी, भामह, वाक्पतिराज, वामन, राज-शेखर, 
अभिनव गुप्त, पृभृति काव्यकारों एवं काव्य-शास्त्रियों की रचनाओं में सर्वत्र 
बिखरी हुई थी। हु 

विषयावत्तरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 2] 


भास 

भास की कृतियों का प्रसिद्ध अर्थशास्त्री बृहस्पति और कौटिल्य के साथ 
भाषा वैज्ञानिक परीक्षण के बाद इतिहासकारों ने यहाँ तक सिद्ध किया है कि भास 
का स्थितिकाल पाँचवीं से चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व था। ह 

भासकृत 8 नाटक कृतियों' का रचनाक्रम विद्वानों ने इस प्रकार बताया 
है-दूतवाक्य, कर्ण-भार, दूतघटोत्कच, ऊरुभंग, मध्यमव्यायोग, पंचरात्र, अभिषेक, 
बाल-चरित, अविमारक, प्रतिमा, प्रतिज्ञायौगन्‍्धरायण, स्वप्नवासवदत्त, चारूदत्त। 
कालिदास 

नाठकों के निर्माण की परम्परा में भास के बाद कालिदास महाकवि का नाम 
आता है। कुछ विद्वानों ने कालिदास से भी पहले 'मृच्छठकटिकम्‌” के रचयिता 
शूद्रक का उल्लेख किया है किन्तु हम कालिदास को शूद्रक के पूर्ववर्ती मानते हैं। 

नाढकों के क्षेत्र में महाकवि ने “मालविकाम्निमित्रम्‌', 'विक्रमोर्वशीयम्‌', 
“अभिज्ञान-शाकुन्तलम्‌” इन कृतियों का प्रणयन किया है। 

अश्वघोष 


कालिदास के बाद अश्वघोष का नाम उल्लेखनीय है। इनका “शारिपुत्र-प्रकरणः 
या “शरद्धतीपुत्र-प्रकरण” उपलब्ध होता है। 
-शूद्क ५ 
संस्कृत नाटकों की समृद्ध परम्परा के क्रम में शाकुन्तल के बाद “मृच्छकटिकम्‌' 
का नाम आता है जिसका लेखक शूद्रक नामक कोई राजा या कवि था। 
हर्षवर्धन 
शूद्रक के बाद हर्षवर्धन का क्रम आता है। सम्राट हर्ष वर्धन के ऐतिहासिक 
व्यक्तित्व के बारे में विद्वान्‌ एक मत होने पर भी उनके नाम से संबद्ध नाटकों का 
रचयिता उन्हें न मानकर उनके नाम पर लिखे हुए, उनके किसी आश्रित कवि को 
मानते हैं, किन्तु इस कारण की पुष्टि के लिये कोई प्रमाण नहीं है। 
(प्रियदर्शिका', 'रत्नावली” और “नागानन्द” ये तीन कृतियाँ हर्ष के नाम से 
प्रचलित हैं। 
भवभूति 
भवभूति ने रामायण की कथा के आधार पर *“उत्तररामचरितम्‌, मालतीमाधवम्‌, 
नागानन्द, रामाभ्युदय” नामक नाटक लिखे। 
विशाख दत 
भवभूति के बाद-विशाख दत का क्रम आता है। “मुद्राराक्षस” “देवीचन्द्रगुप्त'- 
के अतिरिक्त विशाख़दत ने एक तीसरी नाट्यकृति “राघवानन्द” का भी निर्माण 
किया, जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं है, किन्तु उसके उद्धरण सुभाषित ग्रन्थों में 
विद्वानों को मिले हैं। 
22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


नारायण भटूट 

नारायण भट्ट के वेणी-संहार' का स्थान भवभूति एवं विशाख दत के नाटकों 
के बाद आता है। 
मुरारि 

इन्होंने अनर्धराघव” की रचना की है। 
अनंगहर्ष 

अनंगहर्ष “मातृराज” ने “तापसवत्सराज” नाटक लिखा, जिसका समय अविदित 
है। 
मायुराज 

एक अज्ञात लेखक मायुराज ने रामायण की कथा के आधार पर “उदातराघव! 
नाटक की रचना की, जो अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। 
शक्ति भद्र 

आठवीं शताब्दी में विद्यमान शक्तिभद्र नामक एक नाटककार का नाम मद्रास 
में प्रकाशित उनके “आश्चर्य-चूड़ामणि" नामक नाटक से ज्ञात हुआ है। 'कीथ' ने 
इसका नाम “आश्चर्य-मंजरी” लिखा था। 
हनुमनूनाटक का रचियता 

आठवीं शताब्दी के बाद दक्षिण में एक “'हनुमन्‍नाटक' या 'महानाटक' लिखा 
गया। आज उसके दो बहुत भिन्‍न पाठ उपलब्ध होते हैं। पहला दामोदर कृत और 
दूसरा मधुसूदन कृत। इन दोनो में दामोदर मिश्र की रचना मूल ग्रंन्‍्थ के अधिक 
निकट है। 
राजशेखर 

“बाल-रामायण” से विदित होता है कि राजशेखर ने छः प्रबंधों की रचना की 
थी, जिनमे 5 ही उपलब्ध हैं। उनके नाम हैं- कर्पूर मंजरी, विद्धशालाभम्जिका, 
“बाल-रामायण' और “बाल-भारत” । ये उनकी नाट्य कृतियाँ हैं और * काव्य-मीमांसा' 
अलंकार-ग्रन्थ है। उनके छठे महाकाव्य * हर विलास” का भी उल्लेख हेमचन्द्र ने 
किया 'है। अपने अलंकार ग्रन्थ में उन्होने स्वरचित एक भूगोल विषयक ग्रन्थ 
“भुवन-कोश” का उल्लेख किया है। 

राजशेखर ने भीम कृत पाँच नाटकों का उल्लेचा किया है, जिनके लेखक का 
समय .राजशेखर से पहले होना चाहिए था वे सभी नाटक सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। 
उनमें तीन के नाम हैं-- 'स्वप्न दशानन', 'प्रतिज्ञा चाणक्य” और “मनोरमावत्सलराज!। 
क्षेमीश्वर 

क्षेमीश्वर ने 'चण्डी शतक” और “नैषधानन्द” नामक दो नाटक लिखे। 
दिज्लनाग 

राजशेखर के बाद दिड्नाग की “कुन्द माला” में सस्कृत नाटकों की परम्परा 
पुनरुज्जीवित हुई। सन 928 ई० में “कुन्द माला” का प्रकाशन हो चुकने के बाद 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 23 


दिड्जनाग के सम्बंध में उनके आलोचकों ने कुछ बाते कहीं-जो भ्रमपूर्ण थी किन्तु 
अब यह सर्वथा निराकृत हो चुका है कि न तो 'कुन्द माला” के रचियता दिज्ञनाग 
भवभूति के पूर्ववर्ती थे, और न ही कालिदास “मेबदूत” में उद्धृत दिज्ञनाग, 
नाटककार दिड्नाग थे। साथ ही यह भी निश्चित हो चुका है कि बौद्ध दिज्ञनाग, 
नाटककार दिड्ढनाग से भिन्‍न एवं पूर्ववर्ती थे। 
॥7 वीं शताब्दी के अन्य नाटक 

क्षेमेन्द्र 'चित्र-भारत', 'कनकजानकी” विल्हण “कर्णसुन्दरी” कृष्णमिश्र प्रबोध 
चन्द्रोदय' । 
2 वीं शताब्दी के नाटक 


यशचन्द्र 5 'मुदितकुमुतद-चन्द्र' 
कनकाचार्य ८ “घन्डजयविजय' 
रामचन्द्र गा “नलविलास', “निर्भय भीम', 'सत्यहरिश्चन्द्रा 


“कौमुदीमित्रा नन्‍द', “यादवाभ्युदय” आदि। 
विग्रहराजदेव विशालदेव -- हरकेलि नाटक 


सोमदेव न विग्रहराज 
० सुभट कवि. - दूतांगद 
3 वीं शताब्दी के नाटक 
जयदेव गा प्रसन्‍नराघव 
मदनकवि +- परिजातमंजरी 
यशपाल न मोह-पराजय 
मोक्ष्तादित्य॒ भीमविक्रम 
रामभद्रमुनि . ८ प्रबुद्ध रौहिणेय 
रविवर्मा जे प्रचुम्नाभ्युदय 
बालकवि . - रन्तुकेतूदय, रविवर्माविलास 


हस्तिमल्ल.. + विक्रान्तकौरव, मैथिली कल्याण, 
अंजनापवनज्जय, सुभद्रा, उदयनराज 

भरतराज, अर्जुनराज, मेघेश्वर 

रांजरुद्रदेव . ८ उषर्गेदियं नाटिका, ययातिचरित नाटक। 


“ ]4 वीं शताब्दीं के नाटक 
-« विद्यानाथ - प्रतापरुद्रीयकल्याण 
' विश्वनाथ ् सौगन्धिकाँहरंण 
विरुपाक्ष 4 शी न नारायण विलास 
मणिक हे ् भरतानन्द 
उदण्ड न्‍ मल्लिकामारुत 


5 वीं शताब्दी के नाटक... 
24 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वामन भट्ट बाण 


ब्रह्मसूरि - 
गंगा धर ब-> 
हरिहर गा 
रूपगोस्वामी न्‍- 


श्री रामदेव - 


जीवरामयाज्ञिक - 


6 वीं शताब्दी के नाटक 


शेषकृष्ण कि 


रलखेट श्री निवास दीक्षित- 


यज्ञनारायण दीक्षित .+- 
लक्ष्मण माणिक्य देव. - 
विलिनाथ - 
गोकुलनाथ न 
सठकोप - 
कुमारवाताचार्य न 
रामानुज न 


7र्वी शताब्दी के नाटक 


नेपाल नरेश जगज्योतिर्मल्‍ल-- 
गुरुराम ग 
रलचूड़ामणिदीक्षित . - 
नीलकण्ठ दीक्षित न 
वेंकटाध्वरि न 
रुद्रदास - 
महादेव न 
रामभद्र दीक्षित - 
नल्लिका कवि क 
साम-राज दीक्षित गा 


8वीं शताब्दी के नाटक 


विश्वेश्वर कवि न 


“पार्वती परिणय', 'कनकलेखा कल्याण! 
“श्रृंगारभूषण' 

ज्योति-प्रभा कल्याण 

गंगादासप्रताप विलास 

भर्तृहरि-निर्वेद 
“दानकेलिकौमुदी',“विदग्धमाधव',* 
“ललित-माधव' 
“सुभद्रापरिणय','रामाभ्युदय', 
'पाण्डवाभ्युदय! 

'मुरारि-विजय! 


कंसवध 

“भौमिपरिणय! 

“रघुनाथ विलास” हू 
“कुवलयाश्चरित”, “विख्यात-विजयः' 
“मदनमंजरी महोत्सव” 
“मुदितमालसा”, “अमृतोदयः! 
“वसन्तिकापरिणय! 

'परिजात नाटक! 

“वसुलक्ष्मी कल्याण! 


“हर गौरी विवाह” 

“सुभद्रा धनजय”, “रतनेश्वर प्रसादन' 
“आनन्द राघव', “कमलिनी-कलहंसः 

“नल चरित” (अपूर्ण) 

'प्रद्युम्नानन्द' 

“चन्द्रलेखासटूटक' 

“अदूभुतदर्पण! 

“जानकी परिणय! 

“सुभद्रा परिणय! 

“श्री दाम चरित', 'चितवृति कल्याण', 
जीवन मुक्ति-कल्याण', तथा “श्रुगांर 
सर्वस्व भाण' । 


“रुक्मणि-परिणय', 'नवनाटिका', 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 25 


“श्रृगांरमंजरी' 


देवराज - “बालमार्तण्डविजय' । 
राजवर्मन्‌ 5 “रुक्मणि-परिणय', श्रृंगार सुधाकर! । 
विश्वनाथ - 'मृगांक लेखन! । 
देवकवि गा “विद्या-परिणय', “जीवानन्दनम्‌”। 
भूदेवशुक्ल के “धर्म-विजय' । 
9वीं शताब्दी के नाटक 
«.. पद्मनाभ 5 “त्रिपुर विजय” व्यायोग 
बल्लिशाय - “ययातितरुण नन्दन! 
शिवेन्द्र के राजकवि._ - *रामराज्यभिषेक', “बालि परिणय”, 
“कुण्डिनगोत्रीय” रामचन्द्र का “श्रृंगार 
सुर्धाणव' 
ईश्वरसेन के राजकवि --चैत्रयज्ञ' 
पंचानन -अमरमज्नल! 
श्री अम्बिकाक्ष्त व्यास -सामवतम्‌' 
20वीं शताब्दी 


महामहोपाध्यायशंकरलाल-'सावित्री चरित्‌', 'ध्रुवाभ्युदय', “भद्रयुवराज', 
“वामनविजय', 'पार्वती-परिणय” । 
मूलशंकर मणिकलाल - "क्षत्रपति साम्राज्य', 'प्रतापविजय', 
“संयोगिता-स्वयंवर' । 
इस प्रकार संस्कृत में नाटक-रचना की स्थिति को देखकर निश्चय ही यह 
विश्वास होता है कि पूर्णसंतोषजनक न सही, पर इस दिशा में कुछ कार्य अवश्य 
हो रहा है। संस्कृत साहित्य की अन्य विचार-वीथियों की तरह यह दिशा नितान्त 
सूनी नहीं है। फिर भी संस्कृत के समर्थक एवं उन्‍नायक विद्वानों के लिये यह 
आवश्यक है कि वे द्वुतगति से संस्कृत की परम्परा को आधुनिक प्रतिमानों में 
ढालकर उसे सम सामयिक रूप देने तथा उसकी अवरुद्ध समृद्धि को आगे बढ़ाने 
के लिये अपनी मौलिक कृतियों को लेकर इस क्षेत्र में अवतरित हों। 
रूपक के भेद 
भाण ; 
भाण रचना एकांकी होती है। उसमें भाव, भाषा और सरणि की श्रेष्ठता 
रहती है। हाल ही में कुछ भाण रचनाएँ प्राप्त हुई हैं जो इस प्रकार हैं-वररुचि ने 
“उभयाभिसाएस्का', शुद्रक ने 'पद्मप्राभृतक', श्यामलिक ने “पादताड़ित” और ईश्वरदत्त 
ने 'धूर्तविट-संवाद' भाण लिखे। 
प्रहसन 
संस्कृत के प्रहसनों में एक मार्मिक व्यंग्य होने की वजह से उनकी बड़ी 
26 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुरवंद 


ख्याति और लोक-प्रियता भी रही है। इनमें यद्यपि अश्लीलता भी कहीं-कहीं 
दिखाई देती है, किन्तु चार्वाक्‌ू, जैन, बौद्ध, कापालिक आदि वेद-विरोधी धर्मानुयायियों 
के प्रति उनमें जो आक्षेप किये गये हैं वे बड़े ही मार्मिक हैं। 

बोधायन-क्ृत “भगवदज्जुक” ईसा की प्रथम दो शताब्दियों के आस-पास 
लिखा गया सबसे प्राचीन प्रहसन है। 
'एकांकी 

एक अंक में समाप्त होने वाले रूपक-उपरूपकों को संस्कृत के काव्यशास्त्रियों 
ने अनेक श्रेणियों में विभाजित किया है। डॉ. कीथ ने एक अंक में परिसमाप्य इन 
नाटकों को एकांकी (0॥6-४०-?॥७५) कहा है। 4वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में 
विजय-नगर के हरिहर द्वितीय के पुत्र विरुपाक्ष ने एक एकांकी “उन्मत्त-राघव/ 
लिखा। इस प्रकार “विक्रमोर्वशीय” के चौथे अंक का प्रभाव है। 
व्यायोग 

व्यायोग रचनाओं में भासकृत “मध्यम व्यायोग”, 'दूतवाक्य”, “दूतघटोत्कच”, 
“कर्ण-भार', “उरुभंग' प्रमुख हैं। 
रूपक के कुछ अप्रचलित भेद 

रूपक के भेदों में नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन और व्यायोग पर पर्याप्त 
कृतियाँ रची गयीं और वे लोक-प्रिय भी सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त डिम, 
समवकार, वीथी, अंक और ईहामृग इन पांच भेदों का प्रचलन प्रायः बहुत कम रहा 
है। रूपक के प्रायः इन सभी अप्रचलित भेदों पर वत्सराज ने एक-एक कृति का 
निर्माण कर अपने पाण्डित्य का परिचय दिया और संस्कृत साहित्य की एक 
अपूरणीय क्षति को भी पूर्ण किया। 
प्रतीकात्मक शैली के नाटक 

अश्वघोष-“शापिपूत्र-प्रकरण', कृष्ण-मिश्र-प्रबोध चन्द्रोदय ( 
छाया नाटक 

इस परम्परा में सुभटकवि (2वीं शताब्दी) का दूतागंद प्रतिनिधि रचना है। 
तत्पश्चात्‌ 5वीं शताब्दी में व्यास श्री रामदेव ने “सुभद्रापरिणय”, “रामाभ्युदय', 
“पाण्डवाभ्युदय” नाटक लिखे, जिनमें 'सुभद्रा परिणय”, सुभट की शैली पर लिखा 
गया छाया नाटक है। 
महाकाव्य 

“रामायण', “महाभारत”, 'डलियड” और “ओडेसी” आदि ग्रन्थ आज प्रथम 
महाकाव्य कहे जाते हैं। महाकाव्यों की परम्परा को सामान्यतः तीन श्रेणियों में 
विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में वे महाकाव्य आते हैं जो विशुद्ध 
संस्कृत में लिखे गये, जैसे कि कालिदास, माघ, श्री हर्ष आदि के ग्रन्थ तथा दूसरी 
श्रेणी में पालि तथा प्राकृत भाषा के महाकाव्य आते हैं और तीसरी श्रेणी के 
महाकाव्य अपभ्र॑श में हैं, जिनसे हिन्दी साहित्य में काव्य-परम्परा का प्रवर्तन हुआ। 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 27 


ऐतिहासिक दृष्टि से संस्कृत महाकाव्यों की लम्बी परम्परा को हमने तीन 
विभिन्‍न युगों में विभाजित किया है।;पहला उद्भव युग-कालिदास से पहले, 
दूसरी अभ्युत्थान युग-कालिदास से श्री हर्ष तक तीसरा हास युग-तेरहवीं शत्ती 
से अब तक। उद्भव युगीन महाकाव्य-रामायण, महाभारत हैं। अभ्युदय युग 
में-सर्व-प्रथम कालिदास का नाम आता है। 
कालिदास 

इनकी कृतियां इस प्रकार हैं-“ऋतुसंहार', “कुमार-सम्भव”, “मालविकाम्निमित्र', 
“विक्रमोर्वशीय', “'मेघदूत”, 'रघुवंश” और “अभिज्ञान शाकुन्तलम्‌"। 
अश्वघोष 

महाकवि कालिदास के बाद अश्वघोष का स्थान है। अश्वघोष की जिन 
कृतियों के सम्बन्ध में सभी विद्वान्‌ एक मत हैं उनके नाम हैं : “बुद्ध चरित', 
“सौन्दरनन्द', “शारिपुत्र प्रकरण” इनमें आदि की दोनों कृतियां महाकाव्य हैं। 
बुद्धघोष 

बौद्धाचार्य बुद्धोष ने दस सर्गों की एक कृति “पदूम-चूड़ामणि! नाम से 
लिखी । इनका पहला ग्रन्थ 'विसुद्धिमग्ग” है। 
भीम या भीमक 

बुद्धघोष के बाद महाकवि भीम या भीमक ने 27 सर्गों की एक कृति 
“रावणार्जुनीय' या “अर्जुन रावणीय” लिखी। 
भर्तुमिंठ 

इन्होंने 'हयग्रीववध” लिखा जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। 
भारवि 

भारवि की कवित्व कीर्ति को अक्षुण्ण बनाये रखने वाला उनका एक मात्र 
ग्रन्थ 'किरातार्जुनीयम्‌” है। इसकी गणना बृहत्तयी (किरात, माघ, नैषध) में की 
जाती है। 
भट्रिट 

महाकाव्यों के क्षेत्र में भारवि के बाद भट्रिट का क्रम आता है। महाकवि 
भट्ट ने अपने महाकाव्य “भट्रिटकाव्यः या 'रावणवध” की रचना की। 
कुमारदास 

कुमारदास भट्ट के अनुवर्ती महाकवि हैं। इन्होंने 25 सर्गों के "जानकी 
हरण” नामक महाकाव्य की रचना की थी, जिसके अब 5 सर्ग ही उपलब्ध हैं। 
_इस काव्य में रामकथा का बड़ा ही हृदय-प्राही चित्रण है। 
माघ 

कुमारदास के अनन्तर महाकाव्यों की परम्परा को समृद्धिशाली रूप देने वालों 
में महाकविं माघ का नाम आता है। महाकवि माघ की कवित्वकीर्ति का अमर 

28 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


स्मारक उनका 'शिशुपाल वध” या “माघकाव्य' है। माघ शब्दार्थवादी कवि थे। 
रत्नाकर 

इन्होंने 'हरविजय” नामक महाकाव्य की रचना की है। 
शिव स्वामी 

काश्मीर के ही दूसरे महाकवि शिव-स्वामी ने 'कफ्फिणाभ्युदय” नामक 
महाकाव्य का निर्माण किया। 
अभिनन्द 

इन्होंने 36 सर्गों में एक 'रामचरित” महाकाव्य लिखा। 
शंकुक 

इन्होंने 'भुवनाभ्युदय” नामक महाकाव्य की रचना की। 
क्षेमेन्द्र 

इन्होंने 'दशावतारचरित” की रचना की है। 
मंखक 

क्षेमेन्द्र के ही समकालीन एवं एक देशीय महाकवि मंखक हुए हैं, इनके 
महाकाव्य का नाम “श्री कंठचरित” है। 
हरिश्चन्द्र 

इन्होंने 'धर्मशर्माभ्युदय” महाकाव्य लिखा। 
हेमचन्द्र 

इन्होंने “दयाश्रय काव्य' और “त्रिषष्टिशलाकापुरुष-चरित्र” नामक दो महाकाव्यों 
की रचना की। 
माधव भटूट 

इन्होंने 'ररामायण” और “महाभारत” के आधार पर 3 सर्गों का एक महाकांव्य 
*राघव पाण्डवीय” लिखा। 
चण्डकवि विल्वमंगल 

चण्डकवि ने “पृथ्वीराज विजय” महाकाव्य लिखा, जो केवल आठ-सर्गों में ही 
अपूर्ण प्राप्त होता है। 
वाग्भट 

जैन कवि ने '"नेमिनिर्वाण” महाकाव्य लिखा। वाग्भट नामक चार ग्रन्थकारों 
का उल्लेख श्रद्धेय श्री नाथूराम जी प्रेमी ने अपने इतिहास ग्रन्थ में किया है। 
श्री हर्ष ; 

बारहवीं शताब्दी में लिखे गये महाकाव्यों की परम्परा का अवसान श्री हर्ष के 
“नैषधचरित” में जाकर होता है। इसी के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि 
उन्होंने निम्न आठ अन्य ग्रन्थ भी लिखे-स्वैर्यविचार प्रकरण, विजय प्रशस्ति, 
खंडनखंडकाव्य, गौडोवीराकुल-प्रशस्ति, अर्णववर्णन, छिन्द प्रशस्ति, शिवभक्ति सिद्धि। 
नवसाहसांक चरित-चम्पू। 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 29 


ऐतिहासिक महाकाव्य म 

संस्कृत साहित्य में इतिहास विषयक सामग्री प्रायः चार रूपों में उपलब्ध होती 
है। कुछ ग्रन्थकारों ने अपने पूर्ववर्ती ऐतिहासिक ग्रन्थों का उल्लेख किया है, किन्तु 
वे सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री हमें दान-पात्रों, 
अन्तर्लेखों, प्रशस्तियों आदि में मिलती है। तीसरी प्रकार की सामग्री 'रामायण', 
“महाभारत” एवं “पुराण” आदि महाग्रन्धों में प्राप्त होती है और चौथी प्रकार की 
यथेष्ट सामग्री काव्य-परक इतिहास ग्रन्थों में संकलित है। 

ऐतिहासिक महाकाव्यों के क्षेत्र में लिखी गयी सर्वाधिक प्रौढ़ कृति कल्हण की 
राजतरंगिणी है। अपनी इस महानतम कृति का निर्माण कल्हण ने अपने पूर्ववर्ती 
] इतिहास-प्रन्थों के परिशीलन के फलस्वरूप किया था। काश्मीर के राजा 
जयसिंह के राज्य काल में “राज-तरंगिणी” का निर्माण हुआ। 

महाकवि कल्हण के ये आँखों देखे वर्णन पूर्णतया सत्य हैं, और इस दृष्टि से 
यह मानने में तनिक भी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती कि संस्कृत-साहित्य में 
इतिहास विषय पर ग्रन्थ-निर्माण की परम्परा का अभाव था। 

'पालि” भाषा का विकास प्राकृत बोलियों के रूप में हुआ है। इन प्राकृत 
बोलियों की प्रमुख शाखाएँ हैं, मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, पैशाची और 
महाराष्ट्री । 

विषय की दृष्टि से पालि में दो प्रकार के काव्यों का निर्माण हुआ-वर्णनात्मक 
और आख्यात्मक। पहली श्रेणी के काव्यों में कस्सप का “अनागत वंश” और बरमी 
भिक्षु मेघंकर कृत 'लोकप्पदीपसार” या “'लोकदीपसार' आदि का नाम उल्लेखनीय 
है। 

संस्कृत साहित्य का ऐतिहासिक विषय अत्यन्त ही विवाद और अनेक मुखी 
सिद्धान्तों का विषय रहा है। संस्कृत के ग्रन्थों और ग्रन्थकारों की ऐतिहासिकता 
के सम्बन्ध में आज भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। बहुत सारी सामग्री मन गढ़न्त 
और अज्ञानता वश इतिहास-प्रन्थों में ऐसी भी देखने को मिलती है, जिसके 
वास्तविक-ज्ञान मूल्य कुछ और ही थे। 
काव्य-साहित्य की समृद्धि (काव्य-साहित्य) 

संस्कृत का सम्पूर्ण काव्य-साहित्य विषय और रचना-शैली के विकास की 
दृष्टि से तीन श्रेणियों या तीन युगों में अलग-अलग किया जा सकता है। पहली 
श्रेणी के काव्य रामायण” और “महाभारत” हैं। ये लौकिक एवं वैदिक संधिकाल 
के काव्य हैं। दूसरे युग का प्रतिनिधित्व अकेले महाकवि कालिदास की कृतियाँ 
करती हैं और तीसरी श्रेणी में कालिदास के बाद की कृतियों को रखा जा सकता 
है। 

काव्य का विषय बहुत व्यापक है। संस्कृत साहित्य का लगभग अर्धाश एक 
ही काव्य-विषय के भीतर समा जाता है। खंड काव्य, महाकाव्य, गीति काव्य, 

30 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चम्पूकाव्य, ऐतिहासिक काव्य, कथा काव्य, सुभाषित काव्य, गद्य काव्य और 
नाटक आदि अनेक विषयों का एक ही काव्य विषय के भीतर समावेश हो जाता 
है। नाटक और महाकाव्यों के प्रपूरक अंग होने पर भी उनको स्वतंत्र प्रकरणों में 
रखा गया है। उसका कारण काव्य के अन्य अंगों की अपेक्षा उनके रचना विधान 
का वैशिष्ट्य और उनका व्यापक प्रभाव है। 
जिनकी कीर्तिकथा प्रस्तरखण्डों पर उत्कीर्णित है 

संस्कृत साहित्य के कुछ सिद्ध हस्त कवियों की उज्ज्वल कथा पाषाण खण्डों 
पर उत्कीर्णित प्रशस्तियों एवं अन्तर्लेखों के रूप में जीवित है। ऐसे काव्यकारों में 
हरिशेण, वीरसेन, वत्सभट्ट, रविशांति, वासुल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। 
गीति काव्य 

“गीत” या “गीति' का अर्थ सामान्यतया गाना समझ लिया जाता है, जिसमें 
साज श्रृगांर, गायन, वादन की प्रधानता हो, कन्ति यहाँ गीति या गीत से तात्पर्य 
हृदय की रागात्मक भावना को छन्दबद्ध रूप से प्रकट करना अभिप्रेत है। 
गीतिकाव्य में रागात्मकता या ध्वन्यात्मकता होना धूम्र में अग्नि की भाँति 
अनिवार्य है। 
गीति काव्य की भावना की उद्भूति 

गीति काब्यों के प्रणयन में संस्कृत के कवियों में विशेष उत्सुकता दिखाई देती 
है। इस प्रकार की स्फुट संदेश रचनाओं का अनुवर्तन लगभंग वैदिक युग में ही 
हो चुका था, और उदाहरण स्वरूप ऋग्वेद में सरमा नामक एक कुत्ते को पणियों 
के निकट संदेश वाहक रूप में भेजने का प्रसंग यहां स्मरण किये जाने योग्य है। 
“रामायण, “महाभारत” और उनके परवर्ती काव्यों में भी इस प्रकार के स्फुट प्रसंग 
प्रचुर रूप से मिले हैं। 
गीति काव्य के भेद 

संस्कृत के यह गीति काव्य कई प्रकार से लिखे गये हैं यथा-- 

4. स्त्रोत काव्य या भक्ति काव्य। 

2. श्रृंगार काव्य या संदेश काव्य। 
संदेश काव्य 

संदेश काव्य या दूत काव्य की परम्परा में 'मेघदूत" और “घटकर्पर” काव्य 
आरम्भिक कृतियां हैं। इन दोनों के रचयिता क्रमशः महाकवि कालिदास और 
घटकर्पर कवि हुए। 
कथा काव्य 

संस्कृत के कथा साहित्य का विकास बैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृत, पालि, 
प्राकृत और अपशभ्रंश आदि कई स्थितियों एवं युगों में से होकर गुजरता रहा है। 
इन सभी युगों में कथा-साहित्य का अपना एक ही जैसा दृष्टिकोण या एक ही 
जैसा शिल्प सौन्दर्य एवं मान्यताएँ नहीं रही हैं। 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3। 





पौराणिक युग ने कथा साहित्य को अधिक लोकव्यापी बनाया। पुराणों की 
कथाओं का अस्तित्व बहुत समय तक समाज में मौखिक रूप में बना रहा और 
इसलिये एक ओर तो उनमें अनेक प्रक्षेप जुड़े और दूसरी ओर उनके स्वत्व पर 
स्वतंत्र दन्‍्त कथाओं का निर्माण हुआ। 
सुभाषित काव्य 

सुभाषित काव्य संस्कृत साहित्य के श्रृगांर हैं। संस्कृत के छोटे-बड़े सभी तरह 
के सुभाषित काव्यों की सूक्तियों को अपने-अपने ग्रन्थों में उद्धृत कर, उनके प्रति 
अपना अनुराग प्रकट किया। विभिन्‍न ग्रन्थों में विकीर्णित इन सुभाषित ग्रन्थों की 
सूक्तियों से एक बड़ा भारी लाभ संस्कृत के ग्रन्थकारों का इतिहास जानने में हुआ 
है। 

ग्रन्थ रूप में प्रमाणिकता से उपलब्ध होने वाला पहला सुभाषित काव्य “गाथा 
सप्तशती' है, जो महाराष्ट्री प्राकृत के सात सौ श्लोकों में लिखित है। 
नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य 

ग्रन्थ रूप में चाणक्य शतक” पहला नीति ग्रन्थ है जिसमें 340 श्लोक 
संगृहीत हैं और सम्भवतया उसके लेखक सुप्रसिद्ध “अर्थशास्त्र” के निर्माता एवं 
चन्द्रगुप्त मौर्य (400 ईस्वी पूर्व) के प्रधान सचिव कौटिल्य, चाणक्य या विष्णुगुप्त 
ही हैं। इसी चाणक्य ने “राजनीति समुच्चय” एवं “वृद्ध चाणक्य” नामक दो ग्रन्थ 
लिखे। बौद्धों का 'धम्मपद” भी इसी कोटि का ग्रन्थ है। 
गद्य काव्य 

आचार्य दण्डी संस्कृत के प्रथम ग्रन्थकार हैं “दण्डी” सम्भवतः एक उपाधिनाम 
था। दण्डी को तीन ग्रन्थों का प्रणेता बताया गया है। “काव्यादर्श' “दशकुमारचरितम्‌ 
तथा “अवन्ति सुंदरी कथा” उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। 

आचार्य दण्डी के बाद कथा-काव्य के क्षेत्र में सुबन्धु का नाम प्रमुख रूप से 
उपलब्ध होता है। इनकी कृतियों में (800 पेज) “वासवंदता” ही गद्य काव्य की एक 
मात्र कृति है। 

दण्डी और सुबन्धु के बाद बाण का क्रम आता है। बाण ने “कादम्बरी', 
“हर्षचरित” दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ दिये। 

तत्पश्चात्‌ धनपाल (000 ईस्वी ) की 'तिलक मंजरी”, वादीभ सिंह (00 
ईस्बी) की “गद्यचिन्तामणि” साढल्‍ल (00 ईस्वी) की “उदयसुन्दंरीकथा” अगस्त्य 
(7400 ईस्वी) का “कृष्ण चरितः और वामन भट्ट बाण (600 ईस्वी) का 
“बेमभूपाल चरित” आदि का नाम उल्लेखनीय है। 
काव्य शास्त्र 

संस्कृत साहित्य के काव्य या कविता अंग की विधि-व्यवस्थाओं का विवेचन, 
समीक्षण करने वाला शास्त्र ही काव्य-शास्त्र है। उससे हमें काव्य का स्वरूप, 

32 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लक्षण, स्वभाव, प्रवृति और उसकी विभिन्‍न समस्याओं एवं विचार-विभेदों का 
वैज्ञानिक निरूपण देखने को मिलता है। 
मेधाविन 
काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में मेधावी या मेधाविन्‌ अथवा मेधाविरुद्र नाम के एक . 
प्राचीन आचार्य हुए हैं, जिनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, किन्तु जिन्हें इतिहास 
में भामह और दण्डी के समकक्ष रखा गया है। 
भामह 
आचार्य भामह से काव्य-शास्त्र की उन्‍नत परम्परा का आरम्भ माना जाता है। 
इनके ग्रन्थ 'काव्यालंकार' से, नाट्यशास्त्र की चाहरदीवारी से आबद्ध 'काव्य-शास्त्र” की 
बंदी आत्मा को सर्वथा स्वतंत्र-दिशा में विकसित होने का सुयोग मिला। 
दण्डी 
दण्डी काव्य-शास्त्र के प्रमुख आचारों में से हैं। “दण्डी” के तीन ग्रन्थ उपलब्ध 
होते हैं-“काव्यादर्श', 'दशकुमारचरितम्‌! और “अवन्ति सुंदरी कथा” । अंतिम दोनों 
ग्रन्थ काव्य के हैं। 'काव्यादर्श' इनका आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ है। 
उद्भट भट्ट 
आचार्य उद्भट प्रथम कोटि के काव्य-शास्त्री हुए। उद्भट का प्रधान ग्रन्थ 
“काव्यालंकार सार संग्रह” है। जिसको बूलर साहब ने 'जैसलमेर' से प्राप्त किया 
था। 
वामन 
आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के जन्मदाता थे। वामन का एक काव्य-पग्रन्थ 
“काव्यालंकारसूत्र” है, जिस पर गोपेन्द्र त्रिपुरहल भूपाल की टीका “कामधेनु' है। 
इसकी एक महेश्वर प्रणीत “साहित्य-सर्वस्व” नामक टीका का भी पता लगा.है। 
रुद्रट 
“अलंकार सम्प्रदाय” के अनुयायी आचार्यों में रुद्रट का स्थान प्रमुख है। रुद्रट 
* का एक ही उपलब्ध ग्रन्थ है 'काव्यालंकार', यह पहला ग्रन्थ है, जिसमें अलंकारों 
का वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकरण हुआ है। 
आननन्‍्द-वर्धन 
भारतीय काव्य-शास्त्र के इतिहास में आनन्द वर्धन का बड़ा नाम है। उन्हें 
ध्वनि सम्प्रदाय का जन्मदाता कहा जाता है। आनन्द-वर्धन का प्रमुख ग्रन्थ 
“ध्वन्यालोक' वृति है। 
राजशेखर 
इनका आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ “काव्यमीमांसा' है। 
धनंज्जय 
धनज्जय महामुनि भरत की परम्परा के आचार्य हुए। उनका ग्रन्थ नाट्य-शास्त्र 
की श्रेणी का ग्रन्थ है। प 
है विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 33 


धनिक 

धनंज्जय के अनुज धनिक ने “दशरूपक” की तरिकाओं पर “अवलोक' नामक 
टीका लिखी। 
अभिनव गुप्त 

यह ध्वनि समर्थक आचार्य आनन्द वर्धन की परम्परा में हुए वे कवि, 
काव्य-शास्त्री और उद्भट दार्शनिक भी थे। काव्य-शास्त्र पर उन्होंने “अभिनव 
भारती*, 'ध्वन्यालोक लोचन' और “काव्यकौस्तुभ-विवरण' नामकटीका ग्रन्थ क्रमशः 
भरत के “नाट्य-शास्त्र', आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' और अपने गुरु भदृतौत के 
“काव्यकौस्तुभ! पर लिखे। 
कुंतक या कुंतल 

कुंतक एक नये “वक्रोक्ति सम्प्रदाय” के पिता हुए, इनका “वक्रोक्ति-काव्यजीवित' 
ग्रन्थ अपूर्ण ही उपलब्ध है। 
महिम भटूट 

महिम भटूट अद्भुत तार्किक और प्रखर आलोचक थे। इनका एक मात्र ग्रन्थ 
“व्यक्ति विवेक” उपलब्ध है। काव्य-शास्त्र पर इन्होंने एक दूसरा ग्रन्थ “तत्वोक्ति 
कोश' भी लिखा था, जो उपलब्ध नहीं है। 
क्षेमेन्द्र 

क्षेमेन्द्र ने अपना दूसरा नाम व्यासदास लिखा है। इनके दो ग्रन्थ “औचित्य 
विचार चर्या”' और “कविकंठाभरण” प्रकाशित हैं। 
भोजराज 

भोजराज उन-विरले भाग्यशाली लोगों में से थे जिन पर लक्ष्मी और सरस्वती 
दोनों की कृपा रहती है। भोज के ज्योतिष ग्रन्थ 'राज-मृगांक' का रचनाकाल 964 
शक (042 ईस्वी) है। इनके काव्य-शास्त्र विषयक दो ग्रन्थ उपलब्ध हैं। 
“सरस्वती-कंठाभरण” और “श्रृंगार प्रकाश” । 
मम्मट 

“काव्य-शास्त्र” के इतिहास में राजानक मम्मट बड़े सम्मान से याद किये जाते 
हैं। “मम्मट' के ग्रन्थ का नाम “काव्यप्रकाश' है। यह ग्रन्थ सम्पूर्ण काव्य-शास्त्र का 
प्राण है। 
रुय्यक 

राजानक रुय्यक भी काश्मीरी थे। इनके काव्यशास्त्र-विषयक ग्रन्थों के नाम 
हैं-“अलंकार सर्वस्व”, “व्यक्ति विवेक विचार', “काव्यप्रकाश संकेत”, “सहृदय 
लीला', “अलंकार मंजरी”, “अलंकारानुसारणी'”, “साहित्य मीमांसा” “नाटक मीमांसाः 
और “अलंकार वार्तिक' । 
मखंक 

इन्होंने “अलंकार सर्वस्व” के वृति भाग की रचना की। 


34 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वाग्भट प्रथम 

इन्होंने “वाग्भटालंकार” की रचना की है। इस ग्रन्थ पर लगभग आठ टीकाएँ 
लिखी गयी हैं। 
हेमचन्द्र 

काव्य-शास्त्र” पर इन्होंने 'काव्यानुशासन' ग्रन्थ लिखा और उस पर 
“अलंकार-चूड़ामणि! नामक वृति तथा “विवेक” नामक टीका लिखी। 
जयदेव 

इनके ग्रन्थ का नाम *चन्द्रालोक' है। इसके पंचम्मयूख को परिवर्धित करके 
अप्पयदीक्षित ने 'कुवलयानन्द” लिखा। 
विश्वनाथ 

राजानक मम्मट के बाद कविराज विश्वनाथ को ही स्मरण किया जाता है। 
“साहित्य-दर्पण” विश्वनाथ का आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ है। 'साहित्य-दर्पण' काव्य-शास्त्र 
का विश्वकोश है। 
भानुदत 

“रसमंजरी” और “रसतरंगिणी” दोनों इनके आचार्य श्रेणी कें ग्रन्थ हैं। 
अप्पयदीक्षित 

काव्य-शास्त्र विषयक उनके तीन ग्रन्थ हैं-'कुवलयानंद', 'चित्रमीमांसा! और 
“वृति-वार्तिक' । 
जगन्नाथ 

काव्य-शास्त्र के इतिहास में पण्डित राज का स्थान बहुत ऊँचा है। काव्य के 
क्षेत्र में इन्होंने 'भामिनी-विलास”', “आसफ-विलास” “गंगा-लहरी', 'करुणा-लहरी', 
“अमृत-लहरी”, “लक्ष्मी-लहरी” आदि तथा काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में 'चित्रमीमांसा 
खण्डन” तथा “रसगंगाधर” लिखे। 
काव्य-शास्त्र में सम्प्रदाय चिंतन 

आचार्य नन्दिकेश्वर और भरत (ईस्वी पूर्व प्रथण शतक) से लेकर पण्डित राज 
जगन्नाथ (700 ईस्वी) तक काव्य-शास्त्र की परम्परा निरन्तर आगे बढ़ती रही। 
सम्प्रदायों और इनके प्रवर्तकों का विवरण इस प्रकार है- 


. रस सम्प्रदाय - नन्दिकेश्वर, भरत 

2. अलंकार सम्प्रदाय - भामह, उद्भट, रूद्रट। 
3. रीति सम्प्रदाय - दण्डी, वामन। 

4. वक्रोक्ति सम्प्रदाय - कुन्तक। 

5. ध्वनि सम्प्रदाय - आनन्द वर्धन। 


इस प्रकार संस्कृत साहित्य की विशालता को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया। 
उपजीव्य काव्य वाल्मीकि रामायण 
प्रत्येक साहित्य में प्रतिभाशाली कवियों की लेखनी से प्रसूत कतिपय ऐसे 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 35 


मर्मस्पर्शी काव्य हुआ करते. हैं जिनसे स्फूर्ति तथा प्रेरणा लेकर अवान्तर कालीन 
कविगण अपने काव्यों को सजाया करते हैं। ऐसे काव्यों को हम व्यापक प्रभाव 
सम्पन्न होने के हेतु “उपजीव्य काव्य” के नाम से पुकार सकते हैं। संस्कृत साहित्य 
में भी ऐसे उपजीव्य काव्य विद्यमान हैं जिनसे संस्कृत भाषा तथा अर्वाचीन 
प्रान्तीय भाषाओं के कवियों ने अपने विषय के निर्देश के लिये तथा काव्य शैली 
के विमल विधान के निमित्त संतत्‌ उत्साह तथा अअश्रान्त स्फूर्ति ग्रहण की और 
आज भी वे कर रहे हैं। ऐसे उपजीव्य काव्य संख्या में तीन हैं- 

. रामायण. 2. महाभारत 3. श्रीमद्भागवत्‌ 

इन तीनों का अवान्तर काव्य साहित्य के ऊपर बड़ा ही विशाल मार्मिक तथा 
आभ्यन्तर प्रभाव पड़ा है। 

वाल्मीकि समग्र कविसमाज के उपजीव्य हैं--विशेषतः कालिदास तथा भवभूति 
के। इन दोनों महाकवियों ने रामायण का गाढ़ें अनुशीलन किया था और इनकी 
कविता में हमें जो रस मिलता है, उसमें रामायण की भक्ति कम सहायक नहीं रही 
है। कालिदास का श्रृंगार रस सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु इनका करुण रस कम 
प्रभावशाली नहीं है। “कालिदास” ने उभयविध “करुण” को उपस्थित कर उसे 
साज्ञोपाज् रूप से दिखलाया है। पत्नी के लिये पति की करुणा का रूप रघुवंश के 
“अज-विलाप' में पाते हैं और पति के निमित्त पतल्ली की करुण परिवेदना 'रति-विलाप! 
के रूप में हमें रुलाती है। ताप से लोहा भी पिघल उठता है, तब कोमल हृदय 
मानव-चित्त संताप से मूदु बन जाये क्या इस विषय में संदेह के लिए स्थान है? 
“अभितप्त मयोऊपि मार्दव॑ भजते कैव कथा शरीरिषु'। 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि रामायण एक उपजीव्य काव्य है। अर्थात्‌ 
परवर्ती काव्यकारों को इससे प्रेरणा मिलती है। 
आदि काव्य रामायण 

संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण “आदि काव्य” समझा 
जाता है तथा “वाल्मीकि” “आदि कवि? माने जाते हैं। 

तामस-हारिणी तमसा कल-कल करती हुई बह रही थी, उसका पावनतट वृक्षों 
की स्निग्ध छाया से शीतल था। तीर में न तो पड्ढू कलड्डू की तरह व्याप्त था और 
न शैवाल दुष्ट-जनों की चित्त-वृति के समान उसे कलझ्लित कर रहा था। मनोभिराम 
जल सज्जनों के चित्त की भाँति नितान्त प्रसन्‍न था। महर्षि वाल्मीकि के हृदय को 
इस दृश्य ने लुभा दिया, उन्होंने स्नानकर, वल्कल पहनकर इस प्रकार के शांत वन 
में भ्रमण करना शुरू किया। इसी समय क्रोज्ची के करुण क्रन्दन ने उनकी दया 
दृष्टि को अपनी ओर खींचा। उनके सामने क्रौज्वी का मृत कलेवर खून में लथपथ 
हो रहा था। इस दृश्य को देखकर ऋषि के कोमल चित में नैसर्गिकी करुणा का 
स्रोत प्रवाहित होने लगा, सुप्त करुणा इस दृश्य से बलातू जाग पड़ी। अकस्मात्‌ 
उनके मुँह से यह श्लोकात्मक वागू वैखरी प्रस्खलित हुई- 

36 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मा निषाद! प्रतिष्ठाम्‌ त्वमगमः शाश्वतीः समाः। 
यत्‌ क्रौज्वीमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्‌ ।। 
सम अक्षर युक्त चार पदों से मण्डित 'श्लोक' का जन्म हो गया। संस्कृत 
काव्य-कुमार का यही उदय है। महाकाव्य की भाविनी परम्परा का यही मूल स्रोत है। 
महाकाव्य का प्रथम तथा भव्य निदर्शन है-यही वाल्मीकि रामायण। रामायण 
का ही विश्लेषण कर आलड्कारिकों ने “महाकाव्य” का लक्षण प्रस्तुत किया है 
“सर्गबन्धोमहाकाव्यं' लक्षणं का प्रथम तथा सबसे सुन्दर लक्ष्य है-रामायण। दण्डी 
का यह प्रसिद्ध लक्षण 'रामायण” को ही आदर्श मानकर लिखा गया है- 
“अलडूकृतमसंक्षिप्त रसभाव निरन्तरम्‌ 
सर्वैरनतिविस्तीर्णैं: श्राव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ।। 
सर्वत्रभिन्‍नवृतान्तैरूपेतं लोकरञ्जनम्‌। 
काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायेत सदलड्कृति।।”? 
उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण आदि काव्य 
एवं काव्य-परम्परा का प्रेरणा स्रोत है। 
रामायण का आकार 
वाल्मीकि कृत “रामायण' में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचन्द्र के जीवन का 
काव्यमय वर्णन है। उसकी वर्तमान प्रति में सात काण्ड हैं, जिनमें कुल 24000 
श्लोक हैं। यद्यपि “वाल्मीकि रामायण' का प्रचार सम्पूर्ण भारत में है तथापि सब 
प्रान्तों में रामायण का पाठ एक सा नहीं है। पाठ-भेद के अतिरिक्त रामायण की 
कुछ प्रतियों में कई ऐसे श्लोक, वृत्तान्त और सर्ग पाये जाते हैं जिनका अन्य-प्रतियों 
में अस्तित्व ही नहीं है। 
रामायण में प्राप्त सात काण्ड इस प्रकार हैं- 


. बालकाण्ड न प्र7 सर्ग। 
2. अयोध्याकाण्ड न 9 सर्ग। 
3. अरण्यकाण्ड प्र5 सर्ग। 
4. किष्किन्धाकाण्ड. - 67 सर्ग। 
5. सुन्दरकाण्ड न 68 सर्ग। 
6. युद्धकाण्ड - 28 सर्ग। 
7. उत्तरकाण्ड - ]] सर्ग। 
645 


24000 श्लोकों से युक्त होने के कारण ही रामायण को “चतुर्विशति संहिता” 
कहा जाता है। 
विषय वस्तु 
वाल्मीकि रामायण आदि कवि की आदि रचना है, विषय वस्तु की दृष्टि से 
इंसे सीमा: में बांधना असम्भव है। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 37 


के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें श्री राम के जन्म, रावण-राम युद्ध 
एवं भगवान का राज्याभिषेक तथा उनका स्वर्ग-गमन ये मुख्य बिन्दु हैं जिनके 
आधार पर सम्पूर्ण रामायण का रचना कार्य सम्पन्न हुआ है। इनके अतिरिक्त और 
भी ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनका वर्णन रामायण में प्राप्त होता है किन्तु रामायण का 
मूल उद्देश्य पाप पर पुण्य की विजय ही है। रामायण में प्राप्त होने वाले अन्य 
विषय कुछ इस प्रकार हैं-आदि कवि के विषय में कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा 
है कि रामायण के लक्षणों के आधार पर ही दण्डी आदि ने काव्यों की परिभाषा 
बतलाई। त्रयम्बकराज मखानी ने सुन्दर काण्ड की व्याख्या में प्रायः सभी श्लोकों 
को अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्ड नाम की सार्थकता दिखलाई है। वास्तव 
में बात भी ऐसी ही है। सुन्दर काण्ड का पाँचवाँ सर्ग तो नितान्त सुन्दर है ही। 
श्री मखानी ने सभी के उदाहरण भी दिये हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि 
किसी प्राचीन काव्य को बिना देखे ही उन्होंने सर्वोत्तम ग्रन्थ का निर्माण कर दिया। 
इनका प्राकृतिक चित्रण भी बहुत सुन्दर, है। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र को भी परम 
प्रमाण माना है। त्रिजटा के स्वप्न, श्री राम की यात्रा-कालिक मुहूर्त विचार, 
विभीषण द्वारा लंका के अपशकुनों का प्रतिपादन आदि ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञापक 
तथा समर्थक हैं। इसके अतिरिक्त तन्त्रशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, विज्ञान आदि 
सभी से सम्बन्धित सामग्री रामायण में प्राप्त होती है। महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष 
तनत्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रों की प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। 
वस्तुतः यही परम आस्तिक की दृष्टि होती है। धर्म-शास्त्र के लिये तो यह ग्रन्थ 
परम प्रमाण है ही, अन्य ऐतिहासिक कथाएँ भी बहुत हैं, अर्थ-शास्त्र की भी 
पर्याप्त सामग्री है। व्यवहार तथा आचार की भी बातें हैं, कुशल मार्ग का भी 
प्रदर्शन है। 
रामायण की उत्पत्ति एवं रचनाकाल 

यह माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना राम के राज्य 
काल में ही पूर्ण कर ली थी। पर्टिजर महोदय का कथन है कि राम 660 ई पूर्व 
हुए थे दूसरी ओर कुछ आधुनिक अनुसंधान कर्ताओं ने “महाभारत' में द्रोणपर्व 
एवं शान्ति पर्व तथा अन्य निर्देशों से अनुमान लगाया है कि वाल्मीकि जी ने 
अपनी रामायण की रचना पहले से प्रचलित राम-कथा सम्बन्धी आख्यानों के 
आधार पर ही की और वाल्मीकि राम के समकालीन नहीं थे। इन्हीं अनुसंधान 
कर्ताओं के अनुसार प्रारम्भ में 'रामायण” का आकार बहुत छोटा था, किन्तु वह 
समय के प्रवाह के साथ-साथ बढ़ता गया। 

समुचित प्रमाणों के आधार पर “रामायण” का रचना काल निर्धारित करने का 
प्रयास करना चाहिये। यदि ध्यान से देखा जाये तो हमारे समक्ष “रामायण” के दो 
रूप पूर्ण रूपेण स्पष्ट हो जाते हैं। पहला तो मौलिक रामायण का प्रक्षेप रहित रूप 
जो महर्षि वाल्मीकि जी की प्रामाणिक रचना है तथा दूत्तरा वर्तमान प्रचलित 

38 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


“रामायण” का रूप जिसमें अनेक प्रक्षिप्तांश हैं। इन दोनों रूपों का रचनाकाल 
अलग-अलग माना जाता है। याकोबी ने मूल रामायण का रचना काल 800-600 
ईस्वी पूर्व निर्धारित किया है तथा प्रक्षेप युक्त रूप 'रामायण' का रचना काल 
अधिकांश यूरोपीय विद्वान द्विशताब्दी ई० पू० के बाद का नहीं मानते हैं। 
“रामायण में केवल एक ही स्थान पर बुद्ध का नाम आया है किन्तु वह भी प्रक्षिप्त 
ही है क्योंकि यह सब प्रतियों में नहीं पाया जाता है इसके अतिरिक्त मूल रामायण 
के रचनाकाल से परवर्ती ग्रन्थकार पाणिनी, भास, कौटिल्य और पतन्जलि रामायण 
के मुख्य कथानक से पूर्णतया परिचित जान पड़ते हैं। यद्यपि पाणिनी ने रामायण 
में आये हुए अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति दिखलाई है, तथापि “रामायण” में अनेक 
ऐसे आर्ष प्रयोग भी पाये जाते हैं जिनका पाणिनीय व्याकरण से कोई समन्वय 
नहीं दीखता। “रामायण” को अलंकृत एवं परिष्कृत शैली तथा महाभारत” की 
ऊबड़-खाबड़ शैली के अध्ययन से विद्वान्‌ इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे हैं कि 
“रामायण! में एक पूर्ववर्ती कधानक को “महाभारत” की अपेक्षा अधिक परवर्ती 
भाषा और शैली में चित्रित किया गया है। बौद्ध ग्रन्थों में 'दशरथ-जातक' इत्यादि 
की उपलब्धि भी बुद्ध के आविर्भाव से पूर्व राम कथा की प्रसिद्धि में प्रमाण स्वरूप 
उपस्थित होती है। दूसरी ओर रामायण में बौद्ध प्रभाव खोजने पर भी नहीं 
मिलता। 
इन सबके अतिरिक्त रामायण” के कुछ अन्तर्वर्ती साक्ष्यों के आधार पर भी 
“रामायण” का 600 ईस्वी पूर्व ही रचा जाना सिद्ध होता है। 500 ईस्वी पूर्व में 
पाटलिपुत्र की स्थापना मगध-नरेश अजात शत्रु के द्वारा गंगा और शोण नदियों 
के संगम पर की गयी थी। “रामायण में राम वन जाते समय गंगा और शोण के 
संगम पर से तो जाते हैं किन्तु वहां पाटलिपुत्र नाम का उल्लेख नहीं है। इस 
आधार पर भी रामायण का कम से कम अजातशलत्रु के प्रादुर्भाव से पूर्व बनना 
अवश्य सिद्ध होता है। बौद्धग्रन्धों में श्रावस्ती का नाम प्रसेनजित की राजधानी के 
रूप में मिलता है किन्तु अयोध्या का नाम साकेत मिलता है जो निश्चय ही 
“रामायण” की बौद्धग्रन्थों की अपेक्षा प्राचीनता सिद्ध करता है। तीसरे, 'रामायण' 
से विशाला तथा मिथिला इन दो स्वतन्त्र राज्यों का उल्लेख प्राप्त होता है। 
विशाला इक्ष्वाकुपुत्र विशाल द्वारा स्थापित की गयी थी तथा मिथिला राजा जनक 
की राजधानी थी। बौद्ध ग्रन्थों में इन दोनों राज्यों का वैशाली के रूप में सम्मिलित 
वर्णन किया गया है तथा यहाँ गणतंत्र शासन प्रणाली का प्रचलित होना दिखलाया 
गया है। इस कारण से भी “रामायण” का बौद्धों से पहले बना होना सिद्ध होता 
है। चौथे, रामायण में उत्तरी भारत में कौशल अंग, कान्य-कुंब्ज, मगध, मिथिला 
आदि अनेक छोटे-छोटे आर्य राज्यों का उल्लेख किया गया है। ऐसी राजनीतिक 
स्थिति भगवान बुद्ध के पूर्व ही थी। अतः रामायण की रचना भगवान बुद्ध से पूर्व 
हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त प्रो० सिलवां लेवी ने “सद्धर्ममृत्युत्थान' नामक बौद्ध 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन » 39 


ग्रन्थ का अध्ययन कर सिद्ध किया है कि यह ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि का ऋणी है 
तथा जम्बू द्वीप वर्णन 'रामायण' के दिग्वर्णन से पूर्णतः मिलता है। इसी प्रकार इस 
ग्रन्थ में नदियों, समुद्रों, देशों और द्वीपों का वर्णन बिल्कुल उसी शैली में किया 
गया है जैसा कि “रामायण” के अन्तर्गत मिलता है। 

इन सबके आधार पर रामायण बौद्धों से पूर्व किसी समय पूर्ण हो चुकी थी। 
रामायण के प्रक्षिप्ताश 

लोकप्रिय होने के कारण रामायण में निरन्तर कुछ न कुछ प्रक्षेप होते हैं। 
उनके प्रायः सभी आलोचकों का मत है कि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड मूल ग्रन्थ 
में नहीं थे, वे बाद में जोड़ दिये गये। प्रो. याकोबी के मतानुसार “रामायण” के 
मूलपाठ में अयोध्या काण्ड से युद्ध काण्ड तक पाँच ही काण्ड थे। युद्ध काण्ड के 
अन्त में दी गयी फलश्रुति से रामायण की समाप्ति यहीं पर स्पष्ट जान पड़ती है। 
उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य प्रामाणिक काण्डों की शैली से भिन्‍न है, इसकी 
आधी से-अधिक सामग्री रामचरित से सम्बन्ध नहीं रखती और जो सम्बन्ध रखती 
है, उसमें भी एकता नहीं है। उत्तरकाण्ड में अन्य काण्डों को देखते हुए पुनरुक्ति 
दोष तथा अन्य विरोधी बातें भी मिलती हैं। उदाहरणार्थ-युद्ध काण्ड के अन्तिम 
सर्ग में सुग्रीव, विभीषण आदि के चले जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है, फिर भी 
उत्तरकाण्ड में पुनः उनके प्रस्थान का वर्णन किया गया है। उत्तरकाण्ड के 7वें 
सर्ग में वेदवती की कथा आती है, जिसके अनुसार सीता अपने पूर्वजन्म में वेदवती 
ही थीं। यदि यह वृत्तान्त प्रक्षिपत न होता तो उसका उल्लेख “रामायण” के अन्य 
काण्डों में जहाँ सीता जन्म का प्रसंग आया है, अवश्य किया जाता। साथ ही, यह 
भी उल्लिखित है कि महाभारत के 'रामोपाख्यान” में तथा संस्कृत के अनेक 
रामकाब्यों में उत्तरकाण्ड की कथा वर्णित नहीं है। 

बाल-काण्ड की शैली भी बहुत कुछ उत्तर-काण्ड की शैली जैसी है। उसका 
भी प्रायः आधा भाग रामचरित से सम्बन्ध नहीं रखता। उसकी भी अनेक दक्तियाँ 
बाद में पाँच काण्डों से मेल नहीं खातीं। उदाहरणार्थ-बाल-काण्ड में लक्ष्मण और 
उर्मिला का विवाह वर्णित है, किन्तु अरण्यकाण्ड में शूर्पणखा के प्रसंग में लक्ष्मण 
को अविवाहित बताया गया है। केवल बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में राम हमारे 
सामने विष्णु के अवतार के रूप में आते हैं। अन्य काण्डों में, कुछ प्रक्षिप्त स्थानों 
को छोड़कर वे एक आदर्श मानवीय महापुरुष की भाँति ही चित्रित किये गये हैं। 
इन प्रक्षिप्त दो काण्डों में महाभारत की भाँति कथानक का स्वाभाविक प्रवाह भी 
आनुषंगिक आख्यानों से बहुधा अवरुद्ध हो गया है। अन्य काण्डों में ऐसे 
आख्यानों की संख्या बहुत थोड़ी है। हि 
. इसका तात्पर्य यह है कि अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक प्रक्षिप्त अंश है ही 
नहीं। इन पाँचों काण्डों में भी कई प्रक्षेप हैं पर वे भिन्न प्रकार के हैं। इन प्रक्षेपों 
की सृष्टि सूतों और कुशीलवों द्वारा हुई, जिन्होंने इन काण्डों के हृदय-ग्राही-अंशों 

40 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


ह 


का विस्तार कर दिया। जब सहृदय श्रोतागण दशरथ, कौशल्या या सीता के करण 
विलापों का वर्णन सुन नेत्रों से अश्रु-विमोचन करने लगते, या रांम-रावण के 
प्रचंण्ड पराक्रम पूर्ण युद्ध-वर्णन से प्रभावित होने लगते, अथवा नीतियुक्त या 
शील-सौन्दर्य परिचालक शक्तियों पर मन्त्र-मुग्ध होने लगते, तब इन कुशीलवों को 
वाग्विस्तार और अपनी कल्पना के प्रसार का अच्छा अवसर मिल जाता। इस 
प्रकार “रामायण! के प्रक्षेपों की सृष्टि हुई। 

महाभारत की भाँति “रामायण” का नियतरूप लेखबद्ध होने पर ही निर्धारित 
हो सका। परन्तु यह तभी हुआ होगां जब “रामायण” इतनी प्रसिद्ध हो गयीं होगी 
कि उसका श्रवण और परायण पुण्य-कर्म माना जाने लगा और उसे लिपिबद्ध 
करने वाला स्वर्ग का अधिकारी समझा जाने लगा। इसलिये 'रामायण' के प्रथम 
संग्रह कर्ताओं तथा संपादकों के समक्ष जो कुछ भी रामायण के नाम से निर्दिष्ट 
सामग्री प्रस्तुत की गयी उसका उन्होंने स्वागत किया और उसे आलोचक की दृष्टि 
से नहीं अपितु भक्ति-भावना पूर्वक लिखित रूप दिया। यदि सम्पूर्ण भारतवर्ष के 
प्रचलित पाठ-भेदों को छोड़ दिया जाये तो “रामायण” के मूल रूप का अनुमान 
लगाया जा सकता है। ऐसां करने से “रामायण” के 24,000 श्लोकों में से केवल 
एक चौथाई बचे रहते हैं। 
रामायण का महाकाव्यत्व 

“रामायण! संस्कृत कां प्रथम महाकाव्य माना जाता है, किन्तु महाकाव्य के 
आधुनिक स्वरूप के आधार पर उसे महाकाव्य नहीं कहा जा सकता है और न ही 
उसके रचयिता को यह आशा रही होगी कि उसकी रचना कभी महाकाव्य की 
कोटि में गिनी जायेगी। यदि हम “रामायण” को प्रथम काव्य न कहकर युग विशेष 
का प्रतिनिधि महाकाव्य कहें तो असंगत न होगा। इसमें अन्य अदूभुत वर्णनों के 
साथ ही वीर-भावना का प्राधान्य है। जो इस बात का परिचायक है कि यह 
महाकाव्य भारत के प्राचीनतम इतिहास के किसी वीर-युग का प्रतिनिधित्व करने 
वाला है। 

“रामायण” महाकाव्य के विषय में विद्वानों का मत है कि वह अनेक आख्यानों 
का संग्रह है। वैदिक काल से ही प्रचलित कुछ गाथाओं तथा देवी-देवताओं, दैत्यों, 
राक्षसों, नागों और ऋषि-मुनियों की कथाओं के आधार पर इस वृहत्काय काव्य-प्रन्थ 
की रचना की गयी। यही नहीं समयानुसार इसमें वीरों की स्तुतियों को भी सम्बद्ध 
कर दिया गया। यहं भी अनुमान लगाया जाता है कि रामायण-काल से भी पूर्व 
सूत, चारणादि लोग रामचरित सम्बन्धी वीर-स्तुतियों का प्रचार करते रहे होंगे 
उनके द्वारा राजसभाओं में इन स्तुतियों का गायन तथा कुशीलवों द्वारा विविध-स्थानों 
में जाकर सर्व-साधारण को स्तुतियाँ गाकर प्रसन्‍न करने से भी इनका अत्यधिक 
प्रचार हुआ होगा। 

वाल्मीकि ने प्राचीन काल से मौखिक रूप में चले आ रहे अनेक आख्यानों 

विषयावतरणं-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन/ 4। 


और उपाख्यानों का सार समेटकर उसको इस रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप 
से उसकी प्रधान विषय वस्तु उसके निर्माण काल से बहुत पूर्व की है। पूर्वागत 
कथाएँ ही इस महाकाव्य में अपनी सिद्धावस्था को प्राप्त हो गयी हैं। पूर्वागत 
आख्यान और उपाख्यान ही संस्कृत महाकाव्यों के उद्भव रूप हैं और इन्हीं का 
संकलन, संशोधन एवं परिवर्तन करके “रामायण” का विशाल कलेवर निर्मित किया 
गया उसके द्वारा महाकाव्यों की एक प्रौढ़ परम्परा का अनुवर्तन हुआ। 
रामायण के विषय में विद्वानों का यह विचार यथार्थ ही है कि वाल्मीकि ने 
इस महाकाव्य की उस रूप में रचना नहीं की जिसमें कि आज यह प्राप्त होता है, 
प्रत्युत यह कई शताब्दियों की रचना है। अनेक कवियों द्वारा समय-समय पर 
उसमें परिवर्तन, परिवर्धन तथा संशोधन किये गये। स्थान-स्थान पर क्षेपकों का 
समावेश तथा भाषा शैली के आधार पर सम्पूर्ण महाकाव्य से उनकी भिन्‍नता इस 
कथन का पुष्ट प्रमाण है। वर्तमान रामायण के अनेक संस्करणों की भिन्‍न रूपता 
का भी इसके किसी एक समय में किसी एक कवि द्वारा न रचे जाने की ओर 
स्पष्ट संकेत करती है। अतः स्पष्ट है कि रामायण का जो स्वरूप आज हम देखते 
हैं--उसका निर्माण अंनेक शताब्दियों के अनन्तर हुआ है। इस महाकाव्य में हमारी 
जातीय संस्कृति और सभ्यता का यथार्थ दिग्दर्शन हुआ। विकास क्रम में रचित 
यह ग्रन्थ निःसन्देह विकसित महाकाव्यों की कोटि में आता है और अपनी 
आलंकारिक शैली के कारण यह अपने उत्तरवर्ती महाकाव्यों का जनक भी है। 
रामायण! में महाकाव्य के लक्षणों का उच्चतम रूप मिलता है, सच तो यह 
है कि “रामायण” को देखकर ही परवर्ती आचार्यों ने महाकाव्य के लक्षण निर्धारित 
किये हैं। भारतीय साहित्य इस महाकाव्य से अत्यधिक अनुप्राणित हुआ है। 
महाकाव्य के लक्षण आचार्य विश्वनाथ के अनुसार इस प्रकार हैं- 
. यह सगों में विभक्त होता है। 
. इसका नायक, देवता, कुलीन, क्षत्रिय या एक वंशज कुलीन अनेक राजा होते 
हैं। है हि 
खरृंगार, वीर और शान्त रस में से एक प्रधान रस होता है और अन्य उसके 
म्हायक। 
इसमें सभी नाटकीय संधियाँ होती हैं। 
इसका कथानक ऐतिहासिक होता है या किसी सज्जन व्यक्ति से सम्बद्ध। 
इसमें चतुर्वर्ग-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन होता है। 
प्रारम्भ में देवादि को नमस्कार, आशीर्वाद या वस्तु-निर्देश होता है। कहीं 
दुर्जन निन्‍्दा और सज्जन-प्रशंसा भी रहती है।..- 
प्रत्येक सर्ग में एक छन्द वाले प् रहते हैं, किन्तु अन्त में छन्द परिवर्तन हो 
जाता है। 
.. इसमें आठ से अधिक सर्ग होते हैं, जो न बहुत छोटे और न बड़े होते हैं। 
42 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कफ़फ्डी छ७ ७ 


हट 


छ् 


0. कहीं विभिन्‍न छन्‍्दों वाले सर्ग भी होते हैं। 

।. सर्ग में भावी-कथा का संकेत होता है। 

2. इसमें इन प्रधानताः के वर्णन रहते हैं-सन्ध्या, सूर्य, चन्द्रमा, रात्रि, प्रदोष, 
अंधकार, दिन, प्रातः, मध्यान्ह, मृगया, शैल, ऋतु, वन, सागर, युद्ध, प्रस्थान, 
विवाह, मन्त्र, पुत्र, उदय आदि। 

3. ग्रन्थ का नाम कवि, कथानक, नायक या प्रतिनायक के नाम पर रखना 
चाहिये। 

4. आर्ष महाकाव्यों (रामायण, महाभारत) में सग्गों का नाम आख्यान पर निर्भर 
होता है। 
रामायण में उपर्युक्त सभी तत्वों का समावेश है। रामायण में अनेक नायक हैं। 

कथानक ऐतिहासिक है। सूर्योदय, चन्द्रोदय, प्रातःकाल, सायंकाल, मृगया, विवाहादि 

का वर्णन है। रामायण नायक के नाम पर है। 
इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में विद्वानों द्वारा वर्णित महाकाव्य के सभी 
लक्षण विद्यमान हैं। 

रामायण कालीन समाज और संस्कृति 
वाल्मीकि रामायण भारत का राष्ट्रीय आदि काव्य है। धार्मिक एवं नैतिक 

आदशों का भंडार होने के साथ-साथ यह एक महत्त्व पूर्ण मानवीय समाजशास्त्र 

भी है, जो सहस्नों शताब्दियों पूर्व के भारतीयों के जीवन यापन का रोचक वृतान्त 
उपस्थित करता है। एक पुरातन युग की जीवित परम्पराओं, धारणाओं, चिन्ताओं, 
आकॉक्षाओं और भावनाओं का चित्रण करने के कारण यह प्राचीन भारतीय 
सभ्यता और संस्कृति की एक बहुमूल्य निधि है। उसकी उपमा एक ऐसे पर्वत से 
दी जा सकती है जिसकी चोटी से हम प्राचीन आयों के सामाजिक, आर्थिक, 
राजनीतिक, धार्मिक एवं कला सम्बन्धी क्रिया कलाप का सम्यक्‌ दर्शन कर सकते 
हैं। 

सामाजिक जीवन के प्रायः सभी पहलुओं पर वाल्मीकि ने रोचक और स्थायी 
महत्त्व की सामग्री प्रस्तुत की है। 

वाल्मीकि रांमायण काल में समाज में दो ही जातियाँ मूल रूप से निवास 
करती थीं-एक आर्य और दूसरी अनार्य। आयों और अनारयों की सामाजिक 
व्यवस्था में अन्तर था। जहाँ आयों का समाज वर्णाश्रम के ढाँचे में ढला हुआ था, 
वहाँ अनायों का समाज जातिरहित था। आर्यों ने अपनी श्रेष्ठ सभ्यता एवं 
संस्कृति के बल पर धीरे-धीरे प्रायः सारें देश पर अधिकार कर लिया। अनार्य 
जातियों में से कुछ ने आयों को सहयोग दिया और कुछ ने डटकर उनका विरोध 
किया। इनको भी अन्त में पूर्ण परास्त होकर आयों की प्रभुता स्वीकार करने को 
बाध्य होना पड़ा। अनायों के मध्य में एक राक्षस जातिः निवास करती थी, इसी 
के विरुद्ध राम ने संघर्ष किया। 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 43 


राक्षसों के बाद रामायण में वानरों* का उल्लेख है। राक्षसों एवं वानरों के 
अतिरिक्त तत्कालीन भारत में निषाद", गृध* किन्नर” तथा यक्ष'" और नाग" जैसी 
अन्य अनार्य जातियाँ भी निवास करती थीं। 

प्राचीन भारत की कुछ घुमंतू जातियाँ अपने पर्यटन शील स्वभाव के कारण 
पक्षियों-गृधों'” या सुप्णों-के नाम से सम्बोधित की जाती थीं। रामायण काल में 
गृध जाति भारत के पश्चिमी समुद्रतट और उसके आस-पास की पर्वत श्रेणियों पर 
रहा करती थीं। इस जाति के मुखिया सम्पाति और जटायु नाम के दो भाई थे, 
जिनकी मृत्यु के बाद गधों का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया। इन दोनों के 
विभिन्‍न कर्मों द्वारा यह ज्ञात होता है कि इन्होंने आयों की धार्मिक रीतियों को 
अपना लिया, था। 

राम और लक्ष्मण शबरी के आश्रम में पहुँचे, यह शबर जाति अधिकांशतः 
आखेट-प्रिय होती थी। यक्ष जाति राक्षसों की ही समकालीन थी। यक्षों की एक 
और समकालीन जाति सर्प-चिन्ह वाले नागों की थी। यह भी दक्षिण भारत में 
पनपी थी। यह एक समुद्री जाति थी। 

जहाँ तक असुरों का प्रश्न है, रामायण में उनको और राक्षसों को अलग-अलग 
माना गया है। 

इनके अतिरिक्त रामायण में देवों, गन्धवों, चारणों, गिद्धों, किन्नरों और 
अप्सराओं की भी चर्चा आती है। जब कभी कवि किसी आश्चर्य जनक घटना को 
देखने के लिये इकटूठे हुए जन समूह का आभास कराना चांहता है तब वह इन 
जातियों का सामूहिक रूप से उल्लेख करता है। देवों को स्वर्ग का देवता माना 
गया है। 

गन्धर्व लोग अलौकिक संगीतज्ञों के रूप में समादृत थे। किन्नर एक स्त्रैण 
जाति थी जो सदा श्रृंगारिक गीतों और क्रीड़ाओं में मग्न रहती थी। सिद्धों और 
चारणों को वाल्मीकि ने अन्तरिक्ष का निवासी बताया है जो वीरता पूर्ण कृत्यों के 
संपादन पर प्रशंसा की बौछार किया करते थे। 

रामायण में अप्सराओं का उल्लेख बार-बार आता है। पौराणिक दृष्टि से 
अप्सराओं की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई पर देवों और दानवों दोनों ने ही उन्हें पत्नी 
मानने से इन्कार कर दिया। अतः वह साधारणाः (सबके लिये) स्त्रियाँ बन गयीं ।'* 

अप्सराएँ नृत्य-ज्ञान में विशेष दक्ष होती थीं, जिनके बल पर वे संसारी 
प्राणियों के चित्त को लुभाया करती थीं। 

वाल्मीकि ने. मूलतः उत्तरी भारत की आर्य-सभ्यता का चित्रण किया है। 
प्रसंगवंश उन्होंने ऐसी अन्य जातियों की संस्कृति पर भी प्रकाश डाला है। इन 
जातियों में मुख्य रूप से उल्लेखनीय राक्षस और वानर हैं। रामायण में राक्षसों की 
तीन शाखाओं का स्पष्ट रूप से पता चलता है, जिनमें प्रत्येक का अपना 
अलग-अलग वंश था यद्यपि वह सभी राक्षस के नाम से जानी जाती थीं:। इनमें 

44 »/ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


से पहली विराध शाखा थी, जो दण्डकारण्य के उत्तरी भाग में रहती थी, दूसरी 
शाखा दनु की संतति होने के कारण दानवों के नाम से प्रसिद्ध हुई। तीसरी शाखा, 
जो राक्षस” अथवा 'रक्ष! के नाम से विख्यात थी, सबसे अधिक क्रूर और 
शक्तिशाली थी। 

कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि वानर जाति एक पौराणिक अथवा 
काल्पनिक जाति थी और वाल्मीकि ने उसके कार्य-कलाप का जो वर्णन किया है, 
वह निरर्थक विचित्रताओं का एक व्यौरा मात्र है। कुछ विद्वान वानरों को निरा 
बन्दर मानकर उन्हें महत्त्व नहीं देते और यह इसलिये कि कवि ने उन्हें बन्दरों की 
विशेषताओं से युक्त बताया है किन्तु वानरों की सभ्यता का जो चित्रण रामायण 
में प्रस्तुत है, उनसे ये दोनों मान्यताएँ गलत सिद्ध हो जाती हैं, और यह प्रामाणिक 
होता है कि वानरों की जाति एक वास्तविक मनुष्य जाति थी जिसकी अपनी 
विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति थी। रामायण ही भारतीय साहित्य का 
सबसे प्राचीन और सम्भवतः एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिससे हम वानर सभ्यता की 
निकट से झाँकी पा सकते हैं। 

वानरों को कवि ने माया जानने वाले, शूरवीर, वायु के समान वेगवान, 
नीतिज्ञ, बुद्धि के समान पराक्रमी, किसी से परास्त न होने वाले, तरह-तरह के 
उपायों को जानने वाले आदि गुणयुक्त बताया है। 
वर्ण 

रामायण युग में आयों का समाज निश्चित रूप से जाति-पांति में विभक्त हो 
चुका था। वाल्मीकि ने चारों वर्णों का स्पष्ट उल्लेख किया है। महाराज दशरथ के 
अश्वमेध यज्ञ में सहस्नों की संख्या में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आमंत्रित 
किये गये थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्‍न जातियों के बीच स्पष्ट 
मर्यादाएँ तथा सम्मान और गौरव की पृथक्‌-पृथक्‌ धारणाएँ स्थापित हो गयी थीं। 

प्रथम तीन वर्ण “द्विजअ' कहलाते थे। उपनयन संस्कार उनके दूसरे जन्म का 
सूचक था। अयोध्या में रहने वाले चारों वर्ण ब्राह्मणों के अनुयायी, देवताओं और 
अतिथियों के -पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूर, पराक्रमी तथा धर्म और सत्य का पालन 
करने वाले थे। 

ब्राह्मण का व्यक्तित्व गौओं तथा राजाओं की तरह पवित्र माना जाता था। 
जहाँ ब्राह्मणों का कार्य प्रजा के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान में योग देना था 
वहाँ क्षत्रियों का कर्त्तव्य देश को वाह्य और आन्तरिक संघर्षों से बचाना था। 
क्षत्रियों को विशेष रूप से ब्राह्मणों और गौओं की सेवा करनी पड़ती थी। शरण 
में आये किसी भी प्राणी को अभयदान देना उनका धर्म था, जैसे माता अपने गर्भ 
की रक्षा करती है, वैसे ही राजा को तपस्वियों की रक्षा करनी चाहिए। दण्ड अर्थात्‌ 
न्याय का यथोचित विधान करना राजा का कर्त्तव्यः था। यदि ब्राह्मण रामायण 
कालीन समाज के मस्तिष्क थे, और क्षत्रिय उसकी भुजायें तो वैश्य लोग वर्णाश्रम 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 45 


व्यवस्था को आर्थिक सम्बल प्रदान करते थे, उनका मुख्य कार्य अर्थोपार्जन करना 
था। व्यापार, कृषि, गौपालन उनके मुख्य धन्धे थे। वे ही करों का भार वहन करते 
थे। द्विज होने के नाते वैश्यों के धार्मिक संस्कार और कृत्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों 
के समान ही होते थे। शूद्रों को सबसे निम्न स्थान प्राप्त था। उनका कार्य तीनों 
वर्णों की सेवा करना था। वे प्रायः घरेलू नौकरी और दास वृत्ति किया करते थे। 
शूद्रों का यज्ञ में उपस्थित होना वर्जित था। वे मंदिरों, राज-प्रासादों, ब्राह्मणों के 
घरों तथा पूज्य स्थानों में प्रवेश नहीं कर सकते थे किन्तु राजा की विशेष आज्ञा 
पाकर वे सभा या संसद में प्रवेश कर सकते थे। प्राचीन भारत की वर्ण-व्यवस्था 
को इस प्रकार राजकीय स्वीकृति प्राप्त थी, अतः उनका पालन करना लोगों के 
लिए अनिवार्य था। 
आश्रम 

प्राचीन आर्य-ऋषियों के अनुसार मानव-जीवन अनवरत आत्म-शिक्षण एवं 
आत्म-अनुशासन का समय था। इस शिक्षण-काल को उन्होंने आश्रम के नाम से 
कई भागों में बाँट दिया था। इन्हीं पर मनुष्यों के सांसारिक जीवन का ढाँचा 
अवस्थित रहता था। रामायण के समय में आश्चमों की संख्या निश्चित रूप से चार 
बन चुकी थी। यथा- 

]. विद्यार्थी के लिये ब्रह्मचर्याश्रम । 

2. विवाहितों के लिये गृहस्थाश्रम । 

3. अर्थोपार्जन से विरत वनवासी तपस्वी के लिये वान-प्रस्थाश्रम। 

4. संसार त्यागी वैरागी के लिये सन्यासाश्रम। 

उपनयन संस्कार के बाद ब्रह्मचर्यश्रम आरम्भ होता था। इसमें विद्यार्थी 
ब्रह्मचारी रहकर कठोर एवं अनुशासनमय जीवन व्यतीत करता था। गुरु की सेवा 
और शास्त्रों का अध्ययन उसके दो प्रमुख कर्त्तव्य थे। शिक्षा प्राप्ति के बाद वह 
स्नातक कहलाता था। रामायण में तीन-प्रकार के स्नातकों का उल्लेख है-“विद्या 
स्नातक', 'ब्रत-स्नातक' और “विद्याव्रत स्नातक! । 

ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति पर युवक स्नातक विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश 
करता है। इस आश्रम में पितृ-ण देव-ऋण और मनुष्य-ऋण को चुकाने के लिये 
गृहस्थ को श्राद्ध, यज्ञ और अतिथि-सत्कार करने पड़ते थे। सभी धार्मिक क्रिया-कलाप 
और यज्ञ-यागादिक उसे अपनी पत्नी के साथ सम्पन्न करने पड़ते थे, जो इसलिये, 
धर्म-पत्नी कहलाती थी। चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सर्वश्रेष्ठ था ।' और स्वयं 
रामायण गृहस्थाश्रम का ही महाकाव्य है। 

इसके पश्चात्‌ वानप्रस्थ का वर्णन किया गया है। इसमें पत्नी या तो पुत्रों के 
संरक्षण में घर पर रहती अथवा पति के साथ वन गमन करती थी। रामायण में 
उल्लिखित अधिकाँश तपस्वीगण अपनी पत्नियों के साहचर्य में वैखानस व्रतों का 
पालन करते थे। अन्तिम आश्रम सन्‍्यास का “रामायण में विशेष उल्लेख नहीं है। 


46 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उसमें “सन्यासी” शब्द का प्रयोग न होकर “भिक्ष' और “परिव्राजक' नाम आये हैं। 
परिवार 

“कुटुम्ब' अथवा “परिवार” समस्त मानवीय संगठनों की मूल इकाई है और 
सामाजिक विकास की पहली सीढ़ी । वास्तव में रामायण एक कौटुम्बिक महाकाव्य 
है। राग-द्वेष, हर्ष-शोक, ममता, मोह, लोभ, त्याग आदि की सामान्य कौटुम्बिक 
घटनाओं का चित्रण उसे सर्व-सामान्य के लिये एक हृदय-ग्राही रचना बना देता 
है। वाल्मीकि ने पारिवारिक जीवन के प्राचीन आदर्शों को भावी-पीढ़ियों के लिये 
अपनी रामायण में सुरक्षित कर दिया है। 

परिवार का रूप निःसन्देह पैतृक था। उसमें पिता कूटुम्ब का मुखिया था, 
जिसका आदेश सर्वोपरि होता था। पंत्नी गृहस्वामिनी होती थी, किन्तु गृह-स्वामी 
पर आश्रित और उसकी आज्ञाकारिणी। पुत्र और पुत्रियों पर पिता का पूर्ण 
नियन्त्रण था, पिता की अनुमति के बिना वे अपना जीवन साथी नहीं चुन सकते 
थे उदाहरण-धनुभंग करके सीता को पाने के अधिकारी होने पर भी राम ने पिता 
की इच्छा जाने बिना विवाह करने से इन्कार कर दिया ।” व्यवहारिक मामलों में 
पिता की आज्ञा कानून के तुल्य होती थी। परिवार में पुत्र स्नेह का केन्द्र बिन्दु 
था। पुत्रों में भी ज्येष्ठ पुत्र का अधिकारपूर्ण स्थान था। मनुष्य के चरित्र-निर्माण 
में कूठुम्ब के महान योग को रामायण ने स्वीकार किया है। 
विवाह 

रामायण काल में विवाह की रस्म पारम्परिक एवं शास्त्रीय आधारों पर 
पूर्णतया प्रतिष्ठित हो चुकी थी। सामान्यतः प्रत्येक प्राणी के लिये विवाह-पारिवारिक 
स्थिरता, सांसारिक सुख एवं पारलौकिक कल्याण की दृष्टि से आवश्यक और 
वांछनीय माना जा चुका था। विशेष कर स्त्रियों के लिये तो विवाह एक प्रकार से 
उनका नूतन जन्म-संस्कार था। उन दिनों विवाह से पूर्व वर-वधू में कोई परिचय 
या सम्पर्क नहीं होता था। अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन था। पुत्र-पुत्रियों के 
विवाह प्रायः माता-पिता ही रचा करते थे। कन्या की याचना उसके पिता से ही 
करनी पड़ती थी। प्राचीन भारत में स्वयंवर की दो प्रणालियां प्रचलित थीं-एक तो 
वह-जिसमें वधू एक नियत स्थान पर इकटूठे हुए वरों में से अपनी रुचि के पति 
को चुन लेती थीं, दूसरी वह जिसमें पूर्व निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाला ही 
कन्या के पाणि-ग्रहण का अधिकारी होता है। पहली प्रथा रामायण के समय में 
प्रचलित नहीं थी, दूसरी अवश्य प्रचलित थी। 

तत्कालीन विवाह-प्रणाली का पूर्ण परिचय राम-सीता के विवाह-वर्णन में 
मिलता है जिसमें कुल मिलाकर पाँच दिन लगे थे। इस समारोह के तीन-मुख्य 
भाग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। 

. प्रारम्भिक औपचारिक कृत्य । 

2. मूल संस्कार अथवा विवाह। 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ४ 47 


8. समुद्धाह अर्थात्‌ पतिगृह जाने पर किये जाने वाले माँगलिक कार्य । 


प्रेमीजनों के आकर्षण एवं अनुराग के अनेक मंजुल चित्र रामायण में उपलब्ध 
हैं। स्वयं राम ने मानवों पर काम के प्रबल प्रभाव को स्वीकार किया है। कामासक्त 
होने पर मनुष्य क्रोध के पात्र को भी अपना प्रेमास्पद बना लेता है। 

वाल्मीकि ने इस तथ्य को छिपाने की कोई चेष्टा नहीं की है कि पति और 
पत्नी के प्रेम में शारीरिक आकर्षण एवं काम-चेतना का भी प्रमुख योग होता है। 
रामायण की अनेकानेक काव्य-कल्पनाएँ प्रणय-भावनाओं से उदूभूत हुई हैं। 
वाल्मीकि की दृष्टि में हाथी-हथिनी का सम्पर्क स्त्री-पुरुष के पारस्परिक आकर्षण 
का प्रतीक है। प्रणय का उदात्त एवं शालीन रूप कवि द्वारा चित्रित प्रेम की 
प्रगाढ़ता होती है। वाल्मीकि ने सर्वत्र विवाहित प्रणय को ही श्रेष्ठ पद प्रदान किया 
है। 
“नारी? का स्थान घर में 

रामायण कालीन समाज में कन्याओं से किसी प्रकार का द्वेष, द्रोह या घृणा 
नहीं की जाती थी। रामायण से स्पष्ट है कि प्रमुख स्त्री पात्रों को विवाह से पूर्व 
अपने घरों में समुचित शिक्षा मिल चुकी थी। कर्मकाण्ड की शिक्षा पाने के 
अतिरिक्त कन्याएँ शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करती 
थीं। कन्‍्याओं को व्यवहारिक एवं नैतिक शिक्षा भी दी जाती थी। उन्हें पत्नी 
विषयक कर्तव्यों का सुचारु रूप से बोध कराया जाता था। देवासुर संग्राम में 
कैकेई का अपने पति के साथ युद्ध में जाना यह सिद्ध करता है कि लड़कियाँ 
सैनिक-शिक्षा से भी वंचित नहीं रखी जाती थीं। अपने कौमार्य काल में कन्याएँ 
पर्दे जैसे नियंत्रण अथवा अतिशय औपचारिकता के बन्धनों से मुक्त रहती थीं। 
विवाह के बाद पितृ-गृह से पतिगृह आने वाली कन्या “वधू का पद प्राप्त करती थी। 

वाल्मीकि ने गृह-कार्य में रतं गृहणी का कहीं वर्णन नहीं किया है वह केवल 
इतना कहते हैं कि नव-वधू को अपने सास-ससुर के अधीन रहना चाहिये। 

विवाहित स्त्रियाँ पति की कल्याण कामना से ब्रत-इत्यादि रखती थीं। 
नारी का स्वरूप समाज में 

सिद्धान्ततः नारी को अपने आपकी रक्षा करने में असमर्थ माना जाता था, 
अतः वह पति, पुत्र या बन्धु-बान्धवों के ही अधीन रहने के योग्य थी किन्तु 
व्यवहार में इसका अर्थ यह नहीं था कि वह सदा घर की चार दीवारी में कैद रहती 
थी। राम के वनवास से लौटने पर उनका जो अभूत-पूर्व स्वागत किया गया, उसमें 
स्त्रियों का योग और भी अधिक दर्शनीय था। इनके अतिरिक्त राजागण-बड़े-बड़े 
यज्ञ-समारोह आयोजित किया करते थे, जिनमें सभी तरह के अभ्यागत आते और 
आनन्द मनाते थे। महिलाएँ भी इन समारोहों में बड़ी संख्या में भाग लेतीं और 
पुरुषों की तरह विभिन्‍न भोज्य पदार्थों का आस्वादन करती थीं। अन्य दृष्टियों से 

48 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


भी नारी वर्ग संसार और इसके विविध अनुभवों से अलग-थलग नहीं रहता था। 
पुरुष वर्ग के साथ ही वह भी सभी प्रवृतियों में भाग लेता था। पुरुषणण यात्रा 
और विहार में या मित्रों-सम्बन्धियों के यहाँ जाते समय अपनी स्त्रियों को अवश्य 
साथ रखते थे। स्त्रियों को अकेले या अपनी सखियों के साहचर्य में आमोद-प्रमोद 
करने के साधन और अवसर प्राप्त थे। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण कालीन समाज में नारी के प्रति दृष्टिकोण 
विभिन्‍न पहलुओं से निर्धारित होता था, और इसी कारण उसमें परस्पर विरोधी 
बातें देखने को मिल जाती हैं। कुल मिलाकर उस युग में स्त्रियों की स्थिति 
सामान्यतः सुखद थी। कम से कम तत्कालीन परिस्थितियों में नारी को एक कन्या; 
पत्नी, माता और विधवा के रूप में समस्त संभव सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त 
थे, और इनके सहारे वह परिवार, समाज और राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान में 
अमूल्य योगदान कर रही थी। 
आर्थिक जीवन 

रामायण-कालीन आर्य उन पूर्व-कालिक सैनिक कृषकों की भाँति नहीं थे, 
जिन्होंने क्ृष्ण-वर्ण, दस्युओं को परास्त करके सिंधु का मैदान हस्तगत किया था। 
अब तक तो सभ्यता प्रगति कर चुकी थी। समाज अधिक सभ्य और सुसंस्कृत बन 
चुका था तथा विद्या और कला का प्रसार हो चुका था। वित्त शास्त्र को प्राचीन 
भारत में “वार्ता” की संज्ञा दी जाती थी। वार्ता-विद्या के शास्त्रीय स्तर पर पहुँचने 
के बाद कृषि, गो-पालन और व्यापार के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाने 
लगा-इनकी प्रगति की एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित हो गयी। राज्य में वार्ता 
के नियमों और सिद्धान्तों को लागू करना राजा का प्रधान कर्तव्य था। 

राष्ट्र या व्यक्ति के-जीवन में अर्थ का महत्व भली-भाँति प्रकट था। राजा की 
आमदनी का प्रमुख स्रोत “बलि-षड़भाग” था। भारत का शाश्वत एवं चिर-अभ्यस्त 
उद्योग-क्ृषि रामायण युग में भी आजीविका का सर्व-सामान्य साधन था। कृषि- 
उद्योग को राज्य की ओर से पर्याप्त संरक्षण प्राप्त होता था। राज्य की ओर से 
अन्न के सरकारी गोदाम बने रहते थे, जिन्हें शान्यकोश कहा जाता था। 

वाणिज्य-व्यापार वैश्यों के हाथ में था। देश में प्रचुर आंतरिक व्यापार होता 
था। विदेशों से भी व्यापारिक संबंध थे। वस्तुओं का विनिमय-व्यापार “निष्क्रिय' 
कहलाता था। नौकाओं, हवाई-यातायात की भी सूचना मिलती है। 

संक्षेप में, वाल्मीकि के समय में भारत आर्थिक दृष्टि से एक सुखी, समृद्ध 
और वैभव-शाली देश था। दशरथ के राज्यकाल में अयोध्या तथा उसके जनपदों 
की आर्थिक स्थिति अत्यन्त उन्‍नत हो चुकी थी-वे धन, धान्य, पशु आदि जीवन 
की सुख-सुविधाओं से सम्पन्न थे। 
प्रशासन 

रामायण कालीन भारत में कोई एक छत्र साम्राज्य नहीं था। हिमालय और 

विषयावतरण-संस्करृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 49 


विन्ध्य-पर्वत मालाओं का मध्यवर्ती आर्यावर्त देश अंग, काशी, कोसल, केकय, 
मगध, मत्स्य, मिथिला, वंग, विशाला, सिंधु, सौवीर, सौराष्ट्र, सांकाश्या आदि 
स्वतन्त्र राज्यों में विभक्त था। 

रामायण में किसी गणतन्त्र का उल्लेख नहीं है। तत्कालीन शासन का स्वरूप 
मर्यादित राजतन्त्र था। एक वैधानिक शासक द्वारा स्थापित सुदृढ़ शासन व्यवस्था 
में जनता का परम्‌ विश्वास था। स्थायी सरकार के अभाव में होने वाली 
अव्यवस्था से प्रजा सुपरिचित थी। राजा का पद कुल परम्परागत था। प्रायः ज्येष्ठ 
पुत्र ही युवराज-पद का अधिकारी होता था। राजा की मृत्यु पर युवराज पद पर 
अभिषिक्त किया गया राजकुमार ही राज्यारूढ़ होता था, वाल्मीकि के अनुसार आदर्श 
राजा गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता, दृढ़-प्रतिज्ञ, सदाचारी, 
समस्त प्राणियों का हित-साधक, विद्वान, सामर्थ्यशाली, प्रिय-दर्शन, मन पर अधिकार 
रखने वाला, कांतिमान, अनिंदक और संग्राम में अजेय योद्धा होता था। 

तत्कालीन शासनतन्त्र के तीन मुख्य अंग सभा, मन्त्रिपरिषद्‌ तथा शासनाधिकारी 
थे। राम और दशरथ के युग की राज्य सभा, लोक-सभा या धारा-सभा, “परिषद्‌ 
समिति”, 'संसद” या केवल 'सभा” कहलाती थी। सभा के सदस्य सरकारी और 
गैर-सरकारी दोनों होते थे। 


युद्ध 
सैन्य विभाग का निर्देशन स्वयं राजा अपने अमात्यों की सहायता से करता 
था। लंका में सैन्य विभाग एक मंत्री-विशेष के हाथ में रहा होगा तत्कालीन नगर 
दुर्गों के रूप में बनाये जाते थे, सेना के चार भाग होते थे-पैदल (पदाति), 
घुड़सवार, (सादी), रथी और गजा रोह। इसलिये वह चतुरंग बल कहलाती थी। 
सेनाध्यक्ष को सेनानी, सेनापति या सेना नायक कहते थे। अयोध्या में सैनिकों का 
अलग वर्ग था। वे “भट” या “योध' कहलाते थे। सैनिक अनुशासन बड़ा कठोर 
था। समुचित कारण के बिना लड़ाई ठान लेना राजाओं के लिये अनुचित था। 
रामायण के अनुसार युद्ध के आठ कारण होते थे- 
. अपहत नारी को छुड़ाने व अत्याचारी के विनाश हेतु॥ 
प्रतिशोध के लिये। 
मित्रों की सहायतार्थ। 
नारी के लिये। 
भूमि, सोने और चांदी के लिये। 
सार्व-भौम सता स्थापित करने के लिये। 
राज्य-विस्तार के लिये। 
प्राचीन भारत में युद्ध का आश्रय अंतिम उपाय के रूप में ही लिया जाता था, 
सेना की विभिन्‍न व्यूहों में रचना की जाती थी। मल्ल युद्ध या कुश्ती इस समय 
की सर्वाधिक प्रचलित युद्ध प्रणाली थी। रात के समय प्रायः युद्ध बन्द कर दिये 
50 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छा छपी छण- 


दर 


जाते थे। अस्त्रों में बाण ही सर्वाधिक प्रयोग होते थे। बचाव के आयुध या जिरह 
. वख्तर भी कई प्रकार के थे यथा, कवच, अभेद्य-कवच, आर्षभ-चर्म, गोधा, 
तनुत्राण, मर्मत्राण आदि। 
रामायण कालीन संस्कृति 
रामायण की संस्कृति का प्रचार हिन्दू-धर्म के व्याख्याताओं एवं उन्‍नायकों का 
सदा से प्रिय विषय रहा है। वाल्मीकि ने आर्य-संस्कृति के एक अतिशय-प्राचीन 
एवं उत्कृष्ट युग को मानो साकार रूप में रंग-मंच पर उपस्थित कर दिया है। 
तत्कालीन संस्कृति को जानने के लिये निम्नलिखित बिंन्दुओं पर दृष्टि-पात करना 
आवश्यक है- 
आचार-विचार 
जन-साधारण में प्रचलित आचार-विचार ही किसी समाज की संस्कृति का 
परिचायक होता है। सामाजिक शिष्टाचार में अतिथि-सत्कार को सर्वोपरि स्थान 
दिया जाता था।* आतिथ्य करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता था कि 
अतिथियों को उनके पद और गौरव के अनुसार ही सम्मान प्राप्त हो। हर संभव 
अवसर पर अभिवादन करना रामायण कालीन शिष्टाचार का एक अभिन्‍न अंग 
था। उस युग में आलिंगन करने की प्रथा उतनी ही व्यापक और सर्व-प्रचलित 
थी,” जितनी आज हाथ जोड़ने की प्रथा है। पुरुषों में परस्पर सौहार्द प्रकट करने 
का एक और ढंग था, हस्त संपीडन या हाथ मिलाना। 
तत्कालीन संशोधन प्रणाली शिष्ट और गौरव-पूर्ण होने के साथ-साथ स्नेह 
और आत्मीयता की भी सूचक थी। समव्यस्तक मित्र एक-दूसरे को 'तात'* कहते 
या व्यक्तिगत नाम से पुकारते थे। उपकारों के लिये आभार-प्रदर्शन किया जाता 
था। दैनिक जीवन में सत्य और निष्कपट आचरंण को सर्वाधिक महत्व दिया जाता 
था। दीर्घ-प्रवास पर जाने से पहले सुसंस्कृत व्यक्ति गुरुजनों से अपने अपराधों के 
लिये क्षमा-याचना कर लेते थे। 
सामाजिक प्रथाएँ 
सामाजिक रीति-रिवाज. 'लौकिक समय”, “लोक वृत्त', अथवा “'लोकाचार” 
कहलाते थे। आजकल की भाँति उन दिनों भी उपयुक्त अवसर पर अभिनन्दन 
करने की प्रथा थी। मित्रता की मर्यादा अग्नि की साक्षिता में स्थापित की जाती 
थी। पैरों की शपथ खाने का विचित्र रिवाज था। भाग्य, दैव या कृतांत के 
सर्वातिशायी प्रभाव में तत्कालीन समाज की अटल आस्था थी। दैव या भाग्य 
समय पाकर फलीभूत होता है। अतः दैव ही काल है, मान्यता थी। रामायण में 
शुभ-शकूुनों की अपेक्षा दुर्तिमित्तो अथवा उत्पातों का उल्लेख अधिक विस्तारं से 
हुआ है * लोक-मान्यता के अनुसार पुण्यवान व्यक्ति मरने के बाद आकाश का 
एक तारा बन जाता था। 


विषयावतंरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5 


वेष-भूषा 

वस्त्रोौद्योग की उन्‍्नतावस्था के कारण वस्त्रों की विविधता और बहुलता दोंनों 
प्रचुर परिमाण में दीख पड़ती हैं। वाल्मीकि ने सजी-धजी स्त्रियों का बार-बार 
वर्णन किया है। कौशेय वस्त्रों का बहुत प्रचलन था। क्षौम वस्त्र अधिक कीमती, 
मुलायम और बारीक होते थे तथा विशेषकर पूजन-अर्चन में प्रयुक्त होते थे। 
“अजिन! (मृग) वल्कल औरं “कुश-धीर-मुनि-वस्त्र” कहलाते थे। कढ़े हुए या 
किनारीदार वस्त्र तैयार करने की कला बड़ी उन्‍नत थी। आविक और कंवल ऊनी 
कपड़े थे। महीन कपड़े 'सूक्ष्म-वस्त्र', कीमती कपड़े, “महार्ह वस्त्र” या “वराह-वस्त्र' 
तथा नये कपड़े “आहत वस्त्र” कहलाते थे। ब्रह्मचारी या विद्यार्थी केवल एक वस्त्र 
पहनते थे जो कमर में लपेटा या बाँधा जाता था। स्त्रियों का अधोवस्त्र कटि-प्रदेश 
में गाँठ लगाकर बाँधा जाता था। रैँगे हुए वस्त्रों का काफ़ा व्यवहार था। सिले 
वस्त्रों का प्रचलन कम होने पर भी सीने की कला अज्ञात नहीं थी। राजागण 
मणियों से अलंकृत स्वर्ण-मुकुट पहनते थे। 

अयोध्या के नागरिकों में श्रृंगार-प्रसाधनों का सर्व-व्यापी प्रचलन था। पुरुषों 
की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक श्रृंगार-भावना थी। 
खान-पान 

रामायण कालीन आर्य अपने खान-पान में बड़े सुरुचि पूर्ण थे। आमिष और 
निरामिष” दोनों प्रकार का खाद्य-पदार्थ बनाने में प्रवीण थे। आर्य लोग मूलतः 
शाकाहारी और राक्षस मूलतः मांसाहारी थे। खाद्य पदार्थों की ये चार श्रेणियाँ थीं-. 
भक्ष्य, अपूप (रोटी की तरह का पदार्थ) 2. भोज्य (भात-सदृश) 3. चोष्य (गन्ने की 
तरह) 4. लेह्य (शहद या चटनी की तरह खाये जाने वाला) 
क्रीड़ा विनोद” 

राम और वाल्मीकि के युग में लोगों को ऐहिक सुख-सुविधाएँ पर्याप्त उपलब्ध 
थीं। नगरों में मनोरंजन स्थलों को समाज” की संज्ञा दी जाती थी। जहाँ धार्मिक, 
सामाजिक, और आर्थिक विषयों पर विचार-विमर्श होता था तथा नृत्य, संगीत, 
दूत॑ आदि क्रीड़ा विनोद के साधन उपलब्ध थे। परम्परा से चली आ रही कथाएँ 
सुनना, सुनाना भी विश्राम या मनोरंजन का एक सुलभ प्रकार था। 

राम के अनुसार मृगया राजाओं की क्रीड़ा थी। वन्य पशुओं का बाणों से 
संहार किया जाता था। 
शिक्षा 

रामायण में गुरु” आचार्य, कुलपति, श्रोत्रिय, तापसगण, ब्रह्मवादी, उपाध्याय, 
शिक्षक, परिव्राजक आदि का उल्लेख हुआ है। जीवन का प्रथम चरण 
ब्रह्मचर्याश्रम-विद्याध्ययन के लिये नियत रहता था। 

रामायण में राजनीति, अर्थ-शास्त्र, नैतिक-शिक्षा आदि का तत्कालीन समाज 
में प्रचार भी बताया गया है। 

52 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


साहित्य 

साहित्य तत्कालीन समाज का दर्पण होता है। रामायण मुख्यतः एक आख्यान 
है। 

रामायण के युग में संस्कृत बोल-चाल की भाषा होने के कई संकेत मिलते हैं। 
निश्चित ही वाल्मीकि अपना लोक-प्रिय काव्य किसी मृत-भाषा में न रचकर ऐसी 
भाषा में रचने को प्रेरित हुए होंगे, जो लोक में प्रचलित रही हो। व्याकरण की 
दृष्टि से शुद्ध एवं परिष्कृत संस्कृत विशेष रूप से समाज के शिष्ट वर्ग एवं शिक्षित 
वर्गों में प्रचलित थी। रामायण काल में कविता साहित्यिक कला की अभिव्यक्ति 
का एक सम्मत माध्यम बन चुकी थी।४ 
विज्ञान 

साहित्य की भाँति विज्ञान का भी रामायण कालीन वैदिक-्रवृत्तियों में प्रमुख 
स्थान था। फल ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र का पर्याप्त प्रचार था। रामायण में 
आयुर्वेद, आयुर्वेद के जनक-धन्वन्तरि तथा त्रिदोष का उल्लेख हुआ है |“ तत्कालीन 
वैद्य शल्य-चिकित्सा से भी अनभिज्ञ नहीं थे। रामायण में रोगी पशुओं और उनके 
उपचार का भी वर्णन हुआ है। शरीर स्थान का चिकित्सकों को सम्यक्‌ ज्ञान था। 
कला कौशल 

रामायण कालीन आर्य-कलात्मक अभिरुचि सम्पन्न लोग थे। सौन्दर्य प्रसाधनों 
के रूप में पुष्पों, केशों का श्रृंगार, अंगराग, प्रलेपन तथा चित्र-विचित्र वस्त्रों का 
व्यवहार, पैरों में अलंकृत-रस तथा मस्तक पर तिलक का प्रयोग, स्त्रियों के कपोलों 
पर पत्रावली का अंकन आदि कला प्रियता के नमूने हैं।” 

रावण के सुविख्यात पुष्पक विमान को तत्कालीन कला-कौशल का सर्वोत्कृष्ट 
नमूना माना जा सकता है। 
नगर 

जहाँ वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों की संस्कृति मूलतः जनपदीय थी, वहाँ रामायण 
कालीन संस्कृति मुख्यतः नागरिक थी। प्राचीन काल में जीवन और निवास 
संकटापन्न रहने के कारण नगरों को चार दीवारी और खाइयों से सुरक्षित रखा जा 
सकता था। प्राचीन काल में आर्य नगरों का उद्भव और विकास सामरिक 
आवश्यकताओं के कारण हुआ। रामायण काल के प्रमुख नगर भी मजबूत चार 
दीवारी तथा आक्रमणों का प्रतिरोध करने की साज-सज्जा से युक्त पाये जाते हैं। 
नगर के बाहर खायी रहती थी। शत्रु-प्रदेश में विजित स्थानों पर अधिकार कायम 
रखने के लिये महत्वपूर्ण व्यूह-स्थलों पर किले बंदी की जाती थी, जो कालांतर में 
नागरिक सभ्यता का केन्द्र हो जाती थी। 
आश्रम 

रामायण में नगरों की संस्कृति के बाद आश्रमों की संस्कृति का महत्वपूर्ण 
स्थान है, ये आश्रम अरण्यों के अंचल में स्थित होते थे। आश्रमों का निर्माण 

विषयावतरण-संस्कृृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 53 


सुविधा- जनक, रम्य, वनस्थलियों में किया जाता था। आश्रम निर्माण में वृक्ष की 
शाखा, बाँस, बेंत, रस्सी, घास-फूस इत्यादि का उपयोग किया जाता था। एक 
आश्रम में प्रायः दो हिस्से होते थे, बाहरी भाग “पर्णकुटी” और भीतरी 'उटज' 
कहलाता था। कई कूटियों वाली तपस्वियों की बस्ती को “आश्रम-मंडल” या 
“तपोवन” कहते थे और बस्ती के पृथक्‌-पृथक्‌ निवास “'तापसालय” कहलाते थे। 
इस प्रकार के आश्रम-मंडल का अधिपति एक वयोवृद्ध मुनि होता था, जिसे 
कुलपति कहते थे। 
धर्म 

भारत में धर्म को सदैव ऊँचा स्थान दिया गया है। वेदों को सर्वोच्च धार्मिक 
महत्व प्राप्त था। प्रातः:काल का समय आहनिक-कृत्यों के अनुष्ठान के लिये नियत 
रहता था। देवताओं की प्रार्थना करना लोगों के जीवन का अभिन्‍न अंग था। 
मौलिक रामायण में यद्यपि देवताओं की प्रतिमाएँ स्पष्टतया उल्लिखित नहीं हैं 
तथापि गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, धूप आदि पूजन सामग्री का वर्णन किसी आस्पद या 
आधान का होना प्रमाणित करता है। उस समय तीर्थ-यात्रा का भी प्रचलन था। 
गौ को सम्मान दिया जाता था। यज्ञों का बाहुल्‍य था। अश्वमेध-यज्ञ की बड़ी 
प्रतिष्ठा थी। सत्य ही सर्वत्र धर्म के रूप में 'समादृत” हुआ था। 
दर्शन 

कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त जो भारतीय दर्शन की आधार शिला है, 
रामायण में सर्वत्र स्वीकृत एवं समर्थित है। कर्म का सिद्धान्त मनुष्यों के सुख दुःख 
का, उनके भाग्य वैषम्य का एक तर्क-संगत स्पष्टीकरण उपस्थित करता है। 
रामायण के अनुसार मनुष्य का कोई भी कर्म भले ही वह अज्ञानवश ही क्‍यों न 
किया गया हो, निष्फल नहीं जा सकता। कर्म-फल की प्राप्ति के लिये जन्म-मरण 
की श्रृंखला अनिवार्य है, अतः जीव के लिये पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्वीकार कर 
लिया गया। आत्मा की आयु शरीर की आयु से नियंत्रित नहीं होती, यह विश्वास 
सर्वमान्य था। रामायण के अनुसार आदर्श जीवन वह है, जो एकांगी न होकर 
बहंगी हो, जो मानव-अस्तित्व के आध्यात्मिक, व्यावहारिक एवं भौतिक सभी पक्षों 
का यथोचित सेवन करे। 

रामायण कालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं का सिंहावलोकन करते हुए 
यह कहा जा सकता है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर आंधारित॑ थी जिसमें 
जन-सामान्य, वर्णों और आश्रमों में विभक्त होते हुए भी, सहयोग एवं सौहार्द के 
तंतुओं से परस्पर अनुरक्त था। संयुक्त पारिवारिक व्यवस्थां में कुछ कठिनाइयाँ 
अवश्य थीं, पर॑ उन्हें स्नेह और सहयोग के सहारे तथा अतीत की परम्पराओं का 
पालन करके, बहुत कुछ दूर कर लिया जाता था। गृहस्थाश्रम में अनुदारता एवं 
उदारता, आदर्शवादिता एवं व्यावहारिकता दोनों के कांत दर्शन होते हैं। नारी का 
व्यक्तित्व नितान्त आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक था किन्तु वर्णनातीत, दुर्दयनीय एवं 

54 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


असंगतियों से भरपूर। यद्यपि रामायण कालीन आंयों के जीवन में नैतिकता और 
सदाचार का स्वरप्रधान था, तथापि भौतिक पक्ष उनकी पुष्टि में उपेक्षित या 
अनादूत नहीं :था। (रामायणकालीन समाज एवं संस्कृति) 

नगरों और गृहों का यथा-विधि निर्माण तथा इंनकी कला-पूर्ण साज-सज्जा 
जन-साधारण का स्थापत्य-प्रेम और उनकी कलात्मक अभिरुचि प्रकट करते हैं। 

संक्षेप में, रामायण कालीन संस्कृति में चिरकालीन महत्व एवं सार्व-कालिक 
आदर्श के तत्व विद्यमान हैं। 
वाल्मीकि रामायण के प्रकाशित संस्करण 

वर्तमान समय में “वाल्मीकि रामायण” के मुख्यतया तीन संस्करण हैं जिनका 
प्रचार भारत के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में है- 
संस्करण-] ; 

दक्षिणात्यसंस्करण जिसमें बम्बई और मद्रास से प्रकाशित रामायणें गिनी जाती हैं। 
संस्करण-2 

कलकता से प्रकाशित बंगीय या गौड़ीय संस्करण 
संस्करण-3 

होशियार पुर से प्रकाशित पश्चिमीत्तरीय संस्करण। 

प्रत्येक संस्करण में ऐसे अनेक श्लोक हैं जो अन्य संस्करणों में नहीं पाये 
जातें। जो श्लोक तीनों में पाये जाते हैं उन्हें दक्षिणात्य पाठ ही अपेक्षाकृत प्राचीन 
और मौलिक माना जाता है। इन संस्करणों में पाठ भेद का प्रथम कारण यह प्रतीत 
होता है कि “रामायण” आरम्भ में लिखित रूप में नहीं थी। स्तुति पाठकगण 
“रामायण” की कथा कंठाग्र ही सुनाते थे और संभव है इस प्रकार कई शताब्दियों 
बाद श्लोकों के क्रम में परिवर्तन हो गया हो। अतएव ग्रन्थ लिखने के समय 
रामायण के परस्पर भिन्‍न पाठ भी उसी रूप में लिख लिये-गये हों जिस रूप में 
भिन्न-भिन्न प्रान्तों के स्तुति पाठकगण उन्हें सुनाया करते थे। फिर भी मुख्य 
कथानक की दृष्टि से इन संस्करणों में मौलिक भेद नहीं है। 
व्याख्याएँ 

वाल्मीकि रामायण का महत्व केवल काव्य दृष्टि से: ही नहीं है, प्रत्युत वह 
नाना वैष्णव सम्प्रदायों में एक उपास्य धार्मिक ग्रन्थ भी.है। इसलिये रामायण को 
आश्रय मानकर अनेक व्याख्या ग्रन्थों की रचना भिन्न-भिन्न युगों में कीं गयी है। 
डा० ओफ्रेक्ट के अनुसार टीकाओं की संख्या 80 है। 

मध्य युग में रामायण की लोकप्रियता इतनी, अधिक थी कि .पन्द्रहवे।, 
सोलहवीं और सत्रहवीं शतार्ियों में कम से कम दस टीकाएँ लिखी गयीं, ज़ो 
व्याख्या की दृष्टि से बहुत ही असामान्य गुणों से, सम्पन्न हैं। इनका परिचय 


विषयावतरण-संस्कृत, साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 55 


निम्नवत्‌ है- 
. रामानुजीय 
यह रामानुज की नितान्त प्रसिद्ध व्याख्या है इसका समय 400 ईस्वी के 
आस-पास है। 
2. सर्वार्थसार 
इससे पश्चादूवर्ती है। हारीत गोत्रीय वेंकट कृष्णाध्वरी रचित टीका, जिसे 
वैद्यनाथ दीक्षित ने निर्दिष्ट किया है। 
3. रामायण दीपिका 
वैद्यनाथ दीक्षित की यह विख्यात व्याख्या है। समय है लगभग 500 ईस्वी। 
4. “वृहद््‌ विवरण” “लघुविवरण! 
ईश्वर दीक्षित ने रामायण के ऊपर इन टीकाओं का प्रणयन किया है। इनमें 
से प्रथम व्याख्या का काल 58 ईस्वी है। फलतः इसका समय 6वीं शताब्दी 
का प्रथमार्ध है। (525 ईस्वी के लगभग)। 
5. तीर्थीय अथवा “रामायण तत्व दीपिका? 
यह टीका अपने प्रणेता 'महेश्वर तीर्थ' के नाम पर तीर्थीय अभिहित की 
जाती है। 
6. रामायण-भूषण 
अपने रचयिता गोविन्दराज के नाम पर यह “गोविन्द राजीय' के नाम से भी 
प्रसिद्ध है। 
7. वाल्मीकि हृदय हे 
यह अत्रिगोत्री अहोबल द्वारा रचित टीका है। 
8. अमृत कतक अथवा कतक 
इस प्रख्यात टीका के रचयिता का नाम है-माधव योगी। 
9. रामायण तिलक 
यह सर्वाधिक लोकप्रिय टीका है। श्रृंगवेरपुर (आधुनिक सिंगरौर, जिला 
इलाहाबाद) के विसेन वंशी राजा राम वर्मा ही इसके वास्तविक प्रणेता हैं। 
0. रामायण शिरोमणि २ 
रामायण की यह व्याख्या वंशीधर तथा शिव सहाय की सम्मिलित रचना है। 
रचना काल 92 सं. (865 ईस्वी) का उल्लेख टीका में किया गया है। 
. मनोहरा 
इसके रचयिता बंग देशीय लोक नाथ चक्रवर्ती हैं। उनका समय 6वीं शती 
है। 5 
2. धर्माकूतम्‌ 
यह रामायण की आलोचनात्मक व्याख्या है। इसके रचयिता हैं-त्रयम्बक 
मखी। इनका समय है-(674 ईस्वी से 687 ईस्वी) अर्थात्‌ 7वीं शती का 
56 / वाल्मीकि रामायण.तथा आयुर्वेद 


उत्तरार्ध। 
इस प्रकार वाल्मीकि रामायण की विविध व्याख्याएँ की गयीं। 


शोध कार्य में प्रयुक्त संस्करण 
शोध कार्य में रामायण के निम्नलिखित संस्करणों का प्रयोग किया गया-- 
. वाल्मीकि रामायण सातवलेकर कृत _ चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
2. वाल्मीकि रामायण. डा० पी० एल० वैद्य. चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
5. वाल्मीकि रामायण, सं० टी० आर० चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
कृष्णाचार्य वाराणसी 
4. वाल्मीकि रामायण. ज्वालाप्रसाद चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
मिश्र कृत वाराणसी 
5. वाल्मीकि रामायण द्वारिका प्रसाद शर्मा चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी .. 
6. वाल्मीकि रामायण स्वामी जगदीश्वरानन्द 'चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
7. वाल्मीकि रामायण. अखिलानंद कृत ठीका चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
सहित. हिन्दी टीका सहित वाराणसी 
8. वाल्मीकि रामायण तिलक व्याख्या सहित चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
9. वाल्मीकि रामायण. राम कृत तिलक, चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
शिव सहाय कृत 
रामायण शिरोमणि 
गोविन्दः राम कृत 


* भूषण त्रय व्याख्या सहित 
0. वाल्मीकि रामायण . गोविन्द राजीय (भूषण). चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
रामानुजीत निश्लोकी वाराणसी 
महेश्वरतीर्थीय सटिप्पण चार 
संस्कृत व्याख्या सहित 
7. वाल्मीकि रामायण माधव योगी कृत चौखम्भा ओरियन्टालिया, 
वाराणसी 
2. वाल्मीकि रामायण: पं० रामनारायण शास्त्री गीता प्रेस, गोरखपुर 
भाग -2 “राम! 
इस प्रकार रामायण” से सम्बन्धित कुछ तत्वों को प्रस्तुत करने का सूक्ष्म 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एंवं आयुर्वेद विवेचन ./ 57 


प्रयास किया गया है। “रामायण” स्वयं एक विशाल .सागर है, जिसकी सम्पूर्ण रत्न 
राशि को प्रस्तुत करना एक दुष्कर कार्य है, उसमें से इन रत्नों को ढूंढ़ने का मैंने 
प्रयास किया है। तथापि बहुत से तत्व मैं यहां स्थानाभाव के कारण प्रस्तुत नहीं 
कर पा रही हूँ। इसके लिये मैं क्षमा-प्रार्थिनी हूँ। 
द्वितीय परिच्छेद 
साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से शोध-कार्य एवं शोध-दृष्टि से महत्त्व 
साहित्यिक ग्रन्थों का सर्वेक्षण कर उसमें से आयुर्वेदीय सामग्री संकलित करने 
का कार्य भी हुआ है, जो इतिहास के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। 
आयुर्वेद को जीवन के निकटतम लाने के लिये पूज्य-गुरुजनों के द्वारा किये जा 
रहे अथक्‌ प्रयासों की श्रृंखला में नवीनतम उपलब्धि है-काव्यों, नाटकों आदि में. 


निहित-आयुर्वेदिक तत्वों का अवलोकन। 

इस क्षेत्र में निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं- 

१. वेदों में आयुर्वेद राम गोपाल शास्त्री दिल्‍्ली-956 

2. वह क्षक्ष्व हबाभाएलीद्वा करब९फ्णाप96] 
जएलत8 06 89ण ५८१० 

3. व्याकरण वाडूमय में. प्रियव्रत शर्मा आयुर्वेद विकास, 
आयुर्वेदीय सामग्री... मार्च-सितम्बर-967 

4. वाताशा (९७००० ए.ए५. इक्षाा4 टणएाफ्राक्ा08- 972 
॥! पा6 095ञं०थ 48० है 

5. संस्कृत काव्य में वनस्पतियाँ अभिमन्यु अ. कुरुक्षेत्र वि.वि.--968 

6. संस्कृत साहित्य में सुशीला शुक्ला. _गोरखपुर-965 
पेड़-पौधे और पशु-पक्षी 

पर. संस्कृत महाकाव्य में... डॉ. मंजुला सिंहल,. आगरा विश्वविद्यालय 970 
प्रकृति-चित्रण 

8. चरक-संहिता डॉ. सन्‍्तनारायण प्रीयूष प्रकाशन, 


की दार्शनिक, पृष्ठभूमि. श्रीवास्तव त्वय इलाहाबाद-988 
9. महांयान॒ ग्रन्थों में डॉ. रवीन्द्र नाथ ज्योतिरालोक प्रकाशन 


निहित आयु सामग्री. त्रिपाठी वाराणसी 988 
0. संस्कृत काव्य में. डॉ. राम सुशील सिंह वाराणसी 984 
, : विशिष्ट वनस्पतियाँ 
॥, -गरुड़ पुराण की डॉ. जयन्ती भट्टाचार्य वाराणसी .986 
दार्शनिक एवं आयु० ; 
सामग्री का अध्ययन 
]2. अग्नि पुराण का यूथिका राय 


'.. 58 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद्‌ 


सांस्कृतिक अनुशीलन 


3. अग्नि पुराण की दार्शनिक डा० सरिता हांडा वाराणसी 982 
एवं आयु० सामग्री [ 
का अध्ययन 

4. बाण भट्ट की कृतियों.. डा0 हितेश सिंह 
में वनस्पति 


इसी प्रकार ज्योतिमिंत्र ने महाभारत, रामायण तथा बौद्ध वाइमय से आयुर्वेदीय 
सामग्री का संकलन किया है। सतीश चन्द्र साँख्यधर ने (जम्मू) 'हिन्दी साहित्य में 
आयुर्वेद” शीर्षक पर पी- एच० डी० किया है। कुछ शोध-कर्त्ता 'जैन साहित्य में 
आयुर्वेद” पर कार्य कर रहे हैं। 'पुराणों में आयुर्वेद” पर पहले कुछ कार्य हुआ है 
और सम्प्रति कुछ शोध-छात्र कार्य कर रहे हैं। 

इसी प्रकार के कुछ संकलन ग्रन्थ 'सुभाषित” नाम से प्रकाशित हुए हैं जिनमें 
प्राण जीवन मेहता कृत 'वैद्यकीय सुभाषितावली” (चौखम्भा 955) और घाणेकर 
कृत 'वैद्यकीय सुभाषित साहित्यम्‌” (चौखम्भा 968) के प्रमुख हैं। 

वाल्मीकि रामायण के विविध स्वरूपों का विविध दृष्टि कोणों से अनेकानेक 
विद्वानों के द्वारा अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया है, किन्तु उसमें निहित 
आयुर्वेदिक सामग्री की ओर आज तक किसी भी विद्वान का ध्यान आकर्षित ही 
नहीं हुआ है। यदि उसमें निहित महत्वपूर्ण तत्वों के ज्ञान से यह जगत अछूता रह 
जाता है तो आयुर्वेद का इतिहास क्रमबद्ध हो ही नहीं सकता । इसी तथ्य को ध्यान 
में रखकर इस विषय पर कार्य करने का प्रयास किया जा रहा है। 

विविध साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर सर्वाधिक 
प्रत्यक्ष लाभ यह होगा कि इन शोध कार्यों के अध्ययन से आयुर्वेद का प्रचार एवं 
प्रसार जन-जन तक हो सकेगा। 

यही इसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष महत्व है। 


तृतीय परिच्छेद 
आयुर्वेद का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय 

आयुर्वेदिक अष्टाड़ 

“चरक' ने आयुर्वेद को शाश्वत कहा है क्योंकि जब से आयु (जीवन) का 
प्रारम्भ हुआ और जब से जीव को ज्ञान हुआ तभी से आयुर्वेद की सत्ता प्रारम्भ 
होती है। सुश्रुत ने यहाँ तक कहा कि ब्रह्मा ने सृष्टि के पूर्व ही आयुर्वेद की रचना 
की जिससे प्रजा उत्पन्न होने पर इसका उपयोग कर सके। इससे भी आयुर्वेद का 
शाश्वतत्व सिद्ध होता है। सभी संहिताकारों ने ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव 
बताया है तथा यह भी कहा गया है कि ब्रह्मा ने आयुर्वेद की लक्ष श्लोकमयी 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 59 


संहिता का निर्माण किया। यह सब भी सृष्टि काल से ही आयुर्वेद के अस्तित्व की 
सूचना देते हैं। कोई वस्तु जब अनादि काल से परम्परा के द्वारा प्रवाहित होती 
रहती है तब उसे शाश्वत कहते हैं। इसका आदि अंत कहीं हो भी तो उसका पता 
नहीं चलता, नित्य में आदि-अंत होता ही नहीं। शाश्वत और नित्य में यही अंतर 
है। आयुर्वेद को शाश्वत कहा है; नित्य नहीं.। 

चरक के कथनानुसार ब्रह्मा से आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया, 
प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने और उनसे इन्द्र ने उस.ज्ञान को ग्रहण किया। 
ब्रह्मा से आयुर्वेद के प्रादुर्भाव का आख्यान यह संकेत करता है कि आयुर्वेद सृष्टि 
के आदिकाल से ही. विद्यमान है। दक्ष-प्रजापति, अश्विनी कुमार तथा इन्द्र 
ऐतिहासिक व्यक्ति थे या केवल मिथकीय, इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने 
विभिन्‍न विचार व्यक्त किये हैं किन्तु जो भी हो इतना अवश्य प्रतीत होता है कि 
सम्भवतः इन्द्र की परम्परा तंक वह देव-लोक तक ही सीमित था। उसका रूप 
प्रागैतिहासिक था। प्रायः भारतीय परम्परा में विद्वानों का स्रोत ब्रह्मा से प्रारम्भ 
होकर इन्द्र तक क्रमशः माना जाता है। इन्द्र के द्वारा जब इस ज्ञान का प्रसार 
भूमण्डल में हुआ तब से इतिहास की श्रृंखला का प्रारम्भ मानां जा सकता है। 
आयुर्वेद का स्वरूप 

आयुर्वेद संज्ञक वेद वेदविद्‌ विद्वानों द्वारा सम्मानित पुण्यतम वेद है। अन्य 
चेद केवल परलोक हितकर हैं, जबकि आयुर्वेद दोनों लोकों के लिये हितकर है, 
इसलिये आयुर्वेद पुण्यतम वेद कहा गया है 

सुश्रुत, चरक, काश्यप और वाग्भट तथा अन्य आचार्यों ने आयुर्वेद को 
अथर्ववेद का उपवेद माना है।” काश्यप ने युक्तियुक्त ढंग से आयुर्वेद को पञ्चम 
वेद माना है ।* ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी आयुर्वेद को पञ्चम वेद कहा है।” 

आयुर्वेदीय संहिताओं में आयुर्वेद शब्द के प्रयोग के बदले केवल “वेद” शब्द 
का प्रयोग आयुर्वेद अर्थ में किया गया है। 
इस प्रकार विभिन्‍न मतों के पर्यालोचन से निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है 
- आयुर्वेद पञ्मूचम वेद है। 
. आयुर्वेद पुण्यतम वेद है और अन्य वेद पुण्य हैं। 
- आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है। 
आयुर्वेद अथर्ववेद का उपाड़ है। 
आयुर्वेद स्वतंत्र वेदाज्ञ है। 

संक्षेप में कहा जा सकता है कि आयुर्वेद का अधर्ववेद के साथ घनिष्ठ 
सम्बन्ध है। 

यह ऐहलौकिक एवं पारलौकिक उभय-विध कल्याण कारक होने से और 
आरोग्य प्रदान करने के कारण पवित्रतम होने से “पुण्यतम” वेद कहलाने लगा। 


कप की 9० ७ 





60 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अष्टांग 
'सुश्रुत संहिता” में यह उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मा ने मनुष्य की सृष्टि के 
पहले ही आयुर्वेद का एक ग्रन्थ बनाया, जिसमें एक लाख श्लोक और एक हजार 
अध्याय थे।" 
ब्रह्मा ने मनुष्यों की आयु तथा बुद्धि की अल्पता का विचार कर आयुर्वेद को 
आठ आंगों में विभक्त कर दिया। जैसे . शल्य, 2. शालाक्य, 3. काय-चिकित्सा, 
4. भूत-विद्या, 5. कौमार भृत्य, 6. अगदतन्त्र, 7. रसायन-तन्त्र और 8. वाजीकरण ।” 
काय-चिकित्सा 
आयुर्वेद के सभी अंगों में 'काय-चिकित्सा” का प्रमुख स्थान है। अति प्राचीन 
काल से वर्तमान काल तक आयुर्वेद के सम्मान और प्रतिष्ठा का कारण आयुर्वेदीय 
“काय-चिकित्सा” है। 
शरीर के सर्वश्ञ में होने वाले ज्वर, रक्त-पित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ 
एवं अतिसार आदि रोगों की चिकित्सा का विधान जिसमें किया जाता है, आयुर्वेद 
के उस अंग को “काय-चिकित्सा' कहते हैं।* 
काय-चिकित्सा की शाब्दिक व्युत्पत्ति 
“कायः सकल शरीरं तस्य चिकित्सा काय चिकित्सा।/ “काय” का अर्थ 
है-सम्पूर्ण शरीर, अतः सम्पूर्णशरीरगत रोगों की चिकित्सा को 'काय-चिकित्सा! 
* कहते हैं। 
“काय-चिकित्सा” शब्द दो शब्दों के योग से बना हुआ है-काय+चिकित्सा। 
इसलिये इन दोनों शब्दों का अलग-अलग अर्थ जानने पर ही सम्पूर्ण 'काय-चिकित्सा! 
शब्द के यथार्थ-अर्थ का बोध हो सकता है। अतः काय चिकित्सा शब्द का 
-निर्ववन किया जा रहा है। 
काय 
जो शब्द करे, उसे काय कहते हैं-“कायति शब्दायते इति कायः | कान को 
अंगुली से बन्द करने पर एक ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि जीवित शरीर का 
चिन्ह है और इस जीवित शरीर की चिकित्सा करना ही आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन 
है। इसका तात्पर्य यह है कि हृदय की गति का नियमन करना ही काय-चिकित्सा 
है, क्योंकि “कायति शब्द करोति” इस व्युत्पति से काय का अर्थ हृदय है और 
उसकी चिकित्सा करना ही सर्वाधिक मूल्यवान पक्ष है, अतः किसी भी रोग के होने 
पर हृदय की गति का यथावत्‌ संचालन वाउ्छनीय कर्तव्य होता है। “काय” का 
दूसरा अर्थ है-शरीर या देह। जिसका अन्नादि आहार से पोषण होता है, उसे 
काय कहते हैं-“चीयतेउन्नादिभि:” इति कायः। इस प्रकार के शरीर की चिकित्सा 
काय-चिकित्सा है। 
“काय” का तीसरा अर्थ है-जाठराग्नि। इस अग्नि के विक्रृत हो जाने पर 
उसको प्राकृतिक स्थिति में लाने के लिये जो उपचार किया जाता है, उस उपचार 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ८ 6 


को “काय चिकित्सा” कहते हैं, और उपचार करने वाले वैद्य को 'काय-चिकित्सक' 
कहते हैं। 
चिकित्सा 

“कित्‌ रोगापनयने” धातु से चिकित्सा शब्द बना है। रोग के अपनयन को 
चिकित्सा कहते हैं। रोग के प्रतिकार, निग्रह या नाश को चिकित्सा कहते हैं। 

इस 'प्रकार उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वाज्ञ (शरीर) में _ 
होने वाले (रोग) ज्वर, रक्त-पित्त, शोष, उन्‍्माद, अपस्मार, कुष्ठ एवं अतिसार आदि 
रोगों की चिकित्सा का विधान जिसमें किया जाता है, आयुर्वेद के उस अंग को 
“काय-चिकित्सा” कहते हैं। 
क्राय-चिकित्सा के संहिता ग्रन्थ 

. कुछ 'संहिता ग्रन्थ निम्नलिखित हैं- 
अग्निवेश संहिता 
भेल संहिता। 
जतूकर्ण संहिता। 
पराशर संहिता। 
क्षार-पाणि संहिता। 
हारीत संहिता। 
खरनाद संहिता। 
विश्वामित्र संहिता । 
अगस्त्य संहिता। और 

0. अत्रि संहिता। 

कौमार-भृत्य 

इस आयुर्वेदाज् में कुमार (बालक) के भरण-पोषण की व्यवस्था, धात्री 
परीक्षा, दुष्ट-दुग्ध-विशोधन, ग्रह-जन्य रोगों का प्रतीकार तथा बालकों के रोगों की 
चिकित्सा का विधान किया गया है। 

काश्यप संहिता में शिष्योपक्रमणीय अध्याय में कौमार-भृत्य को आठों अंगों 
में प्रथम कहा गया है।-“कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाघमुच्यते। 

बालक ही भविष्य में किसी देश का नागरिक बनता है और उसकी बाल्यावस्था 
के स्वास्थ्य का जीवन-भर प्रभाव रहता है। अतः बालक की देख-रेख सर्वाधिक 
महत्वपूर्ण कर्तव्य है। 

आयु के अनुसार बालक तीन प्रकार के होते हैं- 

. क्षीरप (दूध पीने वाले)। 

2. क्षीरान्‍्नाद (दूध और अन्न खाने वाले) 

3. अन्नाद (केवल अन्न पर निर्भर रहने वाले)। 

बालक के जन्म होने के साथ ही उसका उपचार शुरू हो जाता है। उसके कुछ 


62 ८ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छ्ज्काज़ए ली ए ग0 


संस्कार किये जाते हैं। उसके पेय-लेह्य की व्यवस्था की जाती है। उसकी रक्षा के 
लिये विशेष-ध्यान दिया जाता है। 

बालकों की.विभिन्‍न आयु में भिन्‍न-भिन्‍न ग्रहों के प्रकोप से होने वाले रोगों 
का वर्णन है और उनके उपचार का विधान किया गया है। 

प्रसवागार के साथ ही कुमारागार की व्यवस्था के सम्बन्ध में 'चरक संहिता' 
के शरीर स्थान आठ में विस्तृत वर्णन है। बच्चे के जन्म के समय और बाद में 
क्या-क्या करना चाहिये, यह सब बतलाया गया है। बालक को संभावित रोगों से 
बचाने के लिये रक्षा-विधान का वर्णन है। 'काश्यप संहिता” में बालक की उत्पत्ति, 
उसके रोगों के निदान और चिकित्सा का विशद्‌ वर्णन है। 


कौमार-भृत्य के ग्रन्थ एवं सन्दर्भ 

चरक संहिता न शारीर स्थान 8। 

सुश्रुत संहिता न उतर, 27 से 97। 

अष्टांग हृदय - उतर, से 7। 

जीवक तन्‍्त्र न अनुपलब्ध। 

पार्वतकतन्त्र जा] अनुपलब्धा 

हिरण्याक्षतन्त्र न अनुपलब्ध। 

बन्धक तन्‍त्र न अनुपलब्ध। 

बालचिकित्सामृत न (नेपाल राजकीय पुस्तकालय)। 

बाल-तन्‍्त्र न कल्याण वर्मा कृत 

योग सुधानिधि। 

कुमार तन्‍्त्र न रावणकृत | 

कुमार-तन्‍्त्र समुच्चच - रमानाथ द्विवेदी 

कौमार-भृत्य न रघुवीर प्रसाद त्रिवेदी। 

अभिनव कौमारभूृत्य. - राधा कृष्ण नाथ। 
काश्यप-संहिता है 

यह कौमार-भृत्य-तन्त्र का सर्व-प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें बहुत से ऐसे विषय हैं, 
जिनका उल्लेख अन्य संहिताओं में नहीं है। 


“दन्तजन्माध्याय' में दातों के भेद, उनकी प्रशस्तता, बालक-बालिकाओं के 
दांतों में भेद आदि विषय विशिष्ट हैं। 'स्वेदाध्याय” में बालकों के स्वेदन के विषय 
में बहुत सुन्दर निरूपण किया गया है। “लक्षणाध्याय” में सामुद्रिक लक्षणों का 
विशेष वर्णन किया गया है। अत्यन्त छोटे बालकों में अश्मरी के उद्धरण तथा 
तीक्ष्ण औषधियों के प्रयोग का विशेष रूप से निषेध किया गया है। 

बालकों के वस्तिकर्म में विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया गया/है। 
“फक्क-रोग” का विशेष वर्णन है, इस रोग में तीन पहिये की गाड़ी का उल्लेखः है। 
“अन्नप्राशन” विधान में छठे मास में फंलों का रस और बारहवें ग्रास के बाद अन्न 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 63 


देने का विधान बताया गया है। वेदाध्ययन में वाणी. द्वारा वेदना बतलाने में 
असमर्थ बालकों की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं द्वारा उनके अंगों की वेदना को अनुमान 
के द्वारा जानने का निर्देश है। 

'रेवती कल्पाध्याय” में जातहारिणी ग्रह का वर्णन सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत 
ही महत्वपूर्ण है। उसमें आचार एवं अपने-अपने कर्तव्य पालन का तिरैस्कार करने 
वाले को जातहारिणी ग्रह के ग्रहण की बात कही गयी है। इस माध्यम से समाज 
के प्रत्येक वर्ग को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान एवं ईमानदार बनने का संकेत 
किया गया है। 
$. भूत विद्या (गृह चिकित्सा) 

आयुर्वेद का यह अड्ढ सर्वाधिक उपेक्षित अ् है। इस विषय का स्वतन्त्र कोई 
प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। 

देवता, पितृ, पिशाच तथा ग्रह आदि के आक्रमण से पीड़ित व्यक्तियों के कष्ट 
को दूर करने के लिये, उन देव आदि के लिये बलि, उपहार, पूजा आदि के विधान 
के द्वारा रोग शान्ति का उपचार जिस अक्ञ द्वारा किया जाता है, उसे “भूत-विद्या! 
कहते हैं। 

आयुर्वेद में भूतोन्‍्माद, अमानुषोपसर्ग तथा बालग्रहों का विस्तार-पूर्वक वर्णन 
किया गया. है, वे सब रोग तथा मानसरोग अपस्मार आदि भूत-विद्या के अन्तर्गत 
आते हैं। 

भूत-विद्या के विषय अथर्ववेद में भरे पड़े हैं। गुरु, सिद्ध, ऋषि, देवता, 
भूत-प्रेत, राक्षस, पिशाच एवं स्कन्‍्द, रेवती आदि ग्रहों के तिरस्कार करने पर 

* उन्माद, अपस्मार आदि मानसरोग तथा अनेक प्रकार के शारीरिक रोग होते हैं। 
ऐसे रोगों के उपचार के लिये आक्रामक देवता, राक्षस या ग्रह आदि के अनुरूप 
बलि, पूजा, होम एवं जप आदि किये जाने पर रोग से मुक्ति मिलती है। 

संहिता ग्रन्थों में बीजरूप में भूत-विद्या के विषय हैं, जैसे-सुश्रुत संहिता में 
उतर-तन्त्र अमानुषप्रतिषेधाध्याय । चरक संहिता में उन्‍्माद चिकित्सा एवं वाग्भट 
में भूत-विज्ञानीय एवं भूत-प्रतिषेधाध्याय । 

भूत-विद्या एक रहस्यमय विद्या है, जिंसकी सत्यता के उदाहरण सारे विश्व में 
किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। आयुर्वेद सर्ववेद परिषद्य (सभी प्रकार के ज्ञान 
का आगार) है और इसका प्रमुख लक्ष्य है-आर्तजन की पीड़ा का प्रतिकार करना। 
यों तो सभी रोगों के मूल कारण वात-पित्त-कफ होतें हैं, किन्तु भूत-विद्या सम्बन्धी 
रोगों के उद्भव में,प्रमुख कारण अदृष्ट होता है अथवा अलक्षित कारण होता है, 
इसलिये इन रोगों का उपचार. करना भी अतिशय साहस का कार्य है। 

इस प्रकार भूत-विद्या को आयुर्वेदाचायों ने मानस-विकार माना है और उसके 
उपचार में तीनीं ही प्रकार की चिकित्साएँ (दैंव-व्यापाश्रय, युक्ति व्यापाश्रय और 
सत्वावजय) आवश्यकतानुसार सफल होती है, बशर्ते कि उनका सम्यक्‌ संयोजन 

64 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


किया जाये। 


भूत-विद्या सम्बन्धी ग्रन्थ-सर्दर्भ 

चरक संहिता -  निदान-स्थान अ. 7 तथा 8, चि. 9, 0, सूत्र 24। 

सुश्रुत-संहिता -  उतरतन्त्र 27 से 37 तक तथा 60, 6 एवं 62 अ.। 
, अष्टांग हृदय - निदान 6 तथा उतर से 7 अ.। 

“मानस रोग विज्ञान -_ डा० बाल क्रृष्ण पाठक आदि हैं। 

शालाक्य तन्‍त्र 


कर्ण, नेत्र, मुख, नासिका आदि जत्रु के ऊपर के आंगों में उत्पन्न हुए रोगों 
की शान्ति के लिये तथा शलाका यन्त्र के उपयोग के लिये जो आयुर्वेदाज़ होता 
है, उसे 'शालाक्य तन्त्र” कहते हैं।* 

शालाक्य में समाविष्ट किये गये अंगों में से आधुनिक चिकित्सा में कर्ण, 
नासिका और कण्ठ (ई.एन.टी.) का एक विभाग माना गया है। आँख का एक 
स्वतन्त्र विभाग होता है। दाँत का भी स्वतन्त्र विभाग होता है। 

ऋग्वेद में शालाक्य विषयक चमत्कारों के लिये अश्विनी कुमारों का उल्लेख 
है। उन्होंने अन्धे ऋजाश्व को दृष्टिन्दान दिया । अन्धे कण्व को दृष्टि दी। बहरे 
नार्षद को श्रवण शक्ति दी। इन्द्र ने अन्धे परावृज को दृष्टि दान दिया। 

शालाक्य तन्‍त्र का प्रमुख ग्रन्थ 'सुश्रुत संहिता” है, जिसके उतर तन्‍्त्र के 
अध्याय ] से 9 तक नेत्र रोग का, 20 तथा 2 में कर्ण रोग का, 22 से 24 तक 
नासिका रोग का और 25-26 में शिरो-रोग का वर्णन है। 

सुश्रुत के समय में नेत्र शरीर का अध्ययन तथा नेत्र में विभिन्‍न अवयवों में होने 
वाले रोगों का विशेष अध्ययन प्रचलित था। व्यावहारिक प्रयोग के लिये सेंक, 
विडालंक लेप, नेत्र-पूरण, अञजन, वर्ति आदि का प्रयोग किया जाता था। कान, 
नाक, कण्ठ, मुख आदि के रोगों के निदान और उनकी चिकित्सा का भी स्वतन्त्र रूप 
से अध्ययन किया जाता था। शस्त्र-साध्य रोगों में शस्त्र-कर्म भी किया जाता था। 
शालाक्य के ग्रन्थ 

. विहेदतन्त्र। 2. निमितन्त्र। 3. काइूकायन तल्त्र। 4. गार्ग्य तन्‍्त्र। 5. 
सात्यकितन्त्र । 6. शौनकतन्त्र। 7. कराल तन्‍त्र। 8. चक्षुष्यतन्त्र। 9. 
कृष्णात्रेयतन्त्रमू-इन ग्रन्थों की प्राप्ति वर्तमान में नहीं है। 
वर्तमान में उपलब्ध ग्रन्थ 


. शालाक्य तन्‍्त्र _- ले. पं. रमानाथ द्विवेदी, चौखम्भा औ., वाराणसी 
2. शालाक्य विज्ञान - ले. डॉ. रवीन्द्र चन्द्र चौधरी। 

5. नेत्र-रोग-विज्ञान - डॉ. हंसराज कालेड़ा, अजमेर प्रकाशन। 

4. नेत्र-रोग-विज्ञान - डॉ. विश्व-नाथ द्विवेदी। 

5. नेत्र-विज्ञान - डॉ. बाल-कृष्ण शिवराम मुंजे कृत आदि विविध 


विविध ग्रन्थ वर्तमान समय में उपलब्ध हैं। 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 65 


शल्य चिकित्सा 

अनेक प्रकार के घास, लकड़ी, पत्थर, धूलिकण, धातु (लोहा आदि), मिट्टी, 
हड्डी, केश, नख, पूय, आश्राव, मूढ़गर्भ आदि शारीरिक तथा आगन्तुक शल्यों के 
निकालने के लिये यंत्र, शस्त्र, क्षार-कर्म, अग्नि-कर्म के प्रयोग के लिये विविध 
प्रकार के व्रणों का विनिश्रय करने के लिये यह शल्य नामक आयुर्वेदाज् प्रवृत्त होता 
है। इसे ही शल्य तन्त्र कहते हैं। शल्यतन्त्र को पाश्चात्य चिकित्सा-विज्ञान में 
सर्जरी (5ण्ाष्ट9) कहते हैं। 

आयुर्वेद के आठों अंगों में यह प्रथम और प्रधान है, क्योंकि शारीरिक रोग 
उत्पन्न होने के पूर्व देव-दानवों के युद्ध में प्रह्मर जन्य व्रणों के रोपण करने और 
यज्ञ के कटे हुए शिर को धड़ के साथ जोड़ देने के कारण शल्य ही प्रथम अंग है। 

सभी आयुर्वेदाज्ञों में समान रूप से आवश्यक होने से यंत्र, शस्त्र, क्षार और 
अग्नि के व्यवहार के कारण तथा शल्य-क्रिया करने से शीघ्र आराम पहुँचने के 
कारण शल्य सभी अंगों से अधिक वाज्छनीय है। 

सबसे प्राचीन वाइूमय ऋग्वेद में भी शल्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। 
अश्विनी कुमारों ने 'सन्धान कर्म” (?4४0० $णष्टणआ५) तथा “अंग प्रत्यारोपण! 
(एथ्ाऋ्राधा०ाणा) का कार्य किया था। दास” द्वारा 'दीर्घतमस” ऋषि के सिर 
और छाती को काट दिये जाने पर अश्विनी कुमारों ने उसके अंगों का सन्धान किया 
था। 

वाल्मीकि रामायण में इन्द्र के अण्डकोष के गिर जाने पर भेड़ के अण्डकोष 
के प्रत्यारोपण का उल्लेख है।? 
ग्रन्थ 

संहिता ग्रन्धों में 'सुश्रुत संहिता” सर्व-प्रधान ग्रन्थ है। इस संहिता में व्रणागार 
व्यवस्था, व्रणों के प्रकार, उनकी चिकित्सा के साठ उपक्रम, आठ प्रकार के 
शस्त्र-कर्म, यंत्र-शास्त्रों के प्रकार, जोंक लगाने, क्षार-प्रयोग, अग्नि-कर्म एवं सिरावेध 
आदि का विशद्‌ वर्णन किया गया है। ग 

सुश्रुत की विधियों के आधार पर ही आधुनिक सर्जरी का विकास हुआ है। 
शल्य! में 'सुश्रुत संहिता” का प्राचीन ग्रन्थों में अद्वितीय स्थान है। 
विष-चिकित्सा (अगद तन्‍्त्र) प $ 

अगदतन्त्र सुश्रुत की दी हुई संज्ञा है। चरक ने इसे 'विषगरवैरोधिक-प्रशमन' 
कहा है। “अष्टाड़ संग्रह” और “अष्टाज् हृदय” में इसका नाम <दंष्ट्राचिकित्सा” है। 
सर्प, कीट, लूता आदि से डंसे हुए, अनेक प्रकार के स्वाभाविक कृत्रिम एवं संयोग 
विष से ग्रस्त मनुष्यों के निदान तथा चिकित्सा के लिये जो अंग होता है, उसे 
“अगद-तन्त्र” या. विष-चिकित्सा” कहते हैं--“अगदतंत्र नाम-सर्पकीटलूता- मूषिकादि 
दष्ट विषव्यज्जनार्थ विविध विषसंयोगोपशमनार्थ च'- सुश्रुत। 

प्राचीन काल से ही राजाओं और सम्पतिशाली व्यक्तियों का जीवन बहुमूल्य 
“माना जाता है और शत्रु और दुष्ट जनों से उनके जीवन का संकट सदैव आशंकित 


66 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


रहा है। जरा-चिकित्सा:- इससे सम्बन्धित सामग्री आगे उद्दृत है। 
. पोषक स्तर पर-शतावरी, खर्जूर, दुग्ध एवं घृत। 


2. अग्नि -वर्धक रसायन-पिप्पली। 
3. स्रोतो --शोधक रसायन-गुग्गुल, रसौत, कस्तूरी .आंदि। 
रसायन औषधियों की कार्य-विधि 


. रसादि धातुगत परिवर्तन-धातुवृद्धि जनक। 

2. व्याधि क्षमत्वगत परिवर्तन-व्याधि प्रतिषेधक या निवारक | 
3. अन्तः स्राव (हार्मोन) गत परिवर्तन-शक्तिदायक। 

सभी संहिताओं में रसायन का प्रकरण मिलता है। चरक, सुश्रुत. आदि में 
दिव्य औषधियों का इस कार्य में प्रयोग है। ऋग्वेद में जो सोम का वर्णन है वही 
आगे चलकर पूरे रसायन का प्रतीक बना। 
वाजीकरण चिकित्सा 

क्षीण पौरुष, अल्पवीर्य एवं सन्‍्तानोत्पत्ति में असमर्थ पुरुषों को वीर्यवानू, 
पौरुष-सम्पन्न एवं सन्‍्तान के उत्पन्न करने में समर्थ बनाने वाला यह अंग है। 

“बाज: शुक्र सोञ्स्यास्तीति वाजी” 

अर्थात्‌ वाज का अर्थ शुक्र या वीर्य है, अतः जिसके पास शुक्र है वह वाजी 

है तंदनुसार जिसके पास शुक्र नहीं है, वह अवाजी है। 
“अवाजी वाजी क्रियते अनेन इति वाजीकरणम्‌”। 

अर्थात्‌ जिस क्रिया से अवाजी को वाजी किया जाता है, उसे वाजीकंरण 
कहते हैं। वाजि शब्द का एक अर्थ घोड़ा होता है, तदनुसार वाजीकरण उस युक्ति 
या क्रिया कां नाम है, जिसके द्वारा पुरुष घोड़े के समान अप्रतिहत सामर्थ्य युक्त 
होकर स्त्रीगमन में समर्थ होता है। 

अल्पवीर्य, दुष्ट-वीर्य, क्षीण-वीर्य एवं शुष्क वीर्य जनों में आप्यायन (वीर्य-पुष्टि), 
प्रसादन (वीर्य-शोधन), उपचय (वीर्य वृद्धि) और शुक्रजनन (वीर्योत्पादन) करने के 
लिये जो आयुर्वेदाह् है उसे 'वाजीकरण” कहते हैं।* 

सुश्रुतानुसार वाजीकरण के तीन लक्ष्य हैं- 

]. स्त्री में प्रीति उत्पन्न करना। 

2. सन्तानोत्पत्ति। 

3.. सद्यः कामतृप्ति । - 

कुचमार तन्‍्त्र, अनज्गरज्ञ, वात्सायन, कामसूत्र एवं पंचसायक इस विषय के 
प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। लोलिम्बराज ने सरस भाषा में कुछ योगों का वर्णन किया है: 


चतुर्य परिच्छेद 
आयुर्वेद का साहित्य-विभाजन 
. संहिता काल- 5 से 6 शती 


विषयावतरणं-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन । 


प्राचीन संहिताओं के मध्य आत्रेय-सम्प्रदाय में अग्निविश आदि ने तथा 
धान्वन्तर सम्प्रदाय में सुश्रुत आदि ने अपनी-अपनी संहिताओं का निर्माण किया। 
यहीं से वस्तुतः संहिता ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ होती है। इसके पूर्व ब्रह्म-संहिता, 
धान्वन्तर संहिता तथा भास्कर संहिता के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है किन्तु 
यह विवेचन परवर्ती सन्तति को प्राप्त हुआ, उसे ही संहिता की संज्ञा दी गयी। 
विषय के समस्त अंग जिसमें समाहित हो उसे संहिता कहते हैं। ऐसी एक संहिता 
के ही पढ़ने से समस्त विषय का बोध हो जाता है, इसके लिये फिर किसी अन्य 
ग्रंथ की आवश्यकता नहीं पड़ती-। यद्यपि सम्प्रदाय विशेष की संहिताओं में 
विशिष्ट अंग का प्राधान्य होता है यथा आत्रेय-सम्प्रदाय विशेष की संहिता में 
काय-चिकित्सा और धान्वन्तर संप्रदाय की संहिताओं में शल्य तंत्र की प्रधानता 
देखी जाती है। विशिष्ट प्रतिपाद्य विषय के अतिरिक्त अन्य विषयों का. वर्णन उतर. 
तंत्र में किया जाता है। 

प्रारम्भिक काल में आयुर्वेद की अनेक संहिताओं की रचना विभिन्‍न महर्षियों 
द्वारा हुई जिनके अस्तित्व का ज्ञान परवर्ती ग्रंथों में उपलब्ध उद्धरणों द्वारा होता 
है। इस समय यह संहिताएँ “तंत्र” के नाम से प्रसिद्ध थीं। तंत्र शब्द विस्तारशीलता 
एवं रक्षा का द्योतक है। जिसमें विषयों का वर्णन संक्षिप्त हो किन्तु भविष्य में 
इनके विस्तार की सम्भावना हो तथा जिसमें समस्त विषय अपने रूप में सुरक्षित 
रहे वह “तन्त्र” है। संहिता की अपेक्षा “तंत्र” का रूप संक्षिप्त होता है। अग्निवेश 
की रचना मूलतः अग्निवेश तंत्र थी जो चरक द्वारा उपबूंहित एवं प्रति संस्कृत 
होकर चरक संहिता के रूप में प्रसिद्ध हुई। 

संहिता ग्रन्थों की रचना वर्तमान काल तक चली आयी है, यद्यपि उसके 
समानान्‍्तर विशिष्ट विषयों पर भी ग्रंथ निबद्ध होते आये हैं। समास एवं व्यास की 
शैली पर ग्रंथों का निर्माण प्राचीन काल से होता आ रहा है। वेदों में समाहित सूत्र 
रूप ज्ञान को व्यास ने विस्तृत रूप दिया। ज्योतिष आदि शास्त्रों में भी “वृहत्संहिता? 
आदि संहिताओं की रचना हुई। इन संहिताओं का काल क्रम से विवेचन इस 
प्रकार है- 
प्राचीन काल 

प्राचीन संहिताओं में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भेल संहिता तथा काश्यप 
संहिता सम्प्रति उपलब्ध हैं। प्रथम दो संहिताएँ पूर्णरूप में तथा अन्य दो संहिताएँ 
खण्डित रूप में मिलती हैं। हारीत संहिता का भी एक ग्रंथ प्रकाशित है जिसकी 
मौलिकता संदिग्ध है। इनके अतिरिक्त वाग्भट की रचनाएँ अष्टांग-संग्रह तथा अष्टांग-हदय 
भी संहिताओं में मानी जाती हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- 
चरक-संहिता 


68 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


“*चरक संहिता” आत्रेय संप्रदाय का प्रमुख आकर ग्रंथ माना जाता है जिसमें 
काय-चिकित्सा का मुख्य रूप से प्रतिपादन हुआ है। जिस समय आधुनिक 
चिकित्सा विज्ञान शैशवावस्था में था उस समय “चरक संहिता” में प्रतिपादित 
आयुर्वेदीय सिद्धान्तों की गरिमा एवं गंभीरता से सारा विषय विस्मित एवं प्रभावित 
था। आधुनिक काल में चिकित्सा विज्ञान के विख्यात आचार्य प्रोफेसर ऑसलर 
इस ग्रंथ से इतना प्रभावित थे कि चरक के नाम पर उन्होंने न्यूयार्क (अमेरिका) 
में 'चरक क्लब” की स्थापना 898 ईस्वी में की ।" जहाँ चरक का एक चित्र रखा 
गया। 

आयुर्वेद की वृहत्त्यी में 'चरक संहिता' मूर्धन्य मानी जाती है। मध्य-काल में 
श्री हर्ष ने 'नैषधीय चरित” में चरक का निर्देश किया है। वाग्भट ने भी चरक को 
प्रथम स्थान दिया है तथा भेल आदि संहिताओं की तुलना में अधिक उपादेय 
ठहराया है। 8वीं 9वीं शती में पहले फारसी फिर अरबी में इसका अनुवाद हुआ 
जिसका उपयोग भारतीयेतर विद्वानों ने किया। 

“चरक संहिता” में काल के विषय में यह कहा जा सकता है कि- 

. 'चरक संहिता” के निर्माण के तीन स्तर हैं-अग्निवेश, चरक और दृढ़बल। 
2. मूल तंत्रकार अग्निविश का काल 000 ईस्वी पूर्व है। 

3. प्रति संस्कर्तता चरक शुझ् काल या मौर्य-शुज्ञकाल की सन्धिरेखा पर रखे जा 
सकते हैं। इनका काल दूसरी या तीसरी शती ईस्सी पूर्व है। 

4. दृढ़बल गुप्तकालीन है। इसका काल चौथी शती है। इसके द्वारा 'चरक संहिता! 
का अंतिम प्रतिसंस्कार हुआ। 

चरक संहिता का विषय आठ स्थानों तथा कुल 20 अध्यायों में व्यवस्थित 
है-- 


4. सूत्र स्थान है 30 अध्याय। 
2. निदान स्थान - ४ अध्याय। 
3. विमान स्थान - 8 अध्याय। 
4. शारीर स्थान - 8 अध्यायं। 
5. इन्द्रिय स्थान - 2 अध्याय। 
6. चिकित्सा स्थान - 30 अध्याय। 
7. कल्प स्थान - 2 अध्याय। 
8. सिद्धि स्थान - 2 अध्याय। 

320 अध्याय 
सुश्रुत संहिता 


"सुश्रुत संहिता” के उपदेष्टा धन्वन्तरि हैं जिन्होंने 'सुश्रुतः प्रभृति शिष्यों को 
शल्य ज्ञान मूलक उपदेश दिया। .'सुश्रुत संहिता” में “धन्वन्तरि” के साथ 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन्‌ ८-69 


“काशिराज-दिवोदास' शब्द प्रयुक्त होने से यह संदेह किया जाता है कि धन्वन्तरि 
उपंदेष्टा हैं या दिवोदास। कुंछ विद्वान धन्वन्तरि को उपदेष्टा मानते हैं और कुछ 
काश्रिज दिवोदास को। 

दिवोदास धन्वन्तरि के उपदेशों को सुश्रुत ने अपनी संहिता में निबद्ध किया 
जो शल्य तंत्र का उपंजीव्य ग्रंथ बनी । सुश्रुत दो कहे जाते हैं एक वृद्ध-सुश्रुत और 
दूसरों सुश्रुत। कहीं-कहीं सुश्रुत और वृद्ध सुश्रुत दोनों के उद्धरण एकत्र दृष्टि-गोचर 
होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि दिवोदास का शिष्य आध्य या वृद्ध-सुश्नुत था 
जिसने मूल सौश्रुत-तंत्र क़ी रचना की। यह संभवतः अग्निवेश तंत्र से पूर्व की 
रचना थी। उसके बाद सुश्रुत द्वितीय या सुश्रुत ने उसे प्रति संस्कृत कर नवीन रूप 
दिया। ; 


सुश्रुत संहिता का विषय-विभाग 
. सूत्र स्थान . + 46 अध्याय। 
2. निदान-स्थान  - 6 अध्याय। 
$. शारीर स्थान: +- 0 अध्याय। 
4. चिकित्सा स्थान- 40 अध्याय। 
5. कल्प स्थान. +5.. 8 अध्याय। 
420 अध्याय 
समय 


, 'सुश्ुत-संहिता! में निर्माण के चार स्तर हैं-वृद्ध सुश्रुत, सुश्रुत, नागार्जुन एवं 
चन्द्रट-जिनके काले. भिन्न-भिन्न हैं। ऐसी स्थिति में यह सरलता से संमझा जा 
सकता है कि 'सुश्रुत संहिता” का समष्टि रूप से एक काल निश्चित करना संभव 
नहीं है। इस सम्बन्ध में विभिन्‍न रचना-स्तरों का काल पृथक-पृथक बतलाया जा 
सकता है। इसके विषय में कोई एक मत भी स्पष्ट रूप से नहीं दिया जा सकता 
है। 

सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि- 

. काशीराज दिवोदास ध्रन्वन्तरि तथा आद्य या वृद्ध-सुश्रुत उपनिषद्कालीन 
हैं। इंतका काल 000-500 ईस्वी पूर्व है। 

2. सुश्रुत का काल 2 शती है। इसने मूल संहिता का प्रति संस्कार किया और 
उसने उत्तरतन्त्र जोड़ा। यहस्मरणीय है कि गुप्तकाल में 4-6 ई. के बीच “चरक 
संहिता” और "सुश्रुत संहिता” दोनों का प्रति संस्कार हुआ तथा वाग्भट की रचनाएँ 
भी इसी काल की हैं। 

$. सुश्रुत संहिता की पुनः पाठ शुद्धि चन्द्रट (0वीं शतती) द्वारा हुई, जो एक 
प्रकार का प्रतिसंस्कार है। इस प्रकार वर्तमान सुंश्रुत संहिंता का काल 0वीं शी 
है--इसमें निम्नॉँकित चार स्तर हैं-- 

.वृद्ध-सुश्रुत . + - 7000-500 ईस्वी. पूर्व 
2:समुँश्रुत ... ” ८-८ 2 शती। 


70 /.वाल्मीकि रामायण -तथा आयुर्वेद 


3. नागार्जुन न 5वीं शती। 
4. चन्द्रट कि 0वीं शती। 
भेल संहिता 
भेल (या भेड़) अग्निवेश के सहाध्यायी एवं पुनर्वसु आत्रेय के प्रमुख छः 
शिष्यों में थे। प्रथम ऋषि परिषद्‌ में जिन लोगों ने अपनी रचनाएँ उपस्थित कीं, 
उनमें भेल का नाम सर्व-प्रथम आता है।” “भेल संहिता' के उद्धरण भी अन्य तंत्रों 
और प्रायः सभी टठीकाओं में उपलब्ध होते हैं। 'काश्यप संहिता” में भेल का मत्त 
उद्धृत हुआ है।“ वाग्भट ने भी भेल आदि आर्ष-संहिताओं का संकेत किया है।* 
किन्तु तब तक संभवतः इनका प्रचार कम हो गया था, 'चरक' और 'सुश्रुत' इन्हीं 
दोनों की संहिताएँ प्रमुख हो गयी थीं। इसका कारण यह है कि चरक और सुश्रुत 
अपने-अपने संप्रदायों के प्रमुख एवं आबद्य ग्रन्थ थे। अन्य ग्रन्थों में प्रायः विषय का 
पिष्ट-पेषण होने के कारण मौलिकता का अभाव रहा जिसके कारण वे उपेक्षित 
होते गये। 
समय 
“भेल संहिता” के समय के विषय में निम्न तर्क प्रस्तुत हैं- 
. “बुद्ध” का लक्षण निर्दिष्ट होने के कारण यह ग्रंथ बुद्ध के पूर्व का नहीं 
हो सकता। 
2. गुप्त-कालीन तथा तंत्र सम्बन्धी तथ्य अधिक प्रबल है अतः उत्तर-गुप्त-काल 
के पूर्व इसका समय नहीं रख सकते हैं। 
इस प्रकार वर्तमान ग्रन्थ लगभग 7रवीं शती का लिखा प्रतीत होता है। यदि 
यह मूलतः भेल का रचित हो तब भी इसका प्रति इसका संस्कार उपर्युक्त काल में 
अवश्य हुआ। भेल अग्निवेश के सहाध्यायी थे अतः उनका काल अग्निवेश का 
काल अर्थात्‌ 000 ईस्वी पूर्व होगा। 
हारीत संहिता 
हारीत पुनर्वसु आत्रेय के शिष्यों में से थे। इनके नाम से 'हारीत संहिता! 
प्रसिद्ध है। इसमें चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट का उल्लेख किया गया है, अतः यह 
ग्रन्थ छठी शती के बाद का होना चाहिये। 
जतूकर्ण संहिता 
जतूकर्ण अग्निवेश के सहाध्यायी तथा पुनर्वसु आत्रेय के शिष्य थे, इन्होंने 
'जतूकर्ण संहिता” लिखी। जतूकर्ण अग्निवेश के सहाध्यायी थे, अतः इनका काल 
अग्निवेश का ही काल 000 ईस्वी पूर्व है। 
क्षारपाणि संहिता 
क्षारपाणि पुनर्वसु आत्रेयं के छः प्रमुख शिष्यों में थे। इनका ग्रन्थ 'क्षारपाणि 
' संहिता” था। इसके उद्धरण जेज्जट, चक्रपाणि, डल्हण आदि की व्याख्याओं में 
मिलते हैं। 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ४ 7] 
ढ़ 


पराशर संहिता 

इस नाम के अनेक आचार्य विभिन्‍न शास्त्रों के रचयिता हुए हैं किन्तु पुनर्वसु 
आत्रेय के छः प्रमुख शिष्यों में परिगणित पराशर आयुर्वेद के आचार्य थे जिनकी 
रचना “'पराशर संहिता” थी। 
काश्यप संहिता 

'वुद्ध-जीवक-तन्त्र” सम्प्रति 'काश्यप-संहिता” के नाम से प्रसिद्ध है इसमें 
महर्षि काश्यप उपदेष्टा हैं तथा बृद्ध जीवन ने उनके उपदेशों को ग्रन्थ रूप में 
निवद्धं किया। समय छठी शती ईस्वी पूर्व है। 
जीवक 

जीवक का लिखी कोई संहिता प्राप्त नहीं होती किन्तु इनके गुणों से यह पता 
चलता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक योग्यतम स्नातक होकर उन्होंने 
देश-विदेश में ख्याति अर्जित की। 
_खरनाद संहिता 
“वरनाड संहिता' भट्टारहरिश्चन्द्र कृत सुनी जाती है। गोडे ने इस संहिता का 
<ल ७४5७ “म्वों तथा व्याख्या का काल 850 ईस्वी निश्चित किया है। किन्तु 
दृद़वल न उसके पर्व का माना है। 
विश्वामित्र संहिता 

शिवदास ने चक्रदत्त की टीका (अर्शोधिकार) में विश्वामित्र संहिता की द्रव्य 
गुण सम्बन्धी उपयोगी सामग्री का उल्लेख किया है। 
दारूक संहिता ; 

जेज्जट, चक्रपाणि आदि ने इसे उद्धृत किया है। 
भारद्वाज संहिता 

इसके अस्तित्व का भी पता चलता है। 
अश्विनी कुमार संहिता 
इसके उद्धरण भी प्राप्त होते हैं। 

पूर्वोक्त संहिताओं में 'सुश्रुत' को छोड़कर अन्य सभी संहिताएँ काय-चिकित्सा 
प्रधान हैं। इनके अतिरिक्त, अंग क्रम से निम्नांकित संहिताओं का अस्तित्व 
यत्र-तत्र उपलब्ध उनके उद्धरणों से प्रमाणित होता है :- 








. शल्य 
. औषधेनवतन्त्र 7. भोजतन्त्र 
2. औरभ्रतन्त्र 8. करवीर्य तन्त्र 
3. पोष्कलावत तन्‍्त्र 9. गोपुररक्षित तन्त्र 
4. वैतरजतन्त्र 0. भालुकि तन्‍्त्र 


72 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


38५ 
6. 


वृद्धभोजतन्त्र 
कृतवीर्य तन्‍्त्र 


2. शालाक्य 


4. 


छ़फ़ फ्री ७ ७ 


विदेह तन्‍्त्र 
निमि तन्‍त्र 


» कांकायन तन्‍त्र 
« गार््यतन्त्र 

. गालव तन्‍त्र 

« सात्यकि तन्‍त्र 


3. कौमार भृत्य 


[६ 
2. 
3. 


वृद्धकश्यप संहिता 
कश्यप संहिता (वृद्धजीवक तन्त्र) 
पर्वतक तन्‍त्र 


4. अगद तन्‍त्र 


2 
ड़. 
मु] 
4. 


वृद्धकाश्यप संहिता 
काश्यप संहिता 
सनक संहिता 
लाट्यायन संहिता 


वाजीकरण 
कुचुमार तन्‍्त्र 


वाग्भट 


. कपिल तन्‍्त्र 
2. गौतम तन्‍्त्र 


7. भद्रशौनक तन्‍्त्र 
8. शौनक तन्‍त्र 
9. कराल तन्‍्त्र 
0. चक्षुष्यतन्त्र 
4. कृष्णात्रेय तन्त्र 
2. कात्यायन तन्‍्त्र 


4. बन्धक तलन्‍्त्र 
5. हिरण्याक्ष तन्त्र 
6. कुमार तन्त्र 


» आलम्ब्यायन संहिता 
» उशनः संहिता 

- बृहस्पति संहिता 

.. गरुड़ संहिता 


9० जा 9 कफ 


इनके अतिरिक्त वाग्भट का 'अष्टाज्ञ संग्रह” एवं “अष्टाड़ हृदय भी प्राप्त होता 


है। 


व्याख्या काल :- 7 से 5 शताब्दी 

वाग्भट प्राचीन काल का अंतिम संहिताकार था किन्तु उसने जो मार्ग बनाया 
उसका अनुसरण निरन्तर होता रहा। ऐसी एक संक्षिप्त संहिता की आवश्यकता 
सदा बनी रही जो समस्त आयुर्वेद का सार समाहित किये हो तथा वैद्यों के लिये 
व्यावहारिक पथ-प्रदर्शक हो। यह अवश्य है कि युग की आवश्यकता के अनुसार 
उसके स्वरूप में विभिन्‍नता आना स्वाभाविक था ऐसे कुछ ग्रन्थों के नाम में 
“संहिता” शब्द जुड़ा है और कुछ में नहीं है तथापि दोनों की प्रवृतियाँ समान हैं। 
इनमें से कुछ प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं- 
. 'कल्याण कारक च्ज इसके लेखक '“गग्रादिव्याचार्य' हैं। 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 73 


2. योग शतक न इसके लेखक नागार्जुन माने जाते हैं। 


3. सिद्धसार संहिता न यह बीद्ध आचार्य दुर्गगुप्तात्मज रविगुप्त 
की रचना है। 

4. वररुचि संहिता - इसके लेखक वररुचि हैं। 

5. नामभर्तृतन्त्र ्डः निश्चलकर ने नागदेव तथा विजयरक्षित 
ने नागभर्तृतन्त्र को उद्धृत किया है। 


इसके रचयिता कलहदास हैं। 

यह पण्डित केशवकृत ग्रन्थ है। 

इसके रचयिता दामोदरसूनु शार्डगधर कहे 
जाते हैं। 


6. कलक (कोलह) संहिता 
- आयुर्वेद प्रकाश 
8. शार्डगधर संहिता 


4 


| 


9. परहित संहिता ्द्‌ इसके रचयिता श्री नाथ पण्डित थे। 
0. भाव प्रकाश न यह भाव-मिश्र की प्रसिद्ध रचना है। 
7. योगतरंगिणी न यह त्रिमल्लभट्ट की प्रसिद्ध रचना है। 
2. टोडरानन्द न यह टोडरमल की कृति कहा जाता है। 
8. आयुर्वेद विज्ञान हे इसका प्रणयन 9वीं शती के अन्त में 
कविराज विनोदलाल सेन गुप्त ने किया। 


व्याख्या-वाइमय 

प्राचीन काल में जो आर्षतन्त्र लिखे गये वे संक्षिप्त: सूत्र-शैली में थे जिनका 
* कुछ विशदीकरण प्रति संस्कार के प्रसंग में हुआ जब उन्हें संहिता का रूप उपलब्ध 
हुआ, फिर भी सिद्धान्तों एवं व्यवहारों के और विशदीकरण की अपेक्षा थी अतः 
विद्वानों ने उन पर व्याख्या लिखना प्रारम्भ किया। इस प्रकार कालक्रम से 
संहिताओं तथा अन्य ग्रन्थों के समानान्तर व्याख्या का एक विशाल वाह्ञमय प्रस्तुत 
हो गया। 
व्याख्या काल को भी कई भागों में विभक्त किया जा सकता है यथा- 
प्राचीन काल 

प्राचीनकाल मूलतः सर्जनात्मक प्रवृति का था अतः उसमें मूल-तन्त्र और 
संहिताएँ लिखी गयीं। उनके प्रतिसंस्कार भी हुए फिर भी व्याख्या का प्रारम्भ 
प्राचीन काल में ही हो गया था यद्यपि इन व्याख्याओं की संख्या अधिक नहीं है। 
जेज्जट (9वीं शती) द्वारा उद्धृत टीकाकारों को प्राचीन काल में रखना उचित है। 
इनका काल 7-8 ईस्वी शती रखना चाहिये। इस काल के प्रमुख व्याख्याकार 
निम्नांकित हैं- 
. भटूटारहरिश्चन्द्र 

यह “चरक संहिता” की “चरक न्यास” व्याख्या के रचयिता हैं। शताब्दियों तक 
भटूटार की व्याख्या की विद्वत्समाज पर धाक जमी रही। उसके बाद ही जेज्जट का 
स्थान था। चरकीय मान्यताओं के अवबोध के लिये भट््‌टार की व्याख्या का 


74 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





अवलम्ब अनिवार्य माना जाता था।# 
2. स्वामिकुमार या स्वामिदास 

इन्होंने 'चरक संहिता” की “चरक पडिजका' नामक व्याख्या की रचना की ।" 
यह व्याख्या भटूटारहरिश्चन्द्र कृत *चरकन्यास' की अनुगामिनी है।" स्वामि कुमार 
का काल 77वीं शती है। 
3. आषाढ वर्मा _ 

इन्हें जेज्जट, चक्रपाणि और निश्चलकर ने उद्धृत किया है। इन्होंने चरक 
संहिता पंर 'परिहार-वार्तिक” नामक टीका लिखी। 
4. हिमदत्त 

इन्होंने “चरक-संहिता” एवं “अष्टाइ् हृदय” पर टीका लिखी, किन्तु इनकी 
टीकाएँ शीघ्र ही लुप्त हो गयीं। 
5. क्षीरस्वामिदत्त 

इन्होंने “चरक वार्तिक' की रचना की है। 

इस युग में और भी अनेक व्याख्याकार हुए हैं जिनका नामोल्लेख एवं कृति 


निम्नवत्‌ हैं- 

6. पतंजलि गा “चरक वार्तिक', 'सिद्धान्त-सारावली! 

7. शिव-सैन्धव - यह “चरक'” के टीकाकार थे। 

8. वैष्णव न" यह “चरक' के टीकाकार थे। 

9. चेल्लदेव - यह “चरक' के टीकाकार थे। 

0. सुवीर न इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी, 

7. नन्‍्दी गा इन्होंने 'चरक' तथा 'सुश्रु”' पर टीका लिखी, 
इनकी “योगसार संग्रह' भी रचना है। 

१2. वराह जे इन्होंने भी “सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी। 

मध्यकाल 


अधिकांश टीकाकार इसी काल में हुए अतः अनेक विद्वान मध्यकाल को 
संग्रह-काल या टीकाकाल कहना पसन्द करते हैं। जेज्जट (9वीं शती) से इस काल 
का प्रारम्भ माना जा सकता है। 

इस काल के व्याख्याकारों एवं उनकी व्याख्याओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवत्‌ 


है-- 

9वीं शती 

१. जेज्जट न इन्होंने 'वृहत्तरयी” की सभी संडिताओं, 'चरक संडिता', 
"सुश्रुत संहिता”, “अष्टांग हृदय” आदि पर टीकाएँ 
लिखीं। 

2. सुकीर ्ड इन्होंने 'सुश्रुतः पर टीका लिखी। 

3. सुधीर क्रम इन्होंने “वचरक' तथा '“सुश्रुत' पर टीका लिखी। 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 75 


4. माधव 


5. अमितप्रभ च 
6. भद्गवर्मा न 
0वीं शत्ती 

. चन्द्रनन्दन. “८ 


2. चन्द्रट फ्न्क 


3. भासदत्त - 
4. ब्रह्मदेव ्ा 


5. भीमदन्त - 
6. अज्ञिरि कि 
१. ईश्वरसेन च्ि 
पार्वी शत्ती है 
. गयदास के 
2. वाप्य (ष्प) चन्द्र- 


3. नरदत्त बल 


4. चक्रपाणि दत्त 


- वंगदत्त न 
. कार्तिककुण्ड 
. श्रीकृष्ण वैद्य 
. अमितप्रभ टीकाकार - 
» उपस्कार न 


9 9 >> 9 9९ 


इन्होंने 'प्रश्ससहस्रविधान' या 'सुश्रुतश्लोक वार्तिक' 
तथा 'सुश्रुत' एवं चरक पर टिप्पण किया। 
इन्होंने 'चरक संहिता” पर 'चरक-न्यास” लिखा। 
इन्होंने भी 'वरक” पर टीका लिखी। 


“अष्टांग हृदय” पर “पदार्थ चन्द्रिका' नामक टीका 
एवं “गण-निघण्दु' की रचना की। 

इन्होंने 'चिकित्सा-कलिका” पर विवृति, “योग- 
समुच्चय' नामक चिकित्सा ग्रन्थ, 'सुश्रुत! की पाठ 
शुद्धि तथा 'योग-मुष्टि” एवं 'वैद्ययोश” आदि की 
रचना की। 

इन्होंने 'चरक” पर टीका लिखी। 

इन्होंने 'चरक' एवं "सुश्रुत' पर टीका लिखी। 'सुश्रुत' 
की टीका 'गूढ़पदभंग टिप्पण” नामक थी। 

यह “चरक' के व्याख्याकार थे। 

यह “चरक' के व्याख्याकार थे। 

इन्होंने 'वरक' तथा “अष्टांग हृदय” पर टीका लिखी। 





इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता' पर “न्याय चंद्रिका” तथा 
“चरक संहिता” पर “'चरक चन्द्रिका' नामक टीका 
लिखी। 

इन्होंने 'वृहत्वयी” पर टीका, (ाष्पचन्द्रतक' की 
रचना तथा एक निघण्डु की भी रचना की है। 
इन्होंने 'बृहतन्त्रप्रदी/ नामक “'चरक' की टीका 
लिखी। 

इन्होंने 'चरक” पर “आयुर्वेद दीपिका! नामक तथा 
"सुश्रुत' पर 'भानुमती” टीका लिखी। “चक्रदत्त' एवं 
द्रव्य गुण संग्रह', 'शब्दचन्द्रिका', व्याकरण तत्व 
चंद्रिका', व्यग्रदरिद्रशुभंकर” तथा 'सर्वसारसंग्रह” की 
भी रचना की। 

इन्होंने 'सुश्रुत-ःसंहिता” पर टीका लिखी। 

इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी। 

इन्होंने 'वचरक भाष्य'” की रचना की। 

इन्होंने 'अमितप्रभ” नामक ग्रन्थ की रचना की। 
इन्होंने 'सुश्रुत' की व्याख्या की। 


76 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


॥2वीं शत्ती 


3. भास्कर ह्न इन्होंने 'सुश्रुत-पञ्जिका' की रचना की। 

2. डल्हण - “सुश्रुत-संहिता” पर डल्हण की “निबन्ध संग्रह' 
व्याख्या है। 

3. गदाधर न इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी। 

4. ईशानदेव. - इनकी “चरक संहिता” प्रसिद्ध है। 

5. गुणाकर - वैद्यगुणाकर ने चरक पर कोई वृत्ति लिखी है। 

6. ध्रुवषाद ग यह योगशतक की चन्द्रकला व्याख्या का कर्त्ता है। 

7. जिनदास - इन्होंने *चरक-व्याख्या” लिखी। इसके अतिरिक्त 


“जाम्बस्वामिचरित', 'कल्पभाष्यचूर्णि', 'कर्मदण्डी' 
आदि इनकी रचनाएँ हैं। 

8. गोवर्धन (दत्त) - इन्होंने “बृहत्तन्त्र-प्रदीप" की टीका लिखी। इसके 
अतिरिक्त 'रत्न माला', 'न्यास-सारावली' 
“परिभाषावली', 'चिकित्सालेश” आदि की रचना की । 


9. मैत्रेय - इन्होंने 'चरक” पर टीका लिखी। 

0. रामदेव - इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी। 

. नागदेव न इन्होंने चरक' पर टीका लिखी। 

2. भव्यदत्त गा इन्होंने 'वरक” पर टीका लिखी। 

33. बकुलकर_ - इन्होंने 'वरक' तथा 'सुश्रुत' की व्याख्या तथा 


“सरोच्चय” नामक ग्रन्थ की रचना की। 


4. सनातन न “योग-शतक' पर इनकी वल्लभ टीका है। 

5. विजयरक्षित - इन्होंने माधवकृत रुगृविनिश्वय की टीका लिखी। 

6. श्री कंठ दव - वृन्दमाधव पर इनकी व्याख्या “कुसुमावली' प्रसिद्ध 
है। 

7. वृन्दकुण्ड.. - इन्होंने 'चरक' पर “वृन्दटीका” तथा “वृन्दरभाधव” पर 
“वृन्द टिप्पण” लिखा। 

3वीं शताब्दी 

. अरुणदत्त ध् इन्होंने “अष्टांग हृदय” पर 'सर्वाक्ञ सुन्दरी टीका! 
तथा *सुश्रुत!” पर भी टीका की रचना की। 

2. इन्दु न इन्होंने “अष्टांग संग्रह” पर 'शशि लेखा व्याख्या! 
लिखी तथा “अष्टांग-संग्रह” की भी टीका लिखी। 

3. निश्वलकर_ - चक्रदत्त पर इन्होंने विस्तृत व्याख्या रत्न-प्रभा' 
नामक लिखी है। 

4. हैमाद्वि न “अष्टांग हृदय” की आयुर्वेद रसायन, मुक्ताफल तथा 


हरिलीला पर आयुर्वेद टीका तथा 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' 
विषयावतरण-संस्क्रृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवचन / 77 


की रचना की। 

5. वोपदेव न इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर तथा अपने पिता 
केशव के 'सिद्धि-मंत्र” पर 'प्रकाश-व्याख्या' तथा 
स्वरचित “शतश्लोकी” पर “चन्द्रकला व्याख्या” लिखी। 
इनके अनुसार इन्होंने व्याकरण में 0, आयुर्वेद में 
9, ज्योतिष में [, साहित्य में 3 तथा भागवद्‌ में 5 
ग्रन्थ लिखे। इन्होंने “हदय दीपकः नामक निषण्दु 


रत्न लिखा। 
6. आशाधर - इन्होंने 'अष्टांग हृदय” पर “अष्टांग हृदयोद्योत' नामक 
टीका लिखी। ४ 
4वीं शत्ती 
3. आठमलल . - इन्होंने शार्डगधर पर “दीपिका-टीका” लिखी है। 
2. वाचस्पति +- यह “माधव-निदान” पर “आतंक दर्पण” व्याख्या के 
रचयिता हैं। 
75वीं शत्ती 


. शिवदास सेन-यह चरक-संहिता की “तत्व-प्रदीपिका” व्याख्या के रचयिता 
हैं इस व्याख्या के अतिरिक्त उनकी अन्य भी रचनाएँ हैं- 
. चक्रदत की तत्वचन्द्रिका व्याख्या। 2. चक्रपाणि कृत द्रव्य-गुण संग्रह की 
व्याख्या। 3. अष्टांग-संग्रह की तत्वबोध व्याख्या। 4. भव्यदत्त कृत योग रत्नाकर 
. की टीका। 
-विवृति कालः-6 से आधुनिक काल तक 
+7वीं शत्ती 
:.. काशीराम वैद्य. - इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर 'गूढ़ार्थदीपिका' 
व्याख्या लिखी। 

2. नरसिंह कविराज - इन्होंने मधुकोष के आधार पर माधवनिदान की एक 
महत्वपूर्ण व्याख्या 'रोग विनिश्चयविन्थरण सिद्धान्त 
चिंतामणि” नाम से लिखी । चरक पर भी इनकी टीका 
“चरक तत्व प्रकाश कौस्तुभ” है। इन्होंने 'मधुमती” 
नामक एक अन्य ग्रन्थ की भी रचना की है। 


3. रुद्रभटूट - इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर “आयुर्वेद दीपिका” या 
“गूढान्त दीपिका” टीका तथा लोलिम्बराज कृत वैद्य 
जीवन पर दीपिका टीका लिखी। 

8वीं शत्ती 

. रामसेन - सेन्द्र सार संग्रह” तथा 'रसेन्द्र चिंतामणि' पर टीका 
लिखी। 


78 » वाल्मीकि ग़मायण तथा आयुर्वेद 


9वीं शती 


. गंगाधर राय - “चरक संहिता” पर इनकी “जल्पकल्पतरु' व्याख्या 
विद्वतापूर्ण है। 

20वीं शत्ती 

. हाराणचन्द्र चक्रवर्ती - इन्होंने 'सुश्रुत संहिता” पर "सुश्रुतार्थ संदीपन” भाष्य 
लिखा। 

2. योगीन्द्र नाथ सेन - “चरक संहिता” पर इन्होंने 'चरकोपस्कार' नामक 
सुबोध व्याख्या लिखी। 

3. ज्योतिष चन्द्र सरस्वती- इन्होंने 'चरक-प्रदीपिका” नाम से 'चरक' की 
टीका लिखी। 

4. दतराम चौबे - “निषण्टु रत्नाकर' जैसे बृहतू ग्रन्थ की रचना की। 


फ 


' जयदेव विद्यालंकार - इन्होंने 'चरक संहिता” पर टीका लिखी तथा 'चिकित्सा 


कलिका' तथा “भैषज्य रत्नावली” की भी इन्होंने हिन्दी 
टीका लिखी। 


6. अत्रिदेव विद्यालंकार_ - 


7. राम प्रसाद शर्मा ग्ि 


8. भाष्कर गोविन्द घाणेकर - 


इन्होंने चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट सभी पर 
हिन्दी टीका लिखी। संपूर्ण अष्टांग संग्रह पर 
भी इन्होंने हिन्दी टीका लिखी। 

आपने “चरक संहिता” एवं 'अष्टांग संग्रह” 
पर हिन्दी टीका लिखी। 

"सुश्रुत संहिता” पर आपने टीका लिखी तथा 
“औपसर्गिक रोग', 'स्वास्थ्य विज्ञान' आदि अनेक 
ग्रन्थों की रचना की। 





9. दतात्रेय अनन्त कुलकर्णी- 
0. लालचन्द्र वैद्य न 


. काशीनाथ शास्त्री... - 


इन्होंने 'रसरत्न समुच्चय” पर टीका लिखी। 
इन्होंने “अष्टांग हृदय”, 'भाव प्रकाश” तथा 
“अष्टांग संग्रह” पर विवेचनात्मक व्याख्या 
हिन्दी में लिखी । 

इन्होंने “चरक-संहिता” पर टीका लिखी है। 


इस प्रकार संक्षेप में आयुर्वेद का साहित्य विभाजन प्रस्तुत किया गया। इसके 
आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन काल से अब आधुनिक काल तक 
आयुर्वेद साहित्य मैं विविध ग्रन्थों का सृजन एवं अध्ययन कार्य हुआ है तथा 
वर्तमान समय में भी यह प्रगति की ओर अग्रसर है। 


पंचम परिच्छेद 


वाल्मीकि रामायण के समक्ष विद्यमान आयुर्वेद साहित्य 


विषयावतरण-संस्क्रृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 79 


वाल्मीकि रामायण--संस्कृत का आदि महाकाव्य है, संपूर्ण काव्य इसके बाद 
की ही कृति है। रामायण से पूर्व वेदों एवं उपनिषदों आदि का होना पाया जाता 
है। इन्हीं वेदों में बहुत सी आयुर्वेदिक सामग्री उपलब्ध होती है जिसे रामायण के 
समक्ष माना जा सकता है। संक्षेप में इसका विवरण प्रस्तुत है-- 

वेदों में देवता वाद है। प्रत्येक सूक्त का कोई न कोई देवता होता है। जिस 
सूक्त में जिस देवता की प्रार्थना हो वह उसका देवता होता है। इस प्रकार से अग्नि, 
अप्‌ आदि देवताओं के समान रुद्र, इन्द्र आदि देवता हैं, उनके ही साथ अश्विनी 
भी देवता हैं। अश्विनौ का मुख्य सम्बन्ध चिकित्सा के साथ है। अश्विनौ ने वैदिक 
देवताओं की चिकित्सा की थी।! 
ऋग्वेद में आयुर्वेद 

ऋग्वेद सर्वप्रथम माना जाता है अतः इसमें आयु से सम्बन्धित मंत्रों का होना 
अनिवार्य है। ऋग्वेद में कई ऐसे प्रसंग हैं जो आयुर्वेद की ओर संकेत करते हैं 
यथा- 

एक मंत्र में पुरोहित अपने स्वामी की पत्नी की टाँग कट जाने पर लोहे की 
टाँग के लिये अश्विनौ से प्रार्थना करता है। वह पक्षी के समान हल्की टाँग चलने 
के लिए माँगता है-“वपस्ला की टाँग युद्ध में कट गई है, इसलिये तुम जल्दी आकर 
रात्रि में ही पक्षी के पर के समान हल्की टाँग चलने के लिये लगा दो ।* 
आँखों का दान 

ऋजाश्व को उसके पिता वृषगिरि ने शाप से अन्धा बना दिया था, क्योंकि 
उसने वृक्क के लिये एक सौ भेड़ों को दिया था। इस ऋजाश्व को अश्विनौ ने पुनः 
आँखें प्रदान की थीं क्योंकि अश्विनौ ही वृक्क के रूप में थे।४ 
च्यवन ऋषि को पुनः युवा करना 
इसका उल्लेख भी क्ग्वेद में है ।“ 
दिव्य वैद्य 

वेद में वैद्य का लक्षण बताते हुए कहा गया है-. संपूर्ण औषधियों को अपने 
पास ठीक रखने वाला। 2. विशेष प्रबुद्ध-अपने शास्त्र का पूर्ण, सांगोपांगज्ञाता। 
3. युक्ति और योजना को जानने वाला। 4. राक्षसों का नाश करने में समर्थ और 
5. रोगों को जड़ से उखाड़ सके-ये पाँच लक्षण वैद्य के हैं- 

“यत्रौषधिः समग्मत राजानः समितामिव। 
विप्रः स उच्यते भिषग्‌ रक्षोहाभीवचातनः । ।? 

औषधि-चिकित्सा 

वनस्पति या औषधियों के प्रयोग से रोग दूर होते हैं। वेद में औषधि के लिये 
माता शब्द आता है ।” औषधि के लिये इसमें एक सम्पूर्ण सूक्त है। थोड़े से अंश 
प्रस्तुत हैं।* 
औषधियों से रोग-नाश 

वीर्यवती औषधियों के सेवन से रोग के बीजों का नाश होता है।” 


80 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





रोगों का नाश 

विभिन्‍न रोगों के नाश के लिये भी मंत्र हैं।'' 

इनके अतिरिक्त ऋग्वेद में जल चिकित्सा” प्रसूति सम्बन्धी ज्ञान” सौर 
चिकित्सा» वायु चिकित्सा“ मानस चिकित्सा” एवं हवन चिकित्सा” आदि का भी 
उल्लेख मिलता है। 
यजुर्वेद में आयुर्वेद 

यजुर्वेद के दो भाग हैं-एक तैत्तरीय शाखा और दूसरी वाजसनेयी शाखा। 
इनका सम्बन्ध मुख्यतः कर्मकाण्ड से है, इसलिये शरीर के अंगों के नामों का 
उल्लेख शतपथ-ब्राह्मण में मिलता है। यजुर्वेद के वर्ण्य-वेषय का ज्ञान एक मात्र 
वाजसनेयी संहिता के अध्ययन से हो सकता है। इस संहिता में 40 अध्याय हैं। 

यजुर्वेद में प्राप्त आयुर्वेदिक तत्व निम्नवत्‌ हैं- 
औषधि-सूक्त 

यजुर्वेद में औषधियों के लिये बहुत से मंत्र आये हैं, इनसे स्पष्ट है कि 
औषधियों का उपयोग यज्ञकर्म तथा स्वास्थ्य के लिये विशेष होता था। औषधियों 
से नाना प्रकार की प्रार्थना की गयी है ।” वेद में औषधियों की माता को “ष्कृतिः 
(सर्वेषां रुग्णानां निष्करत्री) सब रोगों को निकालने वाली कहकर प्रार्थना की गयी 
है। 'हे औषधियों! तुम भी मेरे रोगों को निकालो ।९* 

औषधियाँ कहती हैं कि आकाश द्यु-लोक से आती हुई हम जिस व्यक्ति के 
पास पहुँच जाती हैं, वह किसी तरह भी नष्ट नहीं होता ।* 
दिव्य वैद्य 

जो रोगों को जड़ से नष्ट करता है, राक्षसों को मारता है, वह वेद में दिव्य 
भिषक कहा गया है- 
“कम न होने वाले सदा बढ़ने वाले रोग बीजों को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला और सब 
राक्षसों को नीचे की ओर से निकालने वाला है, वह उपदेशक पहला दिव्य वैद्य है ।* 
अथव॑वेद में आयुर्वेद 

अथव॑वेद में आयुर्वेद का विषय विस्तार से आया है। अथर्ववेद का सम्बन्ध 
ही आयुर्वेद उपाज़ से है- 

अधर्ववेद में आये हुए आयुर्वेद सम्बन्धी विषयों की सूची निम्नलिखित है 
जिससे चिकित्सा विषयक सूक्तों की विस्तृत जानकारी मिल जाती है- 
अज्जन 7/30/36; अपामार्ग-4/7, 4/8, 4/9, अपांभेषज /4,5,6 6/23, 
24, अक्षिरोग भेषज 6/6, आंजन 4/9, 9/45, आप /88 3/3, 7/39, 
9/2, 69, आस्राव की औषधि-2/3, औषधि 7/8, 6/59, कुष्ठौषधि 6/95, 
केशवृंहण 6/36, केशवर्धन 6/87, केशवर्धनी औषधि 6/2।, गर्भसंस्राव 20/96, 
-6, पिप्पली भैषज्य 6/09, पृश्निपर्णीमैषज्य 6/22, 52, 83, 9/44, रोहिणी 
वनस्पति 4/2, लाक्षा 5/5, वनस्पति 8/8, वाजीकरण 4/4, विष मैषज्य 7/56, 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 8। 


सौभाग्यवर्धन 6/89। 
रोगादि निवारण 

इषुनिष्कासन 6/90, उनमत्तता मोचन 6/], कासशमन 6/05, कुष्ठत्तम्भ 
नाशन 5/4, कृष्ठनाशन 9/39, क्लीवत्व नाशन 6/38, गर्भबृंहण 6/7, गर्भदोष 
निवारण 8-6, गण्डमाला चिकित्सा 7/74-76, चिकित्सा 6/96, जल चिकित्सा 
6/57, ज्वर नाशन /25, 7/6, तकम नाशन 5/22, दुस्वप्न नाशन 20/96 
आदि अन्य भी विविध रोग। 
कृमि नाशन 

कृमिष्न 5/23, कृमि जम्भन 2/37, कृमि नाशन 2/32, 4/37। 
विष नाशन 

विषघ्न 4/6, विष दूषण 6/00, विष नाशन 4/7, सर्पविष दूरीकरण 0/4, 
सर्प विष नाशन 5/3, 7/88, सर्प विष निवारण 6/2, साँपों से रक्षा 6/56। 
अरिष्ट नाशन 

अरिष्ट क्षपण 6/27, 28, 29, 80, अलक्ष्मी नाशन /8, असुर क्षपण 6/7, 
9/66, ईर्ष्या विनाशन 6/8, 7/45 आदि। 

इस प्रकार आयुर्वेद से सम्बन्धित विषयों का अथर्ववेद में विस्तार से वर्णन 
होने के कारण आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद कहा गया है। 
अथर्ववेद के विभिन्‍न नाम 

. अथर्ववेद। 2. आंगिरस वेद। 3. अथर्वाज्िसिस वेद। 4. ब्रह्मवेद। 5. 
भृग्वाज्िरोवेद । 6. क्षत्रवेद । 7. भैषज्यवेद | 8. छन्दोवेद | 9. महीवेद। 
भैषज्य वेद 

इसमें आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि का बहुत वर्णन है, इसलिये इसे 
“भैषज्य वेद” कहते हैं अथर्ववेद में इसे 'भेषजा” कहते हैं। अधर्ववेद में काण्डों के 
अनुसार प्रतिपाद्य-विषय संक्षेप में इस प्रकार है- 
काण्ड -- विविध रोगों की निवृत्ति, पाश-मोचन, रक्षो-नाशन, गर्भ-प्राप्ति। 
काण्ड -2- रोग, शत्रु एवं कृमिनाशन दीर्घायुष्य। 
काण्ड -3- ब्रह्म विद्या, विष-नाशन। 
काण्ड -4- ब्रह्म विद्या, कृत्या-परिहार। 
काण्ड -5- दुःस्वप्न नाशन, अन्न समृद्धि आदि। 

अथर्ववेद में उस समय प्रचलित रीति-रिवाज, प्रधाएँ, मान्यताएँ यहाँ तक कि 
अंध-विश्वास, रूढ़ियों, जादू-टोने, कृत्या-प्रयोग, अभिचार कर्म, सम्मोहन, वशीकरण, 
ताबीज, जड़ी-बूटी आदि का विस्तृत उल्लेख है। 
आयुर्वेद 

शरीर के अंग (2-88-] से 7, 20-96-7 से 29) रोगों के नाम (9-8) 
औषेध-चिकित्सा एवं जल-चिकित्सा (4-4-5) ज्वर, यक्ष्मा, खाँसी, कुष्ठ, हृदय रोग, 

82 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


क्षेत्रीय रोगों की चिकित्सा (-2, 2-8, -23) आदि। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि अथर्ववेद में सभी वेदों से अधिक आयुर्वेद की सामग्री 
मिलती है। 
अग्निपुराण में आयुर्वेद 

उपयोगिता की दृष्टि से यह सबसे महत्त्वपूर्ण पुराण है। इसे विश्वकोश कहा 
जा सकता है। इसमें उस समय प्रचलित सभी विद्याओं का संकलन है। यह 
महाभारत के तुल्य संकलन ग्रंथ है। इसके लेखक ने यह प्रयत्न किया है कि इसमें 
सभी विषयों का समावेश किया जाये और उनका संक्षिप्त परिचय दिया जाये अतैव 
इसमें काव्य-शास्त्र, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष, कोशग्रंथ, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद, 
अर्थ-शास्त्र, वनस्पति-शास्त्र, स्थापत्य-कला का सुन्दर वर्णन है। नाट्यशास्त्र, 
वैदिक-कर्म-काण्ड आदि विषयों का समावेश किया गया है। 
गरुण पुराण 

इसमें 8 सहस्न श्लोक माने जाते हैं। इसमें पुराणों से साक्षात्‌ सम्बद्ध कोई 
विषय नहीं है, इसमें गणित, फलित ज्योतिष, श्राद्ध-तर्पण, व्याकरण, आयुर्वेद एवं 
विविध-रत्नों का वर्णन है। 

इनके अतिरिक्त ब्राह्मण-य्रन्थों एवं उपनिषदों में भी आयुर्वेद के तत्व थे जो 

: रामायण के समक्ष “आयुर्वेद साहित्य” के रूप में विद्यमान थे। 

तत्कालीन चिंकित्सकों का सामाजिक सम्मान 

रामायण में चिकित्सकों का कया स्थान है यह जानना अत्यन्त आवश्यक एवं 
रोचक है। ह 
आयुर्वेद के आराध्य देव भगवान धन्वन्तरि की कथा सभी धार्मिक ग्रन्थों, पुराणों 
में एक-सी मिलती है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका प्रसंग उपलब्ध होता है। 
वाल्मीकि ने भगवान धन्वन्तरि को “आयुर्वेद-मय पुरुष” माना है। सभी ग्रन्थ उसे 
एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि भगवान धन्वन्तरि का अवतरण समुद्र मंथन से 
हुआ। ;ं 

देवता एवं असुर मंदराचल पर्वत को मथानी मानकर समुद्र मंथन करने लगे 
“तदन्तर 000 वर्ष बीतने पर इस क्षीर सागर में से एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा 
पुरुष प्रगट हुए, जिनके एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डल था। उनका नाम 
धन्वन्तरि था ।”“ इस प्रकार वाल्मीकि रामायण ने भी धन्वन्तरि की उत्पति उसी 
प्रकार मानी है जिस प्रकार अन्द्य ग्रन्थों में मानी गयी है। वाल्मीकि रामायण के 
बालकाण्ड के 45वें सर्ग में श्लोक संख्या 5 से 43 तक इसी प्रकार का वर्णन 
प्राप्त होता है। 

वाल्मीकि रामायण के काल में वैद्य एवं चिकित्सकों की राजकीय एवं 
सामाजिक स्थिति कैसी थी? इस सम्बन्ध में अलग-अलग तो वर्णन प्राप्त नहीं 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन » 83 


ह 


होता है। किन्तु वैद्य उस समय राज्य तथा समाज के एक अंग थे और यह 
अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों ही प्रकार के चिकित्सक उस समय 
उपलब्ध थे। कुछ विशिष्ट चिकित्सकों को राजवैद्य स्वीकार किया जाता था तथा 
अन्य दूसरे साधारण चिकित्सक होते थे। 

सामाजिक चिकित्सकों का यद्यपि रामायण में स्पष्ट वर्णन तो नहीं मिलता 
परन्तु विशिष्ट चिकित्सकों के विषय में पर्याप्त संकेत रामायण में प्रकट होते हैं। 
देव चिकित्सकों के भी नामों का उल्लेख तथा उनके दिव्य कार्यों का संकेत भी इस 
ग्रंथ में प्राप्त होता है। उनके नाम आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा के नामों से बहुत 
कुछ मेल खाते हैं। उदाहरणार्थ-ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, वरुण, गरुड़, शिव, विष्णु, 
बृहस्पति, अश्विनी-कुमार, धन्वन्तरि आदि का नाम उल्लेखनीय है। ये सभी 
देव-चिकित्सक के दिव्य-रूप में पाठकों के सामने आये हैं। श्री भारद्ाज का 
नामोल्लेख यद्यपि रामायण में प्राप्त है परन्तु वे चिकित्सक के रूप में पाठकों के 
सामने नहीं आये हैं। 

रामायण में सभी प्रकार के चिकित्सकों का वर्णन मिलता है--काय-चिकित्सक, 
शल्य-चिकित्सक, युद्ध-चिकित्सक, विष-चिकित्सक आदि का नाम यत्र-तत्र उपलब्ध 
हो सकता है। केवल चिकित्सा मात्र नहीं, राजा तथा प्रजा के स्वास्थ्य की 
जिम्मेदारी भी इन चिकित्सकों की ही हुआ करती थी। विभिन्‍न चिकित्सक 
भिन्‍न-भिन्‍न रोगों के सिद्ध चिकित्सक हुआ करते थे और उनका सम्मान राजा 
द्वारा यथोचित रूप से किया जाता था। यह सत्य है कि समाज में तथा राज्य सभा 
में चिकित्सकों का सम्मान-पूर्ण स्थान था। राजा के दैनिक कार्यों, खान-पान आदि 
में भी उनका हस्तक्षेप रहता था। राजा तथा उनके कुल के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी 
चिकित्सकों की ही थी। 

रघुकुल में राजा दिलीप से लेकर श्रीराम तक सभी राजा अपनी राज्य सभा 
में चिकित्सकों को स्थान देते थे तथा उन्हें विभिन्‍न प्रकार से सम्मानित कर सन्तुष्ट 
कियो जाता था। एक स्थान पर इस प्रसंग का उल्लेख इस प्रकार है-कैकयी जब 
कोप भवन में रुगण बनकर बेहोश पड़ी थी तब राजा दशरथ ने उसके उस भवन 
में प्रवेश किया। रानी की यह स्थिति देखकर राजा ने उसे विभिन्‍न प्रकार से मधुर 
वचनों द्वारा आश्वासित किया और उसे स्वस्थ होने की प्रेरणा दी। साथ ही राजा 
ने उसे यह वचन कहे-“भामिनी! तुम अपना रोग बताओ। मेरे यहाँ बहुत कुशल 
वैद्य या चिकित्सक हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकार से सन्तुष्ट कर रखा है। वे तुम्हारी 
चिकित्सा कर तुम्हें सुखी बना देंगे॥* 

उक्त प्रसंग में यह स्पष्ट है कि वैद्यों को सभी प्रकार से सन्तुष्ट करना राजा 
का कर्त्तव्य था और राजा तथा उसके परिवार की सब प्रकार से सेवा करना (स्वस्थ 
बनाना) चिकित्सक की जिम्मेदारी में था। राजा को पूर्ण-विश्वास तथा गर्व होता था 
इस बात के कहने में कि उसके यहाँ कुशल-चिकित्सक हैं जो उससे पूर्णतया संतुष्ट 

,84./ वाल्मीकि रामायंण तथा आयुर्वेद 


हैं और जो अपने चिकित्सा के दायित्व में सिद्ध हस्त हैं। 

अयोध्या राज्य में चिकित्सकों का कुछ दायित्व सामाजिक भी था। यह बात 
एक प्रसंग में स्पष्ट उल्लिखित है। श्री राम के वन गमन के बाद जब भरत 
अयोध्या में आये तो राम को न देखकर बहुत उद्विग्न हुए अन्त में उन्होंने राम को 
वन में जाकर लौटा लाने का निश्चय किया। वैद्यों ने उस समय अपने सामाजिक 
दायित्व को पहचाना और भरत के साथ उन्होंने वन यात्रा की। यह रामायण में 
स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है-“वैद्या धूप का” अर्थात्‌ भरत की वन यात्रा 
में उनके साथ अन्य सभी चलने वालों में वैद्य भी थे। भरत के इस यात्रा में चलने 
वालों में वैद्यों का उल्लेख वैद्यों के सामाजिक सम्मान तथा उनके सामाजिक दायित्व 
की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। वैद्य समाज के सम्मानित प्राणी थे तथा राजा द्वारा 
मान्यता प्राप्त भी थे। 

राजा श्री राम के मन में चिकित्सकों के प्रति कितना दायित्व था इसके लिये 
निम्न उद्धरण हम यहाँ उद्धरित कर देना उपयुक्त समझते हैं। जब भरत श्री राम 
को लौटा लाने के लिये उनके पास गये तो श्री राम ने भरत से मिलते ही सर्व प्रथम 
निम्न प्रश्न किये-“तात्‌! क्‍या तुम देवों, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान 
आदरणीय वृद्धों, वैद्यों, ब्राह्मणों का सम्मान करते हो ?”* 

“राघव! क्या तुम देवों, वृद्ध पुरुषों, बालकों प्रधान-प्रधान वैद्यों का आन्तरिक 
अनुराग, मधुर वचन और धन-दान इन तीनों के द्वारा सम्मान करते हो ?”« 

श्री राम द्वारा पूछे गये उपरोक्त प्रश्नों से यह स्पष्ट है कि राज्य में वैद्यों का 
सम्मान था, प्रत्येक राजकीय कार्य में उन्हें याद किया जाता था। समारोहों में तथा 
यों भी राजा द्वारा आंतरिक अनुराग, मधुरालाप तथा धन प्राप्त होता रहता था। 
इन सभी से वे तुष्ट होकर हमेशा राजा तथा जनता की सेवा करते रहते थे। ये 
चिकित्सक सभी प्रकार के चिकित्सक थे और विशेष प्रकार की चिकित्साओं में 
सिद्ध हस्त थे। 

सीता की खोज के लिये वानरराज सुग्रीव ने दसों दिशाओं में वानरों को भेजा 
तब जो वर्णन उन्होंने वानरों के सामने दिया है उससे यह स्पष्ट होता है कि वे 
शल्य-चिकित्सक तथा वनौषधि विशेषज्ञ थे। उन्हें इस कला का व्यवहार प्राप्त था 
और हर प्रकार की वनस्पतियों का उन्हें ज्ञान था। अमुक औषधि तथा फल विषैले 
हैं, उनका प्रयोग या स्पर्श न करना यह निर्देश उन्होंने वानरों को दिये हैं। 
शल्यकर्षण प्रदेश का वर्णन करते हुए उन्होंने यह बताया है कि वहाँ शरीर में 
प्रविष्ट शल्य को निकालने के लिये सहायक औषधि पैदा होती है। महाराज सुग्रीव 
का यह सार्व-भौम ज्ञान उनके चिकित्सक होने का स्पष्ट संकेत करता है। 

रामायण में स्पष्ट है कि उक्त उच्चतम चिकित्सकों के अतिरिक्त रनिवास में 
भी ऐसी महिलाएँ रहा करती थीं, जिन्हें देह के सामान्य परीक्षण का ज्ञान हुआ 
करता था। राजा दशरथ का अवसान हो चुका था, अयोध्या में अन्य कोई 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 85 





राजकुमार नहीं था, ऐसी स्थिति में वहाँ रनिवास की स्त्रियों ने राजा दशरथ की 
शरीर परीक्षा की और उन्हें मृत घाषत किया। राजा में जीवन के कोई चिन्ह 
उन्होंने नहीं देखे ।' उन्होंने फिर देखा--“राजा का शरीर चेष्टा शून्य था, हृदय 
तथा हाथ के मूल भाग में संचालित होने वाली नाड़ी की परीक्षा करके वे कॉँप 
उठीं। उन्होंने समझ लिया कि नृप शांत हो गये /”'" इस प्रकार राज-महल में ऐसी 
ज्ञान-वान स्त्रियों के होने का संकेत भी यथा स्थान प्राप्त होता है। 

उपरोक्त संचित प्रसंगों से यह स्पष्ट है कि वाल्मीकीय रामायण काल में वैद्यों 
की सामाजिक तथा राजकीय स्थिति पूर्णतः सम्माननीय तथा उन्‍नत थी और वे भी 
अपने दायित्व को भली प्रकार से निभाते रहते थे। 

“वैद्य! और “'भिषक्‌” शब्दों की व्याख्या 
वैद्य 

वविद्या अस्ति अस्य-विद्या + अणु” यह “वैद्य शब्द की व्युत्पत्ति है।' 

“वैद्य की आयुर्वेद के विविध संहिताकारों ने पृथक्‌-पृथक्‌ व्याख्या एवं गुण 
बताये हैं यथा-अष्टांग संग्रह के अनुसार-“रोग के कारण, रोग के लक्षण, रोग की 
चिकित्सा, रोग की पुनः उत्पति न हो, इन चार का जिसे ज्ञान हो, वह राजा के 
योग्य चिकित्सक है।”” 
चरक संहिता के अनुसार 

“शास्त्र को अच्छी तरह से जानने वाला, दूरदर्शी, क्रिया में कुशल, शुद्धता यह 
वैद्य के चार गुण हैं।? 
सुश्रुत संहिता के अनुसार 

जो वैद्य शास्त्र और प्रत्यक्ष ज्ञान को भली-भाँति जानता है और साथ-साथ 
मतिमान भी है वही सुचिकित्सा रूपी अर्थ के साधन में समर्थ हो सकता है जैसे 
दोनों पहियों वाला रथ युद्ध में कार्य करने में समर्थ होता है।”* 

इन संहिताओं के आधार पर वैद्य के गुणों को कहा जा सकता है कि “वैद्य 
वही हो सकता है जो विधि-पूर्वक शास्त्रों का ज्ञाता, शुभ-अशुभ का ज्ञाता एवं 
चिकित्सा कार्य में निपुण हो । 
भिषक्‌ 

“बिभेत्यस्मात्‌ रोग: भी + घुक्‌ हस्वाश्च'-यह “भिषक्‌' शब्द की व्युलत्ति है। 

'भिषक्‌' शब्द की भी आयुर्वेद में बहुत से संहिता ग्रन्थों में भिन्‍न-भिन्‍न 
परिभाषा एवं गुण बताये गये हैं यथा-अष्टांगसंग्रह के अनुसार “अभेद्य/ (अपने 
प्रतिवादी धूर्त आदि को भेद न दे अर्थात्‌ जिसका कोई भेद न पा सके), अनुद्धतः 
(गम्भीर), स्तब्ध (चिरकारी-सोच-विचार कर कार्य करने वाला), ज्ञात-ग्रन्थः (शास्त्र 
को जानने वाला), अर्थ-शास्त्रवित्‌ (शास्त्र के कर्म को जानता हो), शास्त्रर्थज्ञ 
(चिकित्सतज्ञ), अनाथान रोगिणो (निरुपाय रोगियों को), पुत्र के समान सम्यक्‌ 
उपचार करता हो, गुरु ने जिसको चिकित्सा कार्य करने की आज्ञा दे दी हो वह 

86 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


“भिषक्‌' शब्द को प्राप्त करता है।* 

चरक संहिता के अनुसार-“जिस वैद्य ने शास्त्र और उसके मर्म को समझा 
हो, औषध और औषध के प्रयोग को जाना हो तथा चिकित्सा कर्म को अच्छी तरह 
से देख लिया हो वह गुण चतुष्ट्य युक्त भिषक्‌ प्राणों को देने वाला कहा जाता 
है 23 
रामायण में वैद्य शब्द का प्रयोग 

रामायण में ही चिकित्सक के लिये संभवत: “वैद्य” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 
किया गया है। इसके पूर्व संपूर्ण वैदिक साहित्य अथवा वेदों में चिकित्सक के लिये 
भिषक्‌ शब्द का प्रयोग हुआ है। कहा गया है-“निशाचर ! जो ज्येष्ठ होने के 
कारण राज्य पाकर सबयमें प्रधान हो गया हो, राज्य कार्य को अच्छी तरह चला रहा 
हो और विद्वान (वैद्य), धर्मशील तथा शूरवीर हो उसे भी कूटुम्बी जन अपमानित 
करते हैं तथा अवसर पाकर उसे नीचा दिखाने की भी चेष्टा करते हैं 7० 

वाल्मीकि रामायण में सभी प्रकार के चिकित्सकों का उल्लेख प्राप्त होता है। 
इसमें युद्ध चिकित्सक का विशेष महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। युद्ध चिकित्सकों 
का स्थान युद्ध के समय महत्त्वपूर्ण होता है, जिस सेना के साथ युद्ध चिकित्सक 
न हों, कहना चाहिये कि वह सेना युद्ध करने के योग्य नहीं रह सकती। रामायण 
में भी कुछ ऐसे व्यक्ति थे जो योद्धा होने के साथ-साथ युद्ध चिकित्सक भी थे। 
क्षत्राणी होने के नाते माता 'कौशल्या' को भी ज्ञान था कि युद्ध में या आकस्मिक 
आधघात के पश्चात्‌ कौन सी दिव्य औषधि उपादेय होती है। संभव है यह ज्ञान उन्हें 
राजा दशरथ के द्वारा या राजकीय अन्य सफल चिकित्सकों के द्वारा ही प्राप्त हुआ 
हो। अपने पुत्र श्री राम के वन गमन के समय उन्होंने उनके लिये हृदय से मंगल 
कामना व्यक्त की। उस विशाल लोचना माता ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत, चंदन 
एवं रोली लगायी तथा सिद्ध करने वाली विशल्य-करणी नामक शुभ औषधि लेकर 
अपने पुत्र की रक्षा के उद्देश्य से मंत्र पढ़ते हुए उसको श्री राम के हाथ में बाँध 
दिया ।” फिर उसके गुणों में उत्कर्ष लाने के लिये मंत्र का जप भी किया ।* 

मुनि विश्वामित्र ने भी राम को बला तथा अतिबला नाम के प्रसिद्ध मंत्र 
प्रदान किये ।* ये मंत्र भी राम को श्रम ज्वर तथा रूप विक्ृति आदि से बचाने 
वाला बताया गया है। 

श्री राम स्वयं भी अनेक सिद्ध औषधियों से परिचित थे। उन्हें भी यह 
जानकारी संभव है, मुनि अगस्त्य के आश्रम पर पहुँचकर श्री राम ने नई कुटी 
बनाने की आज्ञा देते हुए अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा-“सुमित्रा कुमार! हम 
गज-कंद का गूदा लेकर उसी से पर्णशाला के अधिष्ठाता देव की पूजा करेंगे। छोटे 
भाई ने वैसा ही किया। श्री राम ने पुनः उसे पकाने के लिये कहा” लक्ष्मण ने 
उसे पकाया। रक्त-विकार का नाश करने वाले गजकंद को भली-भाँति पका 
जानकर लक्ष्मण ने कहा-यह काले छिलकों वाला गज-कंद जो बिगड़े हुए सभी 

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 87 


अंगों को टीक करने वाला है, मेरे द्वारा पका दिया गया ।” इससे स्पष्ट है कि 
लक्ष्मण: भी कुशल चिकित्सक थे। 

इसके अतिरिक्त वानरराज सुषेण, क्रक्षराज जाम्वान, हनुमान आदि सभी 
कुशल चिकित्सक थे। 

रामायण में विष-चिकित्सक गरुड़ का भी उल्लेख प्राप्त होता है, एक प्रसंग 
दृष्टव्य है 'महान चिकित्सक गरुड़ द्वारा स्पर्श होते ही श्री राम तथा लक्ष्मण के घाव 
भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कांति युक्त हो गये /* उनमें तेज, 
बल, उत्साह, वीर्य, ओज, दृष्टि शक्ति, बुद्धि एवं स्मरण-शक्ति आदि महान गुण 
पहले से भी द्विगणित हो गये।* 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 'वैद्य' शब्द 
का ही उल्लेख अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है तथा सभी प्रकार के चिकित्सकों का 
वर्णन भी इसमें यत्र-तत्र विविध संदभों में प्राप्त होता है। 

संस्कृत साहित्य की विशाल राशि को एक स्थल पर प्रस्तुत करना तथा 
रामायण का सामान्य परिचय यथा रामायण उपजीव्य काव्य है, रामायण आदि 
काव्य है, रामायण के विविध संस्करण, आकार, विषयवस्तु, उत्पत्ति, प्रक्षिप्तांश, 
रचनाकाल, रामायण का महाकाव्यत्व, रामायणकालीन समाज एवं संस्कृति, व्याख्याएँ 
एवं शोध-कार्य में प्रयुक्त संस्करणों आदि का संक्षेप में परिचय देना, एवं साहित्यिक 
ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्त्व एवं विविध शोध-कार्यों में उनका प्रयोग, 
इसके अतिरिक्त आयुर्वेद का सामान्य परिचय देना, आयुर्वेद के साहित्य विभाजन 
का परिचय तथा रामायण काल में उपलब्ध आयुर्वेदिक साहित्य का संक्षिप्त परिचय 
देना ही परिवर्त का मुख्य विषय है। 


संदर्भ- 
. अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः 
वाचें चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ।। सु. 30/7 

2. संस्कृत साहित्य का वृहत्‌ इतिहास (डा. राजवंश सहाय हीरा) पृ. ठ सं. 5 
3. वही पृ. सं. 6 
4. भारतीय संस्कृति-पृ. 40 
5. अर. 605 
6. कि६. 37/4 
7. अयो. 50/33 
8. अर. 49/36 
9. बा. 2/2 

0. बा. 2/]2 

॥]. बा. 2/2 
88 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


2. अर. 49/36 
5. न ताः स्म प्रतिगृहणन्ति सर्वे ते देवदानवाः। 
अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणाः स्मृता:।। बा. 45/35 
4. चतुर्णामाश्रमाणां हि गाह॑स्थ्य॑ श्रेष्ठमुत्तममू । 
आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथ॑ त्यक्तुमिच्छसि ।। अयो. 06/22।। 
-5. दीयमानं तु तदा प्रतिजग्राह राघवः। 
अविज्ञाय पितुश्ठन्दमयोध्याधिपतेः प्रभोः।॥ अयो. 8/5 ।। 
46. प्रतिगृह्मतु तां पूजां वसिष्ठाद्‌ राजसत्तमः। 
तपोड॑ग्निहोत्रशिष्येषु कुशल॑ पर्यपृच्छत्‌ ।। बा. 52/4।। 
7. शन्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदनू। 
तावुभौ च समालिंगय रामीः्प्यश्रूण्यवर्तयत्‌ ।। अयो. 99/40 
8. विनद्यसमुहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः। 
निर्घोषोपरंत तात मन्‍्ये राजनिवेशनम्‌ ।। अयो. 5/3॥। 
9. इमां च दुःस्वप्न गतिं निशम्य हि, त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा। 
भयं महत्त हृदयान्न याति मे विचिन्त्य राजानमचिन्त्यंदर्शनम्‌ ।। अयो. 69/2] ।। 
20. वाष्योमैरेयपूर्णाश्चमृष्टमांसच्यरवृता: 
प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूर कौक्कुटैः ।। अयो. 9/70।। 
- इत्येव॑ रममाणानां देवनामिव ननन्‍्दने। 
भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिव्यव्यवर्तत ।। अयो. 9/8 ।। 
22. अनुशिष्टोउस्भ्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना। 
पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्चः।। बा. 26/3।। 
23. (अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः। 
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ।। सु. 30/7॥ 
24. अथ वर्ष सहश्रेण आयुर्वेदमयः पुमान्‌ - बा. 45/3-32 
उदृतिष्ठत्‌ सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु: ।। 
पूर्व धन्वन्तरिनाम अप्सराश्च सुवर्चसं ।। बा. 45/32 
शशिप्रकाश वंदना वरकुण्डल भूषणा:। 
अम्लानमाल्याभरणा ददर्श हरियूथपः ।। स. 0/3 ।। 
26. तस्यायुषो पुण्यतमो वेदों वेदविदां मतः। 
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम्‌ ।। च.स. /48 |। 
27. क. इह खल्वायुर्वेदमष्टाइ्नमुपाज्मथर्ववेदस्य । सु.सू., /6॥ 
ख. भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णा...... मात्मनोष्थर्ववेदे भक्तिरादेश्या। च.सू. 30/2॥ ।। 
ग. क॑ वेदं श्रयति, अथर्ववेदमित्याह। (का.वि. /) 
घ. आयुषः पालन वेदमुपवेदमथर्वण: (अष्टांग संग्रह) 
28. ......एवमेव खुल वेदनासु......आयुर्वेदमेवानुधावन्ति, तस्माद्‌ ब्रूमः- 
विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 89 


श 


25. 


छँ 


ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामाथर्ववेदेभ्यः पञ्‌चमोज्यमायुर्वेदः । (का.वि.) 
29. ऋग्यजुः सामाथववख्यानू दृष्ट्वा वेदान्‌ प्रजापतिः। विचिन्त्य तेषामर्थ च आयुर्वेद चकार 
सः।। कृत्वा तु पंचम वेदं भास्कराय ददौ पुनः।। (ब्रह्म वैवर्त /6/9-0) 
30. (अथातो वेदोत्पत्ति मध्याय॑ व्याख्यास्याम:। (सु.स. /) 
3. (सु. सू. /6) 
32. सु. सू. ॥/7 
33. काय चिकित्सा नाम सर्वाक्‍्सश्रितानां व्याधीनां ज्वर-रक्त-पित्त-शोषोन्मादापस्मार 
कुष्ठातिसारादीनामुपशमनार्थम्‌ सु.सू. ]/3 
34. सु. सूं. /8-2॥ 
35. सु.सू, /8/ 
36. बा. 49/6-0 
37. लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्‌। च.चि. /व 
38. रसायनतन्त्रं नाम वयः स्थापनमायुर्मेधावलकरं रोगापहरण समर्थ च। सु.सू. 
39. अस्य प्रयोगाच्व्यवनः सुवृद्धोउ्भूत्‌ पुनर्युवा। अ.स.उ. 59 
40. “वाजीकंरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीण विशुष्करेतसाम्‌ आप्यायन ,प्रसादो पचयजनननिमित्तं 
प्रहर्षजननार्थम्‌ । सु.सू..” 
वाजीवातिबलो येन याप्यप्रतिहतो स्त्रियः । 
भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां वाजीकरणमेव तत्‌।। 
येन नारीषु सामर्थ्य वाजिवल्लभते नरः। 
ब्रजेच्चाभ्यधिक॑ येन वाजीकरणमेवतत्‌ ।। च. थि. 2 
4. वाी6 एक 0ए७ ५४४५ ९४४७॥5॥20 वा 898 गा )२९७ १०7 ७9५ शाला- 
छछा5 ०06 ग्रास्वांटब] छाणिड्आंणा ग्राक्चिर्ज॑2त ॥ लग, का 0व0 #ञा5- 
णांस्बे 459०९5 0ाल्तालार, 5 ८8०१ शीलः (श्र, बण07 0 0665॥ 
छतक्‍ाला(। ज़ाद व वातव॑शा प्राश्वीथा।8.-8.2.7.. #+, 905 (आयुर्वेद का 
वैज्ञानिक इतिहास-प्रियव्रत शर्मा-?.)५. 737) 
42. च. सू. /33 
43. सिद्धि. अ.। 
44. ऋषि प्रणीते प्रीतिश्चेन्‌ मुक्‍्त्वा चरक सुश्रुती। भेलाधाः कि न पठयन्ते तस्मादू ग्राह्मं 
सुभाषितम्‌ ।।-अ. ह. उ. 40/88 ।। 
45. हरिश्चन्द्रकृतां व्याख्यां विना चरक संमतम्‌। 
यस्तनोत्यकृत प्रज्ञः पातुमिच्छति सोडम्बुधिम्‌ ॥॥ (चन्द्रट) 
46. इसकी पाण्डुलिपि राजकीय प्राच्य हस्तलिखित ग्रन्थागार मद्रास में है ।(नं.डी. 309 


90 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


47. 


48. 
49. 


50. 
(3 मे 
52. 
53. 


54. 


री 


55. 


5 
5' 


£<] 


62. 


63. 
« 'अवपतन्तीरवदन्‌ दिव ओषधयस्परि। 


65. 


झ् 


मुनिं हरिश्वन्द्रमृषिं विपश्चिताम्‌ प्रकाशितार्थ कथन चकार यः। तस्यादूभुतार्था श्रुतिमप्रमादतः 
परीक्ष्य कुर्मश्चरकस्य पड्जिकाम्‌ ।। (सभी संदर्भ आयु. का वैज्ञा.इ.-प्रियव्रतशर्मा-पे. 
नं. 224) 

च. चि. /4/44 

“चरित्र हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्‌। 

स॒द्यो जंघामायसी विष्पलायै धनेहि ते सर््तवि प्रत्यधत्तम्‌ ।। (ऋ, /76/5)' 

ऋ. 7/6/6 

ऋ. 7८775 

“ओषधी रीति मातरस्तद्धो देवीरूपब्रुवे / ऋ. 0/97/4 

या ओषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा। 

मनै नु बभूणामहं शर्त धामानि सप्त च।। ऋ. 0/97/ 

ओषधीरिति मातरस्तद्धो देवीरूपब्रुवे। 

सनेयमश्वं गां वास आत्मानं तव पुरुषे।। ऋ. 0/97/4, 

ओषधय:ः संवदन्ते सोमेन सह राजा। 

यस्मै कृणोति ब्राहमणस्त राजन्‌ पारयामसि।। ऋ. 0/9/22) 

“यदिमा बाजयन्नहमोषधीर्हस्तं आदघे। 

आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीव गृभो यथा ।। ऋ. 0/97/0! 

अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां चुबुकादधि। 

यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिहाया विवृहामिते ।। ऋ. 0/64/, 

ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्याजत्‌। 

यक्ष्मं दोषाण्य मंसाभ्यां बाहुभ्यां विवृह्ठमिते।। ऋ. ./64/2, 

अज्जे-अड्ढे लोम्नि-लोम्नि यस्ते पर्वणि पर्वणि। 

यक्ष्मं त्वचस्यं तव य॑ कश्यपस्य विवर्हेण विष्वंज्व विवृहमसि ।। 

ऊरुभ्यां ते अष्ठीवदुभ्यां पाष्यिभ्यां प्रपदाभ्याम्‌। 

यक्ष्मं भसघं श्रोणिभ्यां भासद॑ भंससो विवृहामि ते।। अथर्वेद 2/33/5 रु 
(सभी संदर्भ आ. का बृ.इ. -अत्रिदेव विद्यालंकार-पेज नं. 2-25 से साभार 

ऋ., ]0/37/6 


. ऋ. 0/62/-4 
58. 
59. 
60. 
6. 


ऋ., २/33/, 4/5/ 
ऋ. 0/37/2 

ऋ. 0/37/7 

अर्थर्व, 30/ 

वा.सं. 2/75-79, 89, 95 
यजु. 2/88 


यं जीवमश्नवामहै न स रिष्यति पुरुष: ।। यजु. 2/97 
यज. 46/5 


विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ४ 9] 


66. अथः वर्ष सहस्नेण आयुर्वेदमयः पुमान्‌ ।। 
उदृतिष्ठतू सुधर्मात्मा सदण्ड:ः सकमण्डलुः । 
"पूर्व धन्‍्वन्तरिनाम अपस्राश्च सुवर्चसः।। बा. 45/3, 32।। 
67. सन्ति मे कुशला वैद्या स्त्वत्वभितुष्टाश्च सर्वशः। 
सुखिनां त्वां करिष्यन्ति व्याधियाचस्व भामिनी ।। अयो. 0/30॥। 
68. कश्चिद्‌ देवान्‌ पितृन्‌ भृत्यान्‌ गुरुन्‌ पितृसमानपि। 
वृद्धांश्व तात वैद्यांश्च ब्राह्मणश्चापि मन्‍य से ।। अयो. 00/3। 
69. कश्चिद्‌ वृद्धाश्व बालकाश्च वैद्यान्‌ मुखाश्च राघवः। 
दानेन मनसा वाचात्रिभिरेतै बुभूषसे ।। अयो. 00/60 
70. अथाप्युचितवत्रास्ता विनयेन नयेन च। 
नाह्यस्य शयन स्पृष्ट्वा किचिदप्युपलेभिरे ।। अयो. 65/3 |। 
पर. ता: स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्वेष्टां संचलनादिषु। 
ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शडकिता:। अयो. 65/4 ।। 
'. हेतौ लिंगे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे ।। 
ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजाहों भिषक्तमः।। अ.सं.सू. 2/2.5 ।। 
73. श्रुतेपर्य्यवदातृत्वंबहुशोदृष्ट कर्मता । 
दाक्ष्यंशीचमितिज्ञे यंवैद्ये गुणचतुष्टयम्‌ ।। च.सं.सू. 9/4॥। 
74. यस्तूभयज्ञों मतिमान्‌ स समर्थोज्र्थताधने। 
आहवे कर्म निर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनों यथा।। सु.सं.सू. 3/53 ।। 
75. अभेद्योष्नुद्धतः स्तब्धः सूनृतः प्रियदर्शनः ।। 
बहुश्रुतः कालवेदी ज्ञात ग्रन्थोषर्थ शास्त्रवित्‌। अनाथान्‌ रोगिणोयश्च पुत्रवत्समुपाचरेत्‌ ।। 
गुरुणा समनुज्ञातः स भिषक्‌शब्दमश्नुते। अ.सं.सू. 2४8, 9 
76. तस्माच्छास्त्रेरर्थ विज्ञाने प्रवृत्त कर्म-दर्शने। भिषक्‌ चतुष्टयेयुक्त: प्राणाभिसर उच्यते ।। 
च.सं.सू, 9/6॥। 
77. प्रधानं साधक वैद्यं धर्मशीलं च राक्षसः। 
ज्ञातयो हामन्यन्ते शूरं परिभवन्ति च।। युद्ध, 6/4 
78. अयो. 25/37 
79. अयो. 25/38 
80. (बा, 22/5,5) 
8. अयो. 56/22, 25, 24, 25, 26, 27 
82. अयं सर्वः समस्ताडः श्रृतः कृष्णमृगो मया। 
देवता देव संकाश यजस्व कुशलो ह्यासि।। अयो. 56/28 ) 
83. वैनतेयेन संस्पृष्टास्तयो: संरुरुहुर्ब्रणा: । 
सुवर्णे च तनू स्निग्धे तयोराशु बभूवतुः।। यु. 50/39।। 
84. तेजो वीर्य बलंचौज उत्साहश्च महागुणाः। 
प्रदर्शन॑ च बुद्धिश्च स्मृतिश्व द्विगुणा तयोः।। यु. 50/40 ॥॥ 


92 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


7 


[] 


द्वित्तीय परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण 


प्रथम परिच्छेद 
आयु और उसका आधार 

जिससे आयु का लाभ और ज्ञान हो, जिसमें आयु है तथा जहाँ आयु के विषय 
में पूर्ण रूप से ज्ञान एवं विचार किया जाता है वह शास्त्र आयुर्वेद कहलाता है। 
आयुर्वेद शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-“आयु' एवं “वेद” | आयु का साधारण 
अर्थ जीवन का व्यतीत काल, सम्पूर्ण जीवन काल, वय, उम्र आदि है, पर आयुर्वेद 
में इस शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थ में किया गया है। इसके अनुसार शरीर का 
ग्राणों के साथ “अदृष्टजन्य संयोग” को “आयु” कहते हैं। प्राण बारह हैं-त्रिदोष, 
त्रिगुण, पाँच इन्द्रियाँ और आत्मा। जब तक इन चारों का संयोग बना रहता है 
आयु स्थिर रहती है। इनके पृथक होते ही आयु समाप्त हो जाती है। 

प्रभाव भेद से आयु को चार प्रकार का माना गया है-सुखायु, दुःखायु, हितायु 
और अहितायु।' 

भौतिक दृष्टि से मानव जीवन का चरम लक्ष्य सुख भोग है। सुख भोग दो 
प्रधान तत्वों पर निर्भर है-सुख भोग सकने की शक्ति अथवा सामर्थ्य तथा सुख 
भोग के साधन। जो इन दोनों से युक्त है उसी की आयु को 'सुखायु' कहते हैं। 
जिसमें इन दोनों में से एक का अभाव है उसकी आयु को <दुःखायु” कहते हैं। 
सामर्थ्य के अभाव में साधन व्यर्थ हैं और साधनों के अभाव में सामर्थ्य पंगु है। 
चरक के शब्दों में, “जो मनुष्य शारीरिक तथा मानसिक रोगों से आक्रान्त नहीं है, 
विशेष रूप से युवा है, प्रत्येक कार्य करने में समर्थ है, बल, वीर्य, यश और पुरुषार्थ 
से युक्त तथा पराक्रमशील है, ज्ञान विज्ञान और इन्द्रियों के बल के समुदाय से 
युक्त है, अधिक सम्पतिशाली है और अनेकानेक प्रकार की सुंदर भोग-सामग्रियों 
से युक्त है, जिस काम को भी चाहे आरम्भ कर सकता है, जहाँ भी चाहे विचर 
सकता है, उसकी आयु को सुखायु कहते हैं। इसके विपरीत मनुष्यों की आयु को 
असुखायु या दुःखायु कहते हैं॥”* 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 93 


व्यष्टि का सुख समष्टि के सुख पर आधारित है। व्यक्ति को अपने सुख के 
साथ-साथ दूसरों के सुख का भी ध्यान रखना पड़ता है। स्वास्थ्य और साधन दोनों 
के रहते हुए अथवा उनमें कुछ कमी होते हुए भी जो व्यक्ति अपने सदृगुणों एवं 
विवेक के द्वारा उनकी पूर्ति कर सदूबृति-पालन में लगा रहता है, स्वयं अपने और 
लोककल्याण में तत्पर रहता है उसकी आयु को “हितायु” कहते हैं। इसके विपरीत 
जो स्वयं अपने और लोक के लिये अभिशाप स्वरूप हो, अन्याय, अविवेक, 
अत्याचार, दुराचार, क्रूरता, लाभ, पाखण्ड आदि कर्मों में लगा रहता है उसकी 
आयु को “अहितायु' कहते हैं। चरक के शब्दों में, “प्राणियों की भलाई चाहने 
वाले, दूसरों के धन की इच्छा न रखने वाले, सत्यवादी, शांति-प्रेमी, विचार-पूर्वक 
काम करने बाले, अप्रमत्त, धर्म-अर्थ तथा काम इन तीनों ही वर्गों को इस प्रकार 
सम्पन्न करने वाले, जिससे इनमें से कोई भी एक-दूसरे के दिगे बाधक न बन 
सके, पूज्यों की पूजा करने वाले, ज्ञानशील, विज्ञानशील, शांतिशील, वृद्धों की सेवा 
करने वाले, राग-द्वेष, ईर्ष्या, मद, मान के वेगों को सुनियन्त्रित रखने वाले, सतत्‌ 
विविध प्रकार के दान में तत्पर, नित्य तपस्या, ज्ञान और शांति कर्मों में संलग्न, 
अध्यात्म के ज्ञाता और उसी के अनुरूप आचरण करने वाले, लोक-परलोक दोनों 
का ध्यान रखने वाले, स्मृति और बुद्धि से युक्त पुरुषों की आयु को हितायु और 
इसके विपरीत पुरुषों की आयु को “अहितायु' कहा जाता है।”* 

पुनः प्रमाणभेद से आयु को तीन प्रकार का माना गया है-दीर्घायु, अल्पायु 
तथा मध्यायु। 

शरीर, इन्द्रियाँ, मन, आत्मा इनके संयोग को “आयु! कहते हैं। उसी को 
“धारी', जीवित, नित्यण और अनुबंध भी कहते हैं। यह आयु के पर्यायवाचक शब्द 
हैं।' 

अर्थात्‌ पंच भौतिक शरीर, चक्षुरादि इन्द्रियाँ, मन और आत्मा इनका संयोग 
जिस किसी पुरुष का जितने समय तक रहता है, उतने समय तक उस पुरुष की 
आयु होती है अतः शरीरेन्द्रियसत्वात्म संयोग ही आयु है। 

सत्व, आत्मा, शरीर तथा इन्द्रियों के परस्पर संयोग को धारण करने से धारि, 
प्राणों को जीवित रखने से जीवित, नित्य प्रतिक्षण गमन-शील होने से नित्यग और 
अपरापर शरीर संयोग रूप अनुबंध से आयु को अनुबंध कहा गया है। महर्षि 
अग्निवेश ने पुनः आयु के विषय में कहा है- 

“आयु चेतनानुवृत्ति (गर्भ से मरण पर्यन्त चेतना का रहना) जीवित, अनुबंध, 
धारि-का एक ही अर्थ है अर्थात्‌ यह सब आयु के पर्याय हैं।* 

“वेद” विद्‌ धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। 
व्यापक अर्थ में वेद से हमारा तात्पर्य किसी भी वस्तु के सच्चे तथा वास्तविक ज्ञान 
से है। 

अतः आयुर्वेद से हमारा तात्पर्य उस शास्त्र अथवा ज्ञान की उस शाखा से है 

94 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जो हमें आयु का सच्चा और वास्तविक ज्ञान प्रदान करे। हिन्दी विश्व कोश के 
अनुसार जिस शास्त्र में आयु के स्वरूप, आयु के विविध भेद, आयु के लिये हित 
कारक एवं अहित कारक आहार, आचार, चेष्टा आदि विषयों का आयु के प्रमाण 
तथा अप्रमाण तथा उनके ज्ञान के साधनों का एवं आयु के उपादान भूत शरीर, 
इन्द्रिय, मन और आत्मा इनमें से सभी अथवा किसी एक के विकास के साथ हित, 
सुख और दीर्घायु की प्राप्ति के साधनों तथा इनके बाधक विषयों के निराकरण के 
उपायों का विवेचन हो उसे ही आयुर्वेद कहते हैं ।* 

वाल्मीकि रामायण एक आयुर्वेदीय ग्रन्थ नहीं है लेकिन फिर भी इसमें 
आयुर्वेदीय सामग्री का भण्डार है। 'आयु' का उल्लेख भी इसमें अनेक स्थानों पर 
विविध सन्दभों में विविध पात्रों के द्वारा कराया गया है। यथा रामायण महाकाव्य 
की महिमा बताते हुए इसी काव्य में कहा गया है कि यह काव्य आयु एवं पुष्टि 
प्रदान करने वाला है।” जो इसका पाठ करता है उसकी आयु की वृद्धि होती है।* 
एक अन्य स्थल पर कहा गया है, दिन-रात बीत रहे हैं और प्राणियों की आयु का 
तीव्र गति से नाश कर रहे हैं । ऋतु-परिवर्तन को आयु का नाश करने वाला बताते 
हुए यह भी कहा गया है, किसी ऋतु का प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी 
हो, ऐसा समझकर लोग हर्ष से खिल उठते हैं, परन्तु यह नहीं जानते कि इन 
ऋतुओं के परिवर्तन से प्राणियों के प्राणों (आयु) का क्रमशः क्षय हो रहा है॥९ 

आयु नष्ट होंने का लक्षण बताते हुए रामायण में कहा गया है-युद्ध के लिये 
उद्यत होने पर जिनका मुख प्रभाहीन हो जाता है उनकी आयु नष्ट हो जाती है।" 

रामायण की महिमा का उल्लेख करते हुए पुनः कहा गया है, रामायण धर्म, 
यश तथा आयु की वृद्धि करने वाला है।' .......... जो इसका पूजन करता है वह 
बड़ी आयु पाता है।.............'* यह काव्य आयु, आरोग्य, यश तथा श्रातृप्रेम को 
बढ़ाने वाला है।* वायु ही जगत की आयु है कहकर वायु के महत्त्व को भी 
प्रतिपादित किया गया है।” 

इस प्रकार उपरोक्त संदर्ों पर दृष्टि-पात करने से ज्ञात होता है कि महर्षि वाल्मीकि 
ने अपने आदि काव्य रामायण में आयु का अनेक स्थलों पर उल्लेख किया है। 
2. आत्मतत्व 

मन, आत्मा और शरीर ये तीनों त्रिदण्ड के समान जीवन के आधार स्तम्भ हैं। 
इन तीनों के संयोग से इस लोक की स्थिति है और इस लोक में ही सब कुछ 
प्रतिष्ठित है। 

साधारणतः मन अथवा अन्तःकरण से परे उसके व्यापारों का ज्ञान कराने 
वाली सता को आत्मा कहते हैं। आत्मा ही ज्ञाता, कर्ता और भोक्‍्ता है। शरीर, मन 
और इन्द्रियाँ उसके साधन हैं। 

आत्मा के सम्बन्ध में लोगों के भिन्‍न-भिन्‍न मत हैं। उनमें से कई मत एक 
दूसरे के विरोधी भी हैं। इस विरोध तथा मत वैभिन्‍्य के होते हुए भी इतना तो 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 95 


सभी स्वीकार करते हैं कि आत्मा चेतन है। इस चेतना को वे चाहे आत्मा का 
गुण-धर्म मानें या स्वभाव। 

चरक के अनुसार आत्मा की सत्ता को न स्वीकार करने से अहंकार, फल, 
देहान्तरगति तथा पूर्व जन्मों की स्मृति आदि की कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं 
की जा सकती | भौतिकवादी विचार-धारा से प्रसूत आधुनिक मनो-विज्ञान में मन 
को ही कर्ता मानकर इन सारी चीजों की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है, पर उनकी 
सभी व्याख्याएँ संतोषजनक होती हों ऐसा नहीं कहा जा सकता। विशेषकर 
परामनोवैज्ञानिक (28975/०४००४५) की खोजों को लेकर जो तथ्य सामने आ 
रहे हैं उनसे आधुनिक मनोविज्ञान की मान्यताओं का अनेक स्थलों पर सामंजस्य 
नहीं होता। मनोविज्ञान में मन को करण के रूप में स्वीकार कर लेने से उसके 
पृथक किसी अन्य सत्ता को कर्ता के रूप में स्वीकार करना आवश्यक हो जाता 
है। 

आयुर्वेद ने भी आत्मा की सत्ता स्वीकार की है। चरक के अनुसार-सत्व 
आत्मा और शरीर ये तीनों तीन दण्डों के समान हैं। लोक इन्हीं के संयोग से खड़ा 
है। सब कुछ इसी में प्रतिष्ठित है।? 

आयुर्वेद ने भी आत्मतत्व निरूपण में मूलतः सांख्य और वैशेषिक को अपना 
आधार बनाया है, पर चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से उसने जहाँ तहाँ कठिनाइयों का 
अनुभव किया वहाँ या तो अन्य दर्शनों से या फिर स्वयं अपनी मान्यताएँ स्थापित की हैं। 

शरीर जड़ पदार्थ है। इसका सम्बन्ध मन के द्वारा जब आत्मा से होता है तब 
जीवन के लक्षण प्रकट होते हैं। इसलिये शरीर निर्माण की छः धातुओं में आत्मा 
को ही प्रमुख माना गया है।* क्योंकि शरीर से आत्मा के चले जाने पर यह शरीर 
गृह-पति विहीन गृह के समान शून्य और जड़ रह जाता है।” 

आत्मा की जो कुछ क्रिया हम शरीर में मानते हैं वह मन के माध्यम से होती 
है। आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और इन्द्रियों का अपने विषयों से जब 
संयोग होकर वह श्रृंखला पूर्ण होती है तब ज्ञान की अभिव्यक्ति होती है तथा 
शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। अतः जीवन के लक्षण आत्मा, 
मन और शरीर के संयोग पर आश्रित हैं। 
आत्मा का स्वरूप 

श्रीमद्‌ भगवद्‌गीता में आत्मा का स्वरूप बताते हुए कहा गया है, “इन्द्रियों को 
पर (सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ) कहते हैं, इन्द्रियों से पर 'मन” है, और मन से पर 'बुद्धि! है, 
और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह “आत्मा! है ९ 

आत्मा का अस्तित्व निर्विवाद है। इस विषय में सब दर्शन एक मत हैं, परन्तु 
आत्मा के स्वरूप के विषय में विभिन्‍न मत हैं। चार्वाक्‌ स्थूल शरीर' को आत्मा 
मानता है। बौद्ध आत्मा को “विज्ञान का प्रवाह” मात्र मानते हैं। न्याय, वैशेषिक 
एवं मीमांसक आत्मा को अचेतन मानते हुए इसे विशेष अवस्थाओं में चैतन्य का 
आधार बताते हैं। 


96 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सांख्य के अनुसार आत्मा का स्वरूप 
सांख्य दर्शन में आत्मा को पुरुष की संज्ञा दी गयी है उसके अनुसार पुरुष की 
निम्न विशेषताएँ हैं-- तो 
. पुरुष प्रकृति तथा उसके विकारों से नितान्त भिन्‍न अपनी पृथक्‌ सत्ता 
रखता है। 
2. पुरुष सुख-दुःखादि गुणों से परे तथा त्रिगुणातीत है। 
3. पुरुष शुद्ध वेतन है। 
4. पुरुष निष्क्रिय है। उसकी क्रियाशीलता प्रकृति के सानिध्य का ही परिणाम है। 
5. पुरुष अनादि एवं अनन्त है। है 
6. पुरुष विभु अर्थात्‌ सर्वव्यापी तथा एक रस रहने वाला अर्थात्‌ अपरिणामी है 
तथा 
7. पुरुष अनेक हैं। 
वैशेषिक के अनुसार आत्मा का स्वरूप 
वैशेषिक दर्शन में आत्मा की निम्न विशेषताएँ बतलायी गयी हैं- 
. आत्मा शरीर, इन्द्रिय और मन से प्रथक्‌ अपनी सत्ता रखता है। 
2. आत्मा नित्य एवं सर्वव्यापी (विभु) द्रव्य है। 
3. आत्मा चेतना का आधार है। 
4. बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, धर्माधर्म, प्रयत्न, संस्कार आदि गुण इसी में 
निवास करते हैं तथा 
5. आत्मा के दो रूप हैं-जीवात्मा, परमात्मा। परमात्मा अथवा ईश्वर एक है। 
जीवात्माएँ अनेक हैं। भिन्‍न-भिन्‍न शरीर में भिन्न-भिन्न जीवात्माएँ रहती हैं। 
इनका ज्ञान मानस प्रत्यक्ष द्वारा होता है। 
आयुर्वेद में आत्मा का स्वरूप 
आयुर्वेद में सभी संडिताकारों ने आत्मा को समान महत्व नहीं दिया है। चरक 
ने आत्मा का विशद्‌ विवेचन किया है। सुश्रुत ने संक्षेप में ही उसका उल्लेख किया 
है उनके अनुसार पञ्चमहाभूत ही सब कुछ हैं-भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता 
चिकित्सते ।-सु.शा. -2 
वाग्भट ने सुश्रुत के उक्त कथन का अक्षरशः पालन करते हुए अपने ग्रन्थों 
में ईश्वर, अव्यक्त, महान, पज्वतनमात्र, अहंकार आदि विषयों का कोई उल्लेख नहीं 
किया है। अन्य संहिताकारों ने किसी न किसी रूप में इन्हीं मतों को ग्रहण किया है। 
चरक के अनुसार आत्मा का स्वरूप 
चरक ने तत्कालीन अन्यान्य आस्तिक दार्शनिक सम्प्रदायों के अनुसार आत्मा 
के दो रूप माने हैं-जीवात्मा और परमात्मा। परमात्मा को उन्होंने नित्य-पुरुष और 
जीवात्मा को राशि-पुरुष, संयोग पुरुष, कर्म-पुरुष आदि नामों से पुकारा है। उनके 
अनुसार परमात्मा नित्य, निर्विकार, अचिन्त्य एवं अव्यक्त है। अनादि परमात्मा का 
कोई प्रभाव नहीं /” उसे चेतना धातु कहा जाता है अर्थात्‌ वह शुद्ध चेतन है। वह 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण. / 97 


ज्ञानी है पर यह ज्ञान भी उसमें तभी उत्पन्न होता है जब वह इन्द्रियों से युक्त 
होता है। यदि इन्द्रियाँ निर्दोष न हों और आत्मा और इन्द्रियों का सानिध्य न हो 
तो ज्ञान की उत्पति नहीं हो सकती। जिस प्रकार गन्दे जल में या. गन्दे शीशे में 
मुँह नहीं देखा जा सकता उसी प्रकार चित्त के विकृत हो जाने पर ज्ञान की उत्पत्ति 
नहीं हो सकती |” 

यही परमात्मतत्व धर्माधर्म तथा कर्म के वशीभूत हो जब शरीर, मन, और 
इन्द्रिय से संयुक्त हो जाता है तो जीवात्मा की संज्ञा प्राप्त करता है। अब यह 
बुद्धि, अहंकार, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, मन, तन्मात्राओं, महाभूतों आदि की राशि से 
युक्त होने के कारण राशि पुरुष होता है।# 

प्रकृति के ये विकार ही करण भी कहलाते हैं। आत्मा इनके संयोग से ही कर्मों 
का संपादन करता है और कर्म फल भोगता है, इसीलिये कर्म-पुरुष कहलाता है । 
यही कर्म पुरुष चेतना का अधिष्ठान है। कर्म, कर्म-फल, ज्ञान, मोह, सुख-दुःख, 
जीवन-मरण आदि इसी में प्रतिष्ठित रहते हैं ।* इसीलिये यह अनित्य है। इसी को 
षड़्धातुज तथा चतुर्विशति धातुज भी कहते हैं। 

चरक ने राशि-पुरुषों की परम्परा को अनन्त माना है। इन्हीं के शब्दों 
में,-*रज एवं तम से संयुक्त पुरुष की बुद्धि, इन्द्रिय, अर्थ एवं मन का संयोग 
अन॑न्तवान है / प्रलयकाल में पुरुष अपने इष्ट भावों से रहित होता है और 
सृष्टि काल में वह पुनः उनसे संयुक्त हो जाता है। इस प्रकार यह परम्परा 
अनन्तकाल तक चलती रहती है।? 

यहाँ पर इस बात की ओर संकेत कर देना भी अनुचित न होगा कि यदि 
चरक के अन्य विवरणों पर भी ध्यान दिया जाये तो हमें ऐसा लगेगा कि उनके 
अनुसार सुख, दुःख, इच्छा द्वेष आदि मन के ही गुण-धर्म हैं। राशि-पुरुष में 
प्रतिष्ठित होते हुए भी वह इनसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। 

कहीं-कहीं पर चरक की उक्तियों में स्पष्ट विरोधाभास प्रतीत होता है। यथा 
एक ओर तो वे परमात्मा को गुणातीत और निर्विकार मानते हैं और दूसरी ओर 
वे कहते हैं-'प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, जीवन, मन की गतियाँ, इन्द्रियान्तर 
संचार, प्रेरण, धारण, स्वप्न में देशान्तर गमन, पंचत्वग्रहण, दक्षिण नेत्र से देखी हुई 
वस्तु को बाएँ नेत्र से भी यह वही है ऐसा ज्ञान होना, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, 
प्रयत्न, चेतना, ध्ृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार ये आत्मा के लिझ्ज हैं। ये लक्षण जीवित 
प्राणियों में ही मिलते हैं, मृतकों *: नहीं। इसीलिये महर्षिगण इन्हें आत्मा का 
लक्षण मानते हैं।* 

इसी प्रकार एक ओर तो वे राशि-पुरुषों की परम्परा को अनन्तवान बतलाते 
हैं और दूसरी ओर यह कहते हैं कि उदय और प्रलय उन्हीं लोगों के लिये है जो 
रज एवं तम से युक्त हैं और जो इनसे ऊपर उठ गये हैं अथवा इनसे रहित हैं 
उनके लिय न उदय है न प्रलय” उनका “वशी आत्मा” का प्रत्यय इस संदर्भ में 
विशेष रूप से द्रष्टव्य है। 


98 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


एक अन्य उदाहरण है-एक ओर तो यह कि आत्मा के शरीर और इन्द्रियों 
के सम्पर्क में आये बिना ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती और दूसरी ओर 
अतीन्द्रिय ज्ञान की सम्भावना की स्वीकृति । यथा, आत्मा जब मन को समाधिस्थ 
कर लेता है तब पर्वत या दीवार से छिपी वस्तु का भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है।* 

वस्तुतः आत्मा दर्शन का विषय है। चिकित्सा शास्त्र एक व्यावहारिक शास्त्र 
है। इसमें आत्मतत्व निरूपण का कोई विशेष उपयोग नहीं है। रोगों के स्वरूप, 
निदान, चिकित्सा आदि के निरूपण में कहीं भी इसकी जरूरत नहीं पड़ती। रोगों 
का अधिष्ठान शरीर और मन ही माने गये हैं आत्मा नहीं। 

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि चरक ने पुरुष के दो रूप माने हैं-नित्य पुरुष 
और अनित्य पुरुष। उनका नित्य पुरुष निर्विकार, अव्यक्त, अचिन्त्य एवं उपाधि 
रहित है। इसके अन्दर सभी कुछ है लेकिन अव्यक्त रूप में। अनित्य पुरुष 
विकारों से युक्त, परिणामी एवं शान्त है। इच्छा, द्वेष, ज्ञान, कर्म, कर्मफल आदि 
इसी में प्रतिष्ठित रहते हैं। वस्तुतः परमात्मा और जीवात्मा को तत्वतः एक मानते 
हुए भी जीवात्मा को परिणामी एवं परिवर्तनशील मानना चरक की सबसे बड़ी 
विशेषता है। 
सुश्रुत के अनुसार आत्मा का स्वरूप 

सुश्रुत ने आत्मा का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा है-“ इसे क्षेत्रज्ञ, वेदयिता, 
स्पृष्टा, प्राता, दृष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष, साक्षी, धाता, वक्‍ता आदि अनेक 
पर्यायवाची नामों से पुकारा जाता है।” उनके अनुसार यह अक्षय, अव्यय तथा 
अचिन्त्य है।” नित्य और अणुरूप है। अति सूक्ष्म, सचेतन और अनुभव ग्राह्म 
है उक्त अक्षय, अव्यय तथा अचिन्त्य आत्मा ही कर्म, प्रारब्ध अथवा दैव के 
वशीभूत हो तिर्यक्‌ योनि, मनुष्य योनि और देव य्रोनियों में भ्रमण करता है। 

सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, बुद्धि, मनः, संकल्प, विचारण, 
स्मृति-विज्ञान, अध्यवसाय और विषयोपलब्धि-ये उस पुरुष के गुण हैं।४ 

सुश्रुत ने भी पंचमहाभूत और आत्मा के संयोग को “कर्मपुरुष” कहा है और 
उसी को चिकित्सा का अधिकरण बताया है। 

चरक और सुश्रुत के उक्त विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि 
आयुर्वेद भी- 

- शरीर, मन और इन्द्रियों से पृथक्‌ आत्मा की सत्ता को स्वीकार करता है। 

2. आत्मा के दो रूप मानता है-जीवात्मा और परमात्मा। जीवात्मा को सगुण 

और परिणामी मानता है तथा परमात्मा को निर्गुण और अपरिणामी। 
$. सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि को आत्मा में ही प्रतिष्ठित मानताः है। 
4. आत्मा को नित्य मानता है। केवल चरक ने जीवात्मा अथवा राशि-पुरुष को 

अनित्य माना है। 
5. चरक ने आत्मा को विभु पर सुश्रुत ने अणुरूप माना है।' 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 99 


6. आत्मा को चेतना कां आधार मानता है। 
गर्भ से आत्मा का सम्बन्ध 

गर्भ की उत्त्ति में मातृज (डिम्ब), पितृ (शुक्राणु), आत्मज (आत्मा), साल्यज, 
रसज तथा मन, ये छः भाव भाग लेते हैं ।'' इन छः भावों के समुदाय से नवीन गर्भ 
की उत्पत्ति होती है।” मातृज (डिम्ब) एवं पितृज (शुक्राणु) भावों से गर्भ की स्थापना 
होती है तथा उनके साथ सात्यज एवं रसज भाव उसके विकास में सहायक होते हैं। 
आत्मा एवं मन द्वारा गर्भ शरीर में प्राणों का संचार होता है। मन आत्मा को गर्भ-शरीर 
से सम्बन्ध में प्रवृत्त करता है /* चरक संहिता में कहा गया है कि-गर्भ के तीसरे मास 
में समस्त इन्द्रियाँ, अंग एवं अवयव बन जाते हैं।” 

सुश्रुत संहिता में इस प्रसंग में कहा गया है कि चौथे मास में गर्भ-शरीर में संपूर्ण 
अंग-प्रत्यंगों के विभाग अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। गर्भ शरीर में हृदय गति होने लगती 
है। इस प्रकार चेतना धातु (आत्मा) की भी अभिव्यक्ति हो जाती है क्योंकि हृदय 
उसका स्थान है इसी कारण चौथे मास से गर्भ शरीर की इन्द्रियाँ अपने विषयों में 
अपनी इच्छा प्रकट करने लगती हैं तथा दो हृदय युक्त उस स्त्री को दो हदनी कहते 
हैं।४ 

उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि गर्भ-शरीर में चौथे मास में आत्मा के प्रवेश की 
कल्पना इसलिये की गयी है कि गर्भ हृदय गति करने लगा और उसकी ध्वनि पृथक्‌ 
से सुनाई देने लगी। 

वाल्मीकि रामायण में भी चेतना धातु (आत्मा) के अस्तित्व को स्वीकार किया 
गया है। रामायण न तो दार्शनिक ग्रन्थ है और न ही आयुर्वेदीय, इसलिये आत्मा 
सम्बन्धी विशद्‌ व्याख्या तो इसमें प्राप्त नहीं होती किन्तु इसका सर्वथा अभाव भी नहीं 
है। 


रामायण में एक-दो स्थानों पर ही इसका उल्लेख किया गया है-यथा 

दशाह व्यतीत हो जाने पर राजकुमार भरत ने ग्यारहवें दिन “आत्शुद्धि” के लिये 
स्नान और एकादशाह श्राद्ध का अनुष्ठान किया फिर बारहवाँ दिन आने पर उन्होंने 
श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये।* 

इस सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्म शुद्धि के लिये श्राद्ध आदि कार्य 
सम्पन्न किये जाते हैं। 
3. शरीर की रचना, शरीर का प्राविभाग, त्वचा, कला, दोष, मल 

भारतीय वाडूमय में दो प्रकार के शरीरों की कल्पना की गयी है-स्थूल शरीर एवं 
सूक्ष्म शरीर। हाड़-मांस-रक्त-चर्म आदि से युक्त शरीर को स्थूल शरीर कहते हैं। इसी 
स्थूल के अन्दर एक सूक्ष्म शरीर की कल्पना की गयी है। यह शरीर मन, बुद्धि, 
अहंकार, पज्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मेन्द्रियों और पञ्च तन्मात्र-इन अठारह अवयवों 
का समूह माना गया है इसी को लिक्न शरीर, कारण शरीर, अतिवाहक शरीर आदि 
नामों से भी पुकारा गया है। कहा जाता है कि मरणोपरान्त आत्मा इसी शरीर के 
आश्रय से एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। 


00 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


आयुर्वेद में शरीर शब्द अधिकांश में स्थूल शरीर का ही वाचक है और इसी से 
उसने अधिकतर काम लिया है। सूक्ष्म शरीर का विवरण भी कुछ स्थलों पर मिलता 
है पर नाम मात्र के लिये। 

स्थूल शरीर” 

आयुर्वेद के अनुसार समस्त चेष्टाओं, इन्द्रियों, मन और आत्मा के आधारभूत 
पज्चभौतिक पिण्ड को स्थूल शरीर कहते हैं। आयुर्वेद में स्थूल शरीर की जो विशेषताएँ 
बतायी गयी हैं वे प्रमुखतः निम्न हैं- 

. शरीर पज्चभूतात्मक है। 

2. शरीर चेतना का अधिष्ठान है। 

5. शरीर उत्पत्ति एवं मरणधर्मा है। 

4. शरीर अवयवी है। 

5. शरीर समयोग वाही है। 

सुश्रुत ने गर्भाविक्रान्ति के प्रसंग में संघटना की दृष्टि से शरीर की अति विशद्‌ 
व्याख्या की है। इनके अनुसार शुक्र और आर्तव का गर्भाशय में सम्मूर्च्डन होने पर 
उसमें तत्काल सूक्ष्म शरीर रहित आत्मा का प्रवेश होता है। इस सूक्ष्म शरीर में आठ 
प्रकार की प्रकृति, पाँच सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्म कर्मेन्द्रियां तथा एक मन होता है। 
इस प्रकार इन सबके संयोग को “गर्भ! कहा गया है। इसी चेतनावस्थित गर्भ को जब 
वायु विभाजित करती है, तेज पाचन करता है, जल क्लेद करता है, पृथ्वी इसमें 
काठिन्य उत्पन्न करती है और आकाश इसे बढ़ाता है तब इस प्रकार विवर्धित वह गर्भ 
हस्त, पाद, जिह्वा, प्राण, कर्ण, नितम्ब आदि अंगों से युक्त हो जाता है तब उसकी 

“शरीर संज्ञा” होती है।" 

सुश्रुत ने दोष, धातु एवं मल के समुदाय को स्थूल दृष्ट्या शरीर माना है ।? चरक, 
सुश्रुत, अष्टांग संग्रह एवं अष्टांग हृदय में शरीर को छः अंगों में विभक्त किया गया 
है। चरक ने दो बाहु, दो सक्थि, शिरोग्रीव एवं अन्तराधि को शरीर का अंग माना है।” 
सुश्रुत ने पडड़॒के अन्तर्गत चार शाखा (दो हस्त, दो पाद) मध्य शरीर एवं सिर की 
गणना की है।“ अष्टांग संग्रह एवं अष्टांगहदय में शिर, अन्तराधि, दो बाहु एवं दो 
सक्थि को शरीर माना गया है।“ वृद्ध वाग्भटट ने नाभि, पाणि, पाद को प्रत्यंग माना 
है। उपरोक्त विवेचन के आधार पर शरीर की रचना के विषय में विस्तृत रूप से इस 
प्रकार कहा जा सकता है- 

- षडझ्वन्धन्याय से प्रकृति-पुरुष (स्त्री-पुरुष) के संयोग से पञ्चमहाभूतमय स्थूल 
शरीर की उत्पति होती है। यह शीर्यमाण होने से 'शरीर” उपचित होने के कारण 
“देह” और “काय” कहलाता है जो जीव (चैतन्य) का निवास है। 

. यह शरीर षडड़ कहलाता है। इसके छः अंग हैं, चार शाखाएँ, मध्य काय और 
शिर। मस्तक, नाभि, ललाट, स्फिक्‌, जानु, उरु आदि प्रत्यज् कहलाते हैं। 

3. सिर से पैर तक समस्त शरीर सात त्वचाओं से आवृत रहता है। सात कलाएँ होती 

हैं, जो धातुओं और आशयों के बीच मर्यादाभूत हैं। 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / ॥0॥ 


हा] 


4. अन्न, दोष, मल आदि जहाँ स्थित छत है वे आशय कहलाते हैं। स्नोत मार्ग हैं जिनके 
द्वारा ये एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं। 

5. अस्थियाँ वृक्ष के सार भाग की तरह मनुष्य के शरीर को धारण करती हैं। ये सन्धियों 
से युक्त हैं। सैकड़ों स्नायुओं से बंधा यह देह कंकाल है। 

6. इन अस्थियों से पेशियाँ सम्बद्ध रखती हैं जिनका अन्त प्रायः रज्जु सदृश्य कण्डराओं 
में होता है। अक्षि निमेष तक सभी चेष्टाएँ पेशियों से होती हैं। 

7. नाड़ियाँ तार की तरह हैं और शिर “मस्तिष्क' और सुषुम्ना से सम्बन्ध रखती हैं। 
यह समस्त देह में व्याप्त होकर संज्ञा एवं चेष्टा का वहन करती है। 

8. जो नलिकाएँ रक्त को हृदय से अंगों की ओर वेग से ले जाती हैं वे धमनियाँ हैं और 
जो अंगों से रक्त को हृदय की ओर मंद गति से ले जाती हैं वे सिरायें हैं। 

9. दोनों के बीच में केश के सूक्ष्म जाल के सदृश फैली हुई रचनाएँ 'केशिका' कहलाती 
हैं जिनसे पोषक रस चूता रहता है। 

0. हृदय रक्त को (अंगों से) लेता है पुनः (अंगों को) देता है तथा निरन्तर वेग के साथ 
चलता रहता है। इस प्रकार उसका 'हदय' (ह + द + य) नाम सार्थक है तथा इसका 
अस्तित्व शरीर के हित में चरितार्थ है। 

१4. हृदय जीवन का मूल है क्योंकि हृदय के रुक जाने पर जीना संभव नहीं है। इसलिये 
पूर्ववर्ती महर्षियों ने इसे चेतना स्थान कहा है। 

2. हृदय रस-रक्‍्त का आश्रय है। यह समस्त देह के पोषण के लिये रस रक्त का 
वितरण करता है तथा उसके दोषों को भी निकाल कर चलता रहता है। इस प्रकार 
हृदय की गति चक्रवतू है। 

3. वक्ष में हृदय-कमल स्थित है। उसके पार्श्व में दोनों ओर फुफ्फुस हैं तथा नीचे दक्षिण 
भाग में यकृत और वाम भाग में प्लीहा है। 

4. दोनों फुफ्फुस रक्त को श्वास-प्रश्वास के द्वारा गहीत अम्बरपीयूष (ओषजन) से 
स्वच्छ कर अमृत-तुल्य बना देते हैं। 

5. यकृत कपिल-वर्ण तथा रक्त वह स्रोतों का मूल है और पित्त का अधिष्ठान हैं। यह 
अनेक कर्मों का सम्पादन करता है। 

6. इसी प्रकार प्लीहा भी रक्त का मूल अधिष्ठान है जहाँ रक्‍्त-कणों आदि का निर्माण 
होता है। रक्‍तक्षय के विकारों में प्लीहा बढ़ जाती है। 

7. ग्रृहणी अग्नि का स्थान है जहाँ पित्तंधरा कला संलग्न है। सभी आहार का पाचन यहीं 
(पाचक) पित के द्वारा होता है। 

]8. रस और मल का विवेक होने से रस तो आँतों द्वारा शोषित होकर हृदय में चला 

जाता है और पुरीष गुदामार्ग से बाहर निकल जाता है। 

.. वस्ति मूत्राधार है, वह वृक्कों में बने हुए तथा दोनों गवोनियों द्वारा लाये गये मूत्र को 

अपने भीतर रखता है तथा मूत्र मार्ग से बाहर निकालता है। 

20. शुक्र (अव्यक्त रूप में) सर्व शरीर में व्याप्त रहता है और व्यक्त रूप में शुक्राशय में 
स्थित होता है यह मैथुनकाल में हर्ष (उत्तेजना) से मूत्र-मार्ग द्वारा बाहर निकलता है। 


02 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छ 


स्त्री की योनि तीन आवतों वाली होती है जिसके तृतीय आर्वत में गर्भाशय रहता है 
जो बस्ति तथा पुरीषाशय के बीच में स्थित है। 
22. मस्तिष्क का आश्रय तथा प्राण और इन्द्रियों का मूल और अंगों में उत्तम शिर कहा 
गया है। यह मर्मों में श्रेष्ठ है। 
शरीर में 00 मर्म हैं, जहाँ आधात लगने से पीड़ा या मृत्यु हो जाती है। हृदय, शिर 
और वस्ति ये मुख्य मर्म “त्रिमर्म' कहलाते हैं। 
वृद्ध वाग्भट ने भी शरीर के प्राविभागों के अन्तर्गत त्वचा, कला, दोष, धातु, मल, 
ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, मनसू, आशय, प्राणायतन, कण्डरा, जाल, कूर्च, रज्जु, सीवनी, अस्थि 
संघात, सीमन्त, अस्थि, अस्थि-सन्धि, स्नायु, पेशी, सिरा, धमनी, स्रोतस, ऊष्मा, मर्म, केश, 
अमश्रु, लोम, प्रकृति एवं विकृति का परिसंख्यान किया है।४ 
पञ्चमहाभूत अविकृत अवस्था में अर्थात्‌ प्रत्येक पृथक्‌-पृथक्‌ रहते हुए सृष्टि की 
उत्पत्ति को कारण नहीं हो सकते हैं जब ये पञ्चीकृत हो एक-दूसरे में अनुप्रविष्ट हो जाते 
हैं अर्थात्‌ प्रत्येक में अन्य चारों का भी समावेश हो जाता है तब ही वे स्थूल शरीर का 
कारण बनते हैं। शरीर में आत्मा का आश्रय हो जाने पर उसमें जीवन के लक्षण प्रकट हो 
जाते हैं। जीवन के लक्षणों से युक्त पञ्चमहाभूतों से निर्मित यह शरीर पुरुष कहलाता है। 
- समस्त उपादान कारणों के सम्यक्‌ भाव में रहने पर ही इस शरीर की क्रियाएँ स्वाभाविक रूप 
से सम्पन्न होती हैं। 
शरीर की परिभाषा चरक ने इस प्रकार दी है-जिसमें पञ्चमहाभूतों का विकार समूह 
हो, आत्मा का वास हो तथा आन्तर एवं वाह्य क्रियाएँ सम्यक्‌ भाव से हो रही हों, वह 
शरीर है।" 
शरीर में पंचमहाभूतों के विकार त्रिदोष, सप्त-धातु तथा मन के रूप में होते हैं। ये 
(दोष, धातु, मल) शरीर के मूल माने गये हैं।#* 
दोष 


श. 


23. 


] 


'दृष्यन्तीति दोषाः” जो शरीर को दूषित करे अथवा बिगाड़े उसे 'दोष' कहते हैं। आयुर्वेद 
में दो प्रकार के दोषों की कल्पना की गयी है-शारीरिक दोष एवं मानसिक दोष । शारीरिक दोष 
वात, पित्त और कफ हैं तथा मानसिक दोष रज एवं तम। शारीरिक दोषों की सम मात्रा शरीर 
को और मानसिक दोषों की सम मात्रा मन को धारण करती है, उन्हें स्वस्थ रखती है। 
शारीरिक दोषों की विषम मात्रा शारीरिक रोगों को और मानसिक दोषों की विषम मात्रा 
मानसिक रोगों को जन्म देती है।” 

'धारणात्‌ धातवः' जो शरीर को धारण करे उसे धातु कहते हैं। शरीर धातु व्यापक, 
अर्थ में तो प्राकृत वात, पित्त, एवं कफ, रस, रक्त आदि, पज्चमहाभूत इन्द्रिय और आत्मा 
सभी धातु कहलाते हैं। ये सभी शरीर को धारण करते हैं पर संकुचित अर्थ में धातुएँ सात 
हैं-रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र। सम मात्रा में रहने पर ये शरीर को 
आरोग्य प्रदान करती हैं और घट-बढ़ जाने पर नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करती हैं /* 

नीचे की तालिका में संक्षेप में इनके कार्य का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण. ४ 03 


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04 / वाल्मीकि रामायंण तथा आयुर्वेद 


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३ मद 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण 


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/ 05 


“मलिनी करणान्मला” जो शरीर को मलिन करे उसे “मल” कहते हैं। मूत्र, पुरीष, 
स्वेद आदि मल हैं।' मल से हमारा तात्पर्य शरीर में उत्पन्न उन द्र॒व्यों से है 
जिनका एक सीमा से अधिक शरीर में बना रहना स्वास्थ्य के लिये घातक सिद्ध 
होता है, हम जो कुछ भी खाते हैं पच जाने के उपरान्त उससे रस बनता है। रस 
के सार भाग से धातुओं का पोषण होता है और किट्ट भाग से मलों की उत्पत्ति 
होती हैं। 

दोषों और धातुओं के समान ही मलों की वृद्धि एवं क्षय से भी अनेकानेक 
रोग उत्पन्न हो जाते हैं। नीचे की तालिका में प्रमुख मलों की वृद्धि एवं क्षय से 
उत्पन्न होने वाले लक्षणों को आसानी से देखा जा सकता है- 


मल वृद्धि क्षय 
पुरीष कृक्षि में शूल, गड़गड़ाहट उदर में गड़गड़ाहट करती हुई वायु का 
एवं भारीपन इधर-उधर घूमना, आँतों में ऐंठन तथा 


पार्श्व एवं हृदय में पीड़ा। 
मूत्र मूत्राशय में व्यथा एवं... बस्ति प्रदेश में पीड़ा, मुखशोष, 
आध्यान (फूलना) मूत्र कृच्छता, मूत्र की स्वल्पता, 
उसके वर्ण की विकृति तथा 
उसका रकक्‍्तमिश्रित होना। 
स्वेद कण्डु एवं शरीर से रोमकूपों की जड़ता, रोमोंका गिरना, 
दुर्गन्ध आना त्वचा का फटना, त्वचा का सुन्न(स्पर्श 
ज्ञान रहित) हो जाना, खुरदुरा होः 
जाना तथा पसीने का न निकलना। 
दोष, धातु तथा मल शरीर के मूल हैं। इनमें से किसी एक का भी अभाव हो 
तो शरीर की स्थिति नहीं रह सकती है। 
इस प्रकार स्पष्ट है कि वात-पित्त एवं कफ दोष, रस रक्तादि धातु एवं पुरीष, 
मूत्र आदि मल होते हैं। 
आचार्य चरक ने शरीर के सम्बन्ध में कहा है कि यह शरीर आहार से उत्पन्न 
होने वाली वस्तु है।” शरीर में आहार द्रव्यों के पाक के पश्चात्‌ आहार रस का 
विसरण होकर शरीर में चयापचय होता है। चयापचय के परिणामस्वरूप सार अंश 
से शरीर के ऊतकों (7/55४5०७) की वृद्धि, क्षय-पूर्ति तथा स्थायी धातुओं की 
उत्पति होती है और निस्सार भाग मल रूप में शरीर से उत्सर्जित हो जाता है। 
जीवन के लिये ये शारीरिक क्रियाएँ आवश्यक हैं इनका नियंत्रण त्रिदोष द्वारा 
होता है। यदि ये क्रियाएँ प्राकृतिक रूप से शरीर में सम्पादित हो रही हैं तो 
वबात-पित्त तथा कफ का कार्य धारण करना मात्र होता है परन्तु जब वात-पित्त 
तथा कफ के द्वारा शारीरिक क्रियाओं में विषमता उत्पन्न हो जाती है तब विषमता 
उत्पन्न करने की विशेष शक्ति से सम्पन्न होने के कारण इन्हें दोष संज्ञा प्रदान 
06 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


की गयी है। इनकी दूषण क्रियाओं से सातों धातुएँ ही प्रभावित होती हैं। अतः 
सातों धातुओं को दूष्य कहा जाता है। अत्यन्त विकृतावस्था में दोष मलरूप से 
शरीर में उपस्थित रहते हैं अतः इन्हें मल” संज्ञा भी दी जा सकती है।” 

शरीर की समस्त क्रियाओं का एक ही उद्देश्य है और वह है शरीर को स्वस्थ 
रखना। इसके लिये इन सब क्रियाओं में परस्पर ताल-मेल रखना आवश्यक है यदि 
किसी एक क्रिया में विकृति आती है तो उसका विपरीत प्रभाव अन्य शारीरिक 
क्रियाओं पर भी पड़ता है। शरीर की इन क्रियाओं का ठीक प्रकार से सम्पन्न न 
होने का नाम ही व्याधि है। 

वात-पित्त-कफ शरीर की उत्पत्ति के कारण हैं। शरीर में नीचे (नाभि के नीचे) 
वात का स्थान है, मध्य में (नाभि और हृदय के मध्य) पित्त का स्थान और ऊपर 
(हृदय के ऊपर) कफ का स्थान है। वात-पित्त-कफ के विकार रहित स्थिति में 
रहने से शरीर का उसी प्रकार धारण होता है जिस प्रकार कम से कम तीन स्तम्भों 
का मकान स्थित रह सकता है। अतः शरीर को त्रिस्थूण कहते हैं। जिस प्रकार 
किसी एक स्तम्भ की निर्बलता से मकान की दृढ़ता में संदेह हो जाता है, उसी 
प्रकार जब बात-पित्त-कफ में किसी एक में भी विकृति आ जाती है तब ये इस 
शरीर रूपी मकान के नाश के कारण बन जाते हैं। 

शरीर क्रियाओं में परस्पर तालमेल उसी समय तक बना रह सकता है जब 
तक कि प्रत्येक का कार्य-क्षेत्र पृथक-पृथक्‌ हो। शरीर में ऐसा ही होता है। यद्यपि 
वात, पित्त, कफ शरीर की क्रियाओं के जनक हैं किन्तु प्रत्येक का कार्य एवं क्षेत्र 
पृथक्‌-पृथक्‌ है। शरीर के अन्दर विभिन्‍न जैव भौतिक (80-?॥५अं०॥) तथा जैव 
रासायनिक (80-0॥०॥0०»/) क्रियाएँ इन्हीं वात-पित्त-कफ के द्वारा सम्पन्न होती 
हैं। कफ अपने विसर्ग कर्म (8780०॥० 7णा८४०४७) पित्त अपने आदान कर्म 
((७४४००॥८ एण्ा०ं०१७) द्वारा तथा वायु अपने विशेष कर्म (कशा०५७ राव 
#णा॥०१।| ५०४०7) द्वारा शरीर को धारण करते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में कवि का शरीर विषयक ज्ञान स्पष्ट परिलक्षित होता है। 
रामायण में शरीर के प्रविभागों में निम्नांकित प्रविभागों का उल्लेख कई स्थलों पर 
किया गया है यथा-त्वचा, दोष, मल, धातु, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन, आशय, 
प्राणायतन, कण्डरा, अस्थि, अस्थि-सन्धि, स्नायु, प्रकृति, केश, रोम, मर्म, नख 
आदि। 

रामायण में एक स्थल पर कहा गया है कि उस समय अग्नि ने उन महात्मा 
के रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड़डी, मांस और रक्त को जलाकर भस्म कर दिया।* 

प्रस्तुत श्लोक में शरीरावयवों के अन्तर्गत आने वाले त्वचा, रोम, केश, अस्थि, 
मांस, रक्त आदि का उल्लेख किया गया है। त्रिदोष का उल्लेख भी रामायण में 
प्राप्त होता है। 
दोष 

वे तीनों लोकों के समान सुस्थिर, तीन अग्नियों के समान तेजस्वी, तीन मंत्रों 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 07 


के समान उग्र तथा तीन रोगों (वात-पित्त-कफ के प्रकोप से) के समान अत्यन्त 
मद 83 छह! 
मल 

वाल्मीकि रामायण में तीन प्रकार के मलों का भी उल्लेख है-. मल, 2. मूत्र, 
3. स्वेद। 
स्वेद 


उनके अंगों से पसीना निकल रहा था (९ 
मल-मूत्र 

वायुदेव उनके मलाशय और मूत्राशय को रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे।” 
आशय 

रामायण में मलाशय,” मूत्राशय एवं गर्भशय* का भी उल्लेख प्राप्त होता है। 
कण्डरा (स्नायु) 

रामायण में युद्ध काण्ड में कहा गया है उनके शरीर का स्नायु-बन्धन 
छिन्न-भिन्‍न हो गया है।* 
धातु 

वाल्मीकि रामायण में सप्त धातु का भी अनेक स्थलों पर उल्लेख किया गया 
है। धातु के अन्तर्गत अस्थि, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, शुक्र, रस आदि सातों ही 
प्रकारों का रामायणकार को पर्याप्त ज्ञान है, ऐसा प्रतीत होता है। 

राक्षस अक्ष कुमार की अस्थियाँ चूर-चूर हो गयीं, अस्थियों के जोड़ टूट गये 
और नस-नाड़ियों के बंधन शिथिल हो गये ९ 

युद्ध काण्ड में एक स्थान पर वर्णन मिलता है, “सैनिकों के यकृत एवं प्लीहा 
जिसके महान पंक थे-रक्त का प्रवाह ही जिसकी महान जल राशि थी। निकली 
हुई आँतें जहाँ सेवार का काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य से 
प्रतीत होते थे। शरीर के छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घास का भ्रम उत्पन्न 
करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे /” इस प्रकार उपरोक्त 
श्लोक से भी यह ज्ञात होता है कि महर्षि वाल्मीकि को शरीर के अंगों का विशद्‌ 
ज्ञान था। 
रक्‍त मेद 

रावण का सारा शरीर रक्त एवं मेद से भीग गया।” 
अन्य गुण 3) 
उसमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टि, शक्ति, बुद्धि और स्मरण शक्ति 
आदि महान गुण पहले से भी दुगने हो गये।” 

इसी प्रकार केश,“ रोम,“ मर्म,“ नख आदि का उल्लेख भी रामायण में प्राप्त 
होता है। 
शरीरावयव वाची शब्द 

रामायण एक आयुर्वेदीय ग्रन्थ नहीं है, फिर इसका निर्माण भी ऐसे समय में 


08 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हुआ जब शरीर शास्त्र का सम्भवतः अधिक विकास न हुआ हो। आदि काव्य होने 
के नाते जितने भी शरीर वाची शब्द इसमें प्राप्त होते हैं वे आश्चर्य जनक हैं। 

रामायण में स्थावर तथा जंगम दो प्रकार की सृष्टि मानी गयी है। मन की 
विभिन्‍न अवस्थाओं का वर्णन रामायण में प्राप्त होता है. यथा-सन्मुनष्य मनो” 
बताकर अच्छे आदमियों के अच्छे मन का उल्लेख है। इसके विपरीत दुष्ट मनुष्यों 
के मन की गति का वर्णन भी रामायण में विस्तृत रूप से प्राप्त होता है। इसी 
प्रकार सद्बुद्धि तथा दुर्बुद्धि, नम्नता और अहंकार की स्थितियों का वर्णन भी 
रामायण में प्राप्त होता है। 

इनके अतिरिक्त शरीरावयवों की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन भी 
रामायण में उपलब्ध है, जैसे-हदय फटकर नीचे गिर जाना,* फेन युक्त रक्‍त-का 
प्रवाहित होना। रक्त की गंध से उन्मत्त हो जाना, कर्ण तथा नेत्रों में रोध 
उपस्थित हो जाना ।' रामायण में सप्त धातु, आंत्र, वक्ष-प्रदेश तथा ममों आदि का 
वर्णन भी संक्षिप्त रूप से प्राप्त होता है। कवि को सद्योप्राणहर मर्म, कालान्तर 
प्राणहर मर्म प्रदेश का सम्यक्‌ ज्ञान था। मर्मों पर आघात होने पर क्या असर होता 
है यह कवि ने अनेक स्थानों पर बताया है। रक्त की उष्ण तथा शीत अवस्था का 
वर्णन भी कवि ने किया है। कुम्भकर्ण के भयंकर रूप का वर्णन करते हुए कवि 
ने “ऊर्ध्व रोमांचिततनु” कहकर उसके दैहिक रोगों का वर्णन किया है। 

हनुमान जी के मुख से राम एवं लक्ष्मण की देह का वर्णन करते समय सभी 
शरीरावथवों का उल्लेख किया गया है-यथात्रिस्थान, त्रिस्थिर, त्रिसम, त्रिप्रलम्ब, 
त्रिषुचोन्नत, त्रिताम्र, त्रिस्निग्ध, त्रिषुगम्भीर, त्रिवल्ली, त्रिशीर्षवान, चतुर्व्यग, चतुष्कल, 
चतुकर्रव, चतुस्किस्कु, चतुस्सम, चतुर्दशसमद्वन्द, चतुरदृष्ट, पंचस्निग्धा, अष्टवंशवान, 
दशपदूम, दशवृहद्‌, षडउन्‍नत, नव तनु। 

इस प्रकार रामायण में दैहिक शुभ-लक्षणों का “बृहद्‌ वर्णन प्राप्त होता है तथा 
दैहिक दोषों की भी उपलब्धि होती है जैसे-कबंध-कुब्जा आदि। 

रामायण में प्राप्त होने वाले शरीरावयव वाची शब्दों की विस्तृत सूची परिशिष्ट 
में संलग्न है। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि कवि का शरीर रचना इत्यादि सम्बन्धित 
ज्ञान व्यापक था और उनके महाकाव्य में इसका विशद्‌ उल्लेख भी किया गया है। 
4. अन्तः करण 

अन्तःकरण के अन्तर्गत मन एवं बुद्धि का समावेश होता है। 
अन 

मन की व्याख्या करते हुए हमारे शास्त्रकारों ने कहा है--'मन्यते बुध्यते अनेन 
इति मनः अर्थात्‌ जो मनन करने का, सोचने समझने का साधन हो, वही मन है। 
मनन शब्द का प्रयोग इस संदर्भ में बहुत ही व्यापक अर्थ में किया गया है। इसके 
अन्तर्गत हमारी वह सारी क्रियाएँ, सारा व्यवहार आ जाता है जिसे हम आधुनिक 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण. / 09 


मनोविज्ञान की भाषा में मानसिक या मनोजन्य कहते हैं। संवेदन, प्रत्यक्षीकरण, 
ध्यान, स्मरण, चिंतन, कल्पना, भाव, संवेग आदि सभी इसकी वस्तुवाचकता में 
समा जाते हैं। बुद्धि, चित, अन्तःकरण आदि शब्द प्रायः इसके पर्यायवाची शब्दों 
के रूप में व्यवहार किये जाते हैं। 
मन के भेद 

मन यद्यपि सत्व-प्रधान है फिर भी. गुणों की विषमता के कारण इसके प्रायः 
तीन रूप हमारे सामने आते हैं। सुश्रुत ने इनका वर्णन निम्न शब्दों में किया है। 
उनके अनुसार भिन्न-भिन्न गुणों से आवृत मन की निम्न-विशेषताएँ हैं- 
सात्विक 

दया, दान, क्षमा, सत्य, धर्म, आस्तिकता, बुद्धि, मेधा, स्मृति, ध्ृति और 
अनासक्ति। ; 
राजस 

दुःखाधिक्य, भ्रमणशीलता, अधीरता, अहंकार, असत्य बोलने की प्रवृति, 
ऋरता, दम्भ, मान, हर्ष, काम और क्रोध । 
तामस 

मानसिक उद्विग्नता, नास्तिकता, अधर्म की ओर प्रवृति, बुद्धि का निरोध, 
अज्ञान, मूढ़ता, आलस्य तथा निद्रालुता।! 

इस सम्बन्ध में यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि मन के सत्वप्रधान होते हुए 
भी उसका निर्माण उक्त तीनों प्रकार की प्रवृतियों से मिलकर होता है। अन्तर 
केवल यही है कि किसी में किसी प्रकार की प्रवृतियों का बाहुल्य है और किसी में 
दूसरे प्रकार की। इसी आधार पर जिसमें जिस प्रकार की प्रवृतियों का बाहुल्‍य 
होता है उसके मन को उसी नाम से पुकारने लगते हैं। चरक के शब्दों में, “जिस 
गुण वाला सत्व पुरुष पर बार-बार अनुवर्तन करता है उस पुरुष के मन को मुनि 
लोग उसी गुण से युक्त बतलाते हैं /”” उदाहरण के लिये जिसके मन में सात्विक 
प्रवृतियों का बाहुल्य होता है उसके मन को सात्विक, जिसके मन में राजसी 
प्रवृतियों का बाहुल्य होता है उसके मन को राजस तथा जिसके मन में तामसी 
प्रवृतियों का बाहुल्य होता है उसके मन को तामस कहा जाने लगता है। 

मनो-विज्ञान की दृष्टि से सत्व की बुद्धि मानसिक स्वास्थ्य की निशानी है। 
सात्विकता का ड्रास और रज की वृद्धि मानसिक चंचलता, द्नन्द्र एवं तनाव का 
सूचक है और तम की वृद्धि स्पष्ट रूप से मानसिक विकारों, मानसिक रोगों का 
प्रतीक है। 
मन की उत्पत्ति 

भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के समय राजस अहंकार की 
सहायता से सात्विक अहंकार से मन की उत्पत्ति हुई। 

सृष्टि की उत्पत्ति का आदि कारण स्वयं कारण रहित सत्व, रज तथा तम गुणों 

]0 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


से युक्त अव्यक्त है। अव्यक्त से त्रिगुणात्मक महतू की उत्पति हुई । महत्‌ का अर्थ 
महान है। जब हम महान कहते हैं तो एक तुलनात्मक निश्चित हमारा मत होता 
है कि अमुक से अमुक महान है। निश्चयात्मक स्थिति के कर्ता को बुद्धि कहते हैं, 
इसलिये महत्‌ को बुद्धित्व भी कहते हैं।। तुलनात्मक भाव अर्थात्‌ छोटे-बड़े या 
अच्छे-बुरे का भाव अहंकाराधीन है। अतः महत्‌ से त्रिगुणात्मक अहंकार की 
उत्पत्ति होती है। गुणों के अनुसार अहंकार तीन प्रकार का होता है-. वैकारिक 
(सात्विक जिसमें सत्वगुण प्रधान है) 2. तैजस्‌ (राजस्‌-जिसमें रजोगुण प्रधान है) 
3. भूतादि (तामस-जिसमें तमोगुण प्रधान है)। 

तैजस्‌ अहंकार की सहायता से वैकारिक अहंकार से- ग्यारह इन्द्रियाँ उत्पन्न 
होती हैं-ये हैं-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, ।. श्रोत्र, 2. त्वक्‌, 3. चक्षु, 4. जिहा, 5. प्राण 
तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ. वाणी 2. हस्त 3. उपस्थ 4. गुदा तथा पाद और ग्यारहवाँ 
मन। जो अतीन्द्रिय कहलाता है-जिसका ज्ञान उपरोक्त दसों इन्द्रियों द्वारा ग्राही 
नहीं हो उसे अतीन्द्रिय कहते हैं। तैजस (राजस) अहंकार की सहायता से भूतादि 
अहंकार से पाँच तन्‍्मात्राएँ (सूक्ष्म-अव्यक्त भूत) उत्पन्न होती हैं। 

ये ग्यारह इन्द्रियाँ आत्मा के चेतन भावों को प्रकट करने का आधार हैं किन्तु 
चेतन भाव किसी जड़ वस्तु के आश्रित ही प्रकट हो सकते हैं। इसके लिये पांच 
तन्मात्राओं से पंच महाभूतों की उत्पति होती है, जिनके परस्पर मिलन से जड़ 
शरीर की उत्पत्ति होती है। जड़ शरीर में आत्मा को मन प्रवृत करता है जिससे जड़ 
शरीर में जीवन के लक्षणों के रूप में आत्मा के लक्षण प्रकट होते हैं। इस कार्य 
की सिद्धि के लिये राजस अहंकार की सहायता से सात्विक अहंकार से मन की 
उत्पत्ति होती है। 
गर्भ से आत्मा एवं मन का सम्बन्ध 

गर्भ की उत्पत्ति में मातृज (डिम्ब), पितृज (शुक्राणु), आत्मज (आत्मा), 
सात्म्यज, रसज तथा मन ये छः भाव भाग लेते हैं ।* इन छः भावों के समुदाय से 
नवीन गर्भ की उत्पत्ति होती है।* 

मातृज (ड्रिम्ब) एवं पितृज (शुक्राणु) भावों से गर्भ की स्थापना होती है तथा 
उनके साथ सात्म्यज एवं रसज भाव उसके विकास में सहायक होते हैं। आत्मा एवं 
मन द्वारा गर्भ शरीर में प्राणों का संचार होता है। मन आत्मा को गर्भ शरीर से 
सम्बन्ध में प्रवृत्त करता है।” पु 
गर्भ पिण्ड से मन एवं आत्मा का सम्बन्ध कब होता है? 

डिम्ब एवं शुक्राणु का संयोग होते ही गर्भ का विकास प्रारम्भ हो जाता है। 
गर्भ के विकास काल में यह सम्बन्ध नहीं होता है क्योंकि एक शरीर में एक साथ 
में एक से अधिक मन एवं आत्मा का निवास नहीं हो सकता है। गर्भ शरीर माता 
से पोषण प्राप्त करता हुआ अपना नियमित विकास करता है गर्भ-पिण्ड में प्रत्येक 
धातु का विकास एक साथ होता रहता है। रस एवं रक्त धातुओं की उत्पत्ति से 

वाल्मीकि रामायण में भरीर-विज्ञान प्रकरण / ॥ 


गर्भ का अपना रक्‍्त-संवहनतन्त्र दिनोंदिन विकास की पूर्णता को प्राप्त करता 
जाता है। गर्भ के चतुर्थमास में उसकी अस्थियों में रक्त मज्जा (९९6 ७0॥6 
एरक्षा०५) उत्पन्न हो जाती है। अतः उसके द्वारा लोहित कोशिकाओं (२.8.0.) 
का निर्माण होने लगता है, परिणामस्वरूप गर्भ-हदय अपना क्षेपण कार्य करने 
लगता है परन्तु फुफ्फुसों के क्रियाशील न होने के कारण रक्त परिशुद्धि माता की 
रक्त संवहन प्रणाली द्वारा होती है गर्भ हृदय के कार्य प्रारम्भ करते ही उसकी हद 
ध्वनि पृथक से सुनाई देने लगती है। अब उस गर्भवती स्त्री को “दो हृदनी” कहने 
लगते हैं। गर्भ शरीर के स्वतन्त्र अस्तित्व को अभी तक स्वीकारा नहीं. गया है 
अतः गर्भ के मन एवं आत्मा को माता के मन एवं आत्मा से पृथक्‌ मानने का 
प्रश्न उत्पन्न नहीं होता है। * 

चौथे मास में गर्भ शरीर में सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगों के विभाग अधिक स्पष्ट हो 
जाते हैं।* गर्भ शरीर में हृदय गति होने लगती है। इस प्रकार चेतना धातु 
(आत्मा) की भी अभिव्यक्ति हो जाती है क्योंकि हृदय उसका स्थान है, इसी 
कारण चौथे मास में गर्भ शरीर की इन्द्रियाँ अपने विषयों में अपनी इच्छा प्रकट 
कंरने लगती हैं तथा दो हृदय युक्त. उस स्त्री को दो हृदनी कहते हैं। 

गर्भ शरीर में चौथे मास में आत्मा के प्रवेश की कल्पना इसलिये की गयी कि 
गर्भ हृदय गति करने लगा और उसकी ध्वनि पृथक से सुनाई देने लगी। यह 
कल्पना कर ली गयी है कि गर्भ में हृदय गति उस समय ही सम्भव है कि जब 
उसमें चेतना धातु का प्रवेश होगा, अन्य कोई कारण इस कल्पना का प्रतीक नहीं 
होता है। गर्भ शरीर गर्भाशय में रहता हुआ माता के तन्‍्त्रों पर पूर्ण निर्भर रहता 
है और अपने विकास की ओर अग्रसर होता चला जाता है उस पर माता के स्वयं 
के मन एवं आत्मा के द्वारा ही नियंत्रण रहता है। इस समय तक उसका अपना 
स्वयं का न तो मन होता है और न चेतना धातु अन्यथा चतुर्थमास अथवा पंचम 
मास में गर्भाशय से बाहर वह जीवित रहना चाहिये था जहाँ उसमें आत्मा के 
लक्षण जीवन के लक्षणों के रूप में परिलक्षित होने चाहिये परन्तु ऐसा सम्भव नहीं 
है वास्तविकता यह है कि जब गर्भ का विकास पूर्ण हो जाता है एवं वह प्रत्येक 
प्रकार से अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ हो जाता है उस समय पूर्व 
जन्मों के कर्मों के अनुरूप पञ्चभूतात्मक (लिब्ढ) शरीर पर आसीन मन और उस 
पर आधारित चेतना धातु (आत्मा) उस गर्भ शरीर में प्रवेश करते हैं। आत्मा का 
गर्भ शरीर से सम्बन्ध स्थापित होते ही उसमें प्राणों का संचार हो जाता है एवं वह 
अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के लिये संसार में प्रवेश के लिये आतुर हो जाता है अतः 
माता को प्रसव-वेदना प्रारम्भ हो जाती है। 

पूर्व जन्म के कर्मों में जो गुण (सत्व, रज, तम) उत्कृष्ट थे मन की प्रवृत्ति उसी 
प्रकार-की रहती है और वह आत्मा को उसी प्रकार के गर्भ शरीर में प्रवृत्त कराता 
है अर्थात्‌ यदि पूर्व जन्म में मन की प्रवृत्ति नीच कर्मों की ओर थी तो वह आत्मा 

2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


को नवीन जन्म में नीच योनि के गर्भ में प्रविष्ट करायेगा। इसके विपरीत यदि मन 
की प्रवृत्ति शुभ कर्मों की ओर थी तो वह आत्मा का संयोग उच्च योनि के गर्भ 
से करायेगा। मन की इस प्रवृत्ति में आत्मा का नियंत्रण ही हेतु होता है। नवीन 
गर्भ में प्रवेश कर आत्मा उसी प्रकार के सात्विक, राजस, अथवा तामस गुणों को 
ग्रहण करने में मन को आकर्षित करता है। 

मन रूपी साधन के द्वारा आत्मा सात्विक, राजस अथवा तामस गुणों को ग्रहण 
के लिये प्रवृत्त होती है।” है 
“मन” शब्द की व्युत्पत्ति 

“मन ज्ञाने” धातु से 'मन्यते ज्ञायते” इस विग्रह से मन शब्द बना है तात्पर्य यह 
है कि जिसके द्वारा ज्ञान की प्राप्ति हो वह मन है। चित्तमू, चेतः, हृदयम्‌ हत्‌ 
मानसमू इत्यादि मन के पर्याय हैं। 
मन 

मन अतीन्द्रिय है तथा सत्व एवं चेत भी इसकी संज्ञा है जिसका ज्ञान 
इन्द्रियग्राही न हो उसे अतीन्द्रिय कहते हैं।* 
मन का स्वरूप 

गुण और कर्म जिसके आश्रित रहते हैं तथा जो गुण और कार्य का समवायी 
कारण है आयुर्वेद में उसे 'द्रव्य” कहते हैं ।* इस परिभाषा के द्वारा नी द्रव्य होते 
हैं-आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, आत्मा, मन, काल एवं दिशा ।* ये द्रव्य 
अव्यक्त है। अतः स्वरूप में मन भी अव्यक्त है। इसका ज्ञान लक्षणों द्वारा ही 
ग्राह्म है ।/ इसी कारण मन की गणना अध्यात्म द्रव्यों में की जाती है। 

मन, मन के विषय (चिन्त्य, संकल्प आदि), बुद्धि (चक्षुबद्धि, श्रोत्र बुद्धि, प्राण 
बुद्धि, रसन बुद्धि, स्पर्शन बुद्धि तथा मनो बुद्धि) और आत्मा के अध्यात्म द्रव्य 
और गुण हैं। मन और आत्मा अध्यात्म द्रव्य हैं यथा मन के विषय तथा बुद्धि ये 
अध्यात्म गुण हैं। ये शुभ और अशुभ की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति में कारण हैं अर्थात्‌ 
यदि इनके द्वारा प्राप्त ज्ञान सम्यक्‌ है तो ये शुभ की प्रवृत्ति और अशुभ की निवृत्ति 
कराते हैं और यदि ज्ञान सम्यक्‌ नहीं है तो यह शुभ की निवृत्ति तथा अशुभ की 
प्रवत्ति के कारण होते हैं” इसलिये कहा जाता है कि मन अतीन्द्रिय है। 
अतीन्द्रिय के दो अर्थ हैं-. इन्द्रियों के स्वरूप को अतिक्रान्त कर जाने वाला। 
2. ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों भौतिक द्रव्य हैं जबकि मन अध्यात्मद्रव्य है 
अतः अतीन्द्रिय कहलाता है इसके स्वरूप आदि का ज्ञान तथा इसके लक्षणों के 
अनुमान द्वारा जाना जाता हैः ॥ 
मन का स्थान 

आचार्य चरक ने मन का स्थान हृदय कहा है। वह कहते हैं कि शरीर के 
छःओं अंग, विज्ञान (बुद्धि), इन्द्रियाँ और इनके पाँचों विषय, आत्मा, मन एवं मन 
के विषय, ये सब हृदय के आश्रित हैं। 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 3 


उन्माद तथा अपस्मार के प्रसंग में भी आचार्य कहते हैं कि दोष प्रकुपित 
होकर हृदय में पहुँचते हैं और वहाँ मानो वह स्लोतों को आच्छादित कर उन्माद 
उत्पन्न करते हैं* एवं रज तथा तम से अभिभूत मन वाले व्यक्तियों में आत्मा के 
श्रेष्ठ स्थान हृदय में जाकर प्रकुपित दोष स्थित हो जाते हैं तथा अपस्मार उत्पन्न 
करते हैं इस प्रकार आचार्य मन का स्थान हृदय कहते हैं। आचार्य सुश्रुत का 
भी ऐसा ही कथन है कि हृदय चेतना (आत्मा) का स्थान है और आत्मा एवं मन 
का नित्य सम्बन्ध है। अतः जो स्थान चेतना का है वही स्थान मन का है।* 

आचार्य चरक ने यह भी कहा है कि जिस अवयव में प्राण एवं सम्पूर्ण इन्द्रियाँ 
आश्रित हैं वह सब आंगों में श्रेष्ठ शिर (मस्तिष्क) है। मस्तिष्क प्राण वायु का 
स्थान भी है।* तथा प्राण वायु मन का नियामक एवं प्रवर्तक है /” यह प्राण वायु 
मस्तिष्क में रहकर बुद्धि, हदय, इन्द्रियों और मन को धारण करता है। भेल 
संहिता, चरक संहिता के समकालीन है। उसमें आचार्य भेल ने तो और भी स्पष्ट 
कह दिया है कि शिर एवं तालु के अन्तर्गत अर्थात्‌ मस्तिष्क में, इन्द्रियों में श्रेष्ठ 
इन्द्रिय मन स्थित है एवं यहाँ पर स्थित मन इन्द्रियों के विषयों को निकटता से 
जानता है।* 

उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि मस्तिष्क शरीर का सबसे उत्तम अंग है तथा 
समस्त इन्द्रियों का अधिष्ठान है। मन तथा अन्य इन्द्रियों की क्रियाओं के 
नियामक प्राण वायु का भी वही स्थान है। 
मन का, कार्य-द्षेत्र 

जीवन के लक्षण समस्त शरीर व्यापी होते हैं। अतः मन की क्रियाएँ भी 
समस्त शरीर में प्रकट होती हैं।” 

सम्पूर्ण शरीर में विचरण करने वाले वात, पित्त तथा श्लेष्मा के सब स्रोत मार्ग 
हैं उसी प्रकार अतीन्द्रिय मन आदि का समस्त चेतनावान शरीर मार्ग-भूत तथा 
आश्रय-भूत है अर्थात्‌ सम्पूर्ण चेतनावान शरीर मन की क्रियाओं का क्षेत्र है? 

समस्त शरीर चेतना का आश्रयभूत है। अतः मन की क्रियाओं का भी क्षेत्र है। 
मन के लक्षण एवं गुण 

एक साथ ज्ञान का अभाव तथा भाव यह मन का लक्षण है अर्थात्‌ एक काल 
में एक ही ज्ञान की उत्पति होना मन का लक्षण है। आत्मा, इन्द्रिय और इन्द्रिय 
विषय के सन्निकर्ष को मन जब प्राप्त होता है उस समय ज्ञान की उत्पत्ति होती 
है। आत्मा, इन्द्रिय तथा इन्द्रियविषय के संयुक्त होने पर भी यदि मन की वृत्ति 
(४०१० ०7700) इनके साथ नहीं है तब ज्ञान नहीं होता है। 

न्याय सूत्रकार ने मन के लक्षण अत्यन्त संक्षेप में कहे हैं कि एक साथ अनेक 
ज्ञानों की अनुत्पत्तिःअभाव मन का लक्षण है।” 
मन के गुण 

मन के दो गुण हैं-. अणुत्व और एकत्व। मन अणु है और एक है। यदि प्रत्येक 

4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


शरीर में एक से अधिक मन की कल्पना करें अथवा उसे महत्परिमाण वाला मानें तो 
एक साथ अनेक ज्ञानों की सम्भावना होती परन्तु ऐसा नहीं होता है अतः मन अणु 
तथा एक है।” 

चिन्त्य, संकल्प आदि मन के अपने स्वयं के विषयों की विभिन्‍नता के कारण एवं 
इन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के भिन्‍न-भिन्‍न होने के कारण तथा 
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से विभिन्‍न अनुपात में संयोग के कारण एक पुरुष 
के मन में एक होने पर भी अनेक प्रकार का दीखता है। वस्तुतः मन एक ही है, अनेक 
नहीं, क्योंकि एक मन एक समय में अनेक विषयों में नहीं जा सकता। अतः सब 
इन्द्रियों की एक साथ प्रवृत्ति नहीं होती है। मन के एक से अधिक होने पर एक साथ 
में एक से अधिक इन्द्रिय विषयों का ज्ञान सम्भव होता * 
मन के विषय 

चिन्त्य, विचार्य, ऊह्य, ध्येय, संकल्पय तथा अन्य जो कुछ भी मन द्वारा ज्ञेय है, 
वे सब मन के विषय हैं“ चिन्तन करना, विचार करना, ऊहय, ध्यान, संकल्प आदि 
मन के निरपेक्ष व्यापार हैं। इसके लिए किसी बाहय इन्द्रिय की (ज्ञानेन्द्रिय या 
कर्मेन्द्रियों की) सहायता की आवश्यकता नहीं होती है अतः ये मन के विषय कहलाते 
हैं। 
मन की वृत्तियाँ है 

मनोवृति एक मानसिक अनुभव है। यह स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब 
वाह्य उतेजनाएँ समाप्त हो जाती हैं और उनका प्रभाव शेष रह जाता है। इस समय 
मनुष्य जो मानसिक चेष्टा करता है उसे मनोवृत्ति अथवा चितवृत्ति कहते हैं। 

शरीर की क्रियाओं में वात, पित्त और कफ का जो स्थान है मन के कार्यों में वही 
स्थान त्रिगुण-सत्व, रज और तम का है। इन तीनों गुणों के न्यूनाधिक्य में जिस गुण 
का बाहुल्‍य होता है, मन की वृत्ति उसी के अनुसार होती है।* 

चंचलता के कारण मन जिस गुण का अनुवर्तन करता है, उस मनुष्य के मन को 
उसी गुण वाला कहा जाता है। 

जब मन पर सात्विक गुण का बाहुल्य होता है तब सात्विक मन होता है यह 
सात्विक मनोवृत्ति का परिचायक है। रजोगुण के बाहुल्य पर राजस मन राजस 
मनोवृत्ति वाला तथा तमोगुण के बाहुल्य पर तामस मन तमो मनोवृत्ति वाला होता है। 

सत्वगुण मन को सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है तथा तमोगुण:ज्ञान 
को आच्छादित करके प्रमाद में लगाता है।* 
मनोवृत्ति के प्रकार 

मनोवृत्ति दो प्रकार की होती है-परिदृष्ट (प्रत्यक्ष) तथा अपरिदृष्ट (परोक्ष) 
मनोवृत्ति। पे 
परिदृष्ट मनोवृत्ति के कारण 

]. प्रमाण। 2. विपर्यय। 3. विकल्प। 4. निद्रा। 5. स्मृति |” 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण ८ ॥5 


अपरिदृष्ट मनोवृत्ति 

जिन वस्तुओं का परिदृष्ट द्वारा ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता परन्तु वस्तु 
के अस्तित्व मात्र का ज्ञान आगम (आप्तोपदेश) अथवा अनुमान द्वारा जाना जा 
सके ऐसा होना अपरिदृष्ट मनोवृत्ति के कारण हैं। यह सात प्रकार की होती है-. 
निरोध। 2. धर्म। 3. संस्कार। 4. परिणाम। 5. जीवन। 6. चेष्टा। 7. शक्ति। 

ये सात चित्त के ऐसे धर्म हैं जिनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है।* 
मन के कर्म 

. इन्द्रियाभिग्रह-(इन्द्रियों में अधिष्ठित होना तथा उन्हें नियंत्रण में रखना)। 

2. स्वनिग्रह। 3. ऊह तथा 4. विचार करना। 

मन के उपरोक्त वर्णित कर्मों को तीन विभागों में रखा जा सकता है- 

१. संज्ञानात्मक कर्म (0027/0५० छि॥०४०5-बुद्धि प्रधान कर्म)। 

2. भावनात्मक कर्म (8॥००४४७ 0७7०४०॥५-भावनात्मक कर्म)। 

3, चेष्टात्मक कर्म (2०7४४४० थधा०४०॥$-शारीरिक चेष्टा प्रधान कर्म) । 

वाल्मीकि रामायण में भी मन नामक अतीन्द्रिय का वर्णन स्थान-स्थान पर 
किया गया है यथा- 

जो नेत्रों एवं मन को भी अत्यन्त प्रिय लगने वाला है” 

उत्साह, सामर्थ्य और मन में हिम्मत न हारना ये कार्य की सिद्धि करने वाले 
सदगुण कहे गये हैं॥०० 

तदन्तर महान प्रयास करके मैंने मन और नेत्रों को सूर्यदेव में लगाया।॥" 

मैनाक ने मन को आह्नलादित सा करते हुए मधुर वाणी में कहा ॥" 

मेरा मन भी ........... मन को रमाने वालों में सर्वश्रेष्ठ श्री राम को देखने का 
हो रहा है॥।% 

मन को संयम में रखकर .......... रा 

उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में मन की विस्तार से 
वर्णन किया गया है। 
बुद्धि 

अन्तः करण के दी तत्व होते हैं-मन एवं बुद्धि। 

मन का अवलोकन करने के पश्चात्‌ बुद्धि का वर्णन एवं उल्लेख प्रस्तुत है। 

संज्ञानात्मक कर्म मन का बुद्धि प्रधान कर्म है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने 
विषय कों ग्रहण कर उनका मन से सानिध्य कराती हैं। मन उन पर संकल्प-विकल्प 
कर बुद्धि को सौंप देता है। बुद्धि विचार तथा संकल्पों का विवेचन कर निश्चयात्मक 
निर्णय लेती है। इन निर्णयों से ही संस्कारों की उत्पत्ति होती है तथा संस्कारों से 

* स्मृति बनती है। इस प्रकार समस्त ज्ञान व्यापार बुद्धि के अधीन रहता है। बुद्धि 
“को इसलिये ज्ञान के अर्थ में भी प्रस्तुत करते हैं। समस्त व्यवहारों का कारण जो 
ज्ञान है, वह बुद्धि है, (सर्वव्यवहार हेतुज्ञनं बुद्धि) अथवा शरीर में अर्थ (विषयो) 
]6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


का ज्ञान बुद्धि है, (अर्थ प्रकाशो वा बुद्धिः)। 
मन से युक्‍त इन्द्रियाँ अपने विषय को ग्रहण करती हैं (इससे जो ज्ञान होता 
है वह निर्विकल्पक होता है) तदन्तर मन के द्वारा उसके गुण दोष की कल्पना की 
जाती है अर्थात्‌ मन, उसके गुण-दोष के अनुसार विचार करता है। इस प्रकार 
विचार के पश्चात्‌ उस विषय में निश्चियात्मक बुद्धि उत्पन्न होती है उसके द्वारा 
व्यक्ति बुद्धिपूर्वक कहने अथवा करने का निश्चय करता है॥० 
आचार्य चरक ने अन्तःकरण की गणना में चित्त तथा अहंकार को छोड़ते हुए 
केवल मन और बुद्धि का ही समावेश किया है। बुद्धि जब निश्चय करने पर उद्यत 
होती है कि अमुक ग्रहण करना है तथा अमुक छोड़ना है ऐसा वह अहंकाराधीन 
ही करती है। अतः बुद्धि के इस व्यापार में अहंकार का भी ग्रहण हो जाता है। 
वास्तव में मन के विभिन्‍न कार्यों के लिये ही यह. विभिन्‍न संज्ञाएँ प्रदान की गयी 
हैं। जब किसी बात पर संकल्प-विकल्प की स्थिति होती है तो मन का कार्य होता 
है, जब निश्चियात्मक स्थिति होती है तो कर्ता को बुद्धि कहते हैं। स्मरणात्मक 
स्थिति को चित्त द्वारा किया हुआ कहते हैं तथा ममत्वभाव को अहंकार द्वारा किया 
हुआ मानते हैं। 
रजो गुण के कारण ही बुद्धि कार्य में प्रवृत्त होती है। उस समय यदि रजोगुण 
के साथ सत्व गुण प्रधान होता है तो सात्विक बुद्धि कहलाती है.। सात्विक बुद्धि 
धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य का ज्ञान कराती है यदि तमोगुण प्रधान है, 
तामसिक बुद्धि अधर्म, अज्ञान तथा अनैश्वर्यज्ञान का कारण होती है। अतः बुद्धि 
ही समस्त संस्कारों का अधिष्ठान है। बुद्धि के इस जन्म में सात्विक होने पर भी 
वह पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण राजसिक अथवा तामसिक भी हो सकती है। 
बुद्धि द्वारा उत्पन्न ज्ञान दो प्रकार का होता है 
. सस्कार जन्य ज्ञान 
2. इससे भिन्‍न ज्ञान अनुभव कहलाता है। 
अनुभव भी दो प्रकार का होता है। . यथार्थ। 2. अयथार्थ | 
यथार्थ (770०) अनुभव को प्रमा अथवा विद्या कहते हैं। प्रमा प्रत्यक्ष, अनुमान 
तथा आप्तोपदेश द्वारा उत्पन्न होती है। बुद्धि द्वारा यदि यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति 
नहीं होती है तब अयथार्थ ज्ञान (अज्ञान) की उत्पत्ति होती है अथवा विषम रूप 
में कमों में प्रवृत्त होती है। इसे आयुर्वेद प्रज्ञापाध मानना है। प्रज्ञापाध को मन 
की दशा द्वारा जान सकते हैं।॥० 
“*मनोअधिष्ठित इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय के अतियोग, अयोग अंथवा मिथ्यायोग 
से विकृत हुई अपनी-अपनी बुद्धि (श्रोत, स्पर्शन, चक्षु, बुद्धि, रसन, प्राण बुद्धि) 
का संहार करती है जिससे अयथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके विपरीत 
प्राकृतावस्था में रहती हुई ये इन्द्रियाँ अपनी-अपनी बुद्धि का सन्तर्पण करती हैं 
" "- उससे यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है ॥९* 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / ]7 


पाश्चात्य दर्शन शास्त्री बुद्धि तथा ज्ञान को पृथक्‌-पृथक्‌ मानते हैं। उनका 
कथन है कि बालक की बुद्धि उसकी आयु के साथ बढ़ती है किन्तु किशोरावस्था 
में एक आयु पर आकर उसका विकास रुक जाता है जिस आयु पर आकर यह 
विकास रुकता है वह ठीक-ठीक बताना कठिन है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में यह 
पथक-पृथक है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आयु के उपरान्त मानसिक 
अभिवृद्धि नहीं होती है परन्तु बाद में बुद्धि नहीं वरन ज्ञान बढ़ता है। इस प्रकार 
ज्ञान एक अर्जित शक्ति है तथा बुद्धि जन्मजात योग्यता है। 
वाल्मीकि रामायण में बुद्धि का उल्लेख भी निम्नलिखित स्थानों पर मिलता है- 

श्री राम के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है वे बुद्धिमान, नीतिज्ञ हैं ॥४० 
एक अन्य स्थान पर कहा गया है- 

कुम्भकर्ण ! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो परन्तु तुम्हारी दृष्टि (बुद्धि) निम्न 
श्रेणी के लोगों के समान है।! 

विभीषण की बुद्धि की तुलना बृहस्पति जी से करते हुए कहा गया है-विभीषण 
बृहस्पति के समान बुद्धिमान थे।”? 

उपरोक्त तत्वों का एवं उद्धरणों का विधिपूर्वक अध्ययन करने से यह स्पष्ट 
परिलक्षित हो जाता है कि रामायण में अन्तः करण के दोनों तत्वों, मन एवं बुद्धि 
की विशद्‌ व्याख्या की गयी है। 

आयुर्वेदीय ग्रन्थ न होने के कारण इसमें मन एवं बुद्धि को आयुर्वेदिक दृष्टि 
से तो प्रस्तुत नहीं किया है-किन्तु इसका उल्लेख अवश्य विभिन्‍न संदर्भों में किया 
गया है। 
5. इन्द्रियाँ 

इन्द्रियाँ बाह्य संसार में प्रवेश के द्वार हैं। इन्हीं के द्वारा हम परिवेश में वर्तमान 
वस्तुओं के प्रति सचेत होते हैं, उनका ज्ञान प्राप्त करते हैं। बुद्धि इन्हीं इन्द्रियों के 
द्वारा कार्य करने में प्रवृत्त होती है। चक्षु के बिना देखना, श्रोत्र के बिना सुनना, 
प्राण के बिना सूँघना, रसन के बिना स्वाद ले संकना तथा स्पर्श के बिना स्पर्शज्ञान 
का अनुभव कर सकना असम्भव है और जब प्राणी न देखेगा, न सुनेगा, न सूँघेगा, 
न स्वाद लेगा और न स्पर्शानुभूति ही ग्रहण करेगा तो उसमें कार्य करने की प्रेरणा 
कहाँ से जगेगी। इन्द्रियों के इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए आयुर्वेद की 
संहिताओं में इनकी विस्तार से व्याख्या की गयी है। 

तर्क भाषा के अनुसार इन्द्रिय वह प्रमेय है जो शरीर से संयुक्त, अतीन्द्रिय 
तथा ज्ञान का कारण हो ।” इस परिभाषा में इन्द्रिय की निम्न चार विशेषताओं 
की ओर संकेत किया गया है- 
१. इन्द्रिय प्रमेय अर्थात्‌ प्रमाण का विषय है। इसे जाना जा सकता है। इसका 

बोध कराया जा सकता है। 
2. इन्द्रिय शरीर संयुक्त है। शरीर में अपने अधिष्ठानों में स्थित रहकर यह कार्य; 

8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


में प्रवृत्त होती है। साधारणतः शरीरगत अधिष्ठानों से पृथक्‌ रहकर इसके 
कार्यो की कल्पना नहीं की जा सकती। 

$. इन्द्रियों का ज्ञान अप्रत्यक्ष रूप से अनुमान द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। 
इन्द्रिय का इन्द्रिय-प्रत्यक्ष संभव नहीं। चक्षु दूसरी वस्तुओं को तो देख सकता 
है पर स्वयं को नहीं। दर्पण में इन्द्रियाधिष्ठान को देखा जा सकता है, चक्षु 
नहीं। 

4. इन्द्रियाँ ज्ञान के कारण हैं। बाह्य संसार का ज्ञान इन्हीं के द्वारा प्राप्त किया जा 
सकता है। भौतिकवादियों के अनुसार हमारे समस्त ज्ञान-विज्ञान के ये ही 
आधार हैं। यहाँ तक कि संसार की तथा स्वयं अपने की संकल्पनाएँ भी 
इन्हीं इन्द्रियों का प्रतिफल हैं।"? 

इन्द्रियों की संख्या * 
इन्द्रियाँ दो प्रकार की मानी गयी हैं-अन्तरिन्द्रिय तथा बहिरिन्द्रिय । अन्तरिन्द्रिय 

के द्वारा प्राणी शरीर के अंदर का ज्ञान प्राप्त करता है। हमारे शास्त्रकारों ने मन 

को ही अन्तरिन्द्रिय माना है। यथा, तर्क संग्रह के अनुसार जिस इन्द्रियके द्वारा हमें 
सुखदुःखादि की उपलब्धि होती है वही मन है (सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः)। 
बहिन्द्रियाँ बाह्य जगत का ज्ञान प्राप्त कराने में सहायक होती हैं। चक्षु, ओत्र आदि 
बहिरन्द्रियाँ हैं। 

बहिरन्द्रियाँ पुनः दो प्रकार की मानी गयी हैं-ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ। 
ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्त कराने का साधन हैं और कर्मेन्द्रियाँ कर्म सम्पादन का। चक्षु, 
श्रोत आदि ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हस्तपादादि कर्मेन्द्रियाँ। आयुर्वेद में इन्द्रिय शब्द' 
प्रायः ज्ञानेन्द्रियों के लिये ही प्रयुक्त हुआ है। 

इन्द्रियाँ पाँच हैं-चश्षु, श्रोत्र, प्राण, रसन तथा स्पर्शन ।'* चक्षु देखने का, श्रोत्र 
सुनने का, प्राण सूँघने का, रसन स्वाद ग्रहण करने का और स्पर्शन स्पर्श को 
अनुभव करने का कार्य करती है। 

इन्द्रियों के द्रव्य 
न्याय वैशेषिक के अनुसार कार्य के समवायी कारण तथा गुण और कर्म के 

आश्रयभूत पदार्थ को 'द्रव्य/ कहते हैं। द्रव्य ही किसी वस्तु का उपादान कारण 

होता है। इसी से वस्तुएँ बनती हैं। इनकी संख्या नौ है-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, 
आकाश, दिक्‌, काल, आत्मा और मन। ये कारणदद्रव्य कहलाते हैं। इनसे प्रसूत 
स्थूल सृष्टियाँ कार्य-द्रव्य कहलाती हैं। चरक ने कार्य-द्रव्यों की दो कोटियाँ 

बतलायी हैं-सेन्द्रिय अर्थात्‌ चेतन द्रव्य तथा निरिन्द्रिय अर्थात्‌ अचेतन द्रव्य ॥0* 

समस्त भौतिक सृष्टि का उपादान कारण पज्चमहाभूत हैं। इन्द्रियाँ और इन्द्रियार्थ 

भी भौतिक हैं।'* उनका भी उपादान कारण पंच महाभूत ही हैं। पञ्च भौतिक 

होते हुए भी प्रत्येक इन्द्रिय में एक-एक द्रव्य का प्राधान्य है।'* जिस इन्द्रिय में; 

जिस द्रव्य की प्रधानता है उसे उसी से निर्मित माना गया है। आकाश से श्रोत्र, 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण ४ 9 





वायु से स्पर्शन, ज्योति से चक्षु, अप्‌ से रसन तथा भू से प्राण की उत्पत्ति की 
कल्पना की गयी है।॥? 

भारतीय दर्शन में इन्द्रियों की भौतिकता के सम्बन्ध में काफी मतभेद हैं। जहाँ 
एक ओर सांख्य इन्हें वैकारिक अहंकार से उत्पन्न मान इनकी भौतिकता का स्पष्ट 
विरोध करता है ।' वहीं दूसरी ओर न्याय, वैशेषिक एवं वेदान्त इनकी भौतिकता 
का प्रतिपादन करते हैं।* 

दोनों ही दृष्टियाँ इन्द्रियों के जड़त्व से इन्कार नहीं करतीं। सांख्य-प्रतिपादित 
वैकारिक अहंकार भी तो जड़ प्रकृति का ही विकार है। दोनों में अंतर है तो केवल 
सूक्ष्मता की मात्रा का। एक इन्हें अधिक सूक्ष्म मानती है, दूसरी कम। 
इन्द्रियों के अधिष्ठान 

अधिष्ठान वास स्थान अथवा रहने की जगह को कहते हैं। इन्द्रियाँ जिन 
स्थानों में रहती हों उन्हें इन्द्रिय अधिष्ठान कहते हैं। पाँच इन्द्रियों के पाँच 
अधिष्ठान हैं-दोनों नेत्र, दोनों कान, दोनों नासागुहा, जिहा तथा त्वचा। इन्द्रियाँ 
अपने ही अधिष्ठानों में रहकर विषयों को ग्रहण करती हैं।॥** 
इन्द्रियों के स्रोत 

इन्द्रियाँ अपने आभ्यान्तरिक अधिष्ठान मस्तिष्क में स्थित रह विशेष प्रकार के. 
स्रोतों के द्वारा जिन्हें इन्द्रिय-स्लोत कहते हैं, अपना कार्य करती हैं। चरक के 
अनुसार ये स्रोत मस्तिष्क से उसी प्रकार बंधे हैं जैसे सूर्य से सूर्य की किरणें ॥” 
अपने-अपने कार्य के अनुरूप ही इनके अलग-अलग नाम पड़ गये 
हैं-यथा-दृष्टि-नाड़ी, श्रवण-नाड़ी आदि। दृष्टि-नाड़ी तथा दोनों नेत्रों की सहायता 
से चक्षु बाह्य जगत की दृश्य उत्तेजनाओं को ग्रहण करता है। श्रवण नाड़ी तथा 
दोनों कानों के माध्यम से स्रोत शब्दोत्तेजनाओं को ग्रहण करता है। इसी प्रकार 
अन्य इन्द्रियाँ भी अपना-अपना कार्य सम्पादित करती हैं। 
इन्द्रियों के अर्थ 

अर्थ विषय को कहते हैं। इन्द्रियाँ जिन विषयों को ग्रहण करती हैं उन्हें ही 
इन्द्रियार्थ कहते हैं। ये भी पाँच है-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ।'* इनमें से 
शब्द श्रोत्र का, स्पर्श स्पर्शन का, रूप चक्षु का, रस रसन का और गन्ध प्राण का 
विषय है। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इन्हीं को समुचित उत्तेजना (89- 
ए7णए7४०७ 5077045) कहा जाता है। 

मन के साथ इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती हैं। इसके बाद मन 
संकल्प करता है कि यह वस्तु गुण युक्त है अथवा दोष युक्त है। इंस विषय में 
जो निश्चियात्मिका बुद्धि होती है उसी के अनुसार मनुष्य बुद्धिपूर्वक कुछ कहने 
अथवा सुनने में समर्थ होता है।'”* 

वाल्मीकि रामायण में इन्द्रियों का विशद्‌ वर्णन प्राप्त होता है। विभिन्‍न स्थलों 
पर भिन्न-भिन्न अर्थों में इनका उल्लेख किया गया है यथा- 

]20 / वाल्मीकि रामायण तथां आयुर्वेद 


राजा का मन बहुत उदास हो गया, उनकी इन्द्रियाँ चंचल एवं व्याकुल हो उठीं 
और वे पुनः अधिक विषाद करने लगे” 

वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियों को अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था।॥* 

सीता जी के विषय में ऐसे रूखे, कठोर, तीखें और इन्द्रियों को संताप देने वाले 
दुर्वचन को सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे ।'” 

मेरी इन्द्रियाँ विचलित हो रही थीं।'” 

फूलों के संसर्ग से सुगन्धित तथा ब्राणेन्द्रिय को सुख देने याली मन्द वायु चलने 
लगी ।४ 

उपरोक्त संदर्भों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि रामायण में इन्द्रियों का 
नामोल्लेख पूर्वक वर्णन किया गया है। 
6. प्रकृति भेद-वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक प्रकृति 

गर्भस्थ शिशु की देह पिता के शुक्राणु तथा माता के शोणित (अण्डाणु, डिम्ब) 
के संयोग से बनती है। संयोग के साथ शुक्राणु तथा डिम्ब में जो दोष प्रबल होते 
हैं उन्हीं के अनुसार शिशु की गर्भ में प्रकृति (भ्रानसिक-शारीरिक गठन) बनती है 
और आजन्म बनी रहती है।* 

शुक्र और शोणित (डिम्ब) की प्रकृति, काल (माता की अवस्था भी) तथा 
गर्भाशय की प्रकृति, माता के आहार, विहार की प्रकृति और महाभूतों के विकार की 
प्रकृति पर गर्भ शरीर की प्रकृति निर्भर होती है। (अधिकृत भूत सृष्टि उत्पत्ति नहीं 
कर सकते हैं अतः महाभूतों के पज्चीकरण को विकार कहा गया है)। ये प्रकृतियाँ 
जिन एक अथवा अधिक प्रबल दोषों (वात, पित्त, कफ) से संयोग करती हैं उन्हीं 
दोषों से गर्भ भी अनुबद्ध हो जाता है। इस प्रकार गर्भ के प्रारम्भ में प्रबल दोष, 
जिससे गर्भ अनुबद्ध हो जाता है, उस पुरुष की “दोषज प्रकृति” बनाते हैं। अतएव 
कुछ मनुष्य वाताधिक्य से वातल प्रकृति, पित्ताधिक्य से पित्तल प्रकृति, कफाधिक्य 
से श्लेष्मल प्रकृति, बन्द्राधिक्य से डन्द्रज प्रकृति तथा दोषों की समावस्था से 
समप्रकृति वाले होते हैं। इस प्रकार दोषज प्रकृतियाँ सात प्रकार की होती हैं ॥?* 

' आयुर्वेद के अन्य संहिता ग्रन्थों में इन्हीं सात प्रकार की दोषज प्रकृतियों का 

वर्णन किया गया है। ये हैं-पृथक-पृथक दोषों के अनुसार तीन प्रकार की . वात 
प्रकृति। 2. पित्त प्रकृति। 3. कफ-प्रकृति, दो दोषों के संयोग से भी तीन प्रकार की। 
4. वात-पित्त प्रकृति। 5. वात-कफ प्रकृति। 6. पित्त कफप्रकृति तथा तीनों दोषों के 
साथ संयोग से एक प्रकार की 7. समवात पित कफ प्रकृति। जन्म से ही प्रत्येक 
व्यक्ति इन सातों प्रकृतियों में से किसी एक प्रकार की प्रकृति का स्वामी होता 
है।४ 

इन प्रकृतियों में भी सम प्रकृति श्रेष्ठ कही गयी है। इस प्रकृति वाले व्यक्ति 
स्वस्थ, निरोग रहते हैं तथा अन्य प्रकृति वाले व्यक्ति में रोगों से आक्रान्त होने की 
सम्भावना अधिक रहती है। सम प्रकृति के अतिरिक्त कफ प्रकृति उत्तम; पित्त , 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 2 


प्रकृति मध्यम, वात-प्रकृति हीन तथा द्विदोषज प्रकृतियाँ निन्‍्दनीय कही गयी हैं।॥** 

विष की प्रबलता से उत्पन्न हुआ कीट जिस प्रकार अपने शरीर गत विष से 
नहीं मरता है इसी प्रकार शरीर गत प्रकृति मनुष्य को किसी प्रकार की हानि नहीं 
पहुँचाती है” 

यद्यपि सम प्रकृति के अतिरिक्त अन्य प्रकृतियों में दोष समभाव से स्थित नहीं 
होते हैं परन्तु इन प्रकृतियों से बढ़े हुए दोषों द्वारा मनुष्यों को हानि नहीं होती है 
उदाहरण के लिये-जिस प्रकार विषैले सर्प को अपने विष से कोई हानि नहीं होती। 
उसी प्रकार यह दोषोत्कटता गर्भ से होने के कारण सहज होती है अतः घातक नहीं 
होती है। सुश्रुत संहिता की टीका करते हुए इस विषय पर डल्हण ने कहा है कि- 
दोषोत्कटता दो प्रकार की होती है ।. प्राकृत तथा 2. वैकृत। गर्भ से ही प्रकृति के 
निर्माण में जिन दोषों की प्रबलता होती है वे प्राकृत हैं अतः हानिकर नहीं हैं। अन्य 
समय की दोषों की उत्कटता वैकृत है अतः हानिकर है। चरक पाणिदत्त चरक 
संहिता की टीका में कहते हैं कि दोषोत्कटता तीन प्रकार की होती है--. हीन 
(अल्प) 2. मध्यम तथा 5. उत्तम। गर्भोत्पति के साथ अल्पदोषोत्कटता होती है, 
अतः घातक नहीं होती है। 

प्रकृतियों का प्रकोप अर्थात्‌ वृद्धि होना यथा सामान्य वातिक से तीव्र वातिक 
हो जाना आदि, प्रकृति का अन्य भाव होना यथा वात-प्रकृति का पित्त या कफ 
प्रकृति में परिवर्तन होना आदि। प्रकृति का क्षय हो जाना यथा तीव्र वात-प्रकृति का 
अल्पवात प्रकृति में परिवर्तन हो जाना आदि। ये परिवर्तन स्वाभाविक नहीं होते हैं। 
स्वभाव से प्रकृति के भावों में वृद्धि, हास अथवा अन्य भावों में परिवर्तन नहीं होता 
है। प्रकृति में इस प्रकार के परिवर्तन आयु समाप्ति के सूचक हैं। ये लक्षण उस 
समय बहुधा दिखाई देते हैं जबकि जीवन की अंतिम अवस्था होती है॥* 
वातिक प्रकृति पुरुष के लक्षण 

वात-प्रकृति पुरुष अल्पकेश युक्त, तथा रुक्ष शरीर वाला, वाचाल, चपल तथा 
स्वप्न में आकाश में विचरण करने वाला होता है।'* 

वातिक पुरुष बकरी, गीदड़, खरगोश, चूहा, ऊँट, कुत्ता, गिद्ध, कौवा, गधा 
आदि के स्वभाव वाला होता है। अतः वात-प्रकृति व्यक्ति इन पशुओं के समान 
चपल, अदृढ़, मत्सर और भीरू होता है।४ 

गीदड़ ऊँट, गिद्ध, चूहे तथा कौवे के स्वभाव वाले व्यक्ति की वात-प्रकृति को 
जानना चाहिये।» 

वात के गुण रुक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद तथा खर हैं ।“*्वात-प्रकृति 
मनुष्यों के शारीरिक तथा मानसिक लक्षण इन गुणों के अनुरूप होते हैं। 
शारीरिक लक्षण * 

शरीर रुक्ष, कृश तथा कुरूप होता है। अंग बेडील तथा आकृति लम्बी होती 
है। शरीर पर कण्डराएँ और शिराएँ उभरी रहती हैं। त्वचा रुक्ष और फटी हुई होती 

22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


है। दाढ़ी, मूँछ, केश, रोम, दाँत, नख रुक्ष होते हैं। नेत्र, खर, धूसर, वृत (गोल), 
कुरूप तथा मृतप्रायः होते हैं तथा सोते समय उभरे हुए प्रतीत होते हैं। स्वर 
अत्यन्त जर्जर तथा रुक-रुक कर बोलने वाला होता है, अंग हर समय फड़कते 
रहते हैं। तेजी से चलता है और चलते समय संधियों में शब्द होता है। शीत को 
सहन नहीं कर सकता है। अतः शीत के कारण शरीर में कम्प तथा स्तम्भन हो 
जाता है। भोजन अल्प करता है अम्ल तथा लवणरसों की इच्छा रखता है और ये 
रस सद्न होते हैं। शरीर में पित्त (अग्नि-ऊषा त्रआए८आणा०) कम होता है तथा 
कम बलशाली होता है। 
मानसिक लक्षण 

कार्य में शीघ्र प्रवृत्त हो जाने की आदत होती है किसी बात को शीघ्र ही ग्रहण 
कर लेता है परन्तु अल्प स्मृति के कारण शीघ्र ही भूल जाता है। बहुत बोलने 
वाला, अदृढ़ स्वभाव वाला होता है। शीत्र ही क्षुब्ध हो जाता है। बैर्य रहित, कृतष्न 
तथा मैत्री में अदृढ़ होता है। अजितेन्द्रिय, आचारहीन, स्त्रियों को अप्रिय तथा कम 
सन्‍्तान वाला होता है। नास्तिक, देषी, मत्सर, चोरी आदि के स्वभाव वाला होता है। 

स्व में पर्वतों और वृक्षों को देखता है तथा आकाश में अपने को उड़ता हुआ 
अनुभव करता है। 
पितप्रकृति पुरुष के लक्षण 

पित्त प्रकृति पुरुष के केश असमय में ही श्वेत हो जाते हैं, वह बुद्धिमान होता 
है, स्वेद तथा क्रोध बहुत आता है, स्वप्न में अग्नियाँ देखता है।'* पित्त प्रकृति 
पुरुष सर्प, उल्लू, गन्धर्व, यक्ष, बिल्ली, बंदर, व्याप्र, रीछ और नेवले के स्वभाव के 
समान स्वभाव वाला होता है॥* 

पित्त प्रकृति पुरुष की आयु मध्यम, बल मध्यम होता है। वह विद्वान होता है। 
क्लेश को सहन नहीं कर सकता है तथा व्याप्र, रीछ, बंदर, बिल्ली और यक्ष के 
स्वभाव वाला होता है॥/ 

पित्त के गुण स्नेह युक्त उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर, कट हैं। (सस्नेहमुष्णं 
तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु-चरक) (पित्त सस्नेह तीक्ष्णोष्णं लघु विद्ध सर॑ द्रवम-अ. 
ह.) पित्त प्रकृति पुरुष में इन गुणों की प्रधानता रहती है अतः उनके शारीरिक 
तथा मानसिक लक्षण इन गुणों के अनुरूप होते हैं। 
शारीरिक लक्षण 

शरीर सुकुमार तथा वर्ण में गौर होता है। शरीर के अंग पेशियाँ और संधियाँ 
शिथिल रहती हैं। अंग पर झुर्रियाँ शीघ्र पड़ जाती हैं। मुख, नख, नेत्र, तालु, जिह्ला 
हाथ, पैर, ताम्र वर्ण के, नेत्र छोटे और कपिल वर्ण के, पलकें छोटी और कम बालों 
वाली होती हैं। केश तथा रोम भी अल्प तथा कपिल वर्ण के होते हैं। केश जल्दी 
ही श्वेत हो जाते हैं और गंजापन भी हो जाता है। स्वेद बहुत आता है तथा 
आमगन्धी होने. के कारण दुर्गन्धमय होता है। शरीर सामान्य से अधिक उष्ण 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 23 


रहता है। भूख तथा प्यास बहुत लगती है। उष्णता को सहन नहीं करने के कारण 
शीतल वस्तुओं की इच्छा होती है। मैथुन शक्ति कम अतः कम सन्तान वाला 
होता है। त्वचा पर पिप्लु, व्यंग तथा तिल अधिक होते हैं। पिड़िकाएँ बहुत 
निकलती हैं। 
मानसिक लक्षण 

पित्त प्रकृति पुरुष तीक्ष्ण स्वभाव का होता है। शीघ्र ही क्रोधित तथा शीघ्र ही 
शान्त हो जाने वाला, श्रृंगार प्रिय, वीर, साहसी, बुद्धिमान, मेधावी, उत्तम धारणा 
शक्ति सम्पन्न, कुशाग्र-बुद्धि, तेजस्वी, भय रहित, प्रतिवादी के पक्ष का खण्डन कर 
बोलने वाला होता है। आश्रितों को सान्त्वना देने वाला तथा अपने आश्रय दाता 
से प्रेम करने वाला, उत्तम चरित्रवान होता है। ऐसा व्यक्ति ईर्ष्यालु भी होता है। 

स्वप्न में अग्नि-दाह, उल्कापात, बिजली, सूर्य, अग्नि, स्वर्ण, पलाश, कर्णिकार 
आदि दिखाई दिया करते हैं। 
कफ प्रकृति पुरुष के लक्षण 

कफ प्रकृति पुरुष गंभीर बुद्धि, स्थूल अंग, स्निग्थ केश, अति बलवान तथा 
स्वप्न में जलाशयों को देखने वाला होता है।'* 

कफ प्रकृति पुरुष ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, सिंह, घोड़ा, हाथी, गौ, सांड, गरुड़ 
और हंस के समान गम्भीर स्वभाव वाला होता है॥* 

कफ प्रकृति का मनुष्य ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, सिंह, घोड़ा, हाथी, गौ, सांड 
के स्वभाव वाला होता है।“ 

श्लेष्मा के गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, स्थिर तथा पिच्छिल (गुरु, शीत, मूदु, 
स्निग्ध, मधुर पिच्छिला) चरक, स्निग्धः शीतो गुरुर्मन्दः, श्लक्ष्णो मृत्स्नः स्थिरः 
कफ: (अ. ह.) गुण हैं। श्लेष्म पुरुष की प्रकृति इन गुणों के अनुरूप होती है। 
शारीरिक लक्षण 

शरीर सुन्दर, सुडौल तथा सुविभक्त होता है। अंगस्थिर, पुष्ट तथा भरे हुए, 
बाहें लम्बी तथा गोल, वक्ष स्थल पुष्ट एवं मस्तक ऊँचा होता है। वर्ण निर्मल एवं 
दूर्वा, नीलकमल, कोमल, नीम-पत्र, सरकण्डा, प्रियक्र, धान्य, गोरोचन अथवा 
सुवर्ण के समान होता है। मुख से प्रसन्‍नता टपकती है। नेत्र प्रसन्‍न, विशाल तथा 
कोरों में सुर्खी लिये हुए होते हैं। पलकें काली होती हैं। केश काले चमकदार होते 
हैं। चाल सार युक्त, दृढ़ तथा स्थिर हाथी के समान होती है। स्वर मेघ, मृदज्ष, 
समुद्र तथा सिंह के समान गम्भीर होता है। अत्यधिक वीर्यवान, मैथुन शक्ति 
सम्पन्न तथा अधिक सन्तानों वाला होता है। शारीरिक विकार अत्यन्त अल्प होते 
हैं। 
मानसिक लक्षण 

सात्विक चित्त वाला, सत्यवादी, धर्मात्मा, स्मृतिवान्‌ तथा मान को महत्त्व देने 
वाला एवं स्थिर स्वभाव का होता है। मन तथा वचन प्रवृत्ति में शीघ्रता नहीं करता 

24 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


है। क्षोभ कम करने वाला, कृतज्ञ, वीर, सहनशील, ओजस्वी, शान्त, दीर्घायु, 
निर्लोभी तथा धनवान होता है। मित्रता तथा शत्रुता को स्थिर रखने वाला, 
आदरणीय पुरुषों का सम्मान करने वाला, सोच-समझकर कार्य करने वाला तथा 
हमेशा निश्चित बात कहने वाला है। भूख-प्यास-दुःख, क्लेश सहन करने वाला 
तथा अल्प क्रोधी, अल्प ईर्ष्या, चेष्य और अल्प आहार-विहार वाला होता है। 
आयुष्यमान, धन, ऐश्वर्यवान, दीर्ष-दर्शी, पण्डित तथा लज्जा युक्त होता है। स्वप्न 
में कमल एवं पक्षियों से युक्त जलाशय, मेघ आदि को देखता है। 
सम एवं दन्द्रज प्रकृतियों के लक्षण 

सम-प्रकृति पुरुष में तीनों प्रकृतियों के उत्तम लक्षण तथा दन्दज प्रकृति वाले 
मनुष्यों में उन प्रकृतियों के सम्मिलित लक्षण मिलते हैं। 
भौतिक प्रकृतियाँ 

कुछ आचार्यों के मतानुसार मनुष्य की प्रकृतियाँ पड्च महाभूतों के कारण पाँच 
प्रकार की होती हैं--]. नाभस। 2. वायव्य । 3. आग्नेय | 4. जलीय । 5. पार्थिव । 
पवन (वायव्य) प्रकृति वाले व्यक्ति की प्रकृति के लक्षण वातिक प्रकृति वाले 
व्यक्तियों के समान होते हैं। दहन (आग्नेय) तेजस, प्रकृति वाले व्यक्तियों की 
प्रकृति पैत्तिक प्रकृति वाले व्यक्तियों के समान होती है। तोय (जलीय) प्रकृति 
वाले व्यक्तियों की प्रकृति कफज प्रकृति वाले व्यक्तियों के समान होती है। शेष 
दो पार्थिव तथा नाभस प्रकृतियों वाले व्यक्तियों के लक्षण इस प्रकार हैं-पार्थिव 
प्रकृति वाला व्यक्ति स्थिर, विपुल शरीर वाला तथा क्षमावान होता है और नाभस 
प्रकृति वाला व्यक्ति पवित्र आचरण वाला, विशाल शरीर छिद्रों वाला अर्थात्‌ मुख, 
कर्ण, नासिका के बड़े छिद्रों वाला दीर्घायु होता है॥& 
मानस प्रकृतियाँ 

मन की प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है इसमें जिस गुण की गर्भ अवस्था के समय 
प्रधानता होती है उसी का प्रभाव मानसिक क्रियाओं पर सबसे अधिक होता है। 
इस प्रकार जन्म से ही तीन प्रकार की मानसिक प्रकृतियाँ होती हैं-- 
. सात्विक प्रकृति। 
2. राजस प्रकृति। 
3. तामस प्रकृति। 

सात्विक प्रकृति उत्तम, राजस प्रकृति मंध्यम तथा तामस प्रकृति हीन होती है। 
सात्विक प्रकृति सात प्रकार की, राजस प्रकृति छः प्रकार की तथा तामस प्रकृति 
तीन प्रकार की होती है- 
सात्विक प्रकृति के भेद तथा लक्षण 
. ब्रह्मकाय अथवा ब्रह्मसत्व 

ऐसा व्यक्ति पवित्रता से रहता है, आस्तिक बुद्धि रखता है, ज्ञान-विज्ञान का 
अभ्यास करता है। गुरुजनों का एवं बड़ों का आदर सम्मान करता है, सत्य-प्रतिज्ञ, 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण » 25 


जितात्मा, कार्य-अकार्य का विभाग करने वाला, वचन तथा प्रतिवचन से युक्त, 
स्मृतिवान, काम, ,क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अप्रसन्‍नता तथा असहिष्णुता से रहित 
एवं सब प्राणियों पर समदृष्टि रखने वाला होता है। 
2. महेन्द्रकाय अथवा ऐन्द्र सत्व 

ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यवान्‌, शूरवीर, तेजस्वी, शास्त्रों के अनुसार आचरण करने 
वाला, निन्दित कर्म न करने वाला, अपने आश्वितों का भरण-पोषण करने वाला, 
दीर्घ-दर्शी, धर्म, अर्थ तथा काम में रत होता है। 
3. वारुणकाय अथवा वारुण सत्व 

ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यवान्‌ शूरवीर, सहनशील, पवित्रता से प्रेम एवं अपवित्रता से 
द्वेष रखने वाला, शीत-पदार्थों में रुचि रखने वाला, निन्दित कर्मों को न करने 
वाला, भाषण में मधुर स्वभाव रखने वाला होता है। 
4. कौबेर काय अथवा कौबेर सत्व 

ऐसा व्यक्ति सम्पन्न, मान-सम्मान से युक्त, नित्य कर्म, अर्थ तथा काम में 
प्रवृत्त, स्पष्ट प्रसन्‍नता एवं अप्रसन्‍नता वाला होता है। 
5. गान्ध्वकाय अथवा गान्धर्व सत्व 

ऐसा व्यक्ति नाच, गाने, बजाने, सुगन्धित वस्त्र, आभूषणों का शौकीन, 
इतिहास पुराण आदि में कुशल तथा स्वभाव में भ्रमणशील होता है। 
6. याम्यकाय अथवा याम्यसत्व 

ऐसे व्यक्ति का आचार कर्त्तव्यवान कर्त्तव्य में मर्यादित होता है तथा असीम 
उत्साह सम्पन्न, निर्भय, उत्तम स्मरण शक्तियुक्त, स्वच्छता प्रिय, राग, मोह, मद 
एवं द्वेष से वियुक्त, उद्यमी तथा ऐश्वर्यवान होता है। 
7. ऋषिकाय अथवा आर्षसत्व 

ऐसा व्यक्ति जप, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, 
अतिथि पूजक, ज्ञान-विज्ञान में निपुण, अहंकार, राग-द्वेष, मोह-लोभ एवं क्रोध 
रहित प्रतिभावान तथा विचारवान होता है। 

इस प्रकार कल्याण भाव से सम्पन्न होने के कारण ये सात भेद शुद्ध सत्व के 
हैं। कल्याण अंश के सम्यक्‌ योग के कारण ब्रह्मसत्व अत्यन्त शुद्ध जानना 
चाहिये ७ 

ये ब्रह्मकाय से ऋषिकाय तक सात प्रकार की प्रकृति वाले व्यक्ति सात्विक 
प्रकृति के होते हैं॥+ है 
राजस प्रकृति के भेद तथा लक्षण 

राजस प्रकृति में रोष का अंश अधिक होता है इसके छः भेद हैं। 
. आसुरकाय अथवा आसुर सत्व 

ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यवान, उग्र, क्रोधी एवं निर्दय स्वभाव वाला, दूसरों के गुणों 
पर भी दोषारोपण करने वाला, भोजन में अकेला खाने वाला. (असूयक) एवं पेटू 

26 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


(औदरिक) तथा व्यवहार में स्वार्थी एवं आत्मश्लाघी होता है। 
2. सर्पकाय अथवा सार्पसत्व 

ऐसा व्यक्ति क्रोध के समय शूर तथा अक्रोध के समय भीरू, घातक (तीक्ष्ण), 
परिश्रमी, आहार-विहार में चपल तथा कपटी होता है। 
$. शाकुनकाय अथवा शाकुन सत्व 

ऐसा व्यक्ति अत्यन्त कामी, असहिष्णु, चंचल चित्त वाला, हर समय आहार-विहार 
में रत तथा धन आदि का संचय न करने वाला होता है। 
4. राक्षसकाय अथवा राक्षस सत्व 

ऐसा व्यक्ति असहिष्णु, दीर्घकाल तक क्रोध में रहने वाला, अवसर देखकर 
प्रहार करने वाला, निर्दयी, अत्यन्त परिश्रमी, ईर्ष्यालु, अधर्म आचरण वाला तथा 
अत्यन्त आत्मश्लाघी होता है। 
5. पैशाचकाय अथवा पैशाच सत्व 

उच्छिष्ट आहार का सेवन करने वाला, तीक्ष्ण स्वभाव वाला, स्त्री लम्पट, 
निर्लज्ज, भीरू, दूसरों को डराने वाला, पवित्रता द्वेषी होता है। 
6. प्रेतकाय अथवा प्रेतसत्व 

आहार-प्रिय, शील, आचार, व्यवहार और उपचार से अत्यन्त दुःख देने वाला, 
“अत्यन्त लोभी, आलसी, दूसरों के गुणों में भी दोषारोपण करने वाला, लालची एवं 
दान न करने वाला होता है। 

ये छः प्रकार के सत्व के भेद “रोष” के अंश से युक्त राजस प्रकृति के हैं 
तामस प्रकृति के भेद तथा लक्षण 

तामस प्रकृति में मोह का अंश अधिक होता है। इसके तीन भेद हैं- 
१. पशुकाय अथवा पाशय सत्व 

ऐसे व्यक्ति बुद्धिहीन, कामुक, नीच वेशभूषा युक्त, दूसरों की वस्तु को छीन 
लेने की प्रवृत्ति वाले निन्दित आहार-विहार वाले अत्यधिक सोने वाले होते हैं। 
2. मत्स्यकाय अथवा मात्स्यसत्व 

ऐसे व्यक्ति मूर्ख, भीरू, आहार लोलुप, परस्पर झगड़ने वाले, अस्थिर चित्त 
वाले, निरन्तर चलना-फिरना पसन्द करने वाले तथा जल प्रेमी होते हैं। 
3. वानस्पत्यकाय अथवा वानस्पत्य सत्व 

अत्यन्त आलसी, एक स्थान पर रहने की इच्छा वाले सब प्रकार के ज्ञान से 
शून्य, नित्य खाने में लगे रहने वाले एवं धर्म, अर्थ, काम से विरहित होते हैं। 

इस प्रकार तामस सत्व के तीन भेद हैं। इनमें मोह का अंश होता है।* 

सात्विक प्रकृति वाला सुख के समय उत्कर्ष तथा दुःख के समय दीनता नहीं 
दिखाता। 

राजस प्रकृति वाला सुख में सुखी व दुःख में दुःखी हो जाता है। 

तामस स्वभाव वाला अकारण ही सदैव दुःखाक्रान्त रहता है। 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 27 


वाल्मीकि रामायण में वात-पित्त एवं कफ का तो कई स्थलों पर उल्लेख 
मिलता है किन्तु पुरुष की प्रकृति का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया. है तथापि 
विशद्‌ अन्वेषण के पश्चात्‌ एक स्थल पर प्रकृति का दर्शन है- 

राजा दशरथ की चेतना लुप्त-सी हो गयी, वे उन्माद ग्रस्त से प्रतीत होने लगे। 
उनकी प्रकृति विपरीत सी हो गयी। वे रोगी से जान पड़ते थे। इस प्रकार भूपाल 
दशरथ मंत्र से जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्प के समान निश्चेष्ट हो गये।४* 

द्वितीय परिच्छेद 
प्रशस्त सामुद्रिक लक्षण 
सामुद्रिक शास्त्र केवल हस्तरेखा तक सीमित नहीं है। इसमें: सम्पूर्ण 

मानव-शरीर के अवयवों का निरीक्षण कर उसके स्वभाव, उज्ज्वल भविष्य, 
स्वास्थ्य का निरूपण है। रामायण में पुरुष तथा स्त्रियों के शुभ-अशुभ चिन्हों का 
वर्णन बड़ी सूक्ष्मता के साथ किया गया है। 
पुरुषगत प्रशस्त लक्षण 

विभिन्‍न आयुर्वेदीय संहिताओं का अध्ययन कर हम निम्नलिखित निष्कर्ष पर 
पहुँचते हैं कि पुरुषगत विविध प्रशस्त लक्षण क्‍या होने चाहिये। 
पाद लक्षण 

जिसके चरण पसीना रहित, कोमल तलवे वाले हों, जिनमें परस्पर अंगुलियाँ 
सटी हों, मनोहर लाल वर्ण वाले नख हों। सुन्दर एड़ियाँ, गरम तथा नसों रहित हों। 
गम्भीर गण्ठों वाले कछुए की तरह ऊँचे हों तो वह मनुष्य नरेश होता है। 
जड्घका लक्षण 

जिसकी जाँधों में रोयें विरत और सूक्ष्म हों और जाँघें गोलाकार हों। जिनकी 
ऊखरू (पतली जाँघें) हाथी के सूंड के समान हों। दोनों जानु मांसल और सम हों 
तो वे राजा होते हैं और जिनकी जाँघे कुते या सियार के समान (चौड़ी) हों तो वे 
दरिद्री होते हैं। .. 
रोम लक्षण 

जिनके रोम कूप में से एक-एक रोम हों वे राजा होते हैं, जिनके रोम कूपों 
में दो-दो रोम हों वे पण्डित या वेदपाठी होते हैं जिनके रोम कूपों में तीन-तीन या 
चार-चार रोम हों वे मनुष्य धनरहित और दुःख भागी होते हैं, इसी प्रकार केशों 
के भी शुभा-शुभ लक्षण होते हैं। 
जाजु लक्षण 

जिसके घुटने मांस रहित हों, वे परदेश में मरता है, जिसके घुटने थोड़े मांस 
वाले हों वह भाग्यशाली होता है। जिसके घुटने चौड़े हों वे दरिद्री होते हैं। जिनके 
घुटने गहरे हों वे स्त्री के वश में रहते हैं। जिनके घुटने मांसल हो वे राज्य पाते 
हैं और भारी घुटने दीर्घायु के द्योतक हैं। 


28 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लिड्ज एवं वृषण लक्षण 
जिनके अंडकोश छिपे हों यानि मांस से घिरे हो वे मनुष्य पृथ्वीपति होते हैं, 
जिनके वृषण सम हैं, वह राजा होता है। 
स्फिक्‌ लक्षण 
जिसके कूल्हे बहुत मोटे हों वह दरिद्री होता है। जिसके कूल्हे मांसल हो वह 
सुखी होता है। जिसके कूल्हे मध्यम हों वह रोगी होता है जिसके कूल्हे मेढक के 
समान हों वह नरपाल होता है। 
कटि-उदर लक्षण 
- जिसकी कमर सिंह के समान हो वह राजा होता है जिसकी कमर वानर या 
ऊँट के बच्चे के समान हों वह दरिद्री होता है, जिनके पेट समान हो वे भोगी होते 
हैं। जिनका पेट घड़ा या बटलोही की तरह हो वे दरिद्री होते हैं। 
नाभि लक्षण 
जिनकी नाभि बड़ी व चारों तरफ ऊँची हों वे सुखी होते हैं जिनकी नाभि 
छोटी व अदृश्य होकर गहरी हो वह उन्हें क्लेश दायक होती है। 
पार्श्व (बाजू) लक्षण 
जिनके बाजू मांसल व कोमल तथा प्रदक्षिणावर्त होकर रोमों से घिरे हों वे 
राजा होते हैं जिनके बाजू विपरीत हों वे दरिद्वी तथा सुख विहीन होकर दास होते हैं। 
चूचक लक्षण 
जिनके स्तन शिर ऊँचे न हो वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके स्तन शिर 
विषम होकर बड़े हों वे निर्धन होते हैं जिनके स्तन शिर मोटे व ऊँचे हों वे राजा 
होकर सुखी रहते हैं। 
हृदय लक्षण 
जिनका वक्षस्थल ऊँचा होकर मांसल हो वे राजा होते हैं, जिनका वक्ष स्थल 
विपरीत व कड़े बालों से युक्त हो वे प्राणी नराधम होते हैं। जिनका वक्ष-स्थल 
समान हों, वे धनी होते हैं, जिनका वक्ष-स्थल मोटा हों वे प्राणी वीर होते हैं, 
जिनका वक्ष-स्थल पतला हों वे दरिद्री होते हैं, जिनका वक्ष-स्थल विषम हों वे 
निर्धन होकर शस्त्राघात से मृत्यु पाते हैं। 
जन्ु लक्षण 
जिसकी हँसली असमान हों वह दुश्चरित्र होता है जिसकी हँसली अस्थि-संधियों 
से बँधी हुई हों वह धनहीन होता है, जिसकी हँसली ऊँची हों वह भोगी होता है, 
जिसकी हँसली निचली हो वह दरिद्री होता है जिसकी हँसली मोटी हों वह धनवान 
होता है। 
ग्रीवा लक्षण 
जिसकी गर्दन चपटी या नसों से व्याप्त होकर सूखी हो वह निर्धन होता है, 
जिसकी गर्दन भैंसे के समान हों वह सूरमा होता है। जिसकी गर्दन बैल के समान 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / ॥29 


हों वह शस्त्राघात से मृत्यु पाता है। जिसकी गर्दन शंख के.समान (तीन से अंकित 
हों वह राजा होता है। जिसका कण्ठ लम्बा हों वह बहुभोगी होता है, जिसकी पीठ 
अभग्न होकर रोम हीन हो वे अर्थशाली होते हैं। इससे अन्य भाँति पीठ अशुभ 
दायक होती है। 
स्कन्ध लक्षण 

जिसके दोनों कन्धे मांस रहित, रोमों से व्याप्त व भग्न होकर छोटे हों वह 
निर्धन होता है जिनके कन्धे चौड़े व ऊँचे होकर भली-भाँति भरे हों: वे पराक्रमी 
सुखी होते हैं। 
बाहु लक्षण 

जिनकी दोनों भुजाएँ गोलाकार, हाथी की सूंड के समान परस्पर बराबर और 
मोटी हों तथा घुटनों तक लम्बी हों वे भूपाल होते हैं। जिनकी दोनों बाहें रोम रहित 
छोटी हों वे निर्धन होते हैं। 
हस्ताडुली लक्षण 

जिनके हाथ की अंगुलियाँ बड़ी हों वे दीर्घ जीवी होते हैं जिनकी अंगुलियाँ 
बलियों से रहित हों वे बड़े भाग्यशाली होते हैं जिनकी अंगुलियाँ पतली हों वे 
बुद्धिमान होते हैं। जिनकी अंगुलियाँ चपटी हों वे दास कर्म करने वाले होते हैं। 
नख-लक्षण 

जिनके नख चपटे व फटे से हों वे धन-हीन होते हैं, जिनके नख कुत्सित तथा 
विवर्ण हों वे कुदृष्टि से निहारने वाले होते हैं जिनकें नख ताम्र वर्ण व लाल हों वे 
पृथ्वीपाल होते हैं। 
अगुष्ठांगुली लक्षण 

जिनके अंगूठे में यव का चिन्ह हो, वे धनी होते हैं जिनके अंगूठे की जड़ में 
यव का निशान हो वे पुत्रवान होते हैं, जिनकी अंगुलियों की पोरें लम्बी हों वे बड़े 
भाग्यशाली तथा दीर्घजीवी होते हैं। जिनकी हथेली की रेखाएँ चिकनी व गहरी हों 
वे धनी होते हैं, इसके विरुद्ध निर्धनी होते हैं जिनकी अंगुलियाँ विरली हों वे 
धनहीन और घनी अंगुली वाले द्रव्य-संग्रह करते हैं। 
ओष्ठ, दशन, दंष्ट्रा लक्षण 

जिनके ओठ स्फुटित, विखण्डित, विवर्ण और रूखे हों वे धनहीन होते हैं। 
बड़ी तीखी दाढ़ों वाले, चिकने, सघन व सम दाँत शुभ सूचक होते हैं। 
मुख लक्षण 

जिनका मुख सुशोभन, गोल, अमल व कोमल तथा समानाकार हो वे राजा 
होते हैं जिनका मुख पूर्वोक्त लक्षणों से विपरीत हो वे क्लेषभागी होते हैं जिनका 
मुख बड़ा भारी हो वे बुरे भाग्य वाले होते हैं। 
कर्ण-लक्षण 

मांस रहित कान वाले पाप कर्म से मौत पाते हैं जिनके कान चपटे हों वे बड़े 

30 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


ही भोग-शाली होते हैं, जिनके कान छोटे हों वे कृपण होते हैं जिनके कान शंकु 
के समान हों वे पृथ्वीपाल होते हैं। 
गण्डनासिका लक्षण 

नीचा गण्ड-स्थल भोगी का होता है जिसका गण्ड-स्थल मांसविशिष्ट हो वह 
मंत्री होता है जिसकी नासिका शुक की चोंच के समान हो वह सुख भागी होता 
है। सूखी नासिका वाला चिरजीवी होता है। 
नेत्र-लक्षण 

जिनके दोनों नयन पद्मदल के समान हों वे धनी होते हैं। लाल नेत्रों वाले 
लक्ष्मी सम्पन्न होते हैं। बादामी अथवा पीले लोचन वाले बड़े अर्थशाली होते हैं 
जिनके लोचन बिलार के समान हों वे पापी होते हैं। 
भुकुटि लक्षण 

जिनकी भीहें. ऊँची उठी हों वे अल्पायु होते हैं, जिनकी भौंहें विशाल तथा 
ऊँची हों, वे-बड़े सुखी रहते हैं, जिनकी भौंहें विषम हों वे दरिद्र होते हैं जिनकी 
भौहें बाल चन्द्रमा के समान लची हों वे धनी होते हैं। 


. _ ललाट लक्षण 


जिनके शंख (ललांट के पाश्वों की हड्ड्डयाँ) उन्‍नत होकर विशाल हो वे धन्य 
गिने जाते हैं जिनके शंख निचले हों वे धन व पुत्रों से रहित होते हैं जिनका ललाट 
विषम हो वे दरिद्र होते हैं, जिनका ललाट अर्धचन्द्राकार हो वे धनवान होते हैं। 

. शिरो लक्षण ः 

जिनके मस्तक गोल हों वे गोधन सम्पन्न होते हैं जिनके शीश चपटे हों-चे ' 
यौवन काल में माता-पिता के मारने वाले होते हैं और जिनके शीश बड़े हों वे दीर्घ 
जीवी होते हैं। 
नाभि आदि के लक्षण 82 

जिनकी नाभि, स्वर व शक्ति गंभीर हो तो वे पुरुष भाग्य वाले होते हैं। 
विस्तृत वक्षः स्थल, ललाट व मुख ये तीनों शुभ-दायक होते हैं। 
वक्ष आदि के लक्षण ग 

वक्षः स्थल, कक्षा, नख, नासिका, मुख और घाटी ये छः ऊंचे (उठे) हों और 
लिछ्छ, पीठ, घींच, जंघा ये चार छोटे हों तो हितकर होते हैं। 
हनु आदि के दीर्घ लक्षण 

जिनकी ठुड्डी, लोचन, बाहु, नासिका और स्तनों का अंतर ये पाँच दीर्घ हों. 
वे राजा होते हैं। राजाओं के सिवा किसी के उक्त पज्च स्थान दीर्घ नहीं होते। 
स्वर लक्षण. 

जिनका शब्द हाथी, बैल, रथ-समूह, भेरी, मृदक्ष, सिंह और मेघ के समान हो 
वह राजा होता है। जिसका शब्द गधे के समान व जर्जर तथा रूखा हो वह धन 
व सुखों से रहित होता है। 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण “. 3 


वर्ण-लक्षण 

तेजस्वी और चिकने वर्ण वाले पथ्वीपाल होते हैं। जिनका वर्ण मध्यम हो वे 
पुत्रवान और धनवान होते हैं। जिनका वर्ण रूखा हो वे निर्धन होते हैं। शुद्ध वर्ण 
शुभदायक होता है मिश्रित वर्ण वाले दीन होते हैं। 
गति लक्षण 

जिनकी गति वाघ, हंस, मतवाला हाथी, बैल और मोर के समान हो वह राजा 
होते हैं। जिनका गमन शब्द रहित, निश्चल हो वे भी समर्थ होते हैं। शीघ्रगामी 
दरिद्र होते हैं। 

मुनि वाल्मीकि के प्रश्न करने पर महामुनि नारद ने श्री राम के गुणों का 
परिचय देते हुए उनके दैहिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। “इक्ष्वाकु वंश के भूषण 
श्री राम के कन्धे मोटे, भुजायें बड़ी, ग्रीवा शंख के समान, ठोड़ी मांसल ।” चौड़ी 
छाती, हँसली मांस से छिपी हुई, हाथ घुटने तक लम्बे, मस्तक सुन्दर, ललाट भर्व्या 
शरीर मध्यम, सुडौल देह चिकना, वक्ष-स्थल भरा हुआ और आँखें बड़ी-बड़ी हैं, ये 
सभी दैहिक शुभ लक्षण हैं।* 

अशोक बन में सीता के प्रश्न करने पर हनुमान जी ने श्री रामचन्द्र जी तथा 
लक्ष्मण जी के शारीरिक चिन्हों को बताया। “जनक नन्दिनी! श्री राम के नेत्र 
प्रफुल्ल कमल दल के समान विशाल एवं सुन्दर हैं। मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के 
समान मनोहर है, वे जन्मकाल से ही रूप और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न 
हैं /”* उनके कन्धे मोटे हैं, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, गला शंख के समान और मुख सुन्दर, 
गले की हँसली मांसल, नेत्रों में कुछ लालिमा* स्वर दुंदुभी के समान गम्भीर, शरीर 
का रंग सुन्दर, चिकना, अंग सुकोमल, सुडौल और बराबर कान्ति श्याम," उनके 
तीन अंग (वक्षस्थल, कलाई और मुट्ठी) स्थिर (सुदृढ़) भौहें, भुजाएँ, मेढू ये तीन 
अंग लम्बे, केशों का अनुभाग, अण्डकोष, घुटने ये तीनों समान (बराबर) हैं। वक्षः 
स्थल, नाभि के किनारे का भाग और उद्र-ये तीन उभरे हुए हैं। नेत्रों के कोने, 
नख और हाथ-पैर के तलवे--ये तीन लाल हैं। शिश्न का अग्रभाग, दोनों पैरों की 
रेखाएँ और सिर के बाल-ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल एवं नाभि ये तीन 
गम्भीर हैं।” उनके उदर तथा गले में तीन रेखाएँ हैं। तलवों के मध्य भाग, पैरों की 
रेखाएँ और स्तनों के अग्रभाग-ये तीन धंसे हुए हैं। गला, पीठ तथा दोनों 
पिण्डलियाँ-ये चार अक् छोटे हैं। मस्तक में तीन भंवरे हैं। पैरों के अंगूठे के नीचे 
तथा ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचे हैं। उनके कपोल भुजाएँ, 
जाँघें और घुटने-ये चार अज्ञ बराबर हैं * शरीर में जो दो-दो की संख्या में चौदह 
अंग होते हैं वे भी उनके परस्पर सम हैं। उनकी चारों कोनों की चारों दाढ़ें 
शास्त्रीय लक्षणों से युक्त हैं। वे सिंह, बाघ, हाथी और सांड-इन चार के समान 
चार प्रकार की गति से चलते हैं। उनके ओठ, ढोड़ी और नासिका-सभी ग्रशस्त 


32 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हैं। केश, नेत्र, दाँत, त्वचा और पैर के तलवे-इन पाँचों अज्ञों में स्निग्धता भरी 
है। दोनों भुजाएँ, दोनों जाँपें, दोनों पिण्डलियाँ, हाथ और पैरों की अंगुलियाँ-ये 
आठ अक्ज उत्तम लक्षणों से सम्पन्न हैं (लम्बे हैं)।” उनके नेत्र, मुख-विवर, 
मुख-मण्डल, जिह्ा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर-ये दस अज्ञ कमल के 
समान हैं। छाती, मस्तक, ललाट, गला, भुजाएँ, कंधे, नाभि, चरण, पीठ और 
कान-ये दस अंग विशाल हैं। वे श्री यश और प्रताप-इन तीनों से व्याप्त हैं। 
उनके मातृकुल और पितृकुल दोनों अत्यन्त शुद्ध हैं। पार्श्व भाग, उदर, वक्ष: स्थल, 
नासिका, कंधे और ललाट-ये छः अंग ऊँचे हैं। केश, नख, लोम, त्वचा अंगुलियों 
के पोर, शिश्न, बुद्धि और दृष्टि आदि नौ सूक्ष्म (पतले) हैं तथा वे श्री रघुनाथ जी 
के पूर्वाहन, मध्याहूच और अपराहून इन तीनों कालों द्वारा क्रमशः धर्म, अर्थ और 
काम का अनुष्ठान करते हैं।॥" 

इसके बाद सूक्ष्म-दर्शी श्री हनुमान जी ने लक्ष्मण के शारीरिक चिन्हों की ओर 
संकेत करते हुए कहा है कि उन दोनों भाइयों भें अंतर इतना ही है कि लक्ष्मण 
के शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान गौर है और महायशस्वी श्री राम चन्द्र जी 
का विग्रह श्याम-सुन्दर है। वे दोनों नर श्रेष्ठ रूप में एक से ही हैं ॥ इस प्रकार 
हनुमान एक सूक्ष्म-दर्शी सामुद्रिक शास्त्र-वेत्ता थे। रामायण में पुरुषगत प्रशस्त 
लक्षण प्रचुर रूप में प्राप्त होते हैं जो आयुर्वेदानुसार तर्क की कसौटी पर खरे 
' उतरतते हैं। 
स्त्रीगत प्रशस्त लक्षण 

विभिन्‍न आयुर्वेदीय संहिताओं का अध्ययन कर हम निम्नलिखित निष्कर्ष पर 
पहुँचते हैं कि स्त्रीगत प्रशस्त लक्षण इस प्रकार होने चाहिये। 
नखपादादि लक्षण . 

जिस कुमारी के नख चिकने और ऊँचे हों, जिनका अग्रभाग पतला व तांबे 
के वर्ण का हो, दोनों पैर समान व कुछ मोटे तथा मनोरम हों, जिनमें गंठे (टखने) 
छिपे हों, अंगुलियाँ परस्पर मिली हों, तलवे कमल के सदृश शोभा वाले हों, ऐसी 
कुमारी को सुलक्षणा जानना चाहिये। यदि कोई पुरुष पृथ्वीपति होने की इंच्छा करे 
तो ऐसी कुमारी से अपना विवाह करे। 
पादजंघादि लक्षण 

कोमल व पसीना रहित चरण.तल, जिनमें मछली, अंकुश, कमल, यव, वज्र, 
हल और तलवार के चिन्ह हों, नारी के ऐसे चरण प्रशस्त होते हैं। जंघाएँ रोम 
रहित, नस-विहीन और गोलाकार हों। दोनों घुटने समान होकर संधि-देश में 
मांसल हों। दोनों उरु घने व हाथी की सूंड के समान हों तथा रोमरहित हों। 
गुह्याज़्, पीपल-पत्र के समान विस्तीर्ण हो। कमर तथा ललाट चौड़े कछुए के समान 
ऊँचे हों। मणि छिपी हो। वह नारी बड़ी संपतिशालिनी होती है। 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 33 


नितम्ब-नाभि लक्षण 

यदि स्त्रियों का नितम्ब चौड़ा, मांसल और बड़ा हो तो वह करधनी से शोभित 
होता है। यदि नारियों की नाभि गंभीर, विपुल और प्रदक्षिणावर्त हो तो वह प्रशस्त 
होती है। 
स्त्रीकट्यादि लक्षण 

यदि मध्य भाग त्रिवलीयुक्त रोम रहित हो, दोनों स्तन घने, समान तथा कड़े 
हों, वक्ष: स्थल कोमल तथा रोमहीन हो, ग्रीवा शंख के समान हो, तो वह नारी 
धनवती और सुखी होती है। 
भ्रू ललाट लक्षण 

स्त्रियों की दोनों भौहें यदि असंलग्न, पतली, छोटी, बाल चन्द्रमा के समान 
टेढ़ी हों तो वह प्रशस्त कहाती है जिनका ललाट अर्द्धचन्द्राकार, लोम रहित और 
सम हो तो प्रशस्त जानना चाहिये। 
कर्ण-केश लक्षण 

स्त्रियों के दोनों कान मांसल, कोमल समान तथा अचल हों तो प्रशस्त कहाती 
हैं जिनका ललाट अर्द्धचन्द्रावकारा लोमरहित और सम हो तो प्रशस्त जानना 
चाहिये। 
रमणियों के राज-लक्षण 

जिन स्त्रियों के कर तल व पाद तल में झारी, आसन, घोड़ा, हाथी, रथ, श्री, 
कल्पवृक्ष, यूप, वाण, माला, कुण्डल, चामर, अंकुश, यव, पर्वत, ध्वजा, तोरण, 
मछली, त्रिकोण, वेदिका, पंखा, शंख छाता और कमल के चिन्ह हों, वे स्त्रियाँ रानी 

*पद पाती हैं। बढ 

मणिबन्धादि लक्षण 

जिनके हाथ गंभीर मणिबन्ध वाले हों, नवीन कमलगर्भ के समान हों, जिनमें 
सारी अंगुलियाँ पतली तथा बविरंली हों वे स्त्रियाँ राज-पत्नी होती हैं। जिनका 
करतल गहरा व ऊँचा न हों तथा सुरेखाओं से संयत हों उन स्त्रियों को 
सौभाग्यवती, पुत्रवती, सुखवती, धनवती तथा संभोगिनी बनाता है। 
पिण्डिकोदर लक्षण 

जिन स्त्रियों की पिंडुरियाँ ऊँची हों, जड्घाएँ लोमों वाली, अति मांसल या 
सूखी अथवा नसों से व्याप्त हों, अर्थात्‌ नसें दिखती हों, जिनका गुद्मदेश वामावर्त, 
गहरा व छोटा-सा प्रतीत है, और उदर घड़ा-सा हो वे स्त्रियाँ दुःख भागिनी होती हैं। 
ग्रीवा लक्षण 

जिन स्त्रियों की ग्रीवा बहुत छोटी हो दे दरिद्रणी होती हैं जिनकी ग्रीवा लम्बी 
हो. वे वंश विनाशती हैं जिनकी ग्रीवा चौड़ी और ऊँची हो वे क्रोधी होती हैं। 
नेत्रगण्डकूप लक्षण 

जिनके दोनों नेत्र कंजे हों वह दुश्चरित्रा होती हैं जिसके नेत्र पिज्नल वर्ण हों, 

34 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चंचल चितवन हों, वह भी दुश्चरित्रा होती है जिसके हँसने के समय गालों में गड़ढे 
पड़ जाते हों उस स्त्री को मुनियों ने निःसंदेह वंचकी (असती) कहा है। 
ललाट लक्षण 

जिसका ललाट बहुत लम्बा हो, वह स्त्री देवर को विनाशती है। जिसका पेट 
लम्बा हो वह ससुर को नाशती है। जिसके कूल्हे लम्बे हों वह पतिघातक होती है 
जिसके मूछें सी निकल आयी हों वह स्त्री स्वामी को शुभ-दायक नहीं होती जो स्त्री 
पति की अपेक्षा लम्बी हों वह स्वामी को अतीव दुःखदायक होती है। 
स्तन-कर्ण-दन्त-लक्षण 

जिनके स्तन रोमों समेत मैले और बड़े हों, कान विषम हों तो उन्हें क्लेष 
कारक होते हैं जिनके दाँत मोटे, कराल तथा विषम हों तो दुःख दायक होते हैं 
जिनके मसूढ़ों के मांस काले हों वह चोरी करती है। 
पाद तल लक्षण 

जिन स्त्रियों के पैरों के तलवे चिकने, मांस से भरे, कोमल तथा सम हों, उनमें 
पसीना न आता हो, गरंम व लाल हों, उन्हें बड़ा भोग प्राप्त होता है। 

जिनके पैर के तलवे रूखे-वर्ण-विहीन व कठोर हों, जिनके रखने पर बालू 
आदि में निशान न हों, सूप के समान हो, विशेषतः सूखे हों ऐसी स्त्रियों को दुःख 
और दुर्भाग्य मिलता है। 
पादतल में चक्रादि लक्षण 

जिसके पादतल में चक्र, त्रिकोणाकार रेखा हो तथा शंख, कमल, ध्वजा, 
मछली और छाते के निशान हों वह रानी होती है। 
प्रदेशिन्यादि लक्षण 

यदि स्त्रियों के पैर की पीठ ऊँची हो तो वंह रानी के पद को सूचित: करती 
है। पैरों के नख-चिकने, ऊँचे तथा ताम्र वर्ण सरीखे गोलाकार हों तो वे 
शुभ-दायक होते हैं। यदि स्त्रियों के पैर की पीठ ऊँची, पसीना रहित, नस-विहीन, 
चिकनी, कोमल और मांस युक्त हो तो रानी पद को सूचित करती है। 
जंघारोम लक्षण 

जिनकी जंधाएँ रोमहीन, समान, चिकनी, क्रम से गोलाकार, नस-विहीन और 
मनोहर हों, वह स्त्री राजपत्नी होती है जिसके रोमकूपों में एक ही रोम हो वह रानी 
होती है जिसके रोम-कूपों में दो-दो रोम हों वह सुख पाती है जिसके रोमकूपों में 
तीन-तीन रोम हों वह विधवा होकर दुःख भोगती है। 
जाजु लक्षण 

जिसके दोनों जानु गोलाकार, मांस से भरे हों वह स्त्री शुभ है जिसके घुटने 
मांस रहित हों तो वह अपनी इच्छानुसार घूमती तथा पुष्ट जानु वाली दरिद्रा होती 
है। है 
उरु लक्षण 

जिनकी उरु (पतली जाँघें) नस रहित, हाथी की सूंड के समान चिकनी, घनी, 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 35 


गोल, और लोमहीन हों वे स्त्रियाँ रानी होती हैं जिनकी उरु रोम संयुक्त हो वे 
विधवा हो जाती हैं, जिनकी उरु चपटी हों वे दौर्भाग्य को प्राप्त करती हैं। जिनकी 
उरुओं के बीच में नसों के कारण गढ़ा-सां हो वे दारिद्रय भोगती हैं। 
कटि-लक्षण ः 
यदि रमणियों की कमर चौबीस अंगुल हो तो शुभ-दावक होती है जिसकी 
कमर ऊंचे और बड़े नितम्बों वाली चौकोण हो वह धनवती होती है। लची, चपटी, 
लम्बी और निमांसि कमर संकटदायंक होती है। छोटी रोम युक्त कमर दुःख दायक 
तथा विधवापन बताती है। हि 
नितम्बादि लक्षण 
यदि स्त्रियों का नितम्बमंडल ऊँचा, मांस से भरा और चौड़ा हो तो वह बड़े 
भोगों के लिये कहा है जो इससे विपरीत हो तो वह अमंगल मात्र गया है। यदि 
कूले कैथा फ़ल की तरह गोल, कोमल, मांसल, घने और बलियों से रहित हों तो 
वे विशेषतः रति सौख्य बढ़ाते हैं। 
बस्ति लक्षण 
जिसकी पेडू विशाल, कोमल और कुछ ऊँची हो तो शुभदायक होती है। जो 
पेडू रोमों व नसों से व्याप्त रेखाओं से अंकित हो वह शुभदायक नहीं होती। 
नाभि-लक्षण 
गहरी, रोम या रेखाओं से दक्षिणावर्त नाभि सुख संपदा के लिये होती है। जो 
नाभि बहुत ऊँची वामावर्त हो, जिसका मध्य भाग दिखता हो व॒ह अशुभ-दायक 
होती है। ज़िसकी कोख चौड़ी सी हों वह स्त्री बहुत से पुत्र पैदा करती है जिसकी 
कोख मेंढक के उदर समान हो वह सुख धाम-पृथ्वी पालक पुत्र कीःमाता होती है। 
उदर-लक्षण है 
जिनका पेट बहुत छोटा, नसहीन और कोमल त्वचा वाला हों वह स्त्री भोग 
युक्त होकर हमेशा मीठे अन्न सेवन करती है जिसका पेट घड़े के आकार वाला 
हो वह दरिद्रणी हाती है जिसका पेट मृदज्ञ के समान कुम्हड़े व यवों के आकार का 
हो तो वह उसका पेट बड़े दुःखों से भरता है। 
रोम राज्यादि लक्षण 
जिसकी रोम पंक्ति कपिल वर्ण वाली टेढ़ी, मोटी, छिन्‍्न-भिन्‍न सी हों वह 
चोर, विधवा और बुरे भाग्य वाली होती है जिसका हृदय रोम राहत, सम हों वह 
ऐश्वर्य भोगती है तथा अपने प्यारे की प्रेम पात्री होती है। 
हृदय लक्षण 
जिसका हृदय विस्तार वाला हो वह स्त्री पुंश्चल। और दयाहीन होती है 
जिसके हृदय में रोम-हो वह निश्च॑य ही पति-नाशक है। स्त्रियों का अठारह अंगुल 
' चौड़ा, मोटा और ऊँचा वक्षः स्थल'सुखदायक होता है। रोम-युक्त-विषम, चौड़ा 
वक्ष-स्थल दुःखदायक होता है। 
36 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


स्तन लक्षण 

दोनों स्तन कठोर, गोल, दृढ़, स्थूल समान हों तो शुभ दायक होते हैं। स्तनों 
के अग्रभाग मोटे, विरले, सूखे हों तो सुखदायक नहीं होते। 
जब्ु-स्कन्ध लक्षण 

जिसकी हँसलियाँ मोटी हो वह स्त्री धन धान्य की निधि होती है जिसकी 
हंसलियाँ ढीली हड्डी वाली, गहरी और विषम हो वह दरिद्रणी होती है। यदि 
कंधे-बंधे या झुके हुये न हों, लम्बे पतले न हो तो वह शुभदायक होते हैं। यदिं 
कंधे टेढ़ें मोटे रोम-युक्त हों तो वे दासी और विधवापन सूचित करते हैं। 
अंस लक्षण 

छिपे संधि वाले, अग्रभाग में झुके मजबूत पुट्ठे शुभ-दायक होते हैं, यदि पुट्ठे 
अग्रभाग में ऊँचे या निर्मास हों तो वे वैधव्य दायक तथा अत्यन्त दुःखदायक होते 
हैं। 
कक्ष लक्षण 

जो काँखे पतले रोम वाली, ऊँची, चिकनी, मांस से भरी हों तो शुभ-दायक 
नहीं होती हैं। गहरी नसों वाली, पसीने से चिकनी काँखें शुभदायक नहीं होती हैं। 
भुजा-लक्षण 

यदि रमणियों की भुजाएँ छिपी हुई हड्डियों व गाँठों वाली, कोमल हों तथा 
नसों या रोम रहित सीधी हों तो वे दोष कारक नहीं। जिनकी भुजाएँ मोटे रोमों 
वाली हों वे स्त्रियाँ विधवा होती हैं जो भुजाएँ छोटी हों वे बुरे भाग्य को सूचित 
करती हैं। जो भुजाएँ चारों तरफ नसों से घिरी हों तो दुःख-दायक होती हैं। 
कराह्डुष्ठ लक्षण 

यदि नारियों के दोनों हाथ, अंगूठे और अंगुलियों के सामने फूलती कमल 
कली के आकार के घने हों तो भोग दायक होते हैं। करतल, कोमल, बीच में 
ऊँचा, लाल-वर्ण, छिद्र रहित, समीचीन, रेखाओं से युक्त हो तो शुभदायक होता 
है। यदि करतल अल्परेखा युक्त हो तो शुभदायक होता है। 
कराहुष्ठांगुलि लक्षण 

सीधा-गोल या गोल नखों वाला, कोमल अंगूठा स्त्री को शुभदायक होता है। 
यदि अँगुलियाँ सुन्दर पोरों वाली, लम्बी, गोल, क्रम से पतली हों तो शुभदायक, 
होती हैं। चपटी या छोटी, गहरी या रूखी अंगुली तथा रोम युक्त पीठ अशुभ-दायक 
होती है। बहुत छोटी पतली या टेढ़ी या विरली अंगुली रोग-दायक है। अगर 
अँगुलियाँ चौड़े पोर वाली हों तो दुःखदायक होती हैं। 
नख-लक्षण ह 

यदि रमणियों. के नख रक्त-वर्ण, शिखा समेत, ऊँचे से हों वह शुभदायक होते 
हैं, गहरे, विवर्णया सीप सदृश पीले नख दारिद्रय सूचित करते हैं। जिनके नखों में 
सफेद बिन्दु (कौड़ी) हो वे प्रायः पुंश्चाली होते हैं। यदि-पुरुषों के नखों में सफेद 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 37 


चिन्ह प्रतीत हों तो वे भी दुःखी ही होते हैं। 
ग्रीवा लक्षण 

ग्रीवा तीन रेखाओं से अंकित व अत्यन्त पुष्ट हों तो उसे शुभ कहना, ग्रीवा 
मांस रहित, चपटी, लम्बी या गहरी, हो तो शुभ दायक नहीं है। ग्रीवा मोटी-सी हो 
वह स्त्री विधवा होती है जिसकी ग्रीवा टेढ़ी हो वह दासी होती है जिसकी ग्रीवा 
चपटी हो वह बाँझ होती है जिसकी ग्रीवा छोटी हो वह सन्‍्तान रहित होती है। 
चिबुक लक्षण 

गोल, मोटी, बड़ी, कोमल या दो अंगुल वाली चिबुक (ठोड़ी) स्त्री के लिये 
शुभ-दायक है। 
कपोल लक्षण 

मोटे, गोल, ऊँचे गाल स्त्री के लिये शुभ-दायक हैं जिसके गाल रोम वाले, 
कठोर निचले या मांस रहित हों उसे त्याग दें। 
मुख लक्षण 

जिनका मुख सम, समांस, चिकना, गोल या सुगन्धित हो और जिसमें 
पितृमुख की शोभा हो वे स्त्रियाँ इस लोक में धन्यवाद देने योग्य होती हैं। 
अधर लक्षण 

जिनका अधर (निचला ओठ) रक्त वर्ण, गोल, चिकना हो और उसके बीच 
में रेखा हो वे स्त्रियाँ रानी होती हैं अगर अधर पतला, लम्बा, रूखा या फूटा-सा 
हो, कपिल वर्ण या अधिक मोटा अधर स्त्रियों को वैधव्य या लड़ाई देता है। 
दन्त लक्षण 

गो-दुग्ध समान चिकने, बतीस संख्या वाले, नीचे ऊपर दाँत शुभदायक होते 
हैं। 
जिद्मा लक्षण 

जिसकी जीभ लाल, कोमल, कुछ सफेदी लिये हो वह स्त्री अभिलाषित पदार्थों 
को पाकर मीठे भोजन करती है। 
नासा लक्षण 

स्त्री की सम गोल पुटों वाली, छोटे छेदों वाली नाक शुभदायक होती है। 
नेत्र लक्षण 

जिसकी आँखें मेढ़े या मैंसे के समान कंजी हों वह शुभदायक नहीं होती। 


भ्रू लक्षण 
अगर भौहें गोल, चिकनी, काली, परस्पर न मिली हों, कोमल रोमों वाली और 
धनुषाकार हों तो शुभदायक होती हैं। बिखरे रोमों वाली, चौड़ी, विकीर्ण, सीधी या 
मिली हुई तथा बड़े रोमों वाली भौहें शुभदायक नहीं होतीं। 
कर्ण लक्षण 
जो कान लम्बे हों तो सुखद होते हैं। 
38 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


ललाट लक्षण 

जिसका भाल नसों रहित लोमहीन, अर्धचन्द्रसमान तथा गहरा न हो और 
तीन अंगुल वाला हो तो वह सौभाग्य व आरोग्य का कारण होता है। 
केश लक्षण 

भ्रमर के समान काले, पतले, चिकने, कोमल तथा अग्रभाग में घुंघराले केश 
अत्यन्त शुभ दायक हैं। अगर केश, कठोर अग्रभाग में टूटे, बिरले, पीले, छोटे, 
रूखे हों तो दुःख दारिद्रय और बंधन देते हैं। 

जिस प्रकार राम निर्दोष अंगों वाले थे उसी प्रकार सीता जी भी निर्दोष अंगों 
वाली थीं तथा उनके भी श्री राम के समान प्रशस्त गुण थे। 

सीता जी के शरीर में पाये जाने वाले सभी गुण आयुर्वेदज्ञों दारा बताये गये 
प्रशस्त गुणों के ही समान हैं यथा-जनक की पुत्री सीता देव-माया की तरह सुन्दर 
लक्षणों से सम्पन्न नारियों में श्रेष्ठ वधू थीं।'? 

रावण ने माया के द्वारा जब राम-लक्ष्मण को मरा दिखाकर सीता को निराश 
किया तो त्रिजटा ने उसका बुद्धिमानी पूर्वक निराकरण किया। सीता ने ककणाजनक 
विलाप करते हुए कहा--सामुद्रिक शास्त्रों के ज्ञाता विद्वानों ने मुझे पुत्रवती और 
सधवा बताया था। आज राम के मारे जाने से वे सब लक्षण मिथ्या तथा ज्ञानी 
पुरुष असत्यवादी हो गये ।” इसी प्रकार ज्योतिषी भी झूठे पड़ गये जिन्होंने मुझे 
आनन्दमयी सधवा बताया था। आज श्री राम मारे गये और मैं विधवा हो गयी 
हूँ।'* आगे विलाप करते हुए सीता ने अंग के सामुद्रिक लक्षणों का स्पष्ट वर्णन 
किया है- 

जिन लक्षण भूत कमलों के हाथ पैर आदि में होने पर भी कुलवती स्त्रियाँ 
अपने पति राजाधिराज के साथ साम्राज्ञी के पद पर अभिषिक्त होती हैं वे मेरे 
दोनों पैरों में निश्चित रूप से विद्यमान हैं।” जिन अशुभ लक्षणों के कारण सौभाग्य 
दुर्बल होता है और स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं, मैं बहुत देखने पर भी अपने अंगों 
में ऐसे लक्षणों को नहीं देख पाती तथापि मेरे सारे शुभ लक्षण निष्फल हो गये ॥९ 
स्त्रियों के हाथों, पैरों में कमल के चिन्ह होते हैं उन्हें लक्षण वेत्ता विद्वानों ने अमोघ 
बताया है किन्तु आज श्री राम के मारे जाने से वे सारे शुभ लक्षण मेरे लिये व्यर्थ 
हो गये।” 

मेरे सिर के बाल महीन, बराबर तथा काले हैं। भौहें परस्पर जुड़ी हुई नहीं हैं। 
मेरी पिण्डलियाँ गोल तथा रोम रहित हैं तथा मेरे दाँत भी परस्पर सटे हुए हैं॥* 
मेरे नेत्रों के आस-पास के भाग, दोनों नेत्रों, दोनों हाथ, दोनों गुल्फ तथा दोनों जांघें 
बराबर हैं, विशाल व मांसल हैं। दोनों हाथ की अंगुलियाँ बराबर एवं चिकनी हैं, 
और उनके नख गोल एवं उतार-चढ़ाव वाले हैं।' मेरे दोनों स्तन परस्पर सटे हुए 
और स्थूल हैं इनके अनुभाग भीतर की ओर दबे हुए हैं मेरी नाभि गहरी और 
उसके आस-पास के भाग ऊँचे हैं। मेरे पार्श्श भाग तथा छाती मांसल हैं।* मेरी 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण. / 39 


अंग कान्ति चमकती हुई मणि के समान उज्ज्वल है। शरीर के रोयें कोमल हैं तथा 
पैरों की दस अंगुलियाँ और दोनों तलुवे ये बारहों पृथ्वी से अच्छी तरह सटे जाते 
हैं। इन सबके कारण लक्षणों के ज्ञाताओं ने मुझे शुभ-लक्षणा बताया है।” मेरे 
हाथ-पैर लाल उत्तम कान्ति वाले उनमें जौ की समूची रेखाएँ हैं तथा उनकी 
अंगुलियाँ जब परस्पर सटी रहती हैं उस समय उनमें कोई भी तनिक छिद्र नहीं रह 
जाता। कन्या के शुभ लक्षण जानने वाले विद्वानों ने मुझे मन्द मुस्कान वाली 
बताया है ।”* ज्योतिष के सिद्धान्तों के जानने वालों ने बताया है कि मेरे पति के 
साथ मेरा राज्याभिषेक होगा, किन्तु आज वे सारी बातें झूठी हो गयीं।? 

रावण जब सीता का हरण करके उन्हें लंका ले जा रहा था, उस समय भी 
उनक़े रूप और सौन्दर्य का दृश्य कुछ इस प्रकार था-“सुन्दर ललाट और मनोहर 
केशों से युक्त, कमल के भीतरी भाग के समान कांतिमान, चेचक आदि के दाग 
से रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान दाँतों से अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रों से 
सुशोभित सीता का मुख आकाश में रावण के अंग में ऐसे जान पड़ते थे मानो मेघों 
'की काली घटा का भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो | 

इनके अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों पर स्त्रीगत प्रशस्त लक्षणों का उल्लेख 
मिलता है।? 

रामायण में इस प्रकार वाल्मीकि कवि ने सामुद्रिक-शास्त्र का वर्णन किया है। 
पुरुष के 52 लक्षण रामायण में स्पष्ट रूप से दिये गये हैं। ये सभी लक्षण शुभ हैं। 
इसमें से जितने कम हों या जितने विपरीत हों पुरुष उतना ही अल्पमात्रा के शुभ 
में लक्षण में माना जायेगा। लक्ष्मण के सांथ श्री राम पूर्ण रूप से शुभ लक्षण पुरुष 
तथा महारानी सीता ठीक उसी प्रकार उन्हीं के अनुकूल स्त्री थीं। 

तृतीय परिच्छेद 


स्वास्थ्य का महत्व 
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले तत्व, वंशानुक्रम, वातावरण, आहार आदि 
वेदों में स्वस्थ रहकर दीर्घायु की कामना की गयी है। सूर्य, अग्नि, जल, वायु 
आदि के द्वारा रोगोत्यादक राक्षतों और कृमियों के विनाश का निर्देश है। 
आयुर्वेदीय संहिताओं में इसका विशद वर्णन है। आयुर्वेद के दो उद्देश्य कहे गये 
हैं-स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के विकार का शमन। प्रथम उद्देश्य 
स्वस्थवृत के अन्तर्गत आता है।' 
सुश्रुत के अनुसार स्वस्थ वह है जिसके शरीरगत दोष (वात आदि), अग्नि 
(जठराग्नि सहित अन्य द्वादश अग्नियाँ), धातु (रस से शुक्र पर्यन्त) मल (पुरीष, 
मूत्र तथा स्वेद) एवं उनकी क्रियाएँ समान रूप से हो रही हों और जिसका शरीर, 
इन्द्रिय एवं मन प्रसन्न हो ।* 
चरक ने धातुओं के साम्य को प्रकृति कहा है और वही स्वास्थ्य का निदर्शक है ।? 


40 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


आयुर्वेद पुरुष के पूर्ण देह मानस स्वास्थ्य पर बल देता है, यह केवल रोगों के 
प्रतिरोध के लिये निषेधात्मक स्वरूप नहीं है अपितु पुरुष को अपनी प्राकृतिक 
स्थिति में रखकर (स्व+ स्थ) उसके बल, वर्ण, ओज आदि की वृद्धि का उपाय 
करता है। अतएव आपयुर्वेदोक्त स्वस्थ लक्षण विश्व का एक अदूभुत आविष्कार है। 
आयुर्वेद वैयक्तिक स्वस्थवृत्त पर विशेष बल देता है क्योंकि इसकी मान्यता है कि 
यदि पुरुष स्वस्थ है तो बाह्य और अभ्यन्तर हेतु इसमें विकार उत्पन्न करने में 
समर्थ नहीं होते। धातु साम्य स्वास्थ्य है इसका अर्थ यह है कि इससे निज विकार 
तो उत्पन्न नहीं ही होंगे, आगन्तुक विकार भी असामर्थ्य का अनुभव करेंगे। 
आयुर्वेद क्षेत्र को प्रमुखता देता है, बीज को नहीं। यदि क्षेत्र प्रतिकूल और कठोर 
है तो बीज पड़ने पर भी वे सूख जायेंगे। 

आहार, स्वप्न और ब्रह्मचर्य ये तीन शरीर के उपस्तम्भ कहे गये हैं। 

स्वास्थ्य की रक्षा करना मानव का नैतिक कर्त्तव्य है, स्वास्थ्य पर विविध 
वस्तुओं का प्रभाव पड़ता है यथा-वंश, वातावरण, आहार-विहार-इत्यादि । व्यक्ति 
जैसे वंश में जन्म लेता है, उसकी प्रकृति उसी के अनुकूल हो जाती है, इसी को 
मातृज, पितृज एवं आत्मज भाव भी कहा जा सकता है, इसके अतिरिक्त व्यक्ति 
के स्वास्थ्य पर अपने आस-पास के वातावरण का भी बहुत प्रभाव पड़ता है। 
आहार-विहार का तो प्रत्यक्ष प्रभाव ही स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। रामायण में 
भी इस प्रकार का उल्लेख किया गया है। 
वंश 

प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थ तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी वंशानुक्रम का 
स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है इस बात को स्वीकार करते हैं। गर्भस्थ शिशु को 
उसकी माता तथा पिता दोनों के ही कुछ न कुछ गुण अवश्य प्राप्त होते हैं यही 
कारण है कि कुछ बीमारियों को वंशानुक्रम से प्राप्त होने वाली कहा गया है यथा- 
मधुमेह, अस्थमा आदि। 

माता-पिता तथा उनके पूर्वजों के शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक गुणों का, 
दोषों का, प्रवृत्तियों तथा अन्य विशेषताओं का उनेके वंशजों में जो न्‍्यूनाधिक 
संचार होता है उसको कुलजता या अनुवांशिकता कहते हैं। इससे कुछ रोगों और 
शारीरिक य्यज्ञों की. उत्पत्ति का सम्बन्ध होता है, यह सिद्ध हुआ है इसलिये 
स्वास्थ्य-विज्ञान में इसका विवरण दिया जाता है। सामान्यतया “यथा बीज तथाउंकुरः 
इस न्याय से स्वस्थ माता-पिता की प्रजा स्वस्थ और अस्वस्थ की अस्वस्थ हुआ 
करती है। 

वाल्मीकि रामायण में वंश शब्द का उल्लेख तो अंनेक' स्थलों पर किया गया 
है किन्तु वह स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं यह नहीं बताया गया है। 
वातावरण 

स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला दूसरा तत्व वातावरण है। व्यक्ति जिस 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / [4 


प्रकार के वातावरण में रहता है, उसी प्रकार का उसके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता 
है। इसीलिये गर्भिणी को अच्छे वातावरण तथा अच्छे लोगों के बीच रहने का 
परामर्श प्रारम्भ से ही दिया जाता है। रामायण में भी लव-कुश का जन्म तपोवन 
के वातावरण में होना बताया गया है जिसके कारण उनका स्वास्थ्य एवं व्यवहार 
तपोवन के अनुकूल ही दिखाई पड़ता है। दूषित वातावरण में रहने वाले व्यक्तियों 
का स्वास्थ्य अक्सर खराब ही दिखाई देता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वास्थ्य पर 
वातावरण का भी बहुत प्रभाव पड़ता है। 
आहार 

स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला तीसरा प्रमुख तत्व आहार है। व्यक्ति जिस 
प्रकार का भोजन करता है उसी प्रकार के स्वास्थ्य को धारण करता है। 

भारतीय आहार-शास्त्र एक प्राचीन विज्ञान है। यह अपनी एक मौलिक 
परम्परा रखता है। अत्यन्त ही प्रसन्‍नता की बात यह है कि वह रामायण में भी 
अपने उसी रूप में अवतरित हुआ है। रामायण का आहार-शास्त्र पूर्ण वैज्ञानिक 
तथा यथार्थपूर्ण है। संक्षेप में इसमें आहार-विज्ञान को दो रूपों में विभकत कियाः 
कु 
. सात्विक आहार। 2. तामसिक आहार। 

राजा दशरथ, मुनि वशिष्ठ, राजा गुह, ऋषि भारद्वाज के यहाँ सात्विक 
आहार। श्री राम का वन में आहार तथा उनका उसी रूप में वर्णन किया गया है। 
राजा रावण के यहाँ तामसी भोजन उपलब्ध था उसका वर्णन रामायण में उसी 
प्रकार किया गया है। 

आहार सम्बन्धी विस्तृत जानकारी तृतीय परिवर्त के द्वितीय परिच्छेद में दी 
जायेगी। 


चतुर्थ परिच्छेद 
मांस तत्व (प्रोटीन) एवं उसके कार्य-कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज-लवण, 
ज़ीवनीय द्रव्य, जल, स्वस्थवृत्त एवं सदृबृत्त 

आहार के सम्बन्ध में विस्तृत एंवं सूक्ष्म विचार आयुर्वेद में किया गया है जो 
आधुनिक विज्ञान में उस रूप में नहीं मिलता। सर्वग्रह और परिग्रह के द्वारा आहार 
मात्रा के प्रसंग में संतुलित आहार का विधान है। कौटिल्य अर्थ-शास्त्र में भी आर्य 
भक्त” का उल्लेख है जो संतुलित आहार का ही रूप है। इसके अतिरिक्त प्रकृति, 
करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोक्ता और उपयोग संख्या इन आठ आहार-विधि 
विशेषायतनों को विचार किया गया है। षड्रसों के साथ-साथ आहासतचद्रव्यों के 
गुण-कर्म विस्तार से वर्णित हैं। चरक संहिता में एक ही श्लोक में पुरुष के लिये 
आवश्यक सभी आहार तत्वों का निर्देश कर दिया गया है।॥ 
षष्टिक, शालि - कार्बोहाइड्रेट । 

42 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेदलमीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण 


मुद्ग - प्रोटीन । 


सैन्धव - लवण। 
आमलक - विटामिन। 
यव - सेलुलोज। 
आन्तरीक्ष (जल) - शुद्ध जल। 
दुग्ध घृत - स्नेह। 
मधु हु; शर्करा 
कार्बोहाइड्रेट 


रामायण में “कार्बोहाइड्रेट” का वर्णन तत्सम्बन्धी शालिधान्य के रूप में किया 
गया है। इसके विशद्‌ रूप को इस प्रकार देख संकते हैं- 
अष्टांग संग्रहकार ने शालि के निम्न लिखित भेद बताये हैं- 


. रक्त शालि। 2. महा शालि 3. कलम शालि। 

4. तूर्णक शालि। 5. शकुना हत शालि। 6. सारामुख शालि। 

7. दीर्घ शुक। 8. रोध्र शुक। 9. सुगन्धक शालि। 
0. पुण्ड्र शालि। 7. पुण्डरीक शालि। 2. पाण्डु शालि। 

3. प्रमोद। 34. गौर। 5. शाखि। 

6. कांचन। 7. महिष। 8. शूक शालि। 

9. दूषक शालि। 20. कुसुमाण्डक। 2. लांगल शालि। 

22. लोह वाल शालि। 23. कर्दम। 24. शीत भीरुक। 

25. पतंग शालि। 26. तपनीय शालि। 27. अन्य श्रेष्ठ शालि। 


सामान्यतः सभी शालि रस एवं विपाक में मधुर, स्निग्ध एवं वृष्य होते हैं। 
बंधा हुआ.अल्प मात्रा में मल निकालते हैं। कषाय ,अनुरस, पथ्य, लघु, मूत्रल तथा 
शीत वीर्य होते हैं।* 

जिन धान्यों में शूक (टूँण) लगा होता है वे शूक धान्य कहे जाते हैं। पुनश्च 
शूक धान्य के भेदों में शालि धान्य की संज्ञा उन्हें देते हैं जो हेमन्‍त ऋतु में होते 
हैं और जो बिना कूटने के ही स्वच्छ निकलते हैं। 
शूक-धान्य में श्रेष्ठ एवं अश्रेष्ठत्व 

शूकज धान्य में रक्त शालि श्रेष्ठ है, यह तृषा नाशक तथा त्रिदोहन होता है। 
रक्‍त शालि की अपेक्षा महाशालि और महाशालि की अपेक्षा कलम शालि और 
उसकी अपेक्षा तूर्णक आदि क्रमशः हीन गुण होते हैं।* 

वाल्मीकि रामायण में कार्बोहाइड्रेट का शालि धान्य के रूप में अनेक स्थलों 
पर उल्लेख किया गया है यथा-अयोध्या पुरी के वर्णन में कहा गया है कि वह 
नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी # उसके चौराहों की दही, अक्षत, 
हृविष्य, लावा, धूप आदि से सदा पूजा की जाती थी ॥९ 

हेमन्त ऋतु के वर्णन में भी जड़हन धान का वर्णन करते हुए कहा गया है-*“ये 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 43 





सुनहरे रंग के जड़हन धान खजूर के फूल के से आकार वाली बालों से, जिनमें 
चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालों के कारण इनकी बड़ी शोभा होती 
है? 

इस प्रकार उपरोक्त स्थलों का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि रामायण 
में अनेक* स्थलों पर धान का वर्णन किया गया है जिसमें कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा 
में उपलब्ध होता है। तथा (चरक सू. 5/2) के आधार पर कथित षष्टिक, शालि 
(धान) में कार्बोहाइड्रेट होने के कारण रामायण में इसका वर्णन किया गया है। 
प्रोटीन 

आयुर्वेदीय संहिता चरक (च.सू. 5/9) के अनुसार मुदग से तात्पर्य प्रोटीन से 
है। रामायण में भी मुद॒ग, कुलथी, माष, तिल आदि का वर्णन मिलता है। 
मुदग, मकुष्ठ, मसूर, राजमाष 

अष्यांग संग्रह में कहा गया है-मूंग सभी दालों में उत्तम, लघु, वातकारक है। 
हरा मुदूग सर्वश्रेष्ठ तथा मकुष्ठ कृमिकारक है। मसूर प्रलेप के रूप में प्रयोग करने 
पर अतिशय कान्ति कारक तथा आन्तरिक प्रयोग में अत्यन्त संग्राही है। राज-माष, 
गुरु, अत्यन्त पुरीष कारक, रुक्ष तथा अतिशय वात-कारक होता है।” 


अष्टांग संग्रह के अनुसार कुलथी रस में कषाय, मधुर, रुक्ष, उष्ण वीर्य तथा 
रक्त-पित्त कारक होती है। पीनस, श्वास, कास, अर्श, हिक्‍्का, आनाह, कफ, वायु, 
शुक्राश्मरी, शुक्रधातु, दृष्टि-शक्ति, शोफ तथा उदर-रोग नष्ट करता है। यह 
संग्राही, लघु, तीक्ष्य, अम्ल-विपाक तथा विदाही है।'" 
माष 

माष स्निग्ध, बल, श्लेष्म, पुरीष, पित्त-कारक, सर, गुरु, उष्ण-वीर्य, वात-नाशक, 
रस में मधुर, शुक्र वर्धक तथा शुक्र का लिझ्ज मार्ग में प्रवृति में प्रेरक है॥' 
तिल 


तिल स्निग्ध, उष्ण-वीर्य, रस में तिकत, कठु, कषाय, मधुर होता है। मेध्य, 
केश्य, गुरु, कान्ति कारक, स्पर्श में शीतल, वात-नाशक, मूत्र की मात्रा को अल्प 
करने वाला, कटु, विपाक, मेधा-अग्नि-कफ-पित्त को बढ़ाने वाला होता है। तिलों 
में कृष्ण तिल श्रेष्ठ, सफेद तिल कृष्ण से कम तथा रक्त तिल सबसे हीन गुणों 
वाला होता है।* 

महर्षि चरक ने तिल को मेध्य के स्थान पर बल्य माना हहै। उन्होंने तिल के 
गुणों का वर्णन किया है।४ 

वाल्मीकि रामायण में प्रोटीन के रूप में तो उल्लेख प्राप्त नहीं होता है किन्तु 
(च.सू. 5/2) चरक के अनुसार उल्लिखित मुद्‌ग, कुल्थी, माष एवं तिल के रूप 
में प्रोटीन का उल्लेख अवश्य अनेक स्थलों पर मिलता है यथा-श्री राम दान करते 
समय विविध अन्नों का भी दान करते हैं तथा उनमें चना, मूंग आदि का भी 

44 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेदमीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण 


उल्लेख करते हुए कहते हैं-“उनके लिये रत्नों के बोझ से लदे हुए अस्सी ऊँट, 
अगहनी चावल का भार ढोने वाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्य-विशेष 
(चने-मूंग) आदि का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ।" 

श्री राम के आदेश से अश्वमेध यज्ञ की तैयारी में विविध अन्न आते हैं। श्री 
राम लक्ष्मण से कहते हैं-महाबली सुमित्रा कुमार! लाखों बोझ ढोने वाले पशु खड़े 
दाने वाले चावल लेकर और दस हजार पशु तिल, मूंग, चना, कुल्थी, उड़द और 
नमक के बोझ को लेकर आगे चलें।5 
वसा 

अष्टांग संग्रह के अनुसार वसा (मांस-स्नेह) और मज्जा (षष्ठी धातु) वात 
नाशक, बल-पित्त-कफ वर्द्धक एवं मांस के गुण वाले होते है। तथा मेद भी वसा 
और मज्जा के समान गुण वाला होता है।॥* 

औलूकी (उल्लू), शौकरी (शूकर), हंस, कुक्कुट (मुर्गा) की वसा अपने वर्ग के 
प्राणियों की वसा से श्रेष्ठ है। कुम्भीर, महिष, काकमुदूगु तथा कारण्ड की वसा 
निन्दित है।” 

शाखादू (पेड़-पौधों की शाखा-पत्ती आदि खाने वाले ([नर७४४०/०७७) प्राणियों 
में छाग (बकरी 0४9॥9» ४७८७) की मेद श्रेष्ठ तथा हाथी (8०ए॥क्षा॥0४८७) मेद 
निन्दित है )* 

वाल्मीकि रामायण में वसा, या चर्बी का कई रूपों में उल्लेख प्राप्त होता है 

, यथा-वसा, चर्बी, स्नेह, दुग्ध, दही आदि। इन सभी पदार्थों के द्वारा व्यक्ति को 

वसा की प्राप्ति होती है। वसा यद्यपि शरीर के लिये आवश्यक है तथापि इसकी 
अधिक मात्रा होने से व्यक्ति का शरीर स्थूलतर होता जाता है और जिसके कारण 
प्र९क्षा ५8०८ और प्लां॥॥ 8.0. जैसी तथा मधुमेह आदि कष्ट-प्रद तथा असाध्य 
बीमारियाँ हो जाती हैं। 

वाल्मीकि रामायण में दृष्टि-पात करने पर निम्नलिखित स्थलों पर वसा का 
अलग-अलग रूप में उल्लेख प्राप्त होता है। 

कबंध के शरीर में व्याप्त वसा का उल्लेख करते हुए रामायण में कहा गया 
है कि चिता में जलते हुए कबंध का विशाल शरीर चर्बियों से भरा होने के कारण 
घी के लोंदे के समान प्रतीत होता था।” 

इसी प्रकार कुंभभरण के भोजन करने का वर्णन भी बड़ा अदूभुत है, “उस 
इन्द्रद्रोही निशाचर ने चर्बी से भरे हुए कितने ही घड़े साफ कर दिये और वह कई 
घड़े मदिरा भी पी गया /” अन्य स्थलों पर भी चर्बी वसा का उल्लेख मिलता है 
यथा ............- “उसका सारा शरीर चर्बी से नहा गया ।”” वानरों की चर्बी और 
रक्त गिराता हुआ उनका भक्षण कर रहा था ।” उसके शरीर में मेद, चर्बी और 
रक्त लिपटे हुए थे” वह चर्बी से परिपुष्ट हुआ था।“ 
खनिज लवण 

मानव शरीर के लिये विभिन्‍न लवण आवश्यक होते हैं। इनमें से मुख्य 


वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 45 


हैं-कैल्शियम, पोटेशियम, लोहा, फास्फोरस, ताँबा, गन्‍्धक, सोडियम, क्लोराइड 
तथा आयोडीन आदि। 

कैल्शियम मुख्य रूप से दाँतों तथा हड्डियों के लिये उपयोगी होता है। रक्त 
की लाल-कणिकाओं के निर्माण के लिये लोहा अनिवार्य है। शरीर की विभिन्‍न 
ग्रन्थियों के समुचित विकास के लिये आयोडीन अनिवार्य है। नमक एक अनिवार्य 
लवण है। नमक जहाँ भोजन को स्वादिष्ट बनाता है वहीं पाचन क्रिया को भी 
सुचारु बनाता है। नमक हमारे शरीर की मांस-पेशियों को क्रिया-शील बनाये 
रखता है। विभिन्‍न-शाक-सब्जियों में सोडियम क्लोराइड पाया जाता है। मुख्यतः 
पालक-शलजम, किशमिश तथा दूध में इसकी उचित मात्रा पायी जाती है। 
पोटेशियम हमारे शरीर के लिये आवश्यक है। इसकी उचित मात्रा के सेवन से 
हमारा शरीर अनेक रोगों से बचा रहता है। फॉस्फोरस एक उपयोगी लवण है। वह 
हमारे दाँतों, हड्डियों तथा रक्त को स्वस्थ बनाये रखने तक शरीर की उचित वृद्धि 
में सहायक होता है। 

सैंधवादि लवण (सैंधव, सौर्वचल, सामुद्र, विड़, औद्भिक, कृष्ण तथा रोमक 
लवण), यवक्षार, सर्जिकाक्षार, त्रपु (रांगा) एवं सीसा। ये लवण स्कन्ध के द्रव्य हैं।? 

संसार के सर्वप्रथम काव्य-ग्रंथ में भी सभी प्रकार के खनिज-द्रव्यों, मूल्यवान 
पाषाणों तथा प्राणिज द्रव्यों का स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होता है। स्वर्ण आदि 
मूल्यवान धातुओं के विविध-प्रकारों का उल्लेख रामायण में उपलब्ध होता है। 
इसके अतिरिक्त चाँदी, ताम्र, लोह, चलेन्द (पारद), लोह किट्‌्ट (मण्डूर), सिन्दूर, 
गैरिक, मनः शिला, पीतल, नीलांजन, सीसक आदि का भी स्पष्ट उल्लेख रामायण 
में प्राप्त होता है। 

कवि को इस बात का ज्ञान था कि धातुओं की उत्पत्ति पर्वतों में ही हुआ 
करती है /* एक स्थान पर कवि ने यह स्वीकार किया है कि शैलेन्द्र हिमालय सभी 
खनिजों का प्राप्ति स्थान है /” इसके अतिरिक्त रामायण में “धातु सहस्न जुष्टम! 
कहकर हजारों प्रकार की धातुओं का संकेत किया गया है जिनके नाम अज्ञात हैं।* 

वाल्मीकि रामायण में लवण (नमक) का भी अनेक स्थलों पर उल्लेख मिलता है।” 

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में खनिज लवणों का अनेक स्थलों 
पर भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग किया गया है। यह संज्ञा के रूप में भी प्रयोग किया 
गया है यथा-लवणासुर के नाम में संज्ञा के रूप में प्रयुक्त है। 
जीवनीय द्रव्य 

जीवनीय द्रव्य से तात्पर्य विटामिन से है । विटामिन एक प्रकार का रासायनिक 
पदार्थ है यह हमारे भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह विशेष रूप से ताजे भोज्य 
पदार्थों में पाया जाता है। बासी पदार्थों को उबालकर निचोड़े गये पदार्थों में 
विटामिन की मांत्रा कम हो जाती है। ताजे फल, दूध, अंडा, दाल, चाचल, हरी 
सब्जियों में यह बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। शरीर के विकास तथा सुन्दर 

46 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


स्वास्थ्य के लिये विटामिनों की भोजन में उपस्थिति बहुत आवश्यक है। 

यदि भोजन में इनकी कमी हो जाये तो स्वास्थ्य खराब हो जाता है। शरीर का 
विकास रुक जाता है। शरीर में रोग-निरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। इनकी 
कमी से मनुष्य को अनेक बीमारियाँ घेर लेती हैं। 

विटामिन छः प्रकार के होते हैं- 
. विटामिन ए। 
2. विटामिन बी। 
3. विटामिन सी। 
4. विटामिन डी। 
5. विटामिन इ। 
6. विटामिन के। 

वाल्मीकि रामायण में यद्यपि जीवनीय द्रव्यों का अलग :से कोई वर्णन नहीं 
किया गया है तथापि इसमें उल्लिखित वस्तुएँ एवं पदार्थों यथा-दूध, दही, फल, 
दालें, चावल इत्यादि में सभी विटामिन (जीवनीय-द्रव्य) प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। 
जल 

जल जीवन का आधार है। शरीर के सम्पूर्ण भाग में 2/8 भाग अर्थात्‌ 
67 प्रतिशत जल होता है। शरीर में भोजन पचाने के लिये एवं रक्त को तरल 
बनाये रखने के लिये जल की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त शरीर से 
व्यर्थ पदार्थों को बाहर करने के लिये भी जल की आवश्यकता होती है। त्वचा, गुर्दे 
आदि सभी मल-पदार्थों को बाहर निकालते हैं। इसमें भी जल का ही कार्य प्रमुख 
है इस प्रकार स्पष्ट है कि जल हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है। 

अष्टांग संग्रह के अनुसार कुआँ, सारस, ताटाक चौण्ड्य, प्रास्वण, औदूभिक, 
वापी तथा नदी का जल ये आठ प्रकार के जल होते हैं ।१९ 
गुण 

कूप का जल क्षार गुण युक्त तथा पित्त कारक, सारस का जल अग्नि-दीपक, 
अल्पवात कारक, मधुर तथा लघु होता है। ताटाक का जल गुरु तथा वात-कारक, 
चौण्डूय का जल-पित्त कारक, झरना का जल त्रिदोष हर, औदूभिक जल मधुर एवं 
पित्त नाशंक, वापी का जल मधुर एवं लघु तथा नदी का जल वात कारक, रुक्ष 
तथा कटु होता है। धन्वदेश, आनूप देश या पर्वतीय प्रदेश के सामीप्य से कूप 
आदि के जल में गुरुता एवं लघुता समझना चाहिये। अष्टांग संग्रह-कार का यही 
मत है।” 

वाल्मीकि रामायण में सामुद्र जल, नदी का जल, सामान्य जल आदि का 
विषद्‌ वर्णन प्राप्त होता है ।” 
स्वस्थवृत्त एवं सदृबृत्त 

आयुर्वेद के दो मूलभूत प्रयोजनों के अन्तर्गत स्वास्थ्य संरक्षण का एक 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / ॥47 


महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस स्वस्थवृत्त को वैयक्तिक एवं सामाजिक इन दो भागों में 
विभक्त किया जा सकता है। जिसे आयुर्वेद ने सद्वृत्त की संज्ञा दी है और इसकी 
परिधि में इन्द्रियं एवं मन के द्वारा अनुष्ठेय नियम आते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में स्वस्थ वृत्त एवं सदूवृत्त की सामग्री प्रचुर मात्रा में 
उपलब्ध है। इसकी विशद समीक्षा तृतीय परिवर्त में है। 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में शरीर विज्ञान प्रकरण को प्रस्तुत करना यथा 
आयु एवं उसका आधार, आत्म तत्व, शरीर की रचना, शरीर का प्राविभाग-त्वचा, 
कला, दोष मल, अन्तःकरण, इन्द्रियाँ, प्रकृति-भेद-वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक प्रकृति, 
प्रशस्त सामुद्रिक लक्षणों का ज्ञान यथा-पुरुषगत प्रशस्त लक्षण एवं स्त्रीगत प्रशस्त 
लक्षण का सामान्य परिचय, स्वास्थ्य का महत्त्व एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले 
वंशानुक्रम, वातावरण, आहार आदि तत्वों तथा मांसतत्व (प्रोटीन) एवं उसके कार्य, 
कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण, जीवनीय द्रव्य, जल आदि का संक्षिप्त परिचय एवं 
वाल्मीकि रामायण में इसकी उपलब्धि प्रस्तुत अध्याय में की गयी है। 


संदर्भ 

प्रथम परिच्छेद 

. हिताहित॑ सुखंदुःखमायुस्तस्य हिताहितम्‌। 
मान च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेद: स उच्यते।। च.सू. /39।। 

2. तत्रायुरुक्‍्तं स्वलक्षणतो यथावदिदैव पूर्वाध्याये च। तत्र शारीरमानसाभ्यां रोगाभ्यामनभिद्गुतस्य 
विशेषण यौवनवतः समर्थानुगतबलवीर्ययशः पौरुषपराक्रमस्य ज्ञानविज्ञानेन्द्रियार्थथल समुदये 
वर्तमानस्य परमर्द्धिरुचिरविविधोपभोगस्य समृद्धसर्वारम्भस्य यथेष्टविचारिण: सुखमायुरुच्यते, 

* असुखमतो विपर्ययेण। च.सू. 30/24 

3. हितैषिणा पुनर्भूतानां परस्वादुपरतस्य सत्यवादिनः शमपरस्य परीक्ष्यकारिणोउ्प्रमत्तस्य त्रिवर्ग 
परस्परेणानुपहतमुपसेवमानस्य पूजार्संपूजकस्य ज्ञानविज्ञानोपशमशीलस्य वृद्धोपसेविनः 
सुनियतरागरोषेर्यामदमान वेगस्य सतत॑ विविध प्रदान परस्य तपोज्ञानप्रशमनित्यस्याध्यात्मविदस्तत्परस्य 
लोकमिम चामुं चावेक्षमाणस्य स्मृतिमतिमतो 

हितमायुरुच्यते, अहितमतो विपर्ययेण । च.सू. 30/24 ॥। 

4: शरीरेन्द्रियसत्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्‌। 

नित्यगश्चानुबंधश्च पय्ययिरायुरुच्यते ।। च.सू. /40॥। 

. तत्र आयु: चेतनानुवृत्तिः, जीवितं, अनुबंधो धारि च इति एकोउर्थः। च.सू. 30/22॥। 

हिन्दी विश्व कोश, खण्ड-, पृष्ठ-387 

आयुष्य॑ पुष्टिजननं सर्वश्रुतिमनोहरम्‌। बा. 4/28 

. सर्वे पापाः प्रणश्यन्ति आयु: कीर्तिश्च वर्धते ।। बा. 44/23 

.. अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह । आयूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशव: ।। 

अयो. 05/20 ह 

48 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


फ्क्ज्ाकफ़फ़ 


१0. हष्यन्त्यतुमुखं दृष्ट्वा नव॑ नवमिवागतमू्‌ | ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षयः।। 
अयो. 05/25) 

7. उद्यतानां हि युद्धार्थ येषां भवति लक्ष्मण। निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायुः परिक्षयः ।। 
अर. 24/9॥। 

2. धर्म्य यशंस्यमायुष्यं साज्ञां च विजयावहम्‌। यु. 28/07 

3. पूजयंश्च पढ़श्वैनमितिहासंपुरातनम्‌। सर्व पापैः प्रमुच्येत दीर्घमायुरवाप्नुयात्‌ ।। 
यु. 28/7 

4. आयुष्यमारोग्यकरं यशस्यं, सौश्ातृक बुद्धिकरं शुभ च। यु. 28/25 

5. अद्यैव च परित्यक्तं वायुना जगदायुषा |। उ. 35/62 

6. अहंकारः फल कर्म देहान्तरगतिः स्मृति: । विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा।। 
च.शा. -52 

7. सत्त्वात्मा शरीरं च त्रयमेतल्त्रिवण्डवतू। 
लोकस्तिष्ठति संयोगातत्र सर्वम्‌ प्रतिष्ठितम्‌ ।। च.शा. ॥/46) 

48. खादूयश्वेतनाषष्ठा धातवः पुरुष: स्मृत:। च.शा. /4 

9. शरीरं हि गते तस्मिन्‌ शून्यागारमचेतनम्‌। 
पज्चभूतावशेषत्वात्‌ पज्चत्वं गतमुच्यते।। च.शा. /75 

20. इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 
मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धेः परतास्तु सः।। श्री म.गी. 3/42 

24. प्रभवो न ह्यनादित्वाद्धि्यते परमात्मनः। पुरुषो राशिसंज्ञस्तु मोहेच्छाद्ेष कर्मजः ।। च.शा. 
प53 

22. आत्मा ज्ञः करणैयगाद्‌ ज्ञान त्वस्य प्रवर्तते । करणानामवैमल्यायोगाद्वा न वर्तते ।। पश्यतो5पि 

यधाऊदर्शे संक्लिष्ट नास्ति दर्शनम्‌। तवं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा।। च.शा. 
व/54 7 

23. बुद्धीन्रियमनोऊर्थानां विद्याद्योगधरं परम्‌। चतुर्विशतिको ह्योष राशिः पुरुषसंज्ञकः।। च.शा. 
]/85 

24. करणानिमंनोबुद्धि बुर्द्धिकर्मेन्द्रयाणि च। कर्तुः संयोगजंकर्म वेदना बुद्धिरिव च। नैकः प्रर्व॒तते 
कर्तु भूतात्मा नाश्नुते फलमू। संयोगाद्वर्तते सर्वतमृते नास्ति किंचन।। च.शा. /56-57 

25. अन्न कर्मफल चात्र ज्ञान चात्र प्रतिष्ठितमू। अत्र मोहः सुख दुःखं जीवित मरणंस्वता।। च. 
शा. 7-37 

26. रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोज्यमनन्तवानू। ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्वबुद्धयां निवर्तते।। 
च.शा. -86 है 

4. अग्यक्तादृव्यक्ततांयाति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः। रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्‌ परिवर्तते।। 
च. शा. /68 

28. प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसोगतिः। इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यतू।। 
देशान्तर गतिः स्वप्ने पंचत्वग्रहणं तथ॑। दृष्टस्व दक्षिणेनाक्ष्णा सत्येनावगमस्तथा ।। इच्छा 

वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण.» 49 


द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः। बुद्धि: स्मृतिरहंकारो लिंगानि परमात्मनः।। 
यस्मात्‌ समुप्लभ्यन्तेलिज गान्येतानि जीवितः। न मृतस्यात्मलिंगानि 
तस्मादाहुर्महर्षयः ।। च.शा. /70-73 

29. येषां दवन्द्े परा शक्तिरहंकार पराश्च ये। उदय प्रलयो तेषां न तेषां ये त्वतोषन्यथा ।। 


+ च.शा. -69 े 
30. विभुत्वमत एवास्य यस्मातू सर्वगतो महान्‌। मनसश्च समाधानात्‌ पश्यव्यात्मा तिरस्कृतम्‌ ।। 
> च.शा. -80 


39 क्षेत्रज्ञो, वेदयिता, स्प्रष्टा प्राता द्रष्टाश्रोता रसयिता पुरुषः म्रष्टा गन्ता साक्षी धाता 
वक्‍तायः कोञ्सावित्येव मादिभि: पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयतेदैवसंगादक्षयोष्व्ययोज्चिन्त्यो 
भूतात्मना सहान्वक्षं सत्वरजस्तमोभिरदैवासुरैरपरैश्च भावैर्वानाउमिप्रेर्यमाणः 
गर्भाशियमनुप्रविश्यावतिष्ठते । (सु.शा. 3/4) 

52. आयुर्वेदशास्त्रसिद्धान्तेष्व सर्वगता: क्षेत्रज्ञा नित्याश्च तिर्यग्योनि मानुषदेवेषु संचरन्ति 
धर्माधर्मनिमित्तं, त एतेउनुमानग्राह्मा: परमसूक्ष्माश्चेतनावन्तः शाश्वता 
लोहितरेतसोः सन्निपातेष्वभिव्यज्यन्ते यतोडभिहितम्‌ पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष 
इति; स एष कर्मपुरुषश्चिकित्साधिकृतः | (सु.शा. -7) 

33- तस्य सुख दुःखे इच्छाद्विषौ प्रयत्नः प्राणापानावुन्मेष निमेषो, बुद्धिर्मनः संकल्पो 
विचारणा स्मृतिर्विज्ञानमध्यवसायो विषयोपलब्धिश्च गुणा: । सु.शा. -8 

34. च.शा. 3/3 

35. च.शा. 3/7] 

36. सत्य॑ जीवस्पृक्‌ शरीरेणाभिसम्बध्नातीति। च.शा. 3/22) 

37. तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाज्ञवयवाश्च योगपद्चेनाभिनिर्वतन्ते | । च.शा. 4/7) 

38. चतुर्थ सर्वाज्ञ :प्रत्यक्ष विभागः प्रव्यक्ततरों भवति। गर्भ हृदय प्रव्यक्ति 
भावाच्चेतनाधातुरभिव्यक्तो भवति। कस्मातू? तत्‌ स्थानत्वात्‌। तस्माद्‌ गर्भ: चतुर्थे 
मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति। द्विहदयां च नारीं दौहदनी माचक्षते।। -सु.शा. 3/श 

39. ततोदशाहेजतिगते कृतशौचो नृपात्मज:। 
द्वादशेह्हनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत्‌ ।। -अया. 77/ 

40. तत्र शरीरं नाम चेतनाथिष्ठानभूतं पज्वमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि। यदा 
हयस्मिन्‌ शरीरे धातवो वैषम्यापद्चन्ते तदा क्लेशं विनाशं वा प्राप्नोति। वैशम्यगमनं हि 
पुनर्धातूनां वृद्धिह्यसगमनकार्स्न्येन प्रकृत्या च। च.शा. 6-4 

4. शुक्र शोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृति विकार सम्मूर्छितं गर्भ इत्युच्यते। तं चेतनावस्थितं 
वायुर्विभजति तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति पृथ्वी संहन्ति आकाशं विवर्धयति एवं 
विवर्धित:ः स॒ यदा हस्त- पाद-जिह्ना-प्राण-नितम्बादिभिरडगैरूपेतस्तदा “शरीरम्‌' इति 
संज्ञा लभते। सु.शा. 5/3 

42. दोष धातुमलमूलं हि शरीरम्‌। सु.सू. 5/3 

43. तत्रायं शरीरस्याज्ञ विभागः तदथ्थथा-द्वौ बाहू, दे सक्थिनी, शिरोग्रीवं अन्तराधि: इति 

50 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


घडड्मज्म्‌। 

44. तच्च षडजज्जं शाखश्वतस्रो मध्यं पज्चमं षष्ठं शिरं इति। सु.शा. 5/3 

45. तच्च पुनः षडड्जई शिरोउन्तराधिः द्वौ बाहू सक्थिनी च। नेत्र-नाभि-पाणिपादादीनि त्वस्य 
प्रत्यज्ञानि। अ.सं,शा. 5-3 

46. अ.सं.शा. 5/25 

47. तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पंचभूत विकार समुदायात्मक॑ समयोग वाहि।।च. 
शा. 6/3 

48. 'दोषधातु मलमूलं हि शरीरमू। सु. सू, 5/3 
दोषधातु मलामूलं सदा देहस्य।। अ.हू.सू. 0/ 

49. वायुः पित्त कफश्चोक्त: शारीरों दोष संग्रह।। च.सू. /56 
वायु पित्त कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः।। अ.ह.सू. 

50. “रसाउसृडमासमेदोडस्थि मज्जाशुक्राणि धावतः। अ.हृ.स्‌ू. /3 

5. मलामूत्रशकृतुस्वेदादयोषपि च। अ.ह0सू., /3 

52. आहार सम्भवम्‌ वस्तु। च.सू. 28/44 

53. शरीर दूषणाददोषा धातवो देहधारणात्‌। 
वात-पित्त कफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मलाः।। शा-पू0 5/24 

54. तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वहिनर्महात्मनः। 
जीर्णा त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितमू।। अर. 5/40 

55. त्रयो लोका इवाव्यग्रा: स्थितास्त्रय इवाग्नयः। त्रयो मन्त्र इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामयाः।। 
उ. 57 

56. विवर्णवदन दृष्ट्वा त॑ प्रस्विन्नममर्षणम्‌। आह दुःखाभिसंतप्ता किमिदानीमिदं प्रभो।। 
अयो. 26/8 

59. विष्मूत्राशयमादृत्य प्रजानां परमार्तिकृत। रूरोध सर्वभूतानि यथा वर्षाणि वासवः।। उ. 
35/50 

58. तस्मिन गच्छति लोक नाथे, गर्भस्थ जन्तोरिव शल्यकृन्तः। नूनं ममाह्जान्यचिरादनार्यः, 
शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्र ।। सु. 28/6 

59. श्वाविधः शललैय्यद्वद्‌ बाणैलग्नैर्निरन्तरम्‌ ।। स्वर्पितैर्ममसु भूशं संछिन्नास्नायु बन्धनम्‌। 
यु. /45 

60. सभिन्‍्न संधि: प्रविकीर्ण बंधनो, हतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः।। सु. 47/36 

64. यकृत्प्लीहमहापड्मां विनिकीर्णन्त्रशैवलाम्‌। भिन्‍नकाय शिरोमीनामज्ञाववव शादलाम्‌।। 
यु. 58/30 

62. स॒कृत्तचाप: शरताडितश्च मेदार्दगात्रो रुधिरावसिक्तः। यु. 59/07 

63. तेजो वीर्य बल॑ चौजं उत्साहश्च महागुणाः। प्रदर्शनं च्‌ बुद्धिश्व स्मृतिश्व द्विगुणा तयो:।। 
यु. 50/40 है 


64. केशान्‌ कर्णललाट्ट च नासिकाश्च प्लवंगमाः। रक्षसां दशनैस्तीकणैर्नखैश्चापि व्यक्तयन्‌।। 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / ॥5 


यु. 98/4 

65. योनिदेशाश्व॑ यवना: शकृदेशाच्छकाः स्मृता:। रोमकूपेषु मलेच्छाश्व हारीताः सकिरातकाः ।। 

बा. 55/8 

. पौरापवादः सुमहांस्तथा जनपदस्य च। वर्तते मयि बीभस्ता सा मे मर्माणि कृन्तति ।। 

उ. 45/3 

67. बा. 2/5 

68. यु. 52/22 

69. यु. 65/36 

70. यु. 44/0 

77. साल्विकास्तु-आनृशंस्य, संविभागरुचिता, तितिक्षा, सत्यं, धर्मम्‌, आस्तिक्यं, ज्ञान, वुद्धिमेधा, 
स्मृतिर्धृतिरनभिपज्ञश्च, राजसास्तु- दुःखबहुलताउ्टनशीलताउद्चृतिहंकार 
आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्ष: काम: क्रोधश्च, तामसास्तु,-विपादित्व॑ 
नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेर्निरोधोउज्ञान दुर्मेधस््वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति। (सु.शा. 
॥-9 पर के 

यदूगुणं चाभीक्ष्णं पुरुषमनुवर्तते सत्वं तत्सत्वमेवोपदिशन्ति मुनयो बाहुल्यानुशयात्‌। 
च.सू. 8-3 

73. च.शा. 3/3 

74. च.शा. 3/॥] 

» च.शा. 3/22 

76. तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाडगवयवाश्च योगपद्चेनाभिनिर्वतन्ते । च.शा0 4/8 

77. तत्रपूर्वचेतनाधातुः सत्त्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते ।। च.शा. 4/7 का 

78. अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसंज्ञकंचेत इत्याहुरेके। च.सू. 8/श 

49. यत्राश्चिताः कर्मगुणाः कारणं समवायियत्‌। तद्‌ द्रव्यम्‌ ।। च.सू., /50 


6 


- 


ध 7 


प 


ञञ 
जे 


| 


80. खादीन्यात्मा मनः कालोदिशश्च द्रव्यसंग्रहः।। च.सू. /47 

8. अतोष्न्यत्पुनरव्यक्तं लिंगग्राह्ममतीन्द्रियम्‌ ।। च.शा. /6] 

82. मनोमनोर्थों बुद्धिरात्मा चेत्यध्यालद्रव्यगुणसंग्रहः शुभाशुभ प्रवृत्तिनिवृत्ति हेतुश्च ।। च.सू. 
8/2 

83. च.नि. 7/3 

84. च.नि. 8/5 

85. सु. शा. 4/3 मे 

86. च. चि. 28/5 

87. नियन्ता प्रणेता च मनसः।। च.सू. ]2/7 

88. प्राणाप्राणभृतां यत्राश्निताः सर्वेन्द्रयाणि च। 


यदुत्तमाइगमड्गानां शिरस्तदभिधीयते ।। च.सू. 7८] 
प्राणोंछत्र मूर्धगः । हे 
52 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उरः कण्ठचरो बुद्धिहृदयेन्द्रियचित्तधुकू ।। अ.ह.सू. 2/4 
/ शिरस्ताल्वन्तरगतं सर्वेन्द्रिय परं मनः। 
> तत्रस्थं तद्धि विषयानिन्द्रियाणां रसादिकान्‌ ।। 
समीपस्थान्विजानाति ।। भे. चि. 8/3 
89. वातपित्तश्लैष्मणांपुनः सर्वशरीरचराणां सर्वस्नोतांस्ययन भूतानीति, 
तद्वदतीन्द्रियाणां, पुनः सत्वादीनां केवलं चेतवावच्छरीर मयन भूतमधिष्ठामद्ीतं च।। 
च.वि.55. 
90. शरीरं नाम चेतनाधिष्ठान भूतम्‌।। च.शा. 6/3 
97. युग्पज्ज्ञानानुत्पत्तिमनसो लिंगमू।। न्‍्या.स. /-6 
92. अणुत्वमथ चैकत्वं दौ गुणी मनसः स्मृती ।। च.शा. /8 
95. स्वार्थेन्द्रियार्थसडल्पव्यभिचरणाच्चानेकमेकस्मिन्‌ पुरुषे सत्त्वं रजस्तमः सत्त्वगुणयोगांच्च, 
न च अनेकत्वं, नाण्वेकं हमेक कालमनेकेषु प्रवर्तते, तंस्मान्नैककाला सर्वेन्द्रिय प्रवृति: ।। 
च.सू. 8/4 शी कर 
94. चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च। 
यत्किचिन्मनसो ज्ञेयं तत्‌ सर्व द्ायर्थसंज्ञकम्‌ ।। च.शा. /9 
95. यदुगणंचाभीक्ष्णंपुरुष मनुवर्तते सर्त्व॑, 
तत्सत्वमेवोपदिशन्तिऋषयो बाहुल्यानुशयात्‌ ।। च.सू. 8/6 
96. सत्व॑ं सुखे सज्जयति रजः कर्मणि भारत। 
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ।। श्री.म.गी. 4/9 
97. वृतयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टा: । हि 
प्रमाण विपर्ययविकल्प निद्रास्मृतयः ।। यो.सू. /5 
98. निरोध धर्म संस्काराः परिणामोडर्थ जीवनमू। 
चेष्टाशक्तिश्च चित्तस्य धर्मादर्शन वर्जिता: ।। यो.सू. 3/5 
99.तत्र नेत्रमनः कान्तः कुज्जरो नाम॑ पर्वतः।। कि. 4/34 
अगस्त्य भवन यत्र निर्मितं विश्रवकर्मणा। 
00.अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराज॑यम्‌ । 
कार्यसिद्धिकराण्यहुस्तस्मादेतद्‌ ब्रवीम्यहमू ।। कि. 49/6 
07.. मनश्च मे हत॑ भूयश्चश्षुः प्राप्य तु संश्रयम्‌। 
यत्नेन महता हास्मिनू मनः संधाय चक्षुषी ।। कि. 6/2 
02: व्यवसाय च॒ त॑ बुदृध्वा स होवाच महागिरिः ।। 
पुत्रेति मधुरां वाणीं मनः प्रहूलादयन्निव || स. 58/2.5, 3 
03. ममापि पदमपत्राक्ष॑ सिंहोरस्कं कुशोदरम | 
त्वरते हि मनोद्रष्टुं रामं रमयतां वरम्‌ू ।। उ. 46/37 
04. पुरोहितं वसिष्ठं च शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान्‌। 
रामेण चाभ्यनुज्ञातः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः। 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण / 53 


प्रदक्षिणमथो कृत्वा निर्जगाम महाबलः।। उ. 6407 
05. इन्द्रियेणेन्द्रियार्थी हि समनस्केन गृह्मते। 
कल्प्यते मनसा्प्यूध्वगुणतो दोषतो यथा।। 
जायते विर्षये तत्र या बुद्धिनिश्वयात्मिका। 
व्यवस्यति तथा वकक्‍तुं कर्तुं वा बुद्धि पूर्वकम्‌ ।। च.शा. /20, 22 
06. बुद्धदृध्या विषमविज्ञानं विषम च प्रवर्तनम्‌। 
प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचरं हिं तत्‌।। च.शा. /08 
07. च.सू. 8/5 
08. बुद्धिमान्‌ नीतिमान्‌ वाम्मी श्रीमाउछत्रुनिबर्हण:। 
विपुलांसो महाबाहु: कंबुग्रीवो महाहनु:॥। बा. /9 
09. कुम्भकर्ण कुले जातो धृष्टः प्राकृतदर्शनः। 
» * अवलिप्तो न शन्कोषि कृत्य॑ सर्वत्र वेदितुम्‌।। यु. 64/2 
70. बृहस्पतेस्तुल्यमतेर्वच्स्त 
ब्रिशम्य यत्नेन विभीषणस्य ............ ।। यु. 5/] 
]. शरीर संयुक्त ज्ञानं करणमतीन्द्रियम्‌ ।-तर्क भाषा 
72. ठ/0छवं - 00 75727०/०६४४ £ 222) 
(प्राचीन भारतीय मनो-विज्ञान-विकार पृ0 46) 
3. तत्र चक्षुः श्रोत॑ प्राणं रसन॑ स्पर्शनमिति पंचेन्द्रियाणि। च.सू. 8/8 
4. सेन्द्रिय चेतन द्रव्यं निरिन्द्रियमचेत॒ुनम्‌ ।। च.सू. /48 
75. भौतिंकानि चेन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते तथेन्द्रियार्थाः। सु,शा, /4 « 
76. एकैकाधिक्युक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु। च.शा. /24 
7. पब्चेन्द्रियंद्रव्याणि खं वायुज्योतिरापो भूरिति। च.सू. 8/9 
78. आहंकारित्वश्रुतेनभौतिकानि | सा0सू, 2-20 ह 
79. प्राणरसन चक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रयाणि भूतेभ्य:। पु 
पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशभूतानि इन्द्रियकारणानि इति।। 
गन्धरूपरस स्पर्श शब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्था:।। न्याय दर्शन --2-4 
20. पैज्चेन्द्रियार्था-शब्द-स्पर्श-रूप-रस गंन्धा:।। कसू. 8- 
श . शिरसि च इन्द्रियाणि इन्द्रिय प्राणवहानि स्रोतांसि सूर्यमेव गभस्तयः संश्रितानि +च.सि0 9-4 
22. पज्चेन्द्रियबुद्धयः-चश्लुरबुद्धथादिकाः, ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थ-सत्वात्मसन्निकर्षजा:, क्षणिका: 
निश्चयात्मिकाश्च | च. सू. 8-2 ह 
23. इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते । 
कल्प्यते मनसा तूर्ध्व गुणतो दोषतोउ्थवा।। ह 
जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्वयात्मिका। 
, _ - व्यवस्यति तथा वकक्‍्तु कर्तुम्‌ वा बुद्धिपूर्वकम्‌ ।॥ च. शा. -22-25 
: 24. प्रतीहार्या वचः श्रुत्वा राजा परमदुर्मनाः।। 
54 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





विषसाद पुनर्भूयो लुलित व्याकुलेन्द्रिः॥॥ अयो. 0/श 
25. हलादयत्‌ सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि च। 
श्रोताश्रय सुखं गेयं तदू बभौ जनसंसदि ।। बाल. 4/34 
26. परुषं दारूणं तीक्ष्णं क्रूरमिन्द्रियताएनम्‌। 
सीतानिमित्तं दुर्वाक्यं श्रुव्वा स न भविष्यति ।। स. 3/24 
27. परिणीय च सर्वत्र नीतोजहं रामसंसदि। 
रुधिरस्नाविदीनाडो विह्लश्चलितेन्द्रियः ।। यु. 30/9 
28.पुष्पसंसर्गासुरभिर्ववी प्राणसुखोडनिलः । 
अन्ये तु हरिवीराणांयूथान्निष्क्राम्य यूथपा: । यु. 39/3 हा 
29. शुक्रशोषित संयोगे यो भवेद्दोष उत्कूटः। 
प्रकृतिजीयते तेन तस्या मे लक्षणं श्रणु॥। सु.शा. 4/62 
30. चरक वि. 8/06 
3. सप्त प्रकृतयो भवन्ति। दोषैः पृथक्‌, द्विशः समस्तैश्च। सु.शा. 4/6 
शुक्रासृगगर्भिणी भोज्य चेष्टा गर्भाशिर्तुषु । 
यः स्थाद्दोषो5धिक्स्तेन प्रकृति: सप्तधोदिता ।। अ.ह.शा. 3/83 
32. तेषामनातुराः पूर्वे वातलाघाः सदाउतुरा:। 
दोषानुशयिता हेषां देह प्रकृति रुच्यते।। च.सू, 7/39 
तैश्च तिस्रः प्रकृतयो हीन मध्योत्तमाः पृथक्‌। 
स धातुः समास्तासु श्रेष्ठा निन्‍्द्या द्विदोषजा:।। अ.ह.सू. /0 
33. विष जातो यथा कीटो न विषेण विपद्यते। 
तद्द्रेकृत्यो मर्त्य शक्नुवन्ति न वाधितुम्‌।। सु.शा. 4/78 
34. प्रकोपो वान्यभावो वाक्षयो वा नोपजांयते। हे 
प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः।। सु.शा. 4/77 
35. अल्पकेशः कृशो रुक्षो वाचालश्वलमानसः। 
आकाशचारी .स्वप्नेषु वात प्रकृतिको नरः।॥। शा. प. 6/20 
36. वातिकाश्चाजगोमायुराशाखूष्दशुनां तथा । 
गृधकाकख़रादीनामनूकैः कीर्तिताः नराः।। सु:शा. 4/66 
37. श्वश्रृगालोष्ट्रगूधारवुकाकाउनूकाश्व वातिकाः ।। अ.ह.शा. 3/89 
38. रुक्ष: शीतो लघुः सूक्ष्मश्चेलोौथ विशदः खरः।। चरक ।। 
रुक्षोलघुः शीत: खरः सूक्ष्मश्चलोडनिलः: ।। अ.ह. 
39. अकाले पलितैव्याप्तो धी मान्‌ स्वेदी च रोषण:। 
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्त प्रकृतिको नरः।। शा.पू. 6/2 
40. भुजंगोंलूकगन्धर्वयक्षमाजरिवानरै: । 
व्याप्र्क्षनुकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराः स्मृता:।। सु.शा. 4/70 
47. मध्यायुषो मध्यबलाः पण्डिताः क्लेश भीरवः। है 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण . / 55 


व्याप्र्षपपिमार्जार यक्षानूकाश्च पैत्तिका:।। अ.ह.शा. 3/95 
42. गम्भीर बुद्धिः स्थूलाइ्ः स्निग्धकेशो महाबलः। 
स्वप्ने जलाशयलोकी श्लेष्म प्रकृतिको नरः।। शा.प. 7/22 ध 
43. ब्रह्मरुदेन्द्रेवरुणैः सिंहाश्वगजगोवृषैः । 
ताक्ष्यहंससमानूकाः श्लेष्म प्रकृतयो नराः ।। सु.शा, 4/75 
44. ब्रह्मरद्रेन्द्रवररुण तार्क्ष्य हंस गजाधिपैः । 
श्लेष्पप्रकृतयस्तुल्यास्तथा सिंहाश्वगोवृषैः ।॥ अ.ह.शा. 3/05 
45. प्रकृतिमिह नराणां भौतिकी केचिदाहु:। 
'पवनदहन तोयैः कीर्तितास्तास्तु तिस्रः।। 
स्थिर विपुलं शरीरः पार्थिवश्च॑ क्षमावान। 
शुचिरथ चिरजीवी नाभसः खैर्महदूभि:।। सु.शा. 4/79 
46. इत्येवं शुद्धस्य सत्वस्य सप्तविध॑ भेदांश विद्यात्‌। 
कल्याणांशत्वातू, संयोगात ब्राह्ममत्यन्त शुद्ध व्यवस्येत्‌ ।। च.शा. 4/45 
47. सप्तैते सात्विकाः काया: ।। सु.शा. 4/87 
48. इत्येवं खलुराजराजस्य सत्वस्य षड्विधं भेदांश विद्याद्‌ रोषांशत्वात्‌।। च.शा. 4/52 
घडेते राजसाः कायाः।। सु.शा. 4/52 
49. इत्येवं खलुतामसस्य सत्वस्य त्रिविध॑ भेदांश विद्यान्मोहांशत्वात्‌। च.शा. 4/56 
इत्येते त्रिविधाः काया: प्रोक्ता वै तामसास्तथा। 
कायानां प्रकृतिज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत्‌।। सु.शा- 4/98 
50. नष्टचितो यथोन्‍्मतो विपरीत्तो यथातुरः। 
हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपति: ।। अयो. 2/55 


द्वितीय परिच्छेद 
- बुद्धिमान्‌ नीतिमान्‌ वाग्मी श्रीमज्छत्रुनिबर्हण:। 
विपुलांसो महाबाहु: कम्बुग्रीवो महाहनुः।। बा. /9 
2. महोरस्को महेष्वासो गूढ़जत्रुररिंदमः। 
आजानुबाहु: सुशिराः सुललाटः सुविक्रम:।। बा. /0 
3. समः समविभक्ताड़ें: स्निग्धवर्ण: प्रतापवानू। 
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाउ्छुभलक्षण:।। बा. / 
4. रामः कमंलपत्राक्षः पूर्णचन्द्रनिभाननः। 
रूपदाक्षिण्यसम्पन्नः प्रसूतो जनकात्मजे।। सु. 35/8 ' 
« विपुलांसो महाबाहु: कम्बु ग्रीवः शुभानन:। रु 
गूढ़जत्रुः सुत्ताम्राक्षो रामो नाम जनैः श्रुतः।। सु. 35/5. कि 
6. दुन्दुभिस्वननिर्धोषः स्निग्धवर्ण: प्रतापवान्‌। 


छ 


56 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


समश्च सुविभक्ताडगो वर्ण श्याम॑ समाश्रितः।। सु. 35/6 
4. ब्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमास्त्रिपु चोन्‍नतः। 
त्रिताप्रस्त्रिपु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिपु नित्यशः।। सु. 35/7 
8. त्रिवलीमांस्त्रयवनतश्चतुर्व्यडग स्त्रिशीर्षवान्‌। ;; 
चतुप्कलश्चतुर्लेखश्वतुष्किप्कुश्चतु: सम: सु. 35/8 
9. चतुर्दशसमबन्द्श्चतुर्दष्ट्रश्चतुर्गति:। 
महोप्ठनहनुनासश्व पंचस्निग्धोषष्टवंशवान्‌ ।। सु. 35/9 
0. दशपदूमो दशबृहत्िभिव््याप्तो द्विशुक्लवान्‌। 
पडुन्नतो नवतनुस्त्रिभिव्याप्नोति राघवः।। सु. 35/20 
. स सुवर्णच्छवि: श्रीमान्‌ रामः श्यामो महायशा:। 
तावुभी नरशारदूली त्वदुदर्शन कृतोत्सवी ॥। सु. 35/25 
2. जनकस्य कूले जाता देव मायेव निर्मिता। 
सर्व-लक्षण सम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधू:।। बा. /27 
॥3. ऊचुलक्षिणिका ये मां पुत्रिण्वविधवेति च। बज 
तेघ्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोउनुतवादिनः ।। यु. 48/2 
4. ऊचुः संश्रवणे ये मां द्विजाः कार्तान्तिका: शुभाम्‌। 
तेषद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोषनृतवादिनः।। यु. 48/5 
5. इमानि खलु पद्मानि पादयोवव कुलस्त्रियः। 
आधिराज्येजभिषिच्यन्ते नरेन्द्रै: पतिभिः सह।। यु. 48/6 
6. वैधव्यं यान्ति यैर्नायोउलक्षणर्भाग्य दुर्लभा:। 
नात्मनस्तानि पश्यामि पश्यन्ती हतलक्षणा।। यु. 48/7 
।7. सत्यनामानि पदमानि स्त्रीणमुक्तानि लक्षणैः। 
तान्यद्य निहते रामे वितथानि भवन्ति मे।। यु. 48/8 
8. केशाः सूक्ष्मा: समा नीला भ्रुवौ चासंहते मम। 
बृत्ते चारोमके जडूये दन्ताश्वाविरला मम।। यु. 48/9 
9. शड्ख़े नेत्रे करौ पादौ गुल्फातोव्रू समौ चिरौ। 
अनुकृत्त नखाः स्निग्धाः समाश्वाडगुलयो मम।। यु. 4800 
20. स्तनौ चाविरलौ पीज्रे मामकौ मग्नचूचुकौ। 
मग्ना चोत्सेधनी नाभिः पाश्वोरस्क च मे चितमू। यु. 48/] 
श. म वर्णो मणिनिभो मृदून्यड्र्हाणि च। है 
प्रतिष्ठितां द्वादशभिममिचु: शुभ लक्षणम्‌।। यु. 48/2 
22. समग्रयवमच्छिद्रं पाणिपाद॑ च वर्णवत्‌ । 
मन्दस्मितेत्येव च मां कन्यालाक्षणिका विदुः।। यु. 48/3 
293. आधिराज्ये अभिषेको मे ब्राह्मणैः पतिना सह। 
कृतान्त कुशलैरुक्तं तत्‌ सर्व वितथीकृतम्‌।। यु. 48/4 
वाल्मीकि समायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण ४ 57 


24. बभूवजलदं नीलं भित्वा चन्द्र इवोदितः। 
सुललाटं सुकेशान्तं पदूमगर्भाभमव्रणमू ।। अ. 52/9 
शुक्लैः सुविमलैद्दन्तैः प्रभावदूभिरलंकृतम्‌। 
तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाइकगम्‌॥। अ. 52/20 
25. अरण्य-52/2, 22, अरण्य -60/3॥, सु, 5/28, 29, 30, 3, उ. 24/7, 8, 9, उ. 


26/8, 79 
तृतीय परिच्छेद 
. प्रयोजन चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षण मातुरस्य विकार-प्रशमनं च। च.सू. 30/24, 
इह खलु आयुर्वेद प्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधि परिमोक्षः स्वस्थ्य रक्षणज्च ।। सु.सू. 
/22 
2. समदोषः समाग्निश्च समधातुमल क्रियः। 
प्रसन्‍्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ।। सु.सू. 5/50 
3 .०« .... साम्य॑ प्रकृतिरुच्यते। चरक सू. (आ. का वैज्ञानिक इतिहास) 
4. उ. 5/8, बा. 8/ 





चतुर्थ परिच्छेद 


. षष्टिकान्‌ शालिमुद्गांश्च सैन्धवामल केयवानू। 
आन्तरीक्ष॑ं पयः सर्पिः जांगलं मधु चाभ्यसेत्‌।। च.सू. 5/2 
2. रक्‍तो महान्‌ सकलमस्तूर्णकः शकुनाहतः। 
सारामुखो दीर्घशूको रोध्रः शूकः सुगन्‍्धकः ।। अ.सं.सू. 7/3 
पुण्ड्रः पाण्डुः, पुण्डरीकः प्रमोदों गौरशारिवौ। 
कांचनो महिषः शूको दूषकः कुसुमाण्डक:।। अ.सं.सू, 7/4 
लांड्गला लोहवालाख्याः कर्दमाः शीतभीरुका:। 
पतड्गाश्तपनीयाश्च ये चानये शालयः शुभाः॥। अ.सं.सू. 7/5 
स्वादुपाक रसाः स्निग्धा वृष्या बद्धाल्पवर्चसः। 
कषायानुरसाः पथ्या लघवो मूत्रला हिमाः।। अ.सं.सू. 7/6 
4. शूकजेषु परस्तत्र रक्तस्तृष्णात्रिदोषहा। 
महांस्तस्यानुकलमस्त॑ चाप्यनु ततंः परे।। अ.सं.सू. 7/7 
तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयोज्वरा: ।। 
5. गृहगाढामविच्छिद्रां समभूमो निवेशिताम्‌। 
शालितण्डुल सम्पूर्णामिक्षुकाण्ड रसोदकाम्‌ ।। बा. 5/7 
. 6. दध्यक्षत हविलजिर्धपैरगुरू चन्दनैः।।॥ 
नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम्‌ । जयो. 7/6 
7. खर्जूरपुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः। 
शोभन्ते किंचिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः।। अर. 6/7 
8. कि. 26/23, यु. 0/9, उ. 9/9, अयो. 20/7, अर. 35/24 


58 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छः 


0.' 


.' 


2 


व3. 


4. 


5. 


46. 


7. 


38. 


9. 


20. 


2. 


22. 


० 





. सृष्यानामुत्तमा मुदूगा लंघीयां सोउल्पमारुता:। 


हरितास्तेष्वपि वरा मकुष्ठा: कृमि कारिण:।॥ अ.सं.सू, 7/26 
वर्ण्याः परं प्रलेपाद्ैर्मसूरा ग्राहिणो भृशम्‌। 
राजमाषो गुरुर्भूरिश कृद्क्षोडति वातलः।। अ.सं.सू. 7/श27 
'कषाय स्व दुरुक्षोष्णा: कुलत्था रक्तपित्तलाः। 
पीनस श्वास कासार्शोहिध्माउजनाहकफानिलानू ।। अ.सं.सू. 7/28 
हनन्ति शुक्राश्मरीं शुक्र दृष्टिं शोफ॑ तथोदरम्‌। 
ग्राहिणो लघवस्तीक्ष्णा विपाकेउम्ला विदाहिनः।। अ.सं.सू. 7/29 
'माषः स्निग्धो बलश्लेषममल पित्तकरः सरः।। आ.सं.सू. 7/3 
गुरुष्णोडनिलहा स्वादुः शुक्रवृद्धि विरेककृत्‌ । 
'स्निग्धोष्णतिक्त कटुकः कषायमघुरस्तिलः। अ.सं.सू. 7/34 
मेध्यः केश्यो गुरु्वर्ण्य: स्पर्शशीतोडनिलापह: । 
अल्पमूत्र: कटुः पाके मेधाउग्निकफ पित्तकृत ।। अ.सं.सू. 7/35 
कृष्ण: प्रशस्तस्तमनु शुक्लस्तमनु चारुण:।। 
स्निग्धवोष्णो मधुरस्तिक्तः कषायः कडुकस्तिलः। 
त्वच्यः केश्यस्य बल्यश्च वातघ्नः कफपितकृत्‌ ।। च.सू. 27/36 
तेषामशीतियानानि .रलपूर्णानि दापय । 
शालिवाह सहम्न॑ च द्वे शते भद्रकांस्तथा ।। अयो. 32/20 
अयुतं तिलमुदृगस्य प्रयात्वग्रे महाबल ।। 
चणकानां कुलित्थानां माषाणां लवणस्य च। उ. 9/9.5 
वसा मज्जा वातहनौ बलपित्तकफ प्रदौ। 
मांसानुगस्वरूपौ च विद्यान्मेदोपि ताविव।। आ.सं.सू. 6/2 
औलूकी शौकरी पाकहंसजा कुक्कुटोदूभवा। 
वसा श्रेष्ठा स्ववर्गेषु कुम्भीर महिषोद्भवा ।। आ.सं.सू. 6/3 
काकमदूगु वसा तद्वकीरण्डोत्था च निन्दिता। 
शाखादमेदसां छाग॑ हस्तिनं च वरावरे।। अ.सं.सू. 6/॥4 
तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमंमहत्‌ । 
मेंदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावकः। अर. 72/3 
आददू बुभुक्षितो मांसं शोणितं तृषितोषपिबत्‌। 
मेदः कुम्भाश्च मद्याश्च पपौ शक्रारिपुस्तदा ।। युद्ध 60/63 
संचुक्षुभे तेन तदाभिभूतो 
मेदार्द्रगात्रो रुधिरावसिक्त: ॥। यु. 67/8 
सम्प्रस्न॒वंस्तदा मेदः शोणितं च महाबलः। 
वध्यमानो नगेन्‍्द्राग्रै्भक्षयामास वानरानू ।। यु. 67/96 
मेदोवसाशोणितदिग्धगात्रः, कर्णावसक्तग्रथितान्त्रमालः। 
वर्ष शूलानि सुतीक्षणद्रष्ट्रः कालोयुगान्तस्थ इव प्रवृद्ध:।। यु. 67/99 
वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण. / 59 


पट 


4. द्वाराणां परिधाणां च गिरीणां चापि भेदनम्‌। 
नानारुधिर दिग्धाडूग मंदोदिग्धं सुदारूणम्‌।। यु. 08/9 
25. लवण द्रव्यस्कन्धः सैन्धवादीनि क्षारान्तानि त्रपुसीसक प्रभूतीनिच।। अ.सं.सू. 8/22 
26. अधिक शैलराजस्तु धातु भिस्तु विभूषितः।। यु. 4/76 
27. धातुनामिव शैलेन्द्रों .... -.। कि. 5/श 
28. यु. 74/67 
29. दुुखे में दुःखमकरोर्वणे क्षारमिवाददाः। राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम्‌ । 
अयो.73/3 स कृत्वासागरे सेतु ती््वा च लवणोदधिम्‌। एप रक्षांसि निर्धूय धन्वी 
तिप्ठति राघवः ।। यु.24/3] महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमा:। निपेतुर्भग्नविटपाः 
सलिले लवणाम्भसि। यु.50/34 को हन्ता लवण वीरः कस्यांशः स विधीयतम्‌। 
भरतस्थ महाबाहो: शत्रुघ्नस्थ च धीमतः।। उ.62/8 चणकानां कृलित्धानां माषाणां 
लवणस्व च। उ. 9/9 
30. कौप सारसताटाक चौण्डूबप्राम्नवणीद्भिदम्‌।। 
बापी नदी तोबमिति तत्‌ पुनः स्मृतमप्टधा। अ.सं.सू. 6/2.5 
3. सक्षारं पित्तकृत्कैपं दीपनं नातिवातलम्‌।। अ.सं.सू. 6/3 
सारसं स्वादु लघु च ताटाक॑ गुरुवातलम्‌। 
चौण्ड्यं तु पित्तलं दोपहरं प्रश्नवणोदकम्‌ ।। अ.सं.सू. 6:+ 
औदूभिदं स्वादु पित्तहनं स्वादु वापीजलम्‌ लघु। 
नादेयं वातलं रुक्षं कटुकं च तथाउडदिशेत्‌॥। अ.सं.सू. 6/5 
धन्वानूष महीघ्राणां सामीप्यात्‌ गुरुलाघवम्‌। 
82. ()) वधामृतस्य सम्प्राप्तियथा वर्षमन्दके ।। बा. 8/50 
बथा सद्दशदारेपु पुत्रजन्माप्रजस्य वै। 
(0) अन्निं कुशान्‌ काप्ठमपः फल मूलं तयैव च। 
न्यवेदयत्‌ सहस्नाक्षो यच्चान्यदपि काड्क्षितम्‌।। वा. 46/0 
(॥)) तिक्तराजपथारम्यां प्रकीर्ण कुसुमोत्कराम्‌। राजप्रवेशसुमुखैः पौरेमड्गलपाणिभि: ।। 
बा.प7/7 
(४) पताकाभिव॑राहाभिधध्वजैश्व समलंकृताम्‌ ।। 
सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरः स्नातजनैर्युताम्‌।। अबो. 7/3 
(४) सा विनीय तमावासमुपस्पृश्य जल॑ शुचि। हे 
चकार माता रामस्य मड्गलानि मनस्विनी ॥। अबो. 25/ 
(५) न ते क्षौद्रं च दधि च ब्राह्मणा वेदपारगा:। 
मूश्नि मूधांभिपितस्य ददति सम विधानतः।। अयो. 26/3 
(शा) तत्न त्रिपथगां दिव्यां शीततोयाम शेवलाम्‌। 
ददर्श राघवों गझ्जां रम्यामृषिनिषेविताम्‌ ।। अयो. 50/2 
(भा) श्वेताभव्निराजीव वायुपुन्नानुगामिनी | तस्व सा शुशुभे छाया पतिता लवणाम्भसि ।। 
सु./77 


60 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 








तृतीय परिवर्त 
शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री 





प्रथम परिच्छेद 

आयुर्वेदीय संहिताओं में स्वास्थ्य संरक्षण का एक महत्वपूर्ण स्थान है। 
इसीलिये आयुर्वेद के मूल-भूत प्रयोजनों के अन्तर्गत स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य 
संरक्षण का निर्देश किया गया है। 

सुश्रुत संहिता में कहा गया है जिसके वात, पित एवं कफ सम हों, जिसकी 
पाचन शक्ति ठीक हो, जिसकी रस, रक्त आदि धातुएँ एवं मलों की क्रियाएँ समान 
हों तथा जिसका शरीर, इन्द्रिय एवं मन प्रसन्‍न हो वह स्वस्थ पुरुष है।' 

चरकाचार्य ने धातुओं की साम्यावस्था को प्रकृति कहा है जो स्वास्थ्य का 
निर्देशक है # 

वाग्भट ने स्वस्थ पुरुष उसे माना है जिसके दोष, अग्नि धातु एवं चेष्टाएँ 
समान हों। साथ ही आत्मा, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों, वह व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ 
माना जाता है। 
स्वस्थवृत विभाग 

आयुर्वेद में स्वस्थवृत वैयक्तिक, सामाजिक एवं सदूबवृत इन तीन विभागों में 
विभक्‍्त है। वैयक्तिक स्वस्थवृत के अन्तर्गत दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का 
समावेश है। इन तीनों का पालन करने वाला मनुष्य स्वस्थ कहा गया है। 
दिनचर्या 

अष्टांग संग्रह 'तृतीय अध्याय' में दिन-चर्या का विशेष वर्णन प्राप्त होता है। 
उसमें कहा गया है-प्रतिदिन करने योग्य चर्या दिनचर्या है।' प्रतिदिन की चर्या का 
नाम दिनचर्या है, चर्या का अभिप्राय है-चरण (आचरण)।' 

दिनचर्या के अन्तर्गत व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले समस्त कार्य यथा 
प्रातः जागरण, शौचादि नित्य कर्म एवं सन्ध्यावन्दनादि कर्मों का उल्लेख किया 
जाता है। वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर नित्य कर्म का उल्लेखं किया 
गया जो कि दिनचर्या की ओर इंगित करता है। यथा-प्रभात काल आने पर श्री 
रघुनाथ जी पूर्वाह्न काल के नित्यकर्म-सन्ध्यावंदनादि से निवृत हो बाहर निकलकर 
प्रजाजनों के दृष्टिपथ में आये।* 

उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लिखित नित्यकर्म एवं सन्ध्यावन्दनादि स्पष्टतः दिनचर्या 

शरीर शुद्धि एवं वैयक्निक स्वस्थबृत की सामग्री / ॥6 











को ही सूचित कर रहे हैं। 
प्रातः जागरण 

आयुर्वेद में स्वास्थ्य को सही रखने के लिये ब्रह्म-मुहूर्त में जागरण बताया गया 
है। “अष्टांग संग्रह” में कहा गया है, “स्वस्थ मनुष्य आयु की रक्षा के लिये रात्रि 
का भोजन पच गया है अथवा नहीं, इसका विचार करते हुए ब्रह्म-मुहूर्त में उठे ।/* 

यदि आहार का पाचन न हुआ हो तो नहीं उठना चाहिये। चार घड़ी रात्रि शेष 
रहने का नाम (प्रातः काल 4 से 6 बजे) ब्रह्म-मुहूर्त है। ब्रह्म ज्ञान एवं परमात्मा 
को कहते हैं। ज्ञान के अध्ययन के लिये तथा ईश्वर ध्यान के लिये योग्य समय 
ब्रह्म-मुहूर्त होता है। इस समय उठकर परमात्मा का ध्यान एवं विद्याध्ययन करना 
चाहिये। सुश्रुत ने भी कुछ ऐसा ही कहा है |” प्रातःकाल को अमृत वेला कहा गया 
है। शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, विपुल प्रकाश एवं विपुल आकाश ये ही 
प्रकृति के पज्चामृत हैं। प्रातः काल ही स्वस्थ एवं प्रदूषण रहित अवस्था में ये पाँचों 
मिल सकते हैं। इस प्रातःकालीन पज्चामृत को त्यागने वाले लोग आरोग्यवान, 
भाग्यवान तथा ज्ञानवान नहीं हो सकते हैं। अथर्ववेद में उल्लेख मिलता है कि 
प्रातःकालीन सूर्य की रश्मियों से व्याधियाँ नष्ट होती हैं # बाल अरुण के 
अल्ट्रावायलेट किरणों द्वारा विटामिन 'डीः एंवं “'ई” का निर्माण आधुनिक वैज्ञानिक 
लोग भी मानते हैं। मुख-दुर्गन्‍्ध, कोष्ठबद्धता, अजीर्ण, आलस्य एवं अनेक प्रकार 
के नेत्ररोग केवल प्रातःकाल न उठने से होते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर 'प्रभात काल” में उठने का उल्लेख 
मिलता है। यथा-तपोधन विश्वामित्र का प्रभात काल में जागरण,” राजा जनक का 
प्रातः जागरण," राजा दशरथ का प्रातः जागरण," राजा राम आदि का प्रातः 
जागरण ।/” इस प्रकार रामायेण में प्रातः: जागरण का उल्लेख किया गया है। 
शौच-विधि * 

आहार का जो दुष्पाच्य और अनुपयोगी अंश होता है वह प्रचूषित न होकर 
आँतों में ही रह जाता है और इसको मल, पुरीष या विष्ठा कहते हैं। पुरीष शरीर 
में अधिक काल तक रहने से सड़ने लगता है'और उससे उत्पन्न होने वाले विषैले 
द्रव्य रक्त में पहुंचकर अनेक विकार उत्पन्न करते हैं। इसीलिये दिन रात में एक 
बार ठीक मलोत्सर्जन जरूर होना चाहिये। इससे अधिक बार मल त्यायने की 
आवश्यकता हो तो ऐसा भी कर सकते हैं। 

मल-शुद्धि के विषय में आयुर्वेदाचायों द्वारा बताये गये नियमों एवं विधि का 
अवश्य पालन करना चाहिये। हि 

अष्टांग संग्रह में मलोत्सर्ग एवं मूत्रोत्सु् की विधि बताते हुए कहा गया है, 
“मलोत्सर्ग एवं मूत्रोत्सर्ग का वेग प्रतीत होने पर दिन में उत्तर दिशा में तथा रात्रि 
में दक्षिण दिशा में मुख करके मूत्र-मल त्याग करना चाहिये। मौन-होकर मलोस्सर्ग 
के अतिरिक्त किसी भी अन्य कार्य में ध्यान नहीं लगाना चाहिये ।” मलत्याग के 
समय वस्त्र (_हमद आदि) धारण किये रहना चाहिये। तथा सिर को ढके रहना 


62 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चाहिये” आते हुए मल-मूत्र के वेग को त्यागना चाहिये किन्तु न आते हुए वेग 
का प्रयलपूर्वक विसर्जन नहीं करना चाहिये । अत्यन्त अपवित्र स्थान में, रास्ते में, 
मिट्टी में, राख के ढेर पर, गो स्थान पर, जन समाज चौपाल आदि में, गोबर के 
ऊपर......'' नगर के समीप, अग्नि के समीप, पिपीलिकादि द्वारा बनाये गये मिट्टी 
के ऊंचे ढेर पर, रमणीय स्थान में, हल द्वारा जोते खेत में, यज्ञादि की अग्नि के 
समीप, वृक्ष के नीचे अथवा ऊपर मल त्याग नहीं करना चाहिये। स्त्री, गुरु आदि 
पूज्य, गाय, अर्क (सूर्य), इन्दु (चन्द्रमा), वायु, अन्न, अग्नि तथा जल की ओर मुख 
करके भूमि को बिना ढके हुए मलोत्सर्ग नहीं करना चाहिये। अर्थात्‌ तृण आदि से 
पृथ्वी को ढककर उसके ऊपर मलोत्सर्ग नहीं करना चाहिये। यदि स्वामी, चोर 
आदि का भय हो अथवा शरीर अशकक्‍्त हो तो इच्छानुसार मल-मूत्र का त्याग 
करें ॥5 

मलोत्सर्ग उपर्युक्त सार्वजनिक स्थानों में नहीं करना चाहिये। इससे गन्दगी 
तथा नाना प्रकार के रोग फैलते हैं। मलोत्सर्ग के समय अन्य विषयों को सोचनें 
से मल-त्याग काफी विलम्ब से होता है। आते हुए मल के वेग को रोकने से 
पिण्डलियों में ऐंठन, प्रतिश्याय, सिर में वेदना, अपान-वायु की ऊर्ध्वगति, गुदा में 
कैंची से काटने के समान वेदना तथा मुख द्वारा मल की प्रवृति हो सकती है। 
प्रयंलवपूर्वक मलोत्सर्ग करने पर आर्श हो जाता है। 

मल-मूत्रादि का वेग उपस्थित होने पर दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये। 
इसी प्रकार साध्य रोगों की चिकित्सा;किये बिना अन्य कार्य नहीं करना चाहिये ।* 
गुदप्रक्षालन विधि कं 

वाग्भट ने काँटे रहित काष्ठादि, शुद्ध मिट्टी के पिण्ड अथवा नदी के पवित्र 
जल से गुद-प्रक्षालन का निर्देश दिया है।? ५ 

वाल्मीकि रामायण में नित्य-कर्म के अन्तर्गत ही अनेक स्थलों पर इसका 
उल्लेख प्राप्त होता है किन्तु इसकी विशद्‌ व्याख्या एवं विधि इत्यादि का वर्णन नहीं 
किया गया है।* 
आचमन (मुख-प्रक्षालन)-(नेत्रा-प्रक्षालन) 

आयुर्वेदाचार्य वाग्भट ने लिखा है-रस रक्तादि धातुओं, पुरीष, मूत्र-कर्ण 
आदि के मलों, अश्रु, वसा, शरीर से कटकर गिरे हुए केशों एवं नखों को स्पर्श 
करके, स्नान करके, भोजन से पूर्व, भोजन के पश्चात्‌, सोकर उठने के पश्चात्‌, 
छींकें आने पर, देव-पूजन के प्रारम्भ में तथा रथामाक्रम्य-बाहर से गली आदि में 
घूमकर घर में आने पर उत्तर की ओर मुख करके अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख 


करके बैठकर आचमन करना चाहिये। एकान्त स्थान में, हाथ घुटनों के बाहर न 7 


करके, अन्यत्र दृष्टि न करते हुए,” मौन धारण करके, शरीर पर उत्तरीय वस्त्र 


* (अंगोछा) धारण करके, अंगुष्ठ की जड़ तक अज्जली में स्वच्छ जल लेकर आचमन 


करना चांहिये। 
आचमन करते समय जल इधर-उधर गिरता हुआ न हो, शरीर नीचे को झुका 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 63 


न हो, शरीर ऊपर की ओर उठा न हो। जल, अग्नि, पक्व, दुर्गन्धित, फेन (झाग) 
सहित, बुलबुलायुक्त, क्षार मिश्रित तथा एक हाथ से दिया हुआ न हो। एक ही 
हाथ धोकर आचमन न किया जाये अपितु दोनों हाथों को धोया जाये। अपवित्र 
हाथ-पैर से आचमन नहीं करना चाहिये। आचमन के समय किसी प्रकार का शब्द 
नहीं निकालना चाहिये। अंगुष्ठमूल को ब्रहमतीर्थ कहा गया है, अंगुलियों का 
अग्रभाग देवतीर्थ है। अतः आचमन के समय अंजलि में अंगुष्ठमूल तक जल लेने 
का विधान है।” 

वाल्मीकि रामायण में भी दिनचर्या के प्रारम्भ में आचमन का उल्लेख किया 
गया है। श्री राम अगस्त्य आश्रम में हैं तथा प्रातः:काल तथा सायंकाल आचमन 
आदि कार्य से निवृत्त होते हैं। रामायण में लिखा है, “वहाँ आचमन और सायंकाल 
की सन्ध्योपासना करके श्री राम ने पुनः महात्मा कुंभज के आश्रम में प्रवेश 
किया ।?! 
दन्‍्तधावन 

मुख-प्रक्षालन के पश्चात्‌ दन्‍्त-धावन करना चाहिये। आचार्य वाग्भट ने कहा 
है--वंट, आसन, अर्क, खदिर, करंज, करवीर, सर्ज, अरिमेद, अपांमार्ग, मालती 
तथा कुकुभ की दतुअन करनी चाहिये अथवा इसी प्रकार के अन्य वृक्ष का मूल 
जो कषाय, कठ, तिकत रस वाले हों तथा परिचित, वृक्ष की दतुअन करनी 
चाहिये ।” थे 

दतुअन का अग्रभाग कूँचा हुआ, ऋजु, अग्रंथि तथा सुभूमिजम्‌ होना चाहिये। 
दतुअन 2 अंगुल लम्बी, कनिष्ठिका अंगुली के अग्रभाग के समान मोटी, सुकूर्च 
होनी चाहिये। प्रातः काल तथा भोजन के पश्चात्‌ मौन होकर दतुअन करना 
चाहिये। इसके पश्चात्‌ वाष्य, कुष्ठ, त्रिवर्ण त्रित्रय (त्रिफला, त्रिकटु, त्रिजातक) 
बत्रिफला-आवँला, हरीतकी, विभीतक, त्रिकटु-शुण्ठी, काली मिर्च पिप्पली, 
त्रिजातक-दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपता के चू्णों को शहद में मिलाकर दाँतों 
पर मलना चाहिये । मसूडों को बिना बाधा पहुँचाये दतुअन करना चाहिये।” 

प्रातःकाल एवं सायंकाल मुख एवं दन्त प्रक्षालन हेतु दातौन का विधान किया 
गया है। दातौन भी कपाय, कटु एवं तिकत रस की होनी चाहिये। महर्षि सुश्रुत ने 
कहा है-कषाय रस में खदिर, बबूल, तिकत रस में नीम तथा कदु रस में करंज 
श्रेष्ठ है ।'' इन वृक्षों में कुछ ऐसे क्षारीय तत्व एवं तैल होते हैं, जो दन्तदादर्यकर, 
कृमि नाशक, जन्तुष्न, व्रणरोपक तथा रक्त-शोधक होते हैं। निम्ब में मार्गोसिन नामक 
तिकत घटक तथा बीज तैल में सल्फर होता है जो कि कृमिष्न है। बबूल में टैनिन 
अरेविक एसिड, कैल्शियम तथा मैग्नीशियम होता है। करंज में करिजन नामक 
सक्रिय तत्व होता है, जिसकी मुख्यतः क्रिया जन्तुष्न होती है। वाल्मीकि रामायण 
में दन्‍्त-धावन का कहीं पृथक्‌ से उल्लेख प्राप्त नहीं होता है अपितु नित्य-कर्म के 
अन्तर्गत ही इसका समावेश हो जाता है।* 

दन्‍्त धावन की विधि बताते हुए वाग्भट ने कहा है-नीचे के दाँतों को 


64 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सर्व-प्रथण साफ करना चाहिये | तत्पश्चात्‌ ऊपर के दाँतों को स्वच्छ करना चाहिये। 
प्रातःकाल मुख में पानी भरकर नेत्रों को शीतल जल से सींचना चाहिये अर्थात्‌ 
शीतल जल के छीटें मारने चाहिये ग्रीष्म एवं शरदूऋतु में शीतल जल से एवं अन्य 
ऋतुओं में किंचित्‌ उष्ण जल से छीटें मारना चाहिये ।” 
जिह्ानिर्लेखन 

अष्टांग संग्रह में कहा गया है-दातीन करने के पश्चात्‌ जिह्लानिर्लेखन द्वारा 
जिह्ना को सुख-पूर्वक साफ करना चाहिये। इस प्रकार दातौन एवं जिह्ानिर्लेखन से 
मुख की मलिनता, वैरस्य, दुर्गन्‍्ध, जिहारोग, मुखरोग एवं दन्त-रोग नहीं होते हैं। 
आहार में रुचि, मुख में स्वच्छता एवं लघुता हो जाती है।”? 

जिहा-निर्लेखन को “'जीभी” कहा जाता है। आजकल ताँबा, लोहा आदि 
धातुओं तथा प्लास्टिक की जीभी बाजार में मिलती हैं। दातौन को चीरकर भी 
जीभी बनायी जाती है। 

वाल्मीकि रामायण में जिह्लानिर्लेखन का पृथक से उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, 
अपितु “नित्य-कर्म' में ही इसका समावेश हो जाता है। 
मुख-नेत्र प्रक्षालन 

मुख-नेत्र प्रक्षालल की समीक्षा “आचमन'” के अन्तर्गत ही समाविष्ट है। 
अज्जन 

आयुर्वेदाचायों ने मुख-नेत्र-प्रक्षालनादि के पश्चात्‌ अज्जन कर्म का विधान 
बताया है। इस विषय में वाग्भट का कथन है, “इसके पश्चात्‌ नेत्रों के लिये 
हितकारी सौवीर अज्जन का प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिये। अज्जन से नेत्र सुंदर 
तथा सूक्ष्म-पदार्थों को देखने योग्य हो जाते हैं।” नेत्र के शुक्ल-मंडल (5०७४४) 
कृष्ण-मंडल (0०7०8) तथा दृष्ट-मंडल (?५/॥) का वर्ण (रंग) व्यक्त हो जाता 
है। नेत्र निर्मल हो जाता है तथा पलकें चिकनी तथा घनी हो जाती हैं|? 

महर्षि सुश्रुत ने कहा है-सिन्धु प्रदेश में उत्पन्न होने वाला विशुद्ध स्नोतांजन 
श्रेष्ठ होता है। यह दाह, कण्डू तथा नेत्र के मल को नष्ट करता है, नेत्रों की 
क्लिन्नता एवं वेदना को शांत करता है। नेत्र में तेज आता है, नेत्र वायु तथा तेज 
को सहने में समर्थ होता है।* 
महर्षि अग्निवेश ने कहा है- 

नेत्र के लिये हितकारी सौवीर अज्जन का प्रयोग सर्वदा करना चाहिये।" 
सौवीराज्जन एण्टिमनी आक्साइड है। 

चक्षु अग्नितत्व प्रधान या आग्नेय है। अतः उसे श्लेष्मा (जल तत्व प्रधान या 
जलीय पदार्थ) से विशेष विकृत होने का भय रहता है, इसीलिये श्लेष्मा के 
स्रावणार्थ प्रति सप्ताह रसांजन का प्रयोग करना चाहिये। 

सौवीरांजन नेत्र को स्वच्छ रखने वाला अज्जन है, इसका प्रयोग नित्य करना 
चाहिये। रसांजन नेत्र के दूषित अश्रु को निकालने वाला अञज्जन है अतः इसका 
प्रयोग सप्ताह में एक बार करना चाहिये।" 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 65 


'भावमिश्र” के मतानुसार दारुहरिद्रा (8090ा$क्षाअक३ 0.0.) के क्वाथ से 
घनसत्व करके रसांजन बनाया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में “अज्जन कर्म” का भी अलग से वर्णन प्राप्त नहीं होता 
है। प्रातःकालीन नित्य-कर्म में ही इसको भी जान लेना चाहिये। 

अज्जन कर्म के पश्चात्‌ नस्य, गण्डूघ एवं कवल का विधान बताया गया है। 
धूम्रपान 

वाग्भट के अनुसार गण्डूषादि के पश्चात्‌ प्रायोगिक धूम्र का सेवन, सुगन्धित 
द्रव्य का लेप तथा पुष्प की मालाओं को धारण करना चाहिये। धूम्र के सेवन करने 
से जत्नरु (कण्ठ-नाड़ी) के ऊपर वात कफ जनित रोग नहीं होते हैं।” 

धूम्रपान तीन प्रकार का होता है-. प्रायोगिक, 2. स्नैहिक, 3. शिरोवैंरेचनिकी । 

वाल्मीकि रामायण में धूम्रपान का भी कहीं पृथक्‌ उल्लेख नहीं किया गया है। 
नित्यकर्म में ही इसका भी उल्लेख समझना चाहिये। 
व्यायाम 

शरीर के विविध अंग-प्रत्यंगादि से बराबर काम लेकर उनको कार्यक्षम बनाने 
वाली तथा शरीर की वृद्धि करके उसका बल बढ़ाने वाली जो-जो चेष्टाएँ होती हैं 
वे व्यायाम कहलाती हैं।” व्यायाम से श्वसन का कार्य अधिक गंभीर और तेज 
होता है, इससे शरीर के भीतर प्राणवायु अधिक मात्रा में पहुँचकर रक्त की शुद्धि 
होती है, और शरीर के भीतर जमी हुई विषैली वायु (0०,) अधिक मात्रा में शरीर 
से बाहर निकल जाती है। हृदय का कार्य भी तेज होकर सम्पूर्ण शरीर के 
अंग-प्रत्यंगों में शुद्ध रक्त अधिक मात्रा में दौड़ता है और उनके भीतर का मैल 
बाहर निकल जाता है। त्वचा में अधिक रक्त आने के कारण अधिक पसीना आता 
है तदूद्वारा रक्त के मलिन पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। ऐच्छिक तथा अनैच्छिक 
पेशियों में आंकुचन प्रसार अधिक होने के कारण वे सुदृढ़ और पुष्ट होती हैं और 
शरीर सुडौल बन जाता है। पाचक अंग अधिक कार्यक्षम होकर अन्न का पाक 
ठीक होकर मलावरोध दूर हो जाता है। भूख अच्छी लगती है। संक्षेप में शरीर के 
प्रत्येक अंग में व्यायाम से नव जीवन का संचार होकर शरीर फुर्तीला हो जाता है। 
व्यायाम का निषेध 

वात-पित्त रोगी, बालक, वृद्ध तथा अजीर्ण रोगी को व्यायाम नहीं करना 
चाहिये।” 
व्यायाम का परिमाण 

बलवान तथा स्निग्ध भोजन करने वाले को शीतकाल एवं वसन्‍्तक्रतु में 
अर्द्धशक्ति भुर व्यायाम करना चाहिये | अन्य ऋतुओं (ग्रीष्म, वर्षा, शरद) में स्वल्प 
व्यायाम करना चाहिये ४४ 
अर्द्वशक््ति का लक्षण 

सुश्रुत ने अर्द्धशक्ति का लक्षण*बताया है।” 

व्यायाम करके समस्त शरीर का सुखपूर्वक मर्दन करना चाहिये।* 


66 वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अधिक व्यायाम से हानि 
अधिक व्यायाम करने से तृषा (प्यास), क्षय-रोग, प्रतमक श्वास, रक्त-पित्त, 
श्रम, कलम, कास, ज्वर, छर्दि रोगों की उत्पत्ति होती है। 
व्यायाम, जागरण, मार्ग-गमन, मैथुन, हास्य एवं भाषण का साहस (शक्ति) 
* से अधिक सेवन करने पर मानव उसी प्रकार विनष्ट (रुग्ण अथवा मृत) हो जाता 
है जिस प्रकार हाथी (अपने से विशाल) को खींचता हुआ सिंह नष्ट हो जाता है।* 
महर्षि सुश्रुत ने भी कहा है।* महर्षि अग्निवेश ने कहा है।! 
वाल्मीकि रामायण में व्यायाम का कहीं अलग वर्णन प्राप्त नहीं होता है। 
* नित्यकर्म ही इसकी ओर इंगित करते हैं। राम का वन में विचरण भी व्यायाम की 
ओर इंगित करता है। 
परिभ्रमण 
परिभ्रमण व्यायाम का ही एक प्रकार है। देशी-विदेशी, सांधिक और व्यक्तिगत 
करके व्यायाम करने के असंख्य प्रकार हैं। जैसे-फुटबाल, बालीवाल, क्रिकेट, 
टेनिस, हॉकी, बैडमिन्टन, कबड्डी, गुल्लीडंडा, सिंगल-बार, परिभ्रमण, मलखंब, 
कुश्ती, तैरना, घोड़े पर सवारी करना, नाव खेना, दण्ड-बैठक, सूर्य-नमस्कार, 
आसन, दौड़ना आदि। 
वाल्मीकि रामायण में “परिभ्रमण” का नामोल्लेख तो कई स्थानों पर प्राप्त 
होता है यथा राम, लक्ष्मण, सीता आदि का वन में परिभ्रमण आदि किन्तु यह 
परिभ्रमण हमारे उद्देश्य को पूर्ण नहीं करता है। 
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि परिभ्रमण का समावेश भी व्यायामादि 
के ही समान नित्यकर्म के अन्तर्गत कर लेना चाहिये। 
क्षौर कर्म डे 
वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है।“४ केश प्राणियों के शरीर 
की रक्षा का एक नैसर्गिक साधन हैं। मनुष्यों में बालों का विचार शरीर रक्षा की 
अपेक्षा स्वास्थ्य रक्षा के साथ अधिक जुड़ा होता है। क्षौर-कर्म के लिये उस्तरे का 
प्रयोग करते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिये। साबुन, कूर्च, उस्तरा इत्यादि 
क्षौर-कर्म की समस्त सामग्री अपनी-अपनी अलग होनी चाहिये। अपनी चीजें दूसरों 
को नहीं देनी चाहिये और दूसरों की चीजें अपने काम में कदापि न लानी चाहिये। 
जहाँ तक सम्भव हो, क्षौर-कर्म स्वयं: करना त्वाहिये। 
केश, नख इत्यादि की स्वच्छता के विषय में योग रत्नाकर में कहा गया है।# 
वाल्मीकि रामायण में क्षौर-कर्म का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
नित्य-कर्म में ही क्षौर-कर्म का भी उल्लेख माना जाना चाहिये। 
अभ्यंग विधि 
(तैलाभ्यड, शिरोभ्यज्ञ, स्नेह सिंचन एवं स्नेह अवगाहन, शरीर परिमार्जन) 
शरीर पर तेल की मालिश करने को अभ्यक्ञ कहते हैं। इसके लिये सरसों, 
तिल या कोई औषधि तेलों का प्रयोग कर सकते हैं। स्नान करने से पहले प्रतिदिन, 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / ॥67 


हर 


विशेषकर जाड़े के दिनों में, इसका प्रयोग करना चाहिये । इससे निम्नलिखित लाभ 
होते हैं- 
. त्वचा मुलायम तथा मजबूत हो जाती है। 
2. त्वचा के रन्ध्र खुल जाते हैं, त्वचा में रक्त भ्रमण खूब होता है और व्यायांम॑ भी 
हो जाता है। , 
3. त्वचा में स्निग्ध द्रव्यों के शोषण की शक्ति होने के कारण मालिश के तेल का 
कुछ अंश शरीर में प्रवेश करके उसको पुष्ट करता है। 
4. तेल मलकर फिर थोड़ी देर धूप में बैठा जाये तब अधिक लाभ होता है। 
5. इससे त्वचागत मैल ढीली होकर स्थान-स्थानं पर एकत्र हो जाती है और नहाते 
समय आसानी से छूट जाती है। .' 
अभ्यज्ञ के विषय में विविध मत प्राप्त होते हैं।४ 
तैलाभ्यड़ के विषय में अष्टांग-हृदय में भी पर्याप्त वर्णन प्राप्त होता.है। उसके 
अनुसार जब खाने-पीने की इच्छा उत्पन्न होती है तो वात-नाशक, सुगन्धित, ऋतु 
के अनुसार, सुखकारक तैल से अभ्यंग करना चाहिये। अभ्यज्ञ वायु नाशक, शरीर 
को पुष्ट करने वाला, निद्रा लाने वाला, शरीर को दृढ़ एवं वृहत्‌ करने वाला होता 
है। (दग्ध) अग्नि से जलने, (भग्न) हड्डी के टूटने, शस्त्रादि सें चोट लगने पर 
अभ्यज्ञ करने से पीड़ा शान्त होती है। कलम (मानसिक अवसाद), श्रम एवं जरा, 
-नष्ट होता है। जिस प्रकार रंथ के अक्ष पर तैल लगाने से रथ के पहिये सरलता 
से चलते हैं, चमड़े पर तैल लगाने से चमड़ा कोमल तथा मजबूत हो जाता है और 
मिट्टी के घड़े पर स्नेह लगाने से घड़ा मजबूत, चिकना एवं चमकीला हो जाता है। 
उसी प्रकार शरीर पर तैल का अभ्यज्ञ करने से शरीर की सन्धियों में गति सरलता 
से होती है, त्वचा कोमलं एवं दृढ़ हो जाती है और शरीर स्निग्ध तथा कान्तिमान 
हो जाता है।6 ... 
शिरोच्भ्यड्ः 
त्वचा में वायु विशेष रूप से रहता है और स्पर्शेन्द्रिय त्वचा में आश्रित है, 
त्वचा में अभ्यज्रं अत्यन्त उपयोगी है, इसलिये अभ्यड्ज का- प्रतिदिन सेवन करना 
चाहिये। शिर, कान और पैर के तलुओं पर विशेष रूप से प्रतिदिन तेल क्री मालिश 
करनी चाहिये । शिर पर तैल लगाना-केशों के लिये हितकर, कपालास्थियों तथा 
इन्द्रियों को तर्पण करने वाला होता है। कान में तैल डालने से हनुशूल (००८ 
2४५0, मन्यास्तम्भ (॥07४००॥॥७), शिर-शूल एवं कर्ण-शूल नष्ट होते हैं। पैरों का 
अभ्यड्ग करने से पैसों में स्थैर्य, अच्छी निद्रा एवं नेत्र की ज्योति बढ़ती हैं। पाद 
सुप्ति (पाद-शून्यता), स्पंर्श-ज्ञान का अभाव (भण्राणवा०5७), श्रम, स्तम्भ, संकोच 
तथा स्फुटन (२8०ताए ० ७०) नष्ट होता है।४ 
अभ्यज्ञ का निषेध 
कफ दोष से पीड़ित रोगी में वमन, विरेचन आदि संशोधन कर्म के पश्चात्‌ 
तथा अजीर्ण रोग में अभ्यज्ञ नहीं करना चाहिये।” 


68./ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


त्वचा में वायु विशेष रूप से रहता है, 5७50 ४९४७८ ॥॥0॥85 भी त्वक में 
रहते हैं, स्पर्शेन्द्रिय (९6॥6 $॥5०४०) त्वक में आश्रित होता है, इसलिये अभ्यज्ञ 
करने से शीघ्र त्वक्‌ विकारों में लाभ होता है। अभ्यज्ञ नित्य करना चाहिये क्योंकि 
इससे वृद्धावस्था, थकावट तथा वात-विकार नष्ट होते हैं। शरीर में जो टूट-फूट की 
प्रक्रिया होती है, उसकी मरम्मत हेतु अभ्यज्ञ लाभ-प्रद है। शिर-कर्ण तथा पाद-तलों पर 
विशेष रूप से अभ्यह्ञ का निर्देश किया गया है। इस सम्बन्ध में इन्दु ने कहा है'* महर्षि 
अग्निवेश ने शिर पर अभ्यज्ञ करने से होने वाले लाभ के विषय में कहा है।” 
महर्षि सुश्रुत ने कहा है।” 
कर्ण में तैल-पूरण से होने वाले लाभ के विषय में महर्षि अग्निवेश ने कहा है।” 
महर्षि सुश्रुत ने कहा है।” 

स्नेह का बाह्य प्रयोग इन्दु ने स्पर्शन, मर्दन एवं अवगाहन तीन प्रकार से किया 
है।# 

इसका बाह्य प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से होता है- 
. अभ्यज्ञ 

अभ्यक्ञ सम्पूर्ण शरीर को कोमल करता है, वात-कफ की शांतिं, रसादि धातुओं 
की पुष्टि, त्वचा की शुद्धि, कान्ति एवं बल-प्रद होता है। 
2. सेंक (सिंचन) सम्पूर्ण अंगों का परिषेक 

वाल्मीकि रामायण में अभ्यज्ञादि का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता है किन्तु नित्य-कर्म 
का उल्लेख ही इसकी पूर्ति कर देता है। 
स्नान 

महर्षि वाग्भट ने स्नान के लाभ बताते हुए कहा हैं, “स्नान जठराग्नि दीपक, 
वृष्य, आयुष्य (आयुवर्द्धक), ओज-प्रद होता है और कण्डू, मल, श्रम-स्वेंद, तन्द्रा, तृषा, 
दाह तथा पाप (बुरी भावना) को नष्ट करता है।”* उष्ण जल से अधः काय (कटि 
के नीचे) का परिषेक (स्नान) बल कारक होता है, किन्तु उष्ण जल से ही शिर का 
स्नान केशों एवं नेत्र के बल को नष्ट करता है।* 

शिर को बिना भिगाये स्नान नहीं करना चाहिये। नग्न होकर स्नान, उदक 
अवतरण एवं शयन नहीं करना चाहिये।* 

दूसरे के द्वारा बनायें गये तालाब आदि में से पाँच ढेला मिट्‌टी का बिना निकाले 
स्नान नहीं करना चाहिये। इससे तालाब की सफ़ाई हो जाती है।” 

महर्षि अग्निवेश ने स्नान से लाभ बताये हैं- 

स्नान पवित्र, वृष्य, आयुष्य, श्रम, स्वेद से उत्पन्न मल को दूर करने वाला, शरीर 
को बल देने वाला तथा ओजस्कर है।* 
महर्षि सुश्रुत ने भी स्नान के अनेक लाभ बताये हैं।” 
शीत एवं उष्ण जल से स्नान का विचार 

शीत एवं उष्ण जलन से स्नान के विषय में सुश्रुत ने अपने. विभिन्‍न विचार रखे 
ड्ैं (0० ४ 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 69 


कुछ निषिद्ध कर्म 

जल में अपनी परछाई नहीं देखनी चाहिये। जलाशय के किनारे खड़े होकर 
जलाशय को न देखें, हाथों अथवा पैरों से जल को नहीं उछालना चाहिये। स्नान 
करने के पश्चात्‌ फिर शरीर के मैल को मलकर नहीं निकालना चाहिये। स्नान के 
पश्चात्‌ बालों को नहीं झटकना चाहिये और स्नान के अनन्तर गीले शरीर में ही 
धोयी हुई पगड़ी और वस्त्र नहीं पहनना चाहिये । स्नान के पूर्व धारण किया हुआ 
वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। स्नान के पश्चात्‌ तैल एवं वसा स्पर्श नहीं करना 
चाहिये। शयन के समय, घर से बाहर जाने के समय तथा देव पूजन के समय 
अलग-अलग वस्त्र धारण करने चाहिये। 
स्नान का निषेध 

अर्दित रोग, नेत्र-रोग, मुख रोग, कर्ण-रोंग, अतिसार, आध्मान, पीनस, अजीर्ण 
तथा भोजन के बाद स्नान गर्हित है, अर्थात्‌ स्नान नहीं करना चाहिये।” सुश्रुत 


ने भी इस विषय में कहा है।” 
स्नान के प्रकार 

अग्निपुराण में स्नान के अनेक प्रकारों का उल्लेख किया है यथा- 
. घृत स्नान। 5. सर्वगन्धोदक स्नान। 
2. गोमय स्नान। 6. फ्लोदक स्नान। 
3. गोमूत्र स्नान। 7. धात्र्ुयुदक स्नान। 
4. क्षीर स्‍्नान। 8. तिलादि जल स्नान। 
5. दघि स्नान। 9. प्रियड्ूदक स्नान। 
6. कुशोदक स्नान। 20. पद्मादि जल स्नान। 
7. पंचगव्य स्नान। 2. बलाद्रमोदक स्नान। 
8. शतमूल स्नान। 22. विष्णूदक स्नान। 
9. गोश्रज्ेदक स्नान। 23. घुत-क्षीर-स्नान। 
0. पलाशादि जल स्नान। 24. पंचगव्य स्नान। 
. बचादि जल स्नान। 25. द्विस्नेह स्‍्नान। 
2. हेम जल स्नान। 26. त्रिरस स्नान। 
3. रजत-ताम्र जल स्नान! 27. समल स्नान। 
4. रत्नोदक स्नान। 28. त्रिमधुर स्नान ४ 


वाल्मीकि रामायण में भी कई प्रकार के स्नान बताये हैं यथा- 
. गंगाजल से स्नान“ 

2. सिर के ऊपर से स्नान 

3. समुद्र के जल से स्नान (“ 

4. तीर्थों के जल से स्नान" 
5. मधु से स्नाना 
6. दधि से स्नान 


(68 १ 
7705 औनोकजमपरम पा आयुर्वद 


8. चन्दन मिश्रित जल से स्नान।” 
9. गोदावरी के जल से स्नान।" 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में स्नान के अनेकानेक प्रकारों का उल्लेख प्राप्त 
होता है। 
यूजाधिकार में वर्णित सामान्य स्नान-विधि 

वाल्मीकि रामायण में स्नान-विधि का उल्लेख नित्य-नियम आदि के अन्तर्गत 
किया है, यद्यपि स्नान शब्द का अभिषेकादि के रूंप में भी अनेकों बार प्रयोग 
मिलता है तथापि इसकी किसी विशेष-विधि की प्राप्ति नहीं होती है। रामायण में 
पूजादि से पूर्व स्नान का निर्देश किया गया है। 

यथा 

. जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन ऋषियों ने पूर्ण सावधान रहकर 
शोणभद्र के तट पर पड़ाव डाला। जब सूर्य देव अस्त हो गये, तब स्नान करके उन 
सबने अग्निह्ेत्र का कार्य पूर्ण किया 7! 
2. पुरोहित जी के चले जाने पर मन को संयम में रखने वाले श्री राम ने स्नान 
करके अपनी विशाल लोचना पत्नी के साथ श्री नारायण की उपासना प्रारम्भ 
की।? 
3. सदूगुणसम्पन्न तथा जपकर्म के ज्ञाता श्री रामचन्द्र जी ने स्नान करके 
शौच-संतोषादि नियमों के पालन-पूर्वक संक्षेप से उन सभी मंत्रों का पाठ एवं जप 
किया, जिनसे वास्तु यज्ञ की पूर्ति हो जाती है।? 
4. नदी. में विधि पूर्वक स्नान करके न्‍्यायतः गायत्री आदि मंत्र का जप करने के 
बाद श्री राम ने पंचसूनादि दोषों की शान्ति हेतु उत्तम बलि कर्म किया।* 

इस प्रकार रामायण में पूजा अर्चनादि तथा सन्ध्योपासनादि से पूर्व स्नान करने 
का उल्लेख प्राप्त होता है। 
वस्त्र धारण 

अष्टांग हृदयकार का मत है कि जीर्ण, मलिन तथा अत्यन्त लाल (रंगीन) 
वस्त्र नहीं धारण करना चहिये। लाल कमल ()५५॥ए॥8०३ 52॥94 ७भ०) के 
अतिरिक्त अन्य मालादि धारण नहीं करना चाहिये।* 

वाल्मीकि रामायण में वस्त्र धारण का नित्य कर्म के अतिरिक्त प्रथक से भी 
उल्लेख प्राप्त होता है। 
अजुलेपन 

स्नान के पश्चात्‌ अनुलेपन का विधान महर्षि सुश्रुत ने बताया है।* “चन्दन 
आदि का शरीर पर लेप सौभाग्य देने वाला, वर्ण को बढ़ाने वाला, प्रीति, ओज एवं 
बलवर्द्धक है, स्वेद दौर्गन्ध्य, विवर्णता एवं श्रम को नष्ट करता है। जिन लोगों के 
लिये स्नान निषिद्ध है उन लोगों के लिये अनुलेपन भी निषिद्ध है।” 

वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर अनुलेपन का उल्लेख किया गया है 
यथा- 


: शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / ॥7 


. यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण यह अड्डराग और बहुमूल्य अनुलेपन 
मैं तुम्हें देती हूँ। सीते! ये तुम्हारे अज्ञों की शोभा बढ़ायेगी। ये सब तुम्हारे ही योग्य 
हैं और सदा उपयोग में लायी जाने पर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी ।” 
2. जनक किशोरी! इस दिव्य अड्जराग को अज्ों में लगाकर तुम अपने पति को उसी 
प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान विष्णु की शोभा बढ़ाती है।* 
5. “आपके ये दोनों धनुष विचित्र चिकने तथा अद्भुत अनुलेपन से चित्रित हैं। इन्हें 
सुवर्ण से विभूषित किया गया है; अतः ये इन्द्र के वज़ के समान प्रकाशित हो रहे 
हैं।!+ 
4. ..... अनुलेपन लगाये, प्रफुल्ल कमल के सदृश सुंदर एवं लाल नेत्र वाले वे 
मतवाले विद्याधरगण भयभीत से होकर आकाश में चले गये।'" 
5. हनुमान जी ने यह भी देखा कि नायिकाएँ अपने अड्डों में चच्दन आदि का अनुलेपन 
करती हैं, ....... 
6. उसके अज्ञों में सुगन्धित लाल चन्दन का अनुलेपन लगां हुआ था जिससे वह 
आकाश में सन्ध्या काल की लाली तथा विद्युल्लेखा से युक्त मेघ के समान शोभा पाता 
था | इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में अनुलेपन का उल्लेख अनेक स्थलों पर दिखाई 
देता है। यही नहीं रामायण में और भी बहुत से ऐसे प्रसंग हैं जहाँ अनुलेपन का प्रयोग 
किया गया है।४ 
पुष्पा भरण धारण करना 

दिनचर्या के अन्तर्गत आवश्यक कार्य, शौच, संतोषादि, स्नान आदि नियमों का 
पालन करने के पश्चात्‌ वस्त्र-धारण अनुलेपनादि का कार्य होता है। तत्त्पश्चातू पुष्पा 
भरण, अलंकार आदि धारण का कार्य होता है। विभिन्‍न संहिताओं में इस प्रकार का 
उल्लेख मिलता है। 

अष्टांग संग्रहकार वाग्भट ने इन अनुलेपन तथा पुष्पादि मालाओं के धारण को 
प्रसाधन कहा है। उनके अनुसार-“शरीर पर सुगन्धित द्रव्यों का लेप तथा का 
माला आदि धारण करना वृष्य (पौरुषकारक $0॥|925 [90)', अलक्ष्मीष्न ( 
नाशक) तथा प्रसाधन (कान्तिकर) होता है।* 

इस सम्बन्ध में महर्षि अग्निवेश ने कहा है-“गन्ध तथा पुष्प-मालाओं का धारण 
वृष्य, सुगन्‍्ध कारक, आयुष्य, काम्य कारक, शरीर के लिये पुष्टि कारक तथा बल-प्रद 
होता है। मन को प्रसन्‍न करता है तथा दरिद्रता नाशक होता है ।/* 

वाग्भट ने पुष्पाभरण के विषय में यह भी कहा है कि-लाल कमल (भञञगए॥8०8 
50988 ५/|0) के अतिरिक्त अन्य लाल रंग के फूलों की माला तथा अत्यन्त लम्बी 
माला धारण नहीं करना चाहिये ।* ह 

वाल्मीकि रामायण में पुष्पाभरण धारण का उल्लेख कुछ इस प्रकार प्राप्त होता 
ह्ठै 2 
सन्ध्योपासना विधि ; 

वाल्मीकि रामायण में प्रातःकालीन मंगलकारक कार्यों के अन्तर्गत सन्ध्योपासना 


72 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


का उल्लेख मिलता है। इस विषय में अष्टांग हृदय में कहा गया है कि मुख 

प्रक्षालन के बाद देवताओं एवं वृद्धजनों को प्रणाम करें ।॥#* 3 
सन्ध्याकालीन उपासना. ही सन्ध्योपासना है। प्रातः एवं सायं की संधि बेला 

के समय को तथा रात्रि एवं प्रातः की संधि बेला के समय को सन्ध्या कहते हैं, उस 

समय में उपासना विधान किया गया है, इस उपासना के अन्तर्गत गायत्री आदि 
मंत्रों एवं इष्ट-स्मरण करना चाहिये। 
रामायण में सन्ध्योपासना का निम्नलिखित उल्लेख प्राप्त होंता है। 

. मुनि कुमार के वध से दुःखी विलाप करते हुए उनके माता-पिता इस प्रकार 

कहते हैं-“अब कौन स्नान, सन्ध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर 

पुत्र-शोक के-भय से पीड़ित हुए मुझ बूढ़े को सांत्वना देता हुआ मेरी सेवा 
करेगा।”# 

2. उस समय लक्ष्मण के थैर्य बंधाने पर शोक से व्याकुल हुए श्री राम ने कमल 
नयनी सीता का चिन्तन करते हुए सन्ध्योपासना की ९ 

$. वहाँ स्नान, सन्ध्योपासना और जप करके वे वानर वीर दशानन को लिये-दिये 
उत्तर समुद्र तट पर जा पहुँचे ।” 

4. प्रातः होने पर पूर्वाह्न काल का कार्य संध्यावन्‍्दन आदि करके महापराक्रमी 
शत्रुघ्न हाथ जोड़ मुनि से विदा ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये।” 

5. वीर! अब सन्ध्योपासना का समय बीता जा रहा है। पुरुष सिंह! सब ओर ये 
सब महर्षि स्नान कर चुकने के बाद भरे हुए घड़े लेकर सूर्य-देव की उपासना 
कर रहे हैं।'* 

6. ऋषि का यह आदेश पाकर श्री रामचन्द्र जी सन्ध्योपासना करने के लिये 

अप्सराओं से सेवित उस पवित्र सरोवर के तट पर गये। . 

वहाँ आचमन और सन्ध्योकाल की उपासना करके श्री राम ने पुनः महात्मा 

कुम्भज के आश्रम में प्रवेश किया ।” 

रात बिताने पर जब सवेरा हुआ, तब स्नान संध्या के पश्चात्‌ समिधा-होम का 

कार्य पूरा करके वे दोनों भाई ऋषि के बताये अनुसार वहाँ सम्पूर्ण रामायण 
का गान करने लगे।४ 
इस प्रकार रामायण में वर्णित सन्ध्योपासना से सम्बन्धित उपरोक्त सभी 
सन्दर्भों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन समाज में सभी लोग 
सन्ध्योपासना करते थे तथा यह उपासना प्रातः एवं सायं दोनों समय हुआ करती 
थी, इससे पूर्व आचमन एवं स्नान अवश्य हुआ करता था तथा सन्ध्योपासना में 
मुनि लोग अधिकांशतः प्रातः को सूर्य की उपासना किया करते थे। इनके 
अतिरिक्त मुनि कुमार, राजा अर्थात्‌ क्षत्रिय एवं ब्राह्मण सभी इसे मानते थे। 
पादत्र एवं पका धारण 
वाल्मीकि रामायण कालीन समाज में पादत्र एवं पादुका धारण करने की प्रथा 
थी, इस तथ्य का परिचय रामायण से ही प्राप्त हो जाता हैं। उस समय में वर्तमान 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ 73 


श्र 


का 


की भाँति चर्म के बने जूते तो नहीं होते थे, किन्तु सुवर्णभूषित चरण-पादुकाएँ 
अवश्य हुआ करती थीं, जिन्हें राजा एवं राजकुमार आदि धारण करते थे। 

इस सम्बन्ध में वाग्भट का कथन है कि “दूसरों के द्वारा उपयोग किया हुआ 
वस्त्र, फूल एवं जूता नहीं धारण करना चाहिये ॥” 

भगवान श्री राम अपने पिता राजा दशरथ की आज्ञा पा वन को चले गये हैं, 
उनके पश्चात्‌ भाई भरत ननिहाल से लौटते हैं तथा सारा वृत्तान्त जानकर व्यथित 
हो अपने अग्रज को लौटाने वन को जाते हैं, अथक प्रयत्न के बाद भी जब श्री राम 
लौटने को तैयार नहीं होते हैं तब भरत श्री राम से इस प्रकार कहते हैं, “आर्य! 
ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इन पर अपने चरण 
रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत्‌ के योग-क्षेम का निर्वाह करेंगी।”* 

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्री राम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर 
अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया ।” 

उन पादुकाओं को प्रणाम करके भरत ने श्री राम से कहा-“वीर रघुनन्दन! 
मैं भी चौदह वर्षों तक जटा और चीर धारण करके फल-मूल का भोजन करता 
हुआ आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर से बाहर ही रहूँगा। परंतप! इतने दिनों 
तक राज्य का सारा भार आपकी इन चरण पादुकाओं पर ही रखकर मैं आपकी 
बाट जोहता रहूँगा |” 

धर्मज्ञ भरत ने भली-भाँति अलंकृत की हुई उन परम्‌ उज्ज्वल चरण-पादुकाओं 
को लेकर श्री रामचन्द्र जी की परिक्रमा की तथा उन पादुकाओं को राजा की 
सवारी में आने वाले सर्वश्रेष्ठ गजराज के मस्तक पर स्थापित किया ॥० 

तदन्तर श्री राम चन्द्र जी की दोनों चरण पादुकाओं को अपने मस्तक पर 
रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्‍नतापूर्वक रथ पर बैठे ।० 

इनके अतिरिक्त और.भी कई श्लोकों में चरण-पादुका का उल्लेख मिलता 
है प्‌ 

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण कालीन 
समाज में पादत्र एवं पादुका धारण करने का प्रचलन था, उस समय में स्वर्ण-भूषित 
पादुकाओं का प्रयोग किया जाता था। पादुकाओं को यथोचित सम्मान दिया जाता 
था। 

राजा अर्थात्‌ क्षत्रिय के अतिरिक्त मुनि, आदि भी काष्ठ की पादुकाओं को 
धारण करते थे। 
छत्न घरण 

वाल्मीकि रामायण में छत्र-धारण का भी उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में 
राजा-महाराजा छत्र-धारण किया करते थे, चँँवर भी डुलाये जाते थे। राजा राम भी 
छत्र-धारण करते थे, इसकी पुष्टि रामायण में लिखित इस उद्धरण से हो जाती 
है--'उस समय भरत ने सारधि बनकर घोड़ों की बागडोर अपने हाथ में ले रखी 
थी। शत्रुघ्न ने छत्र लगा रखा था और लक्ष्मण उस समय श्री रामचन्द्र जी के 


74 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मस्तक पर चँवर डुला रहे थे।" 

राम राज्याभिषेक में भी छत्र-धारण का उललेख मिलता है-उस समय शत्रुघ्न 
जी ने उन पर श्वेत रंग का छत्र लगाया। एक और वानरराज सुग्रीव ने श्वेत चँवर 
हाथ में लिया तो दूसरी ओर राक्षस राज विभिषण ने चन्द्रमा के समान चमकीला 
चँवर लेकर डुलाना आरम्भ किया ॥० 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंगों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन “समाज में 
राजा-महाराजाओं के द्वारा छत्र धारण की प्रथा थी। 
दण्ड धरण 

प्राचीन रामायण कालीन समाज में दण्ड धारण की भी प्रथा थी ऐसा रामायण 
से स्पष्ट होता है,-'इतने में ही लक्ष्मण ने दिव्यास्त्र की शक्ति से सम्पन्न उस 
प्रज्ज्वलित एवं भयंकर वाण को अतिकाय के ऊपर चलाया, मानो यमराज ने अपने 
काल दण्ड का प्रयोग किया हो ॥!० 
सामाजिक स्वस्थवृत्त 

रामायण में स्वस्थ वृत्त को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। प्रत्येक स्थान पर 
पात्र एक दूसरे से मिलने पर परस्पर यह प्रश्न प्रथम पूछा करते थे-““आप स्वस्थ 
तथा सानन्द तो हैं?” राम ने निषाद राज गुह से मिलते ही संतोष व्यक्त किया, 
“गुह! सौभाग्य की बांत है कि मैं आज तुम्हें बन्धु-बान्धवों के साथ स्वस्थ एवं 
सानन्द देख रहा हूँ” यह संतोष है। रामायण में स्वास्थ्य .दो प्रकार का माना 
गया है- 

. मानसिक स्वास्थ्य तथा 

2. शारीरिक स्वास्थ्य ल्‍ 
यह स्पष्ट है कि एक के बिगड़ने पर दूसरा भी विकृत हो जाता है कवि ने इस. 

बात को अधिक स्पष्ट करने की दृष्टि से "कोई शारीरिक व्याधि जनित संताप 

अथवा मानसिक अभिताप (चिन्ता) तो इन्हें पीड़ित नहीं कर रहा है? क्योंकि 

मनुष्य को सदा सुख ही सुख मिले-ऐसा संयोग प्रायः दुर्लभ होता है /'* कहकर 

शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य की ओर संकेत किया है। 

रामायण में जहाँ ज्वर शब्द का उल्लेख किया गया है वहाँ मानसिक शारीरिक 
अस्वस्थता तथा ताप में से एक का संकेत प्राप्त होता है। रामायण में जहाँ सम्पूर्ण 
रूप से स्वस्थ व्यक्ति का नामोल्लेख किया है वहाँ उसे नारायण रूप भगवान की 
संज्ञा दी गयी है- 

“नारायण मनोमये' और ऐसे व्यक्ति केवल भगवान राम थे। जहाँ कहीं भी 
किसी के स्वस्थ रहने की कामना की गयी है, वहाँ “सर्वथा नित्यमनायम्‌” कहकर 
उसके शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य की कामना व्यक्त की गयी है-आप सभी 
तरह से नित्य स्वस्थ रहें। जहाँ कहीं अरोग शब्द का प्रयोग हुआ है वहाँ भी उभय 
प्रकार के स्वास्थ्य का ही तात्पर्य समझा जाना चाहिये। 

श्री राम के वनवास गमन के बाद जब भरत को बुलाने के लिये राजदूत उनके 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 75 


ननिहाल भेजे गये तब भरत ने उनसे पूछा महाराज दशरथ तो स्वस्थ हैं, कौशल्या 
तथा लक्ष्मण तो स्वस्थ हैं?" जहाँ भी समावस्था का प्रयोग किया है-वहाँ भी 
सामान्यतः मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य से ही लिया जाना चाहिये। 

सीता की खोज में गये वानर जब पूर्णतः निराश हो गये तब कवि ने 
'सर्वमस्वस्थम्‌” सभी अस्वस्थ हो गये ऐसा कहकर उनकी विषमावस्था का संकेत 
किया है परन्तु जब वे स्वस्थ हो गये तब “स्वस्थाउभव गतज्वराः” कहा है। रामायण 
में स्वस्थ व्यक्ति को पुनः स्वस्थ बताने के लिये एक शब्द का प्रयोग किया गया 
है और वह है-'स्वस्थतरो5भवत्‌ /”" कुछ ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख भी रामायण 
में प्राप्त होता है जो आजीवन स्वस्थ रहे। अयोध्यापुरी .के लोग “आयुनिरामयं * 
प्राप्त” कहकर उनके नित्य प्रति स्वस्थ रहने का उल्लेख किया: है। यहाँ तक कि 
रामायण को भी “आयुरोगहर काव्य” कहकर आयु निरोगकर काव्य बताया है। 
शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिये “नियतेन्द्रिय” अर्थात्‌ इन्द्रिय संयम से 
रहना परमावश्यक बताया है। 

स्वस्थ रहने वाला व्यक्ति कभी अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। परन्तु युद्ध 
में जो वानर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए वे देव कृपा से पुनः स्वस्थ हो गये। राम 
राज्य प्राप्त करने के बाद अयोध्या में जहाँ सभी नागरिक स्वस्थ, धार्मिक तथा 
बलवान थे। एक भी अकाल मृत्यु की घटना न घटी। एक ब्राह्मण का इकलौता 
बेटा जो केवल 3 वर्ष 0 माह 20 दिन की आयु:का था अकाल मृत्यु को प्राप्त. 
हुआ। वह ब्राह्मण अपने पुत्र को लेकर राम दरबार में आया। इस ब्राह्मण ने बताया 

* कि उसने व्यक्तिगत रूप से कोई पाप नहीं किया है। उसने यह भी बताया कि 

ऐसी घटना न तो पहले कभी घटी है और न सुनी है। उसने श्री राम से अपने पुत्र 
को जिंदा कर देने की प्रार्थना की। अंत में श्री राम ने यह पता लगाया कि इस 
अकाल मृत्यु का कारण कोई पाप कर्म है, जो गुप्त-रूप से राज्य में व्याप्त हो रहा 
है ज्यों ही इस पाप का निराकरण किया गया, ब्राह्मण का वह पुत्र पुनः जीवित हो 
गया। इससे यह स्पष्ट है कि स्वस्थ रहने के कारणों में पुण्य कर्म का भी महत्वपूर्ण 
स्थान है। 

रामायण में कुछ ऐसे प्रदेशों का भी नाम, प्राप्त होता है जो प्रकृतितः स्वस्थ 
एवं निरामय थे। सदा स्वस्थ रखने वाले प्रदेशों में 'कारूप-पथ” तथा “चन्द्रकान्त' 
का नाम आता है। ये दोनों ही प्रांत स्वस्थ थे। समुद्र पर राम ने “अग्नि वाण! 
साधा। इस पर समुद्र घबराया और उसने श्री राम से यह प्रार्थना की कि प्रभो! जैसे 
जगत में आप सर्वत्र विख्यात एवं गुणात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उतर की ओर “द्रम 
कुल्य” नामक एक विख्यात पवित्र देश है। वहाँ आभीर जाति के बहुत से मनुष्य 
निवास करते हैं जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयंकर हैं वे सबके सब पापी और 
लुटेरे हैं, उनके स्पर्श से मुझे पीड़ा होती है। मैं इस पाप को नहीं सह सकता। आप॑ 
इस बाण को वहाँ सफल करिये। राम ने वैसा ही किया और इस प्रकार उस बाण 
से पीड़ित उस पृथ्वी को वरदान भी दिया जो इस प्रकार था- 


76 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


यह मरुभूमि पशुओं के लिये हितकारी होगी। यहाँ रोग कम होंगे। यह भूमि 
फल-मूल और  रसों से सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ 
होंगे, दूध की बहुतायत होगी। यहाँ सर्वदा सुगन्‍्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकार 
की औषधियाँ भी यहाँ उत्पन्न होंगी! इस भूमि का नाम मरु प्रदेश हुआ जो 
सभी मनुष्यों को स्वस्थ कर रहा है। 

इस प्रकार रामायण में व्यक्तिगत स्वास्थ्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य दोनों की ओर 
ध्यान दिया गया है। जिस ग्रन्थ में सर्व-प्रथम मिलते ही जिसके पात्र यह पूछे कि 
आप स्वस्थ तथा सानन्द तो हैं? आपके परिजन स्वस्थ तथा सानन्द हैं? उसमें. 
स्वास्थ्य का क्‍या महत्व है यह तो स्वयं सिद्ध ही है। 
सदृवृत्त या आचार-परक स्वस्थवृत्त हे 

रामायण एक ऐसा काव्य है जिसमें सदृबृत्त प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। 
उसका प्रत्येक शब्द, प्रत्येक श्लोक तथा प्रत्येक परिच्छेद सद्वृत्त का निर्देशक है। 
राष्ट्रव्यापी सदूवृत्त तथा व्यक्तिगत सदृवृत्त दोनों ही रामायण में प्राप्त होते हैं। 

श्री राम के राज्याभिषेक के पूर्व महाराज दशरथ ने उन्हें अपने पास बुलाया 
और यह उंपदेश दिया-राम! तुम गुणों में मुझसे भी बढ़कर हो अतः तुम मेरे परम 
प्रिय पुत्र हो। तुमने अपने गुणों से समस्त प्रजा को प्रसन्‍न किया है।'” तुम स्वभाव 
से गुणवान हो, फिर भी मैं सदूगुण सम्पन्न होने पर भी तुम्हें कुछ हित की बात 
बताना चाहता हूँ तुम और भी अधिक विनयशील तथा जितेन्द्रिय बने रहो। काम 
और क्रोध से उत्पन्न होने वाले दुर्व्यसनों का सर्वथा त्याग कर दो, परोक्ष वृत्ति से 
या प्रत्यक्ष वृत्ति से ठीक-ठाक न्याय विचार में तत्पर रहो। मंत्री, सेनापति तथा 
समस्त अधिकारियों को प्रसन्‍न रखना। पृथ्वी का पालन करते रहना। मन को वश 
यें रखकर उत्तम आचरणों का पालन करो ॥7४ 

महाराज ने भरत के विषय में निम्न शब्द कहे जो सच्चरित्र के परिचायक हैं। 
इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषों के आचार-व्यवहार में स्थित हैं वे 
धर्मात्मा, दयालु तथा जितेन्द्रिय हैं-तुम्हारे गुणों का अनुसरण करने वाले हैं। चारों 
भाइयों का क्रातृ-प्रेम, श्री राम की अपने पिता-माता के प्रति भक्ति, माता-पिता का 
श्री राम के प्रति अनुराग, सीता की पतिव्रता आदि वे आदर्श हैं जिनके प्रति प्रत्येक 
परिवार का आकर्षण होना स्वाभाविक है। रामायण में माँ कौशल्या का भोलापन 
तथा दूसरी ओर कैकेई का कठोर हृदय । राम को वनवास भेजते समय कैकई का 
अभिनय तथा कठोर व्यवहार कितना उनके दूषित हृदय का परिचायक है, जिसमें 
ईर्ष्या विद्वेष आदि दुर्गुण भरे पड़े हैं। साथ ही काम विमोहित महाराज दशरथ किस 
प्रकार अंत तक उसके चंगुल में फंसे रहे। इस प्रकार का यथार्थ पूर्ण चित्रण 
रामायण में अयो. काण्ड के ] से सर्ग 4 तक स्पष्ट देखा जा सकता है। उसी 
स्थान पर श्री राम के लिये उदार, कर्मठ, स्वधर्म पालक, बलशाली तथा जीव जगत 
के रक्षक आदि विशेषण उपयोग में लिये गये हैं। 

श्री राम के गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि ने निम्न गुण बताये हैं- 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ !77 


गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़ प्रतिज्ञ, सदाचार युक्त, 
समस्त प्राणियों का हित साधक, विद्वान, समर्थशाली, प्रिय-दर्शन, मन परं अधिकार 
प्राप्त करने वाला, क्रोधाजित, कान्तिमान, किसी की निन्‍्दा न करने वाला, संग्राम 
में कुपित होने पर जिससे देवता भी डरते हैं ऐसा व्यक्तित्व श्री राम हैं। वे श्री राम 
मन पर विजय प्राप्त करने वाले, महाबली, कान्तिमान, बैर्यवान, जितेन्द्रिय, 
बुद्धिमान, नीति जानने वाले, प्रभावशाली वक्ता, शोभाशाली शत्रु संहारक हैं। 
उनकी लम्बी-लम्बी भुजायें, मोटे कंधे, गर्दन शंख के समान, ठोड़ी मांसल, छाती 
चौड़ी, हंसली मांस वृत, शत्रु का दमन करने वाली भुजाएँ घुटने तक लम्बी, मस्तक 
सुन्दर, ललाट भव्य, मनोहर, मध्यम शरीर, सुडौल देह का रंग चिकना, प्रतापी हैं। 
उनका वक्षः स्थल भरा हुआ, आँखें बड़ी-बड़ी शुभ-लक्षणों से सम्पन्न, धर्म के 
ज्ञाता, सत्य-प्रतिज्न, प्रजा के हित साधन में लगे रहने वाले, यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, 
जितेन्द्रिय, मन को एकाग्र रखने वाले, प्रजापति के समान पालक, श्री सम्पन्न 
शब्रुध्वंसक, धर्म तथा जीवों के रक्षक, स्वधर्म पालक, स्वजन पालक, वेद-वेदाज्ों के 
तत्व के ज्ञाता, धनुर्वेद में प्रवीण, समस्त शास्त्रों के तत्वज्ञ, स्मरण शक्ति से युक्त, 
प्रतिभा सम्पन्न अच्छे विचार तथा उदार हृदय वाले, बात-चीत करने में चतुर, 
समस्त लोकों में प्रिय, साधु-पुरुषों से मिलने वाले, सबसे समान भाव रखने वाले, 
आर्य जिनका दर्शन ही प्रिय मालूम हो, सम्पूर्ण गुणों से युक्त, गंभीरता के समुद्र, 
हिमाचल के समान थैर्य वाले, विष्णु भगवान के समान बलशाली, चन्द्रमा के 
समान प्रिय-दर्शन, क्रोध में कालाग्नि के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, त्याग में 
कुबेर के समान और सत्य में धर्म-राज के समान सभी प्रकार के उत्तम गुणों से 
युक्‍त, सत्य-पराक्रम वाले, सदूगुण शाली थे। ये वे गुण हैं जो मनुष्य को मनुष्य से 
उठाकर देवत्व की ओर ले जाते हैं। 

राम अपनी माता कौशल्या के विषय में कहते हैं--“ये मेरी माता कौशल्या 
वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है यह कभी आपकी 
(राजा दशरथ) की निन्‍्दा नहीं करतीं। भरत का सच्चरित्र उस समय और भी 
उज्ज्वल हो उठता है, जब वे कौशल्या के सामने राम-वन-गमन के विषय में अपने 
उद्गार प्रकट करते हैं, तथा उसके बाद श्री राम को वापस लौटाने के लिये वन 
में जाकर उनसे आग्रह करते हैं लौटाने का.। भरत की शपथें जो वे समय-समय पर 
अपने सफाई देने के लिये कहा करते हैं वे वास्तव में उनके उज्ज्वल चरित्र की 
परिचायक हैं। वे अनुराग के कारण अपनी माँ को बुरा-भला कहने में नहीं चूकते। 

राजा गुह से उनकी बात हुई उसके द्वारा राम के प्रति अनुराग कितना था यह 
स्पष्ट झलकता है। वे तृणों को भी पवित्र मानते हैं जिन पर राम ने सोकर रात 
बितायी थी। 

राज्य परिवार के उच्च चरित्र के बाद वाल्मीकि रामायण में राज-मंत्रियों के 
सद्‌गुणों तथा सदूनीति का वर्णन इस प्रकार है-राजा दशरथ के मंत्रिगण जो संख्या 
में 8 थे मंत्री जनोचित गुणों से सम्पन्न थे ये मंत्र को जानने वाले, मनो-विकार के 


]78 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जानकार, मुखाकृति द्वारा मनोभावों को पहचानने वाले, राजा के प्रिय तथा 

हित-चिन्तक, शुद्ध आचार-विचार वाले, यशस्वी, सदा राज्य सेवारत रहने वाले थे। 

ब्रह्मर्षि तथा ऋत्विज जो मंत्री का कार्य भी करते थे-सभी विद्वान थे, विनय-शील 

थे, सलज्ज, कार्य-कुशल, जितेन्द्रिय, श्री सम्पन्न, महात्मा, शास्त्रों के ज्ञाता, सुदृढ़, 

पराक्रमी, समस्त राज्य कार्यो में सावधान, राजाज्ञा पालक, तेजस्वी, क्षमाशील, 

कीर्तिमान, मुस्कराकर बात करने वाले, काम, क्रोध और स्वार्थों के वशीभूत होकर 

झूठ न बोलने वाले, शत्रु-पक्ष के राजाओं की सारी बात जानने वाले, व्यवहार 

कुशल, सौहार्द्रपूर्ण, न्‍्यायप्रिय, कोष तथा सेना के संगठन में पारंगत, बिना अपराध 

किसी की हिंसा न करने वाले, शौर्य तथा उत्साह से परिपूर्ण, राजनीति में कुशल, 

सत्पुरुषों के रक्षक, न्यायोचित धन संग्राहक, अपराधी को बलाबल देखकर 

यथोचित दण्ड देने वाले, शुद्ध भांव वाले, विचारों में एक उतम व्रतधारी, राज्य 

हितैषी, नीति युक्त, गुरु तुल्य, समादरणीय, राजा के अनुग्रह गात्र, सभी देश कालों 

में गुणवान सिद्ध होने वाले, स्वभावतः दैवी सम्पति से युक्त, राजकीय मंत्रणा को 

गुप्त रखने वाले सूक्ष्म-दर्शी थे।'* इधर प्रजा भी सदूवृत गुणों से सम्पन्न थी। 

अयोध्या पुरी तथा कौशल राज्य में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो मिथ्यावादी, 

दुष्ट तथा परस्त्री लम्पट हो। सम्पूर्ण नगर तथा राष्ट्र में शान्ति छायी हुई थी॥४ 
श्री राम को वन से लौटांने के लिये जब भरत उनके पास गये तब भरत से 

श्री राम ने कुछ प्रश्न पूछे जो उनके राजकीय तथा व्यक्तिगत सदांचार से 

सम्बन्धित थे- 

१. तुम धर्म पर अटल रहने वाले बलवेत्ता गुरु वसिष्ठ जी की पूजा करते हो न? 

2. तात! तुम पिता जी की सेवा-सुश्रुषा करते हो न? 

3. उत्तम कूल में उत्पन्न, विनयशील सम्पन्न बहुश्रुत, पुरोहित जी का सत्कार 
करते हो न? 

4. क्या देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, वृद्धों, वैद्यों .तथा ब्राह्मणों का सम्मान 
करते हो न? 

5. ब्राह्मण देवता द्वारा किये गये हवन को तुम सदैव ध्यान में रखते हो न? 

6. क्या तुमने सर्वगुण सम्पन्न मंत्री अपने पास रखे हैं? है 

7. क्या तुम्हारी मंत्रणा गुप्त रहती है तथा कार्य-क्रम गुप्त रहते हैं? लोग उन्हें तर्क 

: एवं युक्तियों के द्वारा जान तो नहीं लेते? 

8. कया तुम सहस्नों मूखों के बदले एक विद्वान को रखना पसन्द करते हो न? 

9. क्या तुम्हारे मंत्री मेधावी, शूरवीर, चतुर और नीतिज्ञ हैं? 

0. घूस न लेने वाले, बाहर, भीतर से पवित्र तथा परम्परा से ही कार्य करने वाले, 

* अमात्यों को ही तुम उत्तम कार्य पर नियुक्त करते हो नशाण 

. क्या तुम्हारी प्रजा कठोर दंण्ड से उद्विग्ग होकर तुम्हारा तिरस्कार तो नहीं 
करती 778 

2. साम, दाम प्रयोग में कुशल, कुशल राजनीतिज्ञ, फोड़ने में कुशल, शूरवीर, 


शर्र।. शुद्धि एवं वैयह्र्ल्त्म स्वस्थचृ्त की सामग्री / 79 


राज्य को हड़प लेने की इच्छा रखने वाले शत्रु को यदि राजा नहीं मारता हो 
तो वह एक न एक दिन स्वयं उसके हाथों मारा जाता है।* 

3. क्या तुम्हारे सेनापति तुमसे संतुष्ट, शूरवीर, थैर्यवान्‌, बुद्धिमान, पवित्र, कुलीन 
तथा राजा में अनुराग रखने वाले, रक्षण-कार्य में दक्ष हैं?!*० 

4. कया तुमने अपने योद्धाओं की बल-परीक्षा कर ली है तथा उन्हें सम्मानित 
किया है?श 

5. सैनिकों को समय पर वेतन देते हो न?” 

6. क्या तुम्हारे मंत्री तथा सेनाप्रधान तुम्हारे लिये प्राण त्याग करने को तैयार 
हैं 7४ 

7. क्या तुम्हारे राजदूत अपने ही देश के रहने वाले, विद्वान, कुशल, प्रतिभाशाली, 
सद्विवेक युक्त तथा जैसा कहा जाये वैसा ही समाचार आगे कहने वाले 
हैं 2४ 

8. क्‍या तुम शत्रु पक्ष के अठारह तथा अपने पक्ष के पन्द्रह तीथों की तीन-तीन 
अज्ञात गुप्तचरों द्वारा देखभाल कराते रहते हो?” 

9. राज्य निष्कासित शत्रु यदि पुनः राज्य में आ जाये तो तुम उनकी उपेक्षा तो 

«. नहीं करते ?7* 

20. तुम नास्तिक ब्राह्मणों का संग तो नहीं करते 7४ 

- सम्पूर्ण नगरी की तुम भली-भाँति रक्षा करते हो न?! 

22. कौशल देश सुख पूर्वक बसा है न?'* 

23. वैश्य जो कृषि और वाणिज्य चलाते हैं, तुम्हारे प्रीति पात्र हैं न? 

- क्या तुम स्त्रियों को संतुष्ट रखते हो? 

25. पशुओं के संग्रह से तुम्हें तृप्ति तो नहीं होती? 

26. क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्न काल में नगरवासियों को दर्शन देते हो? 

27. क्‍या मनुष्य निडर होकर तो तुम्हारे सामने नहीं आते या तुमसे लोग भयभीत 
तो नहीं हैं? ह 

28. तुम्हारे दुर्ग धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यंत्र, शिल्पी, धनुर्धरों से भरे पूरे तो हैं? 

29. आय अधिक तथा व्यय बहुत कम तथा तुम्हारा धन अपात्रों के हाथ में तो 
नहीं चला जाता है? 

30. देव, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागल, योद्धा तथा मित्रों के लिये राज्य का धन व्यय 
होता है?४९ 

37. कभी किसी प्रकार से अन्याय तो नहीं होता, निर्दोष को दण्ड तथा सदोष 

बिना दण्ड तो नहीं छूटता, धनी तथा गरीब को एक साथ यथावत्‌ न्याय तो मिलता 

है नशभ 

$2. वृद्ध पुरुष, बालक तथा वैद्यों को आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन तथा धः 

दान देते हो न?” 

$5. गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्यवृक्षों तथा समस्तपूर्णकाम 


80 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छ्ि 


क9 
्प 


ब्राह्मणों को नमस्कार तो करते हो न?» 

84.' अर्थ के द्वारा धर्म को तथा धर्म के द्वारा अर्थ को हानि तो नहीं पहुँचाते ?'* 
35. समय का विभाग कर धर्म, अर्थ, काम का योग्य समय में सेवन कटृते हो 
नश5 

36. ब्राह्मण, पुरवासी तथा जनपद वासी तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं न? 
37. नास्तिकता, असत्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घ-सूत्रता, ज्ञानी पुरुषों की उपेक्षा, 
आलस्य, पज्च इन्द्रियों के वशीभूत, राजकार्यों में अकेले सोचना, मू्खों से सलाह 
लेनां, कार्यों को शीघ्र प्रारम्भ न करना, गुप्त मंत्रणा का प्रकट करना, मांगलिंक 
कार्यों का अनुष्ठान न करना, सब शत्रुओं पर एक साथ चढ़ाई करना ये चौदह 
राजा के दोष तुममें तो नहीं हैं।॥४” 


38. दश-वर्ग - आखेट, जुआ, दिन में सोना, पर निन्‍्दा, स्त्री में 
आसकत, मद्यपान, नाचना, गाना, बजाना और व्यर्थ 
घूमना। 

. पंचवर्ग > जल दुर्ग, पर्वतदुर्ग, वृक्षेदुर्ग, उरिण दुर्ग, धन्व दुर्ग। 
चतुर्वर्ग - साम, दाम, दण्ड, भेद । 

संप्तवर्ग 5 राजा, मंत्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना, मित्र वर्ग। 

अष्टवर्ग - चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोष-दर्शन, अर्थ-दूषण, 
वाणी की कठोरता, दण्ड की कठोरता। 

त्रिवर्ग - धर्म, अर्थ, काम। 

तीन विद्या 5 वार्ता और दण्डनीति और तीनों वेदों का ज्ञान। 

छः गुण न संधि-विग्रह-मान-आसन-द्वैधीभाव, समश्रय । 

नीति - राजनीति। 

विशांति वर्ग -. ' (जो संधियोग्य नहीं है) 7 

प्रकृति मण्डल न राजा, अमात्य; सुंहद, कोषाध्यक्ष, सेनांध्यक्ष, राष्ट्रदुर्ग । 

यात्रा युद्ध यात्रा 

दण्ड विधान 

विग्रह पु 


उपरोक्त सभी की ओर तुम यथावत्‌ ध्यान देते हो या नहीं? राजा के सभी 
गुणों का इंससे स्पष्ट उल्लेख नहीं मिल सकता।”* 

रघुवंश के गुणों तथा राक्षस कुल के गुणों में पर्याप्त अंतर है। लंका तम 
प्रधान नगरी थी तथा अयोध्या सत्वप्रधान । यद्यपि रावण भी वेद-विद्या स्नातक था 
परन्तु व्यवहार में उसने उसे उतारा नहीं है, वह कुपथ को ही सुपथ समझता रहा- 
आचार्य गुरु तथा वृद्धों की तुमने व्यर्थ ही सैवा की क्योंकि तुमने उंनसे गुणों तथा 
नीति का सार ग्रहण नहीं किया।” हू 

कुम्भकर्ण के उपालम्भ भी ज्ञान-प्रंद थे- 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री /-8] 


जज] 


. तुमने हितैषी पुरुषों और ए-की हां पर विश्वास नहीं किया ॥४ 
2. तुम्हें अपने दुष्कर्म का फल मिलना अवश्यंभावी है।* 
3. केवल बल के घमण्ड से तुमने पाप-कर्म की परवाह नहीं की ॥४ 
4. जो पहले करने योग्य कार्य को बाद में करता है, वह नीति तथा अनीति को 
नहीं जानता है।5 
5. जो कार्य उचित देश काल न होने पर विपरीत स्थिति में किये जाते हैं, वे दुःख 
का कारण होते हैं॥।* 
6. धर्म, अर्थ और काम में धर्म श्रेष्ठ है, जानकर भी जो धर्म पालन नहीं करता 
वह राजा अज्ञानी है॥।5 

विभीषण ने भी इन्द्रजीत से इसी प्रकार के वचन कहे हैं- 

जिसका शील-स्वभाव धर्म से भ्रष्ट हो गया हो, जिसनें पाप करने का निश्चय 
ही कर लिया. हो, उसको त्याग कर प्राणी सुखी होता है। जो दूसरों के धर्म को 
लूटता हो, पराई स्त्री को हाथ लगाता हो, उसे त्याग देना चाहिये। 

व्यक्तिगत रूप से रामायण में अनेक पात्रों के सदूगुणों का वर्णन है परन्तु 
हनुमान के विषय में कुछ शब्द विशेष रूप से कहे गये हैं- 

उनमें यह सद्गुण प्राकृतिक रूप से भरे थे-उनमें तेज, धृति, यश, चतुरता, 
शक्ति, विनय, नीति, पुरुषार्थ, पराक्रम और उत्तम बुद्धि ये सदूगुण सदा विद्यमान 
रहते थे॥« 

राम राज्य में राष्ट्र भी स्वस्थ था-उनके राज्य में विधवाओं का विलाप नहीं 
सुना जाता था। विषैले तथा दुष्ट जन्तुओं का भय नहीं था। व्यक्तियों को रोगों 
की आशंका नहीं थी। न मानसिक न शारीरिक सम्पूर्ण राज्य चोर, लुटेरों से रहित 
था । कोई मनुष्य अनर्थवादी कार्यों को हाथ में नहीं लेता था। बूढ़ों को बालकों की 
अन्त्येष्टि कर्म नहीं करने पड़ते थे। सब लोग सदा प्रसन्‍न थे, सभी धर्म परायण 
थे, वे कभी एक-दूसरे को कष्ट नहीं पहुँचाते थे। लोग सहस्नों वर्षों तक जीवित 
रहते थे। सहस्नों पुत्रों के जनक होते थे, किसी प्रकार का रोग-शोक उन्हें व्याप्त 
नहीं था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण अपना-अपना कार्य करते थे और 
लोभ रहित थे, कोई झूठ नहीं बोलता था और सभी उत्तम लक्षणों तथा आचरणों 
से सम्पन्न थे, सभी लोग सुखी, प्रसन्न, संतुष्ट, पुष्ट, धार्मिक, रोग-व्याधि मुक्त, 
दुर्भिक्ष भय से सर्वथा निश्चित, कोई पुत्र की मृत्यु नहीं देखा करता था। नगर तथा 
राष्ट्र धन-धान्य से युक्त थे। सत्युग की भाँति सभी प्रसन्‍न थे। राजा दान-दक्षिणा 
आदि में: तत्पर रहते, यहाँ तक कि वृक्षों की जड़ें मजबूत, वृक्ष सदा फलों से लदे, 
मेघ प्रजा की इच्छा तथा आवश्यकता के अनुसार वर्षा करते थे, वायु स्वस्थ तथा 
मंदगति से चलती थी उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। इस प्रकार सम्पूर्ण राष्ट्र 
स्टप्थ और सदूबृत्त का नियमित पालन करता था॥४ 

इस प्रकार उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि रामायण में सद्वृत्त प्रचुर मात्रा 
में दृष्टिगोचर होता है। 


82 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हा 


द्वितीय परिच्छेद 
भक्ष्याभक्ष्यविचार 

आहार 

भारतीय आहार शास्त्र एक प्राचीन विज्ञान है। यह अपनी एक मौलिक 
परम्परा रखता है। प्रसन्‍नता की बात यह है कि वह रामायण में भी अपने उसी रूप 
में अवतरित हुआ है। रामायण का आहार-शास्त्र पूर्ण-वैज्ञानिक तथा यथार्थ-पूर्ण 
है। इसमें आहार-विज्ञान को दो रूपों में विभकत किया गया है। 
. सात्विक आहार। 
2. तामसी आहार। 

राजा दशरथ, मुनि वसिष्ठ, राजा गुह, ऋषि भारद्वाज के यहाँ सात्विक आहार, 
श्री राम का वन में आहार भी सात्विक था तथा उनका उसी रूप में वर्णन किया 
गया है। 

राजा रावण के यहाँ तामसी भोजन उपलब्ध था उसका वर्णन भी रामायण में 
उसी प्रकार किया गया है। 

वाग्भट के अनुसार विधि-पूर्वक लिया गया अन्न-पान (आहार) इन्द्रियाथों 
(शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के लिये इष्ट तथा आयु का आयतन कहा गया है 
क्योंकि ओज, तेज, रसादि धातुएँ, श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ, बल, तुष्टि, प्रतिभा तथा 
आरोग्य आदि सब इसी (आहार) के अधीन हैं। इसी अन्न-पान रूपी ईंधन से 
अन्तराग्नि (जठराग्नि) की स्थिति है और जठराग्नि ही शरीर धारण का मूल है।' 

अग्नि के विषय में महर्षि अग्निवेश ने कहा है- 

बल, आरोग्य, आयु एवं प्राण अग्नि के आश्रित हैं। आहार रूपी ईंधन से 
जठराग्नि प्रज्वलित रहती है, इसलिये आहार रूपी ईंधन के न मिलने से जठराग्नि 
शांत हो जाती है। प 

वाल्मीकि रामायण में आहार का अनेकानेक प्रसंगों में उल्लेख किया गया है 
यथा- 
राजा दशरथ ने अपने यहाँ अश्वमेध यज्ञ किया, जो पुत्र-प्राप्ति के निमित्त 
किया गया था। उस समय ऋषियों के लिये स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता था कोई 
भी व्यक्ति थका माँदा या भूखा प्यासा नहीं दिखता था।' उस यज्ञ में प्रतिदिन 
ब्राह्मण भोजन करते थे तथा शूद्रों को भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और 
श्रमण भी भोजन करते थे।' 

बूढ़े, रोगी तथा स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना 
स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहने पर भी किसी का मन नहीं भरता था। 

यहां विधिवत्‌ पके हुए अन्न के बहुत से पर्वतों जैसे ढेर दिखाई देते थे।* 

श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन विधिवत्‌ बनाया गया है।' बहुत स्वादिष्ट है-ऐसा 
कहकर अन्न की प्रशंसा करते थे। वे कहते थे “हम लोग खूब तृप्त हुए, आपका 

शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ 83 


3 


कल्याण हो? 

वास्तव में भोजन की श्रेष्ठता उसके खाने वाले की तृप्ति से ही ऑकी जा 
सकती है। उपरोक्त प्रसंगों पर विधि-पूर्वक दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट परिलक्षित 
होता है कि वाल्मीकि जी को आहार-शास्त्र का पूर्ण ज्ञान था तथा उन्होंने अपने 
महाकाव्य में भोजन (आहार) का भली-भाँति परिचय प्रस्तुत किया है। 
भोजन के गुण 

“आहार-द्रव्यों के विभिन्‍न स्वाभाविक गुण होते हैं यथा-गुरु-लघु, स्निग्ध-रुक्ष, 
शीत-उष्ण आदि। 

अष्टांग संग्रहकार वाग्भट के अनुसार वर्षा का जल, रक्‍्त-चावल, साठी के 
चावल, मुदूग, एण तथा लावा, पक्षी का मांस आदि आहार द्रव्य स्वभाव से लघु 
होते हैं तथा दूध, गन्ना, ब्रीहिधान्य, उड़द तथा आनूप, देशीय प्राणियों का मांस 
आदि आहार द्रव्य स्वभाव से ही गुरु होते हैं।* 

इस प्रकार आहार-द्रव्यों का स्वाभाविक गुण गुरु-लघु, स्निग्ध-रुक्ष, शीत-उष्ण 
आदि का विचार करके आहार का सेवन करना चाहिये। 

वाग्भट के ही अनुसार ये द्रव्य संयोग आदि विशेषताओं से विपरीत स्वभाव 
के बन जाते हैं।* दो या बहुंत से द्रव्यों का एक साथ मिलना संयोग कहलाता है। 
जो कार्य एक द्रव्य से नहीं होता है, वही अनेक द्रव्यों के संयोग से हो जाता है। 
जैसे मधु-धृत तथा मछली-दुग्ध का संयोग मारक होता है किन्तु पृथक्‌-पृथक्‌ वे 
स्वास्थ्य के लिये लाभ-प्रद होते हैं॥० 

जल तथा अग्नि के सन्निकर्ष आदि से भी द्रव्य में विशेष गुण प्राप्त किया 
जाता है, इस विषय में वाग्भट का मत है कि 'जल तथा अग्नि के सन्निकर्ष, शौच 
(स्वच्छता), मन्थन, देश, काल, भावना तथा भाजन (पात्र) आदि से द्रव्य का जो 


: विशेष गुण प्राप्त किया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं।'!' 


महर्षि अग्निवेश ने कहा है-स्वाभाविक द्रव्यों का अन्य गुणों के आधान के 
लिये अभिसंस्करण करण है। अर्थात्‌ अन्य गुणों का आधान संस्कार है। वे गुण 
जल, अग्नि, सन्निकर्ष, शौच, मंथन, देश, काल, वासन, भावना, काल, प्रकर्ष और 
भाजन से आधान किये जाते हैं।” 

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि उपरोक्त कारणों से द्रव्य (आहार) के गुण 
में परिवर्तन हो जाता है। 
समय 

भोजन का समय ऋतु की अपेक्षा से, व्याधि की अपेक्षा से, आहार के जीर्ण 
एवं अजीर्ण के लक्षणों के अनुसार होता है।” अजीर्ण में भोजन करने पर पहले 
खाये हुए आहार का अपरिणत रस उत्तराहार के रस के साथ मिलकर शीघ्र सब 
दोषों को प्रकुपित करता है॥* 

भोजन के जीर्ण होने पर वात आदि दोष अपने स्थान में स्थित होते हैं। वायु 
की अनुलोमतां से मूत्र और पुरीष का विसर्जन होता है। उद्गार (डकार) तथा 


84 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हृदय के स्रोतों के मुख विशुद्ध होते हैं, इन्द्रियाँ स्वच्छ होती हैं, शरीर में लघुता 
रहती है, जठराग्नि प्रदीप्त होती है, भूख लगती है, इस समय किया गया आहार 
दोषों को दूषित नहीं करता तथा आयु, बल एवं वर्ण (कान्ति) की वृद्धि करता है। 

भोजन का यही ठीक समय है ।* यह मत अष्टांग संग्रहकार महर्षि वाग्भट का है। 

वाल्मीकि रामायण में भी आहार-शास्त्र का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है। | 
भोजन का स्थान 

वाग्भट्‌ के अनुसार आहार-द्रव्यों का उत्पत्ति स्थान तथा उपयोग करने वाले 
का उत्पत्ति स्थान देश कहलाता है। इसमें उपभोक्ता के स्वास्थ्य की तथा रोगी की 
प्रकृति की दृष्टि से परीक्षा करनी चाहिये।* 

महर्षि अग्निवेश ने कहा है देश पुनः स्थान को कहते हैं। द्रव्यों की उत्पत्ति 
और प्रचार देश सात्म्य को बतलाता है।” 
भोक्ता 

भोजन अर्थात्‌ आहार ग्रहण करने वाले को भोक्‍्ता कहा गया है। भोक्‍्ता को 
स्नान किये बिना, नंगा होकर, एक वस्त्र पहनकर, मलिन वस्त्र पहनकर, बिना 
आहुति किये, बिना मंत्रों के जाप किये, देवताओं और पितरों को समर्पित किये 
बिना भोजन नहीं करना चाहिये ॥४# 

पूरब की ओर मुख करके, प्रसन्‍न मन से, पवित्र, भक्त, अक्षुधित (भूख रहित) 
तथा अनुकूल जनों द्वारा लाया गया हितकारक आहार करना चाहिये ॥४१ 

मांस एवं उपदंश भक्ष्य को छोड़कर अन्य पर्युषित भोजन नहीं करना चाहिये ।* 
भोजन के घटरस 

अष्टांग संग्रह के अनुसार रस छः प्रकार के होते हैं- 
स्वादु (मधुर ४०७६ जैसे चीनी)। 
अम्ल (खट्टा ०१ ० $00 जैसे नीबू)। 
लवण (नमकीन 52 जैसे नमक)। 
तिक्त (कड़वा एण्पा_्टणा जैसे करेला, नीम)। 
ऊषण (कटु 80 जैसे मिर्च)। 
कषाय (कसैला »॥7772०॥ जैसे आँवला)। 
ये रस द्रव्याश्रित हैं। अर्थात्‌ द्रव्यों में रहते हैं और इनमें जो जितना पूर्व है, 

वह उतना ही अधिक बल कारक होता है। जैसे मधुर रस सबसे पूर्व है, अतः वह 
सबसे अधिक बल. दायक है” 

आयुर्वेद शास्त्र में रस शब्द का प्रयोग अनेक अथथों में किया जाता है जिनमें 
मुख्य चार हैं। शरीर शास्त्र में “रस” प्रथम धातु है। रसशास्त्र में इसका अर्थ 
“पारद” है। भैषज्य कल्पना में रस किन्हीं द्रव्यों के स्वरस को कहते हैं और 
द्रव्यगुण शास्त्र में 'रस्यते आस्वद्यते रसनेन इति रसः' अर्थात्‌ जिह्ना इन्द्रिय के द्वारा 
जिस विषय का ग्रहण किया जाता है, उसे रस कहते हैं। यहाँ रस से अभिप्राय 
रसनेन्द्रिय के विषय से है। रसदाग्राह्मो गुणो रसः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिहा 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 85 


हक ह पुछ 25 


के द्वारा ग्राह्म गुण को रस कहते हैं। 

शाड्गर्धर संहिता ने भी छः प्रकार के रस बताते हुए कहा है-“अनेक द्रव्यों 
में रहने वाले छः रस प्रसिद्ध हैं यथा मधुर, अम्ल, लवण, कठु, तिकत, कषाय 7! 

आचार्य चक्रपाणि ने रस शब्द की स्पष्ट व्याख्या की है। 'रस्यत आस्वाद्यत 
इति रसः अर्थात्‌ जिह्वा के द्वारा द्रव्य की जिस अवस्था का आस्वादन किया जाता 
है उसे रस कहते हैं। 
7. मधुर (5७०९४) 

मधुर रस उसे कहते हैं जो कि मुख में रखते ही सम्पूर्ण मुख में व्यक्त होकर 
लिपट जाये और शरीर में स्निग्धता, संतृप्ति, प्रसन्‍नता तथा कोमलता ला दे।”* 
शर्करा, द्राक्षा आदि द्रव्य मधुर-रस प्रधान द्रव्यों के उदाहरण हैं। 
2. अम्ल (500) 

जिस रस के खाने से दाँतों में हर्ष उत्पन्न हो, मुख से लारा स्रावित होने लगे, 
शरीर की त्वचा से पसीना आने लगे, मुख एवं जिह्ला को बोधन अर्थात्‌ जिहा 
जागरूक होकर अन्यान्य रसों का ठीक-ठीक परिज्ञान करने में समर्थ हो जाये तथा 
मुख और कण्ठ में जलन होने लगे उसे अम्ल (5०००) रस कहते हैं ।” नींबू, इमली 
अम्ल-रस प्रधान द्रव्य हैं। 
3. लवण (5७0 

जो रस मुख में रखते ही सद्यः क्लेदन (विलयन) शील अर्थात्‌ घुलनशील हो, 
मुख में गीलापन लाकर थूक उत्पन्न कर देता हो और मुख में विशेष प्रकार की 
जलन उत्पन्न कर दे उसे लवण (59॥) रस कहा जाता है |“ सैंधवादि आठों लवण 
“लवणरस' के प्रमुख उदाहरण हैं। 
4. कटु (?प्रा8श॥) 

जो रस जिह्ना पर रखते ही मुख में चुभने की सी पीड़ा कर दे। मुख, नासा 
और नेत्रों से जल-साव तथा विदाह उत्पन्न होता हो उसे कटु रस कहा जाता है।” 
लाल-मिर्च तथा काली मिर्च कटु-रस के प्रधान उदाहरण हैं। 
5. तिक्त (छांपटा) 

जो रस जिह्नमा पर रखते ही जिह्ा के स्वाद को नष्ट कर दे। मुख की विशदता 
को शुष्क कर दे और खाने वाले व्यक्ति को प्रसन्नता उत्पादक हो उसे तिक्त रस 
कहा जाता है।” कुनेन, चिरायता, नीम आदिं तिक्त रस के प्रधान उदाहरण हैं। 
6. कषाय (७$॥क्‍8थ०0) 

जो रस जिह्ला पर रखते ही जिहा के नीलेपन को हटाकर उसमें स्तब्धता 
(निष्क्रियता) एवं मोटापन ला दे। कण्ठ में रुकावट का अनुभव लाकर जिह्ा में 
विकशन कार्य भी ला दे उसे कषाय रस कहा जाता है” बबूल, अर्जुन, मदार 
आदि कषाय रस के उदाहरण हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी षटरस का उल्लेख मिलता है। 

श्री राम वन में कषाय, तिकत तथा कड़वे फलों का आहार करते थे ।* स्वयं 


86 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


श्री राम ने अपने पितृजनों को पिण्डदान करते समय कहा है कि महाराज! यह 
पिण्ड-दान मेरी ओर से स्वीकार कीजिये क्योंकि हम आजकल यही अन्न खाते हैं। 
व्यक्ति को वही वस्तु अपने प्रियजन को अर्पित करनी चाहिये जिसे वह स्वयं 
प्रयोग में लाता हो। वह पिण्ड इंगुदी के गूदे में बेर मिलाकर बनाया गया था।* 
इंगुदी का पिण्याक ही वे उस समय प्रयोग में लिया करते थे। विभिन्‍न प्रकार के 
कन्द-मूल फल ही उनकी नित्य की खुराक थी।” 

वाल्मीकि रामायण में मधुर, अम्ल तथा लवण रसों क॑ भी उदाहरण मिलते हैं 
यथा मधु (मधुर रस) दही, तक्र आदि (अम्ल रस) एवं सौर्वचल लवण आदि लवण 
रस के उदाहरण हैं। 

ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के 
बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये ।” दूध, दही तथा घी की तो नहरें बह 
चलीं ।* षड़्रस भोजनों में से जिसको जो-जो पसन्द हो, उसके लिये वह सब 
प्रस्तुत कर दो ।” वानर सिंह हनुमान ने वहाँ सोने के बड़े-बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, 
सूआर, गेंडा, साही, हरिण तथा मयूरों के मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर 
रखे गये थे वे अभी खाये नहीं गये थे।* 

इस प्रकार उपरोक्त स्थलों पर तथा इन के अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों 
पर रामायण में भोजन के षड्रसों का उल्लेख किया गया है। यथा वसिष्ठाश्रम में, 
राजा दशरथ के महल में, राजा गुह के द्वारा सत्कार में आदि। 
भोजन के प्रकार 

आयुर्वेद में आहार-शास्त्र का प्रमटा स्थान है। आहार कई प्रकार का होता है 
यथा-भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, चोप्य + ताहार, मांसाहार आदि। 

जो दाँतों से चर्बण करके खाये गाय 4" भक्ष्य कहे जाते हैं जैसे- अन्न-रोटी 
आदि। जो अन्न समुद्रवभूत होते हैं वह भव्य टात हैं जैसे खीर। पेय उसे कहते 
हैं जो पिये जायें जैसे दूध आदि। लेह्य चटनोा जसे पदार्थ को तथा चोष्य चूसने की- 
वस्तु को कहते हैं। जब उपवासादि में फलों का सेवन किया जाता है तो वह 
फलाहार तथा मुर्गे, मयूर आदि के मांस को जब भोजन के रूप में खाया जाता है 
तो उसे मांसाहार कहा जाता है। 

रामायण में भोजन -के विविध प्रकारों का वर्णन किया गया है। 

- भक्ष्य (अन्न भोजन) पकवान्न भोजन 
.. भोज्य अन्न भोजन) पकवान्न भोजन 
पेय 
- लेहा 
« चोष्य 
6. फलाहार भोजन 
7. मांसाहार भोजन 
अन्न भोजन 





फ़ के ७० ७ + 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री. / 87 


पक्‍्वान्न भोजन 

(भक्ष्य, भोज्य) अन्न” शब्दं 'अद्भक्षणे' धातु में 'क्त” प्रत्यय से सिद्ध होता 
है। जो भक्षण किया जाये उसे अन्न कहते हैं। अन्न का स्वभाव-रस, वीर्य, 
विपाक, प्रभाव, गुण एवं कर्म आदि के रूप में प्रकट होता है। 

वाल्मीकि रामायण में अन्न भोजन एवं पकवान्न भोजन का उल्लेख इस 
प्रकार किया: गया है। 

राम से मिलने जाते हुए भरत का सत्कार महर्षि भारद्वाज ने विविध प्रकार के 
व्यंज्जनों से किया। भरत की सेना के लिये मैरेय, सुरा, ईख, स्वरस, शीतल जल 
उत्तम अन्न, नाना प्रकार के भक्ष्य-भोज्य, फलों के गूदे, मधु मिश्रित लावा, 
अजवायन मिलाकर बनाये गये वाराही कंद-आम आदि से बनाये गये व्यंज्जन, 
सुगन्ध युक्त रस वाली दालें, श्वेत रंग के भात, खीर आदि भक्ष्य पदार्थ प्रस्तुत किये ।४ 

इसी प्रकार का स्वागत एक बार महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र का किया था। 
उस समय उन्होंने ईख, मधु, लावा, मैरेय, भात, आसव, पानक, दाल, दूध, दही 
आदि द्वारा उनकी सेना का सत्कार किया था।* 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में अन्न-भोजन, पकवान्न भोजन (भक्ष्य, 
भोज्य, लेह्य, चोष्य) आदि का वर्णन विस्तार से किया गया है। 
'फलाहार भोजन 

जब उत्तम फलों को ही आहार रूप में सेवन किया जाता है तो उसे फलाहार 
भोजन की संज्ञा दी जाती है। रामायण में ही फलाहार का उल्लेख कई जगह 
मिलता है यथा-निषाद राज गुह ने राम से मिलने जाते हुए भरत की सेवा में 
मिश्री, फलों के गूदे तथा मधु भेंट की। उन्होंने कहा- यह फल मूल आपकी सेवा 
में प्रस्तुत है इसे निषाद लोग स्वयं तोड़ कर लाये हैं। इनमें से कुछ फल तो हरे 
तथा ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इसके साथ तैयार किया गया फलों का गूदा 
भी है। इसके सिवाय नाना प्रकार के दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। आप इन सबको 
ग्रहण करें।” 

इस प्रकार रामायण में फलाहार का स्पष्ट निर्देश मिलता है। 
मांसाहार भोजन 

वाल्मीकि रामायण में मांसाहार का भी उल्लेख किया गया है। ऋषि भारद्वाज 
द्वारा सेवकों के लिये मांसाहार प्रस्तुत किया गया था। इसके अतिरिक्त रावण के 
महल में भी अनेक प्रकार के मांसाहारी पदार्थ थे। रामायण में प्राप्त मांसाहार के 
प्रसंग निम्नवतू हैं- 
. भरत की सेना में आये हुए निषाद आदि निम्न-वर्ग के लोगों की तृप्ति के लिये 
वहाँ मधु से भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटों पर तपे हुए पिठर 
(कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गों के स्वच्छ मांस भी ढेर के ढेर रख दिये 
गये थे।४ 
2. रावण की पानभूमि के वर्णन में कहा गया है-हनुमान जी ने राक्षस राज रावण 


88 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


के महल में वह पान भूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगों से सम्पन्न थी। उस 
मधुशाला में अलग-अलग मृगों, भैसों और सूअरों के मांस रखे गये थे, जिन्हें 
हनुमान जी ने देखा।” 
3. वानरसिंह हनुमान ने वहां सोने के बड़े-बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, 
साही, हरिण तथा मयूरों के मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे। 
वे अभी खाये नहीं गये थे।० 
4- कूकल नामक पक्षी, भाँति-भाँति के बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए मैंसे, 
एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़े-ये सब रांध-पकाकर रखे हुए थे। इनके साथ 
अनेक प्रकार की चटनियाँ थीं। भाँति-भाँति के पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान 
थे। जीभ की शिथिलता दूर करने के लिये खटाई और नमक के साथ भाँति-भाँति 
के राग और खाण्डव भी रखे गये थे।” 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण कालीन समाज में भी मांसाहार का प्रचलन 
था। सभी धर्म, जाति एवं वर्ग के लोग सभी प्रकार का भोजन करते थे। 
पेय भोजन 

जो भोजन पदार्थ पीकर तृप्ति प्रदान करते हैं वे पेय भोजन कहे जाते हैं। 
वाल्मीकि रामायण में पेय भोजन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। यथा महर्षि 
भारद्वाज ने भरत की सेना के लिये विविध पेय पदार्थ भी प्रस्तुत किये। उन्होंने 
मैरेय, सुरा, ईखस्वरस, शीतल जल, चोष्य, पुष्प-मधु आदि से युक्त प्रेय पदार्थ, 
सुगन्ध युक्त रस वाली दालें, स्वादिष्ट खीर, मधु, दही, सोंठ आदि पड़े दही से भरत 
की सेना का स्वागत किया ।# 

इसी प्रकार का स्वागत एक बार महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र का किया था। 
उस समय उन्होंने ईख, मधु, लावा, मैरेय श्रेष्ठ आसव, पानक, दाल, दूध, दही, घी, 
भाँति-भाँति के खाण्डव द्वारा उनकी सेना का सत्कार किया था।# 

उपरोक्त प्रसंग वाल्मीकि रामायण में पेय भोजन की उपलब्धि का प्रमाण 
प्रस्तुत करते हैं। इसके द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन समाज में 
आहार-न्नान वर्तमान समय॑ से कम महत्वपूर्ण नहीं था। 

वाल्मीकि रामायण में मुनि ने एक स्थान पर पथ्य की तरह दिखने वाले 
अपध्यों की ओर संकेत कर सभी को सतर्क किया है-'अपथ्य पथ्य सन्निभम्‌ 7४ 

रामायण में स्नान करने के लिये कषाय रस वाले द्रव्यों का चूर्ण प्रशस्त माना 
“गया है। इसका. क्वांथ या कल्क कर उस जल का प्रयोग करना चाहिये। इसमें 
निम्ब आँवले आदि का कलल्‍्क उपयोगी होता है। अन्यत्र मुख-प्रक्षालन के लिये 
चंदन का जल प्रस्तुत किया गया है। 

पथ्यों के विभिन्‍न प्रकारों का उल्लेख करते हुए रामायण में लिखा है-तिन्‍नी 
चावल का सूखा भात अर्थात्‌ चिवड़ा अर्थात्‌ शाली चावल तथा भद्गक धान्य 
(चना-मूँग) आदि तथा विशेष यव, लावा और लाजा भी पथ्य हैं। 

मुनि अगस्त्य ने भी श्री राम को भोजन के लिये अनेक गुणों से युक्त कन्द, 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ 89 


मूल, जरावस्था निवारण करने वाली दिव्य-औषधियाँ, पवित्र भात आदि अर्पित 
किये। श्री राम अमृत तुल्य स्वादिष्ट भोजन कर परम तृप्त हुए और प्रसन्‍न हुए।/ 

रामायण में जहाँ पथ्य पर विशद विवेचन किया गया है वहाँ कुपथ्य पर भी 
पर्याप्त सामग्री उपलब्ध होती है। कुछ खाद्य ऐसे हैं जो पथ्य सा दिखाई देते हुए 
भी वास्तव में अपथ्य होते हैं। अतः ऐसे खाद्यों से बचना चाहिये। मुनि ने कहा 
है कि अपथ्य सेवन करने वाला व्यक्ति यदि यह सोचे कि अपध्य लेने के बाद भी 
वह स्वस्थ रहेगा तो यह एक विडम्बना है जिस प्रकार निम्ब से मधु नहीं श्रवता 
नहि निम्बात्‌ श्वेत क्षौद्र.............-.---- ।* कवि ने यह भी स्पष्ट किया है कि दूर 
से पलाश के वृक्ष पर लगे सुंदर फूलों को देखकर ही कोई मनुष्य यह समझ ले कि 
इसके फल भी उतने ही मनोहर तथा सुस्वादु होंगे और इसी आशा में वह आम 
के बगीचों को काटकर अपने यहाँ पलाश के पौधे लगाता है, उसे सींचता है तो 
वह फल लगने के समय पछताता है।” इस प्रकार प्रज्ञापाध रोग के कारण बन 
सकते हैं, यह स्पष्ट है। कवि ने अमृत और कॉँजी के अन्तर को भी परिलक्षित 
किया है। कवि ने खाद्यों के प्रसंग में यह बताया है कि मक्खी घी में पीकर कोई 
उसे पचा नहीं सकता “आज्यं यथा मशिकया जीवर्णम्‌।7? 

यह सब होते हुए भी कवि ने यह संकेत किया है कि मरने की इच्छा करने 
वाले रोगी या मृत्यु के निकट पहुँचे रोगी को पथ्य रुचता नहीं है या वह अपथ्य 
की ओर अधिक आकर्षित होता है।* जैसे मरते समय मनुष्य स्वास्थ्य विरोधी 
पदार्थों को सेवन करने लगता है प्रायः सभी मरणासन्‍्न मनुष्यों को पथ्य नहीं रुचता। 
कवि ने जहाँ राक्षसों द्वारा किये जाने वाले युद्ध में सुरा या मदिरापान को पथ्य माना 
है वहाँ खुशियों के लिये तथा धार्मिक कृत्यों के समय इसी को अपशथ्य बताया है। 

उत्तम विहार का उल्लेख करते हुए कवि ने जल, वायु, देश, काल को 
प्राथमिकता दी है। दिव्य, शीतल और स्वास्थ्यकर हवा प्राण देने वाली, थकान को 
कम करने वाली होती है। इसी प्रकार जल भी दिव्य तथा शीतल व स्वास्थ्यकर 
होता है। इसका उल्लेख भी रामायण में प्राप्त होता है। मुख्यतः मलय तथा दुर्दुर 
पर्वत की हवा स्वास्थ्यकर होती है। ऐसा कवि का मत है।# 

इस प्रकार आहार को जहाँ रामायण में महत्ता दी है, वहाँ विहार को भी इतनी 
ही प्रमुखता देने का प्रयत्न किया है। सौम्य! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना 
चाहिये जो शिथिल न करे और वही अन्न भोजन करना चाहिये जो पेट में जाकर पच 
जाये, रोग न पैदा करे। आँखों में सुई चुभोना भी उतना ही अपथ्य विहार है जितना 
जीभ से तलवार की धार को चाटना। 

रामायण में लिखा है मरुभूमि का जीवन सदा स्वस्थकर है-दूसरे शब्दों में 
मरुभूमि सदा पथ्य हैं।” यह मरुभूमिं पशुओं के लिये हितकारी होगी। यहाँ रोगी कम 
होंगे। यह भूमि फल-मूल रसों से सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि स्नेह अधिक सुलभ 
होंगे। दूध की भी बहुतायत होगी। सुगन्‍्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकार की 
औषधियाँ होंगी। 

90 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सबसे स्पष्ट तथा उत्तम अपथ्य विहार तथा आहार भरत ने उस समय बताये जब 
माता कौशल्या ने उनको व्यड्ग्य में कुछ शब्द कहे थे- 
।. पापी की बुद्धि कभी गुरु से सीखे, शास्त्रों में बताये गये मार्ग का अनुसरण करने 
वाली न हो ।” 
2. सूर्य की ओर मल-मूत्र त्याग करे और सोई हुई गौओं को लात मारे।* 
3. सेवक से भारी काम कराकर अल्प वेतन देने के पाप का भागी हो।* 
4. समस्त प्राणियों का पुत्र की भाँति पालन करने वाला राजा से द्रोह करने वाले लोगों 
को पाप लगता है।* 
5. प्रजा से उसकी आय का छठा भाग लेकर भी उसकी रक्षा न करने वाले राजा को 
पाप लगता है।* 
6. यज्ञ में कष्ट सहने वाले ऋत्विजों को दक्षिणा देने की प्रतिज्ञा करके भी बाद में मना 
कर देता है।* 
7. युद्ध में सत्युरुषों के कर्म का पालन न करने वाले योद्धा का लगने वाला पाप 57 
8. गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को भुला दे।* 
9. राम के दर्शन से वंचित रह जाये।* 
0. मनुष्य खीर, खिचड़ी, बकरी के दूध को देवताओं, पितरों एवं भगवान को बिना 
निवेदन किये व्यर्थ खाय ।* 
7. गुरु जनों की निन्‍्दा, मित्र से प्रतिद्रोह |" 
2. विश्वास घात करे।* 
8. कृतघ्न, सत्पुरुषों द्वारा व्यक्त, निर्लजा, सबके द्वेष का पात्र 
4. सबके साथ रहकर अकेले मिष्ठान्न भोजन कर पाप का भागी होना ४ 
5. सन्‍्तानहीन अवस्था में ही मर जाये तथा अनुकूल पति प्राप्त न हो ।* 
6. सम्पूर्ण आयु का उपभोग करे बिना ही मरे ।* 
7. राजा, स्त्री, बालक, वृद्ध के वध करने के पाप का भागी” 
8. लाक्षा, मधु, मांस, लौह और विष बेचकर धन कमाये।* 
9. युद्ध में पीठ दिखाकर भागना ।* 
20. मैले, कुचैले वस्त्र से अपने शरीर को ढककर, हाथ में खप्पर लेकर भीख माँगता 
फिरे फ० 
2. काम, क्रोध के वशीभूत होकर सदैव मद्यपान, स्त्री समागम और द्यूत-क्रीड़ा 
करे 0! 
22. मन कभी धर्म में न लगे और अधर्म का ही सेवन करे। अपात्र को धन दे।” 
23. सन्ध्याओं के समय सोना, आग लगना, मित्र-द्रोह, गुरु-पत्नी गामी का पाप।” 
24. देव गुरु तथा माता-पिता की सेवा कभी न करे।* 
25. सुकायों से भ्रष्ट हो जाये।* 
26. माता की सेवा छोड़कर अनर्थ की ओर बढ़े ।* 
27. दीनों की याचना को निष्फल करने का पाप।” 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 9 


28. चुगली तथा अपवित्र कर्मों की ओर अग्रसर रहे।* 
29. ऋतुस्नाता, पतिव्रता स्त्री को ठुकराकर पाप का भागी ।* 
$0. अन्नादि का दान न करने वाले विप्र को पाप लगे ७" 
3). पूजा में विघ्न डाले तथा छोटे बछड़े को दूध पीने से रोके 
32. पर स्त्री गमन का पाप 
33. पानी गन्दा करने, दूसरों को विष देने के पाप।* 
34. पानी होते हुए भी प्यासे को उससे वंचित रखे ।* 
35. दूसरों को लड़ाने वाले कलह-प्रिय व्यक्ति को लगने वाला पाप।* 
उपरोक्त सभी अपथ्य विहार हैं जिनका मनुष्य को प्रयत्न-पूर्वक त्याग करना 
चाहिये। 
इनके अतिरिक्त रामायण में कुछ खाद्यों के नाम भी प्राप्त होते हैं-इन्हें इस 
प्रकार सूचीबद्ध किया जा सकता है। 


. दूध। 3. शीतल जल। 25. गाढ़ी स्वादिष्ट खीर। 
2. दही। 4. पायस। 26. केशर मिश्रित तक्र। 
$. घृत। 75. मधु मिश्रित लावा।_ 27. शक्कर मिश्रित तक्र। 
4. अमृत । 6. स्वादिष्ट अन्न। 28. मृग, मोर, मुर्गे का मांस। 
5. अमृत रस। १7. दाल 29. जौ। 

6. विष। 8. अजवायन मिश्रित वाराही कन्द। 

'. मिश्री । 9. शर्वत। 30. गेहूँ। 

8. फलों के गूदे। 20. भात। 3. चना। 

9. मधु। 2. वारुणी। 32. तेल। 

0. शर्करा। 22. शुभ अन्न। $3. मदिरा। 

]7. सुरा। 23. फल रस में पकाये व्यंजन। 

2. ईख का रस। 24. सुगन्ध युक्त दाल। 34. आसव। 


इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में सभी प्रकार के भोजन 
आहार-विहार-पथ्य एवं अपथ्य का विस्तार से वर्णन किया गया है। 
भोजनोत्तर कर्म 

अष्टांग संग्रहकार के अनुसार “भोजन के पश्चातू हाथ में लगे अन्न कणों को 
जल के द्वारा अन्य हाथ से साफ करें। दाँत में लगे अन्न को धीरे-धीरे दनन्‍्त-शोधन 
यन्त्र से साफ करके मुख के भीतर आहार जन्य चिपचिपाहट, गन्ध तथा स्नेह को 
जल का आचमन करके दूर करें। अंगुलियों के अग्रभाग से गिरने वाले जल से नेत्रों 
का सिंचन करें। तम्बाकू आदि से मुख को स्वच्छ करें। ऊर्ध्व कफ के वेग को कम 
करने के लिये धूम्रपान का सेवन करें। सौ कदम जाकर वाम पार्श्व (बायीं करवट) 
में सो जायें। अधिक मात्रा में द्रव पदार्थों को खाकर शैया पर बहुत देर तक नहीं 
सोना चाहिये ॥४ 

भोजन करके यात्रा (वाहन से), प्लवन (तैरना, उछलना, कूदना), वाहन (घोड़ा 


92 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


आदि से चढ़कर जाना), अग्नि और धूप का सेवन नहीं करना चाहिये ।' 

वाल्मीकि रामायण में भोजनोत्तर कर्म का उल्लेख प्राप्त नहीं ,होता है। 
माध्यनिन्दनीय कर्म 

अष्टांग संग्रह के अनुसार जिन कथाओं में प्रधानतः धर्म की चर्चा हो, मध्य 
में अर्थ की चर्चा हो एवं उसी के साथ कुछ काम सम्बन्धी चर्चा हो, ऐसी त्रिगुण 
कथाओं के द्वारा दिन का मध्य भाग इष्ट (प्रिय जनों), शिष्ट (सभ्य) जनों तथा 
सहायकों के साथ व्यतीत करना चाहिये। इससे इतर माध्यनिन्दनीय कर्म है।४ 

रामायण में इनका उल्लेख नहीं मिलता है। 
सन्ध्याकाल में निषिद्ध कर्म 

सन्ध्या काल में निषिद्ध कर्मों का उल्लेख रामाय॑ण में प्राप्त नहीं होता है। 
रात्रि भोजन 

रात्रि-भोजन के विषय में भाव मिश्र ने कहा है कि रात्रि के प्रथम प्रहर में कुछ 
कम भोजन लेना चाहिये तथा दुर्जर (दुष्पाच्य) भोजन नहीं होना चाहिये ।” 

वाल्मीकि रामायण में रात्रि-भोजन का उल्लेख नहीं मिलता है। 
शैय्या 

अष्टांग संग्रह के अनुसार, “शैय्या उपप्रधान (तकिया मसनद) से युक्त, 
स्वास्तीर्ण-विस्तीर्ण (पर्याप्त लम्बी चौड़ी), अविषम (समतल) तथा सुखदायक होनी 
चाहिये ।”४ 
शयनासन (पलंग) 

महर्षि वाग्भट्‌ ने शयनासंन के विषय में बताया है कि शयनासन जानुतुल्य 
(जानु भर) ऊँचा, मृदु एवं शुभ (कल्याणकारी) होना चाहिये ।” 

वाल्मीकि रामायण में शैया एवं शयनासन का उल्लेख विस्तार से मिलता है। 
इसमें जहाँ वनवासी राम की कुशों की शय्या का उल्लेख है वहीं राजा दशरथ के 
महल तथा रावण के महलों में रखे विविध शयनासनों का भी उल्लेख मिलता है- 

निषाद राज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मंत्रियों सहित भरत ने इह्लुदी वृक्ष 
की जड़ के पास आकर श्री रामचन्द्र जी की शय्या का निरीक्षण किया ।” फिर 
उन्होंने समस्त माताओं से कहा- “यहीं महात्मा श्री राम ने भूमि पर शयन करके 
रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुश समूह है, जो अज्ों से विमर्दित हुआ था ।” 

जो पुरुष सिंह श्री राम मुलायम मृग चर्म की विशेष चादर से ढके हुए तथा 
अच्छे-अच्छे बिछौनों के समूह से सजे हुए पलंग पर सदा सोते आये हैं, वे इस 
समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे ।* 

यही मेरे बड़े भाई की शब्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर 
वेदी पर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अंगों से कुचला गया सारा तृण 
अभी तक पड़ा है।* 

कुशों की शय्या के अतिरिक्त रामायण में सुन्दर मणियुक्त पलंगों का भी 
वर्णन है- 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ ॥93 


रावण की उस हवेली में बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे तथा स्वयं राक्षसराज 
उसमें निवास करता था।" 

रावण के अन्तःपुर में इधर-उधर दृष्टिपात करते हुए हनुमान जी ने एक दिव्य 
एवं श्रेष्ठ वेदी देखी, जिस पर पलंग बिछाया जाता था ।” वहाँ वैदूर्यमणि (नीलम) 
के बने हुए श्रेष्ठ आसन (पलंग) बिछे हुए थे, जिनकी पाटी, पाये आदि अंग 
हाथी-दाँत और सुवर्ण से जटित होने के कारण चितकबरे दिखाई देते थे। उन 
महामूल्यवान पलंगों पर बहुमूल्य बिछौने बिछाये गये थे। उन सबके कारण उस 
वेदी की बड़ी शोभा हो रही थी ।* उस पलंग के एक भाग में उन्होंने चन्द्रमा के 
समान एक श्वेत छत्र देखा, जो दिव्य मालाओं से सुशोभित था ।* वह उत्तम पलंग 
सुवर्ण से जटित होने के कारण अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था। हनुमान 
जी ने उसे अशोक पुष्पों की मालाओं से अलंकृत देखा ।'” उसके चारों ओर खड़ी 
हुई बहुत-सी स्त्रियाँ हाथों में चँवर लिये उस पर हवा कर रही थीं। वह पलंग 
अनेक प्रकार की गन्धों से सेवित तथा उतम धूप से सुवासित था।'” उस पर 
उत्तमोत्तम बिछौने बिछे हुए थे। उसमें भेड़ की खाल मढ़ी हुई थी तथा वह सब ओर 
से उतम फूलों की मालाओं से सुशोभित था ॥* उस प्रकाशमान पलंग पर महाकपि 
हनुमान जी ने वीर राक्षसराज रावण को सोते देखा।"* 

इस प्रकार रामायण में प्राप्त उपरोक्त प्रसंगों के आधार पर यह स्पष्ट हो 
जाता है कि रामायण में शय्या एवं शयनासन के विविध रूपों पर दृष्टिपात किया 
गया है। 
रात्रिचर्या 

वाग्भट्‌ के अनुसार सायंकाल लघु, हितकारी, भोजन करके, मन का समाधान, 
स्मरण और पवित्र होकर, शास्ता का स्मरण करके अपनी शय्या पर शयन करना 
चाहिये। सोने का स्थान पवित्र हो। अकीर्ण (भीड़ वाला) नहीं होना चाहिये। पास 
में दो तीन आप्त परिचारक होने चाहिये। 

सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिये। गुरु की तरफ 
पाँव नहीं होना चाहिये। रात्रि के पूर्व भाग में तथा अपर (अंतिम) भाग में धर्म का 
चिंतन करना चाहिये ॥* 

वाल्मीकि रामायण में रात्रिचर्या का विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
आसव 

अष्टांग संग्रहकार वाग्भट के अनुसार आसव के प्रकार एवं गुण-दोष निम्नलिखित 
हैं-- 
. मधुकृतमघं 

'छेदी (कफादि विश्लेषी) एवं तीक्ष्ण होता है। प्रमेठ, पीनस तथा कास को नष्ट 
करता है। 
2. सुरासव 

(जल की जगह सुरा में औषध डालकर बनाया गया) तीक्ष्ण, मद करने वाला, 


94 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


रस में मधुर, तीक्ष्ण तथा वातघ्न है। 
3. मैरेयासव 

(आसव एवं सुरा के बन जाने पर इन दोनों का एक पात्र में संधान कर 
कोद्रव धान्य के संयोग से तैयार) रस में मधुर, वृष्य, सर, सन्तर्पण कारक और गुरु 
होता है। ह 
4. धय (५४००० 0799 #ए४८७5७) , के पुष्प से बना मैरेय 

यह जीर्ण होने पर रुक्ष, रुचिकारक तथा दीपन होता है। 
5. द्राक्षासव (दाख-छोटी जाति के अंगूर ५४४5 शाग्रांशि8 से बना) 

यह मध्यासव के समान किन्तु अत्यन्त अग्नि दीपक होता है। 
6. मद्धीकासव 

(मुनक्का से बना आसव) एवं इक्षुरसासव माद्दीक के समान गुण वाला होता 
है ॥% 

वाल्मीकि रामायण में लिखा है, “श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार 
के बहुमूल्य भक्ष्य पदार्थ प्रस्तुत कर दिये /'* मैनाक पर्वत के वर्णन में लिखा है, 
मधुपान के स्थान में रखे हुए सुवर्णमय आसव पात्र, बहुमूल्य बर्तन, सोने के 
कलश, भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थ आदि .......... ० रावण के महल की भूमि के 
वर्णन में लिखा है, 'उसमें मधु और आसव के गिरने से वहाँ की भूमि गीली हो रही 
थी'* सुन्दरियों की श्वास वायु की सुगन्ध शर्करासव के समान बताते हुए कहा 
है-“उन सुंदरियों के मुख से निकली हुई स्वभाव से ही सुगन्धित श्वासवायु 
शर्करानिर्मित आसव की मनोहर गन्ध से युक्त हो और भी सुखद बनकर उस 
समय रावण की सेवा करती थी।”/७ 

रावण की पानभूमि में भी अनेक प्रकार के आसव विद्यमान थे। इनके 
वर्गीकरण इस प्रकार थे-शर्करासव, माध्वीकासव, पुष्पासव एवं फलासव आदि ९९ 
शर्करासव शवकर से तैयार की जाती थी तथा इसी प्रकार माध्वीकासव मधु से, 
पुष्पासव पुष्पों से तथा फलासव फलों से तैयार की जाती थी। ये सभी कृत्रिम 
सुराएँ होती थीं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक सुराएँ भी होती थीं। वे दिव्य सुरा. याः 
सुरा के नाम से विख्यात थीं। 

उपरोक्त वर्णन के आधार पर आसव आदि की रामायण कालीन. समांज में 
प्राप्ति एवं उसका उपयोग स्पष्ट ज्ञात हो जाता है तथा यह भी सिद्ध हो जाता है 
कि आसवादि का प्रचलन राम इत्यादि सात्विक प्रवृत्ति प्रधान लोगों में कम तथा 
रावणादि तामसिक प्रवृत्ति के लोगों में अधिक था। 
मदिरापान 

अष्टांग संग्रह के अनुसार सभी प्रकार के मद्य (मदिरा) दीपन (अग्निदीप्तकारक), 
रोचन (भोजन में अभिलाषा उत्पन्न करने वाला), तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तुष्टि, पुष्टि, 
किंचित्‌ मधुर, किंचित तिक्‍्त, कटु, रस एवं विपाक में अम्ल, सर, किंचित्‌ कषाय 
रस वाला, स्वर, आरोग्य, प्रतिभा, वर्ण (कान्ति) को करने वाला और लघु है। 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री. / 9 


जिनको निद्रा नहीं आती है या जिनको निद्रा अधिक आती है, उनके लिये पथ्य, 
पित्त एवं रक्त को दूषित करने वाला है। कृश एवं स्थूल के लिये हित कारक, रुक्ष 
(स्नेह रहित), सूक्ष्म, स्रोतों का विशोधक तथा वातघ्न एवं श्लेष्मघ्न है। युक्ति 
पूर्वक (बल, काल, सात्म्य, प्रकृति, वय, मात्रा आदि विचार कर) किया मद्य-पान 
अमृत के समान है। अन्यथा अयुक्तिपूर्वक मद्य-पान विष तुल्य है।”' 
नव एवं जीर्ण मद्य के गुण 

नव मध्य गुरु एवं त्रिदोषकर होता है। जीर्ण मद्य लघु तथा वात श्लेष्मघ्न होता 
है ि क2 
मद्यपान का निषेध 

उष्ण उपचार (आहार-विहार) के साथ मद्य सेवन न करें। विरेचन करने के 
पश्चात्‌ तथा भूखे पेट मद्य न पियें, अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, अत्यन्त स्वच्छ, 
अत्यन्त घन अथवा व्यापन्न (पात्र-देश-काल से दूषित) मद्य नहीं पीना चाहिये ॥” 

वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर मदिरापान का उल्लेख मिलता है 
यथा- 

राजा दशरथ कैकेई से कहते हैं-ओह! मैं तुझे अत्यन्त सती-साध्वी समझता 
था, परन्तु तू बड़ी दुष्टा निकली, ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखने में सुन्दर 
मदिरा को पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकार से यह समझ पाता है कि यह 
विष मिला हुआ था।४ 

मदिरा पान एक बुरा व्यसन है। इसके सेवन करने के बाद मनुष्य अपने 
सम्पूर्ण विवेक को भूल जाता है और आश्चर्य तो यह है कि इसके बाद रुग्ण वह 
अपने आपको स्वस्थतर महसूस करने लगता है। वह शारीरिक रूप से अधिक 
शक्तिशाली तथा मानसिक रूप में चिंता मुक्त हो जाता है। इसीलिये उसकी 
बार-बार पीने की आदत हो जाती है। “मधुपान प्रमत्त कहकर उसके उन्मत्त होने 
की ओर संकेत किया है। इसीलिये बाली ने कहा है, “मेरे मद्यपान कर मतवाला 
होने को तुम युद्ध स्थल में उत्साह वृद्धि के लिये वीरों द्वारा किया जाने वाला 
औषधि विशेष का पान समझो 785 

मदिरापान, काम तथा क्रोध का परस्पर सम्बन्ध है। रावण तो इन सभी दुर्गुणों 
से आक्रान्त था ही। हनुमान जी ने उसे अपने महल में स्फटिक मणि की वेदी पर 
नीलम के बने पलंगों पर जिनके पाये आदि हाथी दाँत के थे तथा जो स्वर्ण जटित 
थे, पर सोते देखा। वह अशोक पुष्पों की माला को धारण किये हुए सो रहा था। 
चारों ओर स्त्रियाँ खड़ी चँवर कर रही थीं। भवन उतम धूपों से सुवासित था।!* 
रावण वस्त्राभूषणों से अलंकृत तो था ही, कानों में कुण्डल चमक रहे थे, आँखें 
लाल, ऐसा प्रतीत होता या कि वह रात्रि में स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करता मदिरा 
पीकर आराम कर रहा है॥!” 

उसके श्वास में आम, नाग केशर तथा मोलसिरी की सुगन्ध से अनुप्राणित 
मदिरा तथा अन्न-पान की सुगन्ध आ रही थी। उसके चरणों के आस-पास उसकी 


96 /आश्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


बहुत-सी पत्नियाँ सो रही थीं। ऐसा जान पड़ता था कि वे क्षीण कटि प्रदेश वाली 
राक्षसराज की स्त्रियाँ मद के प्रभाव तथा रतिक्रीड़ा से थक कर जहाँ तहाँ जो जिस 
अवस्था में थीं, वहीं सो गयी /'* कुछ अतृप्त वासना के कारण निद्रावस्था में वैसे 
ही प्रलाप करने लगीं-कुछ अपने वाद्य-यंत्रों को कसकर सो रही थीं। 

मदिरा के मद से मोहित हुई कोई कमल नयनी नारी “आडम्बर” नामक वाद्य 
को अपनी भुजाओं के आलिइ्नन से दबाकर प्रगाढ़ निद्रा में निमगन हो गयी। इस 
प्रकार हनुमान जी ने उस स्थान को सभी दृष्टियों से देखा। उपरोक्त प्रसंग से यह 
स्पष्ट है कि रति-क्रिया के बाद मनुष्य में कितनी थकावट हो जाती है। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में मदिरा पान तथा व्यसन की बुराइयों का 
विस्तार से उल्लेख किया गया है। 
मधुपान 

अष्टांग संग्रह के अनुसार मधु नेत्र के लिये हितकर छेदन-शील, प्यास, कफ, 
विष, हिक्का, रक्‍त-पित, कुष्ठ प्रमेढ, कूमि रोग, छर्दि रोग, श्वास, कास तथा 
अतिसार को नष्ट करता है। व्रण शोषक संधान रोपण, वात कारक, रुक्ष, रस में 
कषाय तथा मधुर होता है। मधु शर्करा मधु के समान गुण वाली होती है।॥* 
उष्ण-मधु 
उष्ण मधु मारक है, धूप आदि में पीड़ित मनुष्य को मधु मारक (विष) है, 
उष्ण देश में और उष्ण काल में तथा उष्ण पदार्थों के साथ मिला हुआ मधु मारक 
(विष) है। मधु विष के साथ मिला रहता है क्योंकि मधु विषैले पुष्पों से तथा 
विषैले भ्रमर और मधुमाक्षिका द्वारा बनता है इसलिये मधु विष युक्त होता है। 
वमन तथा निरुह वस्ति में उष्ण मधु का प्रयोग निषिद्ध नहीं है क्योंकि मधु बिना 
पचे ही तुरन्त शरीर से बाहर निकल जाता है।”* 
मधु के गुण तथा मात्रा 

गुरु, रुक्ष तथा कषाय एवं शीत होने के कारण अल्पमात्रा में मधु हितकर 
है काश 
मधु का उपयोग 

अनेक प्रकार के पुष्पों के रस से बने होने के कारण मधु परम योगवाही होता 
है। इसलिये वृष्य-योगों के साथ सेवन करने से उत्तम वाजीकर होता है।# 
मधु के भेद 
१. भ्रामर 2. पैत्तिक 5. क्षौद्र तथा 4. माक्षिक। भेद से चार प्रकार की मधु होती 
है। इसमें उत्तरोत्तर तथा पुराना मधु उत्तम होता है। इनमें क्षौद्र एवं माक्षिक नामक 
मधु का उपयोग करना चाहिये 0४ 


आचार्य सुश्रुत ने चार अन्य भेद बताये हैं- 
. छात्र बर्रे के छत्ते में पाया जाने वाला, रस में मधुर। 
2. आर्ध्य अर्ध्या नामक मक्षिका द्वारा सिंचित। 


3. औद्यालक बाँबी में रहने वाले और अल्प आकार के कपिल वर्ण के 
शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 97 


कीड़ों द्वारा च॑ंचित नथु। 
4. दाल इन्द्रनील के दल के आकार की सुंदर, सूक्ष्म, मक्षिकाओं द्वारा 
जो वृक्ष कोटर में निवास करती हैं, संचित मधु भी माने हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी मधुपान का यत्र-तत्र-विविध स्थलों पर उल्लेख 
किया गया है। यथा-मधु या मदिरा आदि के पीने से मनुष्य अधिक वेगवान हो 
जाता है तथा मूत्र-मधुरता का विसर्जन किया करता है।' राक्षस क्लान्त तथा 
थकित होकर मधु या मदिरा पिया करते थे जिससे वह स्वस्थ होकर क्रिया करते 
तथा निश्चिन्त होकर विचरते थे ॥5 

मधु पान के अन्य उद्धरण इस प्रकार हैं। 

वे रास्ते में आये हुए मृगों एवं हाथियों को पीछे लौटाते, जंगली मधु का पान 
करते और नाना प्रकार की नदियों को देखते हुए अपने राज्य का स्मरण नहीं 
करेंगे ॥# 

मधु मक्खियों के छत्तों का वर्णन करते हुए राम कहते हैं कि “लक्ष्मण! देखो, 
यहाँ के एक-एक वृक्ष में मधु मक्खियों द्वारा लगाये गये और पुष्ट किये गये मधु 
के छत्ते कैसे लटक रहे हैं। इन सबमें एक-एक द्रोण (लगभग 6 सेर) मधु भरा 
हुआ है ।””'” भरत की सेना का स्वागत करते समय स्त्रीलिक्ञ वृक्ष कहते हैं-“मधु 
का पान करने वाले लोगों! लो, यह मधु पान कर लो ।”* भरत की सेना में आये 
हुए निषाद आदि की तृप्ति के लिये मधु से भरी हुई बावड़िया प्रकट हो गयी 
थीं जि 

बाली ने तो मधु को औषधि बताया है तथा कहा है, “यदि तुम युद्ध के लिये 
निर्भय होकर खड़े हो तो यह न समझो कि यह बाली मधु पीकर मतवाला हो गया 
है। मेरे इस मद को तुम युद्धस्थल में उत्साह-वृद्धि के लिये वीरों द्वारा किया जाने 
वाला औषधि-विशेष का पान समझो ।”/४ 

उपरोक्त सभी उदाहरणों का अवलोकन करने के पश्चात्‌ यह स्पष्ट हो जाता 
है कि रामायण में मधु पान का अति विस्तार से वर्णन किया गया है इसके 
अतिरिक्त और भी अन्य स्थल देखे जा सकते हैं।”' 


ऋतुचर्या 
मानव स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद में ऋतु के अनुकूल आचार, व्यवहार को 
अधिक महत्व दिया गया. है। इसी को आयुर्वेद में ऋतुचर्या कहते हैं । महाकाव्य में 
भी परम्परा से ऋतु-वर्णन तथा तदनुसार आचार-व्यवहार को भी उतना ही महत्त्व 
मिला है। तात्पर्य यह है कि महाकाव्य में प्रसंगों का होना परम आवश्यक है और 
उसी के अन्तर्गत नायक-नायिका का आचरण या प्रतिक्रिया का वर्णन भी इतना 
ही महत्वपूर्ण तथा आवश्यक है। रामायण में भी इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ है। 
आयुर्वेद मतानुसार वर्ष के बारह महीने में सूर्य की गति के अनुसार- 


98 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उत्तरामण तथा दक्षिणायन, दो अयन माने गये हैं। ये ही आयुर्वेद में आदान काल 
तथा विसर्ग काल के नाम से पुकारे गयें हैं। इसी के अनुसार एक अयन में तीन 
ऋतुएँ हुआ करती हैं और वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं माघ-फागुन में शिशिर, 
चैत्र-वैशाख में बसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ में ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद में वर्षा, आश्विन-कार्तिक 
में शरद्‌, मार्ग-शीर्ष-पौष में हेमनत । इसी प्रकार पूर्व तीन आदान-प्रदान काल तथा 
अन्त के तीन विसर्ग काल कहलाते हैं। विसर्ग मनुष्यों का बल-दाता है तथा 
आदान काल में अग्निर्माँध आदि रहता है। 

रामायण में ऋतुचर्या का उल्लेख संवाद शैली में किया गया है। राम तथा 
लक्ष्मण के संवाद प्रमुख हैं। काव्य-परम्परा के अनुसार श्री राम का विरहनवर्णन 
इसमें मुख्य है। ऋतु के अनुसार आचार व व्यवहार का वर्णन या विरहों के कारण 
ऋतुओं के प्रति असहिष्णुता ही इसमें मुख्य है। अपने प्रिय भरत या सीता का 
स्मरण करते हुए श्री राम या लक्ष्मण ऋतुओं के प्रति मनोभावों को व्यक्त करते हैं। 

रामायण में प्राप्त पड़ऋतु वर्णन की समीक्षा निम्न प्रकार की जा रही है- 
हेमन्तऋतुचर्या 

चर्या शब्द चर्‌ धातु से बनता है, चर्‌ धातु का अर्थ है गति तथा भक्षण, 
इसलिये यहाँ चर्या शब्द से अंभिप्रायः गति अर्थ में विहार तथा भक्षण अर्थ में 
आहार है। अन्य लोग शास्त्र नियमानुकूल आचार को चर्या कहते हैं। ऋतु' 
काल विभाग को कहते हैं। अतः ऋतुओं में अथवा ऋतुओं की चर्या ऋतुचर्या 
कहीं जाती है।॥' ह 
हेमन्त ऋतु के लक्षण 

हेमन्त ऋतु में दिशाएँ धूम के समान धूम्र (मलिन) तथा रज (धूल) से मन्द 
हो जाती हैं। तुषार (कोहरे) से दिशाएँ एवं सूर्यमण्डल आविल (मलिन) हो जाता 
है। उत्तरी वायु शीतलता से रोम हर्ष उत्पन्न करती है। इस त्तु में लोध्न, प्रिंयड्ु, 
पुन्नाग तथा लवली के सुंदर फूल खिलते हैं। हाथी, अज, महिष, वाजि, वायस 
तथा सूकर मदोनन्‍्मत्त हो जाते हैं। नदियाँ हिम से आच्छन्न हो जाती हैं। मछलियाँ 
तथा जलचर पक्षी छिप जाते हैं। नदियों के जल में से वाष्प निकलता है। कूप का 
जल उंदष्ण हो जाता है।* 
हेमन्त काल का शरीर पर प्रभाव 

इस शीत ऋतु में शरीर की ऊष्मा शीतल वायु से आहत होकर शरीर के 
अन्दर प्रवेश करती है, जो जठर में पिण्डी भूत अग्नि को प्रबल कर देता है। प्रायः 
विसर्ग काल में बलवानों की जठराग्नि स्वभाव आदि में गुरु, आहार को पचाने में 
समर्थ होती है, उस समय अग्नि की युक्ति के लिये बृहण अन्न-पान का सेवन 
करना चाहिये। ऐसा न करने से ईंधन रूपी अन्नपान नहीं मिलने से जठराग्नि नष्ट 
हो जाती है अथवा अधिक उदीर्ण (तीक्ष्ण) होने के कारण शरीर के धातुओं को भी 
पचाने लगती है, धातुओं का क्षय होने पर तेज के सहचर वायु शीतकाल में शीत 
से विशेष कुपित हो जाता है।* ५ 


ध 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / /99 # 


हेमन्त ऋतु में आहार-विहार 
शीतकाल में स्निग्ध, मधुर, अम्ल, लवण रसों को सेवन करना चाहिये। 
विलेषय (बिलों में रहने वाले गोधा आदि), औदक (कछुआ-मछली) आदि, आनूप 
(महिष आदि), प्रसह (बाज, कौआ आदि) प्राणियों का भुना हुआ मांस, गुड़ एवं 
* पीठी से बनाई वस्तु, नूतन मद्य, उड़द, गन्ने का रस, दुग्ध से बनाई वस्तुएँ, वसा, 
तैल तथा नये चावलों का सेवन करना चाहिये व्यायाम, उद्धर्तन, अभ्यड्‌ग, स्वेदन, 
धूम्रपान, अंजन तथा आतप (धूप) का सेवन करना चाहिये ।* शरीर शुद्धि में उष्ण 
जल का प्रयोग करना चाहिये। गर्भगृह (भीतरी हिस्से) में रहना चाहिये। शय्या के 
पास अंगीठी रखकर कुथ तथा कम्बल से सुंदर शब्या पर कुंकुम (केशर) अथवा 
अगरु का घना लेप करके हल्के किन्तु उष्ण धूप से धूपित वस्त्रों को ओढ़कर समय 
से सो जाना चाहिये। पुष्ट अु् वाली स्त्री का संसर्ग शीतल वायु को निवारित 
(नष्ट) करता है # 
महर्षि चरक ने कुछ आहार-विहार का इस ऋतु में निषेध किया है। 
वाल्मीकि रामायण में भी इसकां वर्णन प्राप्त होता है। कवि के शब्दों में शरदू 
ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्त का प्रारम्भ हुआ। हेमन्त में श्री राम की चर्या का 
वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है-प्रातः श्री राम गोदावरी नदी के तट पर स्नान 
करने गये, हाथ में कलश लिये सीता व लक्ष्मण उनके साथ थे। इस प्रातः शब्द 
को स्पष्ट करते हुए आगे कवि ने लक्ष्मण के मुख से यह शब्द कहलवाये, “निश्चय 
ही भरत भी इसी बेला में स्नान के लिये उद्यत हो मंत्री एवं प्रजाजनों के साथ 
प्रतिदिन सरयू नदी के तट पर जाते होंगे। अत्यन्त सुख में पले हुए सुंकुमार भरत 
जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले प्रहर में कैसे सरयू नदी के जल में डुबकी 
लगाते होंगे।”” इसके बाद ही जब सूर्योदय हुआ तब तीनों ही निरुपाय व्यक्ति 
भगवान सूर्य का उपस्थान करके अन्य देवताओं की स्तुति करने लगे # लक्ष्मण ने 
फिर कहा-भैया इस ऋतु में अधिक ठंडक या पाले के कारण लोगों का शरीर 
रूखा हो जाता है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने योग्य भी नहीं रहता 
है और आग बड़ी प्रिय लगती है! इस ऋतु में प्रायः सभी जनपद के निवासियों 
की उन प्राप्ति-विषयक कामनाएँ, प्रचुर रूप में पूर्ण हो जाती हैं। गो रस की भी 
बहुतायत होती है। सूर्य देव इन दिनों यम सेवित दक्षिण दिशा का दृढ़तापूर्ण सेवन 
करने लगते हैं।'" कुहासों से फैलती हुई और ढकी हुई किरणों से उपलक्षित होने 
वाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमा के समान दिखाई देते हैं। पूर्वान्ड में तो इनका बल जान 
: ही नहीं पड़ता, मध्यान्ह में इसके स्पर्श से सुख अनुभव होता है।” मध्यान्ह काल 
में धूप का स्पर्श होने से हेमन्त के सुखमय दिन-अत्यन्त सुख से इधर-उधर घूमने 
विचरने योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होने के कारण सूर्य-देव सौभाग्यशाली जान 
पड़ते हैं। परन्तु सेवनः योग्य न होने के कारण छाँह तथा जल अंभागे प्रतीत होते 
. हैं।* आजकल के दिन ऐसे हैं कि सूर्य की किरणों का स्पर्श कोमल जान पड़ता 
है। कुहासे अधिक पड़ते हैं, सर्दी सबल होती हैं। कड़ाके का जाड़ा पड़ने लगता 


200 / वाल्मीकि रामायण तथा आंयुर्वेद 


है, साथ ही ठंडी हवा भी चलती है। चन्द्रमा का सौभग्य सूर्य देव में चला जाता 
है। चन्द्रमण्डल हिमकणों से ढककर धूमिल हो जाता है ।'* पूर्णिमा की चाँदनी रात 
तुहिन बिन्दुओं से मलिन दिखाई देती है। पछुआ पवन जिसका स्पर्श स्वभाव से 
ही शीतल है, हिम कणों से व्याप्त हो जाने के कारण दुगनी सर्दी लेकर वेग से बढ़ 
रही है।# ओस कण पड़ जाने से घास भीगी हुई सी जान पड़ती है। वह धूप का 
प्रवेश होने पर अद्भुत शोभा पा रही है।॥” 

इस ऋतु में रातें बड़ी होने लगती हैं। इसमें सर्दी बहुत बढ़ जाती है। खुले 
आकाश के नीचे कोई नहीं सोता | पौष की ये रातें हिमपात के कारण धूसर प्रतीत 
होती हैं /* हिमालय पर्वत तो स्वभाव से.ही घनीभूत हिम के खजाने से भरा-पूरा 
होता है परन्तु इस समय सूर्य-देव भी दक्षिणायन में चले जाने के कारण उससे दूर. 
हो गये हैं अतः अब अधिक हिम संचय से सम्पन्न होकर हिमवान गिरि स्पष्ट ही 
अपने नाम को सार्थक कर रहा है।॥* 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में हेमनत ऋतु चर्या का उल्लेख प्राप्त होता है। 
शिशिर ऋतुचर्या ग 

शिशिर ऋतु में मेघ, वायु तथा वर्षा के कारण शीत अधिक होता है .तथा 
आदान काल होने से रुक्षता उत्पन्न होती है, इसलिये इस ऋतु में हेमन्‍त ऋतु की 
चर्या का सेवन कुछ अधिक करना चाहिये (९ 

वाल्मीकि रामायण में शिशिर ऋतु चर्या का प्रथक्‌ से उल्लेख प्राप्त नहीं होता, 
है। हेमन्तकऋतुचर्या में ही इसका भी समावेश मान लेना चाहिये। हि 
बसन्त ऋतुचर्या ४ 

वसन्त ऋतु का लक्षण बताते हुए वाग्भट ने कहा है-वसन्त ऋतु में दक्षिण 
दिशा की वायु बहती है, सूर्य की किरणें लोहित (लाल) होती हैं, वृक्षों में नव प्रवाल 
तथा नई त्वचा आ जाते हैं। ककुभ (दिशा) अमला (निर्मल) हो जाती हैं। किशुक, 
अशोक तथा आम्र से वन पंक्तियाँ शोभित होती हैं अर्थात्‌ उनमें पुष्प आने लगते 
हैं और दिशाएँ कोयल तथा भ्रमरों के आलापों के मधुर कोलाहल से व्याप्त हो जाते 
हैं, इस ऋतु में शिशिर ऋतु में संचित श्लेष्मा सूर्य की किरणों से पिघलकर अग्नि 
को नष्ट करता हुआ बहुत से रोगों को उत्पन्न कर देता है।! 
वसनन्‍्त ऋतु में आहार-विहार 

अतः इस ऋतु में तीक्ष्ण वमन, तीक्ष्ण धूम्रपान, तीक्षण-गण्डूष तथा तीक्ष्ण नस्य 
का प्रयोग करना चाहिये। व्यायाम, उद्धर्तन, क्षौद्र, यव, गोधूम तथा जांगल 
पशु-पक्षियों का मांस सेवन करना चाहिये। सुहंदजनों की संगति, उद्यान-गोष्ठी 
तथा मनोहर युवतियों (रति-क्रीड़ा) का सेवन करना चाहिये। स्नान करके अलंकारों 
से शोभित होकर स्त्रग्वी फूलों की माला को धारण करना चाहिये ।” चन्दन, एवं 
अगरु का लेप शरीर पर करें। सहकार (आम) एवं उत्पल के चित्रों से अंकित 
विचित्र पात्रों में निर्णय आसव अरिष्ट, सीधु (इक्षुरस से बना मध्य), मादवीक 
(द्राक्षासुरा) तथा माधव (महुआ की सुरा) का पान करें। पकाया हुआ जल या मोधा 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 20 


एवं शुण्डी का पका पानी या साराम्भ से परिपक्व जल या मधु मिश्रित जल पीवें। 
अपध्य 

इस ऋतु में गुरु एवं शीतल पदार्थ, दिवा-स्वप्न, स्निग्ध पदार्थ और मधुर तथा 
अम्ल रस वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये।” 

वाल्मीकि ने वसन्त ऋतु का उल्लेख करते हुए ऋतु श्रृंगार का वर्णन तो किया 
ही है साथ ही पक्षियों के कलरव, कूजन तथा रत्िक्रीड़ा के पक्ष को भी स्पष्ट किया 
है। श्री राम इस ऋतु में कामोद्दीपक वातावरण को देखकर अनंग वेदना को 
उद्दीप्त अनुभव करने लगे /* वसन्त ऋतु में चलने वाला शीतल तथा सुगन्धित 
मलयानिल विरही-श्री राम को कामाग्नि में जला डालता रहा है।” इस सम्पूर्ण 
प्रसंग में चैन्नमास (पुष्प-मास) का वर्णन आया है। यह वसन्‍्त अपने सभी उपायों 
से श्री राम की कामाग्नि को तो उद्दीप्त करता ही है साथ ही श्री राम को यह 
भी शंका है कि जहाँ सीता है वहाँ भी कहीं वसन्‍्त गया हो तो उसकी क्या हालत 
होगी क्योंकि वह वहाँ परतन्त्र है।* वह सभी वातावरण जो कि श्री राम को सीता 
की उपस्थिति में अच्छा लगता था, वही आज कटु लग रहा है। वायु का प्रवहण, 
चन्दनों, कमलों, अन्य पुष्पों, वृक्षों, लताओं तथा पहाड़ी आदि के बीच में होकर 
चलता हुआ श्री राम के लिये आनन्ददायक नहीं है, कामोत्तेजक है जो कि सीता 
की अनुपस्थिति में कटु लगता है। यहाँ तक कि सीता के वियोग में श्री राम अपने 
प्राण त्याग करने तक के लिये तत्पर हो जाते हैं। यह सब आचरण श्री राम के 
लिये इस ऋतु में होना आयुर्वेद मत से स्वाभाविक था। 
ग्रीष्मऋतु चर्या 

इस ऋतु में सूर्य तेज किरणों वाला, अतसी (अलसी) के पुष्प के समान तथा 
दावाग्नि (वनाग्नि) की भाँति चमकता है। दिशाएँ और भूमि जलती है। नैऋत 
(दक्षिण-पश्चिम) कोण से बहने वाली वायु सुखदायक होती है। उष्ण वायु, धूप एवं 
स्वेद के कारण प्राणी ज्वर की भाँति तप्त हो जाता है। ताप से पीड़ित तुंग मातुंग 
(हाथी) तथा महिषों द्वारा नदियाँ मैली कर दी जाती हैं। अंगारों के समान सूर्य की 
किरणों से नदियों का जल सुखा दिया जाता है। इसलिये नदियों के किनारे विस्तृत 
हो जाते हैं। वृक्ष गर्मी के कारण छायाहीन हो जाते हैं, इनके पते जीर्ण होकर गिर 
जाते हैं, उनकी छाल सूख जाती है एवं उन पर फैली लतायें भी सूख जाती हैं।”? 
ग्रीष्म ऋतु के आहार-विहार 

क्योंकि इस ऋतु में सूर्य जगत्‌ के स्नेहों का आदान (ग्रहण) अधिक मात्रा में 
कर लेता है, इसलिये व्यायाम, आतप (धूप) कठु, अम्ल, लवण रस वाले एवं उष्ण 
पदार्थों का सेवन त्याग देना चाहिये। मद्य का सेवन नहीं करना चाहिये। यदि पीना 
भी हो तो थोड़ी मात्रा में पीवें अथवा उसमें बहुत सा जल मिलाकर सेवन करें। 
अन्यथा वह मद्य शोष (कुशता), शैथिल्य, दाह एवं मोह को पैदा कर देता है। 
मिट्टी के नूतन भाण्डों में रखे गये, हदय को शक्ति देने वाले एवं सुगन्धित शर्करा 
मिश्रित शीतल पानकं एवं मन्‍्थ (सतू) का घोल पियें। मधुर-शीत-द्रव (पतला 


202 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अन्न), जाइल पशु-पक्षी, हरिण का मांस, शालि चावल, दुग्ध, घृत, द्राक्षा, नारियल 
का जल तथा शर्करा का सेवन करना चाहिये। ताड़ के पंखों की हवा, कमल एवं 
उत्पल की माला तथा मृणाल के वलय पहनी हुई कान्ता तथा शरीर पर चन्दन का 
लेप किये हुए तन्‍्वी का सेवन करना चाहिये। दिन में यंत्र के द्वारा पानी जहाँ पड़ 
रहा हो, ऐसे धारा गृह में सोना चाहिये। सर (तालाब), वापी, सरित्‌ (नदी), शीतल 
जंगल तथा सुगन्धित हल्के वस्त्रों का सेवन करना चाहिये। रात्रि में आकाश के 
नीचे सुगन्धित पुष्पों की शय्या पर सोना चाहिये। कपूर तथा चन्दन के घोल से 
शरीर को आद्र करके कभी-कभी मैथुन करना चाहिये। प्रतिदिन नहीं ।”* 

वाल्मीकि रामायण में भी ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया गया है। श्री राम पंपा 
सरोवर का निरूपण करत हुए लक्ष्मण से कहते हैं-सुमित्रा नन्दन! यह पंपा कैसी 
शोभा पा रही है ? इसका जल वैदूर्यमणि के समान स्वच्छ एवं श्याम है। इसमें 
बहुत से पद्म और उत्पल खिले हुए हैं। तट पर उत्तेपन्न हुए नाना प्रकार के वृक्षों 
की शोभा और भी बढ़ गयी है /” तालाब में उत्पल, कंमल, मत्स्यों तथा पास के 
वन में नाना प्रकार के ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का उल्लेख करते हुए कवि ने उसके सौन्दर्य 
का वर्णन किया है। श्री राम ने पुनः कहा- “यद्यपि मैं शोक से पीड़ित हूँ तो भी 
मुझे यह पम्पा बड़ी सुहावनी लग रही है। इसके निकटवर्ती वन बड़े विचित्र दिखाई 
देते हैं। यह नाना प्रकार के फूलों से व्याप्त हैं। इसका जल बहुत शीतल है और 
यह बहुत सुखदायिनी प्रतीत होती है।” नई-नई घासों से ढ़का हुआ यह स्थान 
अपनी नीली-पीली आभा के कारण अधिक शोभा पा रहा है। यहाँ वृक्षों के नाना 
प्रकार के पुष्प सब ओर बिखरे हुए हैं। इससे ऐसा जान पड़ता है मानो यहाँ बहुत 
से गलीचे बिछा दिये गये हैं!” सुमित्रा नन्दन ! इस समय मन्द-मन्द सुखदायिनी 
हवा चल रही है, जिससे कामना का उद्दीपन हो रहा है। यह चैत्र का महीना है। 
वृक्षों में फूल और फल लग गये हैं और सब ओर मनोहर सुगन्ध छा रही है।” 
मलय चन्दन का स्पर्श कर बहने वाली यह शीतल वायु शरीर से छू जाने पर 
कितनी सुखद जान पड़ती है। यह थकावट दूर करती हुई तथा सुगन्ध फैला रही है।* 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में ग्रीष्म ऋतु का विस्तार से वर्णन किया गया है। 
वर्षा ऋतु चर्या हि 

वर्षाऋतु का लक्षण बताते हुए अष्टांग हृदयकार ने कहा है-वर्षा ऋतु में 
वारुण वायु (मानसून) बहने लगती है, जिससे सब प्रकार का शस्य उत्पन्न होता 
है, आकाश तोड़े हुए इन्द्रनील नामक रत्न के समान नीले बादलों के समूह से 
आच्छादित एवं मलिन होता है, वर्षा के नये जल के समूह से दीर्धिका में सीढ़ियों 
की पंक्ति डूब जाती हैं, वर्षा के पानी के अत्यधिक आघात से कमल खिल जाते 
हैं, नदियाँ समुद्र के सदूश दिखाई पड़ती हैं। जीमूत (बादल) मन्द-मन्द गर्जने लगते 
हैं। इन्द्रगोप (वीर बहूटी कृमि), इन्द्र धनुष और विद्युत चमकने लगती है;। भूमि 
पर चारों ओर श्यामल तृण (हरी घास) शिलहिन (छत्रक) तथा कुटज के फूल 
खिलते हैं।* 

शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 203 


वर्षाऋतु के आहार-विहार 

गत आदान काल के प्रभाव से शरीर दुर्बल एवं जठराग्नि मंद होती है पुनः वृष्टि 
हो जाने से भूमि से वाष्प निकलने से पिये गये जल का अम्ल विपाक होने से तथा दूषित 
वातादि के प्रभाव से जठराग्नि और मन्द हो जाती है। वमन और विरेचन से शरीर का 
संशोधन करके बस्ति कर्म का सेवन करें। पुराने शालि चावल, गेहूँ एवं यव को कृतयूष 
के साथ लेना चाहिये। निर्गदं (दोष रहित) मदिरा, अरिष्ट, मद्वीक, या थोड़ा पानी पियें। 
दिव्य (आकाश का जल) पकाकर, कूप का जल, चौण्ड्य का जल अथवा सारस का 
जल पीवें। जिस दिन वर्षा हो रही हो, वायु बह रही हो उस दिन क्लेंद नाशक 
(रूखा-सूखा) तथा वात-नाशक भोजन करना चाहिये। वर्षा ऋतु में परिशुष्क (सूखा) 
हल्का, स्निग्ध, उष्ण, अम्ल एवं लवण रसयुक्त भोजन करना चाहिये। प्रायः सभी 
अन्न-पान मधु-मिश्रित एवं काल योग्य द्रव्यों से संस्कृत होना चाहिये। सरीसृप, भू-्वाष्प, 
शीत-वर्षा की फुहार तथा दंस, मशक, एवं उन्दुर (चूहों) से रहित अंगीठी से गर्म किये 
गये भवन में रहना चाहिये। प्रधर्षण, उद्धर्तन, स्नान, धूम्रपान तथा सुगन्धित अगरु 
(#वृण्णाक्षां8 १88००॥४।२००७) का लेप करें। यात्रा करनी हो तो अच्छे तरह की हाथी 
आदि की सवारी पर बैठकर करनी चाहिये। चित्र-विचित्र पुष्पों की माला तथा सुन्दर 
वस्त्र से विभूषित होकर रहें। 
निषेध 

नदियों का जल, मन्थ (सत्तू), दिन में शयन, अति द्रव, अधिक मैथुन, तुषार, 
चैदल चलना, व्यायाम, तथा सूर्य की किरणों का सेवन त्याग देना चाहिये।* 

प्रायः सभी अन्न-पान मधु-मिश्रित करने का निर्देश किया गया है। इस ऋतु 
में वायु का प्रकोप होता है। मधु का गुण भी रुक्ष, लघु, शीत, कषाय तथा 
अल्पवातल होता है, ऐसी स्थिति में इनका सेवन कैसा होगा इस विषय में 
चक्रपाणि ने कहा है-“क्षौद्रं च यद्यपिं वात प्रकोषि, तथापि वार्षिक क्लेद शमनार्थ 
स्वल्पमात्राया क्षौद्रान्वितपदेन विहितम्‌ / 

वाल्मीकि रामायण में वर्षाऋतु का वर्णन अति विस्तार से प्राप्त होता है- श्री 
राम वर्षा का वर्णन करते हुए लक्ष्मण से कहते हैं- “सुमित्रा नन्दन ! अब यह 
जल की प्राप्ति कराने वाला वह प्रसिद्ध वर्षा काल आ गया। देखो, पर्वत के समान 
प्रतीत होने वाले मेघों से आकाश मण्डल आच्छनन हो गया है।* यह आकाश 
स्वरूपा तरुणी सूर्य की किरणों द्वारा समुद्रों का रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासों 
तक धारण किये हुए गर्भ के रूप में जल रूपी रसायन को जन्म दे रही है।” 
रसायन सेवन से जिस प्रकार मानव पुष्ट होता है उसी प्रकार पृथ्वी तथा 
वनस्पतियाँ वर्षा जल रूपी रसायन को प्राप्त कर पुष्ट होकर वृद्धि को प्राप्त होती 
हैं। विभिन्‍न प्रकार के पशु-पक्षी कीट आदि पैदा होते हैं, मदमत होते हैं और 
आनन्द में विभोर होकर वन में बोलते तथा नाचते हैं। यह समय अधिकतर मानव 
के विश्राम का समय होता है। श्री राम ने यहाँ सुग्रीव के विश्राम की भी चर्चा की 
है।* आगे वायु की सुगन्ध, बूंदों की गिरावट, बादलों के रंग तथा गर्जन, नदियों 


204 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


के प्रवहरण, तालाब, कूप आदि के आप्लावन का भी कवि ने श्री राम के मुखं से 
उल्लेख कराया है। इस ऋतु में जलाभिषेक, युद्ध यात्राओं के स्थगन, प्रस्थित 
सेनाओं का पड़ाव आदि का उल्लेख करते हुए श्री राम ने इसे बल-संग्रह-काल 
बताया है। वेदों के स्वाध्याय की इच्छा रखने वाले ब्राह्मणों के लिये उपक्रम का 
समय उपस्थित हुआ है। साम गान करने वाले विद्वानों के स्वाध्याय का भी यही 
समय है।” इस चातुर्मास के आरम्भ होने से पूर्व आवश्यक*वस्तुओं के संग्रह पर 
भी श्री राम ने जोर दिया है और भरत का उदाहरण देते हुए यह अनुमान लगाया 
है कि भरत ने चार महीने के लिये आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर गत आषाढ़ 
की पूर्णिमा को निश्चय ही किसी उतम व्रत की दीक्षा ली होगी।* 

इस प्रकार रामायणगत वर्षा ऋतुचर्या का एक दिग्दर्शन यहाँ प्रस्तुत है जो 
आयुर्वेद द्वारा प्रमाणित है। 
शरद ऋतु चर्या 

शरद्‌ ऋतु में आकाश सफेद बादलों वाला, पृथ्वी थोड़ा-थोड़ा पड वाली होती है। 
कास, सप्तपर्ण तथा कुमुद खिलने लगते हैं, शालि धान्य की खेती से पृथ्वी सुशोभित 
होती है। वश्नु वर्ण का सूर्य होता है। दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो जाती हैं, उनमें क्रीज्च 
उड़ते हैं। वर्षा एवं शीत का अनुभव करने वाले अज्ञों में सहसा.ही सूर्य की किरणों से 
तपने पर जो पित्त वर्षा एवं शीत से संचित था, वह अब कुपित हो जाता है॥! 
शरद्‌ ऋतु के आहार-विहार 

इस ऋतु में तिकत द्रव्यों से सिद्ध घृत, विरेचन तथा रक्त मोक्षण प्रशस्त है। 
प्रतिदिन शीतल, हल्का अन्न-पान तथा कषाय मधुर और तिक्त रस वाले द्रव्यों का सेवन पथ्य 
है। भूख लगने पर शालि चावल, षष्टिक (साठी) चावल, गेहूँ, यव, मूंग शर्करा, मधु, परवल, 
आमलकी, द्राक्षा तथा जांगल प्राणियों का मांस सेवन करना चाहिये। 

जल जो दिन में सूर्य की किरणों से सन्तप्त हो जाता हो रात्रि में चन्द्र किरणों से 
शीतल हो जाता हो, अगस्त नक्षत्र से निर्विष हो, निर्मल हो, पवित्र हो तथा काल 
के प्रभाव से पकव (शुद्ध) हो गया हो, वह जल पीने में अमृत के समान होता है। 

जिन झीलों में हंस समूह, पंखों को चलाते हुए तैर रहे हों, भ्रमरों की पंक्तियाँ 
जहाँ मंडरा रही हों, ऐसे कमल युक्त सेवनीय तालाबों में तैरना चाहिये। हल्के तथा 
शुद्धवस्त्रों को पहन कर तथा फूलों की माला गले में डालकर, शरीर पर उशीर का 
लेप लगाकर प्रदोषकाल में छत पर बैठकर चन्द्र किरणों: का सेवन करें। 
निषेध 

तृप्ति, दधि, आतप, क्षार, वसा, तैल, पूर्वी-वायु, तीक्ष्ण मद्य, दिन में शयन 
तथा ओस का सेवन त्याग देना चाहिये।/ 

वाल्मीकि रामायण में भी शरद्‌ ऋतु का वर्णन कुछ इस प्रकार प्राप्त होता है- 
श्री राम ने देखा, आकाश श्वेत वर्ण का हो रहा है, चन्द्र मण्डल स्वच्छ दिखायी देता 
है तथा शरद ऋतु की रजनी के अज्ञों पर चाँदनी का अज्लराग लगा हुआ है। यह 
सब देखकर वे सीता से मिलने के लिये व्याकुल हो उठे ।* शरद्‌ ऋतु का वर्णन 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 205 


करते हुए कवि ने कहा-सूर्य, चन्द्र, तारा, जलाशय तथा पृथ्वी स्वच्छ है और शुभ 
हैं श्री राम सुनहरे रंग की धातुओं से विभूषित पर्वत-शिखर पर बैठे हुए शरद्‌ काल 
के स्वच्छ आकाश की ओर दृष्टि-पात कर रहे हैं।“ लक्ष्मण के अनुसार यह ऋतु 
योग का सहारा लेते हुए मन को एकाग्र करने की है। इससे सभी चिंता दूर हो 
जाती हैं।* इस समय में कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये, मन को प्रसन्‍न रखना 
चाहिये तथा चित्त की एकाग्रता को कायम रखना चाहिये। इससे पराक्रम की वृद्धि 
होगी तथा शक्ति का गुणन होता है। चन्द्र किरणों का पहाड़ों पर पड़ना, सूर्य, 
चंन्द्र, तारों की प्रभा द्वारा शोभा प्रद बनाना, दिशाओं का अंधकार दूर होकर 
प्रकाशित होना कमलों को स्पर्श कर शीतल मंद वायु का सुगन्धित होकर बहना, 
धरती के कीचड़ का सूख जाना आदि से दैहिक तथा मानसिक स्वास्थ्यप्रद 
वातावरण का उल्लेख रामायण में है। शोभा शाली चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श ही 
से होने वाले हर्ष के कारण तारे किंचित प्रकाशित हो रहे हैं। चाँदनी की चादर 
ओंढ़े हुए शरद काल की यह रात्रि श्वेत ढ़के हुए अंग वाली एक सुन्दरी नारी के 
समान शोभा पा रही है। उदित चन्द्रमा ही उनका सौम्य मुख है और तारे उनकी 
खुली हुई मनोहर आँखें” इस ऋतु में जल स्वच्छ हो गया है। धान की खेती पक 
गयी है। वायु मंद गति से चल रही है और चन्द्रमा निर्मल दिखाई दे रहा है।४ इस 
ऋतु में विजय के इच्छुक राजाओं के द्वारा युद्ध के निमित उद्योग प्रारम्भ हो जाते 
हैं। अर्थात्‌ कर्म करने का यह समय है। कूप तडांगों का जल भी नितर क़र 
“हंसोदक' बन चुका है। 

उपरोक्त सम्पूर्ण विवरण आयुर्वेद की ऋतुचर्या की कसौटी पर खरा उतरता 
है। रामायण में ऋतु चर्या का वर्णन: इस प्रकार सर्वथा आयुर्वेदानुकूल है। अवश्य 
वह प्रसंगानुसार काव्य धर्म के अनुकूल, लोक-व्यवहार के समीप, साहित्यिक रूप 
से चित्रित किया गया है। आयुर्वेदीय प्रथा के अनुरूप इसका विवरण नहीं किया 
गया फिर भी यह सब आयुर्वेद विरोधी नहीं है। निश्चय ही यह सब जोः कुछ भी 
है वह आयुर्वेदीय दृष्टि से भी संतोषप्रद है तथा प्रशंसनीय है। 

इस प्रकार रामायण में वर्णित शरीर-शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत्त की सामग्री 
यथा दिनचर्या, सामाजिक स्वस्थवृत्त, सदृवृत्त या आचार-परक स्वस्थवृत्त तथा 
तत्कालीन भक्ष्याभक्ष्य विचार, भोजनोत्तर कर्म, माध्यनिन्दनीय कर्म, सन्ध्याकाल में 
निषिद्ध कर्म, रात्रि-भोजन, रात्रिचर्या एवं विविध ऋतुओं के अनुसार वर्णित चर्याओं 
को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। ४ 


206 / वाल्मीकि रामायण. तथा आयुर्वेद 



































सर्दर्भ 
प्रथम परिच्छेद 
. . समदोषः समाग्निश्व समधातुमल क्रियः। 
प्रसन्‍्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते।। सु.सू. 4/48 
2. विकारों धातु वैषम्यं साम्य॑ प्रकृतिरुच्यते। 
सुखसंज्ञ कमारोग्यं विकारो दुःखमेव च।। च.सू. 9/4 
दिनचर्या-प्रतिदिनं कर्तव्या चर्चा दिनचर्या। (इन्दु) अ.सं. 3/2 
... दिने-दिने चर्या, दिनस्य वा चर्या दिनचर्या। (चरणं चर्या) अ.सं. 3/2 
5... ततः प्रभाते विमले कृत पूर्वाहिनकक्रियः। 
अभिचक्राम, काकुत्थो दर्शन पौरकार्यवित्‌ ।। उ. 60/2 
6. .ब्राह्मे मुहूर्ते उतिष्ठज्जीर्णाजीर्णे निरूपयनू। 
रक्षार्थमायुषः स्वस्थो .......। अ.सं. 3/3 
7. ब्रह्े मुहूर्ते बुद्धयेत स्वस्थयो रक्षार्थमायुषः। 
तत्र सर्वाधशान्तयर्थस्मरेच्च मधुसूदनम्‌। अं.सं. अध्याय 5 
8... उद्यन्‌ आदित्यः रश्मिभिः शीष्णोरोगम्‌ अनिनीशत ।। अथर्ववेद 928 
9. ततः प्रभाते विमले विश्वामित्रं तपोधनम्‌। 
उवाच राघवो वाक्य कृताह्चिकमरिंदमः ।। बा. 45/5 
0. तः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः। 
विश्वामित्र॑ महात्मानमा जुहाव सराघवम्‌।। बा. 66/] 
प7. बा. 73/7, 8 
2..उ. 60/2 
--> जात वेगः समुत्सृजेत्‌।। अ.सं. 3/3 
उदड्गमुखो मूत्रशकृद्‌ दक्षिणाभिमुखो निशि। 
वाचं नियम्य प्रयतः संवीताज्ेवगुण्ठितः ।॥ अ.सं. 3/4 
4. प्रवृर्तयेत्रचलितं न तु यत्नादुदीरयेत्‌ । 
नामेध्यमार्गमृद्‌ भस्म गोस्थाना कीर्णगोमये ।। अ.सं. 3/5 
5. पुरान्तिकार्नि वल्मीकरम्योत्कृष्टचितिद्रमे । 
न नारीपूज्यगोर्केन्दुवाय्वन्नाग्नि जलं॑ प्रति ।। अ.सं. ३/6 
न चातिरस्कृत्यं महीं भयाशक्त्योस्तु कामतः। अ.सं. 3/7 
6. न वेगितोडन्यकार्य: स्यात्राजित्वा साध्यमामयम्‌ ।। अ.सं. 3/7 
7. निः शल्यादुष्टमृत्िण्डी परिमृष्टमलायनः। अभ्युद्धताभिः शुचिभिरद्रिभर्मुदृभमश्च 
योजयेत्‌ ।। अ.सं. 3/8 
8.. बा. 45/5, 66/0, 73/7.8 
9. स्पृष्ट्वा धातून्मलानश्रु वसा केश नखांश्च्युतान्‌।। अ.सं. 3/9 
स्नात्वाभोक्तुमना भुक्त्वा सुप्त्वा क्षुत्वा सुरा्चने। 
रथ्यामाक्रम्य चाचामेदुपविष्ट उद्ड्गमुखः। अ.सं. 3/0 


208 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





20. 


2. 


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25. 


26. 


शा 


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2 


32. 


प्राइमुखो वा विविक्तस्थो न बहिर्जानु नान्यदृकू। 
अजल्पन्नुतरासंगी स्वच्छैरडगुष्ठमूलगैः । अ.सं. 3/॥॥ 
नोद्धतैननितो नोर्ध्व नाग्निपक्वैन पूतिभिः। 

न फेन बुदुबुद क्षारैनैंकहस्ता्पिते जलैः॥। अ.सं. 3/2 
नार्दैकपाणिनमिध्य हस्तपादो न शब्दवत्‌। अ.स. 3/2॥/9 
तत्रोदकमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्‌। 

आश्रममू्‌ प्रविशद्‌ रामः कुम्भयोनेर्महात्मनः ।। उ. 82/2 
बटासनार्क खदिरकरंज करवीरजमू।। अ.सं. 3/5 
सर्जारिमेदापामार्ग मालती ककुभोद्भवम्‌। 
कषायतिक्तकटुक॑ मूलमन्यदपीदृशम्‌ ।। अ.सं. 3/4 
विज्ञातवृक्षं क्षुण्णाग्रसमृज्वग्रन्थि सुभूमिजम्‌। 
कनीन्यग्रसस्थौल्यं सुकूर्च द्वादशाइगुलम ।। अ.सं. 3/5 
प्रातुर्भकत्वा च यतवाग्भक्षयेद्दन्तधावनम्‌ । 
व्याप्यत्रिवर्गत्रितयक्षैद्राक्तेन च घर्षयेत्‌ ।। अ.सं. 3/6 
शनैस्तेन ततो दन्तान्दन्तमांसान्यबाधयतू। 

निम्बश्च तिकतके श्रेष्ठ: कषाये खदिरस्त्था। 

मधुको मधुरे श्रेष्ठ: करञ्ज कटुके तथा। अ.सं. अध्याय 5 
प्रभातें काल्यमुत्थाय कृत्वाऊहनिकमरिंदम:। 

ऋषिं समुपचक्राम गमनाय रघूत्तम: ।। उ. 82/5 
दन्‍्तान्पूर्वमधो घर्षेत्परातः सिज्चेच्च लोचने। 

तोयपूर्णमुखो ग्रीष्मशरदोः शीत-वारिणा ।। अ.सं. 5/28 
लिखेदनुसुखं जिह्मा जिह्लानिर्लेखनेन च।। अ.सं. 3/7 
तथाउस्य मलबैरस्य जिह्मागन्धाउञस्यदन्तजा:। 
रुचिवैशद्यलघुता न भवन्ति भवन्ति च।। अ.सं. 3/8 
सौवीरमंजन नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेतू। 

लोचने तेन भवतो मनोज्ञे सूक्ष्मदर्शने ।। अ.सं. 3/25 
व्यक्तत्रिवर्णे विमले सुस्निग्धधनपक्ष्मणी। 3/26 

मतं स्त्रोतोज्जनं श्रेष्ठं, विशुद्धं सिनधु सम्भवम्‌। 
दाहकण्डूमलघ्नं च दृष्टि क्लेदरुजापहम्‌ ।। 

तेजोरुपावहं चैव सहते मारुतातपौ। 

न नेत्ररोगा जायन्ते तस्मादज्जनमाचरेतू।। सु.चि. 24/8-9 
सौवीरमंजन नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत्‌ । 

पंचरात्रेषष्टरात्रे वा स्त्राबाणार्थ रसांजनम्‌ ।। अ.सं. अध्याय 5 
चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छलेष्मतो भयम्‌॥। अ.सं. 3/26 
योज्येत्सप्तरात्रेउस्मात्पावर्णार्थ रसांजनम्‌ । 

प्रायोगिक ततो धूमं गन्धमाल्यादि चाचरेत्‌। 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 209 


की. 


35. 
36. 


. 


39. 


40. 


4. 


42. 


43. 


धूमादस्योर्ध्वजत्रूत्या न स्युवतिकफामया: ।। अ.सं. 3/32 
आयामो विविधोऊड्ननां व्यायाम इति कीर्तितः ।।-धनुर्वेद 
शरीरायासजनक कर्म व्यायामसंज्ञितम्‌ ।। सुश्रुत 

शरीर चेष्टा या चेष्टा स्थै्यार्था चलवर्धिनी। 

देह व्यायामसंख्याता ।। चरक सू. 7/3-33 

स्वेदागमः श्वासवृद्धिरगात्राणां लाघवं तथा।। चरक 

लाघवं कर्म सामर्थ्य दीप्तोडग्निर्मेंचस: क्षयः। 

विभक्तघन गात्रत्वं व्यायामादुपजायते ।। अष्टांगहदय 

(स्वास्थ्य विज्ञान और सार्वजनिक आरोग्य चतुर्थ अध्याय) 
वात-पित्तामयी बालो वृद्धोज्जीर्णीच त॑ं त्यजेतू ।। अ.सं. 3/65 
अर्द्ध शक्त्या निषेप्यस्तु बलिभि: स्निग्ध भोजिभि:। 

शीतकाले वसन्‍्ते च मंदमेव ततोषन्यदा ।। अ.सं. 3/64 
हृदिस्थान स्थितो वायुः यदा वकत्रं प्रपद्यते। 

व्यायाम कुर्वतो जन्तोः तदू वलार्द्धस्य लक्षणम्‌।। सु.चि. 24/47 
त॑ कृत्वाउनुसुखं देहं मर्दयेच्च समन्ततः। 

तृष्णाक्षयः प्रतमको रकतपितं श्रमः क्लमः।। अ.सं. 3/65 
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्व जायते। 
व्यायामजारराध्वस्त्रीहास्य भाष्यादि साहसम्‌ ।। अ.सं. 3/66 
गजं सिंह इवाकर्षन्‌ भजन्नति विनश्यति 

न स्वप्न-जागरण-शयन-अशन-चड्क्रमण-यान-वाहन-प्रधावन-लघनं-प्लवन-प्रतरण-हास्य- 
भाष्य-व्यवाय-व्यायामादि उचितान्‌ अपि अतिसेवेत (सु.चि. 24) 
व्यायाम हास्यभाष्याध्वग्राम्य धर्मप्रजागरानू। 

नोचितानापि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ।। च.सू. 7/34 

ततः शत्रुघ्न वचनाब्रिपुणाः श्मश्रुवर्धनाः। हि 

सुखहस्ताः सुशीघ्राश्च राघव॑ं पर्यवारयन्‌ ।। यु. 28/5 
विशोधित जटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः। महार्हवसनोतेस्तथौ तत्र श्रिया ज्वलनू ।। 
यु. 28/5 

पंचरात्रान्त्खश्मश्रु केश रोमाणि कर्तयेत्‌। 

केशश्मश्रुनखादीनां कल्पन संप्रधानम्‌ ।। 

पौष्टिक वृष्यमायुष्यं शुचिरूपम्‌ विराजनम्‌। 

केश प्रसाधनम्‌ केश्य॑ रजोजन्तुनिवारणम्‌ ।। योगरत्नाकर 
(स्वास्थ्य विज्ञान और सार्वजनिक आरोग्य पेज नं. 78-79) 
अभ्यज्ञमाचरेन्नित्यं सर्वेष्वंगेषु पुष्टिदम्‌। 

शिरः श्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्‌।। योग रत्नाकर 
स्नेहाभ्यंगाद्यथा कुंभश्चमं स्नेहविमर्दनातू। 

तथा शरीरमभ्यंगाद्‌ दृढ़ें सुत्वकू च जायते ।। चरक 


20 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


45. 


46. 


बाप 
48. 
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5. 
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57. 
58. 


कक 





कषायपहत स्नेहस्ततो स्नातो यथाविधि। अष्टांग हृदय 
(स्वास्थ्य विज्ञान और सार्वजनिक आरोग्य पेज नं. 80) 
अथजातान्नपानेच्छो मारुतहनैः सुगन्धिभिः।। अ.सं. 3/55 
यथर्तुसंस्पर्श सुखैस्तैलेरभ्यज्ञ माचरेत्‌। 
अभ्यज्ञोवातहा पुष्टि स्वप्न दाढ़र्यवृहत्तवकृत्‌ ।। 56 
दग्ध-भग्न-क्षत रुजाक्लमश्रमजरापहः। 
रथाक्षचर्मघटवभ्दवन्त्यभ्यड्ग तो गुणाः॥। अ.सं. 3/57 
स्पर्शनेष्भ्यधिको वायु: स्पर्शनं च त्वगाश्रयम्‌। 
त्वच्यश्च परमभ्यंगो यस्मातं शीलदेयतः ।। 58 
शिरः श्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्‌। 
स केश्यः शीलितो मूर्छिन कपालेन्द्रियरर्पण: ।॥ 59 
हनुमन्याशिरः कर्णशूलघ्न॑ कर्णपूरणम। 
पादाभ्यड्गस्तु तत्स्थैर्यनिद्रादृष्टि प्रसादकृत्‌ ।॥ 60 
पाद सुप्ति श्रम स्तम्भ सडूकोचस्फुटन प्रणुत्‌। 
वर्ज्योज्भ्यज्ञ : कफग्रस्तकूत संशुद्धय जीर्णिभिः ।। अ.सं. 6 
सोष्भ्यइ मूर्धि शिरसि शीलितः केश केशेभ्यो हितः:कपालस्थेन्द्रियाणाश्च तर्पणः 


तृप्तिकरः। 


स्नेहेन कर्णपूरणम्‌ हनुमन्यादिशूलघ्नं। अ.सं.अ. 5 

नित्य॑ स्नेहार्द शिरसः शिरः शूलम्‌ न जायते। 

न खालित्य॑ न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च ....... च.सू. 5/8-83 
शिरोगतांस्तथा रोगाजिछरोभ्यज्ञोौउपकर्षति (सु.चि. 24/25-26) 


न कर्णरोगा वातोत्था न मन्याहनुसंग्रहः .........- 


च.सू. 5/84 





हनुमन्याशिरः कर्णशूलघ्न कर्ण-पूरणम्‌ (अ.सं.अ. 3) 

रथाक्षस्य स्नेहस्पर्शन मात्रेण, चर्मणो मर्दनेन, घटस्य स्नेह-संस्कारेण इति। अ. सं. अ. 3 
दीपन वृष्यमायुष्यं स्नानमोजोबलप्रदम्‌ । अ.सं. 3/68 
कण्डूमलश्रमस्वेदतन्द्रावृड्दाहपाप्मजित्‌। 

उष्णाम्बुनाउधः कायस्य परिषेको बलावहः।। अ.सं... 3/69 

तेनैव चोत्तमाइस्य बलहत्केश चश्षुषाम्‌। 

नानाप्लुत्य शिरः स्नायान्‍न जलेघल्पे न शीतले।। 70 

स्नानोदकावतरण स्वप्नान्नाग्नो न चाचरेत्‌। 

पंचपिण्डाननुद्धव्य न स्नायात्यरवारिणि॥। 77 

पवित्र वृष्यं आयुष्यं श्रम स्वेदमलापहम्‌। 

शरीर बलसन्धानं स्नानं ओजस्करं परमू। (च.सू. 5/94) 

निद्रा दाह श्रम हरं स्वेद कण्डू तृषापहम्‌। हथं मल हरह॑ श्रेष्ठ सर्वेन्द्रविशों धनम्‌।। 
तन्द्रापापमोपशमनं तुष्टिदम्‌ पुंसलवर्द्धनम्‌। रक्त प्रसादनं चापि स्नानमग्नेश्च 


दीपनं | सु.चि. 24 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 2] , 


60. 


उष्णेन शिरसः स्नान अहित॑ चक्षुषः सदा! शीतेन शिरसः स्नान चक्षुष्यं इति निर्दिशेत्‌ ।। 
श्लेष्ममारुत कोपे तु ज्ञात्वा व्याधि बलाबलम्‌! काम मुष्णं शिरः स्नान॑ भैषज्यार्थ 


समाचरेत्‌।। 


6. 


62. 


63. 


65. 


66. 


67. 


69. 


70. 
या. 


73. 


74. 


78. 
76. 


१८० 


अति शीताम्बु शीते च श्लेष्ममारुत कोपनम्‌! अत्युष्णं उष्णकाले च पित्त शोणित 
वर्धनम्‌।। सु.चि. 24 

नात्मानमीक्षेत जले न तटस्थो जलाशयम्‌। 

न प्रतिस्फालयेदम्बुं पाणिना चरणेन वा।। अ.सं. 3/72 

स्नात्वा न मृज्याद्गात्राणि धुनुयानन शिरोरुहान्‌। 

निविसीताए्द्र एवाशु सोष्णीषे धौतवाससी।। अ.सं. 3/73 

न त्वम्बरं पूर्वधृतं न च तैलवसे स्पृशेत्‌। वासोष्न्यदन्यच्छयने निर्गमे देवतार्चने।। 
अ.सं. 3/74 

स्नानमर्दित नेत्रास्यकर्णरोगाति सारिषु। आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम्‌।। 
अ.सं. 3/75 

तच्च अतिसार ज्वरित कर्णशूलानिलार्त्तिषु । आध्मानारोचकाजीर्ण भुक्त वस्तु च 
गर्हितम्‌।। 

अग्निपुराण की दार्शनिक एवं आयुर्वेदिक सामग्री-पेज नं. 54 

बा. 44/4, अयो. 4/34 

अयो. 7/5 

अयो. 4/34 - 

अयो. 26/5 

अयो. 56/32 

अयो. 65/8 

अरण्य, ॥7/ 

वासं चक्रु्मुनिगणाः शोणाकूले समाहिताः। 

तेउस्तं गते दिनकरे स्नात्वा हुतहुताशनाः।। बा. 3/20 

गते पुरोहिते राम: स्नातोनियतमानसः। 

सह पलया विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्‌ ।। अयो. 6/ 

रामः स्नात्वा तु नियतो गुण बाञ्जप कोविदः। 

संग्रहेणाकरोत्‌ सर्वान्‌ मन्त्रान्‌ सत्रावसानिकान्‌ ।। अयो. 56/29 

अयो. 5632 

वासो न धारयेज्जीर्ण मलिन॑ रक्तमुल्बणम्‌।। अ.सं. 3/34 

सौभाग्यदं वर्णकरं प्रीति ओजो बल वर्द्धनम्‌। 

स्वेद दौर्गन्ध्यवैवर्ण्य श्रमध्नं अनुलेपनम्‌ ।। 

स्नान॑ येषां निषिद्धं तु तेषां आपि अनुलेपनम्‌।। सु.चि. 24 

इदं दिव्यं वर मांल्यं वस्त्रमाभरणानि च। 

अडूगराग च वैदेही महार्हमनुलेपनम्‌ ।। 


22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





५ 8. 
79. 
80. 
&8. 
82. 


83. 


89. 


9. 
92. 


93. 


मयादतमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत्‌। 

अनुरूपम संक्रिष्टं नित्यमेव भविष्यति ।। अयो. 8/8,9 
अड्ज रागेण दिव्येन लिप्ताज़्ी जनकात्मजे। 

शोभयिष्यसि भर्तरिं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम्‌ ।। अयो. 8/20 
इसमे च धनुषी चित्रे श्लक्ष्णे चित्रानुलेपने ।। कि. 3/6 
प्रकाशेते यथेन्द्रस्य वज्रे हेमविभूषिते। 

कृतकण्ठगुणाः क्षीबा रक्त माल्यानुलेपनाः। 

रकताक्षा: पुष्कराक्षाश्च गगन प्रतिपेदिरे ।। सु. /25 

ददर्श कान्ताश्च समालभन्त्य- 
स्तथा परास्तत्र पुनः स्वपन्त्यः। 
लोहितेनानुलिप्ताड्ग चन्दनेन सुगन्धि ना। 

सन्ध्यारक्‍्त मिवाकाशे तोयदं सतडिद्युगम्‌।। सु. 0/8 

सु. 0/20, 26, 5/39, 7/7, 22/25, यु. 60/34, 64/28, 28/5, उ. 
26/5, 3/3, 69/9 है 

गन्ध माल्यादिक वृष्यमलक्ष्मीहनं प्रसाधनम्‌ अ.सं. 3/34 

वृष्यं सौगन्ध्यं आयुध्यं काम्य॑ पुष्टि बलप्रदम्‌। 

सौमनस्यं अलक्ष्मीहनं गन्धमाल्यनिवेषणम्‌ ।। च.सू. 5/96 

माल्यं न लम्बं न बर्हिन रक्‍तं जलजादूते। 

नैव चान्येन विधृतं वस्त्र पुष्पमुपा नहीं।। अ.सं. 3/35 

() कृत कण्ठगुणाः क्षीणा रक्त माल्यनुलेपना:। 

रकताक्षाः पुष्कराक्षाश्च गगन प्रतिपेदिरे ।। सुन्दर /25 

(2) वृतमाभरणैर्दिव्यै: सुरूपं कामरूपिणम्‌। 

सवृक्षवनगुल्माढयं प्रसुप्तमिव मन्दरम्‌।। सु. 079 

(3) विशोधित जटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपन:। 

महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलनू ।। यु. 28/5 

प्रणम्यदेवान्वृद्धांश्च मंगलाष्टशतशुभम्‌। 

शृण्वन्कांचनविन्यस्तं सर्पि: पश्येदनन्तरम्‌ । अ.सं.सू. 3/24 

को मां सन्ध्यामुपास्थैव स्नात्वा हुतहुताशनः ।« 





* श्लाघयिष्यत्युपासीनः पुत्रशोक भयार्दितम्‌। अयो. 64/33 


आश्वासितो लक्ष्मणेन राम: सन्ध्यामुपासत। 

स्मरनू्‌ कमलपत्राक्षीं सीतां शोकाकुलीकृतः।। यु. 5/23 
तस्मिन्‌ सन्ध्यामुपासिंत्वा स्नात्वा जप्त्वा च वानर:। 

उतरं सागर प्रायाद्‌ वह्मानो दशाननमू। उ. 34229 

प्रभाते सुमहावीर्य:.कृत्वा पौर्वाहिनकीं क्रियाम्‌। 

मुनिं प्राउ्जलिरामन्त्र्य ययौ पश्चान्मुखः पुनः ।। उ. 66/4 
संध्यामुपासितं वीर समयो ह्मतिवर्तते। 


शरीर शुद्धि एवं बैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री . / 23 


94. 


9. 
96. 
फ7. 
98. 


99. 


00. 


30. 


402. 


03. 


04. 


405. 


306. 


307. 


408. 


09. 


एते महर्षयः सर्वे पूर्णकुम्भा: समन्‍्ततः।। 

कृतोद का नर्याप्र आदित्य॑ पर्युपासते। उ. 8/श 
ऋषेर्वचनमाज्ञाय राम: संध्यामुपासितम्‌। 

अपाक्रामत्‌ सरः पुण्यमप्सरोगणसेवितम्‌ ।। उ. 82/ 

उ. 82/2 

उ. 940 

नैवचान्येनविध्ृतं वस्त्रं पुष्पमुपानही ।। आ.सं.सू. 3/35 
अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते। 

एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः॥। अयो. 2/श 
सोञधिरुह्य नरव्याप्र: पादुके व्यवमुच्य च। 

प्रायच्छत्‌ सुमहातेजा भरताय महात्मने।। अयो. 2/22 
स पादुके सम्प्रणम्य राम॑ वचनमन्रवीतू। 

चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्‌।॥ अयो. 2/23 
'फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन। 

'तवागमनमाकाइक्षन्‌ वसन वै नगरादू बहिः।॥2/24 

स पादुके ते भरतः स्वलंकृते 

महोज्जवले सम्परिगृद्य धर्मवित्‌। 

प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं 

चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि ।। अयो. 2/29 

अयो. ॥3/7 

अयो. 73/2, 3, 4 

यू. 28/28 

छत्र॑ तस्य च जग्राह शन्रुघ्नः पाण्डुरं शुभमू। 

श्वेतं च वालव्यजनं सुग्रीवो वानरेश्वरः ।। 

अपरं चन्द्र संकाशं राक्षसेन्द्रो विभीषण:। यु. 28/68.57 
तदस्त्रं ज्वलितं- घोरं लक्ष्मण: शरमाहितम्‌। 

अतिकायाय चिक्षेप काल-दण्डमिवान्तकः ।। यु. 7/86 
दिष्टया त्वां गुह पश्यामि हारोगं सह बान्धवैः। 

अपि ते कुशल राष्ट्रे मित्रेजुच वनेषु च।। अयो. 50/42 
शारीरो मानसोवापि कच्चिदेनं न बाधते। 

संतापो वाभितापो वा दुर्लभ हि सदा सुखम्‌॥। अयो. 8/3 
कच्चित्‌ सकुशली राजा पिता दशरथोमम। 
कच्चिदारोग्यता रामे लक्षमंणे च महात्मनि॥॥ अयो. 70/7 
अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमतः ॥। 70/8 
शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोंगा चापि मध्यमा।। 70/9 
अरोगा चापि मे माता कैकेई किमुवाच ह।। 70/0 


2]4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद : 





0. 
4]]. 


42. 


443. 


उ. 25/ 
पशव्यश्चाल्परोगश्च फलमूलरसायुतः। 

बहुस्नेहो बहुक्षीरः सुगन्धिरविविधौषधिः ।। यु. 22/42 
उत्पन्नस्त्वं गुणज्येष्ठो मम रामात्मजः प्रियः। 

त्वया यतः प्रजाश्चेमा: स्वगुणैरनुडिजताः।। अयो. 3/40 
कामस्त्व॑ प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति।। अयो. 3/4 
गुणवत्यपि तु स्नेहात्‌ पुत्र वक्ष्यामि ते हितम्‌। 
भूयोविनयमास्थाय भव नित्य॑ जितेन्द्रियः ॥॥ अयो. 3/42 
काम क्रोध समुत्थानि व्यजस्य व्यसनानि च। 

परोक्षया वर्तमानो वृत्त्या प्रत्यक्षया तथा ।। अयो. 3८45 
अमात्यप्रभृतीः सर्वाः प्रजाश्वैवानुरंजय । 

कोष्ठगारायु धागारैः कृत्वा संनिचयान्‌ बहून्‌ ।। अयो. 3/44 
इष्टानुरक्त प्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीमू। 

तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्धावमृत मिवामराः॥। अयो. 3/45 
तस्मात्‌ पुन्न त्वमात्मानं नियम्यैवं समाचर। 


- तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः । मन्त्रज्ञाश्चेडूगितज्ञाश्च नित्य॑ प्रियहिते 


रताः।। बा. 7/ 
अष्टौबभूवुर्षीस्य तस्थमात्या यशस्विनः। शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः ।। 
बा. 7/2 

धृष्टिजर्यन्तो विजय: सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धन:। अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोजर्थवित्‌ ।। 
बा. 7/3 

ऋत्विजी द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ। वसिष्ठौ वामदेवश्च मन्त्रिणश्व तथापरे।। 
बा. 7/4 हि 
एतैब्रह्मर्षिभिर्नेल्यमृत्विजस्तस्य पौव॑का: । विद्याविनीता हीमन्तः कुशला नियतेन्द्रिया:।। 
बा. 7/6 

श्रीमन्तश्च महात्मान: शस्त्रज्ञा दृढ़विक्रमा:। कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिण: ।। 
बा. 7/7 (बा. 7/8 से 24 तक)72. 


१5. शुचीनामेकबुद्धीनां. सर्वेष॑ सम्प्रजानताम्‌ । नासीत्युरे वा राष्ट्रे वा मृषावादी नरः 


व6. 


क्कचित्‌ ।। बा. 7/4 

क्चिनन दुष्टस्तत्रासीतू परदाररतिर्नर:। प्रशान्तं सर्वमेवासीदू राष्ट्र पुखरं च तत॥। 
बा. 7/5 

स कच्चिद ब्राह्मणो विद्वान्‌ धर्मनित्यो महाद्युति:। 

इक्ष्वाकूणांमूपाध्यायो यथावत्‌ तात पूज्यते ।। अयो. 00/9 

कच्चिच्छुश्रूपसे तात पितुः सत्य पराक्रम ।। अयो. 00/7। 

कच्चिद्‌ विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः। अयो. 00/7, अयो. 00/2, 5, 
]5, 6, 8, 20, 2, 22, 23, 24 ; 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 25 


7. अंमात्यानुपूधातीवान्‌ पितृपैतामहांशुचीनू । 

श्रेष्ठांफ्रेष्ठेषु कच्चित्‌ त्वँ नियोजयसि कर्मसु ॥। अयो. 00/26 
8. कच्चिनन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजिताः प्रजाः। 

राष्ट्र तवावजानन्ति मन्त्रिणः कैकयीसुत ।। अयो. 00/27 
9. उपायकुशलं वैद्य भृत्त्यसंदुषणे रतम्‌। 

शूरमैश्वर्यकामं च यो हन्ति न स हन्यते।। अयो. 00/29 
20. कच्चिद्‌ धृष्टश्च शूरश्च धृतिसान्‌ मतिमाउछुचि:। $ 

कुलीनरचानुरक्तश्च दक्ष: सेनापतिः कृतः।। अयो. 00/30 
3श. बलवन्तश्व कच्चित्‌ ते मुख्या युद्धविशारदा:। 

दुष्टापदाना विक्रान्तास्त्वया सत्त्कृंत्य मानिताः।। अयो. 00/3 
22. कच्चिद्‌ बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्‌। 

सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे ।। अयो. 00/32 
28. कच्चिद्‌ सर्वेज्नुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः। 

कच्चिद्‌ प्राणांस्तवार्थेषु संस्यजन्ति समाहिता:।। अयो. 00/34 . 
24. कच्चिज्जानपदो विद्वान्‌ दक्षिण: प्रतिभानवान्‌ ॥| 

यथोक्‍तंवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डित:।। अयो. 00/35 
25. कच्चिदृष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च। 

त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैवेत्सि तीर्थानि चारकैः ।। अयो. 00/36 
26. कच्चिद्‌ व्यपास्तानहितानू प्रतियातांश्च सर्वदा। 

दुर्बलाननवज्ञाय वर्तसे रिपुसूदन ।। अयो. 00/37 
श4. कच्चान्न लोकायतिकान ब्राह्मणांस्तात सेवसे। 

अनर्थ कुशला ह्वेते बालाः पण्डितमानिनः।। अयो. 00/38 
28. प्रसादैर्विविधाकरैर्वृतां वैद्यजनाकुलामू। 

कच्चित्‌ समुदितां स्फीतांमयोध्यां परिरक्षसे ।। अयो. 00/42 
29. अयो. 00/43 से 46, 47, 49, 50, 5, 52, 53, 54 
30. देवतार्थे च पित्रर्थ ब्राह्मणाभ्यागतेषु च। 

योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद्‌ गच्छति ते व्ययः 4 अयो. 00/55 
3. कच्चिदायोंऊपि शुद्धात्मा क्षारितश्चापकर्मणा। 

अदृष्टः शास्त्र कुशलैर्न लोभाद्‌ बध्यते शुचिः।। अयो. 700/56._* 
32. कच्चिद्‌ वृद्धांश्व बालां*व वैद्यान्‌ मुख्यांश्व राघव। 

” दानेन मनसा वाचा त्रिभिरेतैर्षुभूबसे ।। अयों 00/60 

33. कच्चिद्‌ गुरुशव वृद्धांशव तापसान देवतातिथीनू। 

चैत्यां*्च सर्वान्‌ सिद्धार्थान्‌ ब्राह्मणांश्व नामस्यसि॥। 00/6 
34. अयो. 00/62 
35. अयो. 00/63 
36. अयो. 00/64 


26 / वाल्मीकि रामांयण _तथा आयुर्वेद 


व37. 
438. 
39. 
40. 
व4ी. 
442. 
443६ 
44. 
345 

46. 


47. 


46. 


4. 


व2 








अयो. 00/65, 66, 67 

अयो. 00/68, 69, 70 

आचार्यो गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः। यु. .29/9 
युद्धकाण्ड-63/2 

युद्धकाण्ड-63/3 

युद्धकाण्ड-63/4 

युद्धकाण्ड-63/5 

युद्धकाण्ड-68/6 

युद्धकाण्ड-68/0 

तेजोधृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्य विनयो नयः। 

पौरुषं विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा ।। यु. 28/82 


यु. 28/98-05 
ह द्वितीय परिच्छेद 
विधि विहितमन्नपानमिष्टेन्द्रियार्थभायतनमायुषोब्रुवते । 
यत्तदायत्तानि द्योजस्तेजोधात्विन्द्रिय बल तुष्टिपुष्टिप्रतिभारोग्यादीनि। ४ 
तदिन्धना चान्तरग्नेः स्थितिः। 
अग्नि मूलं च देह धारणमिति।। अ.सं.सू. 0/3 
बलमारोग्यमायुश्च प्राणश्चाग्नौ प्रतिष्ठिताः। 
अन्नपानेन्धनैश्चाग्निर्जलति व्येति चान्यथा।। च. सू. 27/342 
न तेष्वहः सु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते। बा. 4/॥ 
ब्राह्मणा भुज्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुज्जते। 
तापसा भुज्जते चापि श्रमणश्चैव भुज्जते।। बा. 4/2 
वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तयैव च। 
अनिश भुंजमानानां न तृप्तिखूपलभ्यते ।। बा. 4/3 ; 
बा. 4/5 
बा. 4/7 
तत्रस्वभावतो दिव्योदकरक्तशालिषाष्टिक मुद्गैणलावादयोलघवः। 
क्षीरेक्षु ब्रीहिमाषानूपामिषादयोगुरव इति। अ.सं.सू. 0/5 
ते खल्वपि संयोगादि विशेषैरन्यथात्व॑ प्रतिपद्यन्ते ।। अ.सं.सू. 0/6 
तत्र संयोगो नाम द्वयोहूनां वा संहतीभावः। 
स॒ विशेषमारभते यन्नै कैशो द्रव्याणि।। अ.सं.सू. 0/7 
संस्कारस्तु तोयाग्नि सन्निकर्ष शौचमंथन देशकाल भावनाभाजनादिभिरूपजन्यंते ।। 
अ.सं.सू. 0/8 
करण पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणां अभिसंस्कार:। 
संस्कारों हि गुणान्तराधानम्‌ उच्यते। ते गुणास्तोयाउग्निसन्निकर्ष शौच-मंथनदेशकाल 
वासन भावनादिभिः काल प्रकर्ष भाजनादिभिश्चाधीयन्ते ।। च.वि0 /2-2 
शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री. / 27 


3. 
]4. 


45. 
6. 


प्र 


8. 


9. 


20. 


शा; 


22. 


23. 


24. 


25. 


26. 


शा. 


28. 


29. 


30. 


3. 


32. 


33. 
34. 


कालस्तु ऋतुव्याध्यपेक्षो जीर्णाजीर्णलक्षणश्च ।। आ.सं.सू. 0/7 

अजीर्ण हि पूर्वस्याहारस्यापरिणतो रस उत्तरेण संसृज्यमानः सर्वान्दोषान्प्रकोपयत्याशु ।। 
आ.सं.सू. 0/2 

केवलमयमेव कालो भोजनस्य ।। अ.सं.सू. 0/4 

देशो द्रव्यस्योपयोक्तुश्चात्पतयवस्थाने । 

तत्र पुनरुपयोकता स्वस्थातुरत्वतः प्रकृतिभेदतश्च परीक्ष्य:॥। अ.सं.सू. 0/0 
देशः पुनः स्थान, स द्रव्याणाग्‌ उत्पत्तिप्रचारौ देशसात्यं चाचष्टे। च.वि0 /2-5 
अ+बअष्टांग-संग्रह सूत्र स्थान। 0/6 

न पर्युषितमन्यत्र मांसोपरदंशभक्ष्येभ्य: ।। अ.सं.सू. 0/7 

रसाः स्वाद्मम्ललवणतिक्तोषण कषायका:। 

घट्र द्रव्यमाश्रितास्ते च यथा पूर्पूबलावहा:।। अ.सं.सू. /35 

मधुरोउम्लः पटुश्चैव कटुतिक्त कषायका:। 

इत्येते घड़सा ख्याता नाना द्रव्य समाश्रिताः।। शा.सं.-96 पेज नं. 8 
स्नेहप्रीणनाहूलांद मार्दवैरूपलभ्यते । 

मुखस्थो मधुराश्चास्य व्याप्नुवल्लिभ्यतानि च।। 

दन्‍्तहर्षान्मुखस्रावात्‌ स्वेदनान्मुखबोधनात्‌ । 

विदाहाच्चास्य कण्ठस्य प्राश्यैवाउम्लरसं वदेत्‌।। 

प्रलीय क्लेद विष्यन्द मार्दवं कुरुते मुखे। 


“यः शीघ्र लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च।। शार्डूगधर संहिता-96। पे.नं. 9 


संवेदयेद्यो रसनां निपाते तुदतीव च। 

विदहन्‌ मुखनासाक्षि संस्नावी स कटुः स्मृतः ।। 

प्रतिहन्ति निपाते यो रसानां स्वदते न च। 

स तिकतो मुखवैशद्य शोष प्रहलाद कारकः। 

वैशद्यस्तम्भजाइयै यों रसनां योजयेद्‌ रसः। 

बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकाश्यपि ।। अष्टांग संग्रह-96। पेज नं. 9 


स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च। 
भक्ष्यन्‌ वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति ।। अयो. 2/97 
ऐड्डुदं बदरैमिश्रं पिण्याक दर्भसंस्तरे। 


न्यस्य रामः सुदुःखारतों रुदन वचनमब्रवीत्‌ ।। अयो. 03/29 
इदं भुड्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम्‌। 

यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः।। अयो. 03/30 
ईक्षून, मधूंस्तथा लाजानू मैरेयांश्व वरासवानू। 

पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानापि ।। बा. 53/2 
दधिकुल्यास्तथैव च ।। बा. 53/3 

यस्य-यस्य यथा काम षडरसेष्वभिपूजितम्‌। बा. 52/22 
वराहवाप्रणिसकान्‌ दघिसौवर्चलायुतानू ।। सु. 8/6 


28 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


35. 


36. 


37. 


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40. 


4. 


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-50. 


5. 


इह मे भगवान सोमो विधत्तामन्नमुत्तमम्‌। 
भक्ष्यं भोज्यं च चोष्यं च लेह्यं च विविध बहु। अयो. 9/20 
रसेनान्‍नेन पानेन लेझ्य चोष्येण संयुतम्‌। 
अन्नानां निचयं सर्व सृजस्व शबलेत्वर ।। अयो. 52/23 
अस्ति मूलफलं चैतान्निषादैः स्वयमर्जितम्‌ । 
आदि शुष्क॑ तथा मासं वन्य चोच्चावचं तथा।। अयो. 84/7 
वाष्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांस चरैर्वृता:। 
प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूर कौक्कुटैः ।॥ अयो. 9/70 
मृगाणां महिषाणां च वराहाणां च भागशः। 
तत्र न्यस्तानि मांसानि पानभूमौ ददर्श सः।। सु. /4 
रौक्मैषु च विशालेषु भाजनेष्वप्यभक्षितानू। _ 
ददर्श कपिशार्दूलो मयूरान्‌ कुक्कुटांस्तथा ।। सु. /5, सु. /6 
कृकलानू विविधांश्छागांछशकानर्धभक्षितान्‌ 
महिषानेकशल्यांश्च मेषांश्व कृतनिष्ठितान्‌ ।। सु. /7 
अन्याः सवन्तु मैरेयं सुरामन्‍्याः सुनिष्ठिताम्‌। 
अपराश्चोदक॑ शीतमिक्षुकाण्डससोपमम्‌ ।। अयो. 9/5 
विचित्राणि च माल्यानि पादपप्रच्युतानि च। 
सुरादीनि च पेयानि मांसानि विविधानी च। अयो. 9/श 
इक्षून्‌ मधूंस्तथा लाजानू मैरेयांश्व वरासवानू। 
पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्क्ष्वोच्चावचानपि ।। बा. 53/2 
भवान्‌ मे प्रियकामार्थ वचन यदि होक्तवान्‌ 
अकार्य कार्यसंकाशमपथ्यं पथ्य सन्निभम्‌।। अयो. 09/2 
तस्यागस्त्यो बहुगुणं कन्दमूलं तथौषधम्‌। 
शल्यादीनि पवित्राणि भोजनार्थमकल्पयत्‌ ।। उ. 82/3 द् 
स भुक्तवान्‌ नरश्रेष्ठस्तदन्‍नममृतोपमम्‌। 
प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपाविशत्‌ ।। उ. 82/4 
नहि निम्बात्‌ सवेत्‌ क्षौद्रं लोके निगदितं वच:।। अयो. 35/7 
कश्चिदाम्रवर्ण छित्तवा पलाशांश्च निषिचिति। 
पुष्प दृष्ट्वा फले गुध्नुः स शोचति फलागमे ।। अयो. 63/8 
मृत्युकाले यथा मर्त्यो विपरीतानि सेवते। 
मुमूर्षूणां तु सर्वेषां यत्‌ पथ्य॑ं तन्‍न रोचते।। अर. 53/7 
मलयं दुर्दुरं चैव ततः स्वेदनुदोडनिलः 
उपस्पृश्य ववौ युकतया सुप्रियात्मा सुखं शिवः॥। अयो. 9/24 
पशव्यश्चाल्परोगश्च फलमूलरसायुतः । 
बहुस्नेहो बहुक्षीरः सुगन्धिर्विविधौषधि: ।। यु. 22/42 
कृत शास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत तस्य कदाचन। 

शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 29 


52. 


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ह्पः 


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6. 


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70. 
६ 7 
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75. 


सत्यसंघः सत्ां श्रेष्ठो यस्यायोज्नुमतेगतः।। अयो. 75/श 
प्रैष्यं पापीयसां यातु सूर्य च प्रति मेहतु। 

हन्तु पादेन गाः सुप्ता यस्यायोज्नुमते गतः।॥ अयो. 75/22 
कारयित्वा महत्‌ कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम्‌। 

अधर्मोयोज्स्य सोञ्स्यास्तु यस्यायोज्नुमते गतः।॥ अयो. 75/23 
परिपालयमानस्य राज्ञों भूतानि पुत्रवत्‌। 

ततस्तु द्वुह्मतां पाप॑ यस्यार्थोज्नुमते गतः॥॥ अयो. 75/24 
बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षितुः प्रजा: । 

अधर्मोयोज्स्य सोज्स्यास्तुयस्यार्योउनुमते गतः॥॥ अयो. 75/28 
संश्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वैयज्ञदक्षिणाम्‌। 

तां चापलतां पापं यस्यायोज्जुमते गतः।। अयो. 75/26 
हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले। 

मास्म कार्षीतूसतां धर्मयस्यार्योउनुमते गतः।। अयो. 75/27 
उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थ शास्त्र यत्नेन धीमता। 

स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योजनुमते गत:।। अयो. 75/28 
मा च त॑ व्यूढवा् सं चन्द्रभास्कर तेजसम्‌। 

द्राक्षीद्‌ राज्यस्थमासीनं यस्यार्योजनुमते गतः।॥ अयो. 75/29 
पायसं कृसरं छागं॑ वृथा सोउश्नातु निर्धुणः। 
गुरुश्चाप्यवजानातु यस्यायोजनुमते गतः।। अयो. 75/30 
गाश्च स्पृशतु पादेन गुरुन्‌ परिवदेत च। 

मित्रे दुह्मेत सोषव्यर्थ यस्या्योज्नुमते गतः।। अयो. 75/3 
विश्वासात्‌ कथितं किंचित्‌ परिवादं मिथः क्चित्‌। 

विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्या्योजनुमते गतः।॥ अयो. 75/32 
अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्वकतात्मा निरपत्रपः। 

लोके भवतु विद्विष्टो यस्यायोज्नुमते गतः।॥ अयो. 75/33 
पुत्रैदसिश्च भृत्यैश्व स्वगृहे परिवारितः। 

स एको मृष्टमश्नातु यस्यायेज्नुमते गतः।। अयो. 75/34 
अयो. 75/35 

अयो. 75/36 

अयो. 75237 

अयो. 75/38 

अयो. 75/39 

अयो. 75/40 

4763 

75/42 

75/44/45 


220 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





90. 


9. 


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99. 


«.. 75/46 

.. 75/47 

. 75/48 

'.. 75/50 

.. 75/57 

.. 75/52 

).. 75/53 

- ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः। 

बालवंत्सां च गां दोग्धु यस्या्योज्नुमते गतः।॥। अयो. 75/54 
धर्मदारान्‌ परित्यज्य परदारान्‌ निषेवताम्‌। 

त्यक्त धर्मरतिमूढ़ो यस्यार्योचनुमते गतः ॥॥ अयो. 75/55 

अयो. 75/56 

अयो. 75/57 

अयो. 75/58 

द्रवोत्तरभोजनस्तु शब्यां नातिसेवेत्‌ ।। अ.सं.सू. 0/59 
यानप्लवनवाहनाग्न्यातपांश्च भुक्तवान्वर्जयेत्‌ ।। अ.सं.सू. 0/60 
धर्मोत्तिराभिरथथ्याभि: कथाभिम्निगुणात्मभिः । 

मध्यं दिनस्य गमयेदिष्टशिष्टसहायवानू ।। अ.सं.सू. 3/8 

.. रात्रौ तु भोजन कुर्यात्‌ प्रथम प्रहरान्तरे। 

किचित्‌ ऊन॑ समश्नीयात्‌ दुर्जरंतम्‌ वर्जयेत्‌ ।॥ भाएप्र0पूएख0 4/274 
युक्‍तोपधान स्वास्तीर्ण विस्तीर्णाविषम्‌ सुखम्‌।। अ.सं.सू. स्था0 3/शा 
जानु तुल्यं मृदु शुभं सेवेत शयनासनम्‌। अ.सं.सू. स्था0 3/22 
तच्छुत्वा निपु्ण सर्व भरतः सह मन्त्रिभिः। 

इज्कुदी मूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत ।! अयो. 88/ 

अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः। हि 

शर्वरी शयितां भूमाविदमस्य विमर्दितम्‌ ।। अयो. 88/2 
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये। 

शयित्वा पुरुष व्याप्रः कथं शेते महीतले ।। अयो. 88/4 

इय॑ शैया मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम्‌। ग 
स्थण्डिले कठिने सर्व गात्रैविमूदितं तृणम्‌ ।॥ अयो. 88/5 
अराध्यस्तरणोपेतां रक्षोइईधिपनिषेविताम्‌। सु. 9/27 

अवेक्षमाणो हनुमान्‌ ददर्श शयनासनम्‌।। सु. 0/ 

दान्तकाज्वन चित्राइगैवेंट्यैश्व वरासनैः। महाहास्तिरणोपेतैरूपपन्नं महाधनैः।। सु. 0/2 
.. सु. 0/3 


00. जातरूप्रपरिक्षिप्तं चित्रमानोः समप्रभमू। अशोक मालाविततं ददर्श परमासनमू।। सु. 70/4 


0: 


॥. वालव्यंजन हस्ताभिववीज्यमानं समन्ततः। 
शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 22 


402. 


03. 
04. 


05. 


306. 
407. 
08. 
09. 


0. 


वा. 


2. 
]3. 


34. 


प5. 


गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम्‌।॥। सु. 0/5 
परमास्तरणास्तीर्ण माविकाजिन संबृतम्‌। 

दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम्‌ ।। सु. 0/6 

भास्वरे शयने वीरें प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्‌ ।। सु. 0/7 

साय॑ भुकत्वा लघु हित॑ समाहित मनाः शुचिः। 
शास्तारमनुसंस्मृत्य स्वचयाँ चा्थं संविशेत्‌ ।। अ.सं.सू, 3/20 
देशे शुचावनाकीर्ण द्वित्राप्तपरिचारकः। अ.सं-सू. 30श 
प्राग्दक्षिणशिराः पादवकुर्बाणो गुरुन प्रति।। अ.सं.सू. 3/22 
पूर्वापरनिशा भागे धर्म मेवानुचिन्तयेत्‌। 

छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णों मेहपीनस कासजित्‌ू। 
सुरासवस्तीक्षणमदः स्वादुस्तीक्ष्णोड्निलापहः ।। अ.सं.सू, 6/80 
मैरेयो मधुरो वृष्यः सरः सन्तर्पणों गुरु:। 

धातक्यभिषुत्नो जीर्णो रुक्षो रोचनदीपनः। अ.सं.सू, 603 
द्राक्षासवों मधुसमः परम स तु दीपनं:। 

मार्दीकसदृशः प्रोक्तो मृद्वीकेक्षुससासवः ।। अ.सं.सू. 6/82 
इक्षून्‌ मधूंस्तथा लाजानू मैरेयांश्च व॒रासवान्‌। 

पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचनपि ।। बा. 53/2 
पानभूमिगतंहित्वा हैममासव॑ भाजनम्‌।॥। सु. /23 
मध्वासवकृतक्लेदं मणिभाजनसंकुलम्‌। सु. 6/42 
शर्करासव गन्धः स प्रकृत्या सुरभिः सुखः। 

तासां वदन्‌ निःश्वासः सिषेवे रावणं तदा।। सु. 9/56 
शर्करासवमाध्वीकाः पुष्पासवफलासवाः। 

वासचूर्णैश्च विविधैर्मुष्टास्तैस्तेः पृथक्‌ पृथक्‌ ।। सु. /23 
दीपनं रोचनं मय तीक्ष्णोष्णं तुष्टिपुष्टिदमू । 

सस्वादुतिक्त कटुकमम्लपाकरसं सरम्‌।। अ.सं.सू. 6/5 
सकषायं स्वरारोग्य प्रतिभावर्ण कृल्लघु। 
नष्टनिद्रातिनिद्रेभ्यो हित पित्तास्रदूषणम्‌ ।। अ.सं.सू, 6/6 
कृतस्थूलाहितं रुक्षं सूक्ष्म स्नोतोविशोधनम्‌। 

बातश्लेष्महरं युक्‍त्या पीत॑ विषवदन्‍्यथा।। अ.सं.सू, 6/7 
गुरु तदूदोषजननं नवं जीर्णमतोउन्यथा। 

पेय नोष्णोपचारेण न विरिक्तश्षुधातुरैः ।। अ.सं.सू. 6/8 
नातितीक्ष्णमृदुस्वच्छघनं व्यापन्न मेव वा। 

सती त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसती सतीमू। 

रूपिणीं विषसंयुक्‍तां पीत्वेव मदिरां नरः।। अयो. 2/76 
मत्तोज्यमिति मा मंस्था यद्यभीतो5ुसि संयुगे। 

मदो5्यं सम्प्रहारेौस्मिन्‌ वीरपानं समर्थ्यताम्‌ ।। कि. /38 


222 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


प6. 


97. 


8. 


39. 


20. 


इश. 
22. 


2. 


424. 


 तस्मिज्जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोज्ज्वल कुण्डलमू । 
लोहिताक्ष॑ं महाबाहुं महारजतवाससम्‌ ।। सु. 0/7 
लोहितेनानुलिप्ताइं चन्दनेन सुगन्धिना। 
सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतडिद्गुणम्‌।। सु. 0/8 
वृतमाभरणैर्दिव्यै: सुरूपं कामरूपिणम्‌। 
सवृक्ष वन गुल्माढयं प्रसुप्तमिव मन्दरम्‌।। सु. 0/9 
क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्‌। 
प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्‌।। सु. 0/0 
पीत्वाप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः। 
भास्वरे शयने वीरें प्रसुप्तं राक्षताधिपम्‌ ।। सु. 0/) 
चूतपुंनागसुरभिर्बुकलोत्तमसंयुतः। 
मृष्टान्नरस संयुक्त: पानंगन्धपुर: सरः।। सु. 0/23 
तस्य राक्षसराजस्य निश्चक्राम महामुखात। 
शयानस्य वि निः श्वासः पूरयन्निव तदूगृहम्‌ ।। सु. 0/24 
पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मन:। 
प्रत्नीः स॒ प्रियभार्यस्य तस्य रक्षः पत्ेगृहे ।। सु. 0/30 
मदव्यायामखिन्नास्ता राक्षसेन्द्रस्य योषितः। 
तेषु तेष्ववकाशेषु प्रसुप्तास्तनुमध्यमाः।। सु. 0/35 
काचिदाडम्बरं नारी भुजसम्भोगपीड़ितम्‌। ड 
कृत्वा कमलपत्ाक्षी प्रसुप्ता मदमोहिता ।। सु. 0/45 
चंक्षुष्यं छेदितृट्श्लेष्मविषहिध्माउस्रपित्तनुत्‌ । 
कुष्ठमेह कृमिच्छर्दि श्वासकासातिसाराजितू।। अ.सं.सू. 6/9 
व्रणशोधनसन्धानरोपणं वातलं मधु। 
रुक्षं कषायमधुरं कतुल्या मधुशर्करा ।। अ.सं-सू. 6/92 
उष्णमुष्णा्तमुष्णे च युक्त चोष्णैर्निहन्ति तत्‌। 
विषान्वयत्वेन विष पुष्पेभ्योषपि यतो मधु: ।। अ.सं.सू. 6/93 
कुर्वते ते स्वयं यच्च सविषा भ्रमरादयः। 
प्रच्छ्दने निरुहे च मधूष्णं न निवार्यते ।। अ.सं.सू. 6/94 
अलब्धपाकमाश्वेव तयोर्यस्मानिवर्त्तते। 
गुरुरुक्षकषायत्वाच्छैत्याच्चाल्पं हितं मधु ।। अ.सं.सू. 6/95 
नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु। 
वृष्ययोगैरतो युक्त वृषतामनुवर्तते ।। अ.सं.सू. 6/97 
श्रामरं पैत्तिक॑ क्षौद्रं माक्षिकं च यथोतरम्‌ । 
वरं जीर्ण च तेष्वन्त्ये द्वे एव ह्युपयोजयेत्‌। अ.सं.सू. 6/98 
- स प्रविष्टो मधुवनं ददर्श हरियूथपान्‌। 

विमदानुद्धतान सर्वान्‌ मेहमानान्‌ मधूदकम्‌।। सु. 64/4 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री ४ 223 


25. एकोऊहं भक्षयिष्यामि तां सर्वां हरिवाहिनीमू। 

स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिल्ताः पिबन्तु मधु वारुणीम्‌।। यु. 8/23 
26. निघन्न्‌ मृगान्‌ कुज्जरांश्च पिबंश्चारण्यक॑ मधु। 

नदीश्च विविधाः पश्यन्‌ न राज्यं संस्मरिष्यति।। अयो. 36/6 
24. पश्य द्रोण प्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण। 

मधूनि मधुकारीभिः सम्भूतानि नगे नगे।। अयो. 56/8 
28. सुरां सुरापा: पिबत पायसं च बुभुक्षिताः। 

मासांनि च सुमेध्यानि भक्ष्यन्तां यो यदिच्छति ।। अयो. 9/52 
29. वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टामांसचयैर्वृताः। अयो. 9/70 
30. मत्तोज्यमिति मां मंत्वा यद्यभीतोषुसि संयुगे। 
मदोज्यं सम्प्रहारेष॥स्मिन्‌ वीरपानं समर्थ्यताम्‌ू ।। कि. /38 
कि. 26/23, 33/45, 4/33, 50/32, 34, 67/45, सु. /23, 5/7, 6/42, 
0/23, /4, 20, 32, 36/4] ...... 


तृतीय परिच्छेद 


. ऋतौ ऋतौ चर्या। ऋतुचर्या। ऋतु: काल विभाग:। 
चरधार्तोर्गति भक्षणार्थस्य चर्यामिति रूपमू, तेन आहारो विहारश्च चर्य शब्देनोच्यते। 
अन्ये ......... चर्या शास्त्र नियमित आचारः, ऋतुषु ऋतुनाम्‌ वा चर्या ऋतुचर्या, 
ऋतुचर्यार्थज्ध्यायः ऋतुचर्या (डल्हड़) अ.सं.सू. अ. 4 

2. धूम्रधूम्रा रजोमन्दास्तुषाराविलमण्डलाः-। दिगादित्या मरुच्छैत्यादुतरो रोमहर्षणः ।। 9।। 
रोध्र प्रियड्डु पुन्नागलवल्यः कुसुमोज्ज्वलाः। दृष्ता गजाजमहिष वाजि वायस सूकराः।। 0 
हिमानी पटलच्छनना जल नमीन विहड्गमाः। 
नद्यः सवाष्पा: सोष्माण: कूपापश्च हिमागमे ।। ॥। अ.सं.सू. 4/9, 0, ॥7 

3. देहोष्साणो विशन्तोडन्तः शीते शीतानिलाहता:। 2॥। जठरे पिण्डितोष्माणं प्रबलं 
कुर्वतेडनलं ।। 
विसर्गे बलिनां प्रायः स्वभावादि गुरु क्षमम्‌। 5।। बृहंणान्यन्नपानानि योजयेत्तस्य 


युक्तये।। 
अनिन्‍्धनोष्न्यथा सीदेदत्युदीर्णतयाउथवा । 4 । | धातूनपि पचेदश्य तत्तेषां क्षयान्मरुत्‌।। 


33. 





4. अतो हिमे भजेत्स्निग्धान्स्वादम्ललवणान्‌ रसानू | 5 ॥। 
विलेशयौदकानूप्रसहानां भूतानि च। 
मांसानि गुडपिष्टोत्थमद्यान्यभिनवानि च।। 6।। 
माषेक्षुक्षीर विकृति वसा तैलनवोदनानू। 
व्यायामोद्धर्तनाभ्यज्ञ स्वेद धूमाउजनातपान्‌ ।। 7 । अ.सं.सू. 4/5, 6, ॥7 
5... सुखोदकम्‌ शौचविधौ भूमि गर्भगृहाणि च। 
सज्ञरयानां शय्या च कुथकम्बलसंस्कृताम्‌।। 8॥॥ 


224 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


१0. 


व. 
2. 
3. 


4. 
.. ज्योत्सना तुषारमलिना पौर्णमास्यां न राजते। 


86. 
॥8& 
8. 
॥9. 


20. 


कुड्डुमेनानुदिग्धाज्लोउगुरुणा गुरुणाउपि वा। 

लघूष्णेः प्रावृतः स्वप्यात्काले धूपाधिवासितः।। 9।। 

पीनाइसंसर्ग निवारितहिमानिलः। आ.सं.सू, 4/8, 9, 20 
वर्जयेत्‌ अन्नपानानि वातलानि लघूनि च। 

प्रवात॑ प्रमिताउछ्हारं उदमन्थं हिमागमे।। च.सू. 6/8, अ.सं.सू. 4 
सोऊपि वेलामिमां नूनमभिषेकार्थमुद्यतः । 

बृतः प्रकृतिभिनित्यं प्रयाति सरयूं नदीम्‌ू।॥ अर. 6/29 ५ 
अत्यन्त सुखसंवृद्धः सुकुमारो हिमार्दित:। 

कथं त्वपररात्रेषु सरयूमवगाहते ।। अर. 6/30 

तर्पयित्वाथ सलिलैस्तैः पितृन्‌ दैवतानापि। 

स्तुवन्ति स्मोदितं सूर्य देवताश्च तथानद्या:।। अर. 6/42 

नीहार परुषो लोकः पृथिवी सस्यमालिनी।! 

जलान्यनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः।। अर. 6/5 


प्राज्यकामा जनपदः सम्पन्नतरगोरसा:। 

बिचरन्ति महीपाला यात्रार्थ विजिगीषवः।। अर. 6/7 
सेवमाने दृढ़ं सूर्य दिशमन्तकसेविताम्‌। 

विहीनतिलकेव स्त्री नोत्तरादिक्प्रकाशते ।। अर. 6/8 
मयूरवैरूपसर्पदूभिर्हिमनीहारसंवृतैः । 


दूरमभ्युदितः सूर्यः शशाडूइव लक्ष्यते। अर. 6/8 

अत्यन्त सुख संचारा मध्यान्हे स्पर्शतः सुखाः। 

दिवसाः सुभगादित्याश्छाया सलिलदुर्भगा:।। अर. 6/0 
मृदुसूर्या: सुनीहारा: पटुशीताः समारुता:। 

शून्यारण्या हिमध्वस्ता दिवसा भान्ति साम्प्रतम्‌।। अर. 6/] 
अर. 6/3 


सीतेव चातपश्यामा लक्ष्यते न च शोभते।। अर. 6/4 
प्रकृत्या शीतलस्पर्शों हिमविद्धश्च साम्प्रतम्‌। 

प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्विगुणशीतलः ॥। अर: 6/5 
अवश्याय निपातेन किंचित्रक्लिन्नशादूवला | 

वबनानां शोभते भूमिनिर्विष्टतरूणातपा:।। अर. 6/20 
निवृत्ताकाशशयनाः पुष्यनीता हिमरूणा:। 

शीत वृद्धतरायामास्त्रियामा यान्ति साम्प्रतम्‌।। अर. 6/2 
प्रकृत्याहिमकोशाढदयो दूरसूर्यश्च साम्प्रतम । 

यथार्थनामा सुव्यक्तं हिमवान्‌ हिमवान्‌ गिरिः।। अर. 6/9 
शिशिरेशीतमधिक मेघमारुतवर्षजम्‌ ।। 

रोक्ष्यं चादानजं तत्मात्कार्यः पूर्वोद्धिकं विधि। अ.सं.सू, 4/20 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री. / 225 


2. 


22. 


23. 


24. 


ड5. 


श्ः 


28. 


वसन्ते दक्षिणो वायुराताम्र किरणो रविः॥। अ.सं.सू. 4/श 
नवप्रवालत्वक्पत्राः पादपाः कुकुभोज्मला:। 
किंशुकाशोकचूतादि वनराजिविराजिताः।। अ.सं.सू. 4/22 
कोकिलालिकुलालापकलकोलाहलाकुलाः । 

शिशिरि संचितः श्लेष्मा दिनकृदूभाभिरीरितः ।। अ.सं.सू, 4/23 
तदा प्रबाधमानोऊ॑ग्निं रोगान्प्रकुरुते बहून्‌। 

अतोऊस्मिस्तीक्ष्ण वमनधूमगण्डूषनावनम्‌ ।। अ.सं.सू. 4/24 
व्यायामोद्धर्तनक्षौद्रयवगोधूमजाब्ु लानू। 

सेवेत सुहदुद्यानयुवतीश्च मनोरमाः ॥॥ अ.सं.सू. 4/25 

स्नातः स्वलंकृतः स्रग्वी चन्दनागुरूषितः। 
विचित्रामत्रविन्यस्तान्‌ सहकारोत्पलाइ्डितानू ।। अ.सं.सू. 4/26 
निर्गदांश्चासवारिष्ट सीधुमाद्वीकमाधवानू 

क्वथितं मुस्तशुव्यम्बु साराम्भ: क्षैद्रवारि वा।। अ.सं.सू. 4/27 
गुरुशीतदिवास्वप्नस्निग्धाम्लमघुरांस्त्यजेत्‌ । 

मां हि शोक समाकान्तं संतापयति मन्‍्मथः। 

हृष्टं प्रवदमानश्व समाहयति कोकिलः।। कि. /23 
अशोकस्तरबकाज्ञारः षट्पदस्वननिः स्वनः।। कि. /29 

मां हि पल्‍लवतामर्चिवसन्ताग्निः प्रधक्ष्यति। 
मन्मथायाससम्भूतो वसन्तगुणवर्धितः।। कि. /32 

अयं मां धक्ष्यति क्षिप्रं शोकाग्निर्नचिरादिव । 


. नूनं न तु वसन्तस्तं देश स्पृशति यत्र सा। 


कथं ह्यसितपदूमाक्षी वर्तयेत्‌ (सा मया विना।। कि. /48 
्रीष्मेउतसीपुष्पनिमस्तीक्ष्णां शुर्दावदीपिता: ।। अ.सं.सू. 4/28 
दिशो ज्वलन्ति भूमिश्व मारुतो नैऋतः सुखः। 
पवनातपसंस्वैदर्जन्तवो ज्वरिता इवं।। अ.सं.सू. 4/29 
तापार्ततुड्गमातडूग महिषैः कलुषीकृताः। दिवाकरकराज्ञारनिकरक्षपिताम्भसः ।। असं.सू, 4/30 
प्रबृद्धशोधसो नद्यश्छायाहीना महीरुहाः। 

विशीर्णजीर्णपर्णश्च शुष्कबल्कलताइकिता: ।। अ.सं.सू. 4/3) 
आदत्ते जगतः स्नेहांस्तददित्यों भृशं यतः। 
व्यायामातपकट्वम्ललवणोष्णं व्यजेदतः।। अ. सं. सू. 4/32 
मद्यं न सेव्यं स्वल्पं वा सेव्यं सुबहु वारि वा। 

अन्यथा शोष शैथिल्यदाह मोहान्करोति तत्‌॥। 33 
नवमृदभाजनस्थानि हद्यानि सुरभीणि च। 


. पानकानि समन्थानि सिताद्यानि हिमानि च।। 34 


स्वादु शीतं द्रवं चान्‍न॑ जाइगलान्मृगपक्षिण:। 
शालिक्षीरघृतद्राक्षानारिकेराम्बुशर्कराः ।। 35 


226 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


29. 


30. 


0 


39. 


33. 


34. 


35. 


तालवृन्तानिलानू हारान्‌ स्रजःसकमलोत्यलाः। 
तन्वीमृणालवलयाः कान्ताश्चन्दनरुषिता:।। 36 
सरांसिवापी: सरितः काननानि हिमानि च। 

सुरभीणि निषेवेत वासांसि सुलघूनि च।। 37 
निष्पतद्यन्त्र सलिले स्वप्याद्‌ धारा गृहे दिवा। 

रात्री चाकाशतलके सुगन्धि कुसुमास्वृते ।। 38 ' 
कर्पूरचन्दनाद्रज्ञि विरलानइसइ्मः। अ. सं. सू. 4८32, 33..39 
सौमित्रे शोभते पम्पा वैदूर्यविमलोदका। 
'फुल्लपद्मोत्पलवती शोभिता विवषैद्रैमैः।। कि. /3 
शोकार्तस्यपि मे पम्पा शोभते चित्रकानना। 

व्यवकीर्णा बहुविधैः पुष्पैः शीतोदका शिवा ।। कि. /6 
अधिक प्रविभात्येतन्‍्नीलपीतं तु शाद्लम्‌। 

द्वुमाणां विविधीः पुष्पैः परिस्तोमैरिवार्पितमं । कि. /8 
सुखानिलोज्यं सौमित्रे काल: प्रचुरमन्मथः। 

गन्धवान्‌ सुरभिर्सासो जातपुष्पफलद्गुमः ।। कि. /0 
स एव सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतलः। 
गन्धमभ्यवहनू पुण्यं श्रमापनयनोडनिल: ।। कि. /7 


वर्षासुवारुणो वायुः सर्वसस्यसमुद्गमः।॥। अ. सं. सू. 4/39 
भिननेन्द्र नीलनीलाभ्रवृन्दमन्दाविलं नभः। 

दीर्घिका नववायौघमग्नसोपानपड़्क्तयः ।॥ अ. सं. सू. 4/40 
वारिधाराभृशाघातविकासित सरोरुहा:। 

सरितः सागराकारा भूरव्यक्त जल स्थला।। अ. सं. सू. 4/4॥ 
मन्द्रस्तनित जीमूतशिखिदर्दुरनादिता। 


इन्द्रगोपधनुः खण्डविद्युदुद्योतदीपिता । अ. सं. सू. 4/42 
परितः श्यामलतृणा शिलीन्ध्रकुटजोज्वला | 
तदाउध्दानाबले देहे मन्देउग्नौ बाधिते पुनः ।। अ. सं. सू. 4/45 
वृष्टिभूवाष्पतोयाम्लपाकदुष्टैश्चलादिभिः। 
बस्तिकर्म निषेवेत कृतसंशोधनक्रम: ।। 44 ।। 
पुराणशालि गोधूमयवान्‌ यूषरसैः कृतैः। 

निर्गदं मदिरारिष्टमाद्धीकं स्वल्पमम्बु वा।। 45 ॥॥ 
दिव्यं क्वथितकपोत्यं चौण्डयं सारसमेव वा। 
वृष्टिवाताकुले त्वहनि भोजन क्लेदवातजित्‌।। 46 ।॥॥ 
परिशुष्क॑ लघु स्निग्धमुष्णाम्ललवणं भजेतू। 

प्रायोन्‍नपानं सक्षौद्रं संस्कृत च घनोदये ।। 47 ।। 
असरीसूपभूवाष्पशीतमारुतशीकरम्‌ । 

सन्नियानं च भवन निदर्शमशकोन्दुरम्‌ू।। 48 ।। 


शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 227 


प्रधर्षोद्दर्तनस्नान धूमगन्धागुरुप्रियः । 
यायात्करेणु मुख्याभिश्चित्रस्त्रग्वस्त्रभूषित: ।। 49 ।। 
नदीजलोदमन्थाह: स्वप्नातिद्रवमैथुनम्‌ । 
तुषारपादचरणव्यायामार्ककरांस्त्यजेत्‌ ।। 50 ।। 
36. अयं सकालः सम्प्राप्त: समयोज्य जलागमः। 
सम्पश्य त्वं नमो मेपैः संवृतं गिरिसंनिभैः।। कि. 28/2 
37. नवमास धृतं गर्भ भासकरस्य गर्भस्तिभि:। 
पीत्वा रसं समुद्राणां दयौः प्रसूते रसायनमू ।। कि. 28/3 
38. एष फुल्लार्जुनः शैलः केतकैरभि वासितः। 
सुग्रीव इव शान्तारिधाराभिरभिषिच्यते ।। कि. 28/9 
*५ 39. मासि प्रौष्ठपदे ब्रह्म ब्रह्मणानां विवक्षताम्‌। 
अयमाध्याय समयः सामगानामुपस्थितः।। कि. 28/54 
40. विवृतकर्मायतनो नूनं संचित संचयः। 
आषादीमभ्युपगतो भरतः कोसलाधिप ।। कि. 28/55 
47. शरदि व्यौमशुश्राञ्न॑ कित्रिचत्पड्काडकिता मही। 
प्रकाशकाश सप्ताह्कुमुदा शालिशालिनी ।। अ. सं. सू. 4/50 


विक्षिप्त तीक्ष्ण किरणो मेघौघविगमाद्रवि: | 

बश्रुवर्णोज्ति विमलाः क्रौंचमालाकुला दिशः।। अ. सं. सू. 4/57 
कमलान्तरसल्लीनमीनहंसांसघट्टनैः । 

तरज्जभड्तुज्ञानि सरसि विमलानि च।। अ. सं. सू. 4/52 
वर्षशीतोचिताझ्ञनां स सैवार्करश्मिभिः। 


तप्तानां संचितं पूर्व तदा पित्त प्रकुप्पति || 53 ।॥ 

42. शस्तं तिक्त हविः पान विरेकोडस़सुतिः सदा। 
शीतं लघ्वन्नपानं च कषायस्वादु तिकतकम्‌।। अ. सं. सु, 4/54 
शालिषाष्टिक गोधूमयवमुद्गसितामधु |. 
पटोलामलक्‌ द्राक्षा जाइलं क्षुद्‌वतां भूशम्‌ ।। अ. सं. सू, 4/55 
दिवादिवाकर करैर्निशाकर करै निशि। 
सन्तप्तं हलादितं तोयमगस्तेनाविषीकृतम्‌ ।। 56 ।। 
निर्मलं शुचि कालेन पक्‍क॑ पानेउमृतोपमम्‌। 
हंसौघपक्ष विक्षेप भ्रममद्‌ भ्रमरपड्क्तिषु ।। 57 ।॥। 
सुसरोरुहसेव्यासु सरसीषु पलवेत च। 
लघु शुद्धाम्बरस्रग्वी शीतोशीरविलेपन: ।। 58 ।। 
सेवेत चन्द्रकिरणान्‌ प्रदोषे सौधमाश्नितः। 

कै तृप्तिदध्यात्‌ पक्षारवसातैल पुरोषनिलान ।। 59 ।। 

तीक्ष्ण मद्य दिवास्वप्नतुषारांश्च विवर्जयेत्‌ । 

43. पाण्डुरं गगन दृष्टवा विमल॑ चन्द्रमण्डलम्‌। 


228 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


44. 


45. 


46. 


47. 


48. 


शारदीं रजनीं चैव दृष्ट्वा ज्योत्स्नानुलेपनाम्‌ ।। कि. 30/2 

आसीनः पर्वतस्याग्रे हेमधातुविभूषिते । 

शारद॑ गगन दृष्ट्वा जगाम मनसा प्रियाम्‌।। कि. 30/6 

अयं हिया संद्वियते समाधिः। 

किमत्र योगेन निवर्तते न ।। कि. 30/6 

क्रियाभियोगं मनसः प्रसादं, समाधियोगानुगतं च कालम्‌। 
सहायसामर्थ्य मदनिसत्वः, स्वकर्महितुम्‌ च कुरुष्व तातः।। कि. 30/7 
रात्रि: शशाडूकोदित सौम्यवक्त्रा तारागणोन्मीलित चारुनेत्रा। 

ज्योत्स्नां शुकप्रावरणा विभाति। नारीवं शुक्लांशुक्रसंवृताज्ञी ।। कि. 30/46 
जल प्रसन्‍न॑ कुसुम प्रहासं क्रौज्वस्वनं शालिवनं विपक्कमू। 

मृदुश्च॒ वायुर्विमलश्च चन्द्र: शंसन्ति वर्षव्यपनीतकालम्‌।। कि. 30/58 


शरीर शुद्धि एवं बैयक्तिक स्वस्थवृत की सामग्री / 229 


चतुर्थ परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं 
द्रव्य गुण शास्त्र की सामग्री 





औषधार्थ प्रयुक्त होने वाली सभी वस्तुओं को आयुर्वेद में द्रव्य माना गया है। 
इस प्रकार जगत में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो द्रव्य होकर औषध रूप में न 
हो | सभी द्रव्य पञ्चभौतिक हैं। द्रव्यों का आश्रय स्थान (अधिष्ठान) पृथ्वी और 
उत्पत्ति स्थान उदक है। आकाश, वायु और अग्नि समवाय रूप से रहकर द्रव्य के 
अभिनिवृत्ति. एवं विशेष असादृश्य में कारण होते हैं। यद्यपि सभी द्रव्य पज्चा 
भौतिक हैं तथापि जिस द्रव्य में जिस भूत की प्रधानता रहती है, उसी भूत की 
प्रधानता से उसे पार्थिव, आप्य, तैजस, वायव्य एवं आकाशीय कहते हैं ।! इनमें 
जिह्ा के साथ द्रव्य का संयोग होने पर जो स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है वह रस 
है! 

प्रथम परिच्छेद॒ 
भौतिक एवं प्राकृतिक औषधियाँ 

इस समुदाय के अन्तर्गत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, मेघ, सूर्य, चन्द्र आदि का 
समावेश किया जाता है। 
पृथ्वी 

पृथ्वी सभी की जननी है। अतः उससे उत्पन्न सभी द्रव्य औषधि रूप में प्रयोग 
किये जाते हैं। रामायण में अनेक स्थलों पर पृथ्वी का उल्लेख किया जाता है। 
यथा- 

जब महादेव ने पूछा कि उनके स्खलित तेज को कौन धारण करेगा, तब देवों 
ने इनका नाम बताया।' महादेव के तेज से पर्वत और वनों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी 
व्याप्त हो गयी # उमा ने पृथ्वी को बहुतों की भार्या तथा निःसंतान होने का श्राप 
दिया * सगर के 60,000 पुत्रों ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर यज्ञ-अश्व को ढूंढ़ने का आदेश 
दिया।' 

राजा सगर के पुत्रों के विभिन्‍न आयुधों से अत्यन्त अस्त होकर ये आर्तनाद 
करने लगी # यह विष्णु की महिषी हैं # राजा दशस्थ के शपथ पूर्वक वर देने की 
प्रतिज्ञा करने पर कैकेई ने साक्षी रहने के लिये इनका भी आवाहून किया ॥ राम 
के वनवांस के समय उनकी रक्षा करने के लिये कौशल्या ने इनका भी आवाहून 
किया।” राम ने कहा कि यशस्विनी पृथ्वी ने उनका प्रिय करने के लिये ही 
जानकी के केश से गिरे पुष्पों को सुरक्षित रखा है।” 

230 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


शपथ ग्रहण करते समय सीता ने इनसे अपने भीतर स्थान देने की स्तुति 
की |” उस समय यह एक ऐसे सुन्दर सिंहासन पर आरुढ़ होकर राम की सभा में 
प्रकट हुई जिसे नागों ने धारण कर रखा था और सीता को लेकर रसातल में प्रवेश 
कर गयीं |! जब श्री राम परम धाम जाने लगे तो ये भी उनके साथ-साथ चलीं। 

आज का सभ्य मनुष्य पृथ्वी से दूर होता जा रहा है इसीलिये वह पहले की 
अपेक्षा अधिक चिन्तित और दुःखी है। हम प्रथ्वी को धरती माता कहकर पुकारते 
हैं। जो चीजें हम खाते-पीते हैं या प्रयोग करते हैं, वे सब धरती से ही आती हैं। 
फलों और सब्जियों के विटामिन व खनिज लवण भी मिट्टी से ही आते हैं इसी 
से यह मानना पड़ता है कि मिट्टी में सर्व प्रकार के गुण हैं। : 

यद्यपि रामायण में औषधि के रूप में पृथ्वी का उल्लेख नहीं है तथापि इसके 
अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। 
जल ४ 
“प्राकृतिक चिकित्सा” के अन्तर्गत जल का विशेष महत्त्व है। जल द्वारा 
चिकित्सा का विशेष-विधान बताया गया है। 

रामायण में जल के विविध रूपों का वर्णन होता है यथा- 
- समुद्र का खारा जल। 
2- नदी का जल। 
$- चन्दन मिश्रित जल। 
4- सामान्य जल। 
5- तीर्थों का जल, आदि। 

रामायण में जल को चिकित्सार्थ भी प्रयोग में लाने का उल्लेख मिलता है। 
जैसे-उग्र-शोक के कारण जब मनुष्य मूच्छित हो जाता है तब उसके उपचार के 
लिये शीतल जल का छिड़कना, उत्पल, उशीर, अगर, अथवा चन्दन के ठण्डे जल 
से स्नान कराना या मुख तथा मस्तक धोना रामायण में निर्दिष्ट है। 

श्री राम कहते हैं-“सौम्य पवन कुमार ! जैसे बेहोश हुए मनुष्य को होश में 
लाने के लिये उस पर जल के छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेह नन्दिनी सीता 
ने मूच्छित हुए से मुझ राम को अपने वाक्य रूपी शीतल जल से सींचते हुए 
क्या-क्या कहा है ? यह बार-बार बताओ[”?5 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में जल को एक औषधि के रूप में भी 
व्यवहार में लाया गया है। 
अग्नि 

अग्नि को भी चिकित्सा कार्य में प्रयोग में लाने के कारण औषधि माना गया 
है। रामायण में अनेक स्थलों पर अग्नि का उल्लेख किया गया है-संक्षेप में उसकी 
प्रस्तुति निम्नवत्‌ है। 

ब्रह्मा की इच्छा से उन्होंने नील को उत्पन्न किया।' जब बलि ने समस्त 
देवताओं को पराजित कर दिया तब वे विष्णु की सेवा में उपस्थित हुए!” देवताओं 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 23 


के निवेदन पर इन्होंने महादेव के तेज को अपने भीतर रख लिया ।* जब महादेव 
तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये 
सेनापति की इच्छा लेकर ब्रह्मा के समीप गये और उन्हें प्रणाम करके अपना 
मनोरथ कहा |” ब्रह्मा ने कहा कि शंकर के तेज को उमा की बड़ी बहन आकाश 
गंगा के गर्भ में स्थापित करके अग्निदेव ऐसे पुत्र को जन्म देंगे जो देवताओं का 
समर्थ सेनापति होगा ।” ब्रह्मा के इस प्रंकार कहने पर सम्पूर्ण देवताओं ने अग्निदेव 
को पुत्र उत्पन्न करने के कार्य पर नियुक्त और उनसे रुद्र के महान तेज को गंगा 
में स्थापित करने का निवेदन किया।” देवताओं को अपनी सहमति देने के 
पश्चात्‌ अग्नि (पावक) ने गंगा के निकट आकर उनसे गर्भ धारण करने के लिये 
कहा ।/ “अग्नि की बात सुनकर गंगा ने दिव्य रूप धारण कर लिया। उस रूप 
की महिमा को देखकर अग्नि ने गंगा को सब ओर से उस रुद्र तेज द्वारा 
अभिषिक्त कर दिया जिससे गंगा के स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये ।”” 

तदुपरान्त गंगा ने तेज को धारण करने में अग्नि से अपनी असमर्थता प्रकट 
की, किन्तु अग्नि के परामर्श से उस गर्भ को हिमवान पर्वत के पार्श्व भाग में 
स्थापित कर दिया ।* अग्नि सहित समस्त देवताओं ने मिलकर महातेजस्वी स्कन्द 
का देवसेनापति के पद पर अभिषेक किया।” अण्डकोश से रहित होकर इन्द्र 
अत्यन्त भयभीत हो गये और उसे पुनः प्राप्त करने के लिये उन्होंने अग्नि आदि 
देवताओं से प्रार्थना की“ इन्द्र का वचन सुनकर मरुतों सहित अग्नि आदि 
समस्त देवता पितृ-देवों के पास गये ।” जब विश्वामित्र वशिष्ठ पर ब्रह्मास्त्र से 
प्रहार करने के लिये उद्यत हुए तब अग्नि अत्यन्त भयभीत हो गये /* राम के 
वनवास गमन के समय उनकी रक्षा के लिये कोसलया ने अग्नि को आवाहन 
किया था ।” जब माण्डकर्णि ने एक जलाशय में रहकर केवल वायु का आहार 
करते हुए दस सहस्न वर्षो तक तपस्या की तो अग्नि आदि समस्त देवता अत्यन्त 
व्यथधित हो उठे और उनकी तपस्या में विष्न डालने के लिये पाँच अप्सराओं को 
भेजा |" श्री राम ने अगस्ताश्रम में स्थित अग्नि के मंदिर को देखा ।” राम के दूत 
के रूप में हनुमान के उपस्थित होने पर तर्क-वितर्क करती हुई सीता ने अन्य 
देवताओं सहित अग्नि को भी नमस्कार किया |” हनुमान की रक्षा के लिये सीता 
ने अग्नि का आवाहन किया ।* अग्नि ने कथन नामक बानर यूथपति को एक 
गन्धर्व-कन्या से उत्पन्न किया था।* सीता की अग्नि-परीक्षा के समय अग्नि 
देवता सीता को गोद में लेकर चिता से ऊपर उठे और राम को समर्पित करते हुए 
उसकी' पवित्रता को प्रमाणित किया। जिसके पश्चात्‌ राम ने सीता. को सहर्ष 
स्वीकार कर लिया।* लवणासुर का वध कर देने पर वर देने के लिये अग्निदेव 
शत्रुघ्न के सम्मुख उपस्थित हुए और वर देने के बाद ही अन्तर्ध्यान हो गये।” 
शम्बूक का वध कर देने पर अग्नि ने राम को धन्यवाद दिया ।* वृत्तासुर का वध. 
कर देने के पश्चात्‌ इन्द्र जब ब्रह्महत्या के भय से भाग गये तब अग्नि आदिं देवता 
विष्णु की स्तुति करने लगे। 


232 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


यद्यपि रामायण में अग्नि का औषधि के रूप में स्पष्ट रूप से प्रयोग नहीं 
किया गया है तथापि उपरोक्त उद्धरणों पर दृष्टिपात करने से इसका महत्त्व कम 
नहीं किया जा सकता। 
वायु 

वाल्मीकि रामायण में “वायु” का भी विविध सन्दभों में अनेक स्थलों पर प्रयोग 
किया गया है। सूक्ष्म अवलोकन के आधार पर प्रस्तुति निम्नवत्‌ है- 

इन्होंने कुशनाभ की 00 पुत्रियों को अपनी भार्या बन जाने के लिये कहा ।* 
कुशनाभ की पुत्रियों ने हंसते हुए अवहेलना पूर्वक इनके इस प्रस्ताव को 
अस्वीकार कर दिया ।“ इन्होंने कुपित होकर उनके शरीर में प्रविष्ट हो उनके अंगों 
को मोड़कर टेढ़ा कर दिया जिससे वे कुबड़ी हो गयीं |” कुब्जत्व को प्राप्त होकर 
कुशनाभ की पुत्रियों ने अपने पिता को अशुभ मार्ग का अवलम्बन करके 
बलात्कार करने की वायु की इच्छा को बताया (* ब्रह्मदत्त के साथ विवाह के समय 
उन कन्याओं के कुब्जत्व को इन्होंने दूर किया।* देवताओं ने अग्नि को इनके 
सहयोग से शिव का तेज धारण करने को कहा ।” इन्द्र ने दिति के गर्भ के जो 
सात डुकड़े कर दिये उनमें. से तीसरा दिव्य वायु के नाम से विख्यात हुआ ।* श्री 
राम के वनवास के समय उनकी रक्षा करने के लिये कौसल्या ने इनका आवाहन 
किया ।* श्री राम ने अगस्त्य के आश्रम पर इनके स्थान का दर्शन किया ।* श्री 
राम ने इनसे भी सीता का पता पूछा ।* मैनाक पर्वत ने बताया कि पूर्व काल में 
जब इन्द्र अपने वज़ से उसका पंख काट देना चाहते थे तो वायु देवता ने सहसा 
उसे समुद्र में गिरा दिया ।” वह भी रावण के भय से अशोक वाटिका में अधिक 
वेग से नहीं बहते थे ।* हनुमान ने अपनी सफलता के लिये इनकी स्तुति की” 
रावण को अपना परिचय देते हुए हनुमान ने अपने को इनका औरस पुत्र 
बताया।* सीता ने अग्नि में प्रवेश करते समय अपनी शुद्धता प्रमाणित करने के 
लिये इनका भी आवाहने किया ।* “जब इन्द्र के वज् प्रहार से आहत होकर इनके 
पुत्र हनुमान आहत हो गये तो क्रूद्ध होकर इन्होंने अपनी गति रोक दी। इनकी 
गति रुक जाने से पीड़ित होकर देवगण ब्रह्मा की शरण में आये। ब्रह्मा ने बताया 
कि इनके पुत्र पर वज़ प्रहार होने के कारण ही वे कुपित हैं। तदनन्तर इन्हें ही 
सुख और सम्पूर्ण जगत बताते हुए देवों के साथ ब्रह्मा इनके पास आये। उस समय 
इन्हें गोद में अपने पुत्र को लिये हुए देखकर ब्रह्मा सहित समस्त देवताओं को 
अत्यन्त दया आयी ।”* देवताओं ने इनके पुत्र हनुमान को जीवित करके वरदान 
दिये और उसके बाद ये हनुमान को लेकर अंजना के पास आये। 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि “वायु' 
स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त आवश्यक है तथा इसके बिना व्यक्ति का जीवित रहना 
असम्भव है। वायु पाँच प्रकार की होती है- 

प्राय, अपान,: उदान; . व्यान, समान। 

इन सबका रामायण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 233 


मेघ 

मेघ से तात्पर्य “बादल” से है अर्थात्‌ मेघ चिकित्सा कार्य में किस प्रकार 
सहायक है। रामायण में मेघ का उल्लेख तो अवश्य हुआ है किन्तु बादल के रूप 
में नहीं अपितु पर्वत के नाम के रूप में। मेघ एक पर्वत का नाम है जिसके उस 
पार 60,000 पर्वतों के बीच मेरु पर्वत स्थित था।* 


"सूर्य किरण-चिकित्सा” वर्तमान काल में एक विशेष चिकित्सा प्रणाली है। 
इसके अन्तर्गत विविध प्रकार से धूप-स्नान आदि के द्वारा चिकित्सा की जाती है। 

वाल्मीकि रामायण में सूर्य किरण द्वारा चिकित्सा का कहीं विशेष उल्लेख तो 
नहीं किया गया है किन्तु "सूर्य" का अनेकानेक स्थानों पर नामोल्लेख अवश्य 
मिलता है। यथा- 

सूर्य ने सुग्रीव को जन्म दिया।* श्री राम के वन-गमन के समय उनकी रक्षा 
के लिये कौसल्या ने इनका आवाहन किया ।” श्री राम ने अगस्त्य के आश्रम पर 
इनके स्थान का दर्शन किया ।* विश्वेदेव, वसु, मरूदगण आदि देवता सायंकाल के 
रामय मेरु पर्वत पर आकर इनका उपस्थान करते थे ।* हनुमान ने समुद्र लंघन 
के समय इनका स्मरण किया “ जब्र रावण से युद्ध करते हुए श्री राम थककर 
अत्यन्त चिन्तित हुए तो अगस्त मुनि ने इनके पास आकर उन्हें “आदित्य हृदय” 
नामक अत्यन्त गोपनीय स्त्रोत का जप करने के लिये कहा” अगस्त्य ने बताया 
कि सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित, नित्य उदय होने वाले, देवताओं और 
असुरों द्वारा नमस्कृत, विवस्वान्‌ प्रभा का विस्तार करने वाले और भुवनेश्वर हैं ।“ 
समस्त देवता सूर्य के ही स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत्‌ 
को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं"-और ये ही अपनी रश्मियों का प्रकाश 
करके देवताओं तथा असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं ।* अगस्त्य 
ने सूर्य की महिमा का विशद्‌ वर्णन किया है। अगस्त्य मुनि ने सूर्य का महत्त्व 
बताते हुए श्री राम को “आदित्य हृदय” का तीन बार जप करने का परामर्श 
दिया ।& मुनि का उपदेश सुकनर श्री राम ने प्रसन्‍न होकर शुद्ध चित्त से “आदित्य 
हृदय” को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की 
ओर देखते हुए उनका तीन बार जप किया ।* उस समय देवताओं के मध्य में खड़े 
हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्‍न होकर श्री राम की ओर देखा और रावण के विनाश 
का समय निकट जानकर उनसे शीघ्रता करने के लिये कहा।” 

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में सूर्यदेव का अनेक स्थलों पर 
वर्णन किया गया है। - 
चन्द्र 

वाल्मीकि रामायण में “चन्द्र” का भी चिकित्सकीय उल्लेख नहीं किया गया है 
तथापि इसका जो भी उल्लेख प्राप्त होता है, वह इस प्रकार है-चन्द्र का 
क्षीर-समुद्र से प्रादु्भाव हुआ था। इसे 'शीत रश्मिः निशाकरः कहा गया है।* यह 


234 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


आकाश-गंगा से 80,000 योजन ऊपर स्थित है जब रावण इसके निकट आया 
तो इसने अपनी शीताग्नि से उसका दहन कर दिया ।'" इसने राजसूय यज्ञ के द्वारा 
इस उच्च स्थान को प्राप्त किया।" 

इस प्रकार रामायण में चन्द्र का उल्लेख प्राप्त होता है। 


द्वितीय परिच्छेद 

वानस्पत्य औषधियाँ 
वाल्मीकि रामायण एक चिकित्सा ग्रन्थ नहीं है तथापि अनेकानेक 
वानस्पत्य-औषधियों का नामोल्लेख प्राप्त होता है। इनका गुण-दोष विवेचन 


प्रस्तुत है- 

अगर (अभिष्ट) 

नाम 

संस्कृत - अगुरु, वंशिक, राजार्ड, कृमिजमू | 

हिन्दी - अगर। 

द्राविड़ी - अहिलकटूटे। 

अरबी - ऊद। 

फारसी - ऊदखाम। 

लेटिन - # 4०27० 4 8०0०७७ (एक्वीलेरिया एजेलोका) 
वर्णन 


अगर के वृक्ष सिलहट, मस्राबार, मलंयाचल, मनीपुर इत्यादि स्थानों पर होते 
हैं। इसकी ऊँचाई 60 से 00 फीट तथा गोलाई 5 फीट तक होती है। इसके छिद्रों 
में राल की तरह कोमल और सुगन्धित पदार्थ बहता रहता है जो अगरबत्ती बनाने 
और शरीर पर मलने के काम आता है। 
शुण-दोष 

चरक के मतानुसार अगर शीत-प्रशामक और खाँसी को नष्ट करने वाला है। 
सुश्रुत के मतानुसार यह कांति-वर्धक, कफ नाशक, कुष्ठ, खुजली को नष्ट करने 
वाला है। ५ 
राजनिघण्टुकार के मतानुसार काला अगर कड़वा, उष्ण, लेप में शीतल, पीने 
में पित्त नाशक और किसी-किसी के मत से त्रिदोष नाशक है। काष्ठागरु-चरपरी, 
गरम लेप में रूखी और कफ नाशक है। दाहागुरु-चरपरी, गरम, केश-वर्धक, वर्ण 
को उज्ज्वल करने वाली है और मंगलागुरु शीतल गंध वाही और योगवाही है। 

निघण्टु रत्नाकर के मतानुसार अगर सुगन्धित, गरम, कठु, स्निग्ध मंगलदायक, 
रुचिकारी, धूपयोग्य, पित्तजनक, तीक्ष्ण तथा वात-कफ, कर्ण-रोग और कीढ़ का 
नाश करने वाली है। 

भाव-प्रकाश के मतानुसार अगर गरम, चरपरी, त्वचा को हितकारक, कड़वी, 
तीक्ष्ण, पित्तजनक हल्की तथा कर्ण रोग, नेत्र रोग, शीत, वात और कफ नाशक है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 235 


इसकी लकड़ी-तीक्ष्ण, सुगन्धित, तेलयुक्त, गरम, धातु परिवर्तक, पौष्टिक, 
पेट के अफारे को दूर करने वाली है। कुक्कुर खाँसी (३/॥०००॥४ ९००४) और 
नेत्र की पीड़ा में लाभकारक है। 
उपयोग * 
त्वचा रोग और कांति-वर्धन के लिये अगर का लेप केरना चाहिये। 
कामोद्दीपन 
अगर का चोया पान में लगाकर खाने से अत्यन्त कामोतेजना होती है। 
- बाजीकरण औषधि में भी यह मिलाकर दिया जाता है। 
मन्दाग्नि 
मन्दाग्नि और हृदय रोग में इसके चूर्ण को शहद के साथ चटाने से लाभ होता 
है। 
वाल्मीकि रामायण में उनके स्थलों पर अगरु का प्रयोग किया गया है। श्री 
राम राज्याभिषेक के समय अयोध्या नगरी में धूप, चिता जलाने के लिये,* धूप के 
लिये,* श्मशान में चिता पर,' बिना राजा के नगर की स्थिति ।* धूप के निमित्त,* 
लेप के लिये," चित्रकूट में,' धूप के निमित्त,? लंका में समुद्र तट पर," किष्किन्धापुरी 
में,/ दक्षिण गुफा में, रावण के निवास गृह में,' शुभ-शकुन,* बालक राम की 
बाहों पर लेप,” अगरु जल का प्रयोग, रावण के शव को जलाने के लिये,” 
अयोध्या की अशोक वाटिका में, आदि प्रसंगों में अगरू का उल्लेख किया गया 
है। हे 


अर्जुन 
नाम 
संस्कृत अर्जुन, ककुभ। 
बंगाली अर्जुन, 
मराठी अर्जुन, सादड़ा। 
लेटिन वृ्मागं॥ां4 8] णा8 
अंग्रेजी कपुणा4-५ज० छवका, 
वर्णन 


यह वृक्ष हिमालय की तलहटी, बर्मा, बंगाल, मध्य-भारत, दक्षिण विहार, छोटा 
नागपुर, सीलोन, इत्यादि प्रान्तों में नदी नालों के किनारे पैदा होता है। पंजाब तथा 
वायब्य प्रान्तों में यह कुदरती तौर पर पैदा नहीं होता है। 

अर्जुन के वृक्ष जंगलों में पैदा होते हैं, ऊँचाई 60 से 80 फीट तक गोलाई 0 से 
20 फीट होती है। 
गुण-दोष ओर प्रभाव 

राजनिधण्दु के अनुसार अर्जुन कसैला, गरम, कफ-नाशक, ब्रण-शोधक तथा 
पित्त, श्रम और तृषा-निवारक है, यह वात॑ को कुपित करता है तथा क्षत, भग्न और 
मन्रू-कृच्छ रोग में हितकारी है। 


236 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


निघण्दु रलाकर के अनुसार यह कसैला, उष्ण, मधुर, शीतल, कान्तिजनक, 
ब्रण-शोधक, बल कारक, हल्का तथा अस्थि भंग, अस्थि संहार, कफ, पित्त, श्रम, तृषा, 
दाह, प्रमेह, हृदय रोग, पाण्डुरोग विष बाघा, क्षत क्षय, मेदवृद्धि, रुधिर-विकार, पसीना, 
श्वास, क्षत और भस्म रोग को नष्ट करता है। ५ 

सुश्रुत के मतानुसार इस पौधे की राख सर्पदंश के काम में ली जाती है। वाग्भट 
के मतानुसार बिच्छू के इंक पर इसका छिलका प्रयोग में लिया जाता है। 

महर्षि चरक्‌ इसको संकोचक व मूत्र को साफ करने वाला बतलाते है। 

प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रियों में वाग्भट ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इस औषाधि को 
हृदय रोग के अन्दर उपयोगी बताया है। उनके पश्चात्‌ तो चक्रदत, भाव मिश्र और 
आयुर्वेद के अन्य शास्त्रियों ने भी इसको हृदय रोग की महौषधि माना है। 
उपयोग 
रक्‍्त-पित 

अर्जुन की छाल को रात भर जल में भिगोकर रखें, सबेरे उतको मलकर, छानकर 
या उसको औटाकर उसका क्वाथ पीने से रक्त-पित्त में लाभ पहुँचता है। 
शुक्रमेह 

शुक्रमेह के रोगी को अर्जुन की छाल या श्वेत चन्दन का रस क्वाथ पिलाने से 
लाभ पहुँचता है। 
क्षय-कास 

अर्जुन की छाल के चूर्ण में अडूसे के पतों के पत्तों के स्वर्स की सात भावना को 
देखकर शहद, मिश्री या गो घृत के साथ चटाने से क्षय की खाँसी का-जिसमें कफ में 
खून जाता हो-नाश होता है। 
मूत्राधात 

मूत्राघात रोग में अर्जुन की अन्तर छाल का क्वाथ बनाकर पिलाना चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों पर अर्जुन का उल्लेख मिलता है। 
अप्रत्यक्ष सीता के विषय में राम का प्रश्न,” पंपासर के अरण्य में, प्रश्नवण-गिरि 
पर,” माल्यवान पर्वत पर,” माल्यवान्‌ पर्वत पर,” मलय पर्वत कानन में,“ सेतु 
निर्माणार्थ,” सुवेल पर्वत से दिखने वाला लंका का दृश्य,» कैलाश में,” अयोध्या 
की अशोक वनिका में आदि कई स्थलों पर विविध प्रसंगों में अर्जुन का उल्लेख 
किया गया है। 


अनार 
नाम 
संस्कृत दाडिम 
हिन्दी अनार 
मराठी डालिब 
गुजराती दाडम 
बंगला दाड़िम 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.../ 237 


करनाटकी दारलिव 


तेलंगी डानिबचेटूद 

तमिल मादलई चेहेड़्ड 

फारसी अनार 

अरबी 7: रुमान हामिज 

लेटिन एजांए8 0ावाबापा . 
वर्णन 

अनार का वृक्ष प्रायः सर्वत्र बगीचों. में होता है। 
गुण-दोष और प्रभाव 


भाव-प्रकाश के मतानुसार अनार तीन प्रकार का होता है। एक मीठा, दूसरा 
खट-मीठा, तीसरा केवल खटूटा। मीठा अनार त्रिदोष नाशक, तृषा, दाह, ज्वर, 
हृदय-रोग, कण्ठ-रोग और मुख-रोग को दूर करने वाला, तृप्ति-कारक, वीर्य-वर्धक, 
हल्का, किचित्‌ कसैला, मल-रोधक,. स्निग्ध, मेधा-जनक और बल-वर्धक है। 
खट-मीठा, अनार-दीपन, रुचि कारक, किंचित्‌ पित्त-कारक और हल्का है। खटूटा 
अनार-पित्त कारक, खट्टा तथा वात और कफ नाशक है। 

* आयुर्वेद के मतानुसार इसकी छाल और जड़ वायु नलियों के प्रदाह में 
उपयोगी तथा अतिसार को रोकने वाली और कृमि नाशक है। इसके फूल नाक 
से बहने वाले खून में बहुत लाभदायक हैं। इसका कच्चा फल पौष्टिक, पाचक, 
श्षुधा-वर्धक, पित्त कारक और वमन को रोकने वाला है। इसका पका हुआ फल 
पौष्टिक आँतों को सिकोड़ने वाला-कामोद्दीपक, पित्त-नाशक और त्रिदोष को 
नाश करने वाले है। प्यास, शरीर की जलन, बुखार, हृदय रोग, गले की बीमारियों 
और मुख की सूजन में भी इसका पका फल उपयोगी है। इसके फल का छिलका 
कृमि-नाशक, रक्‍्तातिसार, और खाँसी में लाभदायक है। 

मीठा अनार खून पैदा करने वाला, रस क्रिया को दुरस्त करने वाला, मूत्र 
निस्सारक, पेट को मुलायम करने वाला आदि गुणों को धारण करता है। 

खट्टा अनार छाती की जलन तथा आमाशय और यकृत की गर्मी को शान्त 
करने वाला तथा खून के प्रकोप, ज्वर जन्य अतिसार और वमन में लाभदायक है। 

खट्‌-मीठा अनार पैत्तिक वमन, अतिसार और खुजली में लाभ पहुँचाने वाला 


है। 

उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है कि अनार के अन्दर हृदय को बल देने की 
और कृमियों को नष्ट करने की अच्छी शक्ति है। 
उपयोग 

सूखा रोग में अनार की जड़ की छाल का क्वाथ (काढ़ा) बनाकर देने से बहुत 
लाभ होता है। कामला अनार का रस 6-7 तोले और जरिश्क 6 माशे मिलाकर 
दोनों समय पिलाने से कामला रोग को लाभ पहुँचता है। 

इनके अतिरिक्त बवासीर, खाँसी, अतिसार, उन्‍्माद और हिस्टीरिया, स्त्री-प्रदर, 


238 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कण्ठ-माला इत्यादि में भी यह लाभप्रद है। 
वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थानों पर अनार का उल्लेख मिलता है। 
यथा-विवाह मण्डप में, विरही श्री राम का प्रश्न” सेतु निर्माणार्थ,० 
अयोध्या की अशोक वनिका में," आदि। 
अश्वत्थ (पीपल) 
नाम 
संस्कृत- अश्वत्थ, बोधिद्ठुम, चैत्वद्रुम, चैत्याक्ष, चल-दल, चल-पत्र, देवात्म, 
धनुर्वृक्ष, गजभक्षक, गजपत्र, गजाशन, गुहयपुष्ष, गुरु, कपीतन, कृष्णावास, 
क्षीद्धुम, महाद्वम, माँगल्य, नागवन्धु, पवित्रका, पिप्पल, सेव्य, वृक्षराज, 





शुचिद्रुम इत्यादि। 

हिन्दी - पीपल, पीपली। 

गुजाती - पीपलो पीपुल, जरी। 

बंगाल न अश्वथ, असुद, असवट। ४ 

बम्बई + पीपल, अरली बुसरी। 

पंजाब कं - भोर, पीपल। 

तमिल- अचुक्तम अटासु, अरशमरम, अस्वतम, माघदुरुमम, नारायणमू, 
कुजीरावनम्‌ इत्यादि । 


तेलगु- अश्वथ्थमु, बोधि, रावीचेट्टु इत्यादि। 

फारसी - दरख्त तेंरजो। 

छझाष्टांआ शं098। पा९6. 

लेटिन- ०७७ /२९॥४४०५७ (फायकस रेलीगोसा) 
वर्णन 

पीपल के वृक्ष हिन्दू धर्म-शास्त्रों के अन्दर बहुत पूज्य माने गये हैं। इस वृक्ष 
के अन्दर प्राण-वायु को शुद्ध करने का दिव्य गुण रहता है और इसीलिये क्षय, 
दमा, कुष्ठ, प्लेग, भगन्दर इत्यादि अनेक रोगों पर यह लाभदायक सिद्ध होती है। 
इसके बड़े-बड़े वृक्ष भारतवर्ष में सब जगह पैदा होते हैं और सब लोग इसको 
जानते हैं। 
गुण, दोष और प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार पीपल, मधुर, शीतल, कसैला, दुर्जर, भारी, रूखा, 
कान्ति को उज्ज्वल करने वाला कड़वा, योनि शोंधक और रुधिर दोष, दाह, पित्त, 
कफ और ब्रण को दूर करने वाला है। इसके पके हुए फल शीतल, हृदय को 
५०.३ तथा रक्‍्त-दोष, पित्त, विष, दाह, वमन, शोष व अरुचि को दूर करने 
वाले हैं। 

पीपल की छाल स्तम्भक, रक्त-संग्राहक और पौष्टिक होती है। इसके पत्ते 
आनुलोमिक तथा फल पाचक, आनुलोमिक, संकोच विकास प्रतिबन्धक और रक्त 
को शुद्ध करने वाले होते हैं। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 239 


उपयोग 

मूत्रकृच्छू- पीपल की छाल का क्‍्वाथ या फॉट बनाकर पिलाने से मूत्रकृच्छ 
मिटता है। 
खुजली- इसकी छाल का क्वाथ या फॉँट बनाकर पिलाने से खुजली मिटती है। 
विसर्प रोग- इसकी जड़ की छाल के क्वाथ से विसर्प रोग मिटता है। 
दमा- पीपल के सूखे पत्तों को पीसकर 3 दिन तक जल के साथ फवकी देने से 
दमा में लाभ होता है। 
पित्त की सूजनं- इसकी छाल को पानी में पीसकर उसका ठंडा लेप करने से पित्त 
की सूजन बिखर जाती है। 
हिचकी- इसकी छाल को जलाकर उसकी राख को पानी में घोलकर उसके नितरे 
हुए पानी को पिलाने से हिचकी बन्द हो जाती हैं। 
इस प्रकार अश्वत्थ (पीपल) का अनेकानेक रोगों में प्रयोग किया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में भी इसका एक दो स्थलों पर उल्लेख देखने को मिलता है- 
यथा-भारद्वाजाश्रम पर” तथा पंपासार के पास” आदि। 
अर्क (आक) 

नाम 

संस्कृत - अर्क, राजार्क, क्षीरदल, शुक्रफल, विभावसु। 

हिन्दी - आक, मंदार। 

बंगाली - आकंद। 

मराठी - रुई, पादरी रुई। 

तैलंगी - नलिजिल्ले डे घोली, तेलाजिल्ली डे। 

फारसी - खरक, दूध। 

अरबी - ऊशर। 

अंग्रेजी - 004४० 5७४००७४ ४४०६ (जायजेन्टि स्वेलो वर्ट) 

लैठिन- 08॥000ए& 08४०७ (गेलोट्रोपिस जायजेन्टिका), 

(७४७४०फ5$ ?970०७७८३७ (के. प्रोसीरा) 

वर्णन 

आक के झाड़ सब स्थानों पर मिल जाते हैं। इसकी लाल और सफेद, इस 
प्रकार दो जातियाँ होती हैं। लाल जाति को लैटिन में 08॥०००ए5 08क्षा(०8 
(के. जायजेन्टिका), और सफेद जाति को 0880. 7०००७ कहते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार दोनों प्रकार के आक रेचक तथा वात, कोढ़, कण्डू, 
विष, व्रण, प्लीहा, गुल्म, बवासीर, श्लेष्मा, उदर, यकृत और कृमि रोग को नष्ट 
करने वाले हैं। 

आक का दूध तिक्त, उष्ण स्निग्ध, लवण रस युक्‍त, हल्का तथा कोढ़, गुल्म 

और उदर रोग को नष्ट करने वाला है। यह एक श्रैष्ठ विरेचन है। 


240 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


इसकी जड़ की छाल पसीना लाने वाली, श्वास को दूर करने वाली, गरम, 
वमन कारक और उपदंश को नष्ट करने वाली है। 

इसका फूल मधुर, तिक्‍त, ग्राही तथा कुष्ठ, कृमि, चूढ़े का जहर, रक्त-पिक्त, 
गुल्म और सूजन को दूर करने वाला है। 
उपयोग 

बवासीर- तीन बूंद आक का दूध लेकर और उस पर कुटा हुआ जवाखार 
बुरक कर उसे बताशे में रखकर निगल जाये इस प्रयोग से बवासीर बहुत जल्दी 
नष्ट हो जाता है। 

खाँसी और दमा- आक के कोमल पत्तों का काढ़ा करके उस काढ़े को जौ की 
धानी-की सात भावना देकर सुखा लेना चाहिये। फिर उसका चूर्ण करके छः माशे 
की मात्रा में शहद के साथ चटाने से श्वास रोगों में लाभ होता है। 

इनके अतिरिक्त उदर रोग, विसूचिका, कोढ़, नासूर, रक्‍्त-विकार, दाद, 
लकवा, फालिज, गठिया, साँप, बिच्छु, पागल कुत्ते के जहर, अपस्मार, नेत्र रोग, 
कर्ण-रोग, दन्‍्त रोग, पथरी आदि में भी यह बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी अर्क का उल्लेख मिलता है।* 
अपामार्ग?ः 

“नाम- संस्कृत - अपामार्ग 
हिन्दी - चिरचिरा, लटजीरा, ओंगा। 


गुजराती - अधेढ़ो। 

मराठी - अधाढ़ा। 

बंगाली - आपांग। 

मारवाड़ी - आंधी झाड़ो। 

सिन्धी - गर्जिका। 

कनरटिकी- उत्तरेणी। 
* तेलंगी - दुच्चेणीके । 

लेटिन_- लाश हए5 85००० (एचीरेन्थस एस्पेरा) 
फारसी - खारवाजू। 

अरबी _- अत्कूमह। 


वर्णन 

अपामार्ग का छोटा क्षुप होता है, यह वर्षा ऋतु में स्थान-स्थान पर दिखाई 
देता है, कहीं-कहीं बारह मास भी होता है। इसकी ऊँचाई एक से तीन हाथ तक 
होती है। पत्ते लम्बाई लिये हुए कुछ गोल तथा नोकदार होते हैं। पत्तों के बीच में 
से एक मंजरी निकलती है। उसमें सूक्ष्म और काँटे युक्त बीज होते हैं। यह दो 
प्रकार का होता है। एक लाल दूसरा सफेद। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 24 


आयुर्वेद के अंदर अपामार्ग की गणना अत्यन्त प्रभावशाली दिव्य औषधियों 

में की गयी है। अथर्ववेद के 70 सूक्‍्त के चौथे काण्ड में अपामार्ग की स्तुति की 
गयी हैं।” 

राजनिघण्दु के मतानुसार अपामार्ग कड़वा, गरम, चरंपरा, कफनाशक तथा 
कण्डू एवं उदर रोग, आँव और रुधिर-विकार को दूर करता है। यह वमनकारक 
व मलरोधक भी है।” 

आव-प्रकाश के मतानुसार यह दस्तावर, तीक्ष्ण, दीपन, कड़वा, गर्म चरपरा, 
रुचिकारक तथा वमन, कफ, मेदोरोग, वात, हृदयरोग, आध्मान, बवासीर, कंडू 
शूल, उदर रोग और पाचन शक्ति की हीनता को दूर करता है।” 

शोढ़ल के अनुसार अग्नि कारक, तीक्ष्ण, नस्य लेने से सिर के कीड़ों को नष्ट 
करने वाला, वमन कारक............. | 
उपयोग 

पथरी- अपामार्ग की छः माशा ताजी जड़ को पानी में घोटकर पिलाने से 
पथरी रोग में बड़ा लाभ मिलता है। यह औषधि बस्ति की पथरी को टुकड़े-टुकड़े 
करके निकाल देती है। वृक्क शूल के लिये भी यह महौषधि है। 

नासूर- इसके पत्तों का रस नासूर के ऊपर लगाने से नासूर भर जाता है। 

इनके अतिरिक्त उदर, कण्ठ, दन्त, बुखार आदि रोगों में भी इसका उपयोग 
किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में “अपामार्ग” का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। , 
मन्दार 

मन्दार “अर्क' का ही पर्यायवाची है। इसकी विशद्‌ समीक्षा 'अर्क' के 
अन्तर्गत ही की गयी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। कैलास पर्वत पर 
विभिन्‍न वृक्षों के मध्य मन्दार भी शोभा पा रहा था।“ रम्भा के सौन्दर्य को भी 
मन्दार के पुष्प और अधिक बढ़ा रहे थे।४ 





आम 
नाम 
संस्कृत - आम, फलश्रेष्ठ, कामसर, काम, वल्लभ, वसन्तद्ठु इत्यादि। 
हिन्दी - आम। 
बंगाल - आम। 
मराठी - आँबा। है प # 
गुजराती - आँवो। है ४ 
कर्नाटकी._- माविनफल। हे 
तेलंगी - माविडी। 
इंग्लिश > थिशा20 
फारसी + आँवा। 


242 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अरबी - अबज। 

लेटिन > चिग्ाष्टांटिव वातांट8 । 
वर्णन 

आम की कई जातियाँ होती हैं। जो आम जंगलों में पैदा होते हैं, वे रानी आम 
कहलाते हैं तथा जो बागों में होते हैं वे देशी आम कहलाते हैं। इनके अतिरिक्त 
हाफुस, पायरी, सफेदा, लंगड़ा, नीलम, तोतापरी, राज भोग, कृष्ण-भोग, मोहन 
भोग, गुलाब-खास इत्यादि भी होते हैं। 

औषधि-कार्य में कलमी आम की अपेक्षा चूसने के लायक देशी आम ज्यादा 
गुणकारी होते हैं क्योंकि ये आसानी से पच जाते हैं। 
गुण, दोष एवं प्रभाव हि 

आम के वृक्ष का छिलके से लेकर फल तक प्रत्येक अंग-प्रत्यंग औषधि के 
कार्य में आता है इसलिये उन सबका अलग-अलग उल्लेख इस प्रकार है- 

आयुर्वेदिक मतानुसार आम का कच्चा फल कसैला, खट्‌टा, रुचिकारक तथा 
वातपित्त को पैदा करने वाला है। यह आँतों को सिकोड़ने वाला, गले की 
तकलीफों की दूर करने वाला तथा अतिसार, मूत्र-व्याधि और योनि रोग में लाभ 
पहुँचाने वाला है। कच्चे आम की अमचूर खटूटी, स्वादिष्ट, कसैली, मेदक और 
कफ, वात को हरने वाली है। 
पका हुआ आम 

मधुर, स्निग्ध, वीर्य-वर्धक, सुखदायक भारी, वात-विनाशक, कान्तिवर्धक, 
शीतल प्रमेह नाशक तथा व्रण-श्लेष्म और रुधिर के रोगों को दूर करने वाला है। 
आम का मौर 

शीतल, वात-कारक मल-रोधक, अग्नि-दीपक, रुचिवर्धक तथा कफ पित्त, 
प्रमेह का नाश करने वाला है। 
आम की जड़ 

यह कैसली, मलरोधक, रुचिदायक, शीतल, सुगन्धित तथा कफ और वात 
को नष्ट करने वाली है। 
आम. के पत्ते 

आम के कोमल पते कसैले, मल-रोधक, रुचिकारक तथा वात, पित्त और 
कफ को हरने वाले हैं। 
आम की गुठली 
आम की गुठली मीठी, तुरी और कुछ कसैली होती है। यह वमन अतिसार 
और हदय के आस-पास की पीड़ा को दूर करती है। इसके बीज का पैल कप्तैला, 
स्वादिष्ट, रूखा, कड़वा तथा मुख-रोग, कफ एवं वात को दूर करता है। 
उपयोग 

श्वेत-प्रदर, खूनी बवासीर तथा फेफड़े के द्वारा रक्त-स्राव होने की दशा में 
तथा कृमि-रोग में भी आम की छाल का रस या इसका ठंडा काढ़ा 4 तोला और 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 243 


चूने का नितरा हुआ पानी  तोला मिलाकर सात दिन तक लेने से बहुत लाभ 
होता है। 
गले के रोग * 
आम के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीने से गले के रोग मिटते हैं। 
इसके अतिरिक्त सुजाक, अतिसार बवासीर, कर्ण पीड़ा, नेत्र-पीड़ा, नक्सीर, 
रकत-स्राव आदि में आम का विविध रूपों में प्रयोग किया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में आम का उल्लेख अनेकानेक स्थलों पर किया गया है, 
जिनके सन्दर्भ निम्नवतू हैं-अयोध्यापुरी में,“ 
उदाहरण - स्वरूप," जनपद में,/ उदाहरण स्वरूप,” चित्रकूट में, माल्यवान 
पर्वत पर” आदि। 





आँवला 

नाम 

संस्कृत न्‍ आमल, पंचरसा। शिवा, घातकी, अमृता, व्यस्था, 

अमृत-फला, श्रीफल इत्यादि। 

हिन्दी - आँवला। 

गुजराती * आँवला। 

कनटिकी . - नेल्लि। 

तेलगू - उसरकाय। 

फारसी - आम्लझम्‌। 

अरबी - अम्लजू। 

अंग्रेजी - छााएथां० ]/४५॥०७०ेक्रा 

लैटिन गु एाज्राक्ाशा७५ 870०॥० (फिलेन्थस इम्बेलिकां) 
वर्णन 


आँवले के वृक्ष भारत-वर्ष के जंगलों में प्राकृतिक रूप से पैदा होते हैं। बनारस 
का आँवला भारत वर्ष में सर्वाधिक. अच्छा होता है। 
गुणं-दोष एवं प्रभाव 

महर्षि चरक का कथन है कि संसार के अन्दर अवस्था-स्थापक जिलने द्रव्य 
हैं, उनमें आँवला सबसे प्रधान है। श्रेष्ठ फल होने के कारण तथा ग्राही, मूत्रल, 
रकक्‍्त-शोधक एवं रुचिकारक होने के कारण ये अतिसार, प्रमेह, दाह, कामला, 
अम्लपित, विस्फोटक, पाण्डु, रक्त-पित्त, वात-रक्‍्त, अर्श, बद्धकोष्ठ, अजीर्ण, 
अरुचि, श्वास, खाँसी इत्यादि रोगों को नष्ट करता है, दृष्टि को तेज करता है, 
वीर्य को दृढ़ करता है और आयु की वृद्धि करता है। आँवले के फलों के 
अतिरिक्त इसके अन्य अंग भी कार्यमें आते हैं। इसके पतों को पानी में उबालकर 
उस पानी से कुल्ला करने पर मुँह के छाले समाप्त हो जाते हैं। 
उपयोग 


244 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अतिसार - आँवलों को जल में पीसकर रोगी की नाभि के आस-पास उनकी 
थाल बाँध दें और उस थाल में अदरक का रस भर दें। इस प्रयोग से अतिसार में 
बहुत लाभ होता है। 

हिचकी - आँवला, केंत का रस और पीपल का चूर्ण शहद के साथ रोगी को 
सेवन कराने से हिचकी में लाभ होता है। 

इसके अतिरिक्त बवासीर, मूत्रकृच्छ, सोम-रोग, श्वेत-प्रदर, नेत्र-रोग, पित्त-ज्वर 
और चित की घबराहट, रक्त-पित्त, योनि-दाह, पाण्डु रोग, सुजाक, नक्सीर, आँख 
की फूली, मूत्र रोग आदि में भी बहुत उपयोगी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी आँवले का उल्लेख कई स्थानों पर किया गया है 
यथा-योग का आश्रय लेकर उन धर्मात्मा महर्षि ने पूर्वकाल में जो जो घटनाएँ 
घटित हुई थीं, उन सबको यहाँ हाथ पर रखे हुए आँवले की तरह प्रत्यक्ष देखा४ 
भरद्वाज मुनि के आश्रम का वर्णन करते हुए भी कहा गया है 'स्थान-स्थान पर बेल 
कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आम के वृक्ष लगे थे, जो फलों से सुशोभित 
हो रहे थे /४ आम, जामुन, आँवला आदि घनी छाया वाले वृक्षों से, यह पर्वत 
(चित्रकूट) अनुपम शोभा का पोषण एवं विस्तार कर रहा है ९ 

भारद्वाज के ही आश्रम का वर्णन में पुनः आँवले का उल्लेख करते हुए कहा 
गया है, शिशंपा, आमलकी और जम्बू आदि स्त्रीलिइ वृक्ष तथा मालती, मल्लिका 
और जाति आदि वन की लताएँ नारी का रूप धारण करके भारद्वाज मुनि के 
आश्रम में आ गयीं ।” राम की वानर सेना के गमन काल में भी इसका उल्लेख 
मिलता है- “उछल-उछल कर चलने वाले वे वीर वानर सैनिक रास्ते के अंकोल 
करंज, पाकर, बरगद, जामुन, आँवले और नीप आदि वृक्षों को भी तोड़ डालते 
थे 7 

इस प्रकार उपरोक्त स्थलों का दर्शन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि 
वाल्मीकि रामायण में आँवले का उल्लेख प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। 
औदुम्बरम्‌ 
नाम 

संस्कृत- औदुम्बरम्‌, उदम्बर, हेमदुग्धक, जंतुफल, क्षीर वृक्ष। 

हिन्दी- गूलर, ऊमर, परोआ। 

गुजराती - उमरो। 

मराठी - ऊंबर, गूलर। 

बंगाली - यज्ञ- डुम्बर, जगनी डुम्बर। 

पंजाब- ददुरि, काकमाल। 

अरबी - जमीक्षा। 

तमिल - अतिमरम। 

तेलगू- अत्तिमाणु। 

फारसी- अंजीरे आदम। 

लेटन- 7०७७ 0ण7००४३ (फिकस ग्लोमीरेटा) 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 245 


वर्णन 

औदुम्बर वड़, पीपल और अजीर कं वर्ग का वृक्ष है। इसका वृक्ष 20 से 30 
फुट तक ऊँचा होता है। इसके पत्ते बड़ के पत्तों से मिलते हुए मगर उससे छोटे 
रहते हैं। इसकी डालियों से इसके फल फूटते हैं। इसके किसी अंग में चीरा देने 
से उसमें से दूध निकलता है। इसके फल अंजीर के फलों की तरह होते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से गूलर शीतल, गर्भरक्षक, व्रण को भरने वाला, मधुर, 

रूखा, कसैला, भारी, हड्डी को जोड़ने वाला, वर्ण को उज्ज्वल करने वाला तथा 
कफ, पित अतिसार एवं योनि रोग को नष्ट करने वाला है। इसकी छाल अत्यन्त 
शीतल, दुग्ध-वर्धक, कसैली, गर्भ को हितकारी और वर्ण विनाशक है। इसके 
कोमल फल स्तम्भक, कसैले, रुधिर के रोगों को नष्ट करने वाले और तृषा, पित्त 
तथा कफ को दूर करने वाले होते हैं। इसके मध्यम कच्चे फल शीतल, कसैले, 
रुचिकर तथा प्रदर को नष्ट कने वाले होते हैं। इसके पके हुए फल कसैले, मधुर, 
कृमि पैदा करने वाले, अत्यन्त शीतल, रुचि-वर्धक, कफ कारक तथा रुधिर-विकार, 
पित्त, दाह, क्षुधा, श्रम प्रमेह और मूर्च्छा को हरने वाले होते हैं। 
मात्रा 

छाल की आधे तोले से एक तोले तक, फल की 2 से 4 नग तक और दूध 
की 0 से 20 बूँद तक है। 
उपयोग 
घाव 





इसकी छाल के क्वाथ से साधारण और जहरीले घाव को धोने से वह जल्दी 
भर जाता है। 
आमातिसार 
इसके जड़ के चूर्ण को फक्की देने से आमातिसार मिटता है। 
बलवृद्धि 
इसकी जड़ में छेद करने से एक प्रकार का मद टपकता है। उस मद को 
लगातार कुछ समय तक लेने से बल बढ़ता है। इनके अतिरिक्त पित्त- विकार, 
खूनी बवासीर, बहुमूत्र, कर्णमूल, शोथ, मूत्रकृच्छू, दन्तरोग, रक्त-प्रदर, रुधिर की 
वमन, नक्सीर, गर्भ स्राव, आदि में भी इसका बहुत उपयोग होता है। 
वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-लवकुश को किसी ने यज्ञ पात्र दिया, 
किसी ने गूलर की लकड़ी का बना पीढ़ा अर्पित किया।* 
कटहल 
नाम संस्कृत - पनस, कंटकी फल, पणस, अतिबृहतफल 
इत्यादि। हिन्दी- कटहर, कटहल, पणस। गुजराती - पणस। 
मराठी - फणस। बंगला- फणस, काँटोल । तेलगू-फणसचटूट। 
तमिल-बला | लेटिन-७70०७905 ॥70870048 (आरटोकारपस 
इटेग्रिफोलिया)। 
246 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





वर्णन 

यह भारतवर्ष के अन्दर एक प्रसिद्ध और बड़ा झाड़ होता है। इसका पेड़ 
चालीस से पचास फुट तक ऊँचा होता है। इसका पिंड छोटा और खड़ा होता है। 
इसकी छाल बहुत मोटी होती है जिस पर गहरी दरारें होती हैं। इसकी डालियों के 
रोयें सख्त होते हैं। इसके पत्ते ऊपर से चिकने और नीचे से खुरदरे होते हैं। इसके 
फूल नहीं आते हैं। इसका फल डालियों पर नहीं लगता बल्कि गूलर की तरह 
लकड़ी को फोड़कर निकलता है। इसके फल के ऊपर सख्त रोयें होते हैं। इसके 
फल की लम्बाई गज भर तक होती है। इसका वजन बीस सेर तक होता है। इसमें 
एक प्रकार का गोंद लगता है, जो पानी में गल जाता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से इसका कच्चा फल ग्राही, कसैला, त्रिदोषकारी, बलवर्द्धक 
और भारी होता है। इसका पका फल शीतल, स्निग्ध, तृप्तिकारी, कामोद्दीपक; 
मांसवर्द्धस तथा वात, कुष्ठ और व्रण में उपयोगी है। इसके बीज मीठे, मूत्र॒ल, 
कामोद्दीपक, और कब्जियत करने वाले होते हैं। इसके फल भारी, कड़वे और 
मुख को साफ करने वाले होते हैं। 
उपयोग 

इस पेड़ का रस ग्रन्थियों की सूजन पर और अन्य फोड़ों के ऊपर मवाद पैदा 
करने के लिये लगाया जाता है। इसकी गाँठें यदि कमर के ऊपर बाँधी जाये तो 
जलार्बुद को दूर कर देती है। इसके छोटे-छोटे पत्ते चर्म-रोगों में काम लिये जाते 
हैं। 

वाल्मीकि रामायण में पनस (कटहल) का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध 
होता है-यथा-भारद्वाज के आश्रम में पनस आदि के वृक्षों का उल्लेख भी मिलता 
है। स्थान-स्थान पर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा, तथा आम के वृक्ष लगे 
थे, जो फलों से सुशोभित हो रहे थे।* आम, जामुन, असन, लोध, प्रियाल, 
कटहल, धव, अंकोल, भव्य, तिनिश, बेल तिन्दुक, बाँस, काश्मरी, अरिष्ट, वरण, 
महुआ, तिलक, बेर आदि के वृक्ष वहाँ थे।5 

इसके अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों पर इसका उल्लेख मिलता है ।* 
कदली 

नाम संस्कृत -भानुफल, कदली, राजेष्टा, रम्भा, सुफल, वनलक्ष्मी । हिन्दी-केला, 
बंगाली-केलि । बम्बई--केला । दक्षिण-केल । गुजराती-केला, तमिल-वालें, अरंबई। 
तेलगू-अंनति, कदली | लेटिन- ॥(घ८६ 5वएंल्वाप्या । 
वर्णन 

केले का वृक्ष सब तरह प्रसिद्ध है, जिसमें हती छाल वाली जाति, लाल छाल 
वाली जाति, पीली छाल वाली जाति, त्रिकोनी जाति, चम्पा चीनी इत्यादि जातियाँ 
विशेष प्रसिद्ध हैं। 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 247 


गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार इसकी जड़ तीखी, कुमिनाशक, पौष्टिक एवं क्षुधा-वर्द्धक 
होती है। कफ, पित्त, कान का दर्द, मासिक धर्म की अनियमितता, रक्त-विकार, 
मधुमेह, अग्नि-मांद और कुष्ठ की बीमारी में यह बड़ा लाभदायक है। मधुमेह रोग 
में भी यह बहुत लाभदायक है। इसके पिंड का रस शीतल और आँतों के लिये 
संकोंचक होता है। यह पेचिश में तथा प्यास, पथरी, बहुमूत्र, कर्ण-रोग, रक्त-विकार 
और गर्भाशय के रोगों में भी लाभदायक है। इसके फूल मीठे, कसैले और शीतल 
होते हैं।। ये कृमि-नाशक और आँतों को सिकोड़ने वाला होता है। वात-पित्त-क्षय 
और बच्चों की खाँसी में यह लाभदायक है। इसका कच्चा फल कसैला, शीतल, 
पौष्टिक और संकोचक होता है। यह वात व कफ पैदा करता है। इसका पका फल 
मीठा, ठण्डा, पौष्टिक, कामोद्दीपक और क्षुधा-वर्धक है। यह शारीरिक सौन्दर्य को 
बढ़ाने वाला है। वि 
उपयोग है 
सोम रोग 
प्रदर का एक भेद 

- केले का पका हुआ फल, आँवलों का स्वरस, शहद और मिश्री इन सबको 
मिलाकर खाने से स्त्रियों का सोम-रोग और मूत्रातिसार मिट जाता है। 

2- केले का फ़ल, विदारी कंद और शतावर इन तीनों को मिलाकर लेने से 
सोम-रोग नष्ट हो जाता है। 

अग्नि से जलना-अग्नि से जले हुए स्थान पर पके हुए केले का पुल्टिस 
बाँधने से जले हुए स्थान पर शान्ति पहुँचती है। इनके अतिरिक्त मूत्र-दाह, उदर 
शूल, नक्सीर एवं श्वेत-कुष्ठ आदि में भी यह प्रयोग किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है- जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा 
था-जो दुःख भोगने के योग्य थी ही नहीं, उन्हीं माता कौशल्या को कटी हुई 
कदली की भाँति अचेत अवस्था में भूमि पर पड़ी देख श्री राम ने हाथ का सहारा 
देकर उठाया ।” इसी प्रकार सीता की तुलना भी कदली से करते हुए कहा गया 
है-दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी 
सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने 
लगता है, उसी प्रकार व्रे उद्ेश के कारण थर-थर काँपने लगीं ।* मारीच के भ्रमण 
में भी केले के वन का उल्लेख आया है-केले के बगीचों में जाकर वह कनेरों के 
कुंजों में जा पहुँचा, फिर जहाँ सीता की दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थान में जाकर 
मन्द-गति का आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा।* अन्य स्थल भी दृष्टव्य हैं।“* 
कपित्थमूल * 

नाम-संस्कृत-कपित्थ, दधिस्थ, कुचफल, गन्धफल, ग्राही फल, चिरपाकी। 
हिन्दी-विलिन, कैथ, कटबेल, कबीट.। मराठी-कंबठ, कवीट। गुजराती-कबीट, 
कोथा। तेलगू-एलॉगाकाय। फारसी-कबीट। उर्दू-्कैथ। लेटिन-ल्‍कष०ाां३ 


248 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


&॥०7/थयाणा। (फैरोनिया एलिफेंटम) 
वर्णन 

कपित्थ का वृक्ष सारे भारतवर्ष में पैदा होता है। यह वृक्ष बड़ा और बहुत वर्ष 
जीवी होता है। इसके पत्ते छोटे और चिकने होते हैं। इसके फूल छोटे और सफेद 
रंग के होते हैं। इसका फल गोल बेल के फल की तरह होता है। इसके फल की 
गिरि बहुत खट्टी होती है। उसमें स्थान-स्थान पर बीज जमे हुए होते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार इसका फल मीठा, कसैला, ग्राही, वीर्य-वर्द्धऔ और पित्त तथा 
वात को नष्ट करने वाला होता है। इसका कच्चा फल ग्राही, गरम, रूखा, हल्का, 
खटूटा, रुचि-जनक तथा विष और कफ को नष्ट करने वाला है। इसका पका फल 
रुचि कारक, खटूटा, कसैला ग्राही, मधुर, कंठशोधक, शीतल, वीर्य-वर्द्धक और 
दुष्पच्य है। यह श्वास, क्षय, रक्त-दोष, वमन, वायु, त्रिदोष, हिचकी, खाँसी एवं 
विष को दूर करता है। इसके बीज हृदय-रोग, मस्तक-शूल और विष-विसर्प को दूर 
करते हैं। इसके बीजों का तैल कसैला, ग्राही, स्वादिष्ट, पित्तननाशक तथा कफ, 
हिचकी, वमन और चूहे के विष को दूर करने वाला होता है। इसके पत्ते वमन, 
अतिसार और हिचकी को दूर करते हैं। 

- इसका रस-कानों में टपकाने से कानों की पीड़ा कम होती है। इसका कच्चा 
फल वाधा-नाशक एवं आँतों को सिकोड़ने वाला होता है। यह शरीर की खुजली 
को दूर करता है। इसके फूल विष-प्रतिरोधक होते हैं। 
उपयोग 

हिचकी- चरक के मतानुसार इसके कच्चे फल का रस साढ़े सात माशे से 
सवा तोले तक की मात्रा में पीपल और शहद के साथ देने से हिचकी में लाभ होता है। 

बमन- सुश्रुत के अनुसार बन्द न होने वाली वमन में इसके कच्चे फल का 
रस पीपर और शहद के साथ अवलेह के रूप में देने से लाभ होता है। 

इसके अतिरिक्त श्वेत-प्रदर, दमा, चर्म-रोग शीतादि रोग में भी यह लाभकारी 
सिद्ध होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी ऋषि भारद्वाज के आश्रम में कपित्थ का उल्लेख 
मिलता है-स्थान-स्थान पर बेल, कैथ, (कपित्थ), कटहल, आँवला, बिजौरा तथा 
आम के वृक्ष लगे थे, जो फलों से सुशोभित हो रहे थे।" 
कर्पूर 


नाम- संस्कृत- कर्पूर, घनसारः । चन्द्रसंज्ञ, सिताभ्र: इत्यादि । हिन्दी- कपूर । 
गुजराती- कपूर। मराठी-कार्पूर। बंगाली-कर्पूर। तैलंगी- कर्पूरमू। अरबी-काफूर। 
फारसी- कापूर। लेटिन- 0थ्राए्ञाण4 0ग०/भ्षणा। (केफोरा ऑफिसिनेर)। 
वर्णन ; 

कपूर के पेड़ चीन और जापान देश में अधिकतर पैदा होते हैं। इसकी छाल 
ऊपर से खुरदरी एवं भीतर से चिकनी होती है। इस पेड़ के मौर आते हैं और उन 


5 वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औपध परिचय एवं.... « 249 


पर मटर के समान फल लगते हैं। इनके बीजों में कपूर के समान गन्ध आती है। 
इस वृक्ष की छाल को गोदने से एक प्रकार का दूध निकलता है। उसी दूध से कपूर 
तैयार किया जाता है। भारत वर्ष में केले के झाड़ से पैदा होने वाला कपूर उत्तम 
माना गया है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

सुश्रुताचार्य के मतानुसार कपूर कड़वा, सुगन्धित, हल्का, लेखन त्तथा तृषा, 
मुख शोष (विरसता) और अरुचि को दूर करने वाला है। 

भाव प्रकाश के मतानुसार कपूर शीतल, वीर्य जनक, नेत्रों को हितकारी, 
हल्का, सुगन्धित, मधुर और कड़वा होता है। यह कफ, पित्त, विष, दाह, तृषा, 
अरुचि, मेद और दुर्गन्‍्ध का नाश करता है। कपूर पक्‍व व अपक्व भेद से दो 
प्रकार का होता है। झाड़ के रस को पकाकर जो कपूर बनाया जाता है उसे पकव 
कहते हैं और जो बिना पकाये हुए तैयार किया जाता है उसे अपक्व कहते हैं। 
पकाये हुए कपूर से बिना पकाया हुआ कपूर बहुत साफ और बढ़िया होता है। 
इसकी कीमत भी बहुत अधिक होती है। कई लोगों के मत से इस बिना पकाये 
हुए कपूर को ही ब्रास या भीमसेनी कपूर कहते हैं। 

आयुर्वेदिक मत में कपूर कई प्रकार का होता है। उसमें भीमसेनीकपूर, 
हिमकपूर, उदय-भास्कर कपूर, चीनिया कपूर, शंकरावास कपूर इत्यादि भेद विशेष 
रूप से प्रसिद्ध हैं। 

राजनियण्टुकार के अनुसार स्वच्छ भाँगरे के पत्तों के समान छोटे-छोटे टुकड़े 
वाला, वजन में हल्का, स्वाद में तिक्‍्त, ठंडा, अत्यन्त सुगन्धित, हृदय को प्रिय, तैल 
रहित कपूर, अत्यन्त उत्तम और राजाओं के योग्य होता है। इसके अतिरिक्त दूसरे 
प्रकार के नकली कपूर खराब होते हैं। 
उपयोग 

प्रमेह- दो रत्ती कपूर, पाव रत्ती अफीम की गोली बनाकर सोते समय लेने 
से अपने आप वीर्य का स्खलन होना और प्रमेह की शिकायत मिटती है। 

जुकाम- कागज की भोंगली में कपूर को रखकर श्वास के साथ उसकी धूनी 
से जुकाम मिटता है। 

इनके अतिरिक्त निमोनिया, चेचक, सुजाक, दमा, दन्त-शूल, गठिया, हैजा, 
बिच्छू का जहर, पित्ती आदि में भी कर्पूर लाभदायक है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसकी शीतलता की ओर संकेत करते हुए कहा 
गया है कि मेघ के उदर से निकली, कपूर की डली के समान ठंडी तथा केवड़े की 
सुगन्ध से भरी हुई इस बरसाती वायु को मानो अंजलियों में भरकर पीया जा 
सकता है।” 
कमल 

नाम- संस्कृत-अंबुज, पंकज, कमल, पदूम, पुण्डरीक 
इत्यादि । हिन्दी-कमल, कंबल, सफेद कमल, लाल कमल, 
नील कमल इत्यादि। बंगाली-पदूम, श्वेत-पदूम, रक्त 
पदूम, नील पदूम इत्यादि। मराठी-कमल, ताँवले-कमल, 

250 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





पॉँठरे कमल। गुजराती-कमल, धोला कमल। तेलंगी-कलंग समरा, नेल्लनामर, 
नललकुलब | तमिल-अम्बल, फारसी-नीलूफर, गुलनीलोफर । अरबी-बर्दनीलोफर । 
लेटिन- ॥३९८छाा०छंणा। 59९९०५५॥ (नेम्बियम स्पेसिओसम)। 

वर्णन 


यह पानी में पैदा होने वाली वनस्पति है। यह बड़ी कोमल होती है। इसका 
प्रकांड लता की तरह फैलने वाला होता है। इसके पते गोल बड़े-बड़े प्याले के 
आकार के, अरवी के पत्तों की तरह होते हैं। इन पत्तों पर पानी की बूँद नहीं 
ठहरती। ये चौड़े-चौड़े पत्ते थाली की तरह पानी में तैरते हुए दिखाई देते हैं। इन 
पत्तों के नीचे जो डन्डी होती है, उसको मृणाल अथवा कमल की नाल कहते हैं। 
कमल के फूल अत्यन्त सुन्दर और बड़े आकार के रहते हैं। इन फूलों में जो पीला 
जीरा होता है उसे कमल केशर कहते हैं। इसके फलों को पद्मकोष और बीजों 
को कमल गटूटे कहते हैं। कमल सफेद, लाल और नीले भेद से तीन प्रकार का 
होता हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार कमल शीतल, देह को सुंदर करने वाला और मधुर होता है। 
यह रक्त विकार, विस्फोट, विसर्प और विष को दूर करने वाला है। सफेद कमल 
शीतल, स्वादिष्ट, नेत्रों को लाभदायक तथा रुधिर-विकार, सूजन, व्रण और सब 
प्रकार के विस्फोटकों को दूर करने वाला है। 

रक्त कमल चरपरा, कड़वा, मधुर, ठंडा, रक्त-शोधक, पित्त, कफ और वात 
को शांत करने वाला तथा वीर्यवर्धक हैं। 

नील-कमल शीतल, पित्त-नाशक रुचिकारक, रसायन कर्म में उत्तम, देह की 
जड़ को दृढ़ करने वाला और बालों को बढ़ाने वाला है। 

नीलोत्पल जिसको फारसी में नीलोफर कहते हैं अत्यन्त स्वादिष्ट, शीतल, 
पचने में कड़वा और रक्‍्त-पित्त नाशक है। 
कमलिनी 

जड़, नाल, पत्र और बीजादि से युक्त खिले हुए कमल को पदूमनि कहते हैं। 
यह कमलिनी मधुर, शीतल, कड़ंवी, कसैली,स्तनों को दृढ़ करने वाली और 
रक्त-विकार, विष, सूजन एवं मूत्रकृच्छ में लाभदायक है। 

कमल के कोमल पत्ते शीतल, कड़वे होते हैं। यह शरीर की जलन को दूर 
करने वाले तथा प्यास, अश्मरी तथा बवासीर और कुष्ठ में लाभदायक हैं। 

इसकी जड़ कड़वी, कफ-पित्त में लाभदायक और प्यास को बुझाने वाली 
होती है। इसकी केसर शीतल, वीर्य वर्धक, संकोचक और कफ, पित्त, प्यास, विष, 
सूजन एवं खूनी बवासीर में लाभदायक है। इसके फूल मीठे शीतल तथा 
रक्त-विकार, चर्म-रोग एवं नेत्र-रोग में लाभदायक हैं। इनके बीज अर्थात्‌ कमल 
गटूटे, स्वादिष्ट, रुचिकारक, पाचक, गर्भ-स्थापक, वीर्य-वर्धक तथा पित्त, रक्‍्त-दोष, 
वमन एवं रक्‍त-पित्त को नाश करने वाले होते हैं। इसकी शहद अत्यन्त पौष्टिक, 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 25 


ब्रिदोष-नाशक एवं सब प्रकार के नेत्र रोगों को दूर करने वाली होती है। 

वाग्भट के मतानुसार बवासीर में इसकी केशर को शक्कर एवं मक्खन के 
साथ देने से लाभ होता है। 

चक्रदत्त के मतानुसार गुदाद्वार के निगमन में कमल के कोमल पते प्रातः काल 
शक्कर के साथ लेने चाहिये। 

भाव प्रकाश के मतानुसार रक्तातिसार युक्त पुराने ज्वर में उत्पल, अनार का 
छिलका और कमल की केशर इन तीनों को बराबर लेकर, पीसकर चावल के पानी 
के साथ लेना चाहिये। 

चरक के मतानुसार जिन स्त्रियों को हमेशा गर्भ-गिरने की शिकायत हो उनके 
लिये इसके बीज बहुत ही लाभदायक हैं। 
उपयोग 

सर्प-विष-इसकी मादा केशर काली मिर्च के साथ पीसकर, पीने और लगाने 
से साँप के विष में लाभदायक होता है। 

रकत-प्रदर-कमल की केशर, मुल्तानी मिट्टी और मिश्री के चूर्ण की फक्की 
देने से रकत-प्रदर और रक्‍तार्श में लाभ होता है। 

इनके अतिरिक्त दाद, गर्भ-स्राव, वमन, स्तनों का ढ़ीलापन इत्यादि में भी 
इसका प्रयोग लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में तो कमल का अनेकों स्थलों पर वर्णन किया गया है। 
इसमें कमल के सभी प्रकार यथा श्वेत कमल, रक्त कमल, नील कमल एवं इसके 
सभी अंगावयवों का भी उल्लेख किया गया है। 

मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन करते हुए श्री राम सीता से कहते हैं, 
“भामिनी सीते ! एक सखी दूसरी सखी के साथ जैसे क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार 
तुम मन्दाकिनी नदी में उतरकर इसके लाल एवं श्वेत कमलों को जल में डुबोती 
हुई इसमें स्नान क्रीड़ा करो ।”* हेमनत ऋतु में कमल की क्‍या स्थिति होती है 
इसका वर्णन करते हुए लक्ष्मण कहते हैं, “जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो 
गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित 
होने वाले कमलों के समूह पाला पड़ने से गल गये हैं। उनमें डंठल मात्र शेष रह 
गये हैं। इसलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है।”“ 

इनके अतिरिक्त रामायण में और भी अनेक* स्थलों पर कमल की शोभा एवं 
सौन्दर्य का वर्णन तथा विविध सन्दर्भों में इसका उल्लेख किया गया है। 
कुमुद 

नाम-संस्कृत-उत्पलिनी, कुमुदिनी, चन्द्रेष्ठा, कुवलयिनी, नीलोत्पलिनी। 
हिन्दी-कुमुदनी, कोई। बंगाल-हलाफूल, नालिफल, श्वेतशुद्धि। मराठी-पाँठर 
कमल। गुजराती-पोयणा। लेटिन-9)॥॥9॥8०8 8७8 (निम्फया एल्वा)। 
वर्णन 

यह कमल के ही समान पानी में पैदा होने वाली एक वनस्पति है। यह भी 


252 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लाल, नीले, सफेद फूलों के भेद से 3, 4 प्रकार की होती है। इसके फूल रात्रि को 
चन्द्रमा की रोशनी में खिलते हैं तथा सूर्य के प्रकाश में मुरझा जाते हैं। इसमें एक 
कोष होता है उस कोष का फल बन जाता है। कच्ची अवस्था में उसमें (भीतर) . 
लाल दाने होते हैं और पकने पर वे काले हो जाते हैं। इसके फल को धंधोल कहते 
हैं। इसकी जड़ को सालक कहते हैं। यह रकत-कुमुद एंवं नील कुमुद के भेद से 
दो प्रकार का होता है। था 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार यह स्वादिष्ट, पचने में कड़वी, कफ नाशक, तथा 
रुधिर-विकार, दाह, श्रम और पित्तनाश करने वाली है। इसकी जड़ तीक्ष्ण, 
संकोचक, निद्रा-दायक और पेचिश को दूर करने वाली होती है। लाल कुमुद के 
फूल कड़वे मधुर, शीतल, रक्‍्त-विकार को नष्ट करने वाले, ज्वर निवारक, 
कोमोद्दीपक और त्रिदोष को नाश करने वाले होते हैं। नील कुमुद का पुष्प 
सुगन्धित, शीतल, धातु परिवर्तक, पित्त-नाशक, रुचिकारक, शरीर को मजबूत 
बनाने वाला और बालों को बढ़ाने वाला होता है। 

गायना में इसकी जड़ और डण्डी का काढ़ा स्निग्ध और मूत्रल माना जाता 
है। इसे मूत्राशय की बीमारियों को दूर करने में तथा मूत्रकृच्छ के रोग के इलाज 
में काम लेते हैं। इसके फूलों का काढ़ा निद्रादायक और कामेच्छा नाशक होता है। 

वाल्मीकि रामायण में वन की शोभा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि- 
कहीं कुमुद-समूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। एक अन्य स्थान 
पर कहा गया है, “कुमुद के फूलों से भरा हुआ उस महान्‌ तालाब का जल- 
अत्यन्त शोभा पा रहा है।?० 

इनके अतिरिक्त और भी स्थलों पर कुमुद के दर्शन होते हैं ।९० 
कुश 

नाम-संस्कृत-दर्भ, कुशा, कुशः, सूच्यग्र, यज्ञ-भूषण । हिन्दी-कुश, डाभ, दबोलि। 
बंगाल-कुश। बम्बई-दर्भ, मध्य-प्रान्त-चिर-कुशा | गुजराती-दाभ । पंजाब-कुशा, दाभ। 
तेलगू-अस्वलयन दर्भ, कुश-दर्भा ॥ लेटिन- (॥) छञञ0॥80५8- 8 एञंतरा।ध2 
(डिसमोसटेचा बिपिनेटा) (2) छाब्डा०आं5ड 0/705०ए्ा०१०७ (इराग्रोसटिस 
सिनोसुराइडिस) | 
वर्णन 


कुश या डाभ हिन्दू धर्मानुसार पवित्र वस्तु है। ग्रहण-काल में प्रत्येक वस्तु को 
पवित्र बनाये रखने के लिये उसमें इसको रख दिया जाता है। यह सर्वत्र प्रसिद्ध 
है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

इसकी जड़ मधुर एवं शीतल होती है। यह तृषा (प्यास), पीलिया, श्वास एवं 
रक्त रोगों में लाभकारी है। यह वनस्पति मधुर कसैली, शीतल, कामोद्दीपक और 
मूत्रल होती है। यह स्निग्ध भी है। यह रक्त-विकार, पित्त, दमा, तृषा और मूत्र 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 253 


कृच्छु रोग में लाभदायक है। पीलिया, मूत्राशय के रोग, विस्फोटक एवं वमन में भी 
लाभदायक है। यह गर्भवती स्त्री के गभशिय को शान्ति पहुँचाता है। 
उपयोग 

आमातिसार-. इसकी जड़ का क्वाथ करके पिलाने से आमातिसार मिटता 
है। 2. इसकी और बेल की जड़ को चावलों के पानी के साथ पीसकर पिलाने से 
रक्त-प्रदर मिटता है। 

हिचकी-इसमें कुछ घी मिलाकर उसका धुआँ पिलाने से हिंचकी मिटती है। 

प्रदर-इसकी जड़ कों चावलों के पानी के साथ पीसकर तीन दिन तक पिलाने 
से प्रदर मिटता है। 

श्री राम द्वारा वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है, “भामिनी ! वन में 
काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओं के अग्र भाग सब ओर 
फैले हुए होते हैं, इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है /“ यज्ञ में इसका एक 
ही बार प्रयोग होता है, इस तथ्य को बताते हुए कहा गया है “हविष्य, घृत, 
पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर) के यूप-ये एक यज्ञ के उपयोग में आ जाने पर 
“यातयाम” उपभुक्त हो जाते हैं, इसलिये विद्वान इनका फिर दूसरे यज्ञ में उपयोग 
नहीं करते हैं।'० 

रामायण के अन्य उद्धरण भी 'कुश” को दशति हैं।' 
केवड़ा 

नाम-संस्कृत-धूलि-पुष्पिका, गन्धपुष्प, इन्दुकलिका, नृपप्रिया । केतकी । हिन्दी- 
केवड़ा, केतकी। बंगाली-केवरी, केतकी। बम्बई-केन्दा, केउर। दक्षिण-केवड़ा, 
गुजराती-केवड़ा । तमिल-केदगई, केदगी । तेलगू-केतकी, गोजंगी । उर्दू-केवरा । लेटिन- 
एशथा०भाए5 000थ75$आ7०७5 (पेडेनस ओडारेटिसिमस) एथ्ला्क्षाए5 ववलणांप 
(पेंडिनस टिक्टोरियस)। 
वर्णन 

केवड़े के फूल सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसिद्ध हैं। इसकी सुगन्ध प्राचीन काल से 
ही भारतवासियों को प्रिय लगती रही है। इसका पौधा गन्ने के पौधे के समान 
होता है जिसके लम्बे-लम्बे पत्ते होते हैं। इन पत्तों के किनारे पर काँटे होते हैं। 
इनका भुटूटा 5 से 25 से.मी. तक लम्बा रहता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार इसके पत्ते, तीक्ष्ण, कटु और सुगन्धमय होते हैं। ये विष-नाशक, 
कामोद्दीपक और पथरी तथा अर्बुद में लाभदायक होते हैं। इसका फूल कड़वा, 
तीक्ष्ण और शरीर-सौन्दर्य को बढ़ाने वाला होता है। इसकी केशर फेफड़े के ऊपर 
की झिल्ली (97७४७) के प्रवाह में उपयोगी होती है। इसका फल वात-कफ और 
मूत्राशय की तकलीफों में फायदा करता है। 
उपयोग 


254 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


रक्त-प्रदर-गाय के दूध में केवड़े की जड़ 6 माशे से तोला भर तक घिस कर 
शक्कर मिलाकर प्रतिदिन सुबह शाम पीने से भयंकर रक्‍त-प्रदर भी शान्त होता 
है। 

गर्भ-पात-जिस स्त्री को हमेशा गर्भ-पात होने की शिकायत हो उसको भी 
यह औषधि गर्भ रहने के दूसरे महीने से चौथे महीने तक सेवन करने से गर्भ-पात 
बन्द हो जाता है। 

रामायण में भी केवड़े का बहुत स्थानों पर उल्लेख उपलब्ध है यथा-“विभिन्‍न 
धातुओं से अलंकृत अचलराज चित्रकूट के प्रदेश कहीं पुखराज कोई स्फटिक तथा 
कोई केवड़े के फूल के समान दिखाई पड़ रहे हैं !'* पंचवटी के वर्णन में कहा गया 
है-“आम, अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा आदि वृक्षों से घिरे हुए ये पर्वत बड़ी 
शोभा पा हहे हैं।+ 

केवड़े का उल्लेख और भी अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता है यथा-विरही 
राम के प्रश्न में, ऋष्यमूक पर्वत पर, पंपासर के अरण्य में आदि।” 
केशर 

नाम-संस्कृत-कुंकुम, अग्नि-शेखर, अग्निशिखा। हिन्दी-केशर, जाफरान। 
मराठी-केशर। गुजराती-केशर | बंगाल-जाफरान। काश्मीर-कोंग। अरबी-जाफरान, 
फारसी-जाफरान | लेटिन- (7००७७ $40७७ (क्रोकस सेटिप्हस)। 
वर्णन 

केशर सारे भारत-वर्ष में प्रसिद्ध है। इसकी विशेष खेती भारत में काश्मीर में 
होती है। असली केशर लाल रंग की, बारीक तन्‍्तु वाली, स्वाद में कड़वी, चिकनी 
और कमल के समान गन्ध वाली होती है। केशर को पानी में भिगोकर कपड़े के 
ऊपर लगाने से अगर तत्काल पीले रंग का दाग न लगे तो उसे असली समझना 
चाहिये। अगर उसका दाग लाल रंग का पड़कर फिर पीले रंग का हो जाये तो उसे 
नकली समझना चाहिये। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार केशर-कड़वी, तिक्त, सुगन्धित, गरम, विष-नाशक, कृमि-नाशक, 
विरेचक, पौष्टिक सूखी-खाँसी में लाभदायक तथा गले के दर्द, आधा-शीशी, वमन, 
खुजली, त्रिदोष, पित्त, चर्म-रोग तथा मस्तक-रोग में लाभदायक है। यह अत्यन्त 
कामोद्दीपक है और वाजीकरण प्रयोग में इसका प्रयोग बहुत अधिक होता है। 
उपयोग 
उदरशूल 

दालचीनी और केशर की गोली बनाकर देने से उदरशूल मिटता है। 
कष्ट-प्रद मासिक-धर्म 

केशर और अकरकरे की गोली बनाकर देने से मासिक धर्म शुद्ध होने लग जाता है। 
यकृत वृद्धि 

करेले के रस में केशर को घिसकर पिलाने से यकृत की वृद्धि मिटती है। 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 255 


इसके अतिरिक्त हृदय-रोग, रकत-पित्त, मूत्राघात, आधा-शीशी, आदि में भी 
इसका प्रयोग लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में केसर का वर्णन निम्नलिखित स्थानों पर प्राप्त होता 
है-वसिष्ठ जी की गौ ने जिन वीरों को उत्पन्न किया; वे महापराक्रमी और तेजस्वी 
थे। उनके शरीर की कान्ति सुवर्ण तथा केसर के समान थी।” इसी प्रकार एक अन्य 
स्थल पर कहा गया है, “जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी 
कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित होने वाले कमलों के 
समूह पाला पड़ने से गल गये हैं /”* इनके अतिरिक्त और भी स्थल केसर को दशाते 
हैं क 
कैथ 

कैथ कपित्थमूल का ही पर्यायवाची है। अतः इसकी समीक्षा कपित्थ में ही समझ 
लेनी चाहिये। 
कुटज 

नाम-संस्कृत-कुटज, कोट, वत्सक, गिरि-मल्लिका, कालिइ्, शक्रशाखी, 
मल्लिका-पुष्प, इन्द्र, यवफल, वृक्षक, पाण्डुर्भुम। हिन्दी-कूड़ा, कोरया, इन्द्र जौ, 
गुजराती-इन्दर जव। मराठी-कुड़याचे बीज। कर्नाटकी-कोड़ासिगय बीज। फारसी- 
जबानकुंचिरक | अरबी- लेसानुत असाकीर। बंगाली-इन्द्रयव | लैटिन- प्रणणागक्षा। 8 
#जात095शाश४[08. 
वर्णन 

कुटज को कुड़े का झाड़ भी कहते हैं। यह 0 फीट तक ऊँचे होते हैं उसकी छाल 
आधे इंच तक मोटी तथा भूरे रंग की होती है। इसकी शाखाओं पर चार से आठ इंच 
लम्बे और तीन-चार चौड़े पत्ते आमने-सामने आते हैं। इसके फूल गुच्छेदार और सफेद 
रंग के होते हैं। इनकी फलियाँ एक से दो फीट लम्बी, पाव इंच मोटी और 2 एक साथ 
जुड़ी हुई होती हैं, ये फलियाँ लाल रंग की होती हैं। इनके भीतर के बीज जो इन्द्र जौ 
के नाम से मशहूर हैं कच्ची स्थिति में हरे तथा पकने पर गेहूँ के रंग के होते हैं। 

कुटज का वृक्ष दो प्रकार का होता है। एक सफेद और दूसरा काला। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

कुड़े के झाड़ की छाल और उसके बीज अर्थात्‌ इन्द्र जौ बहुत प्राचीन समय से 
इस देश में औषधि के रूप में व्यवहत होते हैं। इसकी छाल कड़वी, शुष्क, गरम, 
कसैली और कृमिनाशक होती है। अतिसार, रक्तातिसार, पित्तातिसार, आमातिसार 
इत्यादि रोगों पर यह वनस्पति बहुत ही उत्तम कार्य करती है। इससे बवासीर के 
अन्दर से पड़ने वाला खून बन्द हो जाता है। शरीर में ताकत आती है। चेहरे का 
पीलापन मिटता है आँखों में चमक आती है। 

इसके बीज अर्थात्‌ इन्द्रजी ग्राहा और शीतल हैं। बच्चों के अतिसार, 
रकतातिसार और आँतों की व्याधियों में जब गुदाद्वार से खून गिरता है और साथ 
में बुखार भी आता है, तब यह औषधि छाछ के साथ देने से बड़ा लाभ पहुँचाती है। 


256 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख निम्न प्रकार किया गया है-'इस समय 
मेघरूपी सोपान पंक्तियों द्वारा आकाश में चढ़कर कुटज और अर्जुन पुष्प की 
मालाओं से सूर्य-देव को अलंकृत करना सरल सा हो गया है /” 'सुमित्रानन्दन ! 
देखो इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं ? कहीं तो 
पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाष से व्याप्त हो रहे हैं और कहीं 
वर्षा के आगमन से अत्यन्त उत्सुक ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर 
रहे हैं।* 

इसके अतिरिक्त और भी विविध स्थलों पर कुटज का उल्लेख प्राप्त होता 
है।? 
कदम्ब 

नाम-संस्कृत-कदम्ब, सुरभि, हरिप्रिय, जीर्णपर्ण इत्यादि। हिन्दी-कदम्ब। 
गुजराती-कदम्ब। मराठी-कदम्ब। बंगाली-कदम। तेलगू-कदीमी। लेटिन- 
870००७॥०५५ (४०॥७७ (ऐन्थोसीफेलस कदम्ब) 
वर्णन 

भारत वर्ष के अन्दर सुगन्धित पुष्पों में कदम्ब का बड़ा महत्त्व है। इसका 
पुष्प भगवान कृष्ण को बड़ा प्रिय था। यह एक प्रकार का मध्यम आकार का पेड़ 
होता है। जो भारतवर्ष के पहाड़ों में स्वाभाविक तौर से बहुत पैदा होता है। इसका 
पुष्प सफेद और कुछ पीले रंग का होता है। इस फूल पर पंखुड़ियाँ नहीं होतीं, 
बल्कि सफेद-सफेद सुगन्धित तन्तु इसके चारों ओर उठे हुए रहते हैं। इसका फल 
गोल नींबू के समान होता है। 

कदम्ब की कई तरह की जातियाँ होती हैं। जिसमें राजकदम्ब, धारा कदम्ब, 
धूलिकदम्ब, भूमि-कदम्ब इत्यादि जातियाँ उल्लेखनीय हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार इसकी छाल तेज, कड़वी, मृदु और कसैली होती है। 
यह कामोद्दीपक, शीतल, दुष्पच्य, दूध बढ़ाने वाली, संकोचक, विष निवारक और 
घाव को भरने वाली होती है। गर्भशय की शिकायतों, रक्त रोग, वात, कफ, पित्त 
और जलन में यह लाभदायक है। इसका फल गरम, कामोद्दीपक और पकने पर 
पित्त कारक होता है। 

महर्षि चरक के मतानुसार इसकी छाल सर्पदंश में उपयोगी है। 
उपयोग 
ज्वर 

इनकी छाल का काढ़ा पिलाने से ज्वर में लाभ होता है। 

मुँह के छाले-इसके पत्तों के क्वाथ से कुल्ले करने से मुँह के छाले मिटते हैं। 

रामायण में इसका उल्लेख इस प्रकार है- 

कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी; क्या वह यहाँ 
पर है?” क्‍यों तुमने उसे देखा है ? अन्य द्रष्टव्य स्थल” 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 257 





नीम 

नाम-संस्कृत-निम्ब, नियमन, _ नेतर, पिचुमन्द, 
सतिक्तक, अरिष्ट, सर्वतोभद्रक, हिंगु, पीतसार, रवि-प्रिय 
इत्यादि। हिन्दी-नीम। बंगाल-नीमगाछ। मराठी-कडडुनिम्ब। 
गुजराती-लीमड़ो । तेलगू-वेष | तमिल-बेंबू । उर्दू-नीम, अंग्रेजी 
॥7कंगा ।4० (इण्डियन लिलाक)। लेटिन- #2843०॥४8 
[70०७ (एड्लांडिरेक्टा इण्डिका) > 

नीम भारतवर्ष की एक अनोखी कृति है। इसके वृक्ष भारत में सब ओर पैदा 
होते हैं और यहाँ यह जन-समाज में रात-दिन काम में आने वाली एक दवा है। 
इसे सब कोई जानते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

नीम हल्का, शीतल, कड़वा, ग्राही, ब्रण-शोधक, बालकों के लिये हितकारी 
तथा कृमि, वमन, व्रण, कफ, शोथ, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, हृदय की जलन, श्रम, 
खाँसी, ज्वर, तृषा, अरुचि, रुधिर, विकार एवं प्रमेह को नष्ट करता है। 

नीम के पत्ते नेत्रों के लिये हितकारी, पचने में कड़वे और कृमि, पित्त, अरुचि, 
विषविकार एवं कुष्ठ को नष्ट करते हैं। 

नीम की कोंपलें या कोमल पते संकोचक वात-कारक तथा रक्त-पित्त, 
नेत्र-रोग एवं कुष्ठ को नष्ट करने वाले होते हैं। नीम के फूल पित्त-नाशक, कड़वे 
तथा कृमि और कफ को नष्ट करने वाले हैं। नीम के डंठल खाँसी, श्वास, 
बवासीर, गुल्म, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाले हैं। नीम के कच्चे फल अथवा 
कच्ची निबोरी रस में कड़वी, पचने में चरपरी, स्निग्ध, हल्की, गरम तथा कोढ़, 
बवासीर, कृमि एवं प्रमेह को दूर करने वाली है। पक्की निंबोरी मीठी, कड़वी 
स्निग्ध तथा रक्त-पित्त, कफ, नेत्र-रोग, उरक्षत और क्षय-रोगों को नष्ट करने वाली 
है। निंबोरी की मगज कुष्ठ और कृमियों को नष्ट करने वाली है। नीम के बीजों 
का तैल कड़वा और कुष्ठ तथा कृमि रोग को नष्ट करने वाला होता है। 

नीम का पंचाग, रुधिर-विकार, पित्त, खुजली, व्रण, दाह और कुष्ठ को दूर 
करता है। नीम चर्म-रोग, कुष्ठ, चेचक, इक्जिमा एवं मलेरिया ज्वर आदि में काम 
आता है। वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर नीम का वर्णन आया है 
यथा-सुमंत्र कैकेई से कहते हैं, “भला आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी 
जगह नीम का सेवन कौन करेगा ? जो आम की जगह नीम को ही दूध से सींचता 
है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देने वाला नहीं हो सकता ।* कैकेई ! मैं 
समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल के अनुरूप जैसा स्वभाव था वैसा ही 
तुम्हारा भी है। लोक में कही जाने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु 
नहीं टपकता ।”* अन्य स्थल द्रष्टव्य है।” 
सप्तपर्ण 

नाम-संस्कृत-सप्तपर्ण, शारद, गृहनाश, सूति-पत्र, मदगन्ध, देव-वृक्ष, बहुपर्ण, 


258 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





शाल्मलि-पत्रक, गन्ध-पर्ण इत्यादि। हिन्दी-छतिवन, सतवन, सतोना, छातियान, 
शैतान का झाड़। बंगाल-छाटीन, छतिनगाछ। गुजराती-सातवण वृक्ष, सप्तपर्ण। 
मराठी-सातविण। वर्मा-लेटोप, टोगमियोक, कनाड़ी-ऐलेले हेल, हाले, जंप्रहेल, कोडेल, 
मुधोल, मुडीहवाले। अंग्रेजी- [)8 86 लेटिन- #ज्न॒णांब 5००ा०क्षां5 । 
वर्णन 

यह एक बड़ी जाति का वृक्ष है, उसके पत्ते सेंमर के पत्ते की तरह होते हैं इसी 
से इसका नाम सप्तच्छद रखा गया था। इसका दूध कड़वा होता है। इसका फल 
लम्ब गोल होता है और इसमें बीज रहता है। औषधि प्रयोग में इसकी छाल काम 
में आती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेद के अनुसार सप्तपर्ण कड़वा, कसैला, उष्ण-वीर्य, स्निग्ध, भूख बढ़ाने 
वाला, मृदु-विरेचक, कृमिनाशक और दूध बढ़ाने वाला होता है, यह हृदय रोग, 
दमा, धवल रोग, व्रण, रक्‍्त-विकार, त्रिदोष, अर्बुद एवं पुराने घावों को नष्ट करता 
है। दाँतों की सड़न में भी यह लाभ पहुँचाता है। इस वृक्ष की छाल संकोचक, 
कृमि-नाशक, धातु-परिवर्तक एवं ज्वर-नाशक है। जीर्णातिसार या पुराने पेचिश में 
भी यह लाभदायक है। इसका दूध व्रण पर लगाने से व्रण जल्दी भर जाता है। इसे 
तैल के साथ मिलाकर कान में डालने से कान का दर्द मिटता है। इसके नाजुक 
पत्तों को भूनकर पानी में पीसकर पुल्टिस बनाकर खराब फोड़ों पर बाँधने से 
फायदा होता है। 

वाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों पर सप्तपर्ण का उल्लेख मिलता है। 
यथा-पम्पासर का वर्णन करते हुए कहा गया है, “मालती कुन्द, झाड़ी, सप्त पर्ण 
आदि नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई पम्पा वस्त्राभूषणों से सजी हुई युवती 
के समान जान पड़ती थीं ४ शरद्‌ ऋतु के वर्णन में भी कहा गया है-पर्वत के 
शिखरों पर असन, छितवन, कोविदार, बन्धु-जीव तथा श्याम-तमाल खिले दिखाई 
देते हैं।” अन्य स्थल भी दृष्टव्य हैं।* 
अशोक 

नाम- संस्कृत-अशोकः, मधुपुष्पः. अपशोक-मंजरी, मारवाड़ी- असापालो। 
गुजराती- आसोपालव। मराठी- अशोक। लैटिन- ॥णा6०ं॥ ॥5००४ -(जोनेसिया 
अशोका) 589०७ ॥0८8 (सराका इण्डिका)। 
वर्णन 

अशोक का वृक्ष आम के वृक्ष के बराबर होता है। इसकी कई जातियाँ होती 
हैं। एक जाति के पत्ते राम-फल के समान और फूल नारंगी-रंग के होते हैं। जो 
वसन्‍्त ऋतु में मिलते हैं। दूसरे जाति के अशोक के पत्ते आम के पत्तों की तरह 
होते. हैं तथा कुछ पीली झाँई लिये हुए सफेद रंग के होते हैं। कच्चे फलों का रंग 
हरा तथा पकने पर ललाई लिये हुए काला हो जाता है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 259 


गुण-दोष एवं प्रभाव 

नियण्टु रत्नाकर के मतानुसार अशोक मधुर, शीतल, हड्डी को जोड़ने वाला, 
प्रिय, सुगन्धित, कूमि-नाशक, कसैला, गरम, कड़वा, देह की कान्ति को बढ़ाने 
वाला, स्त्रियों के शोक को दूर करने वाला, मल-रोधक तथा पित्त, दाह, श्रम, गुल्म, 
उदर-रोग, शूल, विष, बवासीर, व्रण, तृषा, सूजन, अपच और रुधिर-रोग को दूर 
करने वाला है। 

सोढ़ढल के मतानुसार अशोक की छाल रक्त-प्रदर रोग को नष्ट करने वाली 
है। चक्रधर भी इसको रकक्‍्त-प्रदर नाशक मानते हैं लेकिन चरक, सुश्रुत, राज-निघण्टु 
आदि ग्रन्थों के प्राचीन आचार्यों ने रक्‍्त-प्रदर की चिकित्सा में इसका उल्लेख नहीं 
किया है। 

इसकी छाल का स्वरस बहुत तेज और संकोचक है। अत्यधिक रजः स्राव के 
ऊपर इसे काम में लिया गया और वह पूर्ण रूप से उपयोगी सिद्ध हुआ है। सुश्ुत 
के अनुसार इसकी छाल, फूल और फल सांप, बिच्छू के जहर में उपयोगी हैं, किन्तु 
“महस्कर” और “केस” के मतानुसार इस औषधि में कोई भी विषनाशक गुण नहीं है। 
उपयोग 
रक्त-प्रदर , 

अशोक की छाल 8 तोला लेकर उसे 64 तोला पानी में उबालना चाहिये, जब 
तीन चौथाई पानी समाप्त हो जाये तब उसमें 8 तोला गाय का दूध डालकर फिर 
उबालना चाहिये। जब सब पानी जलकर दूध मात्र शेष रह जाये तब उतारकर 
मल-छानकर रोगी को पिलाना चाहिये। इससे रक्त-प्रदर में बहुत लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में तो अनेकानेक स्थलों पर ही इसका उल्लेख किया गया 
है- यथा....उसी समय मद भरे सुंदर नेत्रों वाली सीता जो फूल चुनने में लगी हुई 
थीं कनेर, अशोक और आम के वृक्षों को लाँघती हुई उधर आ निकलीं ।# 

इसी प्रकार श्री राम कहते हैं-“अशोक ! तुम शोक दूर करने वाले हो इधर 
मैं शोक से अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमा का दर्शन कराकर शीघ्र 
ही अपने जैसे नाम वाला बना दो। मुझे अशोक (शोक हीन) कर दो॥7* 
वाल्मीकि रामायण में और भी अनेक स्थलों पर अशोक का उल्लेख मिलता है 
यथा-पंचवटी में,” जनस्थान में, भ्रमित श्री राम”, पंपासर के पास* आदि-आदि ।? 
असन 

नाम-संस्कृत-असन, बीजक, पीतशाल, महाकुटज, बन्धूक, पुष्प, प्रियक। 
हिन्दी-असन, विजय सार का गोंद। बंगाली-पिया शाल। मराठी-असाणा, 
बिबला। गुजराती-बीयां, हीरादखन। कर्नाटकी-केपिन्न होने। तेलंगी-पेदभी, 
मदूंदी। तमिल-कुरिंजी। बम्बई-असन। पंजाबी-विजयसार। फारसी-कमरकस। 
उर्द- एमल्क्वन। अंग्रेजी-]009ा (00७6 । लेटिन--2070०३४905$ (व5पफ़ापा। । 

वणन. 
यह एक बड़े किस्म का साल वृक्ष के समान वृक्ष होता है। इसकी छाल मोटी 


260 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


और भूरे रंग की, कुछ पीलापन लिये हुए होती है। इसके पत्ते पीपल के पतों से 
कुछ छोटे होते हैं जो कि पाँच-पाँच, सात-सात के गुच्छों में लगते हैं। इन पत्तों के 
दोनों ओर बारीक रूयें होते हैं। इसमें डेढ़-दो इंच लम्बी नोकदार फलियाँ लगती 
हैं। इसके फल पीले आँवले के समान होते हैं। इसकी लकड़ी कालापन लिये हुए 
होती है.। इसमें एक प्रकार का लाल गोंद लगता है। यही गोंद विशेष करके 
औषधि के काम में आता है। 
गुण दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से यह वृक्ष और इसका गोंद गरम, कडुवा और तीखे स्वाद 
वाला होता है। यह विरेचक, कृमि नाशक, गल-रोग-निवारक, रकत-मण्डल-नाशक 
तथा कोढ़-विसर्प, चित्र-कुष्ठ, प्रमेह, गुदा के रोग और रक्‍्त-पित्त को नष्ट करने 
वाला है। यह त्वचा और केशों को लाभ पहुँचाने वाला और रसायन है। इसके 
फूल पचने में मधुर, कड॒ुवे, पाचक और वात-वर्द्धक हैं। 
उपयोग 
रकक्‍्त-प्रदर 

इसका गोंद रकक्‍्त-प्रदर में बहुत उपयोगी है। 
दन्त पीड़ा पु 
इसके पत्ते के काढ़े से कुल्‍्ले करने से दन्त-पीड़ा दूर होती है। 


इसकी लकड़ी को पानी में घिसकर लेप करने से चोट की पीड़ा दूर होती है। 


कुष्ठ 

इसकी लकड़ी को जौकुट कर, पानी में भिगोकर, मल छानकर पिलाने से 
कुष्ठ और रक्‍त-विकार में लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में राज-प्रसाद में, चित्रकूट पर्वत पर, माल्यवान पर्वत पर, 
लंका के अशोक वन में आदि स्थलों पर असन का उल्लेख किया गया है 
यथा-आम, जामुन, असन, लोप्र, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल आदि वृक्षों से 
यह पर्वत अनुपम शोभा का पोषण एवं विस्तार कर रहा है।” विरही श्री राम भी 
कहते हैं, 'सुवर्णमय वृक्षों के समान निर्मल एवं खिले हुए असन नामक वृक्षों को 
देखकर बार-बार उन्हें निहारती हुई भोली-भाली सीता जब मुझे अपने पास नहीं 
देखती होंगी, तब कैसे उसका मन लगता होगा ?* अन्य दृष्टव्य स्थल” 
कोविदार 

नाम-संस्कृत-काज्वन, रक्‍्त-ुष्ष, कान्तार, कनक प्रभ, कांचनार, कोविदार 
इत्यादि। हिन्दी--कचनार। बंगाली-सफेद कांचन, मरीठी-कांचन वृक्ष, कोरल। 
“गुजराती-चम्पाकासी, चम्पी, कांचनार, फारसी-कचनार | लेटिन-84एशंग8 
पृद्लाएव०5३, 880॥779 १२३०८॥॥$७ (बोहिनिया टेंकटोसा)। 
वर्णन ह 

कचनार का वृक्ष 5 से १0 फीट तक ऊँचा होता है। इसकी शाखाएँ नाजव 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..... 2७ 





और झुकी हुई रहती हैं। इसकी छाल एक इंच मोटी, खुरदरी भूरी एवं सफेद रंग 
की होती है। इसके पत्ते हरे और चौड़े होते हैं। पौष माह में इसके पत्ते गिरते हैं 
और फाल्यगुन से ज्येष्ठ तक नये पत्ते आते हैं। इसकी कलियाँ लम्बी और हरी होती 
हैं। इसके फूल दो इंच लम्बे, बड़े और सफेद, पीले तथा लाल रंग के होते हैं। इन 
फूलों में थोड़ी-थोड़ी सुगन्ध आती है, इन फूलों पर एक-एक बालिश्त लम्बी 
फलियाँ आती हैं। ये फलियाँ कड़वे स्वाद की होती हैं। इस पेड़ में भूरे रंग का एक 
प्रकार का गोंद लगता है, जो पानी में फूल जाता है। इसकी छाल रैँगने के काम 
आती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार लाल कचनार शीतल, सारक, अग्नि-दीपक, कसैला, 
ग्राही तथा कफ, पित, व्रण, कृमि, कण्ठमाला, कुष्ठ, वात, गुदाभ्रंश और रक्त-पित्त 
को दूर करता है। इसके फूल शीतल, कसैले, रूखे, ग्राही, मधुर, हल्के तथा पित्त, 
क्षय, प्रदर, खाँसी और रकत-रोग दूर करते हैं। 

सफेद कचनार ग्राही, कसैला, मधुर, रुचिकारक, रुक्ष तथा श्वास, खाँसी, 
पित्त, रक्‍्त-विकार, क्षत और प्रदर-रोग को नष्ट करता है। शेष गुण लाल कचनार 
के ही समान रहते हैं। 

पीली कचनार ग्राही, दीपन, व्रण-रोपक, कसैली तथा मूत्र-कृच्छ, कफ और 
वात-नाशक है। 

सुश्रुत के अनुसार इसके सब हिस्से दूसरी औषधियों के साथ सर्पदंश और 
बिच्छू के विष पर उपयोग में लिये जाते हैं सर्पदंश में इसके ताजा बीजों की लई 
बनाकर सिरके के साथ काटे हुए स्थान पर लगाते हैं। 

चक्रधर के अनुसार-लाल कचनार के छिलके को चावल के पानी और 
अदरक के साथ कण्ठमाला और गले की गाँठ पर लगाने से लाभ होता है। 

वाग्भट्‌ के मतानुसार कचनार के चूर्ण और कमल वृक्ष के सम्मेलन से तैयार 
किया हुआ घी मस्तिष्क, बौद्धिक शक्ति और स्मरण शक्ति को बढ़ाने में बहुत 
सहायता पहुँचाता है। 
उपयोग 
आँतों की कृमि 
इसकी छाल का क्वाथ पिलाने से आँतों के कीड़े मिटते हैं। 


इसकी ज़ड़ का चावलों की धोबन के साथ पुल्टिस बनाकर बाँधने से फोड़ा जल्दी 
पक जाता है। 

इनके अतिरिक्त मुँह के छाले, दन्त-पीड़ा, खूनी बवासीर, गंडमाला आदि में भी 
इसका प्रयोग लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कोविदार का कोविदार एवं कचनार दोनों ही नामों से 
उल्लेख किया गया है यथा- 


262 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है, यह कोविदार के चिन्ह 
वाली विशाल ध्वजा उसी के रथ पर फहरा रही है” 

गुफा का वर्णन करते हुए भी कचनार का उल्लेख किया गया है- 

“वहाँ कई ऐसे सरोवर भी देखने में आये, जो बाल-सूर्य की सी आभा वाले 
विशाल कांचन वृक्षों से आवृत थे /” कचनार का उल्लेख अन्य स्थलों पर भी किया 
गया है।॥९० 
बन्धुजीव 

नाम-संस्कृत-बन्धूक, बन्धुजीव, रक्त, माध्याहनिक, बन्धुजीवक, अर्कवल्लभा, 
हरि-प्रिया, ज्वरहन, रक्‍त-पुष्पा, शरद-पुष्पा, सूर्य भवना । हिन्दी-दुपहरिया । बंगाली-कन्धुलि, 
दुपहरिया । गुजराती-सौभाग्य सुन्दरी, दुपोरियौ । मराठी-ताम्बड़ी, दुपारी । तमिल-नागपू। 
पंजाब- गुल दुपहरिया। लेटिन-?&॥87९७ ?॥००॥०४ (पेन्टापेटस फीनीसिया) 
वर्णन 

यह एक प्रसिद्ध पुष्पवृक्ष है, जो उत्तर पूर्वीय भारत, बंगाल और गुजरात में पैदा 
होती है और भी कई स्थानों पर यह बाग बगीचों में लगायी जाती है। यह वनस्पति 
वर्षा ऋतु में पैदा होती है। इसका वृक्ष 3-7 फीट ऊँचा हो जाता है इसकी शाखाएँ और 
फूल बहुत सुन्दर होते हैं। इसके फूल सफेद, सिंदूरी और लाल रंग के होते हैं। ये फूल 
दुपहर के साथ खिलते हैं। इसलिये इनको दुपहिया कहते हैं। इसकी फली लम्बी और कुछ 
गोल होती है। इसके बीजों के ऊपर धब्बे लगे हुए रहते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार इसका फल मल-रोधक, किंचित गरम, भारी, कफ-नाशक, ज्वर-नाशक 
तथा वात एवं पित्त को दूर करने वाला है। 

चरक के अनुसार यह औषधि दूसरी औषधियों के साथ सर्पदंश में काम में ली 
हे है। वाल्मीकि रामायण में पर्वत के वर्णन में बन्धु जीव का उल्लेख किया गया 

(क 
काँस (इषीका) 

नाम संस्कृत-काशः, सुकाण्ड:, काकक्षु;, शिरी। मारवाड़ी-काँस। हिन्दी-काँस। 
गुजराती-कांसढ़ो । मराठी-कसई, कसाड़। बंगाली-केशोर, कशाड़। पंजाबी-कास, 
किलक। तेलगू-रेलु । लेटिन- $58००ाकषणा। 4फणाकिाल्पा (सेकेहरम एपोण्टेनम), 
580०लाबाणा $श्ला॥0९९प्राफएड (सेकेहरम सेमीडैकम्बरस) ॥ 
वर्णन 

यह एक प्रकार की घास होती है. इसकी यह विशेषता है कि जिस भूमि पर 
यह घास पैदा होती है, उस पर अन्य फसक नहीं हो सकती। शरदू-ऋतु में इस 
घास पर सफेद-सफेद सुन्दर मंजरियाँ लगती है” जिससे इसे सरलता से जाना जा 
सकता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार काँस शीतल, मधुर, तृप्ति-कारक, रोचक, बल एवं वीर्य को 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 263 


बढ़ाने वाला, पचने में मधुर, पेट को मुलायम करने वाला और स्निग्ध होता है। 
उपयोग 

पित्त, दाह, मूत्र-कृच्छू, क्षय, पथरी, उदर-विकार, क्षत-क्षय एवं पित्त-रोगों में 
यह लाभदायक है। इसकी और गोखरू की जड़ को मिश्री के सांथ औटाकर 
पिलाने से मूत्र-क्च्छ में लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में इसकी तीव्रता का उल्लेख करते हुए कहा गया है, 
“भामिनी ! वन में काँटेदार वृक्ष, कुश, काँस, होते हैं, जिसकी शाखाओं के अग्रभाग 
सब ओर फैले हुए होते हैं, इसीलिये वन कष्ट-दायक होता है!" 

इनके अतिरिक्त रामायण में अन्य भी कई स्थलों पर काँस का उल्लेख किया 
गया है॥० 
खजूर 

नाम-संस्कृत-दीप्य मुदारिका, पिंडखर्जूरा, 
पिण्डखर्जूरिका, स्वादुपिण्डा। हिन्दी-खाजि, खर्जूर, 
खारक, अरबी-नखलेह । बंगाल-खजूर । बम्बई-खर्जूर। 
ब्रह्मा-सुन्नवनुन । कन्‍नड़ी-कजुरा, कांरिका, खर्जुरा, 
गुजराती-खारेक, खजूर। मलयालम-इतपालम। 
मराठी-खजूर । नसीराबाद-खांजे, खुरमा । पंजाब-खाजि, 
खजूर। सिंध-कुरमा, काजि, तार, पिण्डचरी, तमिल-इचु, इन्जु कर्चुर, पेरेण्डू, पेरिन्जु, 
तिति । तेलगू-खर्जुरमू, मंजीइता, पेरिड, पेरिता। टर्की-करमा । उर्दू-खुममा । उड़िया-खांजुरि । 
लेटिन-?00०77 08०0/#ि७ (फोनिक्ड डेक्टिलिफेरा)। 
वर्णन 

यह वनस्पति सिंध में और दक्षिण पंजाब में ज्यादा होती है। इसका वृक्ष ऊँचा 
होता है। इसके प्रकांड पर पत्रवृन्त के डन्ठल लगे हुए होते हैं। इसके पत्ते कुछ 
भूरेपन लिए हुए होते हैं और खजूरीं के पत्तों से कुछ छोटे होते हैं। इसका फल 
2.5 से 7.5 सेमी. तक लम्बा रहता है। यह पकने पर कुछ लाल या हल्के बादामी 
रंग का होता है और मीठा रहता है इसकी कई भिन्न-भिन्न जातियों की खेती 
की जाती है। इसका बीज लम्ब-गोल रहता है। और इसके फल के बीच में खड़ी 
लकीर. शुरू से आखिर तक रहती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से इसका फल मीठा और शीतल रहता है। यह पौष्टिक, 
मोटा करने वाला, कामोदुदीपक एवं विषहर होता है। यह कुष्ठ, प्यास, श्वास, 
वायुनलियों का प्रदाह, धकान, क्षय, उदर रोग, ज्वर; वमन, मस्तिष्क-विकार और 
चेतना नष्ट होने पर लाभदायी होता है। इस वृक्ष से तैयार की हुई मदिरा 
कामोद्दीपक, नशा लाने वाली, मोटा बनाने वाली और रुचि पैदा करने वाली होती 
है। यह वायु नलियों के प्रदाह में और वात में उपयोगी तथा पित्तकारक होती है। 

रामायण में पंचवटी के वर्णन में कहा गया है कि पुष्पों, गुल्मों तथा 


264 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





लता-वल्लरियों से युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जल कदम्ब, तिनिश, 
पुंनाग, आम, अशोक, तिलक, केवड़ा आदि वृक्षों से घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा 
पा रहे हैं॥' अन्य भी स्थल द्रष्टव्य हैं।० 
गूगल ३ 
नाम-संस्कृत-गुग्गुल, कौशिक, कुम्भि, देवधूप, देवेष्य, काल-निर्यास, शिवा, 
वायुघ्न, मरुदिष्ट । हिन्दी-गूगल । मराठी-गूगल, कण गूगल । बंगाली-गूगल, गूगुल । 
तमिल-गुग्गल, गूगल। तेलगू- गूगल, महिषाक्षि। अरबी-अफलेतन, मुकल। 
फारसी-बोए, जहूदान । लेटिन-89[5क्ा700०॥0707 |/५।०७। (बालसेमाडेन्ड्रोन मुकुल) 
(णगग्राए7/०७ ४४७०४ (कॉँमिफोरा मुकुल) 
वर्णन 

गूगल के वृक्ष 4 से 72 फीट तक ऊँचे होते हैं इनकी शाखाओं की डंडियों 
पर हमेशा भूरे रंग का पतला छिलका उतरता हुआ दिखाई देता है। उस छिलके 
के नीचे छाल का रंग हरा होता है। इस वृक्ष के छोटी-बड़ी, बाँकी-टेढ़ी, काँटे वाली 
अनेकों डालियाँ निकलती हैं। इसके पत्ते दलदार और छोटे होते हैं। इसके छोटे 
और लाल रंग के फूल आते हैं। इसके फल चिकने और चमकदार होते हैं। इनका 
रंग भूरा और लाल होता है। इस वृक्ष के किसी भी हिस्से को तोड़ने से एक प्रकार 
की सुगन्ध निकलती है। इस वृक्ष पर सर्दी में एक प्रकार का गोंद निकलता है उसी 
को गूगल कहते हैं। 

यह वृक्ष विशेष कर सिंध, मारवाड़ और काठियावाड़ में पैदा होता है। 

भावप्रकाश के मतानुसार गूगल महिषाक्ष, महानील, कुमुद, पदूम और हिरण्य 
इन भेदों से पाँच प्रकार का होता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

भाव-प्रकाश के मत से गूगल कड़वा, उष्ण-वीर्य, पित्तकारक, मूदुविरेचक, 
पाक में चरपरा, रूखा, हल्का, हड्डी को जोड़ने वाला, वीर्य-वर्द्ध,, स्वर को 
सुधारने वाला, उत्तम-रसायन, दीपक और कफ-वात-ब्रण-अजीर्ण, मेद वृद्धि, प्रमेह, 
पथरी, व्याधि, क्लेद, कुष्ठ, आम-वात-ग्रन्थि-रोग, सूजन, बवासीर, गण्डमाला और 
कृमि रोग को नष्ट करने वाला होता है। यह मीठा मधुर रस युक्त होने से वात 
को कसैला होने से पित्त को और कड़वा होने से कफ को नष्ट करता है। इसलिये 
गूगल त्रिदोष नाशक है। नवीन गूगल वीर्य वर्द्धक और बलकारक होता है। पुराना 
गूगल शरीर को दुर्बल करने वाला और अनिष्ट कारक होता है। 
उपयोग 

प्रमेह-दारु हल्दी के क्वाथ के साथ योगराज गूगल को देने से प्रमेह में लाभ 
होता है। 
प्रसूति-रोग 


प्रसूति रोग में दश-मूल क्वाथ के साथ योगराज गूगल को देने से अच्छा लाभ होता 
है। 


इसके अतिरिक्त पाण्डुरोग एवं सूजन, नेत्र-रोग, उदर रोग एवं नष्टार्तव में भी 
वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 265 


यह लाभकारी होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी गुग्गुल का कई स्थलों पर उल्लेख किया गया है 
यथा राजा दशरथ की अलच्त्येष्टि में इसका प्रयोग किया गया है, 'श्मशान' भूमि में 
पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसी ने चन्दन लाकर रखा तो किसी ने 
अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारु की लकड़ियाँ ला- 
लाकर चिता में डालने लगा ० 
गुलाब-(सहस) (शत्पुष्पी) 

नाम-संस्कृत-महाकुमारी, शतपत्री, अतिमंजुला, तरुशी, शतदला इत्यादि। 
हिन्दी-गुलाब। बम्बई-गुलाब। मराठी-गुलाब। गुजराती-गुलाब। लेटिन-९०४३ 
(८०॥४/०४७ (रोज सेन्टिफोलिया), (२०५७ [20850०॥4 (रोज डेमेसकेना) 
वर्णन 


गुलाब के फूल सारे भारत वर्ष में प्रसिद्ध हैं। इसकी सफेद, गुलाबी, आदि 
कई जातियाँ होती हैं। इसको लैटिन में रोज डेमेस्केना, सेंटीफोलिया, रोज इंडिका, 
रोज एल्वा इत्यादि नाम से पहचानते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेद के मतानुसार गुलाब कड़वा, शीतल, कसैला, दस्तावर, रुचिकारक, 
वात-नाशक, कुष्ठ-नाशक, मुँह के मुँहासों को दूर करने वाला, सुगन्धित तथा दाह, 
ज्वर, रक्त-पित्त और विस्फोटक को नाश करने वाला होता है। यह शीतल, 
विरेचक, कामोद्दीपक तथा त्रिदोष, पित्त, कोढ़, कफ और रक्‍त-विकार में लाभदायक 
है। बिच्छू के विष पर भी यह लाभदायक है। जब गुलाब के फूल की पत्तियाँ झड़ 
जाती हैं तब उसका फल नजर आता है। पकने के पश्चात्‌ इसका रंग नजर आता 
है। इसका स्वाद हल्का मीठा होता है इसके अन्दर रुयें और लम्बे सफेद दाने होते हैं। 

गुलाब का फूल खुश्क और सर्द है। यह कब्जियत दूर करता है। इसको खाने 
से यकृत, मेदा और हृदय को बल मिलता है। इसको पीसकर दाँतों पर मलने से 
दाँत मजबूत होते हैं। इसके काढ़े से कुल्ले करने से गले की सूजन दूर होती है। 
घाव से बहते हुए खून पर इसको पीसकर भुर-भुराने से बहता हुआ खून बन्द हो 
जाता है। 

इसके अधिक प्रयोग से फेफड़ों को नुकसान होकर खाँसी पैदा हो जाती है। 
इसके दर्प को नाश करने के लिये गुलकन्द और कतीरे का प्रयोग करना चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में पंपासर पर इसका उल्लेख मिलता है यथा- यह विशाल 
बन टिट्टिभों, मोरो, शतपत्नों आदि से व्याप्त है” टस प्रकार रामायण में शतपत्रि 
का उल्लेख मिलता है। 
गूलर 

“गूलर” का समीक्षात्मक अध्ययन “उदुम्बर' के अन्तग- ही किया जाता है 
क्योंकि 'गूलर' “उदुम्बर” का ही पर्यायवाची है। 


266 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जाती 

नाम-संस्कृत-राजपुत्री, प्रियंबदा, मालती, सुवर्ण जाति का तेल मालिनी, वर्ष 
पुष्पा | हिन्दी-चमंली, चाबेली, चंपेली । बंगाल-जाति । गुजराती-चमेली । बम्बई-चमेली। 
तमिल-कोंडि मलिकई | तेलगू-जेजी । उर्दू-चमेली । फारसी-हशिम । अरबी-पसमयन | 
लेटिन-बरड्मापा। ठ0क्राीठओा। । 
वर्णन 

चमेली सारे भारत वर्ष में पैदा होती है। इसके पुष्प में बहुत अच्छी सुगन्ध 
आती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मतानुसार चमेली का फूल कसैला, कड़वा और तीखा होता है। 
यह गरम, वमन-कारक, विष-नाशक एवं घाव-पूरक है। इसके पत्ते मुख-शोथ, 
मुख-क्षत, दाँतों की पीड़ा, कान का दर्द, रक्त-विकार कोढ़, व्रण एवं पित्त में लाभ 
पहुँचाते हैं। इसके फूल की मात्रा 0 माशे तक और रस की मात्रा तीन तोले तक है। 
उपयोग 
मासिक-धर्म की रुकावट 

चमेली के पज्चाँग का क्वाथ पिलाने से मासिक-धर्म की रुकावट मिटती है 
और लीवर तथा तिल्‍ली की क्रिया सुधरती है। 
दन्त रोग 

इसके पत्तों को पानी में ओटाकर उस पानी के कुल्ले करने से दाँत और दाढ़ 
का दर्द मिटता है।. 

इसके अतिरिक्त सिर-दर्द, नपुंसकता एवं ध्वज-भंग, उपदंश, चर्मरोग आदि में 
भी इसका उपयोग लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भारद्वाज आश्रम में तथा मरीचि के आश्रम में “जाती! 
का उल्लेख किया गया है। यथा-'शिंशपा', आमलकी और जम्बू आदि स्त्रीलिंग 
वृक्ष तथा मालती, मल्लिका, और जाति आदि वन की लताएँ नारी का रूप धारण 
करके भारद्वाज मुनि के आश्रम में आ बसीं ।* मरीचि के आश्रम का वर्णन करते 
हुए कहा गया है-“कहीं श्रेष्ठ अगरु के वन थे, कहीं उत्तम जाति के सुगन्धित 
फल वाले तक्‍्कोलों (वृक्षविशेषों) के उपवन थे ॥”!" 
चन्दन 

नाम-संस्कृत-श्री खण्ड, चन्दन, भद्र श्री, तैलपर्णिक, गन्धसार, मलयज और चन्द्रधुति। 
हिन्दी-चन्दन, सफेद चन्दन। बंगाली-मराठी-चन्दन । कन्नडी-श्री गन्धमर। गुजराती-सुखड़। 
तामिल-चन्दन मरं। तेलगू-गन्धपुर चेक्का, फारसी-सन्दले सफेद। अरबी-सन्दले अब्यज। 
अंग्रेजी- 508] ॥(००० लेटिन- $क्राएणया। 4॥0एा (सैन्टेलमू अल्बम्‌)। 
वर्णन 

चन्दन का वृक्ष सदा हरित 20-80 फीट ऊँचापन एवं अर्द्धपराश्रयी स्वरूप का 
होता है। इसकी छाल कालापन युक्‍त भूरे रंग की, अन्तर छाल-लाल, लकड़ी तैल 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एकं.... / 267 


युक्त दृढ़ और सारभाग पीलापन युक्त भूरे रंग का तथा सुगन्धित होता है। 
पत्ते-विपरीत, 2-8 इंच लम्बे, अण्डाकार, लटवाकार, एवं उपपत्र रहित होते हैं। 
फूल-छोटे, निर्गन्‍्ध, जामुनी रंग के तथा गुच्छों में आते हैं। फल-मांसल, गोल एवं 
कृष्णाभ बैंगनी रंग के होते हैं। इसका केवल काष्ठसार ही सुगन्धित होता है। 

प्राचीन निघण्टुकारों ने चन्दन के कई भेद किये हैं। घ. नि. में चन्दन (श्वेत), 
रक्त चन्दन, कुचन्दन, कालीयक और बर्बरीक ये पाँच प्रकार के चन्दन के भेद 
लिखे हैं। रा. नि. में बेट्‌्ट और सुक्कडि नामक श्वेत चन्दन के दो भेद एवं रक्त 
चन्दन, पतंग (कुचन्दन), कालीयक, बर्बरक तथा हरिचंदन ये सब मिलाकर सात 
प्रकार लिखे हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

श्वेत चन्दन कड़वा, शीतल, रुक्ष, दाह-शामक, पिपासाहर, ग्राही, हृदय-संरक्षक, 
विषष्न, वर्ण्य, कण्डूष्न, वृष्य, आहूलाद-कारक, रक्‍्त-प्रसादक, मूत्रल, दुर्गन्‍्धहर एवं 
अंगमर्द-शामक है। 

इसका उपयोग ज्वर, रक्त-पित्त, पैत्तिक-विकार, तृषा, दाह, वमन, मूत्रकृच्छ, 
मूत्राघात, रक्तमेह, श्वेत-प्रदर, रक्त-प्रदर, उष्णवात, रक्तातिसार तथा अनेक चर्म-रोगों 
में किया जाता है। चन्दन शीत-वीर्य, रुक्ष, तिक्त-रस-युक्त, चित को आहलादित 
करने वाला और लघु होता है तथा श्रम, शोष, विष, कफ, प्यास, पित्त-विकार, 
रक्त-दोष और दाह को दूर करने वाला होता है। 
उपयोग 
वमन 

आँवले के रस के साथ चन्दन देने से वमन बन्द होता है। 
प्रमेह-प्रदर 

दुर्गन्‍्ध युक्त श्वेत-प्रदर, रबत-प्रदर एवं प्रमेह आदि में चन्दन का क्वाथ 
उपयोगी है। 

इसके अतिरिक्त और भी अनेकों रोगों में चन्दन लाभकारी सिद्ध होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी चन्दन का अनेकों स्थलों पर उल्लेख किया गया है। 
यथा-*चन्दन और अगरु की सुगन्ध से मिश्रित तथा धूप की मनोहर गन्ध से 
व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहले की भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा 
है!!!" इसी प्रकार श्मशान में भी चन्दन की आवश्यकता होती है, इस बात का 
परिचय देते हुए रामायण में लिखा है, श्मशान भूमि में पहुँचकर चिता तैयार की 
जाने लगी, किसी ने चन्दन लाकर रखा तो किसी ने अगरू, कोई-कोई गुग्गुल तथा 
कोई सरल, पद्मक और देवदारु की लकड़ियों को लाये ।!” इनके अतिरिक्त और 
भी बहुत से स्थलों पर चन्दन का उल्लेख मिलता है।'” 
जामुन 
नाम-संस्कृत-जम्बू, सुरभिचला, नीलफवा, महास्कन्धा, मेघमोदिनी, राजफला, 
शुक्रप्रिया । हिन्दी- जामुन, जामन, काला जामन, फलांदा, फलिंदा। बंगाल-जामगाछ, 


268 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 











काला जाम बम्बई-जांभूल, जांब जांबूडो । गुजराती-जामू, डँड 
जांमूडी, जांबो । आसाम-जांबू। मैसूर-नरेली। ६ 
कनाड़ी-जामुनरेली। पोरबन्दर-जांबू। तामिल-अरुगदम्‌ 
कोटेनरुम। तेलगू-नेसदू। उर्दू-जामन, फलेंदा। हे 
लेटिन-8एट्टागा9 /थव0००॥ (युजेनिया जाम्बोलेना) | के 
वर्णन 3७० 2७०० 

जामुन के वृक्ष भारत में प्रायः सब ओर पैदा होते हैं। इसकी तीन-चार. (3-4) 
जातियाँ होती हैं। एक जाति नदी के किनारे होती है उसके पत्ते कनेर के पत्तों की 
तरह और फल बहुत छोटे होते हैं। उसको जल जामुन” कहते हैं। दूसरी जाति के 
पत्ते आम के पत्तों की तरह और फल मध्यम कद के होते हैं इस जाति को “जामुन” 
कहते हैं। तीसरी जाति के वृक्ष बहुत ऊँचे और फैले हुए होते हैं। इसके पत्ते पीपल 
के पत्तों की तरह चौड़े, बड़े, चिकने और चमकदार होते हैं। इसके फल भी 2 से 
2 इंच तक लम्बे और । से ] इंच तक मोटे होते हैं। इस जाति को “राज 
जामुन” कहते हैं। यद्यपि इन तीनों जातियों के गुण-धर्म मिलते-जुलते हैं तथापि 
औषधि प्रयोग में राज जामुन” की जाति विशेष गुणकारी होती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से जामुन की छाल कसैली, मल-रोधक, मधुर, पाचक, रुक्ष, 
रुचिकारक तथा पित्त और दाह को दूर करने वाली होती है। इसके फल कसैले, 
मधुर, शीतल, रुचिकारक, रूखे, मल-रोधक, वात वर्द्धध और कफ, पित्त तथा 
अफारे को दूर करने वाले होते हैं। 

जामुन की गुठली मधुर, मलरोधक और मधुमेह को नष्ट करने वाली होती 
है। इसके अंकुर शीतल, रूखे, ग्राही और अफारे को पैदा करने वाले होते हैं। 
राज जामुन 

मधुर, गरम, कसैली, स्वर-शोधक, मलरोधक तथा श्वास, श्रम, मुख की 
जड़ता, अतिसार, कफ और खाँसी को दूर करता है। इसका फल रुचिकर, मधुर, 
स्तम्भक, भारी, दोषनाशक और स्वादिष्ट होता है। 
जल जामुन 

कसैली, शीतल, कड़वी, भारी, पाक में मधुर, पुष्टिकारक तथा दाह, अतिसार, 
रुधिर विकार, कफ, पित्त, भ्रम को दूर करने वाली होती है। 
उपयोग 

इसकी छाल के चूर्ण की फक्की देने से अतिसार मिटता है। 

इसका ताजा रस बकरी के दूध के साथ पिलाने से बच्चों का अतिसार मिटता है। 

इसकी गुठली के चूर्ण का सेवन करने से मधुमेह रोग मिटता है। 

रामायण में जामुन का वर्णन निम्नलिखित स्थलों पर दिखाई देता है यथा--“आम, 
जामुन, असन, लोध्र, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल, भव्य तिनिश, बेल, तिन्दुक, 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 269 


बाँस, काश्मरि आदि वृक्षों से व्याप्त वह पर्वत शोभा को बढ़ा रहा है श्री राम 
की विरह अवस्था में भी जामुन का उल्लेख आया है। यथा-जामुन जाम्बूनद 
(सुवर्ण) के समान कांति वाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम 
उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशंक होकर मुझे बताओ।'* इनके 
अतिरिक्त और भी स्थलों पर जामुन का उल्लेख किया गया है॥5 
जौ 

नाम-संस्कृत-यव, जव, हिन्दी-जव, जो जौ। मागधी-जौ। कन्नड़-मुंडजयव, 
मुंडजयवे। तमिल-वालिं, असिसु, वालिं अरिसु। तैलगू-यव धान्य, गोधुमलु यवल 
नेडधान्यमु । फारसी-जव, जओ। अरबी-शईर, शयईर | बंगाली-जब । नेपाली-टोस, 
भूटानी- नख। अंग्रेजी-80०५ लेटिन-स्णत०्णा ५वछक०। 
वर्णन 

जौ सफेद शूक (सुई या टूंड) से युक्त होता है। अतियव-इसमें शूक नहीं 
होता है। तोक्य-यह शूक से रहित, हरे रंग का तथा छोटा होता है। शूक धान्यों 
में यव (जौ) प्रसिद्ध है। जो उत्तर भारत में अधिक होता है। यह तृण जातीय 
वनस्पति 2-3 फीट ऊँची होती है। पत्ते-पतले और लम्बे होते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

जौ कषाय तथा मधुर रस युक्‍त, विपाक में कठु रस युक्त शीतल, लेखन, 
कोमल, व्रणों में तिल के समान पथ्य रुक्ष, मेधा तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, 
किंचित्‌ अभिष्यन्दी, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, बलकारक गुरु, अधिक रूप 
से वात तथा मल को करने वाला, शरीर के वर्ण को स्थिर रखने वाला, पिच्छिल 
एवं कण्ठ तथा चर्म सम्बन्धी रोग, कफ, पित्त, भेद, पीनस, श्वास, कास, उरुस्तम्भ, 
रक्त-विकार तथा तृषा को दूर करने वाला है। 
अतियंव 

यह जौ की अपेक्षा न्यून गुण वाला है। 

जौ का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी प्राप्त होता है। यथा-हेमन्त ऋतु के 
वर्णन में लक्ष्मण कह रहे हैं-““जौ एवं गेहूँ के खेतों से युक्त बहु संख्यक वन भाष से 
ढके हुए हैं तथा क्रौंच और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदय काल में इन वनों 
की बड़ी शोभा हो रही है।”!९ 
तमाल है 

नाम-संस्कृत-तमाल तापिच्छ, कालस्कन्ध, आर्मतद्रम, नील ध्वज और नील 
ताल। हिंन्दी-तमाल, श्मालतमाल, पसेंदु। बंगाली-तमाल गाछ । तेलगू-तमालुका, 
नुगचेट्टु | मगधी-तमाल वृक्ष । गुजराती-तमाल, द्राविड़ी पुछ मरम | कननड-होगेमरा। 
लेटिन-0थरथंग्रं8 ॥(०7॥ (गर्सिनिया मोरिल्ला)। 
वर्णन मु 

* तमाल पूर्वी बज्ञाल के जंगलों में और खासिया पहाड़, पश्चिम-प्रायद्वीप, मालाबार 

और कन्नर आदि के जंगलों में पाया जाता है। इसका वृक्ष छोटा होता है और शाखाएँ 


270 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


खूब फैली हुई होती हैं। पत्ते 3-4 इंच लम्बे, चौड़े और बर्छीनुमा होते हैं। फूल हरापन 
युक्त सफेद रइ के आते हैं और फल छोटे-छोटे गोलाकार होते हैं। बीज गुर्दाकार दीख 
पड़ते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

तमाल कषाय रस युक्‍त एवं व्रण, स्वेद, कफ, कृमि, ब्रध्न, विद्रधि, बहरापन, 
योनि तथा कर्ण सम्बन्धी रोग को दूर करने वाला है। यह विशेषतः दाह तथा विस्फोट 
का नाशक है। 

रामायण में भी कई स्थलों पर तमाल का उल्लेख किया गया है। यथा-“तदन्तर 
देवादारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्ष के 
साथ भरत की सेवा में उपस्थित हुए”''” इनके अतिरिक्त और भी स्थलों पर तमाल 
का उल्लेख मिलता है।* 
ताल 

नाम-संस्कृत-भूमिपिशाच, चिरायु, ध्वजाद्॒म, दीर्घदारु, दीर्घस्कन्ध, दीर्घ तरु, 
गुच्छ पत्र, मधुरसा, शतपर्व, तरुराज, तन्तुगर्भा। हिन्दी-ताड़, बंगाल-तल, तलगच्छ। 
मराठी-ताड़-तामाड़। कोंकड़-ताड़मद। गुजराती-ताड़। तमिल-करदलम। नीलम, 
तालि | तेलगु-करतलमू, नमताग, पोतातागु। उर्दू-ताड़ । लेटिन-80859057]#ऐ८ांशि- 
(बोरेसस फ्लेबिलीफर) 
वर्णन 

ताल के वृक्ष बहुत ऊँचे और सीधे बढ़ते हैं। इनके पत्ते बहुत बड़े और खूबसूरत 
होते हैं। ताड़ का वृक्ष 700 फीट तक ऊँचा होता है। उसके स्तम्भ की गोलाई 2 फीट 
तक होती है। स्तम्भ के सिरे पर 3-5 फीट के घेरे में 60-70 पत्ते एक साथ सटे हुए 
गोलाकार और झंझरदार होते हैं। पत्र-दण्ड 3-5 फीट का होता है। यह पुरुष और स्त्री 
जाति के भेद से दो प्रकार का होता है। स्त्री जाति पर नारियल के फूल के समान फल 
लगते हैं. और पुरुष जाति पर बाल आते हैं। इसके रस को ताड़ी कहते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार ताड़ का फल मीठा, शीतल, नशीला, मज्जा-वर्द्धक, कामोद्दीपक, 
कृमि-नाशक, पौष्टिक, मृदु-विरेचक और विष-नाशक होता है। यह पित्त, जलन, 
प्यास, थकावट, वात रोग और रक्त रोगों में लाभदायक है। इसके बीज मूत्रल, 
मृदु-विरेचक, नुकीले और पित-नाशक होते हैं। इसकी जड़ सुगन्धित, कुष्ठ रोग में 
उपयोगी और प्रसवकाल में लाभदायक है। इसके फूल तिल्‍्ली के बढ़ने पर लाभ 
पहुँचाते हैं। इसका कच्चा फल स्निग्ध, स्वादिष्ट, भारी, मल-रोधक, बल-कारक, 
शीतल, धातु-वर्द्धक, तृप्तिकारक, मांस-वर्द्धक है। 
उपयोग 

हृदय की जलन-इसके सूखे हुए फूलों के गुच्छे की राख को पिलाने से हृदय 
की जलन मिटती है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 27] 


चर्म रोग 

इसके पके हुए फल के गूदे का लेप करने से चर्म रोग मिटते हैं। 

इसके अतिरिक्त मूत्रातिसार, पित्त के रोग, मूत्र कृच्छ, हिचकी, उपदंश आदि 
में भी इसका उपयोग लाभ-कारी है। 

रामायण में भी कई स्थलों पर इसका उल्लेख उपलब्ध है यथाः-यज्ञशाला के 
निर्माण में उसका उपयोग होता था/होता है- “वह शाल, ताल और अश्वकर्ण 
नामक वृक्षों के बहुत से पत्तों द्वारा छायी हुई थीं, अतः यज्ञ-शाला में जिस पर 
कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लम्बी-चौड़ी वेदी के समान शोभा पा रही थी ॥!/* 
इसके अतिरिक्त समुद्र तट पर उत्पन्न वृक्षों में भी ताल शोभा पा रहा था।-“कहीं 
कदलीवन और कहीं नारियल के कुंज शोभा दे रहे थे। साल, ताल, तमाल तथा 
सुंदर फूलों से भरे हुए दूसरे वृक्ष उस तट प्रान्त को अलंकृत कर रहे थे" इसके 
अतिरिक्त और भी कई स्थलों पर ताल का वर्णन प्राप्त होता है!” 
त्रिफला 
लक्षण 
नाम एवं गुण 

हरड़, बहेड़ा और आँवला इन तीनों के फल यदि समान भाग में एकत्र किये 
जायें तो यही त्रिफला कहलाता है। इसके फलत्रिक और वरा ये भी नामान्तर हैं। 
त्रिफला कफ एवं पित्त को नाश करने वाली एवं प्रमेह व कुष्ठ को दूर करने वाली, 
दस्तावर, नेत्रों के लिये हितकर, अग्नि-दीपक, रुचिकारक एवं विषम ज्वर को नाश 
करने वाली होती है। 

आजकल विद्वान यद्यपि हरड़, बहेड़ा एवं आँवला-इन तीनों को एक साथ 
मिलाकर त्रिफला मानते हैं तो भी इनके सम भाग होने में मतभेद है। कोई एक 
भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और तीन भाग आँवला एवं कोई एक भाग हरड़, दो 
भाग बहेड़ा एवं चार भाग आँवला को त्रिफला कहते हैं। एक हरड़, दो बहेड़े और 
चार आँवले को भी बहुत लोग त्रिफला मानते हैं। उसी प्रकार एक हरड़ से एक 
भाग, दो बहेड़ा से दो भाग बहेड़ा और चार आँवले से चार भाग आँवला समझते 
हैं किन्तु यदि एक हरड़, दो बहेड़े और चार आँवले लिये जायें तो ये प्रायः समभाग 
ही होते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में त्रिफला का पृथक से उल्लेख नहीं किया गया है किन्तु 
त्रिफला में प्राप्त बहेड़ा एवं आँवला का उल्लेख इसमें स्थान-स्थान पर किया गया 
है। 
तिल 

नाम-संस्कृत-तिल, होम धान्य, जटिल, पापष्न, पितृतर्पण, स्नेह फल, वनोदूभव, 
तेल फल, पितृ धान्य। हिन्दी-तिल, काला तिल सफेद तिल। बंगाल-तिल गाछ, 
भादु तिल, कटिल, रासि। गुजराती-तल। मराठी-तिल्ली। बम्बई-कृष्ण तिल, 


तिल 082 -मंगरु तिल। पंंजाब-कुँजा, तिल, तिल्‍्ली। फारसी-कुंजेद। 
272 / रामायण तथा आयुर्वेद 


अरबी-जिल्दजिलन, सिमसिम | तेलगू--नुबल्लु, नऊ। तमिल-इलु, एलू। लेटिन- 


$65क्षा॥त वावीर्पा | 


वर्णन 

तिल की खेती भारतवर्ष में सब ओर होती है। इसका तेल खाने के काम में सारे 
भारत वर्ष में लिया जाता है। औषधि के लिये कृष्णतिल प्रयोग होता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेद के मतानुसार तिल चरपरे, कड़वे, मधुर, कसैले, भारी, कफ-पित्त 
कारक, बल-वर्द्धक, केशों को हितकारी, स्तनों में दूध उत्पन्न करने वाले, व्रणरोपक, 
चर्म-रोगों में हितकारी, दन्‍्त शूल नाशक, मल-रोधक, वात-विनाशक और बुद्धि-वर्द्धक 
होता है। सब तिलों में काले तिल उत्तम होते हैं। सफेद तिल मध्यम, वीर्य-वर्द्धक 
होते हैं और दूसरे तिल हल्के होते हैं। तिल्‍ली की खल मधुर, रुचिकारक, तीक्ष्ण, 
नेत्र-विकार करने वाली, मल स्तम्भक, रुसी और कफ, वात तथा प्रमेह को नष्ट 
करने वालीं है। 

तिल का तेल सब प्रकार के व्रण और जख्मों के ऊपर लगाने के काम में 
लिया जाता है। गर्मी के दिनों में दूसरे ब्रण-रोपक या व्रण शोधक द्रव्यों की अपेक्षा 
यह तेल अधिक हितकारी होता है। 

शारंगधर--के अनुसार इसके बीजों को पानी के साथ पीसकर लेने से रकतार्श 
में लाभ होता है। 

सुश्रुत-के मतानुसार इसके पत्ते साँप और बिच्छू के विष में लाभदायक हैं। 
उपयोग 
खूनी बवासीर 

तिलों को जल के साथ पीसकर मक्खन में मिलाकर चाटने से खूनी बवासीर 
का खून बन्द हो जाता है। 
मासिक-धर्म की रुकावट 

तिल के काढ़ेः में सोंठ, मिर्च और पीप॑र का चूर्ण डालकर पिलाने से मासिक 
धर्म की रुकावट मिटती है। 

इनके अतिरिक्त, खूनी खाँसी, अग्नि से जलना, मोच, नेत्र-रोग, अतिसार, 
गर्भशिय सम्बन्धी रोग, नागफनी थूहर का काटा, मस्तक पीड़ा, पथरी, गर्भशिय 
की पीड़ा, मुहाँसे, विषम ज्वर मकड़ी का विष, भिलावे की सूजन, बालों की सफेदी 
आदि रोगों में तिल का उपयोग बहुत लाभकारी होता हे। 

वाल्मीकि रामायण में तिल का भी बहुतायत से उल्लेख किया गया है। 
यथा-रामाश्वमेध में तिल का प्रयोग करने के लिये श्री राम कहते हैं, “महाबली 
सुमित्रा कुमार ! लाखों बोझ ढोने वाले पशु खड़े दाने वाले चावल लेकर चलें 
और दस हजार पशु तिल, मूंग, चना, कुल्थी, उड़द और नमक के बोझ लेकर 
चलें /'** भरत ने भी अपने स्वप्न में अपने पिता को तिल आदि खाते देखा, इस 
सन्दर्भ में भरत कहते हैं- फिर उन्होंने तिल और भात खाया इसके बाद उन्होंने 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 273 


सारे शरीर में तेल लगाया और फिर वे सिर नीचे किये तैल में ही गोते लगाने 
लगे? 

इसके अतिरिक्त और भी स्थल तिल हेतु द्रष्टव्य हैं, जहाँ रामायण में तिल 
का उल्लेख किया गया है।'* 
रद््वा 

नाम-संस्कृत-अमरी, अमृता, अनन्ता, अनुवल्लिका, असितालता, बहुवीर्य, 
भार्गवी, भंतहंत्री, धूर्ता, दूर्वा, गौरी, गुना, हरसालिका, हरिता, हरितालि, जया, 
महौषधि, महायरी, मंगला, सहस्रार्वा इत्यादि। हिन्दी-दूब, द्ुव, दुर्वा, दूब घास, 
काली घास, राम घास। गुजराती-दुर्वा, हरियाली, ध्रो। मराठी-दुर्बा, हरियाली। 
पंजाब-दूब, दुर्वा, कबर, खब्बवल, ताला, तिला। बंगाल-दूब, दुबला, दुर्वा। 
तमिल-अरूगीमपिल्लू, हरियाली । तेलगू-घोरिचा | अंग्रेजी-88॥08 07355, 000००, 
96७5 "7३55, 0000 (७७5, लेटिन-0,॥000 08९०५/)णा. 
वर्णन 

दूब एक प्रसिद्ध घास है जो प्रायः सारे भारतवर्ष में होती है तथा सभी इसे 
जानते हैं। इसका पौधा जमीन से ऊँचा नहीं उठता बल्कि जमीन पर ही फैला 
हुआ रहता है। इसलिये इसकी नम्रता को देखकर गुरुनानक ने एक स्थान पर 
कहा है- 

नानकनी चाहो चले, जैसे नीची दूब। 

और घास सूख जायेगा, दूब खूब की खूब।। 

दूब की तीन जातियाँ होती हैं--नील, श्वेत एवं गंडदूर्वा 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से दूब कसैली मधुर, शीतल, तथा पित्त, तृषा, अरुचि, वमन, 
दाह, मूर्छा, ग्रह-पीड़ा, भूत-बाधा, कफ, रक्‍्त-रोग और श्रम को नष्ट करने वाली 
है और तृप्तिदायक है। 

नीली या हरी दूब मधुर, कड़वी, शीतल, रुचिकारक, संजीवन, कसैली, 
रक्‍्त-शोधक, रक्‍त-पित्त, अतिसार, ज्वर, वमन, कफ, रक्‍त-रोग, तृषा, विसर्प, दाद 
और त्वचा के विकार को दूर करती है। सफेद दूब मधुर, रुचिकारक, कसैली, 
कड़वी, शीतल तथा वमन विसर्प, तृषा, कफ, पित्त, दाह, आमातिसार रक्‍्त-पित्त 
और खाँसी को दूर करती है। 

गंड दूर्वा अर्थात्‌ गांडर दूब, शीतल, लोहे को गलाने वाली, मल को रोकने 
वाली, हल्की, कड़वी, कसैली, मधुर, वात कारक, पचने में चरपरी तथा दाह, तृषा, 
कफ, रुधिर-विकार, कुष्ठ, पित्त एवं ज्वर को दूर करने वाली है। दूब की जड़ का 
काढ़ा वेदना शामक और मूत्रल होता है। चर्म रोग में इसकी जड़ का काढ़ा 
बनाकर दिया जाता है। 
उपयोग 

नकसीर 


274 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


इसका ताजा रस नाक में टपकाने से नकसीर तुरन्त बन्द हो जाता है। 

घाव 

इसके पंचाग को पीसकर लेप करने से घाव से रक्त स्राव तुरन्त बन्द हो 
जाता है। 

आमातिसार 

दूब. को सोंठ और सौंफ के साथ औटाकर पिलाने से आमातिसार मिटता है। 

इसके अतिरिक्त रकक्‍्त-प्रदर, पित्त की वमन, जलोदर, नेत्र-रोग, मूत्र में रुधिर 
बहना, मलेरिया ज्वर, मुँह के छाले, उपदंश के व्रण, खूनी बवासीर, पेशाब की 
जलन, मूत्रकृच्छ, ज्वर, पित्त की वमन, दाद एवं खुजली आदि में भी दूर्वा का 
प्रयोग लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में दूर्वा दल का उल्लेख एक-दो स्थलों पर प्राप्त होता है 
यथा-रामायण में एक स्थल पर उल्लेख आता है, “श्री राम! पूर्वकाल में हंसों का 
रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था। उनकी पाँखों का अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओं के 
बीच का भाग नूतन दूर्वा दल के अग्रभाग-सा कोमल एवं श्याम-वर्ण से युक्त होता 
था? 
धान 

नाम-संस्कृत-धान्य, शालि, तन्दुल, हिन्दी-चावल, धान। मराठी-ताँदुल, 
भात | गुजराती-चोखा, भात । सिंध-चाँवर । फारसी-बिरंज । अरबी-अर्ज, अरुज। 
तामिल--आरिशी, नेलू। तेलगु-बियर धान्यम्‌, उरलू बदलू। लेटिन-0फट8 
59०५9 । 
वर्णन 

चावल भारतवर्ष का एक प्रसिद्ध खाद्य पदार्थ है। आयुर्वेदिक मत से यह 
शालि धान्य, ब्रीहि धान्य, शिम्बी धान्य और क्षुद्र धान्य के भेद से 5 प्रकार का 
माना गया है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

शालि धान्य मधुर, स्निग्ध, बलकारक, किंचित मल-रोधक, कसैले, हल्के, 
रुचिकारक, स्वर को शुद्ध करने वाले, वीर्य पौष्टिक, वात-कफ को कुपित करने 
वाले, शीतल, पित्त-नाशक एवं मूत्रल होते हैं। 
रक्‍्त-शालि धान्य के गुण 

रक्त शालि-धान्यों में सर्वोत्तम होते हैं। वे बलवर्द्धक, कांति बढ़ाने वाले, 
त्रिदोष नाशक, मूत्रल, स्वर को श्रेष्ठ करने वाले, शुक्रजनक, प्यास को दूर करने 
वाले, विष नाशक, ज्वरध्न, ब्रण को दूर करने वाले तथा श्वास, खाँसी और दाद 
को नष्ट करने वाले होते हैं। 
राज-शालि धान्य 

राजशालिधान्य से तात्पर्य बासमती चावल से है। यह स्निग्ध, मधुर, अग्नि-दीपक, 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 275 


बलकारक, कांति-जनक, धातुवर्द्धक, त्रिदोष नाशक और हल्के होंते हैं। 
ब्रीहि धान्य 

मधुर, शीतवीर्य, मल-रोधक और शुक्र-रूप तथा बल देने वाले होते हैं। 
षष्टिक धान्‍्य 

मधुर-मल-रोधक तथा त्रिदोष नाशक, शीतल और सब प्रकार के चावलों में 
औ्रेष्ठ होते हैं। 

यूरोप के अन्दर चावल फेफड़ों की बीमारी, क्षय, वक्षस्थल के रोग और कफ 
के साथ खून जाने की बीमारी में लाभ दायक माना जाता है। उबला हुआ चावल 
पाचन-क्रिया की विकृति, आँतों के विकार और अतिसार में लाभदायक है। चावल 
का पानी ज्वर एवं आँतड़ियों की जलन में शान्तिदायक पदार्थ की तरह दिया 
जाता है। 

अतिसार या पेचिश के रोगियों के लिये चावल अधिक लामकारी है। आँतों 
के जख्म, खून के दस्त, गुर्दे तथा मसाने की बीमारियों में ये लाभ पहुँचाते हैं। 
चावल को भूनकर उसको रात भर पानी में भिगोकर उस पानी को प्रातः पीने से 
मेदे के कीड़े मर जाते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी धान का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता हैं- 
यथा- 

“अब ये ऐसे वन में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिन्ह 
दिखाई नहीं देगा। न धान आदि के खेत होंगे न टहलने के लिये बगीचे /“ इसी 
प्रकार एक अन्य स्थल पर भी वर्णन मिलता है, “जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए 
धान के खेत को फल से सम्पन्न करते हैं उसी प्रकार मैं भी वाण का प्रयोग करके 
वालि के वध द्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूंगा ।” इनके अतिरिक्त अन्य स्थल 
भी है।* 
पलाश 

नाम-संस्कृत-लता पलाश, पलाश, किंशुक, पर्ण, यज्ञिय, रक्‍्त-पुष्पक, 
क्षारश्रेष्ठ, वात-पोथ, ब्रह्म-वृक्ष तथा समिद्धवर। हिन्दी-पलाश लता, ढ़ाक, परास, 
टेसू, केसू, धारा, कांकरिया, छिउल। बंगाली-पलाश, गाछ। मगधी-पलश 
गुजराती-खाखरी, बेल खाकरा। मराठी-पलाश बेल क. मुतलु, मुदगद गिड़। 
तेलगू-तुका चेट्ट, मोदगु । तामिल-परशना । द्रा. पेलाशं। पं. पलाश। फारती-फलह। 
अंग्रेजी-स्‍॥० ४०७७ एथ॥९ लेटिन--8088 09050. 
वर्णन 

यह प्रायः सब प्रान्तों के वन-उपवनों में पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार 
होता है। पत्तेगगोल-गोल-एक-एक डन्डी पर तीन-तीन लगते हैं। डण्डी की ओर 
का हिस्सा कुछ पतला होता है और उसके नीचे का भाग कुछ चिकना तथा ऊपर 
का भाग रोंवेदार होता है। पत्तों का पत्तल बनाया जाता है। फलियॉ-सेम के समान 


276 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चिपटी, पतली और लम्बी-लम्बी होती हैं। बीज-गोल तथा चिपटे होते हैं। वसन्‍्त 
के समय इस पर पत्ते झड़ जाते हैं तथा फूल आता है। किंचित्‌ पीलापन युक्त 
लाल-लाल फूल बहुत सुहावने दीख पड़ते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

पलाश कषायं, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, अग्नि दीपक, वृष्य, सारक, उष्ण, 
टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, स्निग्ध एवं व्रण, गुल्म, वातादि दोष, गृहणी, आर्श, 
कृमि तथा गुदा में उत्पन्न होने वाले रोगों को दूर करता है। 

ढाक के फूल स्वादिष्ट, तिक्‍्त तथा कषाय रस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, 
वात जनक, कफ-पित्त, रक्‍्त-विकार तथा मूत्र-कृच्छ-नाशक, ग्राही, शीतल, तृषा 
एवं दाह को शमन करने वाले एवं वात-रक्‍त तथा कुष्ठ को अत्यन्त दूर करने 
वाले होते हैं। 

ढाक के फल लघु, उष्ण, विपांक में कटु रस युक्त, रुक्ष एवं प्रमेह, आर्श, 
कृमि, वात, कफ, कुष्ठ, गुल्म तथा उदर रोग के नाशक हैं। 


उपयोग 

इसकी पत्तियों का रस बच्चों की फुंसियों को दूर करने के लिये दही और 
हल्दी के साथ उपयोग में लिया जाता है। 

इसकी जड़, छाल, फूल सभी सर्पदंश की औषधि के रूप में काम में लिये 
जाते हैं। सुश्रुत के मतानुसार बिच्छू का डंक लगने पर इसके फलों का उपयोग 
करना चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में भी 'पलाश” का अनेक स्थलों पर उल्लेख उपलब्ध होता 
है यथा-“जैसे दूसरा कोई गंवार मनुष्य पलाश के फूलों पर ही मोहित हो उसके 
कड़वे फल को नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी 'शब्द-भेदी बाण-विद्या' की प्रशंसा 
सुनकर उस पर लटूटू हो गया ।* एक अन्य प्रसंग भी है, “कोई मनुष्य पलाश का 
सुंदर फूल देखकर मन ही मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर 
तथा सुस्वादु होगा, फल की' अभिलाषा से आम के बगीचे को काटकर वहाँ पलाश 
के पौधे लगाता व सींचता है; वह फल लगने के समय पछताता है।॥४० 
पिप्पली 

पिप्पली से तात्पर्य पीपल से है इसकी समीक्षा “अश्वत्थ' के अन्तर्गत ही 
समाविष्ट है। अश्व॒त्थ पिप्पली का ही पर्यायवाची शब्द है। 
पान 

नाम-संस्कृत-नागवल्ली, नागिनी, नागवल्लिका, पर्णलता, तांबूली, तांबूवल्ली, 
सप्तशिरा, मुखभूषण । हिन्दी-नागरवेल का पान, तम्बूल, बंगलापान | मराठी-नागबेल । 
गुजराती-नागरवेल, पान, कनटिकी-नागरबल्लि, पर्ण। तेलंगी-तामलपाकू, 
नागबलल्‍ली | तमिल-बेट्रिटली । फारसी-वर्गतम्बोला। अरबी-तम्बोला । उर्दू-पान । 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं;... / 277 


अंग्रेजी-88० ९४ लेटिन-?फएल 8ढ०। 
वर्णन 

ताम्बूल या नागरबेल का पान सारे भारत में भोजन के पश्चात्‌ खाने के काम 
में लिया जाता है। इसकी खेती मद्रास, बंगाल, बनारस, महोबा, साँची, लंका और 
मालवा के रामपुरा, मानपुर जिले में बहुत होती है। इन सब पानों में बनारस का 
पान सर्वोत्तम माना जाता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

पान चरपरा, कड़वा, गरम, मधुर, क्षार गुण युक्त, कसैला तथा वात, कृमि, 
कफ और दुःख को हरने वाला है। स्त्री सम्भाषण के विषय में यह अलंकार के 
समान है और धारणा शक्ति और काम शक्ति को बढ़ाता है। पान में जो यह तेरह 
गुण हैं वह स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं। 

राजनिषण्दु के अनुसार पान चरपरा, तीक्षण, कड़वा और पीनस, वात, कफ तथा 
खाँसी में लाभदायक है। यह रुचि कारक दाहजनक और अग्नि-दीपक हैं। 

भाव प्रकाश के मतानुसार पान विषध्न, रुचिकारी, तीक्ष्ण, गरम, कसैला, 
सारक, वशीकरण, चरपरा, रक्‍त-पित्त कारक, हल्का, वाजीकरण तथा कफ मुँह की 
दुर्गन्‍्ध, मल, वात और श्रम को दूर करता है। 

पुराना पान अत्यन्त रसभरा, रुचिकारक, सुगन्धित, तीक्ष्ण, मधुर, हृदय को 
हितकारी, जठराग्नि को दीप्त करने वाला, कामोद्दीपक, बलकारक, दस्तावर और 
मुख को शुद्ध करने वाला है। नवीन पान, त्रिदोष कारक, दाहजनक, अरुचिकारक, 
रक्त को दूषित करने वाला, विरेचक और वमन कारक है। वही पान अगर बहुत 
दिनों तक जल से सींचा हुआ हो तो श्रेष्ठ होता है। रुचि को उत्पन्न करता है। 
शरीर के वर्ण को सुन्दर करता है और त्रिदोष नाशक है। 

पान का प्रयोग कफ-प्रधान रोगों में विशेष रूप से होता है। 

उपयोग 

बच्चों की कव्जियत 

पान के डंठल पर तेल चुपड़कर बच्चों की गुदा में रखने से बच्चों की कब्ज 
और वादी के रोग मिटते हैं। 
सूजन 

पान पर तेल चुपड़कर गरम करके बाँधने से सूजन का दर्द मिटता है। 

इनके अतिरिक्त और भी अनेक रोगों यथा गर्भ-निरोध, जुकाम और सीने का 
दर्द, नेत्र-रोग, रंतौधी, बच्चों की सूखी खाँसी में पान का उपयोग अत्यन्त 
लाभ-कारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी पान का उपयोग एवं उल्लेख एक दो स्थलों पर 
प्राप्त होता है। यथा- कैकेई कहती हैं,-“यदि राम यहाँ से वन को नहीं गये तो 
मैं न तो भाँति-भाँति के बिछौने, न फूलों के हार, न चन्दन, न अंजन, न पान, न 
भोजन और न दूसरी ही कोई वस्तु लेना चाहूँगी। उस दशा में तो मैं यहाँ इस 


278 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जीवन को भी नहीं रखना चाहूँगी।”' 
पारिजात 

नाम-संस्कृत-पारिजात, प्रजापत, हारश्वृगार, नल कुंकुम, रागपुष्पी खरपत्रक। 
हिन्दी-हरसिंगार, सियारी, बिनारी कुटी, पारिजात+ बंगाल-हारसिंगार, सैफालिका । 
बम्बई-हार सिंगार, पारिजात, शिउली। मध्य-प्रान्त-शिरालू। देहरादून-हूरी । 
गढ़वाल-कुरी | गुजराती-जयापारवती। मराठी-खरामली, पारिजातक। 
पंजाब-हार-सिंगार, कुरी, लादुरी, पकुंरा, शियाली तमिल-मंजतपु, पेरिसादम । 
तेलगू-कृष्ण वेणी, पारिजातम्‌। उर्दू-गुलजाफरी, हारसिंगार। लेटिन-.0/ ०005 
#0एंञञॉं$.अंग्रेजी-0078। /8॥6 | 
वर्णन 

पारिजात के वृक्ष बड़े सुंदर होते हैं। इनकी ऊँचाई 5 से लेकर ॥2 फूट तक 
होती है। इसके फूल सफेद और फूलों की डण्डी केसरिया रंग की होती है। इन 
फूलों में बहुत मनोहर सुगन्‍्ध आती है। हि 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेद के अनुसार इसके पत्तों का रस कड़वा और चरपरा होता है, यह ज्वर 
के अंदर लाभदायक है। पारिजात ज्वर-नाशक कफ को दूर करने वाला, यकृत को 
उत्तेजना देने वाला, शामक और चर्म-रोगों को दूर करने वाला होता है। इसके पत्ते 
संटीनोन के समान कृमिनाशक और कटुपौष्टिक तथा पित्त-द्रावक होते हैं। इसकी 
छाल पित्त-नाशक और कफ-नाशक होती है और यह पैत्तिक ज्वरों में उपयोगी 
होती है। 

इसके पत्तों का ताजा रस. पित्त-निस्सारक, मृदु-विरेचक और कटु-पौष्टिक 
होता है। इसको थोड़ी सी शक्कर के साथ बच्चों को देने से उनकी आँतों के गोल 
और चपटे कीड़े निकल जाते हैं। 
उपयोग 

गठिया 

इसके फूलों का क्वाथ बनाकर पिलाने से गठिया में लाभ होता है। 

जीर्ण-ज्वर * 

इसके पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से जीर्ण-ज्वर मिटता है। 

गुध्नसी 

बिल्कुल हल्की आँच पर इसके पत्तों का क्वाथ बनाकर पिलाने से किसी भी 
औषधि से न मिटने वाली गृश्नसी मिटती है। 

वाल्मीकि रामायण में इसका प्रयोग मिलता है। रम्भा के सौन्दर्य-वर्णन में 
कहा गया है-उसके अज्ञों में दिव्य चंदन का अनुलेप लगा था और केश-पाश में 
पारिजात के पुष्प गुंथे हुए थे...... ॥/४* इसके अतिरिक्त और भी अयोध्या की 
अशोक-वनिका में भी इसकी प्राप्ति बतायी गयी है-“चम्पा, अशोक, पुंनाग, 
महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 279 


पारिजात से वह वाटिका सुशोभित थी।” 
प्रियंगू 

नाम- संस्कृत-प्रियंगु, फलिनी, श्यामा, गंधफला, कृष्णपुष्पी, कृशांगी, 
'फल-प्रिया, गौरी, कंगुनी, भंगुरा, पर्णभेदिनी, अंगना प्रिया हिन्दी-प्रियंगू, फूलफेन । 
बंगाल-प्रियंगू, गंधप्रियंगू। मराठी-प्रियंगू, गव्हला, गुजराती-प्रियंगू, धँवला। 
तेलगू-कोण्डनदुगा, इत्तदुगा। लेटिन-4 894 000क्षी$आंग॥9 । 
वर्णन 

यह एक झाड़ीनुमा वृक्ष होता है। इसके पत्ते जुड़वाँ और फूल-पीले रंग के 
होते हैं। फल लगभग 3/4 इंच मोटे, गोल रुएँदार और ताजे होने पर हरिण के 
रंग के और सूखने पर रंग बदल लेते हैं। इसके फलों में एक या दो बीज रहते 
हैं। इन बीजों का स्वाद खटूटा और तूरा तथा ताजी स्थिति में कुछ सुगन्ध युक्त 
होता. है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव * 

आयुर्वेदिक मतानुसार इसकी जड़ और इसकी छाल कफ और पित्त को दूर 
करने वाली कड़वी चरपरी ज्वर-नाशक, कामोद्दीपक, वात और पित्त के प्रकोप 
को दूर करने वाली तथा रक्तातिसार, धवल-रोग, चर्म-रोग और गलित-कुष्ठ में 
लाभ दायक है। यह खराब दुर्गन्‍्ध, बुखार की जलन, प्यास, अनैच्छिक वीर्य-स्नाव, 
वमन, शरीर की जलन और खून की खराबी को दूर करती है। इसके पत्ते वमन 
कारक एवं उदर शूल को रोकने वाले हैं। इसके फूल गलित-कुष्ठ में लाभदायक 
होते हैं। इसके फल मीठे, चरपरे, पचने में भारी ठन्डे, पौष्टिक, आँतों के लिये 
संकोचक, व्रण को भरने वाले, कफ और पित के प्रकोप को दूर करने वाले और 
मूत्र सम्बन्धी शिकायतों में लाभदायक होते हैं। इसके बीज मीठे, चरपरे, ठन्डे, 
खुश्क, संकोचक, पौष्टिक एवं पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाले हैं। 

इसके पत्तों को पानी में भिगोकर मलछानकर मिश्री मिलाकर पीने से मूत्र 
नली का दाह मिटता है। इसके फूलों के चूर्ण को शहद के साथ चटाने से 
रक्त-पित्त मिटता है। इसके फल खाने से अतिसार मिटता है और शरीर की 
शक्ति बढ़ती है। 

वाल्मीकि रामायण में सुग्रीव के अभिषेक के समय प्रिंयगू का उल्लेख मिलता 
है-'पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्ण-भूषित, श्वेत छत्र, सोने की डंडी 
वाली दो सफेद चँवर, सब प्रकार के रत्न, बीज और औषधियाँ, अक्षत-सोना-प्रियह्ू 
आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए'* लंकापुरी के वर्णन में भी प्रियंगू का 
उल्लेख मिलता है यधा- 'उन कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल, कनेर, कुटज, केतक, प्रियंगू 
आदि देखे /* इनके अतिरिक्त और भी स्थलों पर प्रयंगु का उल्लेख मिलता है।'* 
बिम्बी 

नाम-संस्कृत-बिम्बाफल, रक्त-फला, तुडी, ओष्ठोपमफला। हिन्दी-कन्दूरी, 
कन्दौरी | मराठी-बिम्बी,गोडतोडली, कोडंबली । बंगाली-तेलाकुचा, गुजराती-गलेदू, 


280 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गलुदा, घोलां मीठी। अरबी-कवरेहिन्द। फारसी-कुन्ड्रस। तेलगू-दोडतिरो। 
तमिल-कोवे | लैटिन-(00०0॥8 ॥7008, 0९ए॥4|॥0/8-॥7008. । 
वर्णन 

कन्दौरी की लताएँ होती हैं। इसकी बेलें बरसात में पैदा होकर फूलती-बढ़ती 
हैं। इसके पत्ते गहरे हरे रंग के, फूल गुल-चाँदनी की तरह और फल परवल की 
तरह होते हैं। इसके बीज कागजी नींबू के बीज की तरह होते हैं। इसका फल 
कच्ची स्थिति में हरा, सफेद, धारीदार और पकने पर लाल हो जाता है। यह दो 
प्रकार का होता है-एक कड़वा और एक मीठा। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से मीठी कन्दौरी मधुर, शीतल, भारी, स्तनों में दूध पैदा करने 
वाली, कफ-पित्त नाशक तथा दाह, ज्वर, रक्त-पित्त, खाँसी, श्वास और क्षय रोग 
को हरने वाली है। 

इसके फल भारी, स्वादिष्ट, शीतल, मल स्तम्भक, स्तनों में दूध पैदा करने 
वाले, दुष्पच्य, वात कारक, संकोचक और ज्वर-निवारक हैं। वे कोढ़, वात, शरीर 
की जलन, बच्चों की खाँसी, वायु-नलियों के प्रदाह, श्वास, क्षय, पीलिया, रक्‍्त-विकार 
और पित्त-जन्य प्रदाह को दूर करते हैं। इसके पत्ते मीठे, तिक्त, शीतल और आँतों 
का संकोचन करने वाले होते हैं। ये ग्राही, वात कारक तथा कफ और पित्त को 
शक्ति देने वाले होते हैं। इसके फूल खुजली को मिटाने वाले तथा पित्त एवं 
पीलिया की बीमारी में लाभदायक हैं। 

कड़वी कन्दौरी का फल कड़वा, चरपरा, विरेचक, विष-निवारक और वमनकारक 
है। यह कफ, पित्त, मुँह से दुर्ग आना, अरुचि, खाँसी और रक्त-पित्त को नष्ट करने 
वाला है। 
उपयोग 

विरचेन 

इसकी जड़ की छाल के दो माशे चूर्ण की फक्की लेने से अच्छी तरह से दस्त लग 
जाते हैं। 
प्रमेह एवं बहु मूत्र 

इसकी जड़ की छाल का ताजा रस एक तोले की मात्रा में प्रतिदिन प्रातः काल देने 
से प्रमेह एवं बहु-मूत्र-रोग में लाभ होता है। 

इनके अतिरिक्त यह जिह्ना के घाव एवं कर्ण-रोग आदि में भी लाभकारी होती है। 

रामायण में भी बिम्बी का अनेक स्थलों पर उल्लेख प्राप्त होता.है यथा-सीता 
के ओठों की समानता करते हुए कहा गया है, “उनके केश काले-काले और ओष्ठ 
बिम्ब-फल के समान लाल थे /””” उनका बिम्ब फल के समान लाल ओदठों, सुंदर 
नेत्रों, मनोहर भौंहों, रुचिर केशों-वाला मुख राहु-ग्रस्त चन्द्रमा-सा प्रकाशित हो रहा 
था।४ 
बिल्वा फल 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 28] 


नाम-संस्कृत-बिल्व, श्री फल, पूतिवात, शैल पात्र, लक्ष्मी पुत्र, गन्ध-पत्र, 
शिवेष्ट इत्यादि | हिन्दी बेल, बिली, श्री फल। बंगाल-बेल, बिल्व। बम्बई-बेल, 
बिली । मराठी-बेल, गुजराती-बिली | तमिल-बिलूबम । तेलगू-बिल्वमु । उर्दू -बेल 
अरबी-सफरजले। अंग्रेजी-848० ॥0॥ ७० लेटिन--82०४।७ |/क्षा००५ (इगल 
मारमेलोस)। 
वर्णन 

बेल का वृक्ष मध्यम आकार का होता है। शाखाओ में काटे होते हैं, पत्ते 
त्रिदल या एक डण्ठल में तीन-तीन लगते हैं। फूल सफेद और सुगन्धित होते हैं। 
इसके फल गोल, स्वादिष्ट और सख्त छिलके वाले होते हैं तथा उनमें बहुत से 
बीज होते हैं और उन बीजों में गोंद होता है | 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार बेल मीठा, हृदय को बल देने वाला, गरम, कसैला, रुचिकारक, 
अग्नि-दीपक, संकोचक, रुखा, पित-कारक, कड़वा, चरपरा, भारी, पाचक तथा 
वातातिसार और ज्वर को नष्ट करने वाला होता है। 

बेल का कच्चा फल स्निग्ध, भारी, रुचिकारक, जठराग्नि को दीप्त करने 
वाला, मलरोधक, पाचक, कड़वा, हल्का, गरम, कसैला, तथा शूल, आमवात, 
संग्रहणी और कफ के अतिसार को दूर करने वाला होता है। 

बेल का पका हुआ फल दाह पैदा करने वाला, मधुर, भारी, कसैला, 
मल-रोधक, कड़वा, गरम, त्रिदोष कारक, दुष्पच्य और वात-कारक तथा मन्दाग्नि 
को उत्पन्न करने वाला होता है। बेल की जड़ मधुर तथा त्रिदोष, वमन, शूल को 
नष्ट करने वाली, हल्की तथा मूत्र-क्च्छ, वायु, कफ और पित्त का नाश करने 
वाली होती है। 

बेल के पत्ते कफ, वात, आम और शूल को नष्ट करते हैं। 
उपयोग 

अतिसारे 

इसके कच्चे फल के गूदे को सेक कर मिश्री के साथ खिलाने से पुराना 
अतिसार और आमातिसार मिटता है। 

ज्वर 

शीत ज्वर एवं ऐसा ज्वर जिसका कारण मालूम न हो, बेल-गिरी के चूर्ण की 
फक्की देने से दूर होता है। 

इनके अतिरिक्त मूत्रकृच्छू, विसूचिका, सर्प-विष, खराब-फोड़े, मसूड़े का रोग, 
मृंदाग्नि, ज्वर पागलपन, आँख का दुखना, संग्रहणी, वमन, गर्भवती स्त्री का वमन, 
कामलारोग, कानों का बहरापन आदि रोगों में भी बिल्व बहुत उपयोगी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी स्थान-स्थान पर बेल का उल्लेख किया गया है। श्री 
राम वन में जाते समय अन्य विविध वृक्षों के मध्य बेल का वृक्ष भी देखते हुए 
कहते हैं, “सिंह, व्याप्र, सूअर और हाथी भी इस जंगल की शोभा बढ़ा रहे हैं। धव 


282 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


(धौरा) अश्वकर्ण, ककुभ, बेल, तिन्दुक, पाटल तथा बेर के वृक्षों से भरा हुआ यह 
भयंकर वन कया है ? इसका क्या नाम है?» इसी प्रकार वनवास में भी वन में 
विचरण करते श्री राम सीता से कहते हैं, 'देखो ये भिलावे और बेल के पेड़ अपने 
फूलों ओर फलों के भार से झुके हुए हैं. ॥*" इनके अतिरिक्त और भी अनेक 
स्थानों पर बिल्व का उल्लेख प्राप्त होता है।* 
बेला 

नाम-संस्कृत-बेला, बम्बई-बेलीपाता, बंगाल-बोला, चेलवा। 
तमिल-निरष्यरुती | तेलगू-इट्टागोबू। उड़िया-बेनिया। लेटिन-नाछा$०७५७ 
व।8०९५७ । 
वर्णन 

बेला का वृक्ष जंगलों में अधिक होता है एवं वाटिकाओं में भी इसे लगाते हैं। 
इसका वृक्ष 5-7 फीट ऊँचा होता है। पत्ते मल्लिका के समान पर उनसे बड़े होते 
हैं जो 0 से 2.5 से.मी. तक लम्बे होते हैं। फूल सुंदर एवं मर्गान्थित होते हैं, ये 
वर्षा ऋतु में फूलते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

बेला शीतल, लघु, तिक्त-रसन्युक्त एवं त्रिदोप, कान, नेत्र-मुख सम्बन्धी 
समस्त रोग को दूर करने वाली होती है। इसके तेल के भी ये ही सब गुण हैं। 
इसकी जड़ ज्वर नाशक होती है और मालिश तथा लेप करने की औषधियों में 
मिलायी जाती है। 

इसकी छाल का चूर्ण वामक द्रव्य की तरह दिया जाता है और पत्तों का 
निर्यास जख्म को धोने के काम में लिया जाता है। कर्णशूल को मिटाने के लिये 
इसके फूलों को दूध में उबालकर कान में डालते हैं। त्वचा की शिथिलता को 
मिटाने के लिये ताजे फल का पीला रस त्वचा के ऊपर रगड़ा जाता है। इसके पत्ते 
मर्दुविरेचक और व्रण को भरने वाली औषधि की तरह काम में लेते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में बेला का कहीं स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
बाँस 

नाम-संस्कृत-बहुपल्‍लम, धनुद्र॒म, वृहत्तृण, धानुष्य, दृढ़ ग्रन्थ, दृढ़ कांड, 
दुरारुह, कमठ, कंटकी, कंटालु, कीचक, मृत्यु-बीज, मस्कर, वंश, वेणु, यव-फला 
इत्यादि । हिन्दी-बांस, कांटा बांस, मगर बांस, मल बांस, कंटक। बंगाली-बांस, 
बेहूर बांस। बम्बई-दोंगी, कलक मध्य प्रांत-कंटक। गुजराती-बांस। 
मराठी-कलक । संथाल-मठा | फारसी-नाई । पंजाब-नल, मगर, मगेरी । उर्दू-बाँस, 
तमिल-अबल, तेलगू-वोगू। अंग्रेजी-$७7५ छेक्षा/900 । लेटिन ए्ञातत058 
#पराता40९३ । 
वर्णन 

बाँस भारत वर्ष में सभी ओर दूर जंगल और पहाड़ों की तलहटियों में उत्पन्न 
होते हैं। इसके पौधे एक दम सीधे और लम्बे-लम्बे चले जाते हैं। कहीं-कहीं इनकी 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.../ 283 


र 


ऊँचाई 40/50 फीट तक हो जाती है। बासों की दो जातियाँ होती हैं, एक नर और 
एक मादा। नर बाँस ठोस होते हैं और मादा बाँस पोले होते हैं। जब स्वाति नक्षत्र 
का पानी मादा बाँस के अन्दर गिरता है तब वह जमकर वंशलोचन का रूप धारण 
कर लेता है। बाँस के सूखने पर वंशलोचन उसमें से निकाल लिया जाता है। 
गुण-दोष एवं स्वभाव 

आयुर्वेदानुसार दोनों प्रकार के बाँस खट्टे, कसैले, किचित्‌ कड़वे, शीतल और 
मूत्रकृच्छ, प्रमेह, पित्त, दाह और विकार को हरने वाले होते हैं। 

रन्ध्र बाँस अग्नि को दीपन करने वाला, अजीर्ण नाशक, रुचिकारक, पाचक, 
हृदय को हितकारी तथा शूल और गुल्म को नष्ट करने वाला होता है। 

बाँस के अंकुर चरपरे, कड़वे, खट्टे, कसैले, हल्के, शीतल तथा रक्त-पित्त, 
दाह एवं सुजाक में लाभदायक होते हैं। 

बाँस के चावल कसैले, मधुर, पौष्टिक, बल-वर्द्धध तथा कफ-पित्त, विष एवं 
प्रमेह को दूर करते हैं। कभी-कभी बाँसों के ऊपर जौ के समान फल आते हैं। 
इनमें से चावल के समान दाने निकलते हैं इन्हीं को बाँस के चावल कहते हैं। 

बाँस की प्रधान क्रिया गर्भशय के ऊपर होती है। इनमें गर्भाशय का संकोचन 
होता है और इसीलिये इसके कोमल पत्तों का काढ़ा स्त्रियों को प्रसूति के समय 
पपिलाया जाता है जिससे उनके गर्भाशय की गंदगी बिल्कुल साफ हो जाती है और 
गर्भाशय असली स्थिति में आ जाता है। 

उपयोग 

प्रमेह एवं सुजाक, कृमि-रोग आदि में भी इसका प्रयोग लाभकारी होता हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी बाँस का उल्लेख निम्नलिखित स्थलों पर प्राप्त होता 
है-भरत की तुलना दुःख के पर्वत से करते हुए कहा गया है, “.....-अतिशय मोह 
ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर भीतर की इन्द्रियों में होने वाले संताप ही उस 
पर्वत की औषधियों तथा बाँस के वृक्ष थे //* चित्रकूट पर्वत पर भी बाँस आदि 
का होना बताते हुए कहा गया है, “आम, जांमुन, असन, लोध्र, प्रियाल, कटहल, 
धव, अंकोल बाँस...आदि उस पर्वत की शोभा बढ़ा रहे हैं (४ अन्य स्थल भी 
दृष्टव्य हैं, जहाँ पर वेणु (बाँस) का उल्लेख किया गया है।# 
शिरीष 

नाम-संस्कृत-शिरीष, भण्डीर, शुक्र-पुष्प, विषनासन, स्वर्णपुष्पक इत्यादि। 
हिन्दी-सिरस, काला सिरस | बंगला-सिरिस । गुजराती-सरसडो, कालियो सरस। 
मराठी-शिरस | कोंकण-गारसी। फारसी-दरख्ते जकरिया। अरबी-सुलतानुल 
असजार। उर्दू-दराश। तमिल-सोनागम | तैलगू-सिरशामु। अंग्रेजी-8॥75 प्र०० 
लेटिन-400्यथी०७७०६८। 
वर्णन 

यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। सिरस के वृक्ष बड़े-बड़े और सघन 
वन और उपवन में तथा प्रायः सब प्रान्तों में होते हैं। इसके पत्ते-इमली के पत्तों 


284 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


के समान पर इनसे लम्बे, चौड़े एक-एक सींक पर दोनों ओर 9 जोड़े तक लगते 
हैं। चैत्र, वैशाख में फूलता, फलता है। इसके फूल सुगन्ध युक्त सफेद किंचित 
पीलायी लिये हरे छोटे-छोटे तन्तुओं से सजे कोमल, मनोहर होते हैं। सेम के समान 
8 से 2 इंच लम्बी 2 इंच चौड़ी और पतली और हल्के पीले रंग की फलियाँ होती 
हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से शिरीष कड़वा, शीतल तथा विष, खुजली, रुधिर-विकार, 
कुष्ठ, कण्डू एवं त्वचा के दोषों को दूर करने वाला होता है। 

सिरस बवासीर, पसीना, चर्म-रोग, सूजन एवं विसर्प को दूर करता है। 

भाव-प्रकाश के मतानुसार सिरस मधुर, अनुष्ण, कड़वा, कसैला, हल्का तथा 
सूजन, विसर्प, खाँसी, ब्रण और विष को हरने वाला होता है। 

इसकी जड़ सूयूर्यावर्त या आधी शीशी रोग में लाभ पहुँचाती है। इसकी छाल 
कड़वी, शीतल, विष-नाशक, कृमि-नाशक तथा वात, रक्त रोग, बवासीर, सूजन, 
विसर्प, खाँसी और चूहे के विष को दूर करती है। इसके पत्ते आँख-दुःखने को 
अच्छा करते हैं। इसके फूल दमा एवं सर्प विष में उपयोगी होते हैं और इस 
वनस्पति के सभी अह्ज सर्प विष में लाभ पहुँचाते हैं। 
उपयोग हि 

गण्डमाला 

सिरस के छः माशे बीजों को पीसकर उनकी फक्‍्की लेने से गण्डमाला की 
पेशियों की सूजन उतरती है। इसके बीजों को पीसकर उनका लेप करने से भी 
गण्डमाला की सूजन उतरती है। 
मसूड़े के रोग 

इसकी जड़ की छाल के चूर्ण से मंजन करने से पके हुए मसूड़ों का रोग 
मिटता है और दाँत मजबूत हो जाते हैं। 

इनके अतिरिक्त मूत्र-क्च्छ, जलोदर, आधा शीशी, श्वेत-कुष्ठ, कृष्ठ, बवासीर, 
सर्प-विष आदि रोगों में भी इससे बहुत लाभ होता है। 

शिरीष 8 प्रकार का होता है-काला, पीला एवं सफेद। 

वाल्मीकि रामायण में शिरीष का भी वर्णन मिलता है-ऋष्यमूक पर्वत की 
शोभा का वर्णन करते हुए श्री राम कहते हैं-“मुचुकन्द, अर्जुन, शिरीष, शीशम 
आदि के वृक्ष भी फूलों से लदे दिखाई पड़ रहें हैं ।'* प्रख्रवण गिरि के उल्लेख में 
भी शिरीष का उल्लेख आता है, “मालती और कुंद की झाड़ियों, सिन्दुवार, 
शिरीष, अर्जुन और सर्ज के फूले हुए वृक्ष इस स्थान की शोभा बढ़ा रहे हैं।”“ 
मौलश्री 

नाम-संस्कृत-बकुल, केशर, भ्रमरानन्द, स्त्रीमुख-मधु, अनंगका, कंठ, मधुपंजर 
इत्यादि । हिन्दी-मौलसरी, बकुल बंगाल-बकुल गाछ । बम्बई--बोरसली । गुजराती- 
बोलसरी । मराठी-बकुल, वरसोली । पंजाब-मोलसरी । तमिल-अलागु, केसारम्‌। 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 285 


तेलगू-केसारी । उर्दू-मोलसरी । लेटिन-भंग्राप5०9$ €ैक्षाड्डा | 
वर्णन 

मौलश्री के वृक्ष 20 से लेकर $5 फीट तक ऊँचे होते हैं। इसके पत्ते जामुन 
के पत्तों की तरह होते हैं। इसके फूल कुछ मैलापन लिये हुए सफेद, बहुत छोटे 
और अत्यन्त सुगन्धित होते हैं। इनकी सुगन्‍्ध सूखने पर भी नहीं जाती। इसके 
वृक्ष नर और सादा दो प्रकार के होते हैं। मादा वृक्ष के फल उगते हैं और नरवृक्ष 
के नहीं आते। नरवृक्ष का फूल कुछ बड़ा और सफेद होता है। मादा वृक्ष का फूल 
सिंदूरी रंग का होता है और उसका फल पीले रंग का आता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार मौलसिरी की छाल कुछ कड़वी, मीठी, शीतल, हृदय को बल 
देने वाली, अग्नि-वर्द्धग, कृमिनाशक एवं संकोचक होती है। मसूड़े और दाँत की 
व्याधियों में यह बहुत उपयोगी होती है। पित्तविकार को यह दूर करती है। इसके 
फूल मीठे, स्निग्ध, कसैले, विशद, शीतल, आँतों का संकोचन करने वाले रुचिवर्द्धक, 
दौँतों को मजबूत करने वाले एवं रक्‍्त-विकार को दूर करने वाले होते हैं। इसके 
फल मीठे, चरपरे, स्निग्ध, आँतों का संकोचन करने वाले और वात को पैदा करने 
वाले होते हैं। इसके बीज हिंलते हुए दाँतों को मजबूत करते हैं। इनको सूँघने से 
मस्तक शूल दूर होता है। 

इसकी छाल कसैली, पौष्टिक एवं फल रोचक, स्निग्ध कारक एवं संग्राहक 
होती है। 
उपयोग 

अतिसार 

मौलसिरी के बीजों को ठंडे पानी में पीसकर देने से अतिसार दूर होता है, 
पुराने अतिसार में इसके पके हुए फल का गूदा बहुत लाभदायक होता है। 

हृदय रोग 

मौलसिरी के फूलों का हार पहनने से और इसके फूलों को सूँघने से और 
इसकी अन्तर-छाल का काढ़ा पीने से हृदय रोग में लाभ होता है। 

इनके अतिरिक्त प्रदर एवं धातु रोग, बच्चों की खाँसी, मुख रोग एवं मूत्राशय 
के रोगों में भी यह लाभकारी है। 

रामायण में मौलश्री का विविध नामों से विविध स्थलों पर उल्लेख किया गया 
है यथा-श्री राम अरण्य में विविध पेड़ों से सीता के विषय में पूछ रहे हैं, इसी 
सन्दर्भ में बकुल (मौल श्री) का भी उल्लेख है ।'* पम्पासर के वर्णन में मौलश्री का 
उल्लेख किया गया है--“उसके तट पर तिलक, अशोक, नाग-केसर, वकुल तथा 
लिसोड़े के वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।!* 

इनके अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों पर बकुल (“मौलश्री”) का उल्लेख 
मिलता है।* 
माष 


286 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


नाम-संस्कृत-बीजरत्न, धान्यवीर, माष, कुरुविन्द, वृषांकुर, मांसल, बलाद्य 
इत्यादि। हिन्दी-उड़द, उरिद, टिकिरि। गुजराती-अरदू, उड़द। बंगाली-माष 
कलई। मराठी-उड़िद। तेलगू-मिनमुल। कन्नड़-उददू। तमिल-पटचैप्यरी। 
फारसी-माष। अरबी-माषा। लैटिन-/॥852005 २४0६0 | 
वर्णन 

माष (उड़द) का उपयोग दाल के रूप में सारे भारत वर्ष में होता है। इसलिये 
इसके परिचय से सभी परिचित हैं। 

गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार उड़द स्निग्ध, बलकारक, वीर्य-वर्द्धक, पित्तकारक, भारी, 
तृष्तिजनक, स्वादिष्ट, पौष्टिक, मूत्रल, मल-भेदक एवं दुग्ध पैदा करने वाला, 
मांस-वर्धक, मेद वर्धक तथा श्वास, श्रम, परिणाम शूल, अर्दित एवं बवासीर को 
दूर करने वाले हैं। ये प्यास, कफ एवं रक्‍्त-रोग को उत्पन्न करने वाले हैं। 

इसके बीज मीठे और तैल युक्त रहते हैं। ये मृदु विरेचक, कामोद्दीपक, 
पौष्टिक, भूख बढ़ाने वाले, मूत्रल और दुग्ध वर्धक हैं। ये हृदय के लिये उत्तम एवं 
थकान को दूर करने वाले हैं। ये प्यास और रक्‍त-रोग को उत्पन्न करने वाले हैं। 
उपयोग 
लकवा 

उड़द को सोंठ के साथ औटाकर पिलाने से लकवा में लाभ होता है। 
गठिया 

अरंड के जड़ की छाल के साथ उड़द को औटाकर पिलाने से गठिया में लाभ 
होता है। 

इनके अतिरिक्त फोड़ा, नकसीर, हिचकी, स्नायु, शक्ति, पित्त की सूजन, 
अर्दित रोग आदि में भी माष लाभकारी होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है यथा-रामाश्वमेध में 
इसकी आवश्यकता पड़ी थी, “ दस हजार पशु तिल, मूंग, चना, कुल्थी, 
नमक और उड़द के बोझ लेकर आगे चलें” 
रक्त चन्दन 

नाम संस्कृत- रक्‍्तचन्दन, रक्ताडू, क्षुद्रचन्दन, तिलपर्ण, रक्तसार, एवं प्रवालफल | 
हिन्दी-लाल-चन्दन, रक्‍्तचंदन, बंगाली-रक्तचन्दन । गुजराती-रतांजली | तेलगू- 
रक्तचन्दनमू। तमिल-शेन्‌ चन्दनम्‌। पं. मा. लालचन्दन। मला. रक्तशन्दनम्‌, 
फारंसी-सन्दले सुर्ख। अरबी-सन्दले अहमर। अंग्रेजी-२७0 $क्षावश$ ३४0०6; 
ए०त 54769 ९४००१ । लेटिन--?0४०००७४४७७६ $शाएक्रा0ए5. 
वर्णन 

यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कुर्नूल के दक्षिण 
भाग एवं चिंगलपुट में 7500 फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका वृक्ष 25 
फुट तक ऊँचा होता है। छाल कालापन युक्‍त भूरे रंग की, पत्ते प्रायः एक सींक 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं..../ 287 








पर तीन होते हैं। फूल, अल्प, पीताभ श्वेत एवं सबृन्तकाण्डज गुच्छों में आते हैं। 
फलियाँ दो इंच लम्बी, टेढ़ी, आधार की ओर कम चौड़ी एवं छोटे से इंठल से युक्त 
होती हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

यह शीतवीर्य, गुरु, स्वादु तथा तिक्त रसन्युक्त तथा वमन, प्यास एवं 
रकत-पित्त को दूर करने वाला होता है। यह नेत्रों के लिये हितकर, वृष्य 'एवं ज्वर, 
ब्रण तथा विष को दूर करने वाला होता है। इसका बाहय लेप शीतल, शोथष्न एवं 
ब्रण-रोपक है। 

इसका प्रयोग पैत्तिक, विकार, रक्त-दोष, रकतार्श, अतिसार, संग्रहणी एवं 
शिरः शूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है। रंजक द्रव्य के रूप में 
इसका अधिक उपयोग किया जाता है। 
उपयोग 

शोथ, फोड़े, ब्रण, अहोरी तथा शिरः शूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में 
जल में घिसकर लगाते हैं। पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर हो जाती है। 

ग्राही होने के कारण अन्य औषधों के साथ इसका क्वाथ अतिसार एवं 
संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। 

रकतार्श में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में रक्त चन्दन का उल्लेख सर्वाधिक हुआ है, एक दो 
स्थलों पर उल्लेख इस प्रकार है-अशोक-वाटिका में भी रक्त चन्दन विद्यमान था, 
“दुरात्मा रावण की यह अशोक-वाटिका बड़ी ही रमणीय है। चन्दन, चम्पा और 
मौल श्री के वृक्ष इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं..... /'* एक ओर रावण की अशोक 
वाटिका थी तो दूसरी ओर अयोध्या की अशोक वनिका-इसमें भी चन्दन के वृक्ष 
विद्यमान हैं, “चन्दन, अगरु, आम, तुज्न, कालेयक (रक्त चन्दन) तथा देवदारु वन 
सब ओर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।”” अन्य भी स्थल दृष्टव्य है।#* 
हल्दी (शर्वरी) 

नाम-संस्कृत-हरिद्वा, पीता, युवती, हेमरागिणी, कांचनी, मेहघ्नी शर्वरी, गौरी 
इत्यादि । हिन्दी-हलदी । बड़ला-हल्दी, पीतरास, गुजराती-हलदर। मराठी-हलद। 
पंजाब-हलदर | अरबी-कुरकम । पारसी-दरजार्दी, तमिल-मंजल । तैलगू-पम्पी । 
उर्दू-दीहल। अंग्रेजी-[घगर्मांट। लेटन--0पा७एणा३३ [,णाज8 । 
वर्णन 

हल्दी के पौधे छोटे, कोमल और वर्ष जीवी होते हैं। इसके पत्ते बहुत बड़े-बड़े 
होते हैं। इस वृक्ष की जड़ों में जमीन के अंदर हल्दी की गाँठें लगती हैं। ये गाँठे 
पीले रंग की होती हैं। हल्दी मसाले के रूप में सारे भारतवर्ष में प्रयोग की जाती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से हल्दी चरपरी, कड़वी, सौन्दर्य-वर्धक, उष्ण, रूखी, शोधक 
और स्त्रियों के लिये भूषण है। यह कफ, वात, रुधिर, दोष, कोढ़, खुजली, प्रमेह, 


288 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


त्वचा के दोष, घाव, सूजन, पाण्डुरोग, कूमि, विष पीनस, अरुचि, पित्त और 
अपचन को दूर करने वाली होती है। 
उपयोग 

इसका उपयोग प्रतिश्याय, कफ-विकार, चर्मरोग, रक्‍्त-विकार, प्रमेह, कामला, 
आदि में किया जाता है। ; 
प्रमेह 

आँवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में 
अच्छा लाभ होता है। 
श्लीप्रद 

इसमें इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में हल्दी का उल्लेख एक स्थान पर प्राप्त होता है- 
“शर्वर्यामरुणोदये” ।४* 
शमी 

नाम-संस्कृत-शमी, भादरां, दुरितदामिनी, हबिरगन्धा, केशहन्त्रा, लक्ष्मी, 
पापनाशिनी, शक्‍्तुफला, शांता, शिवा इत्यादि। हिन्दी-छोंकर, छिकुर, खेजड़ा, 
सफेद कीकर। गुजराती-खेजड़ी, खजिड़ी। बंगाल-शाईगाछ छुई बाबला। 
मराठी-शमी, लघु-समी । पंजाब-जंड, जड़ी । बम्बई-शमी, शबरी, मारवाड़ी -खेजड़ा, 
कजरा | तेलगू-जंबी, जॉंबी, प्रियदर्शिनी | तमिल--जम्बू, कलिसम। अंग्रेजी--89002० 
पृ७७। लेटिन-श050फञां25 5फांसं2थब. 
वर्णन 

यह वृक्ष पंजाब, सिंध, राजपूताना, गुजरात, बुंदेलखण्ड इत्यादि प्रान्तों में बहुत 
अधिक संख्या में होता है। शमी के वृक्ष 5 से 30 फीट तक ऊँचे होते हैं। इनके 
फूल कुछ सफेदी लिये हुए पीले रंग के और लम्बी कलगी की तरह आते हैं। इसके 
पापड़े सफेद रंग के 4 से 8 इंच तक लम्बे होते हैं। एक पापड़े में 70 से 5 बीज 
निकलते हैं। ये पापड़े थोड़ी मात्रा में बैलों के लिये पौष्टिक खाद्य होते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार शमी कड़वा, चरपरा, शीतल, कसैला, रोचक, हल्का तथा 
कफ, खाँसी, भ्रम, श्वास, कोढ़, बवासीर और कृमि को दूर करता है।.इसका फल 
पित्त-जनक, रूखा, बुद्धिवर्धक और केशों को नष्ट करने वाला होता है। 

इसकी छाल खुश्क, कसैली, कटु एवं तेज स्वाद वाली होती है। यह शीतल 
कृमिनाशक और पौष्टिक है। कोढ़, पेचिश, वायु-नलियों का प्रदाह, दमा, धवल 
रोग, बवासीर, मस्तिष्क की विकृति और मज्जाओं के कम्पन में यह लाभदायक 
है। 

सुश्रुत एवं योग-रत्नाकर के मतानुसार यह वृक्ष साँप के विष पर लाभदायक 
है। सुश्रुत के अनुसार इसका छिलका बिच्छू के काटने पर भी उपयोगी है। 
उपयोग 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 289 


आग से जलने पर-शमी के पाले को पीसकर दही में मिलाकर लेप करने से 
अग्नि से जले हुए स्थान पर शांति मिलती है। नख और दाँतों के जहर पर शमी, 
नीम की छाल, बड़ की छाल तीनों को पीसकर लेप करने से नख और दाँतों से 
पहुँचे जज्ञम विष पर लाभ पहुँचता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी शमी का उल्लेख प्राप्त होता है।'” 
शीशम 

नाम-संस्कृत-शिंशपा, कृष्णसारा, पिपला, युगपत्रिका, कपिला, डलपत्री, 
तीव्र धूमका, श्वेत शिंशपा, कपिलाशिंशपा, पीता इत्यादि। हिन्दी-शीशम, सफेद 
शीशम, पीली शीशम। बंगाल-शीशू, सीस | बम्बई-सीसू गुजराती-सीसम तनच। 
मराठी-सीसू, सीसम, उर्दू-शीशम। पंजाब-शीशम, नेलकार, ताली, शेवा। 
अरबी-सीसम | तमिल-नीसू, गेट्टा। तेलगू-सिसुपा, सीसू। अंग्रेजी-8|5500 
लेटिन-2802०ए्टां8 55500 
वर्णन 

शीकम के वृक्ष प्रायः पूरे भारत में होते हैं। इसका वृक्ष 60 फुट तक ऊँचा 
होता है। इसके पिंड की छाल एक इंच तक मोटी कुछ पीलापन लिये हुए भूरे रंग 
की होती है। इसके पत्ते गोल, और नोकदार बेर के पत्तों के समान होते हैं। इसके 
फूल बहुत छोटे-छोटे सफेद या चाँदनी के रंग के होते हैं, शीशम की तीन जातियाँ 
होती हैं- काली, सफेद, और पीली। पीली शीशम को संस्कृत में कपिल शिंशपा, 
सफेद शीशम को श्वेत शिंशपा और काली शीशम को कृष्णसारा कहते हैं। 

इसकी लकड़ी और बीजों में से तेल निकाला जाता है जो औषधि के काम आता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

शीशम कड़वा, तिकत, कसैला, गरम, कामोद्दीपक, कफनिस्सारक, कृमि 
नाशक, ज्वर नाशक, प्यास को बुझाने वाला, गर्भ को गिराने वाला और वमन 
तथा दाह को शांत करने वाला होता है। यह चर्मरोग, व्रण, रक्त रोग, श्वेत कुष्ठ, 
अजीर्ण, अतिसार और गुदामार्ग की परेशानियों को दूर करने वाला होता है। इसके 
पत्तों का रस नेत्र-रोगों में लाभदायक होता है। 

सफेद शीशम कड़वा, शीतल तथा पित्त और दाह को दूर करने वाला होता है। 

भूरे रंग का शीशम कड़वा, शीतवीर्य, श्रम-नाशक तथा वात, पित्त, ज़्वर, 
वमन, और हिचकी को दूर करता है। है 

तीनों प्रकार के शीशम, कांतिवर्धक, बलकारक, रुचिजनक, तथा सूजन, 
विसर्प, पित्त और दाह को शांत करते हैं। 
उपयोग 

रक्‍्त-विकार 

शीशम के बुरादे का शर्बत बनाकर पिलाने से रक्‍्त-विकार मिटता है। 

वमन 

इसके पत्ते या बुरादे का क्वाथ पिलाने से वमन बन्द होती है। 


290 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


इनके अतिरिक्त यह फोड़े-फुन्सी, कुष्ठ, सुजाक, आदि में भी लाभदायक है। 

वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है। यथा- 
'केतक, उद्दालक, शिरीष, शीशम, धव, सेमल, पलाश, लाल कुरवक.......आदि 
के पेड़ भी फूलों से भरे दिखाई देते थे /“* हनुमान जी ने भी शीशम के वृक्ष पर 
बैठकर ही सीता माता के दर्शन किये थे-'महान्‌ वेगशाली हनुमान जी पत्तों से 
हरी-भरी उस शिंशपा पर दुःख से आतुर सीता जी को देखने के लिये चढ़ गये ॥'? 
अन्य स्थलों पर भी शीशम (शिंशपा) का उल्लेख मिलता है।* 

शर 

नाम-संस्कृत-गुन्द, मुंज, सर, तेजनका । पंजाब-सरकण्डा । हिन्दी-सरकण्डा । 
बंगाल-सर। तमिल-मुंचि। तेलगु-मुंजगहि। अंग्रेजी-2९५॥ $पड्ठभ (क्वा८। 
लेटिन--886९॥क्लाणा 4फ्ाती।_2९ए॥ । 
वर्णन 

यह गन्ने के वर्ग की एक वनस्पति होती है, इसका पौधा गन्ने के पौधे की 
तरह होता है। यह वनस्पति बंगाल, आसाम और वर्मा में पैदा होती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

इसकी जड़े मूत्रल और शांतिदायक होती है। प्रसूतिकाल में प्रसूता के कमरे 
में इसकी धूनी दी जाती है। 

वाल्मीकि रामायण में भी शर का उल्लेख प्राप्त होता है- सीता कहती हैं, 
“रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक एवं काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे 
आपके साथ रहने से रुई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा।”* 

श्री राम ने भी अपनी पर्णकुटी बनाने में बाँसों,सरकंडों आदि का प्रयोग किया 
थी। मिल खम्भों के ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे। बाँसों के रख 
दिये जाने पर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखाई देने लगी। फिर उन बाँसों पर शमी की 
शाखाएँ बिछा दीं तत्पश्चात कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर पर्णशाला को 
भली-भाँति छा दिया“ अन्य दृष्टव्य स्थल ॥6 
सरसों 

नाम-संस्कृत-सर्षप, गौरसर्षप, तीक्षणक, कुष्ठ-नाशक, 
सिद्ध-प्रयोजन, मूत्र-नाशक, कण्डुष्न इत्यादि । हिन्दी -सरसों, 
सफेद सरसों। बंगाल-सरिया। गुजराती-सरसव।॥ 
मराठी-सरसो, शिरष। पंजाब-सरों | फारसी-सिपन्दान 
मुफीद। तमिल-करुप्पुकेडुग्गु। अंग्रेजी-9७॥0 वण्णाम0 । 
लेटिन--885508 (:क्वा॥06९७075 | 
वर्णन 

सरसों का पौधा राई के पौधे की तरह होता है। इसके बीज कुछ ललाई लिये 
पीले रंग के होते हैं। एक जाति की सरसों के बीज सफेद होते हैं। इसके एक मन 
बीजों में करीब 2-5 सेर तेल निकलता है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषधी परिचय एवं..../ 29 





गुण-दोष एवं प्रभाव 

सरसों चरपरी, कड़वी, तीक्ष,, अग्निदीपक, किंचित्‌ रूखी, पितकारक, रक्तपित 
जनक, रुक्ष तथा वात, कफ, कण्डू, कुष्ठ, शूल, कृमि एवं ग्रह-पीड़ा को दूर करने 
वाली होती है। 

सफेद सरसों, चरपरी, कड़वी, रुचिकारक, गरम, वात रक्त कारक, तथा ग्रह 
पीड़ा, बवासीर, त्वचा के दोष, सूजन, व्रण एवं विष को नष्ट करती है। 

सरसों के पत्ते का शाक-सारक, अम्ल, पित्तकारक, कसैला, भारी, स्वादिष्ट, 
गरम, खारी और कफनाशक होता है। 
उपयोग 

गठिया 

सरसों के तेल में कपूर मिलाकर मालिश करने से मांस-पेशियों की गठिया 
मिटती है। 

कर्ण शूल 

सरसों के तेल को कान में टपकाने से वादी का कर्णशूल मिटता है। 

इनके अतिरिक्त श्लीप्रद, सूजन, तिल्‍ली का बढ़ना, पामा, खुजली, नासूर, 
उबटन आदि में भी उपयोग है। 

वाल्मीकि रामायण में भी सरसों का उल्लेख प्राप्त होता है यथा- माता 
कौशल्या ने घी, श्वेत पुष्प एवं माला, समिधा, तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मण 
के समीप रखवा दी।४* 
शाल 

नाम-संस्कृत-शाल, सर्ज, कार्श्य, अश्वकर्णक, शस्यशंबरा। हिदी-शाल, 
साल, साखू, सांखू, सखुआ। बं.-शाल गाछ, लता शाल, म. लघु रालेचावृक्ष, 
रालचा वृक्ष, सजरा, शालवण, लंधरालचा वृक्ष । गुजराती-सज्जरदामर, गलरालनुं 
नहानुं झाड | तेलगु-एपचेट्टु। तमिल-कुज्ञलियम्‌। कन्नड़ी--सज्जर दामर, विलीमते। 
द्राविड़-कुंगेलियम | लेटिन-8#0७4 [२०00४७ । 
वर्णन 

शाल के वृक्ष बहुत बड़े (विशाल) होते है। ये हिमालय पहाड़, सतलज से 
आसाम तक, मध्य भारत के पूर्वी भाग, बंगाल के पश्चिमी भाग और छोटा नागपुर 
के जंगलों में होते हैं, इसके पत्ते विशाल होते हैं। फूल-पीले रंग के बसंत ऋतु में 
खिलते हैं। फल-छोटे-छोटे होते हैं। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

यह कषाय रस युक्‍त एवं व्रण, स्वेद, कफ, कृमि, विद्रधि, बहरापन, योनि 
तथा कर्ण सम्बन्धी रोग में लाभकारी होते हैं। शाल का एक भेद सर्जक भी है जिसे 
सर्जक, अजकर्ण, शाल, मरिचपत्रक कहते हैं। वह सर्ज, कठु, तिक्‍्त तथा कषाय रस 
युक्त, उष्ण एवं कफ, पाण्डु, कर्ण, सम्बन्धी रोग, प्रमेह, कुष्ठ, विष तथा व्रण को दूर 
करने वाला होता है। 


292 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वाल्मीकि रामायण में शाल का अनेक स्थलों पर उल्लेख प्राप्त होता है- 
यथा-राम के वनवास को सुनकर कौशल्या की स्थिति बताते हुए लिखा है, “यह. 
अप्रिय बात सुनकर वन में फरसे से काटी हुई शाल वृक्ष की शाखा के समान कौसल्या 
देवि सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ी ।”** एक स्थान पर साल वन का उल्लेख करते हुए 
लिखा है-“फिर एकसाल नगर के पास स्थाणुमती और विनत-ग्राम के निकट गोमती 
नदी को पार करके वे तुरंत ही कलिंग नगर के पास “साल वन' में जा पहुँचे //* अन्य 
अनेक स्थलों पर भी “साल” का उल्लेख मिलता है।* 
सेंमल (शाल्मलि) (कूठशलालि) 

नाम-संस्कृत-शाल्मलि, रक्तपुष्पा, तूल-वृक्ष, मोचनी इत्यादि। हिन्दी-सेमर, 
मोचरस, कांटिसेमल, रक्त सेमल, पेगून, गुजराती-सेमला, रक्त सेमला | बंगाल-सिमुल, 
रक्त शिमुल। मराठी-सेमर,सांवरी, काण्टेरी सेमर। अंग्रेजी-२९08॥६ (0०७०॥ पो७९ 
(रेडसिल्क कॉँटन ट्री) । लेटिन-80977#८३ |४३|५७कटणा। । 
वर्णन 

सेमर का वृक्ष बहुत बड़ा होता है। इस पर मोटे और तिकोने काँटे होते हैं। 
बसन्‍्त ऋतु में इस वृक्ष पर लाल रंग के बड़े-बड़े फूल आते हैं। इस पर आक के समान 
फल आते हैं। यह फल सूखकर जब फटते हैं तब उनमें से रुई निकल आती है। इसके 
बीज काले रंग के होते हैं। इस वृक्ष के गोंद को मोचरस कहते हैं। मोचरस बहुत 
हल्का, भुरभुरा और लाल रंग का होता है, यह पानी में डालने से फूल जाता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

सेमल मधुर, वीर्यवर्धक, बलकारक, कसैला, शीतल, हल्का, स्निग्ध, स्वादिष्ट, 
रसायन, कफ-कारक, कामोद्दीपक तथा रक्त-पित्त, पित्त और रुधिर दोषों को हरता 
है। इसकी जड़ अथवा सेमर मूसली मीठी, शीतल पौष्टिक होती हैं। इसकी छाल 
कसैली, कफनाशक, मूत्रल, पौष्टिक, और किचित्‌ ग्राही होती है। इसके फूल कड़वे, 
कसैले, स्वादिष्ट, रुक्ष होते हैं। ये तिल्‍्ली की बीमारी और श्वेत प्रदर में बहुत 
लाभदायक होते हैं इसके फल मीठे, शीतल, पचने में हल्के, उत्तेजक, मूत्रल, पौष्टिक. 
होते हैं। 

सुश्रुत के मतानुसार सेमल के फूल और फल दूसरी औषधियों के साथ मिलाकर 
साँप और बिच्छू के विष पर देने से लाभ होता है। 
उपयोग 

रक्‍्त-पित्त 

सेमल के फूलों के चूर्ण को शहद में मिलाकर चाटने से रक्त-पित्त मिटता है। 

प्लीहा 


सेमल के फूलों को रात भर पानी में भिगोकर मल छानकर उसमें राई का 
चूर्ण मिलाकर पिलाने से प्लीहा की वृद्धि मिटती है इसके अतिरिक्त चेचक आदि 
में भी यह लाभकारी है। 

रामायण में भी सेमल का उल्लेख प्राप्त होता है यथा-'हे रावण! तू तीखी 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 293 


शाल्मली (सेमल) का अब दर्शन करेगा /'« पम्पासर के तट प्रान्त पर भी अन्य वृक्षों 
के साथ इसका उल्लेख है।'” अन्य स्थानों पर भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है ।४४ 


नाम--संस्कृत--मृगनाभ, कस्तूरी । हिन्दी-कस्तूरी । बंगाली-मृगनाभि । मराठी- 
कस्तूरी। गुजराती-कस्तूरी। अंग्रेजी-१/५७।८ । फारसी-मुश्क। अरबी-मिस्क। 
लेटिन-/05०४४६ |४०५०४८एा७ (मासकस मासकी फेरस)। 
वर्णन 
कस्तूरी एक विशेष जाति के हरिण के निम्नाव वाही कोष का सूखा रस हैं 
इसकी सुगन्ध मादाओं को नर की ओर खींचने वाली होती है। कस्तूरी लगभग 
एक महीने तक उसकी ग्रन्थियों में रहती है। दो वर्ष की बच्ची की ग्रन्थियों में 
करीब तीन तोला कस्तूरी रहती है किन्तु यह अपरिपक्व स्थिति में होती है और 
इसकी गंध भी अप्रिय रहती है। पूरी उम्र के जानवर में प्रायः दो ओंस के लगभग 
कस्तूरी प्राप्त होती है। यह एक चौकोर या गोल यैली में जिसका व्यास करीब डेढ़ 
इंच का होता है बन्द रहती है। इसके ऊपर का धरातल चपटा और फिसलना 
होता है। और अंदर कुछ कड़े बाल रहते हैं इसका छोटा सा मुँह होता है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 
आयुर्वेदिक मत से कस्तूरी कामोद्दीपक, धातु-परिवर्तक, नेत्रों को लाभ 
पहुँचाने वाली तथा कुष्ठ, मुखरोग, कफ, दुर्गन्ध, दरिद्रता, वात, तृषा, मूर्चछा, शोष, 
विष, खाँसी एवं शीत का नाश करने वाली है। 
उपयोग 
यह खाँसी, दमा, कफ के दोष, अरुचि, मुँह की बदबू, पीलिया, दृष्टि की 
कमजोरी, मुँह की झाईं, शरीर का मोटापन, सुजाक, क्षय आदि के लिये बहुत 
लाभकारी है। 
रामायण में लंका दहन के समय एक स्थान पर कस्तूरी का उल्लेख प्राप्त 
होता है, वह भी अस्पष्ट था। 
'योद्धाओं' के कवच, वाण, तोमर, वालज, अण्डज (कस्तूरी) आदि को फैली 
हुई आग जला रही थी।"” 
गोरोचन 
नाम-संस्कृत-गौरोचन, गौपित, बन्दनीया, मनोरमा, मंगला, शिवा, गोपित, 
सम्भवा, पिक्नला इत्यादि। हिन्दी-गौलोचन | बंगाल-गोरोचन | मराठी-गोरोचन । 
गुजराती-गोरो चन्दन, गोरोन। तेलगू-गोरोचनम्‌। फारसी-गयरोहन। 
अरबी-हजरुल वक्‍कर। लेटिन-80अक्षाएप5 । पं 
वर्णन 
गोरोचन गाय के मस्तक का पित्त होता है। इसका रंग पीला होता है। इसकी 
गोली, चपटी, लम्बी और कोई-कोई तिकोनी होती है। जब इसको निकालते हैं तब 
यह मोम की तरह मुलायम होती है और फिर ठण्डी होने पर बुझे हुए चूने के समान 
सख्त हो जाती है। इसका रंग पीला होता है, किसी-किसी पर काले छीटे होते हैं। 
294 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदिक मत से गोरोचन अत्यन्त शीतल, रुचि-कारक, मंगलदायक, वशीकरण, 
शरीर के सौन्दर्य को बढ़ाने वाला, कामोद्दीपक तथा भूत-बाधा, गृह की पीड़ा, 
विष विकार, कोढ़, कृमि, उन्माद, गर्भस्नावं, क्षत, रक्त-विकार और नेत्र रोगों को 
नष्ट करने वाला होता है। 

रामायण में सुग्रीव के राज्याभिषिक के समय गोरोंचन का उल्लेख किया गया 
है ॥ए० 
श्यामां 

श्यामा' प्रियज्नू का ही संस्कृत नाम है। प्रियड्टू का उल्लेख एवं समीक्षा की जा 
चुकी है। अतः इसके गुण-दोष को भी उसी मे जान लेना चाहिये। 

रामायण में माल्यवान पर्वत पर इसका उल्लेख आता है, “पर्वत के शिखरों 
पर असन, छितवन, कोविदार बन्धुजीव, तथा श्याम तमाल खिले दिखाई देते 
हैं कार 
संहस़पत्री 

'सहसंपत्री” गुलाब का ही पंययिंवाची है अतः उसकी समीक्षा “गुलाब' में ही 
की गयी है। 


शत्पुष्पी' से तात्पर्य “सोया” से है रामायण में सोया का उल्लेख प्राप्त नहीं हो 
पाया है। 
शतावरी 

नाम-संस्कृत-शतमूली, शतावरी, भीरु-पत्री आदि। आयुर्वेदिक मत से 
शतावरी भारी, शीतल, कड़वी, मधुर, रसायन, बुद्धिवर्धक आदि गुणों से युक्त हैं। 

सूखी-खाँसी, अनिद्रा, वातज्वर, मूत्र-विकार आदि में यह लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में इंसका उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
शंखपुष्प 

नाम-संस्कृत-मेध्या, श्यामक्रान्ता, चंडा शंखपुष्पी आदि। आयुर्वेदिक मत से 
यह बुद्धिवर्धक, आयुवर्द्ध,, मानसिक रोगों को हटाने वाली, रसायन, कसैली, 
गरम आदि गुणों से युक्त है 

प्राचीन खाँसी एवं दमे में इसकी सिगरेंट बनाकर पीने से लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में शंखंपुष्प का उल्लेख नहीं किया गया हैं। 
सिन्धुफल (समुद्रफल) (निचुल) 

नाम-संस्कृत-समुद्रफल, अब्धिफल, अम्बुज, हिज्जलं, निंचुल इंत्यादि। 
हिन्दी-समुद्रफल, हिंज्जल, पनियारी, निओरा, जुअर इत्यादि। बंगाल-हिज्जल, 
कुमिया समुन्दर । गुजराती-समुन्दर फल । कोकण-निवार मराठी-समुद्रफल, दा्तेंफल, 
इंगली, नेवार, सठफल, तिवार | उर्दू-समुन्दंरफंल ] तमिल-सेंगाउम्बु, समुद्र पुल्लानि। 
तैलगं-कनपुचेटूटु। ईग्लिश-097-09:. लेटिन-छिक्षागराइ/णां8 ०टक्रा8008 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषधे परिचय एवं... / 295: 


(बोरिंग टोनिया एक्युटगुला) 
वर्णन 7 

यह एक मध्यम कद का वृक्ष होता है। इसके पत्ते लम्बगोल और बादाम के 
पत्तों से कुछ-कुछ मिलते जुलते होते हैं। इसके फूल कलंगीनुमा लाल रंग के होते 
हैं। इसके फल में चार कोने रहते हैं इसके फल काबुली हरड़ के समान भूरे रंग 
के और खड़ी धारियों वाले होते हैं। इनको पानी में डालने से यह मुलायम हो जाते 
हैं। इनकी छाल पतली और बीज मोटे होते हैं। इसके बीज छोटे जायफल के 
समान होते हैं। इसके फलों का स्वाद कड़वा एवं वामक होता है। यह वनस्पति 
विशेषकर कोंकण और बंगाल में उत्पन्न होती है। 
गुण-दोष एवं प्रभाव 

आयुर्वेदानुसार समुद्रफल चरपरा, गरम, वात-विनाशक, भूतवाधा को दूर 
करने वाला और त्रिदोष, कफ, रोग, भ्रान्ति तथा दावानल दोष को हरने वाला 
होता है। 

इसके पत्तों का रस आमातिसार में दिया जाता है। इसका फल कड़वा, 
कसैला, आँतों को संकुचित करने वाला, कृमिनाशक, वात-कारक पित को दूर 
करने वाला तथा रक्त-रोग, खाँसी, आँख के व्रण, मस्तक शूल एवं त्रिदोष को दूर 
करने वाला होता है। 

इसकी जड़ कड़वी होती है। इसके बीज बहुत गरम एवं खुश्क होते हैं। ये 
सुगन्धित द्रव्य की तरह शूल, प्रसव वेदना एवं नेत्र शुक्ल रोग में दिये जाते हैं। 
उपयोग 

नेत्र-रोग 

इसके बीजों को पीसकर लेप करने से नेत्र पीड़ा मिटती है। 
बहिरापन 

समुद्रफल के चूर्ण को गंगेरन के रस में मिलाकर कान में टपकाने से 
बहिरापन मिटता है। 

इनके अतिरिक्त यह बद्धकोष्ठ, उदर-शूल, सर्दी का जमाव आदि रोगों में भी 
लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में पंपासर के वर्णन में सिंधुफल का उल्लेख “निचुल” के 
नाम से प्राप्त होता है। यथा-मालती, कुन्द, झाड़ी, भण्डीर निचुल, अशोक, 
सप्तपर्ण, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई 
पम्पा भाँति-भाँति के वस्त्राभूषणों से सजी हुई युवती के समान जान पड़ती है।” 
मृत संजीवनी एवं विशल्य करणी 

वाल्मीकि रामायण में कुछ दिव्य औषधियों का भी उल्लेख किया गया है 
जिनमें सर्व-प्रथम मृत संजीवनी का स्थान है। 

वानर राज सुषेण ने सुग्रीव का ध्यान अपने एक अनुभव की ओर आकर्षित 
किया। देवासुर संग्राम के समय देवों को दैत्यों ने बुरी तरह घायल कर दिया। देवों 


296 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


को अचेत होते देखकर देव चिकित्सक तथा गुरु बृहस्पति जी मंत्र युक्त विद्याओं 
तथा दिव्य औषधियों द्वारा उनको सचेत तथा स्वस्थ करते रहे ।'” मेरा यह मत 
है कि उन औषधियों को संपाती और पनस सागर के तट से ले आवें। ये दोनों 
वानर वहाँ चन्द्र और द्रोण पर्वतों पर प्रतिष्ठित हुई वनौषधियों में से दो महोषधियों 
को जानते हैं, उनमें से एक का नाम हैं संजीव-करणी (मृत-संजीवनी) तथा दूसरी 
का नाम है विशल्य-करणी, जिनका निर्माण साक्षात्‌ ब्रह्मा जी ने किया है। 
क्षीर-सागर का मंथन करते समय देवताओं ने उन दोनों ही पर्वतों को समुद्र के 
बीच में प्रतिष्ठित किया था।”* 

ऋक्षराज जाम्बवान भी इन औषधियों से भली-भाँति परिचित थे। जब 
मेघनाद द्वारा सरसठ करोड़ वानरों को हताहत कर दिया गया तथा राम, लक्ष्मण 
तथा अन्य सभी प्रमुख वानर मूर्छित होकर गिर पड़े तथा मृत्यु के समीप पहुँचे, तब 
उन्होंने भी इन्हीं संजीवनी, विशल्य-करणी एवं संधानी, सुवर्णकरणी नामक औषधियों 
का सेवन करा उन सबको स्वस्थ किया।”* 

उपरोक्त चारों औषधियों के नामकरण से ही ज्ञात होता है कि वे दिव्य 
औषधियाँ क्रमशः मृतसंजीवनी-संज्ञा शून्य व्यक्तियों को सचेत करने वाली या मृत 
प्राय व्यक्तियों को पुनर्जीवित करने वाली, विशल्य-करणी-देह में प्रविष्ट हुए शल्यों 
को बाहर निकाल देने वाली, सुवर्णकरणी-मुख की तथा देह की वैवर्ण्यता को सुवर्ण 
प्रदान करने वाली तथा संधानी अस्थिभग्न आदि को पुनः संधान करने वाली थी। 
ये चारों ही औषधियाँ अचूक तथा सद्य प्रभावकारी थीं। 

उन महौषधियों की सुगन्ध लेकर दोनों ही राजकुमार श्री राम और लक्ष्मण 
स्वस्थ हुए उनके शरीर से बाण निकल गये, घाव भर गये। इसी प्रकार जो दूसरे 
प्रमुख वानर वीर हताहत हुए थे वे सबके सब उन श्रेष्ठ औषधियों की सुगन्ध से 
रात के अंत में सोकर उठे हुए प्राणियों की भाँति क्षण भर में निरोग हो, उठकर 
खड़े हो गये। उनके शरीर से बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा जाती 
रही ।7% 

इसके बाद जब लक्ष्मण जी इन्द्रजित का वध कर अपने बड़े भाई के पास 
आये तब श्री राम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेण 
वैद्य को बुलाकर कहा मित्र ! सुषेण शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे युद्ध करने 
वाले वानर रीछ, सुमित्रा कुमार और विभीषण स्वस्थ हो जायें और इनके बाण 
निकलकर सारे शरीर के घाव भर जायें और सारी पीड़ा दूर हो जाये।'” यह 
सुनकर सुषेण ने लक्ष्मण की नाक में एक बहुत ही उत्तम औषधि लगा री जिसकी 
गंध को सूँघते ही लक्ष्मण के शरीर से बाण निकल गये और उनकी : प्र 
हो गयी। उनके शरीर के सारे घाव भर गये |” श्री राम की आज्ञा स सुपण न 
विभीषण, वानर, रीछ आदि की चिकित्सा भी की ॥” 

उपरोक्त प्रसंग में रामायण में कुछ दिव्य औषधियों का नामोल्लेख आया है 
संभव है वे औषधियाँ आज उपलब्ध न भी हों-फिर भी उस समय उनकी 


वाल्मीकि रामायण में उपलंब्ध औषध परिचय एवं..../ 297 


प्रभावोत्पादकता, दिव्यता, असंदिग्ध थी। वे औषधियाँ-विशल्यकरणी, बला, अतिबला, 
गजकन्द, संजीवकरणी, सन्धानी, सुवर्णकरणी या संवर्ण करणी थीं। 
औषधि-पर्वत ह 

वाल्मीकि रामायण में “औषधि-पर्वत” का भी उल्लेख प्राप्त होता है। ऋक्षराज 
जाम्बवान ने विभीषण के द्वारा हनुमान को बुलाकर यह आदेश दिया- 

हनुमाने ! समुद्र के ऊपर-उड़कर बहुंत दूर का रास्ता तय करके तुम्हें पर्वत 
श्रेष्ठ हिमालय पर जाना है॥*” वहाँ पहुँचकर तुम्हें सुवर्णमय ऋषभ तथा कैलाश 
पर्वतों के दर्शन होंगे।'* वीर ! उन दोनों शिखरों के बीच में एक औषधियों का 
पर्वत दिखाई देगा, जो अत्यन्त दीप्तिमान है। उसमें इतनी चमक है जिंसकी तुलना 
नहीं है। वह पर्वत सब प्रकार की औषधियों से सम्पन्न हैं।'” इसके शिखर पर 
उत्पन्न चार औषधियाँ तुम्हें दिखाई देगीं जो अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को 
प्रकाशित किये रहती हैं। उनके नाम मृत संजीवनी, विशल्य-करणी, सुवर्ण-करणी 
तथा संधानी हैं। ये चारों ही महौषधियाँ हैं ।** तुम उन सब औषधियों को लेकर 
शीघ्र लौटो और वानरों को प्राण प्रदान करो। | 

हनुमान जी उन औषधियों को उस पर्वत पर पहुँचकर ढूँढ़ने लगे। दीप्तमान 
औषधियों से दैदीप्यमान पर्वत'* पर हनुमान उन औषधियों को खोजते रहे ।४“ 
महौषधियाँ यह जानकर कि कोई उन्हें लेने आया है तत्काल अदृश्य”्हो गयीं।7 
हनुमान जी से यह न सहा गया और वे जोर से क्रोध कर उस पर्वत को उखाड़ 
कर लंका ले चले ।'” सभी को स्वस्थ करने के पश्चात्‌ हनुमान जी ने पुनः उस 
पर्वत को उसी स्थान पर पहुँचा दियां। 

एक अन्य स्थल पर सुषेण ने हनुमान जी से कहा, “सौम्य तुम शीघ्र ही यहाँ 
से महोंदधि पर्वत पर जाओ जिंसका पता जामवन्त ने तुम्हें पहले ही बता दिया है। 
और उसेके दक्षिण शिखर पर लगी हुई विशल्य करणी, सावर्ण्य करणी, संजीवन 
करंणी तथा संधानी नाम से प्रसिद्ध महौषधी को यहाँ ले आओ ॥* वीर! उन्हीं से 
वीरवर लक्ष्मण के जीवन की रक्षा होगी, यह सुनकर हनुमान महोदय गिरि पर्वत 
पर गये परन्तु औषधियों को नं पहचान सकने के कारण विचार करने लगे। इसी 
शिंखर पर वह सुखदायिनी औषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात 
होता है क्योंकि सुषेण ने ऐसा हीं कहा था। औषधि को बिना लिये ही लौट जाने 
से अथवा समय अधिक लग जाने से अधिक दोष की संभावना हैं। यह सोचकर 
हनुमान जी ने गिरिश्रृंग को उठाकर सुषेण के पास ले जाकर रख॑ दिया और 
कहा-महाकपि ! मैं उन औषधियों को पहचानता नहीं हूँ, इसलिये सम्पूर्ण 
पर्वत-शिखर को ही उठा लाया हूँ. सुषेण ने हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते 
हुए-उन औषधियों को उखाड़ लिया महातेजस्वी सुषेण ने उस औषधि को 
कूट-पीस कर लक्ष्मण की नाक में टपका दिया ।”” उस औषधि को सूँघते ही 
लक्ष्मण स्वस्थ हो गये।॥” 

इस प्रकार रामायण में दिव्य औषधियों एवं औषधि पर्वत का उल्लेख आता 


298 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


है किन्तु यह औषधियाँ दिव्य हैं, अतः इनकी समीक्षा करना थोड़ा जटिल एवं 
कठिन कार्य है, इसलिये यहाँ उनका केवल उल्लेख एवं वर्णन ही प्रस्तुत किया 
गया है। 

वाल्मीकि रामायण में कुछ और भी ऐसी वनस्पतियाँ हैं जिनका अभी तक 
उल्लेख नहीं किया जा सका है। वे संख्या में बहुत अधिक हैं, स्थानाभाव के कारण 
संक्षेप में ही उनका परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। 
अग्नि-मुख -भिलावा, भल्लातक 

भिलावा के नाम हैं-भल्लातक, अरुष़्क, अरुष्कर, अग्निक, अग्निमुखी, 
भल्‍्ली, वीर वृक्ष इत्यादि। 
गुण 
पाक में मधुर स्लब्युक्त, लघु, मधुर, कषाय-रस*युक्त, पाचक, स्निग्ध, तीक्ष्ण 
तथा उष्णवीर्य, छेदी, भेदक, मेध्य एवं अग्निवर्धक होता है। 

इसका उपयोग अआर्श, वात-विकार, कफ-विकार, फिरंग, गण्डमाला, कृमि, 
विसूचिका; गुल्म; आमजवात एवं कुष्ठ आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में अग्निमुख'” तथा भल्लातक'” दोनों का ही उल्लेख 
मिलता है। 
अतिमुक्त, तिनिश,; स्यन्दन, रंथद्दु 

तिनिश के नाम हैं-अक्षका, अश्मगर्भका, अतिमुक्तका,; भस्मगर्भा, तिनिश, 
स्यन्दन, नेमी, रथद्वू इत्यादि। 
गुण 

तिनिश कसैला, गरम, संकोचक, कफ-वात-नाशक और रकक्‍्तातिसार, कोढ़, 
प्रमेह, मेद, व्रण, रुधिर-विकार, पित्त, श्वेत कुष्ठ, कृमि, दाह और पांडु रोग का 
नाश करता है। इसके गोंद की फक्की देने से अंतिसार मिटता है। तिनिश की 
गोंद, सोंठ और मिश्री तीनों बराबर लेकर घी में मिलाकर चटाने से आमातिसार 
मिंटता है। इसकी छांल का क्वाथ पिलाने से ज्वर छूटता हैं। 

वाल्मीकि रामायण में अंतिमुक्त,'' तिनिश!* एवं स्यन्दन'* तीनो ही नामों 
से इसका उल्लेख किया गया है। 
अतिबला (कंघी) 

नाम अतिबला, बालिका, बल्या, शीत पुष्पा, वृष-गन्धिका, हिन्दी-कंघी, 
कंघनी, झम्पी। कंसकी, मुद्रिका, करडि इत्यादि। 
गुण ण 
जे अतिबला चरपरी, कड़वी, वात कृमि, दाह, तृष्णा, विष, वमन और क्लेद को 
शान्त करने वाली है। यह वीर्य-वर्धक, बलकारक, अवस्थास्थापक वात-पित्तनाशक 
और मूत्र रोग को दूर करने वाली है। 

इसकी छाल कड़वी, ज्वरनिवारक, कृमिनाशक और जहर के दोष को उपशम 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं....४ 299 


करने वाली है। 

अतिबला की छाल और पुराने पत्तों को पीसकर उनको पानी में ओटाना 
चाहिये और जब अष्टमांस पानी शेष रह जाये तब उस काढ़े से गरमी के चट्टों 
को धोने से लाभ होता है। ह 

अतिबला की जड़ और सोंठ का काढ़ा पिलाने से शीत, कम्प और दाह युक्त 
ज्वर दो-तीन दिन में नष्ट हो जाते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में अतिबला*” को दिव्य-औषधि के रूप में माना गया है। 
इसे मंत्र के रूप में भी देखा जा सकता है जिसको मुनि ने राम को दिया था। 
अरणी, उत्तरा अरणी 

अग्निमंथः, जया, तकारी, नादेयी, अरनी, टाकली, नरबेल, गनिरी, |शल्राव8 
776८४४०४8 आदि अरणी के नाम हैं। 
गुण 

अरणी कड़वी, तीखी, उष्ण तथा वात, कफ, पाण्डु रोग, सूजन, मन्दाग्नि, 
बवासीर, कब्जियत इत्यादि अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करने वाली है। 

इसकी जड़ विरेचक, अग्नि-वर्धक एवं यकृत की पीड़ा को दूर करने वाली 
होती है। अरणी की प्रधान क्रिया गर्भशिय पर होती है। 

बवासीर, वायु-गोला, सूजन, गठिया तथा स्नायु-पीड़ा, शीत, पित्त, आमाशय 
का शूल, हृदय की निर्बलता, उपदंश, रुधिर-विकार आदि में इससे लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में अरणी'* तथा उत्तरा अरणी'“ दोनों का ही उल्लेख मिलता 
है। 
अरिष्ट 

अरिष्टः, फेनिलः, रक्तबीजः, मंगल्यः। अरीठा, रीठा, रेठा बन्दक, रिता, 
520॥005, [7॥.08805 आदि नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेद के मतानुसार अरीठा पचने में चरपरा, त्रिदोष नाशक, तीक्ष्ण, गरम, 
भारी, गर्भपातक, वमन-कारक है। यह गर्भाशय को निश्चेष्ट करने वाला और विष 
के असर को नष्ट करने वाला है। 

इसके उपयोग से हिस्टीरिया और मृगी, आधा-शीशी, अनन्त वायु आदि रोगों 
में लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में अरिष्ट”" (रीठा) का उल्लेख भी प्राप्त होता है। 
असिपत्र, इक्षु, इक्षुकाण्ड 

इक्षु, दीर्घच्छद, भूरिरस, ईख, ऊख, गन्ना, पौण्डा, सांठा। शेरड़ी, शेरड़ीन मूल, 
नेशकर, 5५४५ (श्षा० आदि नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से रक्त-पित्त नाशक, बलकारक, वीर्य-वर्धक, कफकारी, पचने में 


300 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मधुर, स्निग्ध, भारी, मूत्र॒ल, एवं शीतल है। 

सूखी खाँसी, पित्त-विकार, रुधिर का वमन, मूत्ररेचन, विरेचन, रक्तातिसार, 
पितगुल्म आदि रोगों में यह लाभकारी एवं उपयोगी है। 

वाल्मीकि रामायण में असिपत्र,' इक्षु* एवं इक्षुकाण्ड** तीनों ही नामों से 
इसका उल्लेख मिलता है। 
आजै (अजवायन) 

यवानी, दीप्यक, अजवायन, ओवा, यमानी, (क्षण (0०.४०णा आदि अजवायन 
के विविध नाम हैं। 
जुण 

आयुर्वेदिक मत से अजवायन पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, गरम, चरपरी, हल्की, 
दीपन, कड़वी, पित्त-वर्धक तथा शूल, वात, कफ, आध्मान, बवासीर, कृमि, वमन, 
गुल्म, और प्लीहा को नष्ट करने वाली है। 

जुकाम व प्रतिश्याय, अफारा, मन्दाग्नि, आँतों की वेदना, सूखी-खाँसी, जोड़ों का 
दर्द, बच्चों की उल्टी, चर्म-रोग, रजो-दोष, कृमि-रोग, नेत्र-रोग आदि में इसका प्रयोग 
लाभकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका'” उल्लेख मिलता है। 
इंगुदी (हिंगोट) 

इंगुदी, हिंगोट, इंगुद, अंगार वृक्ष, तिक्तक, विषकंटक, इत्यादि तथा 88[क्ा(९5 
#&०९५7४०७०९ आदि इंगुदी के विविध नाम हैं। 
गुण 

हिंगोट मद-गन्धयुक्त,चरपरा, हल्का, कड़वा, गरम, झाग-दार, रसायन तथा कृमि, 
वात, शूल, श्वेतकुष्ठ, व्रण, कफ, ग्रहपीड़ा और भूत-वाधा को दूर करता है। इसके 
फूल मधुर, स्निग्ध, गरम, कड़वे तथा वात और कफ को नष्ट करने वाले होते हैं। 

इनका उपयोग पेट के कृमि, सूखी खाँसी, उदर शूल, मोतिया बिन्द, रुधिर-विकार 
आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में इंगुदी” का उल्लेख प्राप्त होता है। 
उशीर, उशीर बीज 

उशीर के नाम दादहरण, हरि प्रिया, जलाशया, सेव्या, शिशिरा, सुगन्धि मूल, शीत 
मूलका, खस, वाला, बेना, ओनई, पानि। खश, सीरोम, उशीर, #॥कण्ड णा 
ग्राप्माटथ०5 आदि हैं। 
जुण 

खस शीतल, कड़वी और दाह, परिश्रम तथा पित्त ज्वर को शान्त करने वाली 
होती है। यह पाचक, स्तम्भक, हल्की तथा ज्वर, वमन, मद, कफ, पित्त, तृषा, 
रुधिर दोष, विष, विसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्‌ और व्रण-रोग को दूर करती है। 

इसका उपयोग ज्वर, पित्त-रोग, रुधिर-विकार, मूत्रावरोध तृषा, कम्पवायु, 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एव॑.... « 30॥ 


हैजा, मस्तक-पीड़ा, हृदय-शूल, पित्तोन्‍्माद आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में 'उशीर*” तंथां “उशीर बीज*”” दोनों का ही उल्लेख 
किया गया है। 
अंकोल 

अंकोट, दीर्घकील, अंकोल, निकोचक, ढ़ेरां, टेरा, ढ़ेला, बाध आदि अंकोल के 
विविध नाम हैं। 
गुण 

: इसकी छाल कड़वी, उष्ण, वामक, स्वेद-जनक, मूत्रल, रेचक, ज्वर-हर, 

कृमिघ्न एवं विष हर है। हे 

वामक प्रयोग से आमाशय में दाह तथा हृदय एवं रक्‍त-वाहनियों पर 
अवसाद प्रभाव पड़ता है। 

यह कुष्ठ उपंदंश तथा सभी प्रकार के त्वचा रोगों में लाभदायक है। 
यकृतोदर, जलोदर एवं वृक्क-जन्य शोफ में इसकी मूलं-त्वक्‌ देने से लाभ होता 
है। चूहे के विष में तथा सर्प-विष में यह लाभदायक माना जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी अंकोल** के स्पष्ट दर्शन होते हैं। 
कर्णिकार 

कर्णिकार, मुशकुन्द, पदोत्पल, परिव्याधि, कनकचम्पा, कठचम्पा, कदियार, 
थमजम, वइसोक, राजतरु, हटिपैला, वेनगू, मत्सकंद इत्यादि कर्णिकार के विविध 
नाम हैं। 
गुण 

इसका फूल कड़वा, कसैला, पौष्टिक, मृदुविरेचक, व कूमि नाशक होता- है। 
यह; कफ प्रदाह रक्त सम्बन्धी तकलीफें, उदर पीड़ा व जलोदर का निवारण:करता 
है। ब्रण, कुष्ठ, मूत्राशय-सम्बन्धी तकलीफें व अर्बुद में भी यह लाभदायी है। इसके 
पत्तों. के ऊपर का बीट घाव का खून बन्द करने के लिये उपयोग में लिया जाता 
है। इसके फूल पौष्टिक वस्तु के रूप में काम में लिये जाते हैं। कोकन में इसके 
फूल और इसका छिलका जलाकर कमल के साथ छोटी माता की फुन्सियों के पीब 
को बन्द करने के काम में लिया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कर्णिकार** का उल्लेख है। 
करंज, नक्तमाल हि 

करंज, अज्ञर वल्लि, वाधाफल , हरित-वारुणी, पूतिकरंज, नक्तमाल, काकछिन, 
मद-हस्तिनी। करंज, कंज, करंजिका आदि करंज के विविध नाम हैं। 


जा 

इसकी जड़ और छाल गरम, कड़वी, कसैली, कृमिनाशक और बाघा निवारक होती 
है। यह नेत्र, योनि और चर्म रोगों में लाभकारी है। यह अर्बुद, बवासीर, जस्म, फोड़े, 
खुजली, जलोदर, उदरं-रोंग आदि में लाभकारी है। इसके कोमल पत्ते अग्नि-वर्धक, 
विष-नाशक और कूमि नाशक होते हैं। ये भूख बढ़ाने वाले तथा कफ-वात, चर्मरोग 


302 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


आदि को दूर करते हैं। मु 
चर्म रोगों में इसका तैल बहुत लाभदायंक है। इसके फल की लुगदी बनाकर पानी 
के साथ देने से कुष्ठ एवं विसर्पिका रोग मिटते हैं। 
वाल्मीकि रामायण में करंज”" एवं नक्तमाल“ दोनों ही नामों से इसका उल्लेख 
मिलता है। 
करवीर 
अश्वमारक, चन्दन, कनेर, करवीर, हरिप्रिय, गौरि पुष्प, कर्बी, करवी, कनहेर, 
पाँढ़री, गनेरु, करवीरम्‌ इत्यादि-करवीर के विविध नाम हैं। 


जग 

सफेद कनेर कट, कसैली, तीक्ष्ण-वीर्य, आँतों को सिकोड़ने वाली, तथा प्रमेह, कृमि, 
कुष्ठ, घाव, बवासीर और वात-रोग को नष्ट करने वाली है। वह नेत्रों को हितकारी 
हल्की तथा कूमि आदि को दूर करती है। लाल कनेर. शोधक, चरपरी होती है। 

इसका उपयोग खुजली, चर्मरोग, -नेत्र-रोग, नपुंसकता, जोड़ों का दर्द आदि रोगों में 
किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण-में भी इसका उल्लेख मिलता है।/* 
करीर (करील) 

करीर, गूढ़पत्र, शाक-पुष्प, तीक्ष्ण, केटक, इत्यादि । हि. करील भा. ढ्लू बं. करील, 
कवड़ा, नेपती, इत्यादि करीर के विविध नाम हैं। 


करील कसैला, गरम, चरपरा, रुचिकारक, भेदक, विष -नाशक,, विरेचक, एवं 
कृमिनाशक, होता है। यह खाँसी, और श्वास में लाभदायक है। ब्रण, अर्बुद, वमन,-और 
बवासीर, में इसका उपयोग अत्यन्त लाभकारी है। इसके फूल एवं फल कफ एवं वात 
को नष्ट करने वाले हल्के एवं रुचिकारक होते हैं। 

इसका उपयोग ज्वर, दन्तपीड़ा, तिल्‍ली, खूनी-बवासीर, जोड़ का दर्द आदि में किया 
जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी करीर”* का उल्लेख प्राप्त होता है। 

कलिहारी 


अग्निशिखा, अन्निमुली, गर्भघातिनी, इन्दुपुष्पिका, हरिप्रिया, कलिहारी, कलियारी, 
लंगाली, लांगुली, राजाराड़, विष-लांगला, ईश लांगला आदि कल्हार के विविध नाम हैं। 
गुण 
आयुर्वेदिक मत से यह एक उपविष है, इसकी गाँठें कड़वी, कसैली और 
चरपरी होती हैं, यह कृमि-नाशक, विरेचक, विष-निवारक और गर्भघातक होती 
है। निण्टु रत्नाकर के अनुसार यह सारक, कड़वी, चरपरी, क्षारयुक्त, पित्त-जनक, 
तीक्ष्ण, गरम, कसैली, हल्की तथा कफ, वात, कृमि, वस्तिशूल, विष, कोढ़, 
बवासीर, ब्रण, सूजन, शोष, शूल, शुष्क गर्भ एवं गर्भ को नष्ट करने वाली है। 
इसका उपयोग, सुजाक, कंठमाला, कृमिरोग, पुरुषार्थ वृद्धि, कामला, योनिशूल, 
वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 303 


कर्ण-रोग, बिच्छू एवं कानखजूरे का विष आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका” उल्लेख प्राप्त होता है। 
काश्मरी 

गम्भारी, भद्रपर्णी, श्री पर्णी, मधुपर्णिका, काश्मीरी, काश्मरी, हीरा, काश्मर्य, 
पीतरोहिणी, कृष्णवृन्ता, मधुरसा, एवं महाकुसुमिका आदि काश्मरी के विविध नाम 
हैं। 
जुण 

इसका फल बुंहण (धातु-वर्धक), वृष्य (वीर्य-वर्धक), गुरु, बालों के लिये 
हितकर, एवं रसायन होता है। यह वात-पित्त, तृषा, रकत-क्षय, मूत्र-सम्बन्धी 
विवद्धता का नाशक है और पाक में मधुर रस, स्वाद में कषाय तथा अम्ल-रसन्युक्त, 
शीतवीर्य, स्निग्ध एवं शुद्धि-कारक होता है। यह दाह, तृषा, वात, रक्‍्त-पिक्त, क्षत 
एवं क्षय, इन सब रोगों को दूर करता है। 

इसके कोमल पत्तों का स्वरस दुग्ध के साथ सोजाक में देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में 
होने वाले शिरः शूल में पत्तों को दुग्ध में पीसकर सर पर मलते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी काश्मरी*" का उल्लेख प्राप्त होता है। 


श्वेत मंदार रक्‍्त-कुरवक आदि इसके नाम एवं भेद हैं। 

आयुर्वेद के प्रणेता आचार्य गण “नानौषधिभूतं किंचिद्‌ द्रव्यं-जगति' करे 
सिद्धान्त को मानते थे। अतः बिना किसी भेद-भाव के समय-समय पर जिन- 
द्रव्यों का ज्ञान हुआ, उसके औषधोपयोगी पक्ष पर भी उन्होंने गवेषणा कर 
आयुर्वेदीय शास्त्र एवं व्यवहार परंपरा के परिवेश में उसका समावेश भी किया। 
यद्यपि आ. संहिताओं में कुरवक बहुत प्रसिद्ध तो प्रतीत नहीं होता, तथापि सुश्रुत 
इससे अवगत अवश्य थे, 'सुश्ुत-संहिता” में पुष्प-विशेषके रूप में कषाय-वर्ग में 
(सु. सू. अ. 46) तथा पुनः (कल्पस्थान अध्याय 5) विषापह “एकसरौषधगर्णं! - में 
कुरवक का भी उल्लेख है। वर्तमान में विद्वान इसका प्रयोग सैरेयक के पर्याय में 
करते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है" 


कुरन्ट 

कुर॒टंक, किंकीरात, पीत-पुष्पक, श्वेतपुन्य, मृदुकंट आदि हि. कटसरैया, 
पीयावासा। म.-कोरांटा, कलसुंदा, गु-कंटासरियो, बं.-कंटजाति, ते.-नल्लगोरंटे ले.- 
छक्वा०्मं8 ?तंणांशां5 आदि “कुरन्ट' के विविध नाम हैं। 
आुण 

सफेद फूल की कटसरैया कड़वी, मृदु, गरम, दाँतों को हितकारी और 
कृमिनाशक होती है। पीले फूल की कटसरैया गरम, भूख बढ़ाने वाली, कड़वी, 
कसैली तथा चर्म आदि रोगों में लाभकारी है। लाल फूल की कड़वी, कांति कारक 


304 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


एवं गर्म होती है। नीले फूल की सूजन-ब्रण आदि में लाभकारी है। 

इसका उपयोग बन्ध्यत्व, उपदंश, खाँसी, अतिसार आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कुरन्ट* का उल्लेख किया गया है। 
कुलिप्त (कुलथी) 

कुलत्थिका, कुलत्थ, कुलथी, कुरथी, कुथी, कुलिथ, हूरुली, कुलीथ, बुलाबुलु, 
कुलथी, गुलथी, ॥७७० १00०2१ 700॥८०5 ले.- 00॥2005 ७४8।0००५ आदि इसके 
विविध नाम हैं। 
गुण 

कुलथी कषाय रस-युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, पित्त तथा रुधिर विकार 
करने वाली, लघु, विदाही, उष्ण-वीर्य, पसीने को रोकने वाली, सारक एवं श्वास, 
कास, कफ, वायु, हिचकी, पथरी, शुक्र, दाह, आनाह, पीनस, मेद, ज्वर, तथा कृमि 
को दूर करने वाली होती है। 

यह इस देश में प्रायः सर्वत्र होती है। इसका क्षुप लगभग एक हाथ ऊँचा 
होता है। इसके लता क्षुप और पत्ते उड़द (माष) के समान होते हैं। फलियाँ-कुछ 
टेढ़ी और चपटी होती हैं। इसका रंग लाल होता है पर कहीं-कहीं काली और 
सफेद कुलथी भी होती है। इसका उपयोग ज्वर आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।* 
कुशेशय 

“पद्म एवं 'कर्णिका' का पर्याय है, इन दोनों का ही उल्लेख किया जा चुका है ।* 
कुष्ठ (कूठो 

कुष्ठ, अगद, भासुर, हरिभद्रक, काश्मीरजा, कूट, कोठकुर, पाचक, उपलेट 
आदि कुष्ठ के विविध नाम हैं। 
गुण 

इसकी जड़ गरम, कड़वी, तीक्ष्ण, चरबी बढ़ाने वाली, सुगन्धित, दीपक, 
पाचन, कामोद्दीपक, धातु-परिवर्तन, वात-नाशक, कफ-नाशक, उत्तेजक, 
मासिक-धर्म-नियामक और व्रण-शोधक होती है। यह मुँह की कांति को सुधारती 
है। धवल-रोग को मिटाती है। विसर्परोग, दाद, खुजली, रक्‍्त-विकार, वायु-नलियों 
का प्रदाह, वमन और वात-रोगों में लाभदायक है। इसे सिर-दर्द, उन्‍्माद और 
अपस्मार रोग में काम में लेते हैं। 

इसका उपयोग श्वास, हिचकी, मस्तक-पीड़ा, गठिया आदि रोगों में लाभदायक है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख किया गया है।* 


अतिमुक्त, अट्टहास, अट्टपुष्पक, व्रणबन्धु, दलकीष, कंद, मकरंद, मनोदन, 
बसन्‍्त, कुन्दो, कुन्दफल इत्यादि कुन्द के विविध नाम हैं। 
ञुण 
वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 305 


कुन्द शीतल, अत्यन्त मधुर, कसैला, सारक, हल्का, पाचक, दीपक, हृदय के 
लिये पौष्टिक, चरपरा एवं पित्त-रोग, मस्तक-रोग, विष, सूजन, आम, रुंधिर-विकार 
और वात को हरने वाला है। इसके फूल मृंदुविरेचक, पाचक, हृदय को. बल देने 
वाले हैं। ये विघ-नाशक और वात-नाशक हैं। 

इसका उपयोग पित्त में, प्रदाह में, और रक्त सम्बन्धी शिकायतों में लाभदायक 
है। इसके सूखे हुएं फलों को पानी में भिगोकर उनका पुल्टिस बनाया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेंखं प्राप्त होता है।”' 
कृत-मालक (अमलतास) 

नाम-संस्कृत नृपद्गुमः, आरग्वधः, हेमपुष्प:, दीर्घफलः, व्याधिघातः। 
हिन्दी-अमलतास, घनबहेड़ा । मा. करमाड़ी | गुजराती -गरमाड़ी। मराठी-वाहवोह 
बं. सोनालू आदि इसके विविंध नाम हैं। 
गुण 

अमलतास भारी, स्वादिष्ट, शीतल, मृदुरेचक, ज्वर, हृदय-रोग, रक्त-पित्त 
वात, उदावर्त और शूल को नष्ट करने वाला है। इसकी फली रुचिकारक, 
कुष्ठ-नाशक, पित-निवारक, कफ नष्ट करने वाली है। 

इसका उपयोग चर्मरोग, श्वास और रुकावट, रुन्‍्नवात, गठिया, अण्डनवृद्धि, 
कण्ठ-मांला, कब्जियत, कर्ण-रोग, कुष्ठ, अफारा, सुख-प्रसव, हरिद्वा-प्रमेह आदि में 
किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है ।* 
खण्डकानि (खांड) 
खण्ड (खांड) के गुण 

खंड मधुर रस युक्त, वीर्य-वर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण (रस रक्‍्ताति 
वर्धक) शीत-वीर्य, वात तथा पित्त-नाशक, स्निग्ध, बलकारक एवं अत्यन्त वमन 
को दूर करने वाली है। )। 

वाल्मीकि रामायण में भी खंड*” का एक-दो स्थलों पर उल्लेख प्राप्त होता है। 
खदिर (खैर) ५ 

खदिर, खेदसार, सोमसार, सोमवृक्ष, खैर, खन्टेगाछ इत्यादि खैर के विविध 
नाम हैं। 
जुश 

खैर शीतल, कड़वा, दाँतों को दृढ़ करने वाला, कड़वा तथा कसैला होता है। 

यह चर्म-रोग, खाँसी, अरुचि, प्रमेह, ज्वर, आदि में लाभदायक है। वा. रा. में 
भी इसका उल्लेख किया गया है।?* 
गोधूम (गेहूँ 

अरुपा, बहुदुग्धा, गोधूमा, क्षीरी, मलेच्छ भोजन, पवना, गेहूँ, कुनक, नहूँ, गहूँगा 
इत्यादि गेहूँ के विविध नाम हैं। 
गुण 
306. / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गेहूँ शीतल, पौष्टिक, वीर्य-वर्धक, भारी, मधुर, स्निग्ध, कामोदूदीपकं, रुचि-कारक, 
देह को स्थिर रखने वाला, वात-पित्त नाशक एवम्‌ कुछ दस्तावर है। 

गेहूँ का उपयोग खुजली, खाँसी, नारु, पथरी, मूत्र-रोग, मूत्र-कुच्छ आदि रोगों 
में करने से विशेष लाभ होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी गेहूँ का उल्लेख कई स्थलों पर प्राप्त होता है !* 
गौड़ानि (गुड़) 

हि.-गुड़, गुड, मीठा, ते.-वेल्लमु, वेलामु, म.-गूल, मा--गुल, गु.--गोड, 
गोल फा.-कन्दे स्याह। क.-हेमरु अ.-कन्दे असवद। अं.--7९806 (ट्रेकल) 
आंदि गुड़ के विविध नाम हैं। 

गुण 

यह वीर्य-वर्धक, गुरु, स्निग्ध, वात-नाशक, मूत्र-शोधनं करने वाला, थोड़ा 
पित्त-नाशक एवं मेद, कफ, कृमि तथा बल को उत्पन्न करने वाला होता है। 

पुराना गुड़, लघु, पथ्य, अनभिष्यन्दी, अग्निजनक, पुष्टि-वर्धक, पित्त-नाशक, 
मधुर, वीर्य-वर्धक, वात-नाशक है। 

नवीन गुड़ कफ, श्वास, तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला- एंवं जठराग्नि की 
वृद्धि करने वाला होता है। 

इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी कई स्थलों परं उपलब्ध होता है ।* 
चणक (चना) 

चणक (चना), हरिमन्थ, सकल-प्रिय, हि.-चना, छोला, रहिला, रोहिला, बूंट 
म.--हरबरा, हरभरे, हर. भरा, हरभव्या, चणें, बं.-छोला आदि चणक के विविध 
नाम हैं। | 
गुण 

चना कषाय रस युक्‍त, शीतल, रुक्ष, लघु, विष्टग्मक, वात-कारक, एवं पित्त, 
रक्‍्त-विकार, कफ तथा ज्वर का नाशक है। 

भिगोया हुआ चना-कषाय रस युक्त, अत्यन्त कोमल, रुचि-कारक, शीतल, 
वबात-जनक, ग्राही, लघु एवं पित्त, शुक्र तथा कफ, पित को नष्ट करने वाला होता है। 

सूखा हुआ चना अत्यन्त रुक्ष एवं वात तथा कुष्ठको कुंपित करनेवाला होता है। 

: बाल्मीकि रामायण में भी चने का उल्लेख प्राप्त होता है।?” 

चम्पक (चम्पा) हि 

सं. चम्पक, कंचना, नागपुष्पा, पीतपुष्पा, राजंचंपक, उग्रगन्धा, वनमालिका, 
हि.चंपा, नाग चम्पा, चम्प, चम्पक, चम्पका, सोन चम्पा। गु. चम्पो, रायचम्पो, सोनचम्पा 
केसरी चम्पा आदि चम्पक के विविध नाम हैं। 


गुण 

इसकी छाल कड़वी, कसैली एवं चरपरी होती है। यह विष॑ को नष्ट करती है। 
कृमियों को निकाल देती है। वीर्य-वर्धक है। इसके सेवन से हदय को बल मिलता है और 
मूत्र अधिक होता है। कफ, वात एवं पित्त के विकारों को यह दूर करती है। इसके फूल 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 307 


कड़वे, अग्निवर्धक, मूत्र निस्सारक, पित्त-विकारों को मिटाने वाले तथा कोढ़, चर्म-रोग 
और व्रण में लाभदायक हैं। इसका उपयोग प्रसूति रोग, मूत्रकृच्छ, फोड़ा, सिरदर्द, संधि 
वात, नेत्र-रोग, उदर-शूल, ज्वर आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।* 
चिरिबिल्व 

नाम-सं.-चिरिबिल्व हि. चिरविल्व, चिरमिल, चरेल, पापरी, करंजी । मराठी-बावाड़ 
गु.-कणझो ते. नवीली आदि चिरिबिल्व के विविध नाम हैं। 
गुण 

यह वनस्पति शोथ-नाशक और संधिवात में लाभ पहुँचाती है। इसकी जड़ की छाल 
को औटाकर सन्धियों की सूजन पर बाँधने से लाभ होता है। इसके पत्तों की लुगदी से 
तैल को सिद्ध कर उस तैल को व्रणों पर लगाने से व्रण भर जाते हैं। इसकी डालियों 
के रस को दाद पर लगाने से दाद नष्ट हो जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में अन्य वनस्पतियों के मध्य चिरिबिल्व”” का भी उल्लेख प्राप्त 
होता है। 
चूर्णाक (चीनाक) 

नाम-सं.-चीनाक, काककेगु सुश्लक्ष्ण, तथा कंगुमेद । हि.--चीना, चिन्ना, चैना, 
बं.-चिने म.-राले, गु:-चीणे, चीणा क.-चीनक। फा.--उरजान, उरजन। अ.-वारेगा। 
अ. १४गञाला ५5-एं८णा, )/ग्रंशा आदि चीनाकः के विविध नाम हैं। 
गुण 

चीना कंगुनी का भेद है अतः यह भी उसी के समान टूटी हुई अस्थियों को जोड़ने 
वाली, वात-कारक, बूंहण, गुरु, रुक्ष, अत्यन्त कफनाशक और घोड़ों के लिए विशेष रूप 
से गुण करने वाली होती है। 

वा. रामायण में भी चूर्णाक*" का उल्लेख प्राप्त होता है। 
जवा (गुड्हल) 
अर्कप्रिया, जवा, जपा, गुड़लल आदि नाम हैं। 


गुण 

यह शीतल, मधुर, स्निग्ध, संकोचक, बालों को हितकारी, और शरीर की जलन 
आदि को दूर करने वाला है। यह मूत्र नली के रोग वीर्य की कमजोरी, बवासीर तथा 
गर्भाशय एवं योनि मार्ग की तकलीफों को दूर करता है। 

वा. रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है।? 
तगर 

नाम-सं.-कालानुसार्प, तगर, कुटिल, लघुष, नत, चक्र, शठ, दीपन, हि. 
तगर, पाठुका, म.-तगर, गु.-तगर गंठीड़ा। क.--तगर ते.-गन्धि तगर। आदि 
तगर के विविध नाम हैं। 
गुण 

तगर गरम, स्वादिष्ट, हल्के तथा विष, अपस्मार, सिर-दर्द, नेत्र-रोग एवं 


308 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


त्रिदोष को दूर करता है। निघण्टु-रत्नाकर के अनुसार तगर शीतल, पथ्य, कड़वी, 
मधुर, हल्की, स्निग्ध, पाक में चरपरी, कसैली, विष-विकार को दूर करने वाली 
तथा नेत्र-रोग, रुधिर-विकार, त्रिदोष, भूतोन्‍्माद और मृगी को दूर करती है। 

इसका उपयोग वात-पीड़ा, विष-विकार, नेत्र-रोग आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी तगर का उल्लेख उपलब्ध होता है ।”* 
तिन्दुक (तेंदू) 

नाम--सं.-तिन्दुक, अनिलसार, अतिमुक्तक, दंतशट, कालस्कन्ध, स्फूर्जय, 
स्रष्ट, स्यन्दन, रावण, कृष्णसार, केंदू, तिंदू। हिं.-तेंदू, तिंदू। बं.-गाब, मुकुरकेंडी, 
तेंदू। बं.-गाब, तेंदू, कुसी, टिम्बोरी। 
युण 

तिन्‍्दू कसैला, कड़वा, स्निग्ध, गरम, व्रणनाशक, वात को दूर करने वाला, 
मल-रोधक और दुष्पाच्य होता है। इसका कच्चा फल स्निग्ध, कसैला, हल्का, 
मलरोधक, शीतल, रूखा, और वात पैदा करने वाला होता है। इसका पका हुआ 
फल पित्त, प्रमेह, रुधिर-विकार और पथरी को नष्ट करता है। 

इसका उपयोग अतिसार, मुँह के छाले, ताजे घाव, श्वेत-प्रदर आदि रोगों में 
किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।* 
नारियल, नारिकेल, तुंग 

नाम--सं.-नारिकेल, दृढ़फल, लागली, जुँग, स्कन्धफल, श्री-फल, तृणराज, 
सदाफल, सदापुष्प, महाफल, हि.-नारियल, श्री-फल, खोपर इत्यादि नारियल के 
विविध नाम हैं। 
*.- ४४ 

नारियल भारी, स्निग्ध, शीतल, वीर्य-वर्धक, कठिनता से पचने वाला, वस्तिशोधक, 
बलकारक, पौष्टिक, कफ-कारक, स्वादिष्ट, संकोचक तथा शोष, तृषा, दाह, पित्त, 
वात-पित्त, रुधिर-दोष और क्षत-क्षय का नाश करता है। 

इसका उपयोग दाद, अग्निदग्ध, कफक्षय, रक्‍त-स्राव, चर्म-रोग, हैजे की 
वमन, पित्त-ज्वर, हिचकी, चोट एवं मोच, आधा-शीशी, शीतला, गर्भाशय की पीड़ा 
आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में तुंग”** एवं नारिकेल”* दोनों ही नामों से इसका उल्लेख 
उपलब्ध होता है। 


तुम्बी, लौआ, लौका, लौकी, कदूदू, कदुआ, मीठी, तोम्बी, लम्बा कदूदू आदि 
तुम्ब के विविध नाम हैं। 


गुण 
लौकी गुरु, रुचिकारक, वीर्य-वर्धक, हृदय के लिय हितकर, पित्त तथा 
कफ-नाशक एवं विशेष रूप से धातु की पुष्टि करने वाला होता है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 309 


यह प्रायः सब प्रांतों में रोपण की जाती है। खेत, बाग, मचान, छप्पर आदि 
पर फैली हुई इसकी लता होती है। पत्ते कुम्हरे के पत्तों के समान 6-7 इंच के घेरे 
में गोलाकार होते हैं। 
वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।* 
देवदारु 
नाम--सं.-सुरदारु, भद्रदारु, देव-काष्ठ, अमरदास, इन्द्रवृक्ष, इन्द्रदारु, मस्तदारु 
आंदिं हि.-देवदारु, बं.-देवदारु, म.-देवदार आदि देवंदारु के विविध नाम हैं। 
गुण 
देवदारु दो प्रकार का होता है। एक स्निग्ध दारु और दूसरा कष्ट-दारु। 
स्निग्धदारु पचने में चरपरा, चिकना, गरम, कड़वा, रूखा, तथा कफ, प्रमेह, 
बंवासीर आदि को दूर करनेवाला है। कष्ट देवदारु, गरम, कड़वा, रूखा, तथा 
कफ, वात-रोग और भूत-बाधा को दूर करता है। 
इसका उपयोग पारे का उपद्रव, सिर-दर्द, गल-गण्ड, सीने का दर्द, अण्डनवृद्धि, 
श्लीप्रद, नेत्र-रोग आदि में किया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है?” 
धन्व (इन्द्रयव) 
“कुटज बीज', यव, इन्द्रयव, कलिक्र, कालिज् और भद्रयव आदिं इसके विविध 
नाम हैं। धन्व कुटज के बीजों को कहते हैं। 
गुण 
यह त्रिदोष-नाशक, संग्राही, कटुरसयुक्त, और शीतल है। यह ज्वर, अतिसार, 
, खूनी-बवासीर, वमन, विसर्प एवं कुष्ठ को दूर करने वाला, अग्नि-दीपक एवं 
गुदकील, रक्त-दोष, वात रक्त, कफ तथा शूल को दूर करता है। 
गुण ; 
यंह कड़वा, दीपन, संग्राही, ज्वरहरं, कृमिष्न, वातानुलोमक, वृष्य, बल्य एवं 
रकत-संग्राहक है। 
इसका प्रयोग रक्तातिसार, ज्वरातिसार, शीत ज्वर, रक्तार्श, संग्रहणी, प्रवाहिका, 
पथरी तथा श्वास एवं पुराने फुफ्फुस विकारों में किया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।* 
घव 
नाम-सं.-धव, धवल, धुरन्धर, दृढ़तरु, गौर, घट, क्षय, मधुर त्वचा, नन्दितरु, 
पांडुतरु, पिशाच-वृक्ष, पीतफल, शकटाख्य, शुष्कांग, स्थिर, धावड़ा, धोंधंव, इत्यादि धव 
के विविध नाम हैं। 
गुण हु 
धव कसैला, शीतल, मधुर, चरंपरा, अग्निदीपक, रुचिकारक और पाण्डुरोग, प्रमेह, 
कफ, पित्त, बवासीर, और वात को दूर करता है। इसका फल शीतल, स्वादिष्ट, रूखा, 
कसैला, मलरोधक, वात-वर्धक, और कफ-पित्त नाशक होता है। इसकी जड़ चरपरी, 


30 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कसैली, पित्तकारक और अत्यन्त अग्नि-दीपक होती है। इसका गोंद पौष्टिक एवं 
कामोदुदीपक होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।”* 

न्यग्रोध,”" (बड़) वट,”" क्षीर वृक्षः” भण्डीर”' 

नाम- सं.-वट, रक्‍्तफल, शुड्टी, स्कन्धज, ध्रुव, क्षरी, अव-रोहर, भांडीर, भुल्ी, 
वृक्षनाथ, यम-प्रिय इत्यादि हैं। 
जुण 

यह कसैला, मधुर, शीतल, आँतों का संकोचन करने वाला, कफ, पित्त एवं ब्रणों 
को नष्ट करने वाला तथा वमन, ज्वर, योनिदोष, मूर्च्छा एवं विसर्प में लाभदायक है। ये 
कांति को बढ़ाते हैं। इसके पते व्रणों के लिये लाभदायक हैं। नवीन पत्ते गलित कुष्ठ में 
लाभ करते हैं। इसका दूध वेदना नाशक और व्रण रोपक होता है। 

इसका उपयोग गठिया, चोट, मसूड़ें के रोग, फोड़े आदि में किया जाता है। वा. रा. 
में इन सबका उल्लेख मिलता है। 
नाग वृक्ष, पुन्नाग 

नाग-सं.-भुजंगाख्य, चांपिय, हेम, हेमकिंजल्क, केसर, नागकेसर, नाग-पुष्पा, 
पुन्नाग केसर, हि.-नागकेसर, पुन्नाग, नागचम्पा आदि- नाग-वृक्ष के विवध नाम हैं। 
गुण 

नागकेशर, कड़वी, कसैली, आम-पाचक, किंचित-गरम, रूखी, हल्की तथा पित्त, 
कफ, रुधिर विकार, वात, कण्डू, हृदय की पीड़ा, पसीना, दुर्गन्‍्ध, विष, तृषा, कोढ़, 
विसर्प, वस्ति पीड़ा, वात-रक्‍्त, कण्डू रोग एवं मस्तक शूल को नष्ट करता है। 

इसका उपयोग रक्तार्श, पैरों की जलन, सर्प-दंश, गठिया, बिगड़े हुए घाव, 
श्वेत-प्रदर, गर्भ-पात आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। 
निम्बा : (अरिष्ट) 

नाग--सं.--निम्ब, नियमन, नेतर, पिचुमन्द, सतिक्तक, अरिष्ट, सर्वतोभेद्रक, हिंगु, 
पीतसार, रवि-प्रिय, हि-नीम, बं. नीमगाछ, म.-कड़ुनिम्ब | गु.-लीमड़ो इत्यादि नीम 
के विविध नाम हैं। 
गुण 

नीम हल्का, शीतल, कड़वा, ग्राही, व्रण-शोधक, बच्चों क॑ लिये हितकारी, 
कृमि, वमन, व्रण, कफ, शोथ, पित्त, विष, वात, कुष्ठ, हृदय की जलन, श्रम, 
खाँसी, ज्वर, तृषा, अरुचि, रुधिर-विकार एवं प्रमेह को नष्ट करता है। 

इसका उपयोग, जीर्ण ज्वर, मलेरिया ज्वर, पित्ती, घाव, कुष्ठ एवं चर्मरोग, 
विपैले घाव, दमा, फोड़े, हैजा, दस्त, वायु रोग, नासूर आदि अनेक रोगों में किया 
जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख उपलब्ध होता है // 
पर्णास (तुलसी) 





वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 3॥ 


नाम-सं. तुलसी, वैष्णवी, वृन्दा, सुगन्धा, गंध-हारिणी, अमृता, पत्र-पुष्पा, 
पवित्रा, सुरवल्लरी, सुभगा, तीव्रा, पावनी, विष्णु बल्‍्लभा, माधवी आदि तुलसी के 
विविध नाम हैं। 
गुण 

सफेद एवं काली तुलसी गरम, दाहजनक, पित्तकारक, हृदय को लाभदायक, 
कसैली, अग्निदीपक, पचने में हल्की तथा वायु, कफ, श्वास, खाँसी, हिचकी और 
कृमि को नष्ट करने वाली और वमन, दुर्गन्ध, कुष्ठ, पार्श्वशूल, विष, मूत्रकृच्छु, 
रक्त-दोष, भूत बाधा, धर्नुवात, हिस्टीरिया, शूल और ज्वर को नष्ट करने वाली है। 

इसका उपयोग खाँसी, बादी का दर्द, यकृत के रोग, कर्णशूल, सूखी खाँसी, 
मलेरिया, ज्वर, दन्त शूल आदि में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी तुलसी' का उल्लेख प्राप्त होता है। 
प्लक्ष (पाकर) 

नाम-सं.-प्लक्ष, कनीनिका, गृहद्वार प्रवेश | हि.-पाकरी, जरी, गु.-पिप्पर, 
पिपली। बं.-पिपरी, तमिल-इच्चि, कलिच्ची, सीतल, ते.-जबी । उ.-जोरी ले.- 
क्वेट5 वॉहलो॥ । 

यह पीपल की जाति का एक बड़ा वृक्ष होता है। इसके सभी हिस्से चिकने होते 
हैं। इसके पत्ते पतले होते हैं। 7.5 से लेकर 5 सेमी. तक लम्बे और 3.8 से 9 से. 
मी. तक चौड़े होते हैं। यह वृक्ष मध्यप्रांत और पश्चिमी घाट में पैदा होता है। 

इसकी छाल उदर शूल को दूर करने के काम में ली जाती है। 

वाल्मीकि रामायण में भी प्लक्ष (पाकर) का एक दो स्थलों पर उल्लेख 
उपलब्ध होता है।”/” 
पाटला ८ 
नाम-सं.--अलिप्रिया, अवल्लभा, अम्बवासी, वसन्त-दूती, कोकिला, कुबेराक्षी, 
कुम्भी, पाटला, हि.-पाटला, पाड, पाडर, पांडरी। बं.-घण्टा, मुग, पारुल, पं.- 
माडल इत्यादि पाटला के विविध नाम हैं। 
गुण 

पाटल कड़वी, चरपरी, गरम, कफ नाशक, तथा सन्निपात, श्वास, वमन, 
सूजन और अफारे को दूर करती है। इसके फूल स्वादिष्ट, कसैले; हदय को 
हितकारी, शीतवार्य तथा रक्त-दोष, दाह, कफ़, पित-रोग और पितातिसार को हरने 
वाले हैं। इसके फल शीतल, भारी, कसैले, कड़वे, मधुर तथा मूत्र-कृच्छु, रक्‍्त-पित, 
हिचकी, वात का नाश करने वाले होते हैं। 

इसका उपयोग मधुमेह एवं मूत्राधात आदि रोगों में किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है! 
पुरोडोल** सोम” (सोमरस) 

नाम-सं.-सोमवल्ली, सोमलता, द्विज-प्रिया, यज्ञ श्रेष्ठा, सोमा इत्यादि 
सोमलता के विविध नाम हैं। 


32 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गुण 
सोमबेल मादक, रसायन, शोथ, दाह, ज्वर तथा कफ को नष्ट करसे वाली है। 
महर्षि सुश्रुत के अनुसार उसके रसपान से शारीरिक स्वास्थ्य मन की स्फूर्ति, 
बुद्धि-बल, वाणी, और आनन्द में सैकड़ों गुनी वृद्धि होती है। सोमवल्ली आयुर्वेद 
के अनुसार एक दिव्य-औषधि है। महर्षि सुश्रुत लिखते हैं कि सामेवल्ली 24 प्रकार 
की होती है। सब प्रकार की सोमवल्लियों पर 5-5 पत्ते होते हैं जो कृष्ण-पक्ष 
में गिरते हैं और शुक्ल-पक्ष में प्रतिदिन नये फूटते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी कई स्थलों पर इसका उल्लेख प्राप्त होता है। 
बदरी (बेर) 

नाम-सं.-बदरी, अजाप्रिया, बालेष्टा, दीर्घ बीजा, द्विपर्णी, कंटकी, राजबद्री, 
फलाशयाशिरा, सूक्ष्मपत्रिका, श्रगाल, कोली, हि.-बैर,' बेर, बेरी इत्यादि बदरी के 
विविध नाम हैं। 
जुण 

आयुर्वेदिक मत से बेर की जड़ कड़ेवी और ठंडी होती है। यह कफ, 
पित्त-विकार और मस्तक-शूल में लाभदायक होती है। इसकी छाल बालतोड़ और 
स्फोटक व्रण को अच्छा करती है और रकक्‍्तादि-सार तथा प्रवाहिका में लाभ 
पहुँचाती है। इसके पत्ते कड़वे और शीतल होते हैं। इसके पके हुए फल (सौबीर 
बेर) ठंडे, पचने में कठिन, कामोद्दीपक, पौष्टिक, मृदुविरिचक, ओज बढ़ाने वाले 
और पित्त-नाशक होते हैं। 

इसका उपयोग जी-मिचलाना, ज्वर की तृषा, पित्तज्वर, अतिसार आदि में 
किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उपयोग मिलता है।”' 
“बला : 
नाम-सं.-बरियार, बरियारा, बरियाल, खरेठी, खरैटी, खिरैटीं बीजबंद बं.- 
बेडेला म.-चिकणा, गु.--बलदाणा, खरेंटी बल, बला क.-किसंगी, ते.--चिरिबेन्डा 
ता.-अखिल मनैपुण्डु मा.-खरेंटी आदि बला के विविध नाम हैं। 
जुन 

बला शीतवीर्य, बल्य, रसायन, वृष्य, प्रजास्थापन, संग्राही वात-पित्त हर एवं 
स्निग्ध है। 

इसका उपयोग रक्‍्त-पित्त, प्रमेह, प्रदर, वात-विकार एवं व्रण में किया जाता है। 
शुक्र-मेह में इसके पञ्चांग का स्वरस देने से लाभ होता है। श्वेत-प्रदर, बार-वार 
पेशाब होना तथा सोजाक में इसके जड़ की छाल का चूर्ण शर्करा तथा दुग्ध के साथ 
प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यंद में इसके बीज पीसकर बाँधते हैं। उपदंश, फिरंग तथा 
क्षत में इसकी जड़ को पीसकर बाँधने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी बला का दिव्य-औषधि के रूप में उल्लेख है।”” 
बिमीतक (बहेग़) 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 33 


नाम-सं.-विभीतक, अक्ष, अनिलघ्नक, बहेड़क, बहुवीर्य, भूतावास, हाय॑, 
विपघ्न, कलिद्रु, कलिद्रुम, कल्पवृक्ष, तेलफल, कासघ्न, हि.-बहेड़ा, वहेड़ा, बुहुरा 
इत्यादि विविध नाम हैं। 
गुण 

बहेड़ा चरपरा, कड़वा, कसैला, हल्का, दस्तावर, पाक के समय मधुर, रूखा, 
नेत्रों को हितकारी, केश-वर्धक, भेदक तथा पलित-रोग, स्वरभक्न, नासारोग, रुधिर 
दोष, कण्ठरोग, नेत्र-रोग, खाँसी, हृदय-रोग और कृमियों को नष्ट करता है। 

बहेड़े के फल की मींग आँख के फूल को दूर करती है। इसकी छाल 
रक्ताल्पता, पांडुरोग एवं श्वेत कृष्ठ में लाभदायक है। इसके वीज कड़वे, नशीले, 
प्यास, वमन आदि को दूर करने वाले हैं। इसका उपयोग नपुंसकता, पित्त की 
सूजन, पित्त और कफ का बुखार, मंदाग्नि, खाँसी, अतिसार, आदि में लाभकारी 
है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।?* 
बीज-पूरक (बिजौरा नीबू) 

नाम-सं.-अम्ल-केशर, बीजपूर, बीजक, बीजफलक, बीजपूर्ण, जन्तुष्न, 
महाजरण, मातुलुह्ु, फलपूर, रोचन-फल, सुकेशर, हि. बिजोरा नींबू, बड़ा-नीबू 
आदि बीजपूरक के नाम हैं। 
गुण 

इसकी जड़ कृमिनाशक होती है। कब्जियत और अर्वुद या गाँठ के रोग में 
इसका उपयोग किया जाता है यह पेट के दर्द को दूर करती है, वमन, मूत्र 
सम्बन्धी, पथरी-रोग और दन्त-रोग में उपयोगी है। इसकी कलियाँ और फूल 
उत्तेजक और आँतों के लिये संकोचक होते हैं, भुख वढ़ाते हैं, वमन की शिकायत 
दूर करते हैं, आर्बृद या गाँठ में लाभदायक हैं। पेट की परशानियों को दूर करता है। 

दमा, खाँसी, कुकुर-खाँसी और नश को दूर करन में लाभदायक है। इसके 
कच्चे फल वात, पित्त और कफ को वढ़ात हं तथा रक्‍न को भी दूपित करते हैं। 
इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी प्राप्त होता है” 
भूर्जपत्र 

नाम-सं.-भूर्जपत्र, भूर्ज, बहुलवल्कल, बिंदुपत्र, भूतघ्न, हि.--भोजपत्र। गु.- 
भोजपत्र बं.-भूच्चिपत्र | पंजाब-भुज, बुर॒झल इत्यादि भोजपत्र के विविध नाम हैं। 
गुण 

इसकी छाल कसैली, चरपरी, गरम, पौष्टिक, भूत-बाधा को दूर करने वाली 
और आक्षेप, खाँसी, रक्त-रोग, कर्ण-रोग, कुष्ठ और त्रिदोष को दूर करने वाली 
होती है। 

यह एक छोटी जाति का झोाड़ी नुमा वृक्ष होता है। वृक्ष की छाल को ही 
भोज-पत्र कहते हैं। यह कागज के समान अथवा कंले के सूखे पत्ते के समान होता 
है। पहले जब कागज नहीं बनता था तब भोज-पत्र का ही कागज के स्थान पर 














34 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


व्यवहार किया जाता था। 

इसकी छाल का शीत, निर्यास, हिस्टीरिया में उपयोगी और शांति-दायक 
माना जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।”” 
मंजिष्ठा (मंजीठ) 

नाम-सं.-मंजिष्ठा, विकसा, जिंगी, समंगा, कालमोषिका, भंडीरी, मंजूषा, 
ज्वरहन्ती, हेमपुष्पी, हि.-मंजीठ, बं.-मंजीठ, म.-मंजिष्ठा, गु.-मंजीठ तमिल 
मंजीठी आदि इसके विविध नाम हैं। 
ञ्ुण 

मंजिष्ठा मधुर, कड़वी, कसैली, गरम, रक्तातिसार-नाशक, स्वर को शुद्ध 
करने वाली, कांति-वर्धक, भारी तथा विष, कफ, सूजन, योनि-रोग, नेत्र-रोग, 
कर्ण-रोग, कृष्ठ, रुधिर विकार, विसर्प, व्रण और प्रमेह को नष्ट करने वाली होती है। 

मंजीठ के पत्ते मधुर, हल्के, स्निग्ध, जठराग्नि को दीप्त करने वाले तथा वात 
और पित्त को हरने वाले होते हैं। 

मंजीठ का फल तिल्ली के रोगों को दूर करने वाला है। मंजीठ में स्तम्भक, 
पौष्टिक, आर्तव-प्रवर्तक, वेदना-नाशक, शोथघ्न, चर्म-रोग-नाशक धर्म रहते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी मंजिष्ठा का उल्लेख प्राप्त होता है।”* 
मघूक”” (महुआ) महाद्वुम”* 

नाम--सं.-मधुक, मधुवृक्ष, डोलाफल, महाद्र॒म, गुड़-पुष्प | हि.-महुआ, महूला । 
बं.-महूला, मध्वा गु.-महूड़ा, म.-मोहड़ा, मोहो, मोहावा इत्यादि विविध नाम हैं। 
गुण 

महुए का वृक्ष मधुर, कट, शीतल, कफ-कारक, कामोद्दीपक, कृमि-नाशक 
और पित्त-दाह, व्रण, श्रम, और वात को नष्ट करने वाला होता है। इसकी छाल, 
व्रण और घाव को भरने वाली, रक्त-पित्त नाशक और टूटी हुई अस्थियों को 
जोड़नेवाली होती है। 

इसका उपयोग फोड़े-फुंसी, वादी की पीड़ा, गठिया, पामा, नपुंसकता, अण्डन वृद्धि, 
सरदी के रोग, वायु-शूल, मिरगी आदि में किया जाता है। वा. रा. में भी इसका 
उल्लेख प्राप्त होता है।”* 
मधूनि 

नाम-सं.-मधु, मकरन्द रस, माक्षिक, पुष्पासव, क्षौद्र, पुष्परसोद्भव, 
भूड़ग वात, हि.-मधु, शहद | बं.-मधु, मौ, म.-मध | गु.-मध पं.--शहद, मधु 
आदि शहद के विविध नाम है।। 
गुण 

मधु शीतज्, स्वादिष्ट, रूखा, स्वर॒ को शुद्ध करने वाला, ग्राही नेत्रों को 
हितकारी, अग्नि-दीपक, व्रण-शोधक, नाड़ी को शुद्ध करने वाला, सूक्ष्म, कांति-वर्धक, 
मेधा जनक, कामोद्दीपक, रुचि-कारक, आनन्द-जनक, कसैला, कुष्ठ, वात-कारक, 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 35 


बवासीर, खाँसी, रुधिर-विकार, कफ, प्रमेह, कूमि, मद, ग्लानि को नष्ट करने वाला है। 

इसका प्रयोग नेत्र-पीड़ा, हिचकी, बिच्छू का विष, गर्भशय का मल इत्यादि में 
लाभकारी होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। 
मरिच (मिर्च) 

नाम-सं.-मिरचीं फला, तीव्र शक्ति, ब्रह्म ऋचा, अजड़ा, कुमऋचा, हि.-- 
लाल मिर्च, लंका मिर्ची, बं.-लंका मुरिच, लाल मरिच। बं.--लाल-मिरची | गु.- 
मिरची आदि इसके विविध नाम हैं। 
गुण 

लाल-मिर्च अग्नि-दीपक, दाहजनक, तथा अजीर्ण, विसूचिका, दारुण-च्रण, 
तन्द्रा, मोह, प्रलाप, स्वर-भंग, और अरुचि को दूर करती है। 

मिर्च दीपन, पाचन और आनुलोमिक होती है। बिच्छू के डंक पर इसको पानी 
में पीसकर लगाने से लाभ होता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ आत्रेय संहिता में 
मिर्च को अग्नि-दीपक, कफ-नाशक, दाह-जनक, और अजीर्ण, विसूचिका, दारुणव्रण, 
तन्द्रा, मोह, प्रलाप, स्वरभंग, अरुचि तथा कफ नाशक बताया है। इसका उपयोग 
सन्निपात में विशेष गुणकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी मरिच का उल्लेख प्राप्त होता है।”" 
माधवी*' (अतिमुक्ता, वासन्ती) 

नाम-सं.--अतिमुकता, माधवी, सुवसन्ता, पराश्रया, कामुक, मण्डक, चन्द्रवल्ली, 
भूंगप्रिया, भद्रलता, वसन्तदूति, हि. माधवी लता, मदमाती, मधुलोटा इत्यादि 
विविध नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से माधवी लता चरपरी, कड़वी, कसैली, मादक, गन्ध बाला, 
तथा पित्त, खाँसी, व्रण, दाह और शोष को दूर करने वाली होती है। 

भाव-प्रकाश के अनुसार यह शीतल, हल्की और त्रिदोष-नाशक होती है। 
इसके पत्ते चर्म-रोग नाशक, और छाल कड़वी और सुगन्धित होती है। इसके पत्तों 
का रस एक उत्तम, कृमि-नाशक पदार्थ हैं इसका उपयोग चर्म-रोग, पेट के कृमि, 
गठिया एवं दमा इत्यादि रोगों पर करना विशेष लाभदायक सिद्ध होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।/* 
मुग्ध (मूंग) 

नाम-सं.-मृदूग, सूपश्रेष्ठ, मुक्तिप्रद, हयानंद, सुफल, हि.-मूंग, बं.-मुग, 
बुलट, म.-मूंग, गु.-मग, पंजाब-मूंग, तै.-पाचटा, ता.-पाटचाई। अं.-0्शा 
6 इत्यादि। 
जुण 

भाव-प्रकाश के अनुसार मूंग रूखा, हल्का, मलरोधक, कफ-पित नाशक, 
शीतल, स्वादिष्ट, किंचित्‌ वात कारक, नेत्रों को हितकारी और ज्वर को दूर करने 


36 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वाला होता है। सब प्रकार के मूंगों में हरा मूंग उत्तम होता है। 

मूंग पित्त-कफ-नाशक, व्रण-विनाशक, कंठरोग-निवारक, हल्का तथा वात-रकत, 
कृमि-रोग, नेत्र-रोग में हितकारी होता है। यह मन्दाग्नि को दूर करता है, स्वर को 
सुधारता है और मूत्र-रोगों में लाभ पहुँचाता है। यह एक उत्तम पथ्य है। 

इसका उपयोग नासूर, पित्त-ज्वर, अतिसार, विसर्परोग में होता है। वाल्मीकि 
रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।”” 
मुचुकन्द 

नाम-सं.-मुचकन्‍्द, क्षत्रवृक्ष, चित्रक, प्रतिविष्णुक, दीर्घपुष्प, हरिवल्लभ, हि.- 
मुचकन्द, गु.-मुचकन्द, बं.-मुचकन्द ता. सेम्बोलऊ। तें--लीलेबू ले.- 
शिश०्कऋ्लाएणा $5फ्रैशांणिंणा आदि। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से मुचुकन्द चरपरा, गरम, कड़वा स्वर को सुन्दर करने वाला 
तथा खाँसी, कफ, त्वचा के विकार, सूजन, सिर की पीड़ा, त्रिदोष, रक्त-पित्त, 
रुधिर-विकार, और पित के कोप को दूर करने वाला होता है। 

इसके फूलों में एक प्रकार का उड़नशील तैल रहता है। इस तैल का प्रधान 
धर्म-वेदना नाशक होता है। 

इसके फूलों को चावल के मांड के साथ पीसकर मस्तिष्क पर लेप करने से 
आधा शीशी का दर्द बन्द हो जाता है। यह बवासीर में उपयोगी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी मुचुकन्द का उल्लेख प्राप्त होता है“ 
रजका (रंजक) कपीला 

नाम-सं.-कपिल्लकः, रकतांगा, रंजनः, बहुपुष्पः, लघुपुत्रक इत्यादि। हि.- 
कम्बिला, कपीला, गु.--कपीली, म.-कपिला, बं.-कमलागुन्डी । पं.-कमीला आदि 
विविध नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से कपिला दस्तावर, चरपरा, गरम, व्रण-नाशक, कफ, खाँसी 
और कृमियों को दूर करने वाला, तथा गुल्म, उदर रोग, अफरा और पथरी को नष्ट 
करने वाला होता है। इसके पत्ते शीतल और कड़वें होते हैं। यह भूख बढ़ाने वाला 
है। इसके फल में तैयार किया हुआ चूर्ण कुमि-नांशक है, घावपूरक है और 
विरेचक है। 

कपिला एक सुन्दर हल्के लाल रंग का गन्ध एवं स्वादहीन पदार्थ है। यह ठंडे 
पानी में नहीं घुलता है। इसका उपयोग, घाव, दाद, खाज, इन्द्रलुप्त, कृमि एवं 
पसली के दर्द में गुणकारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।“ 
लकुच'”* (बड़हर) 

नाम-सं.-अम्लक, एरावत, लकुच, निकाच क्षुद्रफणस | हि.-बड़हर, बड़हल, 
लकूुच, घाव। ब.-दाहू, देफल, लकुच, मदार, गु.-लकुच | म.-बधार, क्षुद्रफणस, 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 37 


घोंटवा । आदि विविध नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से इसका कच्चा फल गरम, भारी, कव्जियत करने वाला, 
मीठा, खटूटा, त्रिदोष को पैदा करने वाला, रुधिर को दूषित करने वाला, नेत्रों को 
हानिकारक, और वीर्य को नष्ट करने वाला होता है। 

इसका पका फल मधुर, खटूटा, वात-पित्त-नाशक, कफ-कारक, रुचि-वर्धक, 
कामोद्धीपक, एवं कब्जियत करने वाला होता है। 

फोड़े-फुन्सी एवं पैर की बिवाई में इसके छिलके का सत्व लगाया जाता है। 
घावों के ऊपर इसके छिलके को पीसकर लगाने से यह उसके मवाद को खींच 
लेता है। 

वा. रामायण में भी लकुच का उल्लेख प्राप्त होता है ।“ 
लवण*” (नमक) 

नाम-लवण, सैधवं हि.-नमक, म.-मीठ, गु.-मीठ्‌ फारसी-नमक, अंग्रेजी- 
(ऋंगरांव० ० 5090 ले. 500/ ०/०११एा॥ । नमक मानवी भोजन में पड़ने वाली 
एक अनिवार्य वस्तु है। इसकी कई जातियाँ होती हैं। जैसे सेन्धा नमक, साम्भर 
नमक, काला नमक, संचर नमक, बीड़ नमक इत्यादि पर इन सबमें सेंधा नमक 
विशेष उत्तम होता है। 
जुण 

आयुर्वेद के अनुसार सेंधा नमक रुचिकारक, वीर्य-वर्धक, नेत्र को हितकारी, 
अग्नि-दीपक, शुद्ध, स्वादिष्ट, हल्का, स्निग्ध, पाचक, शीतल, सूक्ष्म, हदय को 
हितकारी, त्रिदोष-नाशक तथा व्रण-दोष, कब्जियत एवं हृदय-रोग को नष्ट करने 
वाला है। 

सेंधा नमक आँख के लिये बहुत लाभदायक है। वाल्मीकि रामायण में भी 
लवण के कई रूपों का उल्लेख मिलता है। 
लाजा 

जिन धान्यों के चावल होते हैं, वे धान्य भूसी के साथ ही अर्थात्‌ बिना कूटे 
ही यदि भून दिया जाये तो खिल जाते हैं। उन्हीं को संस्कृत में लाजाः कहते हैं 
और हिन्दी में खील कहते हैं। 
गुण 

खील मधुर रसयुक्त, शीतल, लघु, अग्निदीपक, स्वल्प-मूत्र तथा मल को लाने 
वाले, रुक्ष, बलकारक, एवं पित्त/कफ, वमन, अतिसार, दाह, रक्‍त-विकार, प्रमेह, 
मेद तथा तृषा को दूर करने वाले होते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी लाजा का उल्लेख अनेक स्थलों पर होता है 
लाख” लाक्षा”" अंलक्ता! 

नाम-सं.-लाक्षा, अलंक्तः, रक्ता, पित्तारि, कृमिजा, रंगमाता, हि.-लाख, 
लाही, गाला, मराठी लाख, गु.-लाख। ५४- $॥6॥9० ले. (००७५ .3००४ आदि 


38 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


नाम हैं। 
५ 

आयुर्वेदिक मत से लाख शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली शीतल, 
बलकारक, स्निग्ध, कसैली, हल्की तथा कफ, रक्त-पित्त, हिचकी, खाँसी, ज्वर, 
त्रण, उरःक्षत, विसर्प, कृष्ठ, कृमि, विष, रक्त-दोष और विषम ज्वर को हरने वाली 
होती है। 

लाख कड़वा होता है। इसका उपयोग विविध रोगों मे किया जाता है यथा- 
मासिक-धर्म की अधिकता, रक्त-पित्त, रक्त-प्रसार, वमन, हिचकी, रुधिर की 
वमन आदि में। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका महावर के रूप में एवं अन्य रूपों में भी 
उल्लेख प्राप्त होता है। 
गुण 

नाम-सं.-लोध्र, तिराटक, शाबर, गाल्व, हस्ती, हेमपुष्पक, हि.-लोध्र, गु.-- 
लोद़ म.-लोध, बं.-हुरा, लोध, म.-प्रा.-लोध, निनसाह, तेलगू-लोडुगा उर्दू- 
लोध पठानी आदि विविध नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से इसकी छाल कसैली, शीतल, पचने में हल्की, आँतों का 
संकोचन करने वाली, नेत्र-रोग एवं मसूड़े के रोगों में लाभदायक होती है। कफ, 
पित्त, रक्‍्त-रोग, अतिसार, सूजन, काष्ठ, प्रदर, गर्भपात, और गर्भ-स्राव में भी यह 
बहुत लाभदायक होती है। यह योनिपथ के व्रणों को मिटाती है। इसके फूल 
चरपरे, कसैले, मीठे, कड़वे, शीतल और आँतों का संकोचन करने वाले होते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी कई स्थलों पर उल्लेख मिलता है।”* 
वरुणः (बरना) 

नाम-सं.-वरुण, वरण, सेतु, तिक्तशाक, कुमारक, हि.-वरुन, बरना, बं.-- 
बरन गाछ। म.-बायवरणा, वायवर्णा, पं.-बरना ले. (४808८४८ ८।४058 आदि 
नाम है। 
ख्ञ 

बरना कषाय, मधुर, तिक्त तथा कदु रस युक्त, रुक्ष, लघु, पित्ततजनक, मल 
का भेदन करने वाला, उष्ण, अग्नि-दीपक, एवं कफ, मूत्र-कृच्छु, पथरी, वायु, 
गुल्म, वात रक्त, कृमि को दूर करने वाला होता है। 

यह मालवार और कननर में नदियों के आस-पास पाया जाता है। इसका 
वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और शाखाएँ-फैली हुई रहती हैं। छाल आधा इंच 
मोटी खाकी रंग की होती है। शाखाओं के अंत में 2-4 इंच लम्बी डंडियों पर पत्तों 
के गुच्छे रहते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी वरुण का उल्लेख प्राप्त होता है।”* 
वानीर*” (वेत्न), वेतस”* 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 39 


नाम-सं.-अभ्रपुष्पा, दीर्घपत्रका, दीर्घ-बल्लि, गन्ध पुष्पा हि.-दीर्घपत्रा। 
तमिल-आरिनी पीर अम्बु। ते.-बेथमा। ले.--8|आ०७५ २०७४४ आदि विविध 
नाम हैं। 
गुण ण 

आयुर्वेदिक मत से यह वनस्पति तीक्ष्ण, कड़वी, सुगन्धित, कसैली, शीतल 
और विषनाशक होती है। कफ और वात में यह लाभंदायक है। पित्त की जलन, 
बवासीर, पथरी, श्लीपद, पेचिश, प्यास, व्रण, कोढ़, रक्त-रोग और मूत्र सम्बन्धी 
विकारों में लाभदायक है। गर्भिशय और योनिद्धार के विकारों में भी यह लाभदायक 
समझी जाती है । इसकी जड़ जीर्ण ज्वर में दी जाती है। इसके पत्ते खून और पित्त 
की बीमारियों में उपयोगी और मृदु-विरेचक होते हैं। इसके बीज कफ रोग एवं 
रक्त रोग में लाभदायक होते हैं। वाल्मीकि रामायण में भी इनका उल्लेख मिलता 
है। 
वाराही कंद 

नाम-सं.-वाराही कन्द, शूकर कन्द, ब्राह्मी कन्द, कुष्ठ नाशक, महावीर्य 
इत्यादि । हि.-बाराही कन्द, सूअरकन्द, मिखोलीकन्द, गेठी, ले. [80०८४ 84 । 
इत्यादि विविध नाम हैं। 

यह एक बड़ी जाति की बेल होती है। जो पहाड़ों पर पैदा होती है। इसके पत्ते 
नागर बेल के पत्तों के समान होते हैं। इसकी जड़ में एक कन्द रहता है जिस पर 
सूअर के बाल के समान बाल रहते हैं। 
खुलः 

वाराही कन्द चरपरा, कड़वा, बलकारक, पित्त-जनक, रसायन, कामोद्दीपक, 
वीर्य-वर्धक, भूख बढ़ाने वाला, मधुर, गरम, कांति-वर्धक, स्वर को शुद्ध करने 
वाला, आयुवर्धक तथा कोढ़, प्रमेहल, त्रिदोष, कफवात, कृमि और मूत्र-क्च्छ रोग 
को नष्ट करता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राष्त होता है?” 
शर्करा (शक्कर) 

नाम सं. शर्करा, हि. चीनी, बुरा, भुरा, शक्कर, सफेद खांड, चिन्‍्नी, बूरा। बं. 
चिनी, म: पिठी साखर, गु. साकरिया, खाँ। अं. 508५ ले: $8९९७७एा। | 

जो खाँड बालू के समान तथा अत्यन्त श्वेत हो उसे “शर्करा” अथवा 'सिता! 
कहते हैं। 
गुण 

चीनी अति मधुर, रुचिकारक, वात-पित्त, रक्‍्त-विकार, तथा दाह को दूर 
करने वाली, अति शीतल, शुक्र को उत्पन्न करने वाली एवं मूर्चछा, वमन तथा ज्वर 
को नष्ट करने वाली होती है। 

वाल्मीकि रामायण में भी शर्करा अर्थात्‌ शक्कर का उल्लेख प्राप्त होता है [7 
शादला (शैवाल) 


320 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कांई ह४ 
नाम-हि.-नाम शैवाल, जल्लील, गु.-जलेसर, पोलाइन, ते.-पंचदूब, ड.- 
छ८।2795५ (एलग्रास) ले. ५४॥॥ञ्ञा००७-$|॥७॥$ (हेलिसनेरिया स्पिरेलिस)। 
गुण 

यह वनस्पति शीतल, कड़वी, मधुर, सारक, रुक्ष, सलोनी, पचने में हल्की, 
और स्निग्ध होती है। यह तृषा, रक्त-पित्त, ज्वर, शोष, दाह, और व्रण को मिटाती 
है। यह वनस्पति अग्नि-वर्धक होती है और श्वेत-प्रदर में इसका उपयोग किया 
जाता है। 

शैवाल के वर्ग की वनस्पतियाँ विषैली नहीं होतीं । 
उपयोग 

वीर्य का पतलापन, सुजाक, श्वेत-प्रदर आदि रोगों में इसका उपयोग विशेष 
लाभ-कारी है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कई स्थलों पर इसका उल्लेख उपलब्ध होता है?” 
श्लेष्मान्तक (लिसोढ़ा) 

नाम-सं.-श्लेष्मान्तक, शेलू, उद्दाल, भूकर्बुदार, हि.-लिसोड़ा, बड़गूंदा, बं.-- 
चालता गाछ, बहुबड़ा, गु.-बडगूँदो, मराठी-बड़गूंद भोकर। उर्दू-लिसोड़ा अं.- 
$क्कल्त्रला शा आदि। 
गुण 

लिसोड़े का फल कंछ मीठा, कुछ शीतल, कृमि नाशक, कफ निस्सारक 
संकोचक और फेफड़े की सब प्रकार की बीमारियों में बहुत उपयोगी होता है। 

इसकी छाल का रस नारियल. के तेल के साथ मिलाकर शूल को दूर करने के 
लिये दिया जाता है। इसकी छांल और इसके कच्चे फल हल्के पौष्टिक पदार्थ की 
तरह उपयोग में लिये जाते हैं। इसको पीसकर लेप करने से दाद मिट जाता है। 
ब्रण और मस्तक शूल पर इसके पत्तों का लेप करने से लाभ होता है। 

यह अतिसार, मूत्रकृच्छ, घाव, बंदगाँठ आदि में प्रयोग करने पर बहुत 
लाभकारी है। वा. रा. में भी इसके वन का उल्लेख है।!* 
सरल (चीड़) 

नाम-सं.-भद्रदारु, धूपवृक्षका, मनोजना, मरीचपत्रिका, पीतदारु, पीतद्रु, 
पीतद्ु, पूतिकष्ट, सरला, सुरभिदारुका। हि.-चीड़, साला, सारल, सरल, गु.-सरल 
देवदार ले.-0॥05 [,080॥8 आदि नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से यह मीठा, तीक्ष्ण, कड़वा, गरम, स्निग्ध एवं आँतों के 
कीड़ों को नष्ट करने वाला है। आँख, कान, गला, रक्त एवं चर्म की बीमारियों में 
भी यह लाभदायक है इसका गोंद कड़वा, कसैला, गरम एवं स्निग्ध होता है। यह 
पेट के अफारे को दूर करता है। कामोदूदीपक होता है। मूत्रल, कृमिनाशक, और 
वेदना शून्यता लाने के गुण भी इसमें विद्यमान हैं। योनि एवं गर्भशय की 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 32। 


तकलीफों में भी लाभदायक है। मन्दाग्नि, व्रण,. खुजली, प्रदाह, और सिरदर्द को 
यह दूर करता है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।”* 
सल्लकी 

नास-सं.--शल्लकी, गजभक्ष्या, सुवहा, सुरभि, रसा, महेरुणा, कुन्दरुकी, 
वल्लकी, वहुम्नवा, हि.-सालई, सलई, शालई, सलग, सलैया शलग, ले.-8059७2० 
$शा४8 ब.-शलई, शाल-विशेष, सल्‍लकी। मे.-शालई वृक्ष, धूप शलाई, गु.- 
शालेडं, धूपेडो, सालेडा । क.--तदीकु, आने-व्याल | ता.-कुलि, मा. -सेलो। ते.- 
अन्दगु आदि विविध नाम हैं। 

यह पश्चिमी हिमालय के नीचे के जंगलों में मध्य भारत विहार से राजपूताना 
तक, दक्षिण एवं कोंकण आदि प्रान्तों में होता है। यह 30 फीट तक ऊँचा होता 
है। कोमल पत्ते एवं शाखाएँ रोवेदार होती हैं। पत्ते आमने-सामने व कुछ अन्तर 
देकर 8 से. 5 जोड़े और 8-5 इंच लम्बे नीम के पत्तों के समान तिखूटे होते हैं। 
पीले फल अथवा फल में तीन रेखाएँ होती हैं। इसके गोंद को कुन्दरु कहते हैं। 
गुण 

यह कषाय-रस-युक्त, शीतल, पुष्टि-कारक एवं पित, कफ, अतिसार, रक्‍्त-पित्त 
तथा ब्रण को दूर करने वाली होती है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख 
उपलब्ध होता है ।* 
सिन्दुवार 

नाम-सं. सिन्दुवार, सिन्दुर, सिन्दुवारक निर्गुण्डी, शेफाली, सुवहा। हि. निर्गुण्डी, 
निगोरी, सम्हालू, सिंदूआरी। बं. निर्गुण्डी, निषिन्दा, समालू, ले. शारू ४८९४ए॥७० 
आदि नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदानुसार निर्गुण्डी कड़वी, तीखी, तूरी, हल्की, गर्म, दीपन, वात-नाशक, 
वेदना-शामक, कुष्ठघ्न, व्रण-शोधक, व्रण-रोपक, शोथघ्न, कफ-निस्सारक, ज्वर-नाशक. 
पार्यायिक-ज्वरों को रोकने वाली, खाँसी को दूर करने वाली, मूत्रल, आर्तव-प्रवर्तक, 
कृमि-नाशक, मज्जा-तन्तुओं को शक्ति देने वाली बल-वर्धक एवं परमू-रसायन है। 

सिन्दुवार का सूजन को नष्ट करने वाला, वेदना-नाशक, एवं वात-नाशक गुण 
बहुत प्रभाव शाली है। 

“चरक' और '"सुश्रुत” के मतानुसार इसका पौधा सर्प-विष एवं बिच्छू-विष पर 
उपयोगी होता है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख है।!० 
क्षोभ (अलसी) 

नाम-स.--अतसी, पिच्छिला, उमा, क्षुमा, हि.-अलसी, तीसी, मसीना, बं.-- 
तीसी। म.-जवस, अलशी गु.--अलशी, कर्नाटकी-असगे, ले.--ग $शापरा॥3 
[/शक्षा अं.--. 5००१ आदि अलसी के विविध नाम हैं। 
गुण 

आयुर्वेदिक मत से अलसी मन्दगन्धयुक्त मधुर, बलकारक, किंचित्‌ू कफ-बात 


322 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कारक, पित्त-नाशक, स्निग्ध, पचने में भारी, गरम, पौष्टिक, कामोद्दीपक, पीठ के 
दर्द और सूजन को मिटाने वाली है। इसके अतिरिक्त यह मूत्र की बीमारी और 
कुष्ठ को नष्ट करती है। नेत्र की ज्योति को हानि पहुँचाती है। 

इसका उपयोग फोड़े, सुजाक, पीठ का दर्द, खाँसी, कान की सूजन, गुदा का 
घाव आदि रोगों पर किया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है।”* 


तृतीय परिच्छेद आय 
धातुज औषधियाँ 


प्राचीन काल में आयुर्वेदज्ञों को धातु, उपधातु और अन्य खनिजों, रत्नों, 
उपरत्नों और मूल्यवान पाषाणों का ज्ञान नहीं था, इसकी शंका की जा सकती है 
किन्तु रामायण एक आदि काव्य होने के बाद भी इन सबका वर्णन करता है, यह 
अवश्य ही आश्चर्यजनक बात हे। आयुर्वेद के इन मुख्य खनिज द्र॒व्यों तथा 
मूल्यवान पाषाणों की चर्चा एक वार नहीं वार-बार इस ग्रन्थ में पढ़ने को मिलती है। 

स्वर्ण आदि मृल्यवान धातुओं के विविध प्रकारों का उल्लेख रामायण में 
उपलब्ध होता है यथा-साधारण-स्वर्ण, तप्त-स्वर्ण, कांतिमान-स्वर्ण, जम्बूनद-स्वर्ण, 
कांचन-विन्दु, (स्वणंप्रवाही) आदि इस प्रसंग में विशेष उल्लेखनीय हैं। स्वर्ण के 
बने हुए पात्र, आभूषण, द्वार, सीट़ियाँ *थ. स्वर्ण-पात्र, आदि का उल्लेख भी 
रामायण में स्थान-स्थान पर प्राप्त होता है। इसक अतिरिक्त चाँदी, (रजत), ताम्र, 
लौह, चलेन्द (पारद), लोहकिट्ट (मण्डूर), सिन्दूर, गैरिक, मनः शिला, पीतल, 
नीलांजन, सीसक, आदि का भी स्पष्ट उल्लेख रामायण में प्राप्त होता है। 

वाल्मीकि मुनि को इस बात का भी पूर्ण ज्ञान था कि धातुओं की उत्पत्ति 
पर्वतों से ही हुआ करती है।' एक स्थान पर कवि ने हिमालय पर्वत को ही सभी 
खनिजों का प्राप्ति-स्थल बताया है” इसके अतिरिक्त रामायण में “धातु सहस्रजुष्टम्‌ 
कहकर हजारों प्रकार की धातुओं का संकेत किया गया है। जिनके नाम अज्ञात 
हैं।' स्वर्ण की उत्कृष्टता उसके तपने में है। इस बात को स्पष्ट करते हुए कवि 
ने “सुनिष्ट तप्नेन सुवर्णेन! कहा है। 

रामायण में धातुओं की तेज वृद्धि के एक निदान पर एक आख्यान है- 
भगवान शिव तथा पार्वती की रति-क्रोड़ा के फलस्वरूप इनका तेजस्वी स्खलन 
प्रथ्वी न सहन कर सकी तो देवों न भगवान महेश्वर से प्रार्थना की कि वे इस तेज 
को गंगा में स्थापित कर दें- (शैल पुन्या महा तेजों गंगायां तेज उत्सृज) गंगा देवी 
ने दिव्य रूप धारण कर उस तेज को ग्रहण किया, परन्तु गंगा ने थोड़ी ही देर वाद 
कहा कि वह इस तेज को ग्रहण करने में असमथ्थं है-उसका सम्पूर्ण शरीर जल 
रहा है।' ५ 








वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचिय एवं.... « 323 


इस पर देवताओं ने गंगा को यह परामर्श दिया कि वह इस तेज को हिमालय 
के पार्श्व भाग में स्थापित कर दें। देवों की बात सुनकर गंगा ने अपने प्रकाशमान 
अमित गर्भ को निकाल यथोचित स्थान में रख दिया। 

गंगा के गर्भ से जो तेज निकला वह तपाये हुए जम्बूनद नामक स्वर्ण के 
समान कांतिमान दिखाई देने लगा। 

पृथ्वी पर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँ की भूमि तथा प्रत्येक 
वस्तु स्वर्णमयी हो गयी । उसके आस-पास का स्थान जन संपन्न प्रभा से प्रकाशित 
होने वाला रजत हो गया । उस तेज की तीक्ष्णता से ही दूर-वर्ती भू-भाग की वस्तुएँ 
तांबे और लोहे के रूप में परिणत हो गयीं। उस तेजस्वी गर्भ का जो मल था, यहाँ 
रागा और सीसा। इस प्रकार पृथ्वी पर पड़कर यह तेज नाना प्रकार की धातुओं 
के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ,' इसी कारण अग्नि के समान प्रकाशित होने वाला 
सुवर्ण का नाम भी 'जातरूप” नाम से प्रसिद्ध हुआ / क्योंकि उसी समय स्वर्ण का 
तेजस्वी रूप प्रकट हुआ उस गर्भ के सम्पर्क से सब कुछ स्वर्णमय हो गया। 


विविध रत्नों-उपरत्नों का विशद्‌ वर्णन इस प्रकार है 

जम्बूनद -विशेष उच्च कोटिका स्वर्ण -सु. 3/8 
तप्त हाटक -तपा हुआ सोना न्सु. 3/9 
रजत नचाँदी न्सु, 8/9 
हेमजम्बूनद स्वर्ण न्सु. 4/30 
रुप्य न्चाँदी नसु. 906 
कांचन न्सोना सु. 7/2 
ताम्र न्ताँबा सु. 37/38 
कांचन बिन्दु स्वर्ण बिन्दु न्सु. 44/9 
हेम जाल सोने की जाली न्सु. 45/9 
कालायस. लौह न्यु. 305 
गैरिक न्गेरु चु. 4/76 
तप्त कांचन -तपा सोना च्यु. 70755 
हेम कोणे . सोने के डंडे >उ, 42/34 
नीलांजन नीला सुरमा न्उ, 6 
असी ज्लौह नउ, श5 
हिरण्य -चाँदी, स्वर्ण न्‍बा. 3728 
कृष्णायस. ज्लौह न्‍बा. 37/9 
जअपु जराँगा >बा. 37/9 
सीसक नशीशा न्‍बा. 37/9 
स्वर्ण-प्रतिर्ष -पीतल >्अर, 29/20 
मनः शिला -मेणाशिल -कि. 26/28 


उपरोक्त धातु नामों के अतिरिक्त खनिज मृतिका में गैरिक पाण्डु मृतिका 
324 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


(अयो. 9/42) आदि मिट्रिटयों का विवरण भी स्थान-स्थान पर प्राप्त होता है। 
परन्तु विभिन्‍न धातुओं के साथ उनकी कृत्रिमता का उल्लेख नहीं है। हाँ, आभूषण 
रथ, भवन आदि में जहाँ इन धातुओं का उल्लेख है; उनकी कृत्रिमता स्पष्ट है। 

रत्नों का उल्लेख करते हुए वाल्मीकि ने हीरक-मुक्ता, वज्रमणि, इन्द्रमणि 
सामान्य मणि, पद्मराग मणि, पुष्प-राग मणि वैदूर्य-मणि, प्रवाल-मणि, इन्द्रनील 
मणि, माणिक्य-मणि, महानीलमणि, स्फटिक मणिभुजंग-मणि, नील-मणि, आदि 
मणियों का उल्लेख बार-बार किया है। 

इसके अतिरिक्त रामायण में शंख, शुक्ति, मुक्ता, शुक्ति सामान्य स्फटिक 
पाषाणों आदि के नाम भी उपलब्ध होते हैं जो स्थान-स्थान पर प्रसंगवश देखे जा 
सकते हैं :- 


चैडूर्य -नीलम न्सु. 3/8 
वज्र न्हीरा न्सु. 3/9 
स्फटिक >स्फटिक मणि. न्सु. 300 
मुक्ता न्मोती न्सु. 3000 
शंख "शंख न्सु. 7/2 
प्रवाल मूंगा न्यु, 708 


इन्द्रनील.._ -मणि (विशेष). न्सु. 907 
विद्वम नप्रवाल (मूंगा). सु. 38000 


कांचन मणि -दिव्य मणि सु. 65/8 . 
शुक्ति पु न्यु. श/29 
कौस्तुभ नमणि च्ु. शशश्श 
स्निधा न्मणि न्यु. 75/8 
इन्द्रनील..._ नमणि न्यु. /42 
अर. 42/6 
मणिवर >पुखराज न्अर, 29/5 
कोयला न्‍कोयला -कि. 59/4 


यद्यपि रामायण एक आयुर्वेदिक ग्रन्थ नहीं है तथापि इसमें धातु उपधातु, 
रत्न, तथा प्राणिज-द्रव्यों का नामोल्लेख व्यापक रूप से प्राप्त हुआ है। लंका का 
वर्णन करते हुए कहा गया है कि हनुमान जी ने देखा- 

स्वर्ण के बने हुए द्वार, नीलम के चबूतरे, हीरे, स्फटिक, मोटे मोती उन 
चबूतरों पर जड़े हुए माणिक्य, फर्श, दोनों ओर तपाये हुए स्वर्ण के हाथी, उन द्वारों 
का ऊपरी भाग, चाँदी का स्वच्छ, तथा श्वेत सीढ़ियाँ नीलम की बनी हुई। द्वारों 
का भीतरी भाग स्फटिक मणि का बना था। 

लंका उस समय बहुमूल्य धातुओं, रत्नों आदि से युक्त थी इसका वर्णन कवि 
ने अनेक स्थलों पर किया है। 
हिरण्य (सोना) 

वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 325 


स्वर्ण के गुण 

सुवर्ण (सोना)-वृंहण, स्निग्थ, रस एवं विपाक में मधुर, त्रिदोप नाशक, 
शीतवीर्य, किंचित्‌कषायरस एवं रसायन होता है।॥* 

रस-तरडूगिणी में उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त शुद्ध स्वर्ण को नेत्र-हितकारी, 
गर्भधारण, शक्ति वर्धक, हृदय दीर्बल्य में सर्वोत्तम एवं विष-प्रभाव-नाशक माना 
गया है। स्वर्ण को अन्यान्य औषधियों आदि में मिलाकर स्वर्णलवण (गोल्ड 
क्लोराइड), स्वर्ण-भस्म इत्यादि रूपों में प्रयुक्त करने से भी अनेक लाभ प्राप्त होते 
हैं। स्वर्ण-भस्म क्षय में अति उपयोगी हैं। स्वर्ण मुक्त अवस्था एवं संयुक्त अवस्था 
दोनों में पाया जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में स्वर्ण का निम्न-लिखित स्थलों पर उल्लेख प्राप्त होता 
है। 
जाम्बूनद 
विशेष उच्च कोटि का स्वर्ण 

इसका उल्लेख करते हुए रामायण में कहा गया है, “स्वर्ण के बने हुए द्वारों 
से उस नगरी की अपूर्व शोभा हो रही थी। उन सभी द्वारों पर नीलम के चबूतरे 
बने हुए थे ।* 
तप्त हाटक 
तपा हुआ सोना 

इसका उल्लेख भी रामायण में प्राप्त होता है,-““वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों 
और मोतियों से जड़े गये थे, मणिमय फर्श उनकी शोभा बढ़ा रहे थे, उनके दोनों 
ओर तपाये हुए स्वर्ण के बने हुए हाथी शोभा पाते थे। उन द्वारों का ऊपरी भाग 
चाँदी से निर्मित होने के कारण स्वच्छ एवं श्वेत था।" 
हेम जम्बूनद 
स्वर्ण 

इस रूप में स्वर्ण का उल्लेख करते हुए रामायण में लिखा है, “तदन्तर जिसके 
चारों ओर सुवर्ण एवं जम्बूनद का परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती 
और मणियों से विभूषित था तथा अत्यन्त काले अगरु एवं चन्दन से जिसकी 
अर्चना की जाती थी, रावण के अन्तःपुर में हनुमान जी ने प्रवेश किया।' 
कांचन 
स्वर्ण 

स्वर्ण का भी वाल्मीकि रामायण में उल्लेख प्राप्त है, “फिर उन्होंने राक्षसराज 
रावण का उसकी शक्ति के अनुरूप अत्यन्त उत्तम और अनुपम भवन देखा, जो 
मेघ के समान ऊँचा, सुवर्ण के समान सुन्दर कांति वाला तथा मनोहर था।"” 
कांचन बिन्दु 
स्वर्ण जल 

स्वर्ण-जल का उल्लेख भी रामायण में प्राप्त होता है, “.......रक्‍्त से रंजित 


326 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हुआ उनका वह रकक्‍्त-वर्ण का मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाश में लाल 
रंग के विशाल कमल को सुवर्णमय जल की बूंदों से सींच दिया गया हो--उस पर 
सोने का.पानी चढ़ा दिया गया हो।४ 
हेमजाल | 
सोने की जाली 

स्वर्ण का उल्लेख करते समय रामायण में सोने की जाली का भी उल्लेख 
किया गया है,- “उनके घोड़े जुते हुए विशाल रथ सोने की जाली से ढँके हुए 
थे | ६ कक 

इनके अतिरिक्त तप्त कांचन,” हेमकोणे, हिरण्य,' जात-रूप'” आदि के रूप 
में भी रामायण में 'हिरण्य” नामक धातुज” औषधि का उल्लेख प्राप्त होता है। 
पिल्ठः (स्फटिक) (गोमेद) 

वाल्मीकि रामायण में विविध मणियों के मध्य स्फटिक मणि का भी उल्लेख 
अनेक बार किया गया है। 
स्फटिक मणि के गुण 

भाव-प्रकाश के अनुसार स्फटिक मणि को हिन्दी में गोमेद मणि, राहुरत्न, 
जवाहर, बं.-में-गोमेद मणि, तेलगू में गोमेदक अंग्रेजी में 0५० कहते हैं। 

गोमेद अर्थात्‌ गाय॑ के मेद यानि गांय की चर्बी के समान वर्ण वाला होता है, 
इस कारण इसका नाम गोमेद मणि पड़ा। स्वच्छ गो-मूत्र के समान वर्ण वाला, 
उज्ज्वल (चमकदार) चिकना, समतल, भारी, निर्दल, कोमल और प्रकाशवान, इन 
आठ लक्षणों से युक्त गोमेद मणि उत्तम होता है। कांति रहित, वजन में हल्का, 
रूखा, चपटा, परत वाला, प्रभा रहित, काञ्च के समान पीले रंग वाला, ऐसा गोमेद 
मणि निकृष्ट होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी स्फटिक मणि (पिह्ढ) का यत्र-तत्र उल्लेख प्राप्त 
होत्ता है यथा- “...उनकी सीढ़ियाँ, नीलम की बनी हुई थीं। उन द्वारों के भीतरी 
भाग स्फटिक मणि के बने हुए और धूल से रहित थे। वे सभी द्वार रमणीय 
सभा-भवनों से युक्त और सुन्दर थे तथा इतने ऊँचे थे कि आकाश में उठे हुए से 
जान पड़ते थे”|8 
बच्र (हीरा) 
(चन्द्र 

भाव-प्रकाश के मतानुसार हीरक, वज्र, चन्द्र, मणिवर आदि हीरे के संस्कृत 
नाम हैं। जो हीरा सफेद रइ् का होता है, वह ब्राह्मण, लाल रह्ज का क्षत्रिय, पीले 
रछ्न का वैश्य और असित रंग का शूद्व वर्ण का होता है। इस प्रकार हीरा की चार 
जातियाँ होती हैं। 

हीरा एक खनिज, बहुत मूल्यवान्‌ एवं प्रसिद्ध रतन है। यह रत्न दक्षिण के पूर्व 
भाग में पिननर से सोन तक, मद्रास में कड़ड़ापा, बुंदेलखण्ड के खानों में कहीं-कहीं 
प्राप्त होता है। ब्राह्मण वर्ग का हीरा रसायन के लिये उपयोगी, सर्वसिद्धियों को देने 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 327 


वाला होता है। क्षत्रिय वर्ग का हीरा रोगों को नष्ट करने वाला एवं जरा (बुढ़ापा) 
तथा मृत्यु को दूर करने वाला, वैश्य वर्ण का हीरा धन देने वाला तथा देह को दृढ़ 
करने वाला और शूद्र वर्ण का हीरा रोगों को नाश करने वाला तथा आयु को स्थिर 
रखने वाला अर्थात्‌ शरीर में वृद्धावस्था जन्य क्षीणता को नहीं आने देने वाला 
होता है। 

वाल्मीकि रामायण में थी हीरा (वज़) का उल्लेख अनेक स्थानों पर उपलब्ध 
होता है यथा-“वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों, और मोतियों से जड़े गये थे ।* 

इस प्रकार रामायण में हीरा, मोती, मणियों आदि सभी का उल्लेख प्राप्त होता 
है। 
चौंदी झश्शः 

अष्टांग संग्रह के अनुसार चाँदी स्निग्ध, रस में कषाय एवं अम्ल, विपाक में 
मंधुर, सर, वयः स्थापन, शीत-वीर्य, लेखन तथा वात पित्त नाशक होती है (० 

रसतरझ्विणी के अनुसार चाँदी शुक्रमेहघ्न, आयुष्य, वयः-स्थापक, वृष्य एवं 
मेधा-वर्धक भी है। रजत-भस्म को वात-हर, कफ-प्रकोप-नाशक, शिरोविकार-जन्य-श्रम 
में लाभकारी एवं गर्भशय शोधन में अति उत्तम माना गया है। 

वाल्मीकि रामायण में भी रजत अर्थात्‌ चाँदी का उल्लेख अनेक स्थलों पर 
प्राप्त होता है यथा-“उनके दोनों ओर तपाये हुए स्वर्ण से बने हुए हाथी शोभा ... 
पाते थे, उन द्वारों का ऊपरी भाग चाँदी से निर्मित होने के कारण स्वच्छ एवं श्वेत 
थाए 

रामायण में और भी स्थलों पर “रजत” का उल्लेख मिलता है यथा-“उसकी 
फर्श स्फटिक मणि से बनायी गयी थी, जहाँ बीच-बीच में हाथी के दाँत के द्वारा 
विभिन्‍न प्रकार की आकृतियाँ बनी हुई थीं। मोती, हीरे, मूँगे, चाँदी और सोने के 
डारा भी उसमें अनेक प्रकार के आकार अंकित किये गये थे? 

इस प्रकार रामायण में चाँदी का भी विविध नामों यथा- रजत, रुप्य, हिंरण्य 
आदि के द्वारा उल्लेख उपलब्ध होता है। * 
जपु (रॉँगा) तथा सीसा (पत्रा आते ॥,९७१) 

वाल्मीकि रामायण में राँगा तथा सीसा (धातुओं) का भी उल्लेख प्राप्त होता 
है।.अ. सं. के अनुसार “राँगा किंचित्‌ तिक्त, लवण, मल का भेदन करने वाला 
होता है। पाण्डुरोग, कूमिरोग, तथा वायुनाशक होता है। लेखन तथा किंचित्‌ 
पित्त-कारक भी है। सीसा भी राँगा के समान गुण वाला होता है।? 

विधि पूर्वक तैयार की हुई वंग. भस्म लघु, शीतल, रुक्ष, मेदोविकार-नाशक, 
कफ-प्रकोप-जन्य-रोग-शामक, प्रमेह-विकार-नाशक, क्षय-रोग-नाशक, नेत्र-शक्ति-वर्धक 
एवं शुक्र-वर्धक है। इसके सेब्वन से कृशकाय व्यक्ति में भी काम-शक्ति, और 
शारीरिक-वल की वृद्धि होती है। 

रसतरंडगणी के अनुसार सीसे की विधि-पूर्वक बनायी गयी भस्म मधुर, 
तिक्त, स्निग्ध... उप्ण, गुरु, अग्नि-वर्धक, प्रमेहननाशक, वात-रोग संहारक, 


328 / वाल्मीकि रामायंण तथा आयुर्वेद 


कफ-प्रकोप-जन्य, व्याधि-नाशक, गुल्म-रोग-नाशक, संग्रहणी तथा अर्श-शामक है। 

वाल्मीकि रामायण में भी "त्रपु! तथा सीसा का उल्लेख है ।---उस तेजस्वी 
गर्भ का जो मल था वही राँगा और सीसा हुआ /” इस प्रकार रामायण में राँगा 
एवं सीसा का वर्णन प्राप्त होता है। 
तात्र (ताम्बा) (क॒ुएश' 

अष्यांग संग्रह के मतानुसार ताँबा किंचित्‌ तिकत, मधुर, कषाय, लेखन, लघु, 
रस एवं विपाक में कट, शीतवीर्य, रोपण तथा कफ-पित्त-नाशक होता है।” * 

ताम्र के उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त रसतद्लिणी में ताम्र-भस्म वीर्य में उष्ण, 
अम्ल रस, स्निग्ध, विषहर, पित्त-निःसारक, लेखन, दीपक, कृमि-हर, कुष्ठ-नाशक, 
कास, श्वास शामक, क्षय-रोग-नाशक, पाण्डु-रोग-हर, ज्वर-नाशक, व्रण-नाशक, 
रुचि कारक, उदर-रोग-हर, आयुष्य, वामक, विरेचक, शूल-नाशक, अम्ल-पित्त 
शामक, यकृत-प्लीह-रोग-नाशक, अपस्मार-रोग-हर, विसूचिका तथा वमन रोग 
निवारक माना गया है। हि 

वाल्मीकि रामायण में भी ताम्र” का उल्लेख प्राप्त होता है यथा-“उस तेज की 
तीक्ष्णता से ही दूरवर्ती भू-भाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो 


« गयीं” 


इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में ताँबे (ताम्र) का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। 
लौह (कृष्ण लौह तथा तीक्ष्ण लौह) [7णा 

अष्टांग संग्रह के मतानुसार कृष्ण-लौह चक्षु के लिये हितकारी, रस में कषाय, 
मधुर, तिक्त, लेखन, वात-कारक, तथा शीत-वीर्य होता है। कूमि रोग, कुष्ठ-रोग, 
कफ-विकार, गात्र शैथिल्य, पालित्य, पाण्डुरोग, शोथ एवं शोष को नष्ट करता है। 
तीक्ष्ण लौह भी इन्हीं गुणों वाला होता है। विशेष रूप से विकासी तथा दुर्जर होता 
है।# 

रसतरक्ञिणी में कहा गया है कि लौह का सेवन जीर्ण, अतिसार, 
नवीन-गण्ड-माला-रोग, वृक्क-शोथ, स्त्रियों में रजोरोध, हृदय-रोग, विशम-ज्वर, ' 
फिरंग-जन्य-पाण्डुरोग, कामला, हलीमक, योषापस्मार, श्वेत-प्रदर, मधुमेह, मांसतान 
(डिप्थीरिया) विविध प्रकार के क्षय, ताण्डव, सूतिका-ज्वर, गलक्षत, आम-वात, 
यकृत-रोग, भगन्दर, पीनस और अम्ल-पित्त आदि रोगों को नष्ट करता है। किसी 
रोग शांति के पश्चात्‌ उत्पन्न दुर्बलता दूर करने में भी लौह विशेष उपयोगी है। 

आयुर्वेद के ग्रन्थों में लौह के तीन उल्लिखित भेद हैं। . मुण्डलौह या कृष्ण 
लौह 2. तीक्ष्णलैह 3. कोत लौह। इन तीनों में अंतः प्रयोग में कांत लौह सर्वोतम 
और कृष्ण लौह निकृष्ट माना गया है। 

परन्तु शास्त्रोल्लिखित कांतलौह अति दुर्लभता से ही प्राप्त होता है। वाल्मीकि 
रामायण में भी लौह धातु का उल्लेख प्राप्त होता है। 
कालायस ९ े 

इसका उल्लेख इस प्रकार है-'जिन्हें वीर-राक्षस गणों ने बनाया है, जो काले 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 329 


लोहे की बनी हुई, भयंकर और तीखी हैं तथा जिनका अच्छी तरह संस्कार किया 
गया है, ऐसी सैकड़ों शतघ्नियाँ (लोहे के काँटों से भरी हुई चार हाथ लंबी गदाएँ) 
उन दरवाजों पर सजाकर रखी गयी हैं।? 

असी 


इसका उल्लेख इस प्रकार है-“कुछ पापी असिपत्र वन में जिसके पत्ते तलवार 
की धार के समान तीखे थे, विदीर्ण किये जा रहे थे 7 
कृष्णायस 

इसका उल्लेख भी रामायण में इस प्रकार प्राप्त होता है। “--- उस तेज की 
तीक्ष्णता से ही दूरवर्ती भू-भाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो 
गयीं ४ 

इस प्रकार रामायण में लौह धातु का विविध नामों से उल्लेख होता है। 
गेरु 

अष्टांग संग्रह के अनुसार गैरिक या गेरु-विशद्‌, स्निग्ध, कषाय, मधुर तथा 
शीत-वीर्य होता है ९ 

गैरिक के दो भेद हैं-स्वर्ण गैरिक एवं पाषाण गैरिक। स्वर्ण गैरिक उत्तम, 
स्निग्ध एवं मृसण होता है, जबकि पापाण गैरिक अवर तथा रुक्ष। स्वर्ण गैरिक 
दाह-नाशक, पित्त-ज्वर-नाशक, व्रण-रोपक, हिक्का-वमन- नाशक, रक्‍्त-पित्त 
तथा रक्‍्त-प्रदर में लाभ-प्रद भी होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी गैरिक का उल्लेख प्राप्त होता है, “वह पर्वतराज 
गैरिक आदि धातुओं से विभूषित हो, बड़ी शोभा पा रहा था 7? 
अज्जन 

अष्टांग संग्रह के अनुसार अज्जन (सुरमा) कषाय, मधुर, शीत वीर्य, लेखन, 
स्निग्ध होता है। रक्त-पित्त, विष, वमन एवं हिकका को नष्ट करता है। दृष्टि को 
निर्मल करता है। इन अंजनों में स्रोतांजन श्रेष्ठ होता है। सौवीरांजन (श्वेत सुरमा) 
इससे कम उत्तम (काला) होता है। रसाञ्जन (रसोत-दारुहरिद्रा-विकार) कफघ्न, 
तिक्‍त, कटठु, छेदनीय तथा किचित्‌ उष्णवीर्य होता है।” 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है यथा-नीलाज्जन। 
मनः शिला है 

आ. सं. के अनुसार मैनशिल कफ-नाशक, रस में तिक्त, कठु, लेखन तथा सर होता 
है। मैनसिल गुणों में (२०४॥४० 85, 5.) गुणों में स्निग्ध, उष्ण एवं गुरु, बिबन्धनाशक, 
कण्डू-नाशक, जीवाणु-नाशक एवं विष-नाशक भी है।* 

वाल्मीकि रामायण में भी मनः शिला (मैनशिला) का उल्लेख प्राप्त होता है। 
यथा-“पहले तो वे सब लोग--अज्जराग, गोरोचन एवं मैनासिल आदि सामग्री लेकर वहाँ 
उपस्थित हुए, 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 
सभी धातुओं का उल्लेख प्राप्त होता है। 


330 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मणियाँ 

वाल्मीकि रामायण में विविध मणियों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। 

अष्टांग संग्रह के अनुसार पदूमराग (माणिक्य), महानील (नीलम), पुष्पराग 
(पुखराज), विदूरक (वैदूर्य), मुक्ता (मोती), विद्वम (मूंगा), वज़ (हीरा), इन्द्रवैदूर्य (उतम 
कोटि का वैदूर्य), स्फटिक (वैक्रान्त) आदि मणियाँ रत हैं। ये सब सर, शीत, वीर्य, रस 
में कषाय एवं मधुर, लेखन तथा चक्षु के लिये हितकारी होते हैं। इनको धारण करने से 
पाप, अलक्ष्मी तथा विष का नाश होता है। ये धन, आयुष्य, ओज, हर्ष, उत्साह, को 
बढ़ाने वाले तथा मंगलकारी होते हैं। नवरत्नों के विभिन्‍न रत्न विभिन्‍न ग्रहों के प्रतीक 
माने जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में रोगोत्पत्ति ग्रह दुष्टि के कारण मानी जाती है अतः उन 
ग्रहों के शमनार्थ उनके रत्ल-प्रयोग का विधान वर्णित है। उपर्युक्त सभी रत्नों की भस्म 
वृष्य, आयुष्य, बल-वर्धक, मेधा-वर्धक एवं रसायन होती है।” 

वाल्मीकि रामायण में भी विविध मणियों का उल्लेख इस प्रकार प्राप्त होता है- 
वैहटर्य 

भाव प्रकाश के अनुसार बैडूर्य मणि” को संस्कृत में दैदूर्य दूरजरल” तथा 
'केतुग्रहवल्लभ” कहते हैं इसका हिन्दी नाम-वैडूर्यमणि, लहसुनिया, बं.--नाम-ैदूर्य । म. 
--नाम-चैडूर्य्य रत्न गुजराती नाम-लसणियों एवं अंग्रेजी नाम (३४५ ०५८ है। 

जिसका रंग कालापन युक्त सफेद हो, समतल अर्थात्‌ टेढ़ा-मेढ़ा न हो, निर्मल, 
वजन में भारी, तेजवान और जिसके अन्दर सफेद रंग की रेखा दिखाई देती है ऐसा 
वैदूर्य-मणि उत्तम होता है और जो काले रंग का हो, कांति हीन, चपटा, हल्का, खुरदरा 
और जिसके अन्दर लाल रंग की रेखा दिखती हो ऐसा वैदूर्य मणि निकृष्ट होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी लंकापुरी के वर्णन में नीलम 'वैदूर्यमणि' का नामोल्लेख 
आया है।* 
बच 

बज्र अर्थात्‌ 'हीरा” का उल्लेख भी रामायण में प्राप्त होता है, इसका वर्णन भी 
पूर्व में किया जा चुका है।” 
स्फटिक 

स्फटिक मणि का उल्लेख भी रामायण में प्राप्त होता है, इसका वर्णन भी पूर्व 
में किया जा चुका है। 
मोती 

नाम-संस्कृत मौक्तिक, शौक्तिक, मुक्ता तथा मुक्ताफल। हि.-मोती 
ते.-मोव्यालु, मोत्पालु । बं.-मुक्ता । म., गु.-मोती । क.-मौक्तिक, फा.--मरबारिद, 
मूबरिद अ.-लोलो, लू लू । अं.--?८०। ले.--(»४५7६० आदि मोती के विविध 
नाम हैं। 

सीप, शड्ख, हाथी, सूअर, साँप, मछली, मेढ़क और बाँस ये आठ मोतियों के 
निकलने के स्थान मोतियों के विषय में अभिन्न लोगों ने बताये हैं। 

मोती शीतल, वीर्य-वर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बल तथा पुष्टि को देने 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 33 


वाला होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी लंकापुरी के वर्णन में मुक्ता-मोती का नामोल्लेख 
प्राप्त होता है।* 
शंख 

नाम-सं.-शंख, समुद्रज, कम्बु, सुनाद तथा पावनध्वनि, हि.-संख, शंख, 
बं.-शंख सांक, द्रा.-शंख पं. क. मा. गु.-शंख, ते.-शंखसु, म.--शंखो, 
अं.-0०४०॥ (कोंच) आदि शंख के विविध नाम हैं। 

शंख-एक प्रसिद्ध समुद्री कोशस्थ जीव का अस्थिवत्‌ रक्षक है। जिस प्रकार 
देशी घोंघे सितुहे के जीव कोश के अंदर रहते हैं, उसी प्रकार यह भी रहता है। 
शंख को पूजा करते समय बजाते हैं। इसकी आवाज पवित्र समझी जाती है, 
जिससे देवता लोग प्रसन्न होते हैं। दक्षिणावर्त एवं वामावर्त इन भेदों से शंख दो 
प्रकार का होता है। इसमें दक्षिणावर्त शंख दुष्प्राप्य है। वामावर्त शंख बहुत मिलता 
है इसी को औषधि के काम में लेते हैं। जो शंख चिक्कन, भारी और चन्द्रमा के 
समान उज्ज्वल हो वह उत्तम होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी शंख का उल्लेख उपलब्ध होता है।“ 
प्रवाल (मूंगा) (विद्ुम) 

नाम-सं.-प्रवाल एवं विद्रुम, हि.-मूंगा, बं.-पला, मुझ्ञा, म.-पोवंले, 
गु.-पखाला, परवाली, क.-अवलेहवत। तै.-प्रवालक, पागाडालु, पगडमु। 
फा. -मिरजान, मिरगां, मिरजां, मरजानू अरबी-एहेम, खुस्सुद, कोरल, वसद। 
पं. मा. मूंगा । कं.--हवलवु । द्रा.-पवलं अं.--२०० 0ण4। ले.-00/कणा॥एशपा 
आदि मूंगे के विविध नाम हैं। 

मूंगे का वृक्ष झाड़दार होता है और इसकी माला बनाकर गले में पहनते हैं। 
व मूंगा अत्यन्त लाल हो और अपने रंग को न बदले यह उत्तम अन्यथा त्याज्य 

। 

वाल्मीकि रामायण में भी प्रवाल एवं विद्वुम दोनों ही नामों से इसका उल्लेख 
प्राप्त होता है।" 
शुक्ति सीप 

नाम-शुक्ति, मुक्ता शुक्ति, मुक्ताग्रृहा, बं.-झिनुक, पं.-सीप, हि.-सीप, 
शीप, मोती की सीप आदि शुक्ति के विविध नाम हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी शुक्ति का उल्लेख प्राप्त होता है।/ 
मणिवर (पुखराज) 

नाम--सं.-पुष्पराग, मंजुमणि, तथा वाचस्पति वल्लभ हि.--पुखराज, पोखराज 
आदि विविध नाम हैं।. 

जो वजन में भारी, स्निग्ध, चिकना, निर्मल, मोटा, समतल, कोमल कर्कशता-रहित 
और कर्णिकार के फूल के समान पीले रंग का हो, ऐसा पुखराज श्रेष्ठ होता है और 
जो कांति-हीन, खुरदुरा, रूखा, काले-पीले मिश्रित रंग का, ऊँचा, नीचा, टेढ़ा, मेढ़ा, 


332 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कालापन युक्त, भूरे रंग का और पाण्डु-वर्ण का हो ऐसा पुखराज निकृष्ट होता है। 
वाल्मीकि रामायण में पुखरांज का भी उल्लेख प्राप्त होता है। इनके अतिरिक्त 
इन्द्रनील, महानील, काञ्चनमणि, दौस्तुभ-मणि, स्निधा मणि आदि मणियों का भी 
रामायण में नामोल्लेख प्राप्त होता है। 
गृहं शांति हेतु विशिष्ट रत्न, दिन एवं विशिष्ट धातु 


गृह रत्न दिन धातु 
सूर्य माणिक्य रविवार स्वर्ण 
चन्द्र मोती सोमवार चाँदी 
मंगल 7 मूंगा मंगलवार स्वर्ण 
बुद्ध पन्‍ना  बुछ्धवार स्वर्ण, काँसा 
गुरु पुखराज गुरुवार चाँदी 
शुक्र हीरा शुक्रवार चाँदी 
शनि नीलम शनिवार लोहा, सीसा 
राहु गोमेद. अमावस्या पज्चधातु 
केतु चैडूर्य पूर्णाणा. पञ्चधातु (सोना, चाँदी, 


ताँबा, काँसा, लोहा (समभाग) 

इस प्रकार रामायण में सभी धातु एवं मणियों का उल्लेख प्राप्त होता है। 
दिव्य-औषधियाँ 

वाल्मीकि रामायण में कुछ स्थलों पर कुछ दिव्य औषधियों का भी उल्लेख 
प्राप्त होता है यथा- 
विशल्यकरणी ।€? 
बला।! 
अतिबला।# 
गजकन्द ।/ 
संजीवकरणी (संजीवनी)/ 
संधानी ४ 
सुवर्णकरणी ।४ 
सोमलता 6 

9. चन्द्र।४6 

0. द्रोण ४ 

उपरोक्त दिव्य औषधियों का रामायण में नामोल्लेख आया है। सम्भव है वे 
औषधियाँ आज उपलब्ध न भी हों, फिर भी उस समय उनकी प्रभावोत्यादकता, 
दिव्यता अवश्य असंदिग्ध थी। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में सभी प्रकार की औषधियों यथा भौतिक 
एवं प्राकृतिक, वानस्पत्य, धातुज, मणि-रत्न इत्यादि तथा दिव्य औषधियों एवं सुरा 
आदि का वर्णन प्राप्त होता है, जो चकित्साजगत्‌ का एक अनिवार्य अंग है। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 333 


48 75 के ८ २०. ले 


आवश्यक टिप्पणी-इस अध्याय में वर्णित सभी औषधियों का प्रयोग एवं 
सेवन योग्य 'ैद्य' अथवा चिकित्सक के परामर्श से ही करें। 


संदर्भ 
प्रथम परिच्छेद 
- इत्थं च नानौषध भूतं जगति किचिद 
द्रव्यमस्ति विविधार्थ प्रयोगवशात्‌ । अ. सं. सू. 7/6 
2. इह हि द्रव्यं पाज्वभीतिकम्‌ । 
तस्याधिष्ठानं पृथ्वी योनिरुदक॑ खानिलानलसमवायन्निर्वृतिविशेषौ.... । अ. सं. सू. 7/3 
तत्र व्यक्तो रसः। अ. सं. सू, 7/4 
एकमुक्तास्ततो देवा: प्रत्यूचुर्वेषभध्वजम्‌। 
यत्तेज: क्षुभितं ह्यद्य तद्धरा धारयिष्यति ।। बा. 36/5 
5. एवमुक्तः सुरपतिः प्रमुमोच महाबलः। 
तेजसा पृथ्वी येन व्याप्ता सगिरि कानना।। बा. 36/6 
6. एवमुक्त्वा सुरान्‌ सर्वाञ्शशाप पृथिवीमपि। 
अवने नैकरूपा त्वं बहुभार्या भविष्यसि ॥। बा. 36/23 
न च पुत्र कृतां प्रीतिं मक्कोधकलुषीकृता । 
प्राप्स्यसि त्वं.सुदुर्मेधो मम पुत्रमनिच्छती।। बा. 36/24 
समुद्रमालिनीं सर्वा पृथिवी मनुगच्छथ। 
एकैक॑ योजन पुत्रा विस्तारमभिगच्छत ।। बा. 39/4 
8. शूलैरशनिकल्पैश्च हलैश्चापि सुदारुणै:। 
भिद्यमाना वसुमती ननाद रघुनन्दन।। बा. 39/9 
9. यस्थेयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः। 
महिषी माधवस्यैष: स एव भगवान प्रभु:।। बा. 40/2 
0. चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात््यहनी दिशः। 
जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वाः सराक्षंसाः॥। अयो. /4 
- शैलाः सर्वे समुद्राश्य राजा वरुण एव च। 
चौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्व सचराचर:।। अयो. 25/3 
2. मन्ये सूर्यश्च वायुश्व मेदिनी च यशस्विनी ।। अ. 64/27 
3. मनसा, कर्मणा वाचा यथा राम॑ समर्चये। 
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्ईति१॥ उ. 97/5 
यथैतत्‌ सत्यमुक्तं मे वेद्‌मि रामात्‌ परं न च। 
तथा मे माधवी देवि विवरं दातुमरहति ।। उ. 97/6 
4. तथा शपफश्व्यां वैदेहयां प्रादुरासीत्‌ तददूभुतम्‌। 
भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम्‌ ।। उ. 97/7 
तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृहय मैथिलीमू। 


334 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हे 9 


कं 


१ 


स्वागतेनाभिनन्धैनामासने चोपवेशयत्‌ ।। उ. 97/9 

5. किमाह सीता वैदेही ब्रूही सौम्य पुनः पुनः। 
पुरासुमिव तोयेन सिज्चन्ती वाक्यवारिणा।। सु. 66/8 

6. बा. 7/3 

7. बा. 29/6 

48. या. 36/08 

9. बा. 27/-2 

20. बा. 37/7 

श. बा. 37/0- 

22 बा. 37/2 

23. बा. 37/3-4 

24. बा. 37/5-6 

25. बा. 37/30 

26. बा. 49/ 

27. बा. 49/5 

28. बा. 56/4 

29. अयो. 25/24 

30. अर. 7/3-5 

34. अ. 2/7 

32. सु. 32/4 है 

33. सु. 53/25-28 

34. यु. 27/20 

35. यु. 48/0-7] 

36. उ. 70/-3 

37. उ. 70/6-7 

38. उ. 76/5-6 

39. बा. 32/4-6 

40. बा. 32/7-श 

4. बा. 32/22-23 

42. बा. 33/2-3 

43. बा. 33/23-श4 

44. बा. 36/8 

45. बा. 47/5-8 

46. अयो. 25/5 

47. अर. 72/08 

48. अर. 63/27 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 335 


49. सु. /26 

50. सु. 8/68 

5. सु. 8/65 
52. सु. 5/5 

53. यु. 6/28 
54. उ. 35/48-65 
55. कि. 42/33 
56. बा. 7/0 
57. अयो. 25/28 
58. अर. 2/77 
59. कि. 42/39, 40 
60. सु. /8 

6. यु. 405/-5 
62. यु. 05/6 
63. यु. 05/7 

64. यु. 05/6-श 
65. यु. 05/229-27 
66. यु. 05/28-29 
67. यु. 05/8 
68. .उ. 28/22 
69. उ, 23 घ/6 
0. उ. 28 घ/8 
70. उ. 83/7 


वतन ध्त् 


हद द्व दव ध्य धूप 


द्वितीय परिच्छेद 


१. अयो. 4/28, 7/-2, 3-6 
2. अयो. 6776 

3. अयो. 7/28 

4. अयो. 76/7 

5. अयो. 76/28 

6. अयो. 88/6 

7. अयो. 9/83 

8. अयो. 94/24 

9. अयो. 4/20, 22 

30. अर. 35/22 


336 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


7. कि. 33/7 

2. कि. 50/7 

3. सु. 9/27 

4. सु. 29/8 

5. यु. 2/4 

6. यु. 75/8 

7. यु. /05 

8. उ. 42/2 

9. अर. 60/4 

20. कि. /80 

श. कि. 27/0 

22. कि. 28/4, 9, 34, 4 

28. कि. 30/25 

24. यु. 4/80 

25. यु. 22/56 

26. यु. 39/8 

शा. उ. 26/5 

28. उ. 42/4 

29. अर. 60/2 

30. यु. 22/59 

3. उ. 42/5 

32. बिल्वा मार्दडिगका आसज शम्याग्राहा बिभीतका:। 
अश्वत्था नर्तकाश्चासन्‌ भरद्वाजस्य तेजसा ।। अयो. 9/49 

33. जम्बूप्रियाल पनसा न्यग्रोधप्लक्ष तिन्दुकाः। 
अश्वत्था: कर्णिकाराश्च चूताश्चचान्ये च पादपा:।। अर. 73/3 

34. पुष्पार्ककेतकाभाश्च केचिज्ज्योतीरसप्रभा:। 
विराजन्तेज्चलेन्द्रस्य देशा धातु विभूषिता:॥। अयो. 94/6, 

35. अर. 355/23, लंका के समुद्रतट पर। 

36. क्षुधामारं तृषामारं, मगोतामनपत्यतामू । 
अपामार्ग त्वया व्यं, सर्व तदपमृज्महे ।। । ।। 
तृषमार क्षुधामारं, मारमथो अक्षिपराजयम्‌। 
अपामार्ग त्वया व्य॑, सर्व तदपमृज्महे ।। 2 ॥॥ 

37. वनौषधि चन्द्रोदय (-5) पेज नं. 45 

38. वनौषधि चन्द्रोदय (-5) पेज नं. 45 

39. वनौषधि चन्द्रोदय (-5) पेज नं. 45 

40. चम्पकाशोकपुंनागमन्दार तरुभिस्तथा। 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 337 


42. 


43. 


44. 


45. 


46. 


47. 


48. 


49. 


50. 


5. 


52. 


&. 2. 


56. 
57. 


58. 


338 / 


चूतपाटललोधैश्च प्रियड्यर्जुनकेतकः ।। उ. 26/5 

- दिव्यचन्दनलिप्ताडूगी मन्दार कृत मूर्धजा। 
दिव्योत्सवकृतारम्भा दिव्य पुष्पाविभूषिता ।। उ. 26/5 
वधूनाटकसंबैश्च संयुकतां सर्वतः पुरीम्‌। उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्‌ ।। बा. 
5/29 

आम्रं छित्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत्‌ तु कः। 

यश्चैनं पयसा सिंचेन्नैवास्य मधुरो भवेत्‌ ।। अयो. 35/6 
उद्यानाम्रवणोपेतान्‌ सम्पन्न सलिलाशयानू। 
तुष्टपुष्टजनाकीर्णान्‌ गोकुलाकुलसेवितान्‌ू ।। अयो. 50/9 
कश्चिदाम्रवर्ण छित्वा पलाशांश्च निषिश्चति। 

पुष्प॑ दृष्ट्वा फले गृध्न: स शोचति फलागमे।। अयो. 63/8 
आम्रजम्ब्वसनैलेप्रिः प्रियालैः पनसैर्धवैः । 
अड़ोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुकवेणुभि: ।। अयो. 94/8 
5८८ अनेकवर्ण पवनावधूतं 

भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्कम्‌।। कि. 28/9 ) 

ततः पश्यति धर्मात्मा तत्‌ सर्व योगमास्थित:। 

पुरा यत्‌ तत्र निर्वृत्तं पाणावामलक॑ यथा ।। बा. 3/6 

तस्मिन बिल्वाः कपित्थाश्च पनसा बीजपूरका:। 

आमलकक्‍्यो वभूवुश्च चूताश्व फलभूषिता:।। अयो. 9/30 
काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि । 
बदर्यामलकैर्नपैवेत्र धन्‍्चन वीजकैः।। अयो. 94/9 
शिंशपा55मलकीजम्बूर्याश्चान्या: कानने लताः। 
मालती मल्लिका जातिरय॑श्वान्याः कानने लताः। ....अयो. 9/5॥ 
अंकोलांश्च करंजाश्च प्लक्षन्यग्रोध पादपान्‌। 
जम्वूकामलकान्‌ नीपान्‌ भंजन्ति सम प्लवंगमा।। यु. 4/73 
औदुम्वरीं बृसीमन्यः स्वस्तिकेचित्‌ तदावदनू। 
आयुष्यमपरे प्राहुर्मुदा तत्र महर्षयः।। बा. 4/25 





* तस्मिन्‌ बिल्वाः कपित्थाश्च पनसा बीजपूरकाः। 


आमलकक्‍्यो बभूवुश्च चूताश्वफलभूषिता:।। अयो. 9/30 


. आम्रजम्बवसनैलेंनि: प्रियालैः पनसैर्धवैः | 


अड्जेलैर्भव्यतिनिशैर्विल्वन्तिन्दुकवेणुभि: ।। अयो. 94/8 

अर. /74, 526 8, 60/2, 73/3, यु. 3/20, उ. 26/6, 42/3 
तामदुःखोचितां दृष्टवां पतितां कदली मिव। 

रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम्‌ । अयो. 20/33 

श्र॒ुत्वा सगर्वितं वाक्‍्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा। 

सीता प्रवेषितोद्वेगात्‌ प्रवाते कदली यथा।। अयो. 2/5 


वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


859. 


65. 


67. 


69. 


70. 


या. 


72. 


73. 


74. 


75. 


76. 


कदलीगृहक॑ गत्वा कर्णिकारानितस्ततः। 
समाश्रयन्‌ मंदगतिं सीतासंदर्शन॑ ततः।। अर, 42/23 
अर. 25/3, 47/49, 62/4, कि. 8/4, 32/6, उ. 42/4 सु. 58/56 
- तस्मिन बिल्वाः कपित्थाश्च पनसा बीजपूरकाः। 
आमलकक्‍्यो बभूवुश्च चूताश्च फलभूषिताः।। अयो. 9/30 
'. मेघोदरविनिर्मुक्ता: कर्पूरदलशीतला: । 
शक्‍्यमज्जलिभि:ः पातुं वाताः केतकगन्धिनः ।। कि. 28/8 
.. सखीवच्च विगाहस्व सीते मन्दाकिनीं नदीम्‌। 
कमलान्यवमज्जन्ती पुष्कराणि च भामिनी।। अयो. 95/4 
« जराजर्जरितैः पत्रैः शीर्णकेसरकर्णिकैः । 
नालशेषा हिमध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः।। अर. .6/26 
अयो. 64/70, अर. 8/9, 52/85, 72/2, कि. 48/22, सु. 9/5, 57/, यु. 
74/43, उ. 7/48 अर. 50/26 सु. 58/57, अर. 60/26। 
.. क्वचित्‌ कुमुदखण्डैश्च कुडालैरुपशोभिताम्‌। 
नाना पुष्परजो ध्वसतां समदामिव च क्वचित्‌।। अयो. 50/श 
सुप्लैकहंसं कुमुदैरूपेत॑ 
महाह्ददस्थं सलिलं विभाति। 
घनैर्विमुक्तं निशि पूर्णचन्द्रं 
तारागणाकीर्णमिवान्तरिक्षम्‌ । । कि. 30/48 
सु. 57/2, यु. 4/85 
द्रुमाः कण्टकिनश्वैव कुशाः काशाश्च भामिनी। 
बने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतों वनम्‌।। अयो. 28/22 
हविराज्यं पुरोडाशः कुशा यूपाश्च खादिरा:। 
नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे ।। अयो. 6/7 
अयो. 30/2, अर. 5/8,22, सु. 33/28, उ. 66/7, अयो. 94/24, अर. 26/33, 
यु. 88/70, उ. 09/4, अयो. 99/6, 9 अर. 60/7 उ. /5 
पुष्पार्ककेतकाभाश्च केचिज्ज्योतीरसप्रभा: 
विराजन्तेष्चलेन्द्रस्य देशा धातुविभूषिताः।। अयो. 94/6 
चूतैरशोकैस्तिलकैः केतकैरपि चम्पकैः। 
पुष्पगुल्मलतोपेतैस्तैस्तरुभिरावृताः ।। अर. 5/7 
() अर. 60/22, कि. 27/7, 8, कि. 49/4, यु. 4/78, (2) अर. 75/0, 24, 
कि. 28/8, 9, 28, सु. /श] उ. 6/ (3) कि. /87 कि. 42/8 सु. 2/9 
ततोजस्त्राणि महातेजा विश्वामित्रो मुमोच ह। 
तैस्तै यवनकाम्बोजा बर्बराश्चाकुलीकृताः। बा. 54/23 
जराजर्जरितैं: पत्र: शीर्णकेसरकर्णिकैः । 
नालशेषा हिमध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः।। अर. 6/26 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 339 


7 
78. 
79. 
80. 
8. 


82. 
83. 


84. 


85. 
86. 


87. 


88. 
89. 


90. 


भ 
92. 
95. 
94: 
95. 


96. 


97. 
98. 


अयो. 9/72 

सुंदर 7/9, 7/4 

शक्यमम्बर मारुहय मेघसोपान पंक्तिभिः:। 
कुटजार्जुनमालाभिरलंकर्तु दिवाकरः।। कि. 28/4 

कच्चिद्‌ बाष्पाभिसंरुद्धान्‌ वर्षागमसमुत्सुकान्‌। 

कुटजान्‌ पश्य सौमित्रे पुष्पितान्‌ गिरिसानुषु। 

ममशोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान्‌ स्थितान्‌। कि. 28/4 

कि. 30/25, यु. 4/93, सु. 2/9, यु. 28/56 

अस्ति कच्चित्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया । 

कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम्‌।। अर. 60/2 

अर. 73/4, कि. 27/0, कि. 28/8, 34 42, उ. 26/4, 42/5 
आम्र॑ छित्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत्‌ तु कः। 

यश्चैनं पयसा सिंचेन्नैवास्य मधुरो भवेत्‌।। अयो. 35/6 
अभिजात्य॑ हि ते मन्ये यथा मातुस्तयैव च। 

न हि निम्बात्‌ स्॒वेत क्षौद्रं लोके निगदितं वचः।। जयो. 35/7 
यु. २२८59 

मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरे्निचुलैस्तथा । 

अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः ।। अर. 75/24 ५ 
असनाः सप्तपर्णाश्व कोविदाराश्च पुष्पिताः। ४ 
दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु ।। कि. 30/62 

कि. 49/7, सु. 4/36, 5/9, यु. 22/57, 39/3, 42/24 
कुसुमापचये व्यग्रा पादपानव्यवर्तत। 

कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा ।। अर. 42/3 

अशोक शोकापनुद शोकोपह्तचेतनम्‌। 

त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शीन मामू।। अर. 60/7 

अर. 5/7 

अर. 62/3 

अर. 73/5 

अर. 73/6, 24, कि. /59, 6/29, 27/7, सु. 074, सु. 4/3, सु. 5/7 
आम्रजम्ब्वसनैलर्थि: प्रियालैः पनसैर्धवै: । 
अज्ञोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वततिन्दुकवेणुभि: ।। अयो. 94/8 
पुष्पितांश्चासनानू दृष्टवां कांचनानिव निर्मलानू। 

कथं सारमते बाला पश्यन्ती माम पश्यती।। कि. 30/8 

कि. 30/62, 30, 56, सु. 2/0, उ. 42/3 
यदा नु खलु दुर्बद्धि भरतः स्वयमागतः। 

स॒ एष हि महाकायः कोविदार ध्वजो रथे ।। अयो. 84/3) 


340 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


99. महदूभि कांचनैवृक्षिृता बालकिसंनिभे:। 
जातरुपमयैर्मसस्ैर्महद्भिश्वाथ पड्कजैः ।। कि. 50/29 
00. अयो. 96/8, कि. /80, 30/62, सु. 2/0, यु. 4/80, उ. 4/25. असनाः 
0। असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च, पुष्पिताः। 
दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु ।। कि. 30/62 
02. द्ु:माः कण्टकिनश्वैव कुशा: काशाश्च भामिनि। 
बने व्याकुल शाखाग्रस्तेंन दुःखमतो वनम्‌।। अयो. 28/22 
03. अयो. 30/2, अर. 5/8, 5/22 
04. सालैस्तालैतमालैश्च खर्जूरे: पनसैद्र॒मैः। 
नीवरैस्तिनिशैश्वैव पुन्नागैश्चोपशोभिताः।। अर. 5/6 
05. अर. 6/7, सु. 2/9 
06. चन्दनागुरुनिर्यासान्‌ सरल॑ पद्मक॑ तथा। 
देवदारुणिचाहत्यक्षेपयन्तितथापरे ।। अयो. 76/6 
07. कोयष्टिमिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्व कीरकैः । 
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद्‌ वन॑ महत्‌।। अर. 75/2 
08. शिंशपाउउमलकी जम्बूयेश्चान्या: कानने लताः। 
मालतीमल्लिका जातियेश्चान्याः कानने लताः। 
प्रमदाविग्रहं कृत्वा भरद्वाजाश्रमेजवसन्‌ ।। अयो. 9/5॥ 
09. अगुरुणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च । 
तक्‍कोलानां च जात्यानां फलिनां.च सुगन्धिनाम्‌ू ।॥ अर. 35/22 
0. चन्दनागुरुसम्पृक्तो धूपसम्मूच््छितोउम्ल:। 
प्रवाति पवन: श्रीमान्‌ कि नु नाद्य यथा पुरा।। अयो. 77/28 
- चन्दनागुरुनिर्यासान्‌ सरल पद्मक॑ तथा। 
देवंदारुणि चाहत्य क्षेपयन्ति तथापरे।॥ अयो. 76/6 
प2. 
. अयो. 8024. 2. अयो. 88/6 
3. अयो. 9/83._ 4. अयो. 99/35 
5. अयो. .9/78 . 6. .अयो. 4/20, 22 
के 
9. 


वा 


अर. 7508. 8. अर. 55/श 
अर. 60/22.._30. अर. 63/8 
प. कि. /7 2. कि. /82 


5. कि. 45/8 34. कि. 35/4 
एु. कि. शा... 6. कि. 27/84 
7: कि. 28/6 38. कि. 32/7 
9: कि. 4/4 20. कि. 4/श7 
श. कि. 46/7 22. कि. 50/535 





वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषंध परिचय एवं... 


28. सु. 4/30 24. सु. 6/ 

25. सु. 908 26. सु. 0/9 
शा. सु. /32, 38 28. सु. 4/44 
29. सु. 29/3 30. यु. 26/4 

डा. यु. 3/45 32. यु. 36/25 
33. यु. 60/34 34. यु. 75/8 

35. यु. /05, 8. 36. यु. 2/2 
37. उ. 26/25 38. उ. 32/36, 48 
39. उ. 4222 


3. आम्रजम्बवसनैलेंन्निः प्रियालैः पनसैर्धवैः | 

अड्कोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुकवेणुभि: ।। अयो. 94/8 
74. यदि दृष्टा त्वया जम्बो जाम्बूनदसमप्रभा। 

प्रियां यदि विजानासि निः शड्टूं कथयस्व मे।। अर. 60/9 
75. अर. 73/3, कि. 28/9, 30 यु. 47/3 

अयो. 9/4] उ. 42/5 
6. बाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च। 

शोभन्तेभ्युदिते सूर्य नदद्धि : क्रौज्वसारसैः।। अर. 6/6 
7. ततः सरलतालाश्च तिलकाः सतमालाका:। 

प्रहृष्टा: तत्न सम्पेतुः कुब्जा भूत्वाथ वामना:।। अयो. 9/50 


8. अयो. 99/9 कि. 42/2 
अर.5/6 कि. 50/25 
अर. 35/3, 28... यु. 39/8 
कि. 37/2 उ. 0/5 
कि. 40/56 


9. सालतालाश्वकर्णानां पर्णर्बहुभिरावृताम्‌। 
विशालां मृदुभिस्तीर्णा कुशैवेंदिभिवाध्वरे । अयो. 99/9 

20. कदल्यटविसंशोभे नारिकेशोपशोभितम्‌। 
सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितिः। अर. 55/3 

]2. अयो. 9/50, अर. 5/6, 25/32, 29/4, 46/20, 60/8, कि. 3/4, 40/56, 
कि. 40/76, 42/46, 50/25, सु. 36/34, 56/34, 69/, यु. 5/4, 22/56, 59, 
39/3, 65/39, उ. 05/5 

22. शतं वाहसहस्राणां तण्डुलानां व पुष्मताम्‌। 
अयुतं तिलमुद्‌गस्य प्रयात्वग्रे महाबल।। उ. 9/9 

28. ततस्तिलोदन भुक्त्वा पुनः पुनरधः शिराः। 
तैलेनाभ्यक्त सर्वाड्ल्‍स्तैलमेवान्वगाहत ।। अयो. 69/0 

]24, बा. 7/24, सु. 9/26, 46/37, यु. 59/37, उ. 22/20 हे 


342 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


25. 


426. 


इश्. 


428. 


429. 


430. 


3: 


432. 
333. 
434% 
435. 
436. 
437. 
438. 


339. 


440. 


हंसानां हि पुरा राम न वर्ण: सर्वपाण्डुरः। 

पक्षा नीलांग्रसंवीता: क्रोडाः शष्पाग्रनिर्मला: ।। उ. 8/33 
प्रणष्ट जनसम्बाध॑ क्षेत्रारामविवर्जितम्‌ । 

विषमं च प्रतापं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति ।। अयो. 52/98 

प्रसूतं कलमक्षेत्रं वर्षणेव शतक्रतु:। 

तदाहलाननिमित्तं वालिनो हेममालिनः।। कि. 4/6 

अयो. 2077, 52/0, अर. 55/24, कि. 30/47, कि. 30/53, यु. 4/9, 50, 

उ. 7/3, 84/8, 0/2 । * 

यथास्यः पुरुष: कश्चित्‌ पलाशैर्मोहितो भवेत्‌। 

एवं मयाप्यविज्ञातं शब्दवेध्यमिदूं फलम्‌। अयो. 63/3 

कश्चिदाम्रवर्ण छित्वा पलाशांश्च निषिचति। 

पुष्प॑ दृष्ट्वा फले गृध्नु: स शोचति फलागमे।। अयो. 63/8 

अंन्‍्य स्थल-बा, 4/22, अयो. 56/6, अर. 5/7, कि. /75, 87, सु. 5/7, यु. 

40/4, 45/9, 54/32, 58/28, 67/29, 73/59, 75/26, 80/34, 88/7, 90/37, 

03/7 । 

अहंहि नैवास्तरणानि न स्रजो 

न चन्दन नांजनपानं भोजनम्‌। 

न किचिदिच्छामि न चेह जीवनं। 

न चेदितो गच्छति राघवों वनम्‌ ।। अयो. 9/64 

दिव्यचन्दन लिप्ताज्जी मन्दारकृत मूर्धजा। 

दिव्योत्सवकृतारम्भा दिव्यपुष्प विभूषिता ।। उ. 26/5 

चम्पकाशोकपुंनागमधूकपनसासनैः । 

शीभितां पारिजातैश्च विधूमज्वलन प्रभै:।। उ. 42/3 

अक्षतं जातरूप॑ च प्रियज्लु मधुसर्पिषी । 

दधि-चर्म च वैयाद्र॑ पराध्यें चाप्युपानहौ।। कि. 26/27 

प्रियड्टून्‌ गन्धपूर्णाश्च नीपान्‌ सप्तच्छदांस्तथा। 

असनान कोविदाराश्च करवीरांश्च पुष्पितानू।। सु. २४0 

उ. 26/5, 42/5. । 

तां नीलकण्ठी बिम्बोष्ठीं सुमध्यां सुप्रतिष्ठितामू। सु. 5/29 

तस्याः पुनर्बिम्बफलोपमोष्ठं, 

स्वक्षिभु केशान्त मरालपक्ष्म ..........सु. 29/7 

सिंह व्याप्रवराहैशव वारणैश्चापि शोभितम। 

ध्ववाश्वकर्ण ककुमैर्बिल्वतिन्दुक पाटलैः ।। बा. 24/5 

पश्य भल्लातकान्‌ बिल्वानू नरैरनुपसेवितानू। 








- 'फल्नपुष्पैश्वनतान्‌ नून॑ शक्ष्यामः जीवितुम्‌ ।। अयो. 56/7 


4. 


अयो. 79/30, 49, 94/8-0, अर, /74.......... ॥। 
* वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 343 


42..- प्रमोहानन्तसत्तवेन संतापौषधिवेणुना। 
आक्रान्तो दुःखशैलेन महता कैकेयी सुताः। अयो. 85/20 
48. आम्रजम्बवसनैलंश्निः प्रियालैः पनसैर्धवैः । है 
अड्कोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुक वेणुभि:॥। अयो. 94/8 
44. कि. 30/50, सु. 56/37, यु. 22/56 
345. मुचुकुन्दार्जुनाश्वैब दृश्यन्ते गिरिसानुषु । 
केतकोद्दालकाश्वैव शिरीषाः शिंशंपा धवाः।। कि. /8] 
46. मालती कुन्दगुल्मैश्च सिन्दुवारैः शिरीषकैः। 
- कम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितिसपशोभिताम्‌।। कि. 27/0 
47. बकुलानथ पुन्नागांश्चन्दनान्‌ केतकांस्तथा। 
पृच्छन्‌ रामो वने भ्रान्त उन्मत्त इव लक्ष्यते।। अर. 60/22 
48. तिलकाशोक पुंनाग बकुलोद्दालकाशिनीम्‌।। अर. 75/6 
रम्योपवन सम्बाधां पदमसम्पीडितोदकाम्‌। 
449. कि. /78.. सु. 75/44उ. 26/4 
कि. श/ध8 यु. 4/79 उ. 42/5 
कि. 42८7... यु. 22/59 उ. 0/5 
सु. 44/243.. यु. 39/3 
50. अयुतं तिलमुद॒गस्य प्रयात्वग्रे महाबल |] उ. 9/9 
चणकानां कुलित्थानां माषाणां लवणस्य च। 
5. अशोक वनिकाचेंयं दूढं रम्या दुरात्मन:। 
चन्दनैश्चम्पकैश्चापि बकुलैश्च विभूषिता।। सु. 4/43 
52. चन्दनागुरुचूतैश्व तुझ कालेयकैरपि। 
- देवदारुवनैश्चापि समन्तादुपशोभिताम्‌।॥ उ. 42/2 


53.. अयो. 88/6 अर. 75/8.. कि. 282 
«. अयो. 9/85 अर. 355/श. कि. 5/8 
अयो. 99/35 अर. 60/22. कि. 35/4 


अयो. 4/20, 22 अर. 63/8. कि. ॥/7 
* 54. भरतः क्षिप्रमागच्छत्‌ सुपरिश्रान्तवाहनः। 
वन॑ च समतीत्याशु शर्वर्यामरुणोदये.॥। अयों. 7/7 
55. स्वन्दनैश्चन्दनैर्नपिः पणसिर्लकुचैरपि। 
- * धवाश्वकर्णखदिरैः शमीकिशुकपाटलैः॥। अर. 5/8 
शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशिताम्‌। 
कुशकाशशरैः पर्णै: सुपरिच्छादितां तथा ।। अर. 5/22 
56. केतकोद्दालकाश्वैव शिरीषाः शिंशपाः धवाः।। कि. /8 
57. सुपुष्पिताग्रान्‌ रुचिरांस्तरुणाइकुरपललवानू। ४ 
तामारुहय महावेगःशिंशपां पर्णसंवृताम्‌।। सु. 4/42 


344 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


58. 347 सु. 58/55, 62, 64 
सु.42/9,. यु. 4/80 
सु. 560 
59. कुशकाशशर्ेंषीका ये च कण्टकिनोद्व॒ुमाः । 
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया।। अयो. 30/2 
60. शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशितामू । 
कुशकाश शरैः पर्णै: सुपरिच्छादिताम्‌ू तथा। अर. 5/22 
6. उ. 35/22 
62, घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्वैव सर्षपान्‌। 
उपसम्पादयामास कौसल्या परमाडूगना।। अयो.' 25/28 
63. सा निकृत्तेव सालस्य यष्टि: परशुना वने। 
पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता।। अयो. 20/32 
64. एक साले स्थाणुमती विनते गोमतीं नदीम्‌। 
कलिंग नगरे चापि प्राप्य सालवनं तदा।। अयो. 7/6 


65. यु. 59/77.. 39/3, 93/9.. अयो. 20/32 7/6, 72/22, 
964 97/28 99/9.._ अ. 5/6, 25/32, 30/6 
35/3 60/श कि. 8/2, 4, 5 /90, 9 2/35, 2777, 
डा/ब 40/5,6 50/25 सु. 0/48 ]4/3 44/3, ॥4 
56/34 यु. 22/56 28/2 39/3, 42/4, 43/34, 


59/43, 77... कि. श/ध0,,... 2878, बा. 2475 « 

अयो. 9909 अ. 75/8.._ कि. 3/4 
66. द्रक्ष्ससे शाल्मलीं तीक्ष्ममायासैः कण्टकैश्चिताम्‌। 

नहि त्वमीदशं कृत्वा तस्यालीक॑ महात्मनः॥। अर. 53/श 
67. शाल्मल्यः किशुकाश्चैव रक्‍ताः कुरवकास्तथा। 

तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दनाः स्वन्दनास्तथा।। कि. /82 
68. यु. 7/3, 40/4, 88/7 
69. रोमजं वालजं चर्म व्याप्रजं चाण्डजं बहु। 

*. मुक्तामणि विचित्रांश्च प्रसादाश्व॑ समन्ततः।। यु: 75/2 

70: समालम्भनमादाय गोरोचन मनः शिलाम्‌। ४ 

आजम्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्याश्व बोडश ॥। कि. 26/28 
377. असनाः सप्तपर्णश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः। 

दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु ।। कि. 30/62 
72. मालतीकुन्दगुल्मैश्व भण्डीरैनिचुलैस्तथा । 

अशोकैः सप्तपर्णैश्व कतकैरति मुक्तकैः ।। अर. 75/24 
73. तानार्तान्‌ नष्टसंज्ञाश्च गतासूंश्च बृहस्पति । 

विद्यार्भिमन्त्रयुक्ताभिशेषधीभिरिश्चकिंत्सति ।। यु. 50/28 


5 वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं. 








/& 345 


74. हरयस्तु विजानन्ति पर्वती ते महौषधिम्‌। 
संजीवकरणीं दिव्या विशल्यां देवनिर्मितम्‌ ।। यु. 50/30 
75. मृतसंजीवनी चैव विशल्यकरणी मपि। 
सार्वण्यकरणीं चैव संधानकरणीतथा।। यु. 74/33 
76. तावुप्युभी मानुषराजपुत्री, त॑ गंघं माप्राय महौषधीनाम्‌। 
बभूवतुस्तत्र तदा विशल्यावुत्तस्थुस्ये च हरिः प्रवीराः।। 
सर्वे विशल्या विंरुजा क्षणेन हरि प्रवीरा निहताश्च येस्युः। 
गन्धेन तासां प्रवरौषधीनां सुप्ता निशन्तेष्विव संप्रबुद्धाः।। यु. 74/73, 74 
'.. राम सुषेणं मुदितः सभा: भाष्येदमब्रवीत। यु. 9/20 
विशल्यो महा प्राज्ञ सौर्भिन्‍्नः वत्सलः। 
यदा भवति सु स्वस्थ स्तथा त्वं समुपाचरा।। यु. 9/श 
78. एव मुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथमः। 
लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेण परमौषधम्‌।। 
सतस्य गंध माप्राय विशल्यः समपद्यता। 
तदा निर्वेदनश्चेवय संरुढ़ ब्रणस्थता।। यु. 9/24, 25 
79. विभीषण मुखाना च सुहृदां राघवाज्ञया। 
सर्व वानर मुख्यानां चिकित्साम करोत तदा।। 
ततः प्रकृति मापग्नो हुतशल्यो गतल्कमः। 
सोमिति युमुदे तत्क्षणेन विगत ज्वरः।। यु. 9/26, श7 
80. हिमवन्त नगश्रेष्ठं हनुमन्‌ गन्तुमर्हसि। यु. 74/29 
87. ततः कांचनमत्युच्चमृषभं पर्वतोत्तमम्‌। 
कैलाश शिखर चापि द्रक्ष्यस्यरिनिषूदना ।। यु. 74/30 
82. तयोः शिखरयोर्मध्ये प्रदीप्त मतुलप्रभम्‌॥ यु. 74/8॥ 
83. मृत संजीवनी चैव विशल्य करणीमपि। 
सावर्ण्यकरणीं चैव संधानकरणी तथा।। यु. 74/33 
84. प्रदीप्तमतुलप्रभम्‌। यु. 74/6॥ 
85. आप्लुप्य तं॑ औषधि पर्वतेन्द्रं ततोषधीनां विचयं चकार। यु. 74/62 
86. विज्ञायार्थि नमायान्तम्‌ ततो जम्मुरदर्शनम्‌।। यु. 74/64 
87. स त॑ समुत्पाट्य खमुत्यपात। यु. 74/68 
88. सौम्य शीघ्रमितो गत्वा पर्वत हि महोदयम्‌।। 
पूर्व तु कथितो योञसौ वीर जाम्बवता तव। 
दक्षिणे शिखरे जातां महौषधिमिहानय ।॥। 
विशल्यकरणीं नाम्ना सावर्ण्यकरणी तथा। 
संजीव करणीं वीर संधानीं च महौषधीम्‌।। यु. 0/30-32 
89. सुषेणो वानरश्रेष्ठो जग्राहोत्पाटय चौषधीः।। यु. 0/42 
90. ततः संक्षोदयित्वा तामोषधीं वानरोत्तमः। 


346 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


7 


जे 


श् 


9| 


492. 


9: 


95. 


9. 


97. 


9: 


9: 


छ 


200. 


श0 


203. 


204. 


205. 


206. 


207. 


208. 


। 


छ 


लक्ष्मणस्य ददौ नस्तः सुषेणः समुहाद्युतिः।। यु. 0/44 


- सशल्यः स समाप्राय लक्ष्मण: परवीरहा। 


विशल्यो विरुजः शीघ्रमुदतिष्ठन्महीतलात्त ।। यु. 0/45 
अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्‍्ताः पारिभद्रकाः। 
तानारुहयाथवा भूमौ पातयित्वा च तानू बलातू।। अर. 73/5 
पश्य भल्लातकान्‌ बिल्वान्‌ नरैरनुपसेवितानू। 
फलपुष्पैरवनतान्‌ नूनं शक्ष्याम जीवितुम्‌ ।। अयो. 56/7 


.. मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरै्निचुलैस्तथा । 


अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः।। अर. 75/24 
शाल्मल्यः किंशुकाश्वैव रक्‍्ता कुरवकास्तथा। 

तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दनाः स्यन्दनस्तथा।। कि. ॥/82 
स्यन्दनैश्चन्दनैर्नपिः पाणसिर्लकुचैरपिं । 

धवाश्वकर्ण खदिरेः शमीकिंशुकपाटलैः। अर. 5/8 
मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा। 

न श्रमो न ज्यरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः ।। बा. 22/3 
सा विद्धा बहुभिवक्यिर्दिग्यैरिव गजाज्नना । 

चिरसंनियतं. बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणि:।। अयो. 30/28 


. दारुपात्राणि सर्वाणि अरणिं चोत्तरारणिम्‌। 


दत्वा तु मुसलं चान्य॑ यथा स्थान विचक्रमुः।। यु. /6 
काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि । 
बदर्यामलकैर्नपिवेत्र धन्‍वनबीजकैः ।। अयो. 94/9 


-असिपत्रवनेचैव भिद्यमानानधार्मिकानू। 


रौखे क्षारनब्यां च क्षुरधारासु चैव हि।। उ. 2/5 


!. इक्षृंशच मधुलाजांश्च भोजयन्ति सम वाहनानू। 


इक्ष्वाकुवरयोधानां चोदयन्तो माहबलाः।। अयो. 9/56 
अन्याः स्वन्तु मैरेयं सुरामन्‍्याः सुनिष्ठिताम्‌। 
अपराश्चोदक शीतमिक्षुकाण्डरसोपमम्‌ ।। अयो. 9/5 
आजैश्चापि च वाराहैर्निष्ठानवरसंचयै: । 

फलनियूह संसिद्धैः सूपैर्गन्‍्धरसान्वितैः ।। अयो. 9/67 
अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवानू। 

सुमहानि्जुदी वृक्षो वसामोज्जैव सारथे ।। अयो. 50/28 
उपरुूहयन्ति मे प्राणा दृष्टिर्भ्रमति राघव। 

पश्यामि वृक्षान्‌ सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान्‌ू ।। अर. 68/7 ॥। 
ततो मरुत॑ नृपतिं यजन्तं सह दैवतैः। 

उशीर बीजमासाद्य ददर्श सं तु रावणः।। उ. 8/2 ।। 
आम्रजम्ब्वसनैलेप्षिः प्रियालैः पनसैर्धवैः । 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 347 


अड्कोलैर्भव्य तिनिशैर्बिल्व तिन्दुक वेणुभि: ।। अयो. ,94/8 
209. इयं सुमित्रा दुःखार्ता देवी राज्ञश्व मध्यमा। 
कर्णिकारस्य शाखेव शीर्णपुष्पा बनान्तरे।॥ अयो. 92/28 
20. अंकोलाश्च करंजाश्च प्लक्षन्यग्रोधपादपान्‌ । 
जम्बूकामलाकान्‌ नीपानू भंजन्ति सम प्लवंगमाः।। यु. 4/78 
. शाल्मल्यः किंशुकाश्वैव रक्‍्ताः कुरवकास्तथा। ” 
तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दनाः स्यन्दनास्तथा।। कि. /82 
22. धन्वना नागवृक्षाश्व तिलका नक्तमालकाः। 
नीलाशोका कदम्बाश्च करवीराश्च्‌ पुष्पिता:।। अर. 73/4 
23. तालानूदाडिमगुल्मांश्व नारिकेलविभीतकान्‌ । 
करीरानू बकुलानू निम्बान्‌ समाजहुरि तस्ततः।। यु. 22/59 
24. व्यक्त नभः शस्त्रविधौतवर्ण, कृशप्रवाहानि नदी जलानि। 
:. कहलारशीताः पवनाः प्रवान्ति, तमोविमुक्ताश्च दिशः प्रकाशाः।। कि. 30/36 
25. काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि । 
बदर्यामलकैर्नपिरवेत्रधन्वनबीजकैः ।। अयो. 94/9 
26. चूतनीपमहासालान्‌ पनसान्‌ कुरवान्‌ धवानू। 
दाडिमानपितान्‌ गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशा:।। अर. 60/2 
2१7. अड्जोलाश्च कुरण्टाश्च चूर्णकाः पारिभद्रका:। 
चूताः पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिता:।। कि. /80 
श४8. चणकानां कुलित्थानां माषाणां लवणस्य च। 
अतोष्नुरूप॑ स्नेह च गन्धं संक्षिप्तमेव च ॥॥ उ. 9/20 
श9. कुष्ठस्थगरपुंनागभूजपन्नोत्तरच्छदान्‌ । 
220. कामिनां स्वास्तरान्‌ पश्य कुशेशयदलायुतान्‌ू ।। अयो. 94/24 
शश. केतक्थः सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च सुपुष्पिताः। 
माध्व्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्द गुल्माश्च सर्वशः।। कि. /77 
222. वार्नीरेस्तिमिदैश्वैव बकुलैः केतकैरपि। 
हिन्तालैस्तिनिशैर्नपर्वेतसिः कृतमालकैः।। कि. 27/8 
228. विविधानि च गौडानि खाण्डवानि तथैव च। 
न निःसृतं भवत्योष्ठाद्‌ वचन यावदर्थिनामू ।। उ. 92/2 
224. प्राप्ते यूपोच्छये तस्मिन्‌ षड्‌ बैल्वाः खादिरास्तथा। 
* तावन्तो बिल्वसहिताः पर्णिनश्च तथा परे।। बा. 4/22 
225. वाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च। 
शोभन्तेषभ्युदिते सूर्य नदृदाभि कौंचसारंसैः ।॥ अर. 6/6 
226. विविधानिं च गौडानि खाण्डवानि तयैव च। 
न निः सृतं भवत्योष्ठाद्‌ वचन यावदर्थिनाम्‌ू ।। उ. 92/2 
227. चणकानां कुलित्थानां माषाणां लवणस्य च। 


348 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


श्र 


228. 


229. 


230. 


23: 


282. 
283. 
234. 
285. 
236. 
287. 
258, 
239. 


240. 


श्व 


242. 


243. 
244. 


अतोष्नुरूप॑ स्नेहं च गन्धं संक्षिप्तमेव च।। उ. 9/20 

सा हि चंम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेवकोचिता । 

कोमला- विलपन्‍्त्यास्तु कान्तायाभक्षिता शुभा।। अर. 60/32 
नीवारान्‌ पनसानू सालानु वंजुलांस्दिनिशांस्तथा। 

चिरिबिल्वान्‌ मधूकांश्व बिल्वानथ च तिन्दुकानू॥॥ अर. /74 
अड्डोलाश्च क्रण्टाश्च चूर्णकाः पारिभद्रका:। 

चूताः पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिता:।। कि. /80 


- संध्यया चावृता लड्का जपापुष्पनिकाशया। 


दृश्यते सम्प्रदीप्तेव दिवसेषपि वसुंधरा ।। यु. 06/23 
तगरैनारिकेलश्च प्रियालपनसैस्तथा । 

एतैरन्यैश्व तरुभिरुद्भासितवनान्तरे ।। उ. 26/6 
सिंहव्याप्र वराहैश्च वारणैश्चापि शोभितम्‌। 
धवाश्वकर्णककुमैर्बिल्वतिन्दुक पाटलैः ।। बा. 24/5 
चंदनागुरुश्चूतैश्व तुड्‌ कालेयकैरपि। 

देवदारुवनैश्चापि समन्तादुपशोभिताम्‌ ।॥ उ. 42/2 
तगरैनारिकेलश्च प्रियालपनसैस्तथा । 

'एतैस्यैश्व तरुभिरुद्भासितवनान्तरे ।। उ. 26/6 
सुमतिस्तु नरव्याध्र गर्भतुम्ब॑ व्यजायत । 

घष्टि: पुत्र सहस्नाणि तुम्ब भेदादू विनिःसृता:ः। बा. 38/7 
श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा। 

द्वावेव तत्र विहिंतौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ ।। बा. 4/23 
काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि। 
बदर्यामलकैर्नपिरवेत्रधन्चन बीजकैः ।। अयो. 94/9 
सिंहव्याप्रवराहैश्व वारणैश्चापि शोभितम्‌। 
धवाश्वकर्णककुमैर्बिल्वतिन्दुक पाटलैः ।। बा. 24/5 
ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम्‌। 

न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ। अयो. 53/33 


- तिलकैर्बीजपूरैश्च वटैः शुक्लद्वमैस्तथा । 


पुष्पितैः करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितिः।। अर. 75/23 
सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोह्मन्‌ कुसुमानि च। 
शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्‌ ॥। कि. 26/25 
मालती कुन्द गुल्मैश्व भण्डीरेनिचुलैस्तथा ।। अर. 75/24 
धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका रकतमालकाः। 
नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिता:।। अर. 73/4 
कुष्ठ स्थगरपुंनाग भूर्जपत्नोत्तरच्छान्‌। 
कामिनां स्वास्तरान्‌ पश्य कुशेशयदलायुतानू ।। अयो. 94/24. 
वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 349 


245. आम्र॑ छित्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत्‌ तु कः। 
यश्चैनं पयसा. सिंचेन्नैवास्य मधुरो भवेत्‌ ।। अयो. 95/6 
. स्थन्दनैश्चन्दनैर्नपिः पणसिर्लकुचैरपि। 
धवाश्वकर्ण खदिरेः शमीकिंशुक पाटलैः।। अर.5/8 
247. जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुका: । 
अश्वत्था: कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपा:।। अर. 73/3 
248. सिंहव्याप्र वराहेश्ववारणैश्चापि शोभितम्‌। _ 
धवाश्वकर्णककुमैर्बिल्वतिन्दुक़पाटलैः ।। बा. 24/5 
249. हविराज्यं पुरोडाशः कुशा यूपाश्च खादिराः। 
नैतानि यातयामानि कुर्वन्त्रि पुनरध्वरे।। अयो. 6/7 
250. तथा हयात्तमिद॑ं राज्यं हृतसारां सुरामिवं 
नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम || अयो. 6/8 
25. क्रोशमात्रं ततोगत्वा नील प्रेक्ष्ष च काननमू। 
सल्लकी बदरी मिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनैः।। अयो. 55/8 
252. मन्त्रग्रामं गृहाणत्वं बलामतिबलां तथा। 
नश्रमो न ज्वरोवाते न रुपस्य विपर्ययः।। बा. 22/3 
253. बिल्वामार्दड्गका आसञ्शम्याग्राहा विभीतकाः। 
अश्वत्था नर्तकाश्चासन्‌ भरद्वाजस्य तेजसा ।। अयो. 9/49 
254. तस्मिन्‌ बिल्वाः कपित्थाश्व पनसा बीजपूरकाः। 
आमलकक्‍यो बभूवुश्च चूताश्व फलभूषिताः।। अयो. 9/30 
255. कुष्ठस्थगरपुन्नाग भूर्जपत्रोत्तरच्छदानू। 
कामिनां स्वास्तरान्‌ पश्य कुशेशय दलायुतानू।। अयो. 94/24 
256. केचिद्‌ रजतसंकाशाः केचित्‌ क्षतजसंनिभा:। 
पीतमांजिष्ठव्णश्च केचिन्मणिवरप्रभा:।॥ अयो. 94/5 
257. काश्मर्यारिष्ट वरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि। 
बदर्यामलकैर्नपिरवेत्रधन्चन बीजकैः ।। अयो. 94/9 
258. चिरिबिल्वा मधूकाश्च वंजुला बकुलास्तथा। 
रज्जकातिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः ।। यु. 4/79 
259. पश्य द्रोणप्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण। 
हि मधूनि मधुकारीभिः सम्भूतानि नगे-नगे।। अयो. 56/8 
260. पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च। 
मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरतः।। अर. 35/23 
267. केतक्यः सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च सुपुष्पिता:। 
माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च सर्वशः।। कि. /77 
'. शत वाहसहस्नाणां तण्डुलानां वपुष्मताम्‌। 
अयुतं तिलमुद्गस्य प्रयात्वग्रे महाबल ।। उ. 9/9 


350 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


24; 


[-] 


26: 


[<] 


263. मुचुकन्दार्जुनाश्वैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु । 

केतकोद्दालकाश्चैव शिरीषाः शिशंपा धवाः।। कि. /8 
264. चिरिबिल्वा मधूकाश्च वज्जुला बकुलास्तथा। 

रज्जकास्तिलकाश्वैव नागवृक्षाश्च॒ पुष्पिता:।। यु. 4/79 
265. स्यन्दनैश्चन्दनैर्नपिः पणसिर्लकुचैरपि । 

धवाश्वकर्णखदिरे: शमीकिंशुक पाटलै: ।। अर. 5/8 
267. तवापमान प्रभवः क्रोधोष्यमतुलो मम्‌। 

न शक्यते धारयितु लवणाम्भ इवोल्बणम्‌।। अर. 22/2 
268. लाजपूर्णैश्चि पात्राभिरक्षतैरपि संस्कृतैः। 

दर्भ: समैः समास्तीर्य विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्‌ ।। बा. 73/25 

शुक्लमाल्यानि लाजांश्च पृथक्च मधुसर्पिषी। 

अहतानि च वासांसि रथं सर्वायुधान्यपि । अयो. 3/9 
269. लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च। 

सदैव बिभूयाद्‌ भृत्यान्‌यस्यार्योजनुमते गतः।॥। अयो. 75/38 
270. अंलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ । 

अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभी ।। अयो. 60/8 
27]. आम्रजम्बवसनैलें्निः प्रियालैः पनसैर्धवैः । 

अड्डेलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुक वेणुभि:।। अयो. 94/8 
272. काश्मर्यारिष्ट वरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि । 

बदर्यामलकैर्नपैर्वेत्र धन्‍्चन बीजकैः ।। अयो. 94/9 
273. वानीरैस्तिमिदैश्वैव बकुलैः कैतकैरपि । 

हिन्तालैस्तिनिशैर्नपिर्वेतसैः कृतमालकैः ।। कि. 27/8 
274. काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि । 

बदर्यामलकैर्नपिवेत्र धन्‍चन बीजकैः ।। अयो. 94/9 
275. आजैश्चापि च वाराहैर्निष्ठानवरसंचयैः । 

फलनियूहसंसिद्धैः सूपैर्गन्धरसान्वितैः ।। अयो. 9/67 
276. हतदाः पूर्णा रसालस्य दछ्नः श्वेतस्य चापरे। 

बभूवुः पायसस्यान्ये शर्कराणां च संचया: ।। अयो. 9/75 
277. सचन्द्रकुमुदं रम्यं सार्ककारण्डवं शुभम्‌। 

तिष्यश्रवणकादम्बमभ्रशैवलशाद्चलम्‌ ।। सु. 57/2 
278. एवं लब्धवराः सर्वे भ्रातरो दीप्ततेजस:। 

श्लेष्मान्तकवनं गत्वा तत्र ते न्‍्यवसन्‌ सुखम्‌॥। उ. 0/49 
279. चन्दनागुरुनिर्यासान्‌ सरलं पद्मक तथा। 

देवदारुणि चाहत्य क्षेपयन्ति तथापरे।। अयो. 76/6 
280. क्रोशमात्र॑ ततो गत्वा नील प्रेक््य च काननम्‌। 

सल्लकी बदरी मिश्र रम्यं वंशैश्व यामुनैः।। अयो. 55/8 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 35 


28. मालती कुन्दगुल्मैश्व सिन्दुवारैः शिरीषकैः। 
कदम्बार्जुन सर्जैश्च पुष्पितिसपशोभितम्‌।। कि. 27/0 
282. उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च। 
अविद्वाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि ।। अयो. 7/4 
तृतीय परिच्छेद 
- अधिक शैलराजस्तु धातुभिस्तु विभूषितः। 
धातुभ्यः प्रसृतो रेणु्वायु वेगेन घंट््‌टतः ।। यु. 4/76 
2. धातुनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान्‌। 
तत्‌ क्षमो न विरोधस्ते सह तेन महात्मना।। कि. 5/श 
3. यु. 74/67 ह 
4. अशक्ता धारणे देव तेज स्तव समुद्धतम्‌। 
दाह्म मानाग्निना तेज संप्रव्यथित चेतना ।। बा. 37/6 
5. यदस्या निर्गतं तस्मात्‌ तप्त जम्बूनद प्रभम्‌। बा. 37/8 
कांचनं धरणीं प्राप्तं हिरण्य मतुल प्रभम्‌। 
ताम्र कार्ष्णायसं चैब तैक्ष््यादेवाभिजायत ।। बा. 37/9 
मल॑ तस्याभवत्‌ तत्र त्रपु सीसकमेव च। 
तदेतद्वरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ।॥। बा. 37/20 
6. जातरूपमितिख्यातं तदाप्रभृति राघवं। 
सुवर्ण पुरुषव्याप्र हुताशनसमप्रभम्‌..... ।। बा. 37/22 
7. सु. 3/8-0 
8. सुवर्ण वृंहणं स्निग्धं मधुरं रसपाकयो:। 
विषदोषहरं शीत सकषाय॑ रसायनमूं। अ. सं. सू. 2/2 
9. जाम्बूनदमयैद्रिवैदूर्यकृत वेदिकः।। सु. 3/8 
40. वज्रस्फटिक मुक्ताभिमंणिकृट्टिम भूषितैः। 
तप्तहाटकनिर्यूहै राजतामलपाण्डुरैः ।। सु. 3/9 
- स हेमजाम्बूनद चक्रवालं महाईमुक्तामणिभूषितान्तम्‌। 
परार्ध्यकालागुरुचन्दनां् स रावणान्तः पुरमाविवेश ।। सु. 4/30 
2. ततो ददर्शोच्द्धिमिघरूपं, मनोहरम्‌ कांचनचारूरूपम्‌। 
रक्षोडधिपस्यात्मबलानुरूपं, गृहोत्तमं हयद्यतिरूपरूपम्‌।। सु. 7/5 
 ततस्य रकक्‍्त॑ रकतेन रंजितं शुशुभे मुखम्‌। 
यथाञकाशे महापदूमं सिक्‍त॑ कांचनबिन्दुभि:।। सु. 44/9 
- हैमजाल परिक्षिप्तै्ध्वजवद्भि: पताकिभिः। 
तोयदस्वननिर्धषिवाजियुक्तैर्महारयैः ।। सु. 45/3 
5. यु. 0/5 
6. कांचन धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्‌। 
हि ताम्र॑ काषष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। बा. 37/9 
352 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


व 


. 


छ 


यु 


20. 


श. 


22. 


23. 


24. 


25. 


26. 


श्य 


28. 


हक 


30. 


3. 
32. 


33. 
* 34. 


. बा. 37/8 
« वैदूर्यकृतसोपानैः स्फाटिकान्तर पांसुभिः। 


चारुसंजवनोपेतैः खमिवोत्पतितैः शुभैः।। सु. 300 


.. वज्रस्फटिक मुक्ताभिर्मणिकृड्टिमभूषितैः । 


तप्तहाटकनिर्यूहै राजतामलपाण्डुरैः ।। सु. 3/9 

रुप्यं स्निग्धं कषायाम्लं विपाके मधुरं सरम्‌। 

वयसः स्थापनं शीतं लेखन वात-पित्तजित्‌।। अ. सं. सू. 2/3 
स्फाटिकैरावृततलां दन्तान्तरितरुपिकाम्‌। 

मुक्तावज़प्रवालैश्व रुप्यचामीकरैरपि ।। सु. 9/23 

सतिक्त लवण भेदि पांण्डुत्वकृमिवातनुत्‌। 

लेखन पित्तलं किचित्‌ त्रपु सीसं च तदगुणम्‌।। अ. सं. सू. 2/6 
मल तस्याभवत्‌ तत्र त्रपु सीसकमेव च। 

तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धघत्‌ ।। बा. 37/20 
ताम्रसतिक्तमधुरं कषायं लेखनं लघु। 

कडु पाक रसं शीतं रोपणं कफपित्तजित्‌।। अ. सं. सू. 72/4 
कांचनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्‌। 

ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिज़ायतू।। बा. 37/9 

चक्षुष्यं कृष्णलीहं च कषायं स्वादुतिक्तकम्‌। 

लेखन वातलं शीत॑ कृमिकुष्ठकफ प्रणुत्‌।। -अ. सं. सू. 2/7।। अ. सं. सू. 
2/8॥। ह 

द्वारेषु संस्कृता भीमाः कालायसमयाः शिता:। 

शतशो रचिता वीरैः शतघ्न्यो रक्षसां गणैः ।। यु. 3/3 

असिपत्र वने चैव भिद्यमानानधार्मिकानू। 

रोखे क्षारनद्यां च क्षुरधारासु चैव हि।। उ. 2/5 

काज्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्‌। 

ताम्रं का्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। बा. 37/9 

विशदो गैरिकः स्निग्ध: कषाय मधुरो हिमः। अ. सं. सू, 2/23 
अधिक शैलराजस्तु धातुभिस्तु विभूषितः। 

कषायं मघुरं शीतं लेखन स्निग्धमज्जनम्‌। 

(धातुभ्यः प्रसृतो रेणुवायुवेगेन घट्टितः।। यु. 4/76) 

रक्तपित्त विषच्छर्दिहिध्माघ्नं दृकू प्रसादनमम्‌॥। अ. सं. सू. 2/25 
स्रोतोष्ज्जनं वरं तत्र ततः सौरवीरकाञ्जनम्‌। 

कफष्नं तिक्तकटुक छेदि सोष्णं रसाञ्जनम्‌।। अ. सं. सू. 2/26 
कफध्नी तिक्तकटुका मनोह्मा लेखनी सरा। अ. सं. सू, 2/24 
समालम्भन मादाय गोरोचनं मनः शिलाम्‌। 

आजम्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्याश्च षोडश ।। कि. 26/28 


वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध परिचय एवं.... / 353 


35. 


39. 


40. 


है. 


42. 


43. 


44. 


45. 


46. 


पदूमराग महानील पुष्पराग विदूरकाः 

मुक्ताविद्वम वज़ेन्दवैदूर्यस्फटिकादिकम्‌ ।। अ. सं. सू, 2/9 
मणिरत्न सरशीतं कषायं स्वादु लेखनमू। 

चक्षुष्यं धारणातत्सु पापालक्ष्मीविषापहमू। अ. सं. सू, 2/20 
धन्यमायुष्यभोजस्व॑ हर्षोत्साहकरं शिवम्‌। अ. सं. सू. 2/2॥ 


« जाम्बूनदमयैद्वरिवैदूर्यकृतवैदिकैः ।। सु. 3/8 
कप. 


वज्ञस्फटिकमुक्ताभिर्मणिकुट्टिम भूषितैः । 
तप्तहाटक निर्यूहै राजतामल पाण्डुरैः।। सु. 3/9 


« वज्स्फटिक मुक्ताभिर्मणिकृड्टिम भूषितै:। 


तप्तहाटकनिर्यूह़े राजतामल पाण्डुरैः॥। सु. 8/9 

निवेशनानां विविधाश्चशाला:, प्रधानशड्खायुधचापशाला:। 
मनोहराश्चापि पुनर्विशाला, ददर्शवेश्माद्रिषु चन्द्रशालाः।। सु. 7/2 
कृताश्च वैदूर्यमया विहड्‌ूगा, रुप्यप्रवालैश्व तथा विहड्गा। 
चित्राश्च नानावसुर्भिर्भुजड्गा, जात्यानुरुपास्तुरगा: शुभाड्गा: ।। सु. 722 
महोर्मिमालाविततः शड्खशुक्ति समावृतः। 

सधूमः परिवृत्तोर्मि सहसासीन्महोदधिः।। यु. 27/29 
विशल्यकरणीं नाम्ना सावर्ण्यकरणीं तथा। 

संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीमू।। यु. 0/82 

त्रिषु लोकेषु वा राम न भवेत्‌ सदृशस्तव। 

बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव।। बा. 22/5 

ऐणेयं मांसमाहत्य शालां यक्ष्यामहे वयम्‌। 

कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभि: ।। अयो. 56/22 
तथाद्यात्तमिदं राज्यं हतसारां सुरामिव। 

नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्यरम्‌ ।। अयो. 6/8 

चन्द्रश्च नाम द्रोणश्च क्षीरोदे सागरोत्तमे। 

अमृत यत्र मथितं तत्र ते परमौषधी ।। यु. 50/37 


354 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


पंचम परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण 





(॥) शारीरिक कारण 
वात, पित्त, कफ, असालन्द्रियार्थ संयोग आदि। 

शरीर में पंचमहाभूतों के विकार वायु आदि त्रियोग, रसादि सप्तधातु एवं पुरीषादि 
मल के रूप में विद्यमान हैं। वे (दोष, धातु, मल) शरीर के मूल माने गये हैं। सुश्रुत,' 
अष्टाड संग्रह* एवं अष्टाइ़ हृदय* आदि ग्रन्थों में भी यही वर्णन मिलता है। 

शरीर की समस्त क्रियाओं का उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना ही है। इसके लिये 
इन सब क्रियाओं में परस्पर तालमेल रहना आवश्यक है। यदि किसी एक क्रिया में 
विकृति आती है तो उसका विपरीत प्रभाव अन्य शारीरिक क्रियाओं पर भी पड़ता है। 
शरीर की इन क्रियाओं का ठीक प्रकार से सम्पन्न न होने का नाम ही व्याधि है। 
शारीरिक क्रियाओं में दोषों की प्रमुखता को प्रकट करने के लिए आचार्यों ने शरीर को 
“ब्रिस्थूण” के ऊपर आधारित कहा है।' 
बात (वायु) 

उच्छवास, निःश्वास, उत्साह, प्रस्पन्दन, इन्द्रिय-पाटव, वेग प्रवर्तन, आदि कार्यों से 
शरीर का उपकार करती है। 
पित्त 

पक्ति, (पाचन) ऊष्मा, अभिलाषा, श्वुधा, पिपासा, प्रभा, कान्ति, प्रसाद, दर्शन, 
मेधा, शौर्य, मार्दव आदि से शरीर का उपकार करती है। 


कफ 

स्थैर्य, स्नेह, सन्धि-बन्धन, वृषता, क्षमता, धी, बल, अलोक्य आदि से शरीर को 
अनुगृहीत करता है। शरीर की क्रियाओं में तालमेल उसी समय तक बना रह सकता 
है जब तक कि प्रत्येक का कार्य-क्षेत्र पृथकू-पथक्‌ हो। शरीर में ऐसा ही होता है। 
यद्यपि वात, पित्त एवं कफ शरीर की क्रियाओं के जनक हैं, परन्तु प्रत्येक का कार्य एवं 
क्षेत्र पृथक्‌-पृथक्‌ है। 
बात 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 355 


महर्षि अग्निवेश ने वायु का प्राकृत कर्म उत्साह, उच्छवास, निःश्वास, चेष्टा-धातु 
आदि को बताया है? 

वायु तन्त्र रूपी यन्त्र को धारण करता है। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान 
स्वरूप विविध चेष्टाओं का प्रवर्तक, मन का नियंत्रक एवं प्रवर्तक, सभी इन्द्रियों को 
उनके अपने-अपने विषयों तक एवं विषय प्रतीति को मस्तिष्क तक पहुँचाता-है। शरौर 
के सभी धातुओं का व्यूह करता है अर्थात्‌ एक दूसरे'के साथ गूँये रखता है। शरीर 
का सन्धान अर्थात्‌ सभी अवयवों को परस्पर संयुक्त करता है। वाणी का प्रवर्तक है, 
शब्द एवं स्पर्श का प्रकृति अर्थात्‌ कारण है। श्रवणेन्द्रिय एवं स्पर्शन्द्रिय का उपादान 
है। शरीर में हर्ष, उत्साह को जन्म देता है। जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। वृद्ध पित्त 
एवं कफ का शोषण करता है, मूत्र-पुरीषादि मलों को बाहर निकालता है। स्थूल एवं 
अणु ख्रोतसों का भेदन करके उनमें प्रवेश करता है। गर्भ की आकृतियों को करने 
वाला है। इस प्रकार अकुपित वायु आयु के परिपालन में कारण होता है।* 

सुश्रुत के अनुसार प्राकृत वायु मन सहित इन्द्रियों को उनके विषयों के साथ 
संयुक्त करता है। दोष, धातु एवं अग्नियों को विकार रहित अवस्था में रखता है। तथा 
अनुलोम क्रियाएँ करता है। आधुनिक दृष्टि से वात का प्राकृत कर्म नाड़ी संस्थान तथा 
इन्द्रिय व्यापार के समान कहा जा सकता है।? 
।. प्राणवायु 

मस्तिष्कान्तर्गत वायु तत्व को जो इन्द्रियों द्वारा रूप, रस, स्पर्श, शब्द, गंध आंदि 
को ग्रहण करता है। चिन्तन, मनन, ऊहापोह, निर्धारण आदि का कार्य करता है। 

- आहार पान को (५४४०७) द्वारा निकालने का कार्य करता है। (श्वास केन्द्र द्वारा) 

श्वास लेने का कार्य करता है, प्राण वायु कहते हैं। कहा भी है-'प्राणोज्अमूर्धनि' 
(वाग्भट) तथा “हदि प्राण:” (शार्डगधर)। 
2. उदान वायु 

फुफ्फुस तथा कण्ठ की उस वायु को जो भाषण और यत्न के" साथ काम करता 
है, उदान वायु कहते हैं। 
$. समान वायु 

पाचक स्थान में विद्यमान वायु को, जो पाचक सरसों को प्रवृत्त करने का काम 
करता है, समान वायु कहते हैं। / 
4. अपान वायु 

वस्ति स्थान में स्थित उस वायु को जो मलनमूत्र को प्रवृत्त करता है, अर्थात्‌ 
(एक्षकाण्‌०१०११० १०४९ ?७॥ में स्थित है, अपान कहते हैं। 
5. व्यान वांयु 

अनैच्छिक नाड़ी मण्डल #ए्ाणा०गरां० )प. 5एशथा। के स्थान मस्तिष्कगत 
(प्/9४॥शभ॥५७) में विद्यमान उस धातु को जो रक्त-लसीका के संचार को तथा. 
मांस पेशियों में होने वाली ऐच्छिक, अनैच्छिक चेष्टाओं को उत्पन्न करने का कार्य 
करता है, व्यांन वायु कहा है। 


356 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


प्रत्येक सेल में जो कार्य हो रहा है वह वायु तत्व के कारण संचालित हो रहा है। 
तथापि नाड़ी मण्डल (५. $/४०॥) को उसका प्रधान स्थान कहा है। 

शरीर का यह वायु तत्व बल-प्रद, आहार, विश्राम, निद्रा, मानसिक शान्ति, 
प्रसन्‍नता आदि भावों से प्रबल रहता है। पित्त कां पचन कर्म, कफ का वृद्धि कर्म ठीक 
रहे तो भी वायु तत्व को बल मिलता है। वायु तत्व के सम अवस्था में रहने से शरीर 
स्वस्थ रहता है। आयु दीर्घ होती है। 

शरीर की जीवनी शक्ति के निर्बल हो जाने से जो लक्षण हो जाते हैं, उन्हें वायु 
रोग या वायु प्रकोप कहते हैं। इस अवस्था का प्रधान लक्षण शारीरिक या मानसिक 
चलता या विक्षोभ शीलता है अर्थात्‌ जब किसी अंग को रक्त, ऑक्सीजन या आहार 
द्रव्य कम मिलते हैं तो उसमें चलता, वेदना, चमचमाहट, सुप्ति आदि लक्षण होने लगते 
हैं। इन लक्षणों से वायु रोग का अनुमान होने लगता है। 

जिस अंग में वायु तत्व का हास होता है उसमें क्षीणता के सूचक लक्षण होने 
लगते हैं अर्थात्‌ उस अंग में रुक्षता खरता की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। उस अंग के 
सेलों में न्‍्यूनता होने लगती है। अर्थात्‌ वहाँ लघुता की विकृति भी होने लगती है उस 
अंग में तापमान की न्यूनता भी हो सकती है अर्थात्‌ कुछ शीतता का लक्षण भी हो 
सकता है। उस अंग में चीटियों के चलने की सी प्रतीति, चमचमाहट आदि लक्षण होने 
लगते हैं। ये लक्षण वायु विकृति के सूचक होते हैं। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि शारीरिक रोगोत्पत्ति का एक प्रमुख कारण वात है। 

वाल्मीकि रामायण में “वात” दोष का विशद्‌ वर्णन मिलता है। 

राजा क़ुशनाभ की सौ कन्याएँ वात दोष के प्रकुपित होने के कारण ही कुब्जता 
को प्राप्त हुई थीं। इसकी विस्तृत समीक्षा “वात रोग” षष्ठ परिवर्त में प्रस्तुत है। अतः 
यहाँ इसकी संक्षेप में ही समीक्षा की जा रही है। 

राज़ा कुशनाभ की सौ कन्याएँ, जो अति सुन्दरी थीं, उद्यान में विहार करने गयीं। 
उनकी सुन्दरता पर वायु देव मोहित हो गये तथा उनके समक्ष प्रणय-प्रस्ताव रखा। उन 
कन्याओं ने उस प्रस्ताव पर अपनी अस्वीकृति प्रदान की तथा कहा कि वे अपने पिता 
के आधीन हैं, पिता जिसे चाहेंगे, उसे सौंप देंगे। इस बात से कुपित हुए वायु देव 
ने उन सबको कूबड़ी बना दिया। बाद में उनके पिता के प्रयास से वे सभी कुब्जत्व 
दोष से मुक्त हुईं 

इसके अतिरिक्त रामायण में एक और वर्णन भी मिलता है-शिशु हनुमान पर 
इन्द्र द्वारा वज्र का प्रहार करने से क्रुद्ध हुए वायु देव ने प्रजा में रहकर अपनी गति 
संकुचित कर ली। श्वास आदि के रूप में संचार रोक लिया। वायुदेव ने प्रजा के 
मलाशय को रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा दी। उन्होंने सम्पूर्ण भूतों में वायु का संचार 
अवरुद्ध कर दिया। वायु के प्रकोप से समस्त प्राणियों की सांस बन्द होने लगी, उनके 
सभी अंगों के जोड़ टूटने लगे और वे सभी काठ के समान चेष्टा-शून्य हो गये। लोगों 
के नित्य-कर्म बन्द हों गये और वे पीड़ा के मारे कराहने लगे। 

वायु के क्रुद्ध होने पर देवों के भी पेट इस प्रकार फूल गये थे मानो उन्हें महोदर 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 357 


रोग हो गया हो। वायु देव आयु क अधि-पति जो हैं, प्राणों के ईश्वर हैं। परन्तु संचार 
रोकने पर प्राणियों तथा देवों पर उसका प्रतिकूल प्रभाव होने लगा। देवों ने ब्रह्मा से 
प्रार्थना की कि वे वायुदेव को प्रसन्न करें। इस पर प्रह्मा ने उनसे कहा- 

वायु देव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरों में उनकी रक्षा करते हुए 
विचरते हैं। वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत 
है। वायु से परित्यक्त होकर जगत कभी सुख नहीं पा सकता। वायु ही जागतू की 
आयु है। इस समय वायु ने संसार के प्राणियों को त्याग दिया है इसलिये वे सबके सब 
निष्थ्राण होकर काठ और दीवार के समान हो गये हैं। तदनन्तर वायु देव को ब्रह्मा-ने 
प्रसन्न किया और सभी जगत सुखी हुआ ।* 

उपरोक्त विवरण में वायु के प्रभाव को भली प्रकार से स्पष्ट किया गया है। इस 
प्रकार रामायण में वायु धातु तथा वायु दोष और साधारण वायु का वर्णन मिलता है, 
जो आयुर्वेद के विशाल-साहित्य को विस्तृत करता है। 
पित्त न 
महर्षि चरक ने पित्त का प्राकृत कर्म बतलाया है-दर्शन पंक्ति शरीर में ऊष्मा का 
नियमित रखना, भूख, प्यास, शरीर में कोमलत्ता, कान्ति, मन की प्रसन्नता तथा मेधा 
को बनाये रखना पित्त का कार्य है" सुश्रुत के अनुसार पित्त अपनी सिराओं में गति 
करता हुआ भ्राजिषणुता, अन्न में रुचि, अग्नि की प्रदीष्ति तथा आरोग्य को उत्पन्न. 
करता है। आधुनिक दृष्टि से पित्त का प्राकृत कर्म शरीर में होने वाली सभी 
रासायनिक क्रियाओं तथा पाचक रस के समान कहा जा सकता है।" 

शरीर का दूसरा मूल-तत्व देहाग्नि या पित्त-तत्व है। आहार पाक-धातु पाक और 
मल-पाक का मूल-प्रवर्तक यही है। इसी के कारण शरीर के सेलों में सैकड़ों 'पाचक 
रस' '2/77»' उत्पन्न होते हैं जो शरीर व्यापी पाचन प्रक्रिया अर्थात्‌ !(०४७०४5चा 
का संचालन करते हैं। इन पाचक रसों द्वारा आहार द्रव्य साधारण द्रव्यों में परिवर्तित 
हो जाता है। फिर इन साधारण द्रव्यों के मिलने से शरीर के मांस आदि धातु उत्पन्न 
होते हैं फिर मांस आदि धातुओं का पाचक रसों द्वारा पाक होता है जिससे. मल उत्पन्न 
होते हैं, फिर इन मलों का पाचक रसों द्वारा पाक होता है जिससे वे साधारण द्रव्यों 
में परिवर्तित होकर श्वास, स्वेद, मल-मूत्र आदि द्वारा शरीर से बाहर फेंक दिये जाते 
हैं। इस प्रकार देहाग्नि शरीर को स्वच्छ, सुन्दर और निर्मल बनाये रखती है। 

देहाग्नि के इस पचन-कर्म से उत्पन्न ऊष्मा के कारण शरीर गर्म रहता है तथा इस 
पचन कर्म के रासायनिक परिवर्तन से उत्पन्न शक्ति (आथ89) के द्वारा वायु तत्व को 
बल मिलता है। 

शरीर का यह पित्त तत्व सम अवस्था में रहे तो शरीर की ऊष्गा ठीक रहती है, 
भूख-प्यास ठीक लगती है, त्वचा की कांति ठीक बनी रहती है, नेत्रों की दृष्टि ठीक 
रहती है, रक्त स्वच्छ रहता है, मस्तिष्क में हर्ष, प्रसाद और शूरता के भाव रहते हैं, 
बुद्धि निर्मल रहती है। 5५ कर 

शरीर की पित्ताग्नि को ठीक रखने के लिये आवश्यक है कि आहार सुपच हो, 


358 / वाल्मीकि रामायंण तथा आयुर्वेद 


मात्रा में थोड़ा हो, अति शीत, अति रुक्ष, अति स्निग्ध न हो, नियत समय पर लिया 
जाए। व्यायाम तथा शारीरिक श्रम से पित्ताग्नि प्रबल रहती है। 

शरीर का कोई अवयव क्षत हो जाता है तो उस क्षत प्रदेश के पाचन (0.00८९- 
०) के लिये स्वभावतः देहाग्नि प्रबल होती है। शरीर के अवयवों में क्षत सवसे 
अधिक जीवाणुओं या ५॥७६०४ के कारण होता है, ऐसी अवस्था में जब शरीर में 
पित्त-वृद्धि होती है तब ज्वर, दाह, पिपासा, स्वेद, रक्‍्त-क्षय आदि लक्षण हो जाते हैं 
जिन्हें पित्त-वृद्धि का लक्षण कहते हैं। यह पित्त वृद्धि जीवाणुओं के विनाशार्थ उनके 
#ध750065 को उत्पन्न करने के लिये होती है। रोग के कारण भूत जीवाणु जब 
नष्ट हो जाते हैं तब पित्त-वृद्धि शान्त हो जाती है। इस प्रकार वस्तुतः ज्वर या 
पित्त-वृद्धि शरीर की रक्षा के लिये होती है। 

पित्त-वृद्धि के रोगी की शक्ति को बढ़ाने के लिये उसे पूर्ण विश्राम देना चाहिये। 
उसे सुपच पौष्टिक आहार मिलना चाहिये, ताकि उसकी जीवाणु निवारक शक्ति बढ़े। 
औषध भी उसे शक्ति-वर्धक ही मिलनी चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में 'पित्त” का भी वर्णन उपलब्ध होता है। रामायण में सीता की 
अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है-“जनकनन्दिनी सीता के मुख पर आँसुओं 
की धारा वह रही थी। उन्होंने अपना मुख नीचे की ओर झुका लिया था। वे उपर्युक्त 
बातें कहती हुई ऐसी जान पड़ती थीं मानों उन्मत्त हो गयी हों-उन पर भूत सवार हो 
गया हो अथवा पित्त बढ़ जाने से पागलों का सा प्रलाप कर रही हों अथवा दिग्भ्रम 
आदि के कारण उनका चित्त भ्रान्त हो गया हो। वे शोक-मग्न हो धरती पर लोटती 
हुई बछेड़ी के समान पड़ी-पड़ी छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में सरल हृदया सीता 
ने इस प्रकार विलाप करना प्रारम्भ किया” ।॥* 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 
पित्त-प्रकोप का उल्लेख किया गया है। 
कफ 

प्राकृ कफ का कर्म महर्षि 'चरक' ने बताया है-शरीर में स्निग्धता बनाये 
रखना, सन्धियों को सुसम्बद्ध रखना, शरीर स्थिर, शरीर में गुरुता, बल को स्थिर 
रखना, क्षमा, धैर्य और अलोभ कफ का प्राकृत कर्म है।* 

महर्षि 'सुश्रुत' के अनुसार अपनी शिराओं में गति करता कफ अंगों में स्निग्धता, 
सन्धियों में स्थिरता, बल, सामर्थ्य और अन्य गुणों को उत्पन्न करता है।' 

आधुनिक दृष्टि से कफ का सामान्य कर्म शरीर संश्लेषण तथा उदक कर्म अर्थात्‌ 
जल से सींचने के समान शरीर को आप्लावित करना है। 

शरीर का तीसरा मूल तत्व कफ है। इस वृद्धि तत्व के कारण शरीर के अवयवों 
में वृद्धि, रोहण, रोपण; रक्षण आदि कर्म होते हैं। शरीर में किंसी क्षत के होते ही तुरन्त 
उसका रोहण आरम्भ हो जाता है। यदि किसी अवयव में जीवाणु आक्रमण“करता है 
तो वहाँ रक्षण-कर्म  १॥॥॥७७७।०४ (0950॥9. [./5०2५॥० आदि की उत्पत्ति के रूप 


में) आरम्भ ? जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 359 


इस तत्व के कारण शरीर और मस्तिष्क में उचित विकास होता है। शरीर परिपुष्ट 
होता है। मस्तिष्क में बुद्धि का विकास होता है। मन में उत्साह*का उदय होता है। 
ज्ञान शक्ति, सहन शक्ति और धीरता के गुण उत्पन्न होते हैं। शरीर में जो स्थिरता, 
दृढ़ता, श्लिष्टता, स्निग्धता के गुण हैं, वे कफ तत्व के कारण हैं। 
- मुख तथा जिह॒वा में जिस कफ तत्व के कारण रस का बोध होता है उसे रस 
बोधक श्लेष्मा कहते हैं। 
आमाशय में जो श्लेष्मा, अन्न का क्लेदन करता है, उसे क्लेदन श्लेष्मा कहते हैं। 
फुफ्फुस में जो क्लेदन का कारण है, उसे अवलम्बक श्लेष्मा कहा है। 
सन्धियों, कण्डराओं और संधियों की यैलियों में जो चिकना द्रव्य रहता है उसे 
सन्धि श्लेषक श्लेष्मा कहा जाता है। 
5. मस्तिष्क के अन्दर विद्यमान स्नेहन, रक्षण आदि कार्य करने वाले द्रव (ए७८- 

७॥०५/७४॥० &७४४) को इन्द्रियतर्पक श्लेष्मा कहा है। 

इस कफ तत्व का पोषण, पोपक आहार, विश्राम, निद्रा, निश्चिन्तता, प्रसन्‍नता, 
वीर्यरक्षा आदि के द्वारा होता है। 

स्वास्थ्य कफ और पिन्त के सन्तुलन पर निर्भर है। कफ तत्व आहार के द्वारा प्राप्त 
“कैलगंज' से शरीर के अवयवों का निर्माण करता है। पित्त तत्व आहार के द्वारा प्राप्त 
“कैलरीज” को खर्च करता है। 

इस प्रकार कफ और पित्त एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं। इन दोनों के 
संतुलित रूप में कार्य करने से शरीर स्वस्थ रहता है। यदि शरीर में व्यय अधिक और 
आय कम हो जाये तो उसे पित्त-वृद्धि या पित्त-प्रकोप की अवस्था कहते हैं। ज्वर में 
ऐसा ही होता है। इसके विपरीत यदि शरीर में आय अधिक और व्यय कम हो अर्थात्‌ 
कफ कर्म अधिक और पित्त कर्म कम हो तो उसे कफ-वृद्धि, कफ प्रकोप या कफ 
रोग की संज्ञा देते हैं। इसे अग्नि या पित्त की मंदता भी कहते हैं। इस प्रकार जितने 
भी कफ रोग हैं, उनका कारण अग्नि की मंदता है। 

अग्नि की मंदता से होने वाले रोगों के लिये लंघन, अर्ध-लंघन, परिमित आहार, 
लघुरुक्ष, उष्णगुण आहार, शारीरिक श्रम, स्वेदन, वमन, विरेचन, कटुतिक्त, कषाय रस 
प्रधान औषधियों का सेवन उपयोगी है। 

प्रकृति भी आयुर्वेद में तीन प्रकार की कही गयी है । जिनमें जन्म से ही प्राणतत्व 
या जीवनीय तत्व की निर्बलता है उसे वातिक (५७॥०॥०) प्रकृति का कहा है। जिनमें 
जन्म से अग्नितत्व की प्रबलता है उसे पित्त प्रकृति (७॥2७॥॥८०) का कहा है। जिनमें 
जन्म से अग्नि तत्व की निर्बलता है उसे श्लैष्मिक प्रकृति का कहा है। उस-उस प्रकृति 
वाले में उस-उस रोग के होने की प्रवृत्ति रहती है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कफ तत्व का उल्लेख मिलता है। राक्षस राज सुकेश के 
तीनों पुत्रों की तुलना वात-पित्त एवं कफ इन तीन से की गयी है।5 

इस प्रकार स्पष्ट है कि सभी रोगों का एक मात्र कारण वातादि तीनों दोष ही हैं। 
जैसे पक्षी नदी, वन, समुद्र आदि सब स्थानों पर दिन भर उड़ता हुआ भी अपनी छाया 


560 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


७०४ ७ 


का अतिक्रमण नहीं करता है अथवा जैसे इस विश्व का समस्त विकार समूह नाना रूप 
में व्यवस्थित होता हुआ भी सत्व, रज, तम इन तीनों से अलग नहीं हो सकते जैस- 
विद्युत, वर्षा, इन्द्रधनुष आदि आकाश में रहने पर भी बिना कारण दिखाई नहीं पड़ते, 
वातावरण रूप निमित्त कारण से अवश्य दिखाई देते हैं, उसी प्रकार रोग भी दोषों में 
सदा रहने पर असात्म्य आदि निमित कारणों के बिना दिखाई नहीं पड़ते ॥* 

वाल्मीकि रामायण में भी तीनों दोषों से ही समस्त रोगों की उत्पत्ति को स्वीकार 
करते हुए कहा गया है- 

वे तीनों लोकों के समान सुस्थिर, तीन अग्नियों के समान तेजस्वी, तीन मंत्रों के 
समान उग्र तथा तीन रोगों के समान अत्यन्त भयंकर थे। सुकेश के वे तीनों पुत्र 
त्रिविध अग्नियों के समान तेजस्वी थे। वे वहाँ उसी तरह बढ़ने लगे, जैसे उपेक्षावश, 
दवा न करने से रोग बढ़ते हैं।'” 
असात्प्येन्द्रियार्थ संयोगादि 

अष्टाड़ संग्रहकार के अनुसार रोगों के कारण तीन प्रकार के होते हैं- 
. असाल्पेन्द्रियार्थ संयोग... 2. प्रज्ञापाध 3. परिणाम ।४ 

पुनः इन तीनों में प्रत्येक के कारण अतियोग, अयोग एवं मिथ्यारोग भेद से तीन 
प्रकार के होते हैं। इनमें चक्षु आदि इन्द्रियों का रूप आदि विषयों से अत्यधिक संयोग 
अतियोग है। स्वल्प अथवा बिल्कुल भी संयोग न होना अयोग है, अति सूक्ष्म, अति 
दूर, अति निकट, अत्यन्त भास्वर, अति भैरव, अत्यन्त अप्रिय और विकृत आदि 
वस्तुओं का दर्शन चक्षु इन्द्रिय का रूप के साथ मिथ्या-योग है। 

निन्दित, बहुत ऊँचा, कठोर, भीषण आदि शब्दों का सुनना, श्रोत्रेन्द्रिय का अपने 
विषय के साथ मिथ्या-योग है। पूति (दुर्गन्धित) अमेध्य, अतितीक्ष्ण, उग्र-प्रतिकूल 
आदि गंधों का सूंघना अपने विषय के साथ मिथ्या-योग है। स्नान आदि शीत, उष्ण 
आदि स्पर्श का विपरीत प्रकार से सेवन न करना, अपवित्र भूत (प्राणियों) का 
अभिषघात्‌ (दंश), विषैले वायु आदि का संस्पर्श, स्पर्शेन्द्रिय का अपने विषय के साथ 
मिथ्या-योग है।४ 
प्रज्ञापाध 

“अष्टांग संग्रह” के अनुसार-शरीर-वाणी और मन इन तीनों के द्वारा किया जाने 
वाला अहित कर्म प्रज्ञापाध है।* 

इनमें शरीर, वाणी और मन द्वारा किये हुए कार्यों की अति प्रवृत्ति अतियोग है, 
अल्प प्रवृत्ति अथवा सर्वथा अप्रवृति अयोग कहा जाता है। मल, मूत्र आदि वेगों का 
उदीरण अथवा धारण, स्खलन, कण्डूयन, प्रहार, प्राणयाम्‌ आदि शरीर के मिथ्या-योग 
हैं। भूख-प्यास, खाते समय बोलना आदि वाणी के मिथ्या योग तथा भय, शोक, ईर्ष्या, 
मात्यर्स आदि मन के मिथ्या योग हैं। दशविध निन्दित कर्म, हिंसा, चोरी, अगम्य स्त्री 
गमन, पैशून्यता, पुरुषता, असत्य बोलना, सम्भिन्‍नालाप, व्यापद, अभिधा (पद, धन 
की इच्छा), दृगविपर्यय, शरीर, वाणी और मन के मिथ्या योग हैं।! 
परिणाम 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 36। 


परिणाम काल को कहते हैं”? अर्थात्‌ शीत, उप्ण, वर्षा भेद से तीन प्रकार का होता 
है। ग्रीप्म आदि ऋतुओं में अपने स्वाभाविक लक्षणों से उप्णता आदि का अधिक होना 
काल का अतियोग कहलाता है, अपने लक्षणों से हीन होना हीन योग अथवा अयोग 
कहलाता है तथा ग्रीष्मादि ऋतुओं में अपने लक्षणों के विपरीत शीत आदि का होना 
मिथ्या योग कहलाता है। ये सब अतियोग, अयोग तथां मिथ्या योग आदि सामान्य 
रूप से शरीर के लिये अनुपशय (अहित) होते हैं और इन सब से न बचना प्रज्ञापराध 
है। अर्थ, कर्म एवं काल का सम्यक्‌ योग उपशम होने से स्वास्थ्य का कारण होता 
है। इनमें भी रस नामक विषय को छोड़कर शेष चारों विषय गन्ध, शब्द, स्पर्श, रूप 
अपने-अपने इन्द्रियों को अतियोग, अयोग तथा मिथ्या योग से पीड़ित करते हैं और 
सम्यक्‌ योग से अपने-अपने इन्द्रियों का उपचार करते हैं तथ रस नामक विषय (अर्थ) 
कर्म तथा काल के अतियोग, अयोग तथा मिथ्या योग से सम्पूर्ण शरीर को हानि 
पहुँचाते हैं और, सम्यक्‌ योग से सम्पूर्ण शरीर का उपकार करते हैं। 

इसके अतिरिक्त “माधवनिदान” की मधुकोष टीका में निम्नलिखित कारण व्याधि 
के वताये गये हैं- 
. सन्निकृष्ट हेतु, विप्रकृष्ट हेतु, व्यभिचारि हेतु तथा प्राधानिक हेतु। 
2. दोष हेतु, व्याधि हेतु एवं उभय हेतु। 
3. उत्पादक हेतु एवं व्यंजक हेतु। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में शारीरिक रोगोत्पति' का कारण 
वात-पित्त एवं कफ (त्रिदोष) को बताया गया है। 
(0) मानसिक कारण 

काम, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, लोभ, रजोगुण-तमोगुण आदि 

जिस प्रकार वात-पित्त एवं कफ ये तीन शरीर दोप हैं, इसी प्रकार मन को 
प्रभावित करने वाले रज एवं तम मानसे दोष हैं।# 

वास्तव में मन को प्रभावित करने वाले तीन कारण हैं, सत्व, रज एवं तम। परन्तु 
सत्वगुण स्वयं विशुद्ध है अतः उसके द्वारा मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं 
हो सकता है शेष दोनों गुण रज एवं तम हीं मन को विकृत करते हैं। इसीलिये मानस 
दोषों में इन्हीं दोनों की गणना की जाती है| तर्क के लिये यदि सत्व को अविकारी माने 
तो परिणाम यह होगा कि मन कभी भी विकार रहित स्थिति को प्राप्त नहीं होगा। उस 
पर तीनों गुणों में किसी न किसी का प्रभाव बना रहेगा और वह. सदैव विकृत स्थिति में 
रहेगा। विना अविकारी मन के यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति असम्भव है और यथार्थ ज्ञान रहित 
व्यक्ति के लिये मोक्ष असम्भव है। अतः सत्व गुण क॑ द्वास मन की विकृति नहीं होती 
है। जब तक मोक्ष की स्थिति नहीं आती तव तक रजोगुण एवं तमोगुण में जो प्रबल होगा 
मन पर प्रभाव डलेगा और उनके अनुसार मन बिकृत होगा। मन के इन विकारों को 
“मानस विकार' एवं कारण रज एवं तम को 'मानस दोष” कहते हैं। 

मानस दोषों से उत्पन्न विकार हैं-काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार, 
अभिमान, शोक, चितक्त-ग्लानि. भय हर्ष आदि। 


362 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मानस विकारों में पहले मन विकृत होता है और फिर उसके प्रभाव से शरीर दोप 
भी विषम हो शरीर में भी विकृति उत्पन्न करते हैं। यदि मन को विकृत करने वाले 
कारण हट जाते हैं तो सामान्यतः शरीर में विकार स्वयमेव नप्ट हो जाते हैं तो इसी 
प्रकार यदि वात-पित्त कफ आदि में किसी भी भी असाम्यावस्था से शारीरिक विकार 
उत्पन्न होते हैं तो उनके प्रभाव से मन में भी विकार उत्पन्न होने की सम्भावना से 
इन्कार नहीं किया जा सकता है तथा शारीरिक विकार के कारणों के नष्ट हो जाने से 
मानसिक असंतुलन भी संतुलित हो जाता है। £ 

वात-पित्त एवं कफ की साम्यावस्था शारीरिक क्रियाओं के स्वाभाविक सम्पादन 
को तथा असाम्यावस्था शरीर में भौतिक, जैविक, एवं रासायनिक क्रियाओं में विकार 
को इंगित करते हैं। इसी प्रकार रज एवं तम की साम्यावस्था मानसिक क्रियाओं में 
संतुलन को तथा इनकी असाम्यावस्था मानसिक विकारों को इंगित करते है। धातुओं 
(दोषों) की विषमता को “विकार” कहते हैं तथा इनकी समता को “आरोग्य” कहते हैं। 
आरोग्य का नाम सुख है तथा विकारों का नाम दुःख है।” 
असाम्यावस्था के कारण 

शरीर एवं मानस दोनों प्रकार की असाम्यावस्था (विषमताओं) के तीन प्रधान 
कारण हैं। 

. असाल्पेन्द्रियार्थसयोग 2. प्रज्ञापाध.. 3. परिणाम 
- असास्प्येन्द्रियार्थसंयोग 

इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ असात्मय संयोग होना। असात्म्य संयोग का 
अर्थ है इन्द्रियों का अपने-अपने विषय के साथ समयोग न होकर अतियोग, अयोग 
अथवा मिथ्या योग का होना। 
2-प्रज्ञापाध 

प्रज्ञा के अन्तर्गत धी (निश्चयात्मक बुद्धि) धरृति (धारणात्मक बुद्धि), स्मृति का 
समावेश है। इनका अतियोग, अयोग अथवा मिथ्या-योग होना प्रज्ञापाध का कारण 
होता है। 
3-परिणाम 

काल (ऋतु जन्य अथवा वातावरण जन्य काल) का अतियोग, अयोग अथवा 
मिथ्यायोग होना। 

वाल्मीकि रामायण में भी मानसिक रोगोत्पत्ति के सभी कारणों काम-क्रोध आदि 
का उल्लेख किया गया है। रामायण में जहाँ भी अस्वस्थ शब्द का प्रयोग हुआ है वहाँ 
शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की अवस्था के लिये हुआ है। काम-क्रोध 
आदि विकारों का उल्लेख इस प्रकार हैं- 
काम 

महर्षि वाल्मीकि इस बात को बहुत अच्छी तरह- जानते थे, इसलिये उन्होंने 
“काममोहपरीतस्य”” कहकर काम के द्वारा मोह और मोह से उन्माद तथा तदन्तर 
मूर्च्छा की उत्पत्ति बतायी है। रावण ने स्वयं “कामोन्माद करामम्‌”” में अपनी उन्मत्त 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्यत्ति के कारण / 363 


अवस्था को स्वीकार किया है। ऐसा होने पर इन्द्रिय व्याकुल हो उठती हैं, परन्तु इस 
रोग की एक चिकित्सा भी कवि ने बतायी है कि मनुष्य यह समझ ले कि “परदारा 
पराभवम्‌” अर्थात्‌ पराई स्त्री विनाश का कारण होती है।” भरत ने एक स्थान पर 
गालियाँ देते हुए यह कहा है कि “जिसे राम से द्रोह हो वह नित्य ही मद्यपान तथा 
: पर-स्त्री समागम करे /” इससे यह स्पष्ट है कि नित्यप्रति मद्य-पान तथा स्त्री समागम 

पाप है तथा रोगकारक है। इस प्रकार विकार रूप में काम एक भयंकर व्याधि है 
जिससे आक्रान्त होकर व्यक्ति अपने विवेक तथा आत्मसंयम को तो भूलता ही है, 
साथ में अपने स्वास्थ्य, आयु तथा प्रतिष्ठा को भी खो देता है। 
क्रोध 

क्रोध दूसरा विकार है जो मनुष्य को अस्वस्थ बना देता है-रावण क्रोध से 
आक्रान्त होकर अपनी विचार शक्ति खो देता है। इसीलिये तो वह श्री राम के बल- 
पौरुष तथा पराक्रम को नहीं आँक सका। आँखों से हनुमान तथा अंगद के पराक्रम 
को देखकर भी वह भूल गया कि रामदूत इतने शक्तिशाली हैं। अपने गुप्तचरों, मंत्रियों 
आदि से सत्य बातें सुनकर भी वह सीता को लौटाकर युद्ध नहीं टाल सका | यहाँ तक 
कि माल्यवंत्त तथा विभीषण से सत्परामर्श को सुनकर वह क्रोध से काँप उठा और 
उसने उनका अपमान किया। परिणामतः वह अपने मानसिक स्वास्थ्य को कायम न 
रख सका और अन्त में विनाश को प्राप्त हुआ। क्रोध से वह कई बार मूच्छित हो 
जाया करता था। यह मानसिक विकार था जिससे आक्रान्त होकर भी उसने उपेक्षा की 
और स्वयं को स्वस्थ समझता रहा परन्तु विवेक होने पर वह कहता-“मैंने भ्रम में 
पड़कर या चित्त मोह से तुम्हारी बात न मानी 772 

परन्तु उसके बाद फिर वह विकार ग्रस्त +कर क्रोध-मूच्छित हो जाता तो वैसी ही 
बातें करने लगता एक बार कुंभकरण ने भी रावण को मंदोदरी तथा विभीषण के शब्दों 
को बल देते हुए समझाने का प्रथल किया और कहा, “अब आप रोष (क्रोध) 
त्यागकर स्वस्थ हो जाइये ।”* परन्तु परिणाम इच्छित न मिल सका और युद्ध हुआ 
ही। युद्ध क्षेत्र में विभिन्‍न योद्धाओं के क्रोध मूच्छित होने के प्रसंगों के अतिरिक्त रक्त 
गन्ध द्वारा उन्‍्मत्त कहकर एक नये कारण को स्पष्ट किया है। क्रोध मूरच्छित व्यक्ति 
की चिकित्सा के लिये कवि ने दो उपाय बताये हैं। 

3. शीतल जल का अभिषेक तथा 2. मीठे वचनों द्वारा आश्वस्त करना। 
मोह 

मोह वह मानसिक आवेग है जो मनुप्य को संज्ञा-शून्य कर देता है। मोह की वृद्धि 
पर मनुष्य मानसिक क्लेश का शिकार हो जाता है और पूर्णतः निरुत्साहित होकर 
उदासीन हो जाता है। कभी-कभी मधपान के द्वारा भी मोह उत्पन्न हो जाता है, यह 
बात कवि ने बतायी है। रावण “मैं पीड़ित हूँ”” ऐसा महसूस करने लगा और इस 
प्रकार धीरे-धीरे वह “मोह 'पीडूयमान” हो गया। एक बार श्री राम पर भी यह आघात 
हुआ वह "मोह से पीड़ित हुए' । इससे उनके पैर लड़खड़ाने लगे। सारा अंग विहल हो 
गया, वे मृत शरीर से गिर पड़े, उनकी आँखें लाल थीं, अवस्था उन्मत थी। राक्षसों ने 


364 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


यह घोषणा की कि श्री राम मारे गये। रामादल के लोग भी यही महसूस करने लगे 
परन्तु ऐसा हुआ नहीं था। वे मोह से पीड़ित थे, उनकी चेष्टा समाप्त हो चुकी थी 
निःश्वास मंद हो गयी, वे रक्त रंजित थे, परन्‍त काल-च्ञान वेत्ता विभीषण ने कहा ये 
मरे नहीं हैं इनकी मुख श्री नहीं गयी, इसलिये जीवित हैं।४ 

अन्त में राम स्वस्थ हो गये। रामायण में मोह-कारक वायु तथा शब्द का भी 
उल्लेख प्राप्त होता है। लंका के चैत्यपाल मोहित हो गये । हनुमान जी द्वारा किये जाने 
वाले तोड़-फोड़ की विध्वंसक आवाज से प्रासाद रक्षक मूच्छित हो गये। 

जब दोनों रघुवंशी भ्राता पुनः और स्वस्थ और सानन्द हो गये तब रावण ने यह 
समाचार सुनकर निम्न शब्द कहे-“न जाने कौन से प्रभाव से या किस प्रकार की 
माया से या किसी प्रकार की मोहिनी औषधि से ये दोनों भाई पुनर्जीवित हो गये ।”/* 

उपरोक्त कथन से यह स्पष्ट है कि मोहिनी औषधियों का भी उस समय परिचलन 
था आगे उसने यह भी स्वीकार किया कि श्री राम निश्चय ही साक्षात्‌ भगवान 
नारायण हैं जो रोग-शोक से सर्वथा परे हैं।' 

इस प्रकार राम के प्रभाव को देखकर रावण निरुत्साहित हुआ परन्तु फिर वह इस 
ज्ञान को भूल गया और श्री राम से युद्ध करने के लिये तैयार हो गया। 
ईर्ष्या 

ईर्ष्या का समावेश काम-क्रोध-मोह-लोभ-मद-मत्सर इन छः तत्वों में ही हो जाता 
है अतः इसका पृथक्‌ से वर्णन करना उचित नहीं जान पड़ता। 
लोभ 

रामायण में एक प्रसंग में धन का लोभी व्यक्ति खाद्य में विष मिलाकर किसी को 
दे देता है यह स्पष्ट है। खाद्य में विष मिलाकर देना एक अपराध है परन्तु इस पाप 
का आधार लोभ है, धन का लोभ। केवल धन का ही क्यों खाने के लोभ को भी 
रामायण में दर्शित किया है। निरन्तर खाते रहने पर भी जी नहीं अघाता था और वे 
लोग लगातार खाते रहते थे। यद्यपि यह कथन स्वादि"> भोजन क॑ लिये ही प्रयुक्त 
हुआ है फिर भी अधिक खाने का लोभ तथा स्वादिष्टता का लोभ उसे रुग्ण बना देता है। 

उपरोक्त विशेष लोभ का कारण है-'प्रज्ञापराध'। मनुष्य अपनी सुबुद्धि के 
अपराध के कारण कई त्रुटियाँ कर बैठता है जो उसे विपत्ति में डाल सकती हैं तथा 
इच्छानुसार फल प्रदान नहीं करतीं। उदाहरणार्थ- 

भला कौन आदमी आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी जगह नीम लगायेगा? 
और फिर उस नीम को दूध से सींचता रहेगा और फिर वह आशा करता रहेगा कि 
वह नीम मधुर फल देगा ।” यह उसकी बुद्धि का अपराध मात्र है। यदि कोई आशा 
करे कि नीम से मधु टपकेगा तो वह भी त्रुटि है* अथवा कोई मनुष्य पलाश के वृक्ष 
पर लगे सुन्दर फूलों को देखकर यह अनुमान लगा ले कि इसके फल इससे भी सुन्दर, 
मनोहर तथा मधुर होंगे और इसी आशा से वह आम के पेड़ों को काटकर उसके स्थान 
पर पलाश लगवा दे और फिर अपनी चिए प्रतीक्षित अभिलाषा की पूर्ति, चाहे, तो वह 
फल देखकर निश्चय ही पश्चाताप करेगा ! 


वाल्मा+ रामावः में रोगोत्पत्ति के कारण / 365 


मद 

मदिरापान एक वुरा व्यसन है। इसके सेवन करने के वाद मनुष्य अपने सम्पूर्ण 
विवेक को भूल जाता है और रुग्ण होने पर भी अपने आपको स्वस्थतर महसूस करने 
लगता है। वह शारीरिक रूप से अधिक शक्तिशाली तथा मानसिक रूप में चिन्ता 
मुक्त हो जाता है। इसलिये उसकी वार-वार पीने की आदत हो जाती है “मधुपान 
प्रमत्त” कहकर उसके उन्नत होने की ओर संकेत किया है, इसलिये रावण ने एक 
स्थान पर कहा है “राक्षसों ! मेरे मदपान कर मतवाला होने को तुम युद्ध स्थल में 
उत्साह वृद्धि क॑ लिये वीरों द्वारा किया जाने वाला औषधि विशेष का पान समझो?” 

मदिरापान की अवस्था का वर्णन करते हुए महर्षि ने कहा है- 

मदिरपान से जिसके नेत्र चंचल हो रहे थे जो नशे से विहल हो लड़खड़ाते हुए 
चलते थे। जिनक॑ वस्त्रों को उनकी प्रेयसियों ने पकड़ रखा था जो शत्रुओं पर कुपित 
थे जिनक हाथों में गदाशूल तथा खड़ग थे जो खाने-पीने में लगे हुए थे जो वहुमूल्य 
शैया पर अपनी प्रेयसी के साथ सो रहे थे। उपरोक्त पदों में मदपान के बाद या 
मदपान कं प्रभाव में आकर किये जाने वाले कार्यो का स्पष्ट उल्लेख है। 

मदिरापान-काम क्रोध का परस्पर सम्बन्ध है। रावण तो इन सभी दुर्गुणों से 
ही। हनुमान जी अपने महल में स्फटिक मणि की वेदी पर नीलम 
के बने शैयासनों पर जिनके पाये आदि हाथी दाँत थे तथा जो स्वर्ण-जटित थीं, पर 
सोते देखा। अशोक पुप्पों की माला को धारण किये सो रहा था। चारों ओर स्त्रियाँ 
चँवर कर रही थीं। भवन उत्तम धूपों से सुवासित था। रावण वस्त्राभूषणों से अलंकृंत 
तो था ही, कानों में कुण्डल चमक रहे थे, आँखें लाल, ऐसा प्रतीत होता था कि वह 
रात्रि में स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करता मदिरा पीकर आराम कर रहा है। 

वे क्षीण-कटि प्रदेश वाल्री राक्षस राज की स्त्रियाँ मद के प्रभाव तथा रति-क्रीड़ा के 
परिश्रम से थककर जहाँ-तहाँ जो जिस अवस्था में थीं, सो गयीं।* 

इस प्रकार रामायण में मद का प्रभाव स्पप्टतः उल्लिखित है। 
शोक 

शोक भी उतना ही दुःखदायी है जितने उपरोक्त सभी मानसिक उद्वेग। विनम्र 
प्रकृति वाले व्यक्ति तो शोक से मूच्छित हो ही जाते हैं। वलवान व्यक्ति भी कभी 
उसके निर्मम शिकार वन जाते हैं। भरत शोक संतप्त होकर संज्ञा शून्य हो गये और 
दो-घड़ी तक मूच्छित रहे। 

सीता भी शोक के कारण मूरच्छित हो गयी थीं।" अन्य अनेक स्थलों पर भी 
सीता की शोकोन्माद अवस्था का उल्लेख मिलता है।/ 

एक वार श्री राम भी शोक से मूर्च्छित हो गये। राजा दशरथ के अभाव में 
सम्पूर्ण अयोध्या निवासी अस्वस्थ और व्याकुल हो गये। सुग्रीव भी शोक से पीड़ित 
होकर निरुत्साहित हुए। श्री राम ने उस पीड़ित सुग्रीव को अपने हृदय से लगाकर 
आश्वस्त किया” जो पुरुष उत्साहहीन हो जाते हैं, दीन तथा शोक ग्रस्त रहते हैं 
उनके सारे काम बिगड़ जाते हैं, और स्वयं बड़ी विपत्ति में पड़ जाते हैं। सुग्रीव के 


366 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 











उक्त शद्दों ने श्री राम को आश्वस्त किया और वे क्रियाशील हुए। शोक मिहिता 
व्यक्ति के लिए रामायण में एक अन्य चिकित्सा भी दी है और वह है ठंडे जल 
का प्रयोग। 

सुग्रीव ने जव समझा कि दोनों ही राघव मारे गये तो वह शोक संतप्त होकर 
उर्द्धचेतनावस्था में गिर पड़े तव विभीषण ने उनके नेत्रों को अपने भीगे हाथों से 
पोंछा और उन पर ठंडा जल छिड़का । जल के प्रयोग से सुग्रीव चेतन हुए और उन 
दोनों रघुवंशियों की मूर्च्छा ठीक करने का प्रयत्न करने लगे।“ 
रजोगुण 

सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण में सतोगुण सर्वश्रेष्ठ है, यदि व्यक्ति इससे 
सम्पन्न है तो उसे कोई व्याधि पीड़ित नहीं कर सकती तथा वह मोक्ष प्राप्त कर लेगा, 
किन्तु यदि ऐसा नहीं होता है तो रजोगुण एवं तमोगुण उसके चित्त पर अपना अधिकार 
जमा लेंगे तथा विकारोत्पन्न कर देगे। रामायण में भी उल्लेख मिलता है-“यह 
राजसमाज कार्य-साधन में असमर्थ और अव्यवस्थित है, इसे धिक्कार है क्योंकि इस 
रजोगुण मूलक क्रोध के ही कारण समर्थ होते हुए भी मैंने सीता की रक्षा नहीं 
की।7४ 

इस उदाहरण से स्पप्ट हो जाता है कि क्रोध आदि मानसिक-विकारों का 
उत्पत्ति कारण रज एवं तम ही है। यह रामायणकार महर्षि वाल्मीकि ने भी माना 
है और इसी कारण यत्र-तत्र प्रसंग वश इनका उल्लेख भी किया है। 
तमोगुण 

तमोगुण ही उपरोक्त सभी प्रकार के विकारों के उत्पन्न करने का मूल-भूत 
कारण है। रामावण में तामस, तमोमवी महामाया का कई स्थानों पर उल्लेख 
किया गवा है। यथा- 

उस तामस बुद्ध में समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक दूसरे को 
पहचान नहीं पाते थे।४ 

पूर्वकाल में पशुपति महादेव जी से उसको जो तपोमयी महामाया प्राप्त हुई थी 
उसमें प्रवेश करके उसने अपने को छिपा लिया और अत्यन्त क्रोध पूर्वक शत्रु सेना 
में घुसकर उसे खदेड़ना आरम्भ किया।" 

इस प्रकार तमोगुण के विकारों एवं परिणामों को देखकर ही महर्षि ने रामायण 
में वर्णित युद्ध का नाम ही 'तामस युद्ध रख दिया। अतः स्पष्ट है कि तमो गुण 
ही मानसिक एवं शारीरिक विकारों का जन्मदाता है। 

इस प्रकार रामायण में मानसिक रोगोत्पत्ति के कारणों में काम, क्रोध, मोह, 
इंप्यां, लोभ, मद, शोक, रजोगुण एवं तमोगुण का वर्णन किया गया है। 
(॥॥) आगन्तुक कारण 
आघात जन्य, ऋतु सम्बन्धी, स्थान सम्बन्धी 

रामायण में रोगोत्पत्ति के आन्तुक कारणों का भी उल्लेख मिलता है। आगन्तुक 
रोगों से तात्पर्य ऐसे रोगों से है जो बिना किसी पूर्व कारण के अकस्मात्‌ उत्पन्न हो 

वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 367 


जाये जैसे-अस्थि-भंग या शरीर के किसी अंग का अवयव का कटकर गिर जाना 
इत्यादि। जिस प्रकार शारीरिक रोगों का कारण वात-पित्त कफादि होते हैं तथा 
मानसिक रोगों का कारण काम-क्रोध, मोह, मद, ईर्ष्या रजो गुण एवं तमो गुण 
बताये गये हैं उसी प्रकार आगन्तुक रोगों के भी कुछ कारण होते हैं जो आघात 
जन्य, ऋतु सम्बन्धी एवं स्थान सम्बन्धी कहे जाते हैं। 
आधघातजन्य 

आधघातजन्य कारण से तात्पर्य ऐसे कारणों से है जिसमें व्यक्ति को अकस्मात्‌ 
आघात लगे। यद्यपि आघात का अप्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रज्ञापाध से ही है तथापि वह 
आगन्तुक ही कहा जा सकता है। रामायण में उल्लिखित है कि महारानी कैकयी 
राम के राज्याभिषेक के शुभ अवसर पर जव अकस्मात्‌ ही राम को वन गमन तथा 
भारत को राज्य की याचना साधिकार करती है तो राजा दशरथ को एक धक्का 
(आघात) लगता है और परिणाम स्वरूप वह कुछ समय के लिये मूर्च्छित हो जाते 
हैं। इसके अतिरिक्त आघात से यह भी तात्पर्य लिया जा सकता है कि आघात का 
अर्थ चोट है-यथा-कवि ने एक स्थान पर रावण कं देह का वर्णन करते हुए 
उसकी छात्ती पर ऐरावत हाथी के दाँतों के आयात चिन्ह का वर्णन किया है।” 

इनके अतिरिक्त और भी आकस्मिक आधातों का वर्णन रामायण में मिलता 
है यथा-अंग विहल होना, बुद्धि विचेतन, नष्ट चेतना, दीनता, आतुरता, आँखें 
लाल होना, उन्मत्तता, संज्ञा-शून्यता, शिथिलता आदि। 

रामायण में आकस्मिक मृत्यु भी विशेष स्थान रखती है। कहा जाता है कि 
राम के समय में कोई पाप नहीं होता था जिसके कारण उनके राज्य में कोई भी 
व्यक्ति आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त नहीं करता था। कोई पिता अपने पुत्र की मृत्यु 
नहीं देखता था, स्त्रियाँ विधवा नहीं होती थीं इतना होने पर भी रामायण में 
जबरदस्ती मृत्यु प्राप्ति के कुछ कारणों का उल्लेख किया गया है। यथा- 

. आपातमरण"* 

2. उपवास द्वारा प्राण त्यागना 
- विष पीकर" 
छुरा भोंककर 
» आग में जलकर” 

6. गला घोंटकर”* 

इस प्रकार रामायण में रोगोत्पत्ति के आगन्तुक कारणों में आघात जन्य कारण 
तथा आकस्मिक मृत्यु का उल्लेख प्राप्त होता है। 
ऋतु सम्बन्धी 

मानव स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद में ऋतु के अनुकूल आचार-व्यवहार को 
अधिक महत्व दिया गया है। महाकाव्य रामायण में भी परम्परा से ऋतु-वर्णन तथा 
तदनुसार आचार-व्यवहार को भी उतना ही महत्व मिला है। 

आयुर्वेदमतानुसार वर्ष के 2 महीने में सूर्य की गति के अनुसार उत्तरायण 


368 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


फ़््फ्े ५० 


तथा दक्षिणायन दो अयन माने गये हैं। ये ही आयुर्वेद में 'आदान काल” तथा “विसर्ग 
काल' के नाम से पुकारे गये हैं। छः ऋतुएँ कही गयी हैं जो अपने-अपने समय में 
व्यक्ति के शरीर को प्रभावित करती हैं उनका क्रमशः वर्णन इस प्रकार है- 
. ग्रीष्म ऋतु 

ग्रीष्म ऋतु का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका वर्णन करते हुए श्री राम 
लक्ष्मण से कहते हैं, “ग्रीष्म की गर्मी तथा विरहार्नि से संतृप्त मुझे, पंपासर बड़ी 
सुहावनी लगती है ।”” इससे स्पष्ट है कि ऋतु का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, ग्रीष्म 
ऋतु शरीर को झुलसा देती है। 
2. बसनन्‍्त ऋतु 

वसनन्‍्त ऋतु का भी शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है, वह कामोद्दीपक है जिसके 
कारण काम नामक मानस दोष से उत्पन्न होने वाले कामोन्माद इत्यादि शारीरिक एवं 
मानसिक रोगों की उत्पत्ति संभव होती है। रामायण में भी इस सत्य को स्वीकार किया 
गया है। श्री राम इस ऋतु में कामोद्दीपक वातारण को देखकर अनंगवेदना को 
उद्दीप्त अनुभव करने लगे ।* 

वसनन्‍्त ऋतु में चलने वाला शीतल एवं सुगन्धित मलयानिल विरही श्री राम को 
कामाग्नि में जला डालता रहा है।* 

यह इतनी कामोत्तेजक होती है कि इसके कारण राम अपने प्राण त्याग तक के 
लिये तैयार हो जाते हैं। 
3. वर्षाऋतु 

वर्षा ऋतु का भी शरीर पर प्रभाव पड़ता है। इस ऋतु में सर्वत्र जल ही जल व्याप्त 
हो जाता है। अतः ज्वर तथा पीनस इत्यादि रोग होने का भय रहता है। इसीलिए इस 
ऋतु में स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। रामायण के किष्किधा काण्ड में भी 
इस ऋतु का वर्णन प्राप्त होता है। 
4. शरद ऋतु है 

लक्ष्मण के अनुसार यह ऋतु योग का सहारा लेते हुए मन को एकाग्र करने की 
है इसमें सभी चिन्ता दूर हो जाती है।* 

इस समय में करों का अनुष्ठान करना चाहिये, मन को प्रसन्‍न रखना चाहिए तथा 
चित्त की एकाग्रता को कायम रखना चाहिए। इससे पराक्रम की वृद्धि होगी तथा 
शक्ति का गुणन होता है।” 
5. शिशिर एवं हेमन्त ऋतु 

इन ऋतुओं का भी शरीर पर स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई पड़ता है क्योंकि इन 
दिनों में अत्यन्त शीत होता है उसे कष्ट साध्य कहते हैं। राम कहते हैं, “अत्यन्त सुख 
में फले हुए सुकुमार भरत जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले प्रहर में कैसे सरयू 
के जल में डुबकी लगाते होंगे।”* 

लक्ष्मण ने भी राम से कहा है-भैया ! इस ऋतु में अधिक ठंडक या पाले के 
कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। जल अधिक ठंडा होने के कारण पीने के 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 369 


योग्य नहीं रहता है और आग बड़ी प्रिय लगती है।” 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि ऋतुएँ भी व्यक्ति के शरीर 
को बहुत प्रभावित करती हैं तथा समसामयिक आगन्तुक रोगों का प्रबल कारण भी 
बन जाती हैं। अतः ऋतु विशेष की ऋतुचर्या के पालन का विशेष ध्यान रखना चाहिये 
ऐसा रामायण का निर्देश है। 
स्थान सम्बन्धी 

स्थानों का भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। रामायण में भी सभी 
प्रकार के स्थानों का उल्लेख किया जाता है। क्रमशः देखने पर जहाँ रामायण में 
अयोध्या, जनकपुरी इत्यादि महानगरों का वर्णन किया गया है वहीं मलय, दर्दुर, मेरु 
आदि पर्वतों का भी उल्लेख किया गया है। दण्डकारण्य, वन, आश्रम तथा समुद्र तट 
आदि का भी इसमें यत्र-तत्र उल्लेख प्राप्त होता है। 

स्थान व्यक्ति क॑ शरीर में रोगोत्पत्ति का कारण बनते हैं ऐसा रामायण में कहीं 
स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है फिर भी कुछू स्थानों पर रहने से कुछ प्रभाव अवश्य 
पड़ता है। जैसे-'मलय तथा दर्दुर पर्वतों का स्पर्श करके हवा बहने लगी जो 
सुखदायिनी स्वास्थ्य कर थीं।' 

रामायण में कुछ ऐसे प्रदेशों का नामोल्लेख अवश्य प्राप्त होता है जो प्रकृतितः 
स्वस्थ एवं निरामय थे। सदा स्वस्थ रखने वाले प्रदेशों में कारूप-पथ तथा चन्द्रकान्त 
का नाम आता है। ये दोनों ही प्रान्त स्वस्थ थे। “कारूप निरामय” तथा “चन्द्रकान्त 
निरामय” कहकर स्पष्ट किया है। 

राम ने समृद्र पर अग्निवाण साधा तब समुद्र घबराया और बोला द्रुमकुल्य नामक 
विख्यात पवित्र देश है वहाँ रूप एवं कर्म में भयंकर आभीर जाति के लोग निवास 
करते हैं उन्हीं 5 आप अपना वाण सफल करिये। राम ने वैसा ही किया साथ ही वहाँ 
की पृथ्वी को वरदान भी दिया- 

यह मरुभूमि पशुओं के लिये हितकारी होगी, यहाँ रोग कम होंगे। यह भूमि 
फल-मूल और रसों से सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे। 
दूध की भी वहुतायत होगी। यहाँ सुगन्‍्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकार की औषधियाँ 
उत्पन्न होगी।" । 

इस भूमि का नाम मरु प्रदेश हुआ जो सभी मनुष्यों को स्वस्थ कर रहा है। 

यद्यपि रामायण में विविध स्थानों का वर्णन प्राप्त होता है तथापि उनका व्यक्ति 
के शरीर पर किस प्रकार प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है, ऐसा कहीं 
भी निर्देश प्राप्त नहीं होता है। 

इस प्रकार रामायण में वर्णित रोगोत्पत्ति के विविध कारणों की संक्षेप में समीक्षा 
की गयी। 
संदर्भ 
. दोपघातु मल मूल॑- हि शरीरमू।। सु.सू. 5/3 


370 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कर 
4 


400 68 


38. 


2. दोष धातु मलमूलो हि देह:। अ. सं. 9/3 


दोप धातु मला मूलं सदा देहस्य।। अ. है. / 
वात-फ्ति-श्लेष्माण एव देहसंभवहेतव:। 

तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्यो धव्वसन्नविष्टै: शरीरमिदं 

धार्यतेडगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभि:, अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके । 

त एव च व्यापन्नाः प्रलय हेतवः | सु. सू. 20/2 
उत्साहोच्छवासू- निश्वास-चेप्टा धातुगतिः समा। 

समो मोक्षो गतिमतां वायो: कर्माजविकारजमू ।। च. सू. 8/49 
च. सू. 2 

सु. नि. 

बा. 32/6, 7, 9-22-26। बा. 33--26 तक 

अशरीरः शरीरेषु, वायुश्वरति पालयन्‌। 

शरीरं हि विना वायुं समतां याति दारूभि:।। उ. 35/60 

वायुः प्राण: सुख -वायुर्वायु: सर्वमिदं जगतू। 

वायुना सम्पंरित्यक्तं न सुखं विन्दते जगत 

अधैव च परित्यक्तः वायुना जगदायुषा। 

अद्यैव ते निरूच्छवासाः काप्ठकुड्डयोपमा स्थिता:।॥ उ. 35/62 
दर्शनं पक्तिरुष्मा च क्षुत्‌ तृष्णा देहमार्दवमू। 

प्रभा प्रसादो मेधा च. पित्त कर्मा विकारजम्‌।। च. सूत्र 8/50 


« भ्राजिष्णुतामन्नरुचिं अग्निदीप्तिमरोगताम्‌। 


संसर्पतू स्वाः सिराः पित्त कुर्यात्‌ चान्यान्गुणानपि।। सु. शा. 7 
प्रसक्‍ताश्रुमुखी त्वेवंब्रुवती जनकात्मजा। 

अधोगतमुखीबाला विलुप्तुमुपचक्रमे ।। सु. 26/ 
उन्मत्तेव-प्रमत्तेव भ्रान्ताचितेव शोचती। 

उपावृत्ता' किशोरीव विचेष्टन्ती महीतले।। सु. 26/2 

स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलमू। 

क्षमा धृतिरतोभश्च कफकर्मा विकारजमू्‌।। च. सू. 8/5 
स्नेहमड्लेषु सन्धीनां स्थैय॑ बलमुदीर्णताम्‌। 

करोत्यन्यान्‌ गुणाश्चापि वलासः सवा: शिराश्चरनू।। सु. शा. 7 


.. वा. रा. उ. 5/7, 8 
.. अष्टाइ संग्रह अ. 22/0 


न्नयो लोका इवाव्यग्राः स्थितास्त्रय इवाग्नय:॥। उ. 5०7 

त्रयो मन्‍्त्रा इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामयाः। 

त्रयः सुकेशस्य सुतास्त्रेताग्नि समतेजसः ।॥ उ. 5/8 

विवृद्धिमगमस्तत्र व्याधयोपेक्षिता इव। 

त्रिविध तु निमित्तमेषामसात्म्येन्द्रियार्थ संयोग: प्रज्ञापराधः परिणामश्च | अष्टांग संग्रह 22/] 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 37 


90. 
श्र 
22. 
23. 
24. 


25. 


9. 


श्प 


अष्टाडूग संग्रह 22/ 

कायवाज्ञनोभेदेन तु त्रिविधमत्यहिंत प्रज्ञापाध:। अ. स. 22/2 
अष्टांग संग्रह 22/2 

अष्टांग संग्रह 22/3 परिणामः पुनः कालः उच्यते। 

वायुः पित्त कफश्चोक्तः शारीरो दोष संग्रहः। 

मानस: पुनरुद्धिष्टो रजश््च तम एवं च।। च. सू. 4/56 
रजस्तमश्च मानसौ दोषौ-तयोर्विकाराः-काम, 
क्रोध-लोभमोहेष्यामानमदशोक चित्तोद्वेगाभयाहर्षादयः। च. वि. 6/6 
विकारो धातु वैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते। 

सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च।। च. सू. 9/3 

रोगस्तु दोष वैषम्यं दोष साम्यमरोगता।। अ. ह. सू, /20 

तत्र तु खल्वेषां द्यानामपि दोषाणां त्रिविध प्रकोपणम्‌। 
तद्यथा-असाल्पेन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापपाधः परिणामश्चेति ।। च. वि. 6/7 
तदिदं वीर सम्प्राप्तं यन्मया पूर्वमीरितम्‌। 

काम- मोह परीतस्य यत्‌ तन्‍न रुचितं तव ॥। यु. 09/4 


28. नदन्ति काम शकुना मुदिता: सं्रशः कलमू। 


29. 


30. 


3. 


32. 


33. 


34. 


35. 


आहवयन्त इवानोन्यनं कामोन्माद करामम।। कि. /46 
अतुष्टं स्वेषु दारेषु चपलं चपलेन्द्रियम्‌। 

नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदारा: पराभवम्‌।। सु. 28/8 
विभ्रमाच्चित मोहादू वा बलवीर्याश्रयेण वा। 

नाभिपनन मिदानीं यद्‌ व्यर्था तस्य पुनःकथा ।। यु. 63/24 
अल राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते । 

रोष॑ं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमरहसि | यु. 68/3॥ 
नैतत्‌ किंचन रामस्य न च रामो मुमूर्षति। 

नह्ोन॑ हास्यते लक्ष्मीदुर्लभा या गतायुषम्‌।। यु. 46/40 
तन्‍न जाने प्रभावैर्वा मायया मोहनेन वा।। यु. 72/7 
शरबन्धाद्‌ विमुक्तौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥। यु. 72/7.5 
यस्य विक्रममासाथय राक्षसा निधन गताः। 

त॑ मन्ये राघवं वीर॑ नारायणमनामयम्‌।। यु. 72/ 

आग्रं छित्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत्‌ तु कः। 

यश्चैनं पयसा सिचेन्नैवास्य मधुरो भवेत्‌ 4॥ अयो. 35/6 


36. अभिजात्य॑ हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च। 


37. 


न हि निम्बात स्रवेत्‌ क्षौद्रं लोके निंगदितं वचः।। अयो. 35/7 
कश्चिदाग्रवर्ण छित्वा पलाशांश्च निर्षिंचति । 
पुष्प॑ दृष्ट्वा फले गृध्नु: स शोचति फलागमे ।। अयो. 63/8 


38. मतोज्यमिति मा मंस्था यद्यभीतोषसि संयुगे। 
372 » वाल्मीकि. रामायण तथा आयुर्वेद 


डः 


40. 


4. 


42. 


43. 


४.००] 


46. 


था. 


48. 


49. 


50. 


5. 


3० 


53. 


मदोंज्यंसम्प्रहारेउस्मिनू वीरपानं समर्थ्यताम्‌ ।। कि. /38 
मदव्यायायामखिन्नास्ता राक्षसेन्द्रस्य योषितः। 
तेषु तेष्ववकाशेषु प्रसुप्तास्तनुमध्यमा: ।। सु. 0/35 
लक्षणस्य वचः श्रुत्वा दारुणं जनकात्मजा। 
परं विषादमागम्य वैदही निपपात ह।। उ. 48/ 
सा मुहूर्तमिवा संज्ञा वाष्पपर्याकुलेक्षणा। 
लक्ष्मणं दीनया वाचा उवाच जनकात्मजा।। उ. 48/2 
उन्मत्तेव प्रमत्तेव भ्रान्तचित्तेव शोचती । 
उपावृता किशोरीव विचेष्टन्ती महीतले।। सु. 26/2 
निरुत्साहस्य दीनस्य शोक़पर्याकुलात्मन:। 
सर्वाधा व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति।। यु. 2/6 
एवमुक्‍्त्वा ततस्तास्य जलकिन्नेन पाणिना। 
सुग्रीवस्य शुभे नेत्रे प्रममार्ज विभीषण:।। यु. 46/34 
ततः सलिलमादाय विद्यया परिजप्य च। 
सुग्रीवनेत्रे धर्मात्म प्रममार्ज विभीषण:।। यु. 46/35 
धिगस्तु राजसं भावमनीशमनवस्थितम्‌। 
ईश्वरेणापि यदू्‌ रागान्मया सीता न रक्षिता।। सु 5506 
तस्मिंस्तु तामसो युद्धे सर्वे ते देव राक्षसाः। 
अन्योन्यं नाभ्यजानन्त युध्यमानाः परस्परमू।। उ. 29/3 
तां प्रविश्य महामायां प्राप्तां पशुपतेः पुरा। 
प्रविवेश सुसंरब्धस्तत्‌ सैन्यं समभिद्रवत्‌ ।। उ. 29/28 
ऐरावतविषाणागैरापीडनकृतव्रणौ । 
वज्जोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ ।। सु. 0/6 
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः। 
छिद्रमन्ये प्रपचचन्ते क्रौचस्य स्वमिव द्विजा:।। यु. 63/9) 
यदि त्वं यास्यसि वन त्यक्त्वा मां शोकलालसामू। 
अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यमि जीवितुमू ।। अयो. 20/27 
प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा 
सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज। 
न ते करिष्यामि वचः सुदारुणम्‌ 
ममहित॑ केकयराजपांसने ।। अयो. 2/09 
कण्ठमस्याः नृशंसायाः पीडयामः किमास्यते। 
निवेद्यताम्‌ ततो राज्ञे मानुषी सा मृतेति ह।। सु. 24/42 
. शोकार्तस्यापि मे पम्पा शोभते चित्रकानना। 

व्यवकीर्णा बहुविधैः पुष्पै: शीतोदका शिवा।। कि. /6 
« मां हि शोक समाक्रान्तं संतापयति मन्मथः। 


वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / 373 


हष्टं प्रथटमानश्व समाहयति कोकिलः।। कि. /28 
स्वनन्ति पादपाश्चैमेममानडुप्रदीपका: । 
अशोकस्तवकाझ्ञरः पट्पदस्वननिः स्वनः ।। कि. /29 
55. मन्मथायासमम्भूतों वसन्तगुणवर्धितः।। 
अयं मां धक्ष्यति क्षिप्रं शोकाग्निर्नंचिरादिव । कि. .8/32.5 
56. किमार्यकामस्य वंशगतेन, किमात्मपौरुष्यपराभवेन। 
अयं हिया संहियते समाधि:, किमत्र योगेन निवर्तते न।। कि. 30/6 
57. क्रियाभियोगं मनसः प्रसाद, समाधियोगानुगतं च कालमू। 
सहायसामर्थ्यमदीन सत्तवः स्वकर्महितुं च कुरुष्व तात।। कि. 30/7) 
58. सोञपिवेलामिमां नूनमाभिपेकार्थमुद्यतः । 
वृतः प्रकृतिभिर्नित्यं प्रयासि सरयूं नदीमू।॥ अ. 6/29 
अत्यन्त सुखसंवृद्धः सुकुमारो हिमार्दितः। 
कथं त्वपरारात्रेषु सरयूमवगाहते।॥ अ. 6/30 
59. नीहार परुषो लोक: पृथिवी सस्यमालिनी। 
जलान्युपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः॥॥ ज. 6/5 
60. मलयं दर्दुरं चैव ततः स्वेदनुदोहनिलः ।। 
उपस्पृश्य ववौयुक्त्या सुप्रियात्म सुखं शिवः।। अयो. 9/24 
6. विख्यातं त्रिपु लोकेषुं, मरुकान्तारमेव च। 
शोपवित्वा तु त॑ कुक्षिं रामो दशरथात्मज: ॥। यु. 22/40 
वरं तस्मै ददों विद्वान्‌ मखेउमरविक्रम:।। यु. 22८4 . 
पशव्यश्वाल्परोगश्व फलमूल रसायुतः। 
वहूस्नेहो बहुक्षीरः सुगन्धिर्विविधोषधि:।। यु. 22/42 


374 / वाल्मीकि-शीमायण तथा आयुर्वेद 


षष्ठ परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान 





चरक के अनुसार आयुर्वेद के अष्टांगों में काय-चिकित्सा की सर्वोपरिता स्वीकार 
की गयी है।' काय-चिकित्सा की कोई परिभाषा उल्लिखित नहीं है। सुश्रुत ने 
काय-चिकित्सा पद की विशद्‌ व्याख्या की है अष्यांग संग्रह” एवं अष्टांग हृदय' में 
“काय' पद प्रयुक्त हुआ है। 

सुश्रुत के अनुसार जिस अंग में सर्वशरीर गत रोगों यथा-ज्वर, रक्‍्त-पित्त, शोध, 
उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह एवं अतिसार आदि की चिकित्सा का वर्णन हो, वह 
काय-चिकित्सा है।* 

यद्यपि 'काय' शब्द का सामान्य अर्थ शरीर या देह होता है, किन्तु आयुर्वेदज्ञों 
द्वारा प्रयुक्त काय शब्द चरक के टीकाकारों के अनुसार अन्तरग्नि का बोधक है। 
भोजन में रस आदि निर्माण करने वाले पाचक रस एवं जठराग्नि सहित भूत एवं 
धातुओं की अग्नियाँ इसमें सम्मिलित हैं ।* 

अग्नि के यथावत्‌ रहने पर मनुष्य स्वस्थ एवं नीरोग रहता है, अग्नि के शांत हो 
जाने पर मनुष्य मृत हो जाता है और अग्नि के विकृत होने पर वह रुग्ण हो जाता 
है। इसीलिये इस चिकित्सा में अग्नि की चिकित्सा की जाती है। शरीर का आधार 
अग्नि है, इसलिये सुश्रुत ने कहा है-'जाठरों भगवानग्निः ईश्वरोउन्तस्य पाचकः” 
भगवान स्वयं वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणियों के शरीर में आश्रित होकर खाद्य, पेय, 
लेह्य और चर्व्य सब प्रकार के अन्नों को पचाता है। इसी अग्नि की विकृति की 
चिकित्सा इस अंग में की जाती है। 

रामायण एक -चिकित्सा-ग्रन्थ नहीं है तथापि विभिन्‍न रोगों से सम्बन्धित 
विभिन्‍न तत्वों का दर्शन महाकवि ने अपनी लेखनी के माध्यम से कराया है। रामायण 
में वर्णित विविध रोगों की समीक्षा निम्न प्रकार की जा सकती है- 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 375 


प्रथम परिच्छेद 
. शारीरिक रोग-अतिसार (आंत्ररोग) 

सुश्रुत के अनुसार हुद्रांत्र में विक्षोमक गुण आहार-द्रव्य के पहुँचने पर वहाँ अग्नि 
शांत हो जाती है, कफ स्राव बढ़ जाता है। आहार के विक्षोभ॑फ होने से वायु भी 
प्रकुपित हो जाती है आँत का विश्लुब्ध हुआ यह वायु जब मलयुकत बढ़े हुए इस 
श्लेष्मस्राव को नीचे की ओर फेंकने लगता है तो उसे अतिसार कहते हैं।* 
श्लैष्मिक अतिसार या आमातिसार 

अति-मात्रा में गुरु, शीत, स्निग्ध, गुण भोजन के सेवन से अग्नि के मंद हो जाने 
के कारण उत्पन्न हुए अतिसार को श्लैष्मिक अतिसार (0959०7४४० एींश्रा००७) 
कहते हैं। इसमें मल चिकना, गाढ़ा, पानी में डूबने वाला, शवेत-वर्ण, श्लेष्म-द्रव युक्त, 
दुर्गन्धित होता है। रोगों में क्षुधा-नाश, अरुचि, वमन, तन्द्रा, आलस्य, मंदता आदि 
मंदाग्नि सूचक लक्षण होते हैं | 
पित्तातिसार (छत एंथ्रा0९०) 

किसी उष्ण-तीक्ष्ण गुण विष-द्रव्य के क्षुद्रांत्र में पहुँचने पर उसकी श्लेष्म-कला में 
तीव्र पैत्तिक शोथ होकर जो हरे-पीले रंग के दुर्गन्‍्ध युक्त पतले दस्त होने लगते हैं, 
जिस अवस्था में रोगी में ज्वर, सन्‍्ताप, पिपासा, मूर्च्छा, पाक, आदि पित्त प्रकोप सूचक 
लक्षण होते हैं, उसे पित्तातिसार कहते हैं 0० 
बातातिसार 

आंत्र-गत वायु में विक्षोभ से जो अतिसार अल्प-अल्प मात्रा में बार-बार होता है 
उसे वातातिसार (06 000०0) कहते हैं।! 7 

भय-शोक आदि मानव भावों से उत्पन्न होने वाले अतिसार को मानस अतिंसार 
कहते हैं। 
चिकित्सा 
श्लैष्मिक अतिसार की चिकित्सा 

इसमें लंघन तंथा मंदाग्निहर, दीपन, पाचन तथा स्वल्प-मात्रा में संग्राही औषधियों 
का प्रयोग करना चाहिये। निम्नलिखित में से किन्हीं एक-दो योगों का प्रयोग किया जा 
सकता है- 
. हरीतकी चूर्ण 5-4 माशे के साथ एक-दो माशे पिप्पली या सौंफ या सोंठ को 

मिलाकर 3-4 बार दें। 
2. दाडिमाष्टक चूर्ण वंशलोचन- तोला, चतुर्जातक १-६ तोला, अजवायन, धनिया, 
जीरा, पिप्पली मूल, त्रिकुट प्रत्येक 5 तोला अनार दाना तथा खाण्ड 32-82 तोला। 

3. लवंगचतुः समचूर्ण-लवंगं, जातिफल, जीरा, सुहागा, समांन भाग, शहद के साथ दें। 
4. अभ्यादि चूर्ण-हरड़, अतीस, हींग, त्रिकटु, क्राला नमक सब समान भाग। 
5. आजमोदादि चूर्ण-अजवाइन, .सोंठ, मोचरस, धांतकी समान भाग दें। 


376 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


पैत्तिक अतिसार की चिकित्सा 
पैत्तिक अतिसार अर्थात्‌ तीव्रातिसार में जिसमें ज्वर, दाह और अतिसार अधिक मात्रा 
में होते हैं, निम्नलिखित योगों में से किसी का भी प्रयोग करना चाहिये। 
।- गुड्दच्यादि कषाय :- गिलोय, अतीस, धनिया, सौंठ, विल्व, मुस्ता, सुगन्धवाला, 
पान, कुडा की छाल, चिरायता, चंदन, खस, पित्त-पापड़ा समान भाग। 
2- विल्वादि क्वाथ :- बिल्व, इन्द्र जी, मोथा, सुगन्‍्ध वाला, अतीस समान भाग। 
$- लोप्रादि चूर्ण :- लोप्र, धातकी, विल्व, मुस्ता, इन्द्र जौ, आम की गुठली समान 
भाग। 

वाल्मीकि रामायाण में अन्वेषण के पश्चात्‌ भी जिज्ञासु अनुसंधित्मु को अतिसार 
अथवा आंत्र-रोग के विषय में विशद्‌ वर्णन प्राप्त नहीं हो सका है किन्तु एक-दो स्थलों पर 
ही “आंत्र' शब्द का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि यह अंग एवं रोग वैद्यों के संज्ञान में था। 
ज्बर 

“ज्वर संताप लक्षणम्‌” वस्तुतः ज्वर तो एक ही प्रकार का होता है, क्योंकि ताप 
या संताप का मिलना ही इस अवस्था में प्रमुख लक्षण है। तथापि शास्त्रकारों ने ज्वर 
का विस्तार करते हुए कई प्रकार के भेद किये हैं। यथा-द्विविध, त्रिविध, चतुर्विध, 
पंचविध, सप्त-विध तथा अष्टविध-प्रकारों का वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त 
विशिष्ट ज्वरों में भी कुछ उपभेद बताये गये हैं। 

ज्वर आठ कारणों से मनुष्य के शरीर में उत्पन्न होता है जैसे-वात से, पित्त से, 
कफ से, वातं-पित्त से, पित्त-कफ से, वात-कफ से एवं वात-पित्त-कफ से आठवाँ 
आगन्तुक कारण से ॥7 
वायु कोप का कारण 

रुक्ष, लघु, शीतल पदार्थों के सेवन से, परिश्रम करने से, वमन, विरेचन, और 
आस्थापन के अतियोग से। मल-मूत्रादि वेगों को रोकने से, उपवास करेने से, चोट 
लगने से, मैथुन करने से, उद्ेश और शौच होने से, रक्त के अत्यन्त निकलने से, रात्रि 
में जागने से, शरीर को ऊँचा, नीचा तिरछा आदि करने से, इन सब कारणों के अधिक 
सेवन से शरीर में वायु कोप होता है।? 

वह कूपित हुई वायु-आमाशय में प्रवेश करके आमाशय की गर्माई में मिल जाती - 
है। फिर वह आहार के सारभूत रस नामक धातु का आश्रय लेकर रस और स्वेद के 
बहने वाले छिद्रों की रोक देती है फिर पाचकाग्नि को हनन करके पंक्ति स्थान की 
गर्माई को बाहर निकाल देती है। फिर वह वायु शरीर को यथोचित अग्निबल हीन 
देखकर बल पा जाती है। वह बल पाया हुआ वात-वात ज्वर को उत्पन्न करता है।* 
लक्षण 

उस ज्वर के यह लक्षण होते हैं-जैसे-ज्वर के चढ़ने के साथ और उतरने के 


समय शरीर के ताप में विषमता, कभी-कभी शरीर का अधिक तपना और कभी थोड़ा 
वाल्मीकि रामायण मं वर्णित रोग एवं उनका निदान / 377 


तपना, ज्वर एक सा रहना, कभी ज्वर तीक्ष्ण और कभी मंद होना आदि।॥”* 
पित्त-प्रकोप का कारण 

पुष्प, अम्ल, लवण, क्षार, चर-परे पदार्थों के सेवन से एवं अजीर्ण कर्ता भोजन के 
अधिक सेवन से तथा अति तीक्ष्ण, धूप, अग्नि, और संताप के सेवन से, परिश्रम करने 
से तथा विषम भोजन करने से पित्त का प्रकोप होता है।* फिर वह पित्त प्रकुपित होकर 
आमाशय से गर्मी को उत्तेजन करता हुआ आहार का'परिणाम रूप जो रस नामक धातु 
है उसमें मिलकर स्वेद और रस के बढाने वाले छिद्रों को रोक देता है फिर अपने द्रव से 
जठराग्नि को हनन कर पाचक स्थान की गर्मी को बाहर निकाल देता है।. तब अपना 
अधिकार पाकर शरीर को पीडन करता हुआ पित्त-ज्वर को उत्पन्न करता है।? 
लक्षण 

उस ज्वर के लक्षण इस प्रकार हैं। शरीर में एक-दम ज्वर का होना, भोजन के 
पाक के समय दिन के मध्य में, अर्द्धरात्रि में, शरदूऋतु में विशेषकर ज्वर की वृद्धि 
होना या उत्पन्न होना। मुख में कटुता, नाक, मुख, कण्ठ, ओष्ठ और तालु का पकना 
आदि पिक्त-ज्वर के लक्षण हैं।5 
कफ-प्रकोप का कारण 

चिकने, मधुर, भारी, शीतल, पिच्छिल, अम्ल, एवं लवण पदार्थों के खाने से, दिन 
में सोने से, हर्ष से, परिश्रम न करने से इत्यादि कफ वर्धक पदार्थों के अधिक सेवन 
से कफ का कोप होता है।'* 

वह कुपित हुआ कफ आमाशय में प्रवेश करके जठराग्नि के साथ मिलकर आहार 
के परिणाम रूप रस नामक धातु के साथ जाकर रस और स्वेद के बहाने वाले छिद्रों 
को रोक देता है। तब जठराग्नि को हनन करके पाचकाग्नि की गर्मी को बाहर निकाल 
देता है। फिर अपना अधिकार पाकर शरीर को पीड़ित करता हुआ कफ-ज्वर उत्पन्न 
करता है।* 
लक्षण 

कफजज्वर के लक्षण कुछ इस प्रकार हैं-शरीर में एक-दम ज्वर का प्रगट होना। 
भोजन करते ही पूर्वाहन में, रात्रि के प्रथम भाग में एवं वसन्तु ऋतु में ज्वर का अधिक 
होना, शरीर में भारीपन होना आदि कफ ज्वर के लक्षण होते हैं। 

ज्वरों के विभिन्‍न प्रकार निम्न-लिखित हैं- 
(0) द्विविध ज्वर 

अ. अधिष्ठान भेद से-शारीरिक ज्वर, मानसिक ज्वर। 

आ. निमित्त भेद से-निज ज्वर, आगन्तुज ज्वर। 

इ. विधि भेद से-सौम्य, आग्नेयज्वर। 


378 / वाल्मीकि रामायण तथा अप्युर्वेद 


ई. प्रभाव भेद से-अंतर्वेग, बहिरवेग ज्वर। 

उ. ऋतु भेद से-प्राकृतिक, वैकृतिक ज्वर। 

ऊ. साध्यासाध्य भेद से-साध्य, असाध्य, ज्वर। 

ए. काल-भेद से-नव ज्वर, जीर्ण ज्वर। 

ऐ. अवस्था भेद से-आम ज्वर, निराम ज्वर। 

(7) त्रिविध ज्वर 

अ. दोष भेद से-वातज, पित्तनज कफज। 

ब. अवस्था भेद से-आम, पच्यमान, निराम ज्वर। 

(॥ग) चतुर्विध ज्वर र 

वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सन्निपातज 
(7५) पंच-विध-ज्वर 

चरक-संतत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक एवं चातुर्थिक | 

सुश्रुत-सतत, अन्येद्युष्क, त्रयाख्य, चातुर्थिक एवं प्रलेपक | 
(५) सप्त-विध-ज्वर 

अ. दोष भेद से-वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, वात-पैत्तिक, वात-श्लैष्मिक, 

पित्त-श्लैष्मिक एवं सन्निपातिक-ज्वर। 

सप्त धातु गत ज्वर-रसगत ज्वर, रक्तगत ज्वर, मांस-गत ज्वर, मेद गत ज्वर, 

अस्थि गत ज्वर, मज्जा गत ज्वर एवं शुक्र गत ज्वर। 
(शा) पंच विशति विध ज्वर (पृथग्दोष से) 

. वातज 2. पित्तज 3. कफज 4. वात पैतिक ज्वर 5. वात श्लैष्मिक ज्वर 6. 
पित्त श्लैष्मिक ज्वर 7. सन्निपात ज्वर 8. विषम ज्वर 9. सतत ज्वर 0. संतत ज्वर 
7. तृतीयक ज्वर 2. चातुर्थिक ज्वर 3. अभिचारण ज्वर 4. ग्रृहावेशज ज्वर 35. 
शापज ज्वर 6. श्रमज ज्वर 7. दाहज ज्वर 8. क्षतज ज्वर 9. क्षेदज ज्वर 20. 
कामज ज्वर 9]. भयज ज्वर 22. शोकज ज्वर 23. क्रोधज ज्वर 24. विषज ज्वर 25. 
औषधि गंधज ज्वर। 

(शा विशिष्ट ज्वर भेद 

विषम ज्वर पाँच प्रकार के विषम ज्वरों में से तृतीयक ज्वर एवं चातुर्थिक ज्वर के 
निम्न प्रभेद किये गये हैं-- 

तृतीयक 7]. त्रिकग्राही 2. पृष्ठ-ग्राही 3. शिरोग्राही। 

चातुर्थिक व. जज्ञग्राही 2. शिरोग्राही। 
सन्निपात ज्वर 
चरक ने निम्नांकित तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर बताये हैं- 

. वातपित्तोल्वणहीन कफ सन्निपात ज्वर (बश्न, बश्रु, बद्ध) 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 379 


2. वातपित्तोल्बणहीन पित्त सन्निपात ज्वर (शीघ्र-कारी) 
3. वातपित्तोल्वणहीन वात सन्निपात ज्वर (भल्लु, फल्गु) 
4. वातपित्तोल्वणहीन कफ-पित्त सन्निपात ज्वर (विस्फारक, विस्फोटक) 
5. वातपित्तोल्वणहीन कफ-वात सन्निपात ज्वर (आशुकारी) 
6. वातपित्तोल्बणहीन वात-पित्त सन्निपात ज्वर (कम्पन) 
7. वातपित्तोल्वणहीन मध्यपित्त हीन पित्त सन्निपात ज्वर (वैदारिक) 
8. पित्तोल्वण मध्य कफ हीन सन्निपात ज्वर (याम्य, संग्राम) 
9. वातोल्वण मध्य हीन पित्त वात सन्निपात ज्वर (कुकज) 
0. कफोल्वण मध्य वात हीन पित सन्निपात ज्वर (कर्कटक, कर्कोटक) 
7. वातोल्वण मध्य पित्त हीन कफ सन्निपात ज्वर (सम्मोह) 
2. पित्तोल्वण मध्य वात हीन कफ सन्निपात ज्वर ( पाकल) 
3. त्रिदोषोल्वण सन्निपात ज्वर (कूट पाकल) 
सुश्रुत के अनुसार सन्न्पात ज्वर 
. अभिन्‍्यास सन्निपात ज्वर। 
2. हतौजस सन्निपात ज्वर। 
3. संन्यास सन्निपात ज्वर। 
4. आजोनिरोधज सन्निपात ज्वर। 
भाव प्रकाश आदि में तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वरों का वर्णन किया गया है-- 
. शीताड़ ज्वर। 
2. तन्द्रिक (तन्त्री) ज्वर। 
3. प्रलापक (प्रलापी)। 
4. रक्तष्ठीवी ज्वर। 
5. भुग्ननेत्र ज्वर। 
6. अभिन्‍यास ज्वर। 
7. जिहृवक ज्वर। 
8. सन्धिक ज्वर। 
9. अन्तक ज्वर। 
0. रुग्दाह ज्वर। 
7. चित-विश्रम ज्वर। 
32. कर्णिक ज्वर। 
3. कण्ठ, कुब्जक (कण्ठ-ग्रह) ज्वर। 
भाव प्रकाश आदि के अनुसार तेरह प्रकार के और भी सन्निपात ज्वर होते हैं- 
3. कुम्भी पाक ज्वर। 
2. प्रोर्णनाव 
380 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


3. प्रंलापी ज्वर। 
4. अन्तर्दाह ज्वर। 
5. दण्डपात ज्वर। 
6. अन्तक ज्वर। 
4. एणीदाह ज्वर। 
8. हारिद्र ज्वर। 
9. अजघोष ज्वर। 
0. भूतहास ज्वर। 
. यन्त्रपीड ज्वर। 
2. सनन्‍्यास ज्वर। 
3. संशोषी ज्वर। 
(शा!) मानसिक ज्वर 
. काम-ज्वर। 
2. शोकज ज्वर। 
3. भयज ज्वर। 
4. क्रोधज ज्वर। 
(75%) आगजन्तुज ज्वर 
..अभिघात ज्वर। 
2. अभिषक्ष ज्वर। 
3. अभिचार 
4. अभिशाप ज्वर। 
5. विषज ज्वर। 
6. औषधि गंधज ५ 
अभिषज्ञ ज्वर कारण भेद से पाँच प्रकार का होता है-कामज, शोकज, भयज, 
क्रोधज तथा भूतावेश। 
(50) विविध ज्वर 
. औपत्यक ज्वर। 
. मद्य जन्य ज्वर। 
वात बलासक। 
- गंभीर ज्वर। 
. दाह पूर्वक ज्वर। 
« शीत पूर्वक ज्वर। 
. चेतना जन्य ज्वर। 
. हारिद्रक ज्वर। 
9. रात्रिक ज्वर। 
0. अर्द्धनारीश्वर ज्वर। 


विविध आयुर्वेदीय संहिताओं में वर्णित ज्वरों का वर्गीकरण देखने के पश्चात्‌ 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 38 


9० नये 90 एफ के 9० ७ 


रामायण में वर्णित एवं उल्लिखित ज्वरों की संक्षेप में समीक्षा इस प्रकार प्रस्तुत है- 
काम ज्वर 
“काम-ज्वर' में चित्त का विश्रंश, तन्द्रा, आलस्य, भोजन की अनिच्छा, हृदय में 
वेदना तथा शरीर और मुख कां सूखना आदि लक्षण होते हैं।!” वाग्भटाचार्य ने 
काम-ज्वर में भ्रम, बेचैनी और दाह का होना तथा लण्जा, निद्रा, बुद्धि और धैर्य का 
नष्ट होना तथा रुग्ण का एकान्त में किसी (अभीष्ट व अप्राप्त कामिनी) के चिंतन में 
लगे रहना एवं शोकाकुल ऊँची साँस का छोड़ना आदि लक्षण लिखे हैं-?* 
आयुर्वेद मतानुसार 'ज्वर' को रोग राट््‌ माना गया है। रामायण में भी 'ज्वर' का 
उल्लेख बार-बार आता है। प्रमुखतः ज्वर तापमान की वृद्धि या ऊष्मा से सम्बन्धित 
है तथा अन्य रूप से सामान्य पीड़ाओं को (मनुष्य की रुग्णावस्था को) भी ज्वर कहते 
हैं। 'काम ज्वर' या 'अनंग ज्वर' का नामोल्लेख रामायण में कई बार हुआ है। सीता 
के विरह में व्याकुल श्री राम लक्ष्मण से इस प्रकार कहते हैं, 'अनंग वेदना से उत्पन्न 
हुई शोकाग्नि वसन्तऋतु के गुणों का ईंधन पाकर बढ़ गयी है, जान पड़ता है यह मुझे 
शीघ्र ही अविलम्ब जला देगी।” 
“अपनी उस प्रियतमा पत्नी को मैं नहीं देख पाता हूँ और इन मनोहर वृक्षों को 
देख रहा हूँ, इसलिये मेरा यह अनडू ज्वर अब और बढ़ जायेगा ।'” 
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रामायण में काम ज्वर का विशदू वर्णन प्राप्त होता है। 
भयज ज्वर (शोक ज्वर) 
भय तथा शोक से उत्पन्न ज्वर में रुग्ण प्रलाप (असम्बद्ध भाषण) करता है एवं 
कोप से उत्पन्न ज्वर में रुण्ण का शरीर काँपने लगता है एवं अभिचार (मंत्रादि से 
मारण प्रयोग) तथा ब्रह्मर्षि गुरु सिद्ध आदि के अभिशाप से उत्पन्न ज्वर में मोह 
(मूर्च्ठ) और तृष्णा होती है। इसी प्रकार भूतों (प्रेतों या देवादि ग्रहों) के अभिषज्ञ 
(सम्बन्ध या आवेग) से उत्पन्न हुए ज्वर में रुगण को सभी उद्वेग (चित्त की अशान्ति) 
कभी हास्य तथा कभी रुदन होता है।” 
वाग्भटाचार्य ने लिखा है कि अभिचार (श्येनादि याग या विपरीत मंत्र और 
लौह-सुवा) के प्रयोग से उत्पन्न होने वाले ज्वर से प्रथम दाह, चित्त में होता है तथा 
बाद में देह में दाह होता है और इसके बाद विस्फोट, तृषा, भ्रम और मूर्च्छा के साथ 
ज्वर की वृद्धि होती है।” 
भयादि ज्वर लक्षण 
सु. सं. में भय-शोकादि से उत्पन्न ज्वर के लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया 
गया है- 
शोकजे वाष्पं बहुलम्‌ ऋ्रासप्रायं भय ज्वरे। 
क्रोधजे बहुसंरम्भ॑ भूतावेशे त्वमानुषम्‌।। 
मूर्च्छामोहमदग्लानि भूयिष्ठं सम्भवे। 


382 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


केषांचिदेषां लिझ्ञानां सन्‍्तापो जायते पुरः।। 
पश्चातूतुल्यन्तु केषांचिदेषु काम ज्वरादिषु। 
मनस्यभिहते पूर्व कामायरैर्न तथा बलमू।। 
ज्वरः प्राप्नोति वातायैर्देहोयावन्‍्न दुष्यति। 
देहे चाभि द्वुते पूर्वे वातायै्न तथा बलम्‌।। 
ज्वरः प्राप्नोति कामाद्ैमनो यावन्नदुष्यिति ।। 

माधवकार ने काम-शोक और भय से वायु, क्रोध से पित्त और भूताभिषज्ञ से 
तीनों दोषों का कुपित होना लिखा है- 

“कामशोक भयाद्वायुः क्रोधात्पितंत्रयो मलाः। 
भूताभिषज्ञत्कुप्यन्ति भूत सामान्यलक्षणाः।।! 

रामायण में भयज ज्वर अथवा शोक ज्वर का भी उल्लेख किया गया है। “रावणः 
स्थितः ज्वरः'” कहकर इसके प्रभाव को दर्शित करते हुए यह कहा गया है कि 'स 
बभूव कृशो”* वह कृशकाय अर्थात्‌ कमजोर हो गया। ज्वर के प्रभाव से मानव कृश 
हो जाता है। केवल मनुष्य मात्र का नहीं हाथी के ज्वर का उल्लेख भी रामायण में है। 
ज्वर के कारण हाथी काँपने लगता है-और घबराने लगता है-ठीक इसी प्रकार राजा 
दशरथ कॉपने और घबराने लगे” “ज्वरातुरोनाग इव व्याधातुरः” (ज्वर से पीड़ित एवं 
व्ययथित हुए हाथी की तरह आतुर होकर राजा घबराने लगे, आँसू बहाने लगे और 
काँप उठे ) 
वाल्मीकि रामायण में ज्वर के कई प्रकारों का वर्णन किया गया है- 

. काम ज्वर (अनड ज्वर)। 

2. शोक ज्वर। 

3. हाथी का ज्वर। 

4. मानसिक ज्वर। 

"सुश्रुत संहिता” में इनके विषय में उल्लेख किया गया है-“भूत-प्रेतादिकों के 
अभिषंड्‌ (आवेश) से उत्पन्न हुए ज्वर की चिकित्सा में भूत विद्या तंत्र में कहे हुए मंत्र 
पूर्वक रज्ज्यादि से बन्धन आवेशन (मंत्र-पूर्वक सर्षपादि से ताड़न) तथा पूजंन करना 
चाहिये तथा काम, क्रोध, शोकादि से उत्पन्न हुए मानस ज्वर को विज्ञानादिक उपायों 
से शान्त करना चाहिये ।*९ 
तन्त्रान्तरोक्त भूत ज्वर चिकित्सा 

सहदेवाया मूलं विधिना कण्ठे निबद्ध मपहरति। 
एकबित्रिचतुर्भिदिवसैर्भूत ज्वरं पुंसामू।। (सु. उ. 39/265) 
मानस ज्वर 
वास्तव में देह शरीर और मन में जो संताप होता है, उसी को ज्वर कहते हैं। 


“ज्वरः प्रत्यात्मिकं लिज्ञ संतापो देह मानसः? किंवा देह, इन्द्रिय और मन को तप्त करने 
वाल्मीकि. रामायण में वर्णित रोंग एवं उनका निदान / 383 


वाला जो हो उसे ज्वर कहते हैं'-आश्रय भेद से भी ज्वर के शरीर और मानस ये ही 
दो मुख्य भेद किये गये हैं*--मानस ज्वरोत्पत्ति में काम, शोक, क्रोध और भय ये मुख्य 
कारण हैं तथा इनसे उत्पन्न ज्वर को अभिषज्ञ ज्वर भी कहा जाता है”-काम, शोक 
और भय से वायु का प्रकोप होता है तथा क्रोध से पित्त और भूताभिषड् से तीनों दोष 
प्रकुपित होकर ज्वरादि रोग करते हैं ।# काम ज्वर में भय, अरुचि, दाह होता है तथा 
लज्जा, निद्रा बुद्धि और बैर्य का क्षय हो जाता है।” मानस ज्वर चिकित्सा में 
विज्ञानादि का जो संकेत किया है उसमें आदि शब्द से धैर्य, स्मृति, ज्ञान और समाधि 
का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि चरकाचार्य ने कहा है कि बुद्धि, धैर्य, स्मृति, ज्ञान 
आदि यें मनोदोष की परम्‌ औषध मानी जाती हैं। 

“थी धैर्यात्मविज्ञानं मनोदोषौषधं परम्‌ ।” विविध प्रकारोत्थ मानस ज्वर शमनोपाया- 

क्रोधजे पित्तजित्कायें धार्ये सद्वाक्यमेव च। 

आश्वासेनेष्टलाभेन वायोः प्रशमनेन च।। 

हर्षणैश्च शमं यान्ति काम क्रोध-भय ज्वराः। 

कामैरथ मनोष्नैश्च पित्तब्नैश्वाप्युपकमैः ।। 

सद्वाक्यैश्च शमं याति ज्वरः क्रोधसमुत्यितः ।। 

रामायण में मानसिक ज्वर का भी उल्लेख है-विभीषण के हित-प्रद वचनों को 
सुनकर “निशम्य तदूवाक्यमुपस्थितोज्वरः ।”* रावण को ज्वर हो गया यह मानसिक 
ज्वर था। इससे राजा “वभूवः कृशोराज'”” कमजोर हो गया। 

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण में 'ज्वर' रोग का विशद्‌ 
वर्णन किया गया है। 
अंग-भेदन 

“ंग-भेदन! से तात्पर्य अंगों के विंधने या अस्थि-भंग हो जाने या किसी अंग के 
कट जाने आदि से लिया जाता है। रामायण में इस प्रकार अंगों के कटने या उनमें 
घाव हो जाने आदि का अनेक स्थलों पर उल्लेख किया गया है। इस प्रकार की 
परिस्थिति में विविधता दिखाई पड़ती है अतः भिन्न-भिन्न स्थितियों की चिकित्सा भी 
भिन्न-भिन्न प्रकार से ही की जा सकती है। 

संक्षेप में रामायण के प्रसंगों का उल्लेख निम्नवत्‌ है- 

शरभज्ञ मुनि के शरीरावयवों का अग्नि द्वारा भस्म कर देना भी इसी को सूचित 
करता है, “उस समय अग्नि ने उन महात्मा के रोम, केश, नख, जीर्ण-त्वचा, हड्डी, 
मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया 7”* इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर 
भी इसी प्रकार का वर्णन प्राप्त होता है, “उन दोनों में वहाँ प्राणान्तकारी युद्ध छिड़ 
गया। उस समय वाली ने दुन्दुभि को उठाकर पृथ्वी पर दे मारा, साथ ही अपने शरीर 
से उसको दबा दिया, जिससे दुन्दुभि पिस गया /' गिरते समय उसके शरीर के समस्त 
छिद्रों से बहुत-सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु असुर पृथ्वी पर गिरा और मर 

384 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गया।?* 

एक अन्य स्थल पर “उसकी चोट लगते ही समराज्ञण में सुमाली का काम तमाम 
हो गया। न उसकी हड्डी का पता लगा, न मस्तक का और न कहीं उसका मांस हीं 
दिखाई दिया। वह सब कुछ उस गदा की आग से भस्म हो गया।"* 

हनुमान का वर्णन करते हुए एक स्थल पर कहा गया है, “इन्द्र के वज़ की चोट 
खाकर यह एक पहाड़ पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी ।* 

अक्षय कुमार तथा हनुमान के युद्ध का वर्णन करते हुए भी ऐसा ही प्रसंग सामने 
आया है, “नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छाती के टुकड़े-टुकड़े हो गये, 
खून की धारा बहने लगी, शरीर की हड्ड्डयाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल 
आयीं, अस्थियों के जोड़ टूट गये। और नस-नाड़ियों के बन्धन शिथिल हो गये। इस 
तरह राक्षस पवन-कुमार हनुमान जी के हाथ से मारा गया ।/ 

राम एवं राक्षसों के युद्ध का वर्णन भी यही प्रदर्शित करता है, “उन राक्षसों के 
घोर अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से यद्यपि श्री राम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी 
वे व्यधित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान वज्रों के आधात सहकर 
भी महानू पर्वत अडिग बना रहता है 7? श्री रामचन्द्र जी के सारे अंगों में घाव हो 
गया था, वे लहूलुहान हो रहे थे।“ परन्तु पराक्रमी महाबाहु श्री राम ने रण-भूमि में 
अपने वाणों द्वारा उनके अस्त्र-शस्त्रों को रोक कर उनके गले काट डाले और प्राण हर 
लिये।* सिर, ढाल और धनुष के कट जाने पर वे निशाचर गरुड़ के पंख की हवा से 
टूटकर गिरने वाले नन्‍्दन वन के वृक्षों की भाँति धराशायी हो गयें।४ जहाँ-जहाँ दृष्टि डे 
जाती थी वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे, गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए 
दिखाई देते थे।० वहाँ श्री राम के वाणों से कटे हुए पगड़ियों सहित मस्तकों, बाजूबंद 
सहित भुजाओं, जाँघों, बाहों आदि से पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखाई 
देती थी। उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख श्री रामचन्द्र जी ने उसकी दोनों भुजाएँ 
काट डालीं । श्री राम ने महा कपाल का कपाल एवं सिर उड़ा दिया। प्रमाथी को 
असंख्य वाण-समूहों से मथ डाला एवं स्थूलाक्ष की स्थूल आँखों को सायकों से भर 
दिया।“ एक वाण से तो खर के रथ का जुआ काट दिया, चार वाणों से चारों 
चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाण से युद्ध स्थल में खर के सारधि का मस्तक 
काट गिराया।* 

रावण ने शूर्पणखा से पूछा किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं।” 

वज् के समान तेजस्वी उस उत्तम वाण ने मृगरूपधारी मारीच के शरीर को 
चीरकर उसके हृदय को भी विदीर्ण कर दिया ।* 

इस प्रकार उपरोक्त स्थलों पर दृष्टि-पात करने से यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 385 


जाता है कि रामायण में “अंग-भेदन” का विशद्‌-वर्णन किया गया है। इन प्रसंगों के 
अतिरिक्त रामायण में और भी ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ पर “अंग-भेदन” का ही 
उल्लेख किया गया है। इसका सूक्ष्म अवलोकन इस प्रकार है यथा- 
कटे-पिटे, व्यथित, रक्‍्त-वमन करना आदि। ये सभी “अंग-भेदन” की ओर संकेत 
करते हैं। मा 
. कटे-पिटे ४ 
2. व्यथित ।* 
3. रक्त वमन करना अ. 67/4, 68/5, कि. 6/22, 48/2, यु. 52/0, 
54/25, 58/6, 59/6, 67/20, 27, 9, 96, 
89/50, 90/2 । 


कान से खून बहना कि. /4, यु. 59/6 

क्रन्दन करना सुं, 54/25 

कराहना यु. 4408 

लहूलुहान यु. 24/88, 3/28, 49/4, 5/3, 53/9, 68/39, 


64/25, 66/3, 67/89, 73/4, 5, 80/30, 34 
उ. 75/85, श/8॥ 

घाव (व्रण) यु. 4]/25, 05/45, अयो. 73/2 अ. 2२/२, कि. 
6/24, 6/2, सुं, 38/24, 46/36, यु. 22/38, 
54/32, 74/73, 88/55, 02/9, 4, 7, उ. 7/5, 


28/36 
छाती में आघात सु. 47/25, 67/7, 8 यु. 77/6, 90/9 
छटपटाना यु. 59/7, अयो. 4/ 
घायल अयो. /8, अ. 25/3, कि. 2/22, 22/24, 


49/2, यु. 24/38, 44/3, 49/4, 52/7, 54/0, 
69/9], 94, 76/56, 90/26, 9/, 00/, 
403/प्रा. उ. 5/28, 35, 0/22, 23/26, 29, 34, 


85/48 । 
शरीर में चिन्ह दागना सुं, 52/5 
तड़पना यु. 59/7 
हताहत यु. 4/78 
क्षत-विक्षत अयो. 9/4, सुं. 38/8, यु. 48/23, 34, 44/8, 


3, 35, 70/30, 57, 7/42, 73/4, 55, 80/30, 
85/20, 49, 58, 7, 02/9, उ. 28/4, 28/॥] 
शूल अयो. 4/श 


386 “वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जर्जर अयो. 9/5 

इस प्रकार यदि रामायण में वर्णित उपरोक्त सभी प्रसंग स्थलों पर दृष्टिपात किया 
जाये तो यह सर्व-विदित हो जायेगा कि “अंग-भेदन” की प्रचुर सामग्री ;रामायण में 
उपलब्ध है। 
शिरो-रोग 

शिशे-रोग से तात्पर्य मानसिक रोगों से है। रोग दो प्रकार के हुआ करते हैं-शारीरिक 
तथा मानसिक, दोनों ही रोगों की उत्पत्ति तथा चिकित्सा अलग-अलग होते हुए भी दोनों 
रोग एक-दूसरे से अन्योन्याश्रित रहते हैं। जिस मनुष्य का मन रुग्ण है, उसका शरीर भी 
रोगी है तथा जिस मनुष्य का शरीर रोगी है उसका मन भी आक्रान्त है। परन्तु कभी-कभी 
अपवाद भी होते हैं यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मानसिक रोग सभी कष्ट साध्य 
होते हैं जबकि शारीरिक रोग सामान्यतः सुसाध्य | जिस प्रकार शारीरिक रोगों की उत्पत्ति 
त्रिदोष “वात-पित्त-कफ” से होती है, इसी प्रकार मानसिक रोगों की उत्पत्ति तमोगुण से 
हुआ करती है। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, शोक” आदि मनो-वेग जो तमो गुण प्रधान 
होते हैं-मानसिक रोगों के कारण होते हैं। 

रामयण में विभिन्‍न शिरो-रोगों का वर्णन है यथा- 
मानसिक ज्वर 
() उन्माद(भूतोन्माद) 

(पिशाचोन्माद) 
(गन्धर्वोन्माद) 

(॥) मूर्च्छा 
(गत) शोकोन्माद 
(॥५) कामोन्माद 
(५) मद 
(५) पा्गलपन 
(शा) मदाशय 
(शा) दीनता, आतुरता आदि। 

इन सभी रोगों की विशद्‌ समीक्षा अन्यत्र की जा रही है, अतः यहाँ सक्षेप में ही 
तथ्य प्रस्तुत किया गया हैः 
राज-यक्ष्मा 

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी आदि 27 नक्षत्र हैं, इन्हें दक्ष-प्रजापति की 
कन्याएँ माना जाता है। चन्द्रमा ने इन 27 कन्याओं के साथ विवाह किया था। परन्तु 
चन्द्रमा रोहिणी में ही आसक्त रहने लगा। अन्य कन्याओं ने चन्द्रमा के इस व्यवहार 
की बात अपने पिता से कही तो वे क्रुद्ध हुए और उन्होंने चन्द्रमा को शाप दिया 


जिससे उसका शरीर और बल दिन-प्रतिदिन घटता चला गया तब चन्द्रमा ने अपने 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 387 


ससुर से क्षमायाचना की और सभी पत्नियों के साथ एक-सा व्यवहार करने का 
आश्वासन दिया। तत्पश्चात्‌ अश्विनी कुमारों ने रसायन और ओजो-वर्धक औषधियों 
से चन्द्रमा की चिकित्सा की और उसे स्वस्थ किया। 

इस पौसणिक कथा से तीन बातें स्पष्ट होती हैं- 
(0) अधिक कामासकत रहने से शुक्रक्षय के कारण राज-यक्ष्मा होता है। 
(7) मानसिक कारणों (शाप -आदि) में भी राज-यक्ष्मा होता है। 
(गा). राज-यक्ष्मा से सर्व-धातु सार-ओज का क्षय होता है। 

यह रोग सर्व-प्रथम नक्षत्र राज चन्द्रमा को हुआ था इसीलिये इसे रोग राटू भी 
कहते हैं। क्षय (एणा5$णाफंणा) शोष (॥॥#5) तथा यक्ष्मा (एफरदारए00०70७ं5) 


एक ही व्याधि है। 
राज-यक्ष्मा के निदान 
साहस, वेग-धारण, क्षय, विषमाशन । 
राज-यक्ष्मा के भेद 
. कारणों के आधार पर चार प्रकार के होते हैं-साहसज, वेगधारणज, क्षयज 
और विषमाशनज राज-यक्ष्मा। 


2. लक्षणों के आधार पर राज-यक्ष्मा तीन प्रकारे का होता है-त्रिरूप राज-यक्ष्मा, 
घटूरूप राज-यक्ष्मा, एकादश रूप राज-यक्ष्मा । ग 
5. वैसे तो राज-यक्ष्मा एक ही रोग है, त्रिदोषज है, रोग समूह है, रोग राट्‌ है। 
राज-यक्ष्मा के पूर्व-रूप 
१. प्रतिश्याय 
2. दौर्बल्य 
3. दोष रहित वस्तु में भी दोष दर्शन 
4. बल तथा मांस का क्षय 
5. स्वप्न में गिद्धों द्वारा ऊपर उड़ा ले जाना 
6. स्त्री, मद्य और मांस में अधिक रुचि होना तथा 
7. स्वप्न में नदी, जलाशय एवं वनों को शुष्क देख॑ना। 
राज-यक्ष्मा के लक्षण 
राज-यक्ष्मा के त्रिरूप- 
. अंसपार्श्वाभिताप 
. 2. करपाद संताप 
$. ज़्वर 
राज-यक्ष्मा के षट्र्‌ रूप 
. ज्वर 2. कास 
- 3. पार्श्वशूल 4. मल-भैद 
388 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


5. स्वर भेद 6. अरुचि। 
राज-यक्ष्मा के एकादश रूप 

. कास 2. ज्वर 

$. पार्श्वशूल 4. मल-भेद 
5. अरुचि 6. शिरः शूल 


7. श्वास 8. रक्तष्ठीवन 
9. कफष्ठीवन 0. अंसाभिताप। 
“राज-यक्ष्मा के दोषानुसार लक्षण 


वायु के लक्षण-स्वर भेद, पार्श्वशूल तथा पार्श्वसंकोच। 

पित्त के लक्षण-ज्वर, दाह, अतिसार, रक्तष्ठीवन। 

कफ के लक्षण-शिरोगौरव, अरुचि, कास, कण्ठोध्वंस। 
साध्यासाध्यता 

१. जो रोगी बलवान हो और जिसकी रक्त मांस आदि धातुएँ अधिक क्षीण न 
हुई हो, वह साध्य होता है। 

2. रोगी दुर्बल हो गया हो परन्तु उसकी रक्त मांस आदि धातुएँ क्षीण न हुई हों 
तो भी साध्य मानना चाहिये। 

3. यदि राज-यक्ष्मा के सम्पूर्ण लक्षण मिलते हैं तो असाध्य मानें। 

4. राज-यक्ष्मा में अचानक कई विचित्र अरिष्ट लक्षण पैदा हो जाते हैं, तब वह 
असाध्यावस्था बन जाती है। 

5. दौर्बल्य और धातुक्षय बहुत हो गया हो तो कष्ट साध्य समझना चाहिये। 
चिकित्सा 

. राज-यक्ष्मा में धातु- क्षय होता है, ओज एवं बल का क्षय होता है अतः बल्य, 
वृष्य एवं ओजो वर्धक आहार-विहार करना चाहिये। 

2. कास हो तो वासा, दाह हो तो द्राक्षा, श्वास हो तो भागी, रक्तष्ठीवन हो तो 
लाक्षा, कफष्ठीवन हो तो अभ्रक, उरः शूल हो श्रृंग, स्वर- भेद हो तो यष्टी मंधु एवं 
अन्य कोई लक्षण हो तो इसी प्रकार की लाक्षाणिक चिकित्सा भी करनी चाहिये। 

पथ्य-शालि, गो-धूम, यवात्र, मुदृगयूष, दाडिम, आमलकी, आग्र, दुग्ध, अजा-दुग्ध, 
मांस, मद्य। 

अपथ्य-बैंगन, करेला, बिल्व, राई तैल साधित वस्तु, मैथुन, दिवा-स्वप्न, क्रोध 
तथा राज-यक्ष्मा के सभी निदान। 

वाल्मीकि रामायण में युद्ध काण्ड के नवें सर्ग के नवें श्लोक में कहा गया है, 'जो | 
महारोग आदि से ग्रस्त होने के कारण दैव से मारे गये हों, उन्हीं पर भली-भाँति परीक्षा 
करके विधि-पूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं।* 


उपरोक्त प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि रामायण में 'महारोग' का उल्लेख किया 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 389 


गया है प्राचीन काल में जब विज्ञान के प्रगति अधिक नहीं हो पायी थी, तब व्यक्ति 
ऐसे रोगों से ग्रसित हो जाता था जो असाध्य होते थे-इन्हीं को रामायणकालीन 
समाज “महारोग' की संज्ञा देता है। आज यद्यपि समाज ने तथा विज्ञान ने बहुत प्रगति 
कर ली है तथापि कुछ रोग ऐसे हैं जिनको पूर्णतः समाप्त करने का कोई उपाय नहीं 
बन पाया है फिर भी यदि समय रहते उनका पता लग जाये तब उनकी चिकित्सा 
संभव है-महारोग की श्रेणी में मुख्यतः राज-यक्ष्मा, कैंसर, प्लेग, हैजा, आदि असाध्य 
रोग आते हैं। इनमें से रामायण-काल में केवल राज-यक्ष्मा को 'महारोग” माने जाने की 
संभावना है अतः महारोग के रूप में राज-यक्ष्मा का ही समावेश किया जा सकता है। 
कुष्ठ 

इस रोग को संस्कृत में “कुष्ठ, महाकुष्ठ” हिन्दी में कोढ़, हिकमत में जजाम और 
अंग्रेजी में लैपरोसी (6.०7०059) कहते हैं। 

कुष्ठ रोग शरीर में एक विशेष प्रकार के कीटाणुओं के चले जाने से हो जाता है। 
वर्षों तक रोगी या डॉक्टर इस रोग का पता नहीं लगा सकता और न ही रोगी को 
किसी प्रकार का कष्ट होता है। 

कृष्ठ रोगी के शरीर में दोष आ जाने से त्वचा पर गुठलियाँ (५०००९७) 
छोटे-छोटे उभार, मस्से पैदा हो जाते, रोग बढ़ जाने पर उनमें तरल व पीप पड़ जाती, 
चर्म मोटा, खुखुरा हो जाता, त्वचा फट कर उसमें चीर पड़ जाते हैं। कई बार रोगी 
की त्वचा पर छाले (8॥92) और घाव भी हो जाते हैं। 

चरक ने कुष्ठ के सात भेद, अठारह भेद तथा असंख्य भेद माने हैं। 

सुश्रुत ने भी महाकुष्ठ एवं क्षुद्र कुष्ठ भेद से 8 प्रकार के कुष्ठ रोगों का वर्णन 
किया है। 
चरक के अनुसार 7 प्रकार के कुष्ठ- (भाव प्रकाश के अनुसार महाकुष्ठ)- 


. कपाल-कुष्ठ 2. उदुम्बर कुष्ठ. 3. मण्डल कुष्ठ 
4. ऋष्यजिह्न कुष्ठ 5. पुण्डरीक कुष्ठ 6. सिध्म कुष्ठ 
7. काकणक कुष्ठ 

सुश्रुत एवं वाग्भट के अनुसार 7 प्रकार के महाकुष्ठ 
. कपाल-कुष्ठ 2. उदम्बर कुष्ठ. 3. अरुण कुष्ठ 
4: ऋष्यजिहव कुष्ठ.. 5. पुण्डरीक कुष्ठ 6. दद्ु कुष्ठ 
7. काकणक कुष्ठ 

सुश्रुत के अनुसार 7 प्रकार के छुद्र-कुष्ठ 
. स्थूलारुष्क 2. महाकुष्ठ 3. एककुष्ठ 
4. चर्मदल 5. विसर्प कुष्ठ. 6. परिसर्प 


390 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


7. सिध्म 8. विचर्चिका 9. किटिभ 
0. पामा 3. रकसा 
वाग्भटानुसार ] प्रकार के क्षुद्र-कुष्ठ 
. एक कुष्ठ 2. चर्म-कुष्ठ $. किटिभ 
4. विपादिका 5. अलसक 6. सिध्म 
7. चर्म-दल 8. पामा 9. विस्फोट 
0. शतारु_. विचर्चिका 
साध्यासाध्यता के भेद से सप्त-शाखागत कुष्ठ (सुश्रुत-निदान 5) 


. त्वचागत 2. रक्तगत 3. मांसगत 
4. मेदगत 5. अस्थिगत 6. मज्जागत 
7. शुक्रगत कुष्ठ 


वाल्मीकि रामायण ज्ञान का अथाह सागर है, इसमें काफी खोजने के पश्चात भी 
“कुष्ठ” रोग के विषय में किसी भी प्रकार की कोई जानकारी नहीं मिल पायी है। 
गुल्म 
वाल्मीकि रामायण में 'गुल्म” का प्रयोग लता-वृक्ष-गुल्म आदि के रूप में तो किया 
गया है किन्तु 'गुल्म” रोग विशेष के रूप में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया 
है। 
अतः इसका विशद्‌ विवेचन रामायण के आधार पर करना असम्भव है। 
व्रण 
"मुश्रुत संहिता” में व्रण का उल्लेख इस प्रकार है, “त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु, 
: अस्थि, सन्धि कोष्ठ और मर्म ये आठ व्रण वस्तुएँ हैं। इन्हीं में सर्वप्रकार के व्रणों का 
सान्निवेश या स्थिति होती है /”* इसमें से दीर्घ, चतुष्कोण, गोल और त्रिकोण ये 
संक्षेप से चार व्रण की आकृतियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त विकृत आकृति वाले ब्रण 
दुःखसाध्य होते हैं” जो मनुष्य पथ्यकारी आहार-विहार करते हैं तथा सुशिक्षित और 
अनुभवी वैद्यों के द्वारा चिकित्सा करते हैं, उनके सर्व प्रकार के व्रण शीघ्र ही रोपित हो 
जाते हैं किन्तु आहार-विहार में कुपथ्य करने तथा अशिक्षित और अनुभवहीन नीम 
हकीमी चिकित्सा करने वाले मनुष्यों के व्रण-दोषों की वृद्धि हो जाने से दूषित या 
दुश्चिकिल्स्य होते हैं ।* प्रायः व्रण में सफाई का ध्यान रखने से तथा जन्तुनाशक घोलों 
से प्रक्षालल आदि न करने से व्रण दूषित (५००७०) हो जाते हैं जिससे वे शीघ्र नहीं भरते हैं। 
अधिक छोटे मुख वाला, अधिक चौड़े मुख वाला, अति कठिन, अति मृदु, उन्नत 
(उठा हुआ) मांस, हीन मांस, अधिक ठण्डा, अधिक गर्म, काला, लाल, पीला, और 
श्वेत रंगों में से किसी एक रंग वाला, देखने में भयानक, दुर्गन्धित पूय, मांस, सिरा, 
स्नायु आदि से युक्त, दुर्गन्धित पूय के स्राव से युक्त, उन्मार्गी, ऊँचा उठा हुआ, देखने 
में और गंध में विकृत, अधिक पीड़ा युक्त दाह, पाक, लालिमा, खुजली, शोथ और 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 39। 





पिड़काओं से उपद्गुत, अत्यन्त दूषित रक्त के स्राव से उक्त तथा अधिक तप 
अनुबन्धित (विद्यमान) ये दुष्टव्रण के लक्षण हैं। दोषों की अधिकता के अनुसार 
ब्रण के 6 विभाग कर यथा दोष चिकित्सा करने में यलशील होना चाहिये।* 

त्वचा के घिस जाने या छिल जाने पर तथा फोड़ों के स्वयं फूट जाने या विद्ारित 
करने पर जल के समान स्राव निकलता है जो कि कु 
है। मांस स्थित व्रण का स्राव घृत के समान गाढ़ा यदिया होता है। सिरा स्थित 
व्रण की यदि तत्काल सिरा कटी हो तो उसमें ले रक्त का अधिक ञ्ञाव होता है। णक 
हो जाने पर जल की नालियों से जल निकलने के समान ८ग से पूय का ज्नवण होता 
है। इस तरह का स्राव पतला, खण्ड़ित, लसदार, गाढ़ा, काला तथा ओस के समान 
होता है। स्नायुगत व्रण का स्नाव चिकना, गाढ़ा, नासा से निकलने वाले पीत शोप्पा 
के समान तथा रक्त युक्त होता है। अस्थि के टूटने-उटने भिन्‍न होने दः! दोषों से 
विदीर्ण होने पर अस्थि में व्रण हो जाता है तथा दोषों द्वारा अस्थि के भक्षित होने पर 
अस्थि निःसार (हल्की) तथा धोई हुई सीप के समान हो जाती है तथा उसमें से मज्जा, 
युक्त, स्निग्ध तथा रक्त-सहित स्राव निकलता है। सन्धि सें स्थित ब्रण होने पर सन्धि 
को दबाने पर भी स्ाव नहीं निकलता है किन्तु सन्धि को या अंग को कुंचन प्रसारण 
करने से ऊँचा उठाने या नीचा दबाने से एवं दौड़ने से, जोर से खासने से और प्रवाहण 
(काँखने) करने से निकलता है. तथा वह स्राव चिपचिपा, चासनी के समान तार 
टपकाने वाला एवं फेन, मवाद तथा रक्त से मथित जैसा होता है। व्रण के कोष्ठ में 
स्थित होने पर उसमें से रक्त, मूत्र, मल, पूथ और जल टपकते हैं ।० 
लक्षण 

वायु के कारण-त्वचा गत व्रण स्राव परुष, मांस गत काला, स्नायुगत दही के 
पानी के समान, सिरागत कुहरे के समान, अस्थिगत क्षारोदक के समान, संधिगत 
मांस-धावन के समान तथा कोष्ठ-गत ब्रण स्नाव पुलाकोदक के समान होता है।” 

पित्त के कारण-क्रमशः ल्वगादि स्थानों के ब्रणों का स्राव गोमेदक, गोमूत्र, शंख, 
भस्म, कषायोदक, माध्वीक और तेल के समान होते हैं * 

रक्त के कारण-त्वगादि स्थानों के स्राव पित्त के ही समान होते हैं। किन्तु उन 
स्रावों में आम मांस की तरह दुर्गन्‍ध अधिक होती है [७ 

कफ के कारण-त्वगादि स्थानों के स्राव मक्खन, कासीस, मज्जा, पिष्टी, तिल, 
नारियल के जल के सदृश तथा शूकर की चर्बी के समान क्रमशः होते हैं।* 

सन्निपात के कारण-त्वगादि स्थानों के स्लाव नास्यिल के पानी, ककड़ी के जल, 
कॉँजी का स्वच्छ पानी, आरुकोदक, प्रियंगफल, यकृत मूंग के यूष के समान होते हैं ।० 

पकक्‍काशय से फुलकोदक के समान निकलने वाला स्राव असाध्य तथा रक्ताशय 
से क्षारोदक के समाने*निकलने वाला ज़ाव वर्जित है। इसी तरह आमाशय और त्रिक 
सन्धि से मटर के यूष के समान स्राव असाध्य होता है। इसलिये प्रथम इन स़रावों की 

392 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उस 














परीक्षा करके चिकित्सा करें * जहाँ तोदन (सुई चुभने के समान), भेदन (विदारण) 
ताडन, छेदन, आयमन (खींचने के समान), व्रण के भीतर मथने के समान, विक्षेपण, 
चुभ-चुभायन, जलाने के समान, अवभंजन (वायु से टूटने के समान) फूटने की सी, 
नखादि से विदारण के समान आदि की सी पीड़ा हो तथा अकारण ही अनेक प्रकार 
की बेदनाओं का प्रादुर्भाव होना आदि लक्षण हों तब वातिक व्रण जानना चाहिये। जहाँ 
पर ओष-चोष, परिदाह और व्रण से धूम निकलने की सी प्रतीति हो उसे पैत्तिक व्रण 
जानना चाहिये। पित्त के समान ही रक्त-दृष्टि से उत्पन्न ब्रण के लक्षण समझने 
चाहिये। जहाँ पर खुजली, भारीपन, सुप्ति, शरीर पर लिप्त-सा रहना आदि लक्षण हों 
वहाँ कफ दूषित व्रण समझना चाहिये | जहाँ पर तीनों दोषों में कही हुई सर्व-प्रकार की 
पीड़ाओं की उत्पत्ति हो उसे सन्निपातिक व्रण जानना चाहिये।” 

वायु के द्वारा दूषित व्रण भस्म, कपोत और अस्थि के समान होता है तथा स्पर्श 
में कठोर, कुछ लाल और काला होता है। रक्त और पित्त के द्वारा दूषित ब्रण नीला, 
पीला, हरा, आसमानी, काला, लाल, कपिल और पिड्नल वर्ण का होता है। कफ के 
द्वारा दूषित व्रण सफेद, चिकना और पाण्डु वर्ण का होता है। सन्निपात से दूषित व्रण 
उक्त सर्व-प्रकार के वर्णों से युक्त होता है।* 

न केवल व्रणेषूक्तो वेदना वर्ण सड्ढग्रहः। 
सर्व शोफ विकारेषु व्रणवल्लक्षयेद्रभिषक्‌ | ।* 

वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर 'ब्रण” का उल्लेख मिलता है। यथा- 

भरत कैकेई को धिक्कारते हुए कहते हैं, तूने राजा को परलोक वासी तथा श्री 
राम को तपस्वी बनाकर मुझे दुःख पर दुःख दिया है, घाव पर नमक सा छिड़क दिया 
है | 

खर शूर्पणखा से कहते हैं, बहिन ! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे अत्यधिक 
क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड 
वेग से बढ़े हए खारे पानी के समुद्र जल को (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे 
घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना)” 

एक अन्य स्थल पर वर्णन है, “उस वृक्ष की चोट से वाली के शरीर में घाव हो 
गया। उस आघात से विहल हुआ वह भार से दबी नौका के समान काँपने लगा” 

सम्पाति निशाकर मुनि को अपने पंख जलने का कारण बताते हुए कहते हैं- 
“मैंने कहा, भगवन! मेरे शरीर में घाव हो गया है, तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल 
हैं, इसलिये अधिक कष्ट पाने के कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता 7? 

लक्ष्मण के घावों का वर्णन है-उसकी गन्ध सूंघते ही लक्ष्मण के शरीर से वाण 
निकल गये और उनकी सारी पीड़ा दूर हो गयी। उनके शरीर में जितने भी घाव थे, 
भर गये।४ 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंगों पर दृष्टिपात करने से यह ज्ञात होता है कि रामायण 
में 'ब्रण” का पर्याप्त उल्लेख किया गया है तथा यत्र-तत्र इसकी चिकित्सा का भी 

वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 393 


उल्लेख मिलता है। इनके अतिरिक्त और भी अनेक स्थल रामायण में उपलब्ध हैं जो 
“ब्रण” की ओर इंगित करते हैं।" 
नाड़ी व्रण 

“व्रण” से थोड़ा भिन्‍न “नाड़ी ब्रण” है। आयुर्वेदाचार्य “नाड़ी व्रण” के पाँच भेद 
मानते हैं। 

- वातिक नाड़ी व्रण 

#- पैत्तिक नाड़ी व्रण 

$- श्लैष्मिक नाड़ी ब्रण 

4- त्रिदोषज नाड़ी व्रण 

5- शल्यज नाड़ी व्रण 

वाल्मीकि रामायण में नाड़ी व्रण का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 

: विसूचिका 

“चरक' तथा "सुश्रुत” में विसूचिका रोग का विशेष वर्णन नहीं हुआ है। 'सुश्रुत'* 
तथा माधव निदान में इसे अजीर्ण से उत्पन्न होने वाला वात-प्रधान रोग कहा जाता 
है अर्थात्‌ अजीर्ण जनित विष से आमाशय तथा क्षुद्राँत्र की प्राण-शक्ति क्षीण हो जाती 
है जिससे इनकी दीवार की रक्त वाहिनियाँ शिथिल हो जाती हैं, एवं उनसे रक्त का 
द्रव भाग प्रभूत मात्रा में बाहर निकलने लगता है। इस रोग की चिकित्सा के लिये रोगी 
को गर्म रखते हुए उसे उष्ण-दीपन-पाचन गुण औषधियाँ दी जाती हैं-उदाहरणतः 
अग्नि की वृद्धि के लिये संजीवनी वटी, विडंग, शुण्ठी, बिजली, त्रिफला, वचा, गुडडुची, 
भल्लातक, मीठा विष, समान-समान मात्रा में. मिला, गो-मूत्र से 5-6 दिन मर्दन 
करके - रत्ती की गोलियाँ बनायी जाती हैं, पोदीने के अर्क या प्याज के रस या 
अदरक रस के अनुपान से 5-5 मिनट के बाद २-2 गोली की मात्रा में 2 गोलियाँ 
तक दी जाती हैं। 

लहसुन का भी इस रोग में प्रयोग किया जाता है। “लहसुनाष्टक चूर्ण! या 
“लहसुन वटी” लहसुन 8 भाग, मरीचि 4 भाग, हींग 2 भाग, कपूर । भाग निम्ब के 
स्वरस में पीसकर चने के बराबर गोली बना ली जाती हैं। आधे-आधे घन्टे बाद दी 
जाती हैं। 

लाल-मिर्च तथा अहिफेन का भी इस रोग में प्रयोग किया जाता है। इसके लिये 
लाल-मिर्च, जाति-फल, हींग, प्रत्येक 2 तोला, कपूर 2 माशा, चन्द्रोदय 2 माशा, 
अहिफेन  माशा मिलाकर प्याज के रस से मूंग बराबर गोली बनाकर आधे-आधे घंटे 
के बाद इसकी 2-2 गोलियाँ अर्क-पोदीने के अनुपान से दी जाती हैं। कर्पूरासव, को 
75-75 बूंद की मात्रा में आधा-आधा घंटे के बाद देने से भी लाभ होता है। 
कर्पूरादिवटी को लौंग, सूखा पोदीना, एक-एक माशा को पीसकर थोड़ा गर्म जल 
मिला-छानकर उससे देते हैं। 8४5 0॥॥$ के प्रयोग से (श्ंपएण, गंप्ाएथ, 

394 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


/#॥॥5$८८० 0$ के समान-समान 28% या अमृतधारा की पाँच-पाँच बूंद की मात्रा में 
आधा-आधा घंटा बाद देने से भी लाभ हो जाता है। 

वाल्मीकि रामायण में आंत्र-रोग का तो उल्लेख प्राप्त होता है, किन्तु विषूचिका 
का नामोल्लेख प्राप्त नहीं होता। 
मंदाग्नि 

वाल्मीकि रामायण में “मंदाग्नि' रोग का भी कहीं भी उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, 
जबकि इससे थोड़ा मिलता-जुलता रोग आंत्र-रोग है, उसका उल्लेख अवश्य प्राप्त 
होता है। 

आंत्र-रोग की विशर्द्‌ समीक्षा अतिसार एवं विषूचिका में की जा चुकी है, अतः 
उसको दुबारा प्रस्तुत करना अनावश्यक प्रतीत हो रहा है। 
वायु रोग 

“चरक' ने 80 प्रकार की नानात्मज वात-व्याधियों का वर्णन किया है। अष्टाड़ 
संग्रह में भी चरक के अनुसार लगभग 80 प्रकार के वात के नानात्मज रोग मिलते हैं। 
शाईधर ने भी 80 प्रकार के वात के नानात्मज रोगों का उल्लेख किया है- 


चरक के अनुसार 

. नख भेद 2. विपादिका $. पादशूल 

4. पाद-भ्रंश 5. पाद-सुप्तता 6. वातखुड्डता 
7. गुल्फग्रह 8. पिण्डकोद्वेष्ण. 9. गृध्नसी 

0. जानुभेद . जानुविश्लेष_ 2. ऊरुस्तम्भ 
3. ऊरुसाद 4. पहु 5. गुदभ्रंश 

6. गुदार्ति 7. वृषणाक्षेप._8. शोफः स्तम्भ 


9. वड्क्षणानाह 20. श्रोणिभेद 2. विड्भेद 
22. उदावर्त 28. खज्ज (खंज) 24. कुब्ज 


25. वामनत्व 26. तिकूग्रह 27. पृष्ठग्रह 
28. पारश्वविमर्द 29. उदरावेष्ट. 30. हन्मोह 
3. हृदद्रव 32. वक्षोद्घर्णष 33. वक्षोपरोध 


34. वक्षस्तोद.. 35. बाहुशोष 36. ग्रीवास्तम्भ 
37. मन्यास्तम्भ 38. कण्ठोध्वन्स॑ 39. हनुस्तम्भ 
40. ओष्ठभेद 4]. अक्षिभेद 42. दन्तभेद 
43. दन्तशैधिल्य. 44. मूकत्व 45. वाक्स 

46. काषायास्यता 47. मुखशोष 48. अरसन्ञता 
49. प्राणनाश 50. कर्णशूल 5. अशब्दश्रवण 
52. उच्चै: श्रुति 58. बाधिर्य 54. वर्त्मस्तम्भ 


55. वर्त्ससंकोच._ 56. तिमिर 57. अक्षिशूल 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 395 


58. अक्षिव्युदास 59. भू व्युदासा 60. शड्खभेद 

6. ललाट भेद. 62. शिरोकक 635. केश भूमिस्फुरन 
64. अर्दित 65. एकाडूग रोग 66. सर्वाज्न रोग 
67. आक्षेपकक.. 68. दण्डक 69. तम 

70. भ्रम 7. वेपथु 72. जुम्भा 

78. हिक्का 74. विषाद 75. अतिप्रलाप 

76. रौक्ष्य 77. पारुष्य 78. श्यावारुणावभासता 
79. अस्वप्न 80. अनवस्थित चित्तत्व 

चरक की कुछ प्रतिलिपियों में पक्ष-वध का भी समावेश वात के नानात्मज व्याधियों में 
किया जाता है। 

शार्ईगधर के अनुसार 

. आक्षेपक 2. हनुस्तम्भ 3. उरुस्तम्भ 

4. शिरोग्रह 5. बाहूययाम 6. अन्तरायाम 

7. पार्श्वशूल 8. कटिग्रह 9. दण्डापतानक 
0. खल्ली . जिहवास्तम्भ2. अर्दित 

3. पक्षाघात 4. क्रोष्दुशी्ष 5. मन्यास्तम्भ 

6. पडूग 7. कलायखज्ज  8. तूनी 

9. प्रतितूनी 20. खज्ज 2. पाद हर्ष 

22. गृध्नसी 23. विश्वाची 24. अपबाहुक 

25. अपतानक 26. व्रणायाम 27. वातकण्टक 
28. अपतन्त्रक.. 29. अज्ञभेद 30. अज्ञशोष 

3]. मिनिमनत् 32. गदुगद 335. प्रत्यष्ठीला 

34. अष्ठीला 35. वामनत्व $6. कुब्ज 

37. अड्ड पीड़ा 38. अड्ज शूलं.. 39. संकोच 

40, स्तम्भ 4. रुक्षता 42. अड्ढ भ्ञ 

43. अड्विभ्रेशथ.. 44. विडग्रह 45. बद्धविटकता 
46. मूकत्व 47. अतिजुम्भा. 48. अत्युदगार 

49. अन्त्रकूजन . 50. वात-प्रवृत्ति . 5. स्फुरण 

52. शिरापूरण..._ 53. कम्प 54. कार्श्य 

55. श्यावता 56. प्रलाप 57. क्षिप्रमूत्रता 

58. निद्रानाश 59. स्वेदनाश 60. दुर्बलत्व 

6. बलक्षय 62. शुक्र की अति-प्रवृति 

638. कार्श्य 64. रेससनाश 65. अनवस्थित चित्तत्व 


396 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


66. काठिन्य 67. विरसास्थता 68. कषायवक्त्रता 
69. आध्मान 70. प्रत्याध्मान _7. शीतता 


72. रोमहर्ष 73. भीरुल 74. तोद 
प्र5. कण्डू 76. रसाज्ञता 77. शब्दाज्ञता 
78. प्रसुप्ति गन्धाज्ञत्व॒ 80. दृग्क्षय 






इन व्याधियों क॑ अतिरिक्त वात-व्याधियों के निम्नलिखित भेद हैं 
अधिष्टान भेद से वात-रोग 


3. आमाशय गत कुपित वात 2. पक्वाशयगत कुपित वात 


3. स्नायुगत कुपित वात 4. सिरागत कुपित वात 
5. सन्धिगत 6. इन्द्रियगत 

7. सर्वाज्ञ कुपित 

शाखा गत-दुष्ट-बात 

१. त्वचा गत दुष्ट वात 2. रक्त गत दुष्ट वात 
3. मांस गत दुष्ट वात 4. मेद्‌ गत दुष्ट वात 
5. अस्थि गत दुष्ट वात 6. मज्जा गत दुष्ट वात 


7. शुक्रगत दुष्ट वात 
अष्टांग संग्रह के अनुसार वायु के 22 आवरण 


. पित्ताबृत वायु 2. कफाबृत वायु 

3. रकतावृत वायु 4. मांसावृत वायु 

5. मेदावृत वायु 5. अस्थ्यावृत वायु 

7. मज्जावृत वायु 8. शुक्रावृत वायु 

9. अन्नावृत वायु 0. मूत्रावृत वायु 

7: विडाबृत वायु १2. सर्वधातु वृत वायु 
3. पित्तावृत प्राण-वायु 4. कफावृत प्राण वायु 
5. पित्तावृत उदान वायु 6. कफावृत उदान वायु 
7. पित्तावृत समान वायु 8. कफावृत समान वायु 
9. पित्तावृत व्यान वायु 20. कफावृत व्यान वायु 
2. पित्ताबृत अपान वायु 22. कफावृत अपान वायु 


साध्यासाध्यता की दृष्टि से पक्ष-वध निम्न तीन प्रकार का होता है- 
. शुद्ध वात पक्ष-वध 
2. पित्तानुबंधी पक्ष-वध एवं 
$. कफानुवंधी पक्ष-बध 
आयाम (धजुस्तम्भ, धनुर्वात) 
धनुस्तम्भ रोग का वर्णन सुश्रुत ने वात-व्याधियों के अंदर किया है। आयाम दो 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 397 


प्रकार के होते हैं- 
. बहिरापन 
2. अन्तरायाम 


ग्ृध्नसी रोग दो प्रकार का होता है- 

- वातिक गृुप्रसी । 

2- पैत्तिक गृध्नसी । 

वाल्मीकि रामायण में वात-रोग से सम्बन्धित एक पौराणिक कथा प्राप्त होती 
है-प्राचीन काल में धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ के घृताची अप्सरा के गर्भ से 00 
कन्याएँ जन्मीं। वे सबकी सब सुन्दरता एवं लावण्य से सुशोभित थीं। उनके 
अंग-प्रत्यंग मनोहर थे। एक दिन वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर वे सभी कन्याएँ 
उद्यान-विहार के लिये गयीं। उनको इस प्रकांर विहार करते देख वायुदेव उन पर 
मोहित हो गये और बोले, 'सुंदरियो, मैं तुम सबको अपनी प्रेयसी बनाना चाहता हूँ। 
तुम सब मेरी भार्याएँ बनकर “मनुष्य भाव” का त्याग कर देवॉगनाओं भासत दीर्घायुष्य 
प्राप्त करो। मुझे अंगीकार करने पर तुम सबको अक्षय यौवन प्राप्त होगा। तुम जानती 
हो मानव शरीर में यौवन कभी स्थिर नहीं रहता, वह प्रतिक्षण क्षीण होता जाता है ।7० 

कन्याओं ने वायुदेव के उस अनुग्रह को स्वीकार नहीं किया और कहा,-“सुर 
श्रेष्ठ आप प्राण-वायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विचरते रहते हैं। मन की 
बातें आपसे छिपी नहीं रहतीं अतः आपको यह ज्ञात है कि आपका प्रभाव (कोप) 
कितना प्रबल है। हम सब राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं। देवता होने पर भी हम 
आपको शाप देकर वायु-पद से भ्रष्ट कर सकती हैं। परन्तु हम ऐसा करना नहीं 
चाहतीं, क्योंकि हम अपने तप को सुरक्षित रखना चाहती हैं। फिर आप हमारा 
अपमान न करें, ऐसी प्रार्थना है। दुर्मती देव ! वह समय कभी न आवे जब हम अपना 
वर स्वयं ढूंढने लगें। हमारे पिता हमें जिसे देंगे, वही हमारा पति होगा।'” उनकी यह 
बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त ही कुपित हुए और उन ऐश्वर्यशाली प्रभु ने उनके भीतर 
प्रविष्ट होकर सब अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जाने से वे सभी बहनें 
कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुठूठी बाँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयीं। वे सभी 
भय से व्याकुल हो उठीं। वायुदेव के द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओं ने राज-भवन 
में प्रवेश किया। उनकी यह स्थिति देख कुशनाभ घबड़ा गये और बोले तुम्हारी यह 
स्थिति कैसे हुई तथा उत्तर जानने के लिये बैठ गये*--राजा कुशनाभ के पूछने पर 
उनकी उन रूपवती पुत्रियों ने राजा को सारा वृत्तान्त क्रमशः कह सुनाया और कहा 
कि इस प्रकार वायु देव ने हमारा कहना न मानकर हमें गहरी चोट पहुँचायी, बिना 
अपराध के हमें यह पीड़ा दी ।* उनकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी 
महाराज ने अपनी परम उत्तम सौ कन्याओं को इस प्रकार उत्तर दिया, “थुत्रियो! 


398 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


क्षमाशील महापुरुष जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। तुम सब लोगों में 

समान रूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओं के लिये भी दुष्कर 

है। पुत्रियो! क्षमा धन है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, 
क्षमा पर ही यह सम्पूर्ण संसार टिका पड़ा है ।*९ 

इसके पश्चात्‌ राजा कुशनाभ ने अपनी उन पुत्रियों के विवाह हेतु सुयोग्य मंत्रियों 
के साथ मंत्रणा प्रारम्भ की। तथा धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्म-दत्त के साथ अपनी 
सौ कन्याओं का विवाह करने का निश्चय किया। विवाह काल में उन कन्याओं के 
हाथों का ब्रह्मदत के हाथों से स्पर्श होते ही वे सब की सब कन्याएँ कुब्जत्व दोष से 
रहित हो निरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न होने लगीं। वात-रोग के रूप में आये हुए 
उन वायु देव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया। गन्धर्वी सोमदा ने भी अपने पुत्र तथा 
पुत्र-वधुओं को आशीर्वाद दिया तथा वहाँ से प्रस्थान किया ।* 

उपरोक्त आख्यान में महर्षि ने वात से सम्बन्धित जो बातें कही हैं उनके अधार 
पर यह कहा जा सकता है- 

- सदाचार रसायन है और उसका पालन करने वाला व्यक्ति सदैव ही सुखी तथा 
तेजस्वी रहता है। उसे कभी रोग नहीं सताते। 

. वर्षा ऋतु में उत्साह वृद्धि होती है और इस ऋतु की चर्चा बताते हुए महर्षि ने कहा 
है-वस्त्राभूषणों का धारण, उद्यान-विहार, गाना, बजाना, नृत्य करना तथा अन्य 
आमोद-प्रमोद करना कारण है। 

. स्वच्छ वायु का उपयोग आयुष्य कर है। देवांगनाएँ भी इसी कारण से दीर्घायु होती 

थीं। वायु का निरन्तर सेवन यौवन प्रदान करता है और वह अक्षय होता है। 

परन्तु जब यही वायु प्रकुपित होती है तो मनुष्य को रुग्ण बना देती है। 
वायु-विकृति कर्मज भी होती है। 

कितनी भी आपत्ति पड़ने पर मनुष्य को सदाचार नहीं छोड़ना चाहिये। क्षमा, दान, 

सत्य, यज्ञ, धर्म और यश ये सभी रोगी के लिये आवश्यक हैं, मानव मात्र के ये 

गुण हैं। 

१. काम-क्रोध देह को नाश कर देते हैं और मन को भी रुग्ण बना देने वाले हैं। 

8. ब्रह्म तेज से सम्पन्न व्यक्ति, जो स्वयं ब्रह्म-रूप हो गया हो, तपस्वी हो तथा 

ब्रह्म-शक्ति युक्त हो, एक सच्चा चिकित्सक है और वह अपनी चिकित्सा द्वारा कठिन 

से कठिन रोगी को भी रोग-मुक्त कर सकता है। 

इसी ग्रन्थ में अन्यत्र एक प्रसंग में पवन-पुत्र शिशु हनुमान पर इन्द्र द्वारा वज़ की 
चोट करने पर पिता वायुदेव कुपित हो उठे और उनका यह प्रकोप प्रजा-जनों के लिये 
अहितकर सिद्ध हुआ। सामर्थ्यशाली मारुत, जो अब तक प्रजा के पालक तथा पोषक 
थें, ने प्रजा में रहकर भी अपनी गति संकुचित कर ली। श्वास आदि के रूप में संचार 


] 


डी फ् 


डक 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 399 


रोक दिया। वायुदेव ने प्रजा के मलाशय को रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा दी। उन्होंने 
सम्पूर्ण भूतों में प्राण का संचार अवरुद्ध-कर दिया। वायु के प्रकोप से समस्त प्राणियों 
की साँस बन्द होने लगी, उनके सभी अंगों के जोड़ टूटने लगे और वे सभी काठ के 
समान चेष्टा-शून्य हो गये। लोगों के नित्यकर्म बन्द हो गये और वे पीड़ा के मारे 
कराहने लगे। 

वायु के क्रद्ध होने पर देवों के भी पेट इस प्रकार फूल गये थे, मानों उन्हें 'महोदर' 
रोग हो गया हो ।* वायु देव आयु के अधिपति जो हैं, प्राणों के ईश्वर हैं। परन्तु संचार 
रोकने पर प्राणियों तथा देवों पर उसका प्रतिकूल प्रभाव होने लगा। देवों ने ब्रह्मा से 
प्रार्थना की कि वे वायुदेव को प्रसन्न करें। इस पर ब्रह्मा ने उनसे कहा-वायुदेव स्वयं 
शरीर धारण न करके समस्त शरीरों में उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं। वायु के बिना 
यह शरीर सूखे काष्ठ के समान हो जाता है। वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख 
है और वायु ही यह समस्त जगत है। वायु से परित्यक्त होकर यह जगत्‌ कभी सुख 
नहीं पा सकता वायु ही जगत्‌ की आयु है। इस समय वायु ने संसार के प्राणियों को 
त्याग दिया है इसलिये वे सवकेसब निष्प्राण होकर काठ और दीवार के समान हो गये 
हैं। तदनन्तर वायुदेव को ब्रह्मा ने प्रसन्न किया और सभी जगत्‌ सुखी हुआ ॥# 

उपरोक्त विवरण में वायु के प्रभाव को भली प्रकार से स्पष्ट किया गया है। इस 
प्रकार रामायण में वायु धातु तथा वायु दोष और साधारण वायु का वर्णन मिलता है, 
जो आवुर्वेद के विशाल साहित्य को विस्तृत करता है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता 
है कि रामायण में महोदर एवं कुब्जत्व दो वात रोगों का उल्लेख विशेष प्रकार से किया 
गया है। 
महोदर 

महोदर उदर में होने वाला एक रोग है जिसमें शूल, शोध तथा संग होता है। 
उदर-रोग में कई रोगावस्थाओं का समावेश हो जाता है। चरक ने शूल-रोग का पृथक्‌ 
वर्णन नहीं किया है। चरक ने “गुल्म-उदावर्त' तथा “उदर-रोगों' में विभिन्‍न प्रकार के 
शूलों का समावेश कर लिया है। सभी उदर-रोगों में कम या अधिक उदरोत्सेध का 
होना बताया गया है। सांथ ही उदर रोग में अवस्था विशेष में पाक तथा जल-संचय 
का होना भी बताया गया है। सभी उदर रोगों में मंदाग्नि को विशेष महत्त्व दिया गया 
है- रोगाः सर्वेषि मन्देग्नौ सुतरामुदराणि तु। 
त्वचा रोग 

“त्वचा रोग' से तात्पर्य “चर्म रोग” से है। त्वचा के ऊपर होने वाले सभी रोग त्वचा 
रोग के अन्तर्गत आते हैं। वाल्मीकि रामायण में “त्वचा रोग' के अन्तर्गत मसूरिका 
(चेचक) का उल्लेख किया गया है। इसके भी तीन प्रकार होते हैं- 

. शीतला 2. मसूरिका 3. रोमान्तिका 

400 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


शीतला 

शीतला रोग का वर्णन चरक, सुश्रुत तथा वाग्भट में नहीं मिलता है। 'माधव 
निदान” में भी इसका वर्णन नहीं है। “'भाव-प्रकाश' ने इसका वर्णन किया है, “शीतला 
नामक देवी के प्रकोप से जो मसूरिका उत्पन्न होती है, उसका नाम शीतला है,” ऐसा 
भी कुछ लोगों का मन्तव्य है। 
शीतला के भेद 
(0) बृहती-ज्वर पूर्वक स्फोट निकलते हैं, 'इसे बड़ी माता निकली है, ऐसा कहते हैं ।' 
“बृहती' में प्रथम सात दिन तक फोड़े निकलते हैं, दूसरे हफ्ते में उनमें पूथ भर जाता है। और 
तीसरे हफ्ते में वे फोड़े स्वतः फूटकर सूख जाते हैं और पपड़ी जम जाती है। 
(॥) केद्धवा-वात तथां कफ से उत्पन्न कोद्रव (कोदों) के दाने के समान शीतला को 'कोद्रवा' 
कहते हैं। कुछ लोग इसमें पाक की कल्पना भी करते हैं परन्तु वास्तव में इसमें पाक नहीं होता 
है, यह अपना दाग छोड़ जाता है, प्रायः सात दिन में अपने आप ठीक हो जाता है। 
(॥) पाणिसह्य-गरमी के कारण राई जैसी कण्डूयुक्त स्पर्श प्रिय शीतला -'पाणिसहा” कहलाती 
है। सात दिन के बाद यह भी स्वतः ठीक हो जाती है। 
(॥५) सर्षपिका-सर्षप के आकार की, पीत सर्ष के वर्ण की होती है, स्वतः ठीक हो जाती है, 
इसमें अभ्यंग वर्ज्य है। 
(५) दुःखकोद्ववा-गरमी के कारण राई के दाने के समान पिडिकाएँ बालकों के मुख पर हो जाती 
हैं, उन्हें दुःख कोद्रवा' कहते हैं, ये भी अपने आप ठीक हो जाती हैं। 
(५7) लोहितोन्नतमण्डला-इसमें ज्वर-पूर्वक कोष्ठवत्‌ रक्‍्तवर्ण तथा व्यथायुक्त शीतला होती है। 
इसमें स्फोट भी होते हैं, ज्यर तीन दिन रहता है। स्वतः ठीक हो जाता है। 
साध्यासाध्यता 

शीतला के कई भेद बिना चिकित्सा के भी ठीक हो जाते हैं। 


निम्ब-बीज, विभीतक बीज तथा हख््रा को ठण्डे पानी के साथ मिलाकर देना चाहिये तथा 
चन्दनवासा तथा यष्टीमधु को मधु के साथ प्रयुक्त करें। 


चरक में एक स्थल पर मसूरिका का उल्लेख इस प्रकार किया गया है--जो पिडिका पित्त 
तथा कफ के प्रकोप से सारे शरीर में होती है और जिसका प्रमाण मसूर के दाने के समान होता 
है उसे मसूरिका कहते हैं। 
निदान 

. कटु अम्ल, लवण, क्षार का अधिक सेवन। 

2. विरुद्ध आहार। 

3. अध्यशन। 

4. दृषित-भोजनादि। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 40 


सम्प्राप्ति घटक 
दोष-पित्त-कफ, दृष्य-रक्‍्त, म्लोतस-रक्‍्त वह, अधिष्ठान-त्वचा। 


पूवरूप हर 

ज्वर, गात्र-पीड़ा, भ्रम, वैवर्ण्य, कण्डू, अरति, लवक्‌ू-शोथ, नेत्र लाल होते हैं। 
लक्षण 

स्फोट, कास, कंप, तीव्र ज्वर, दाह, मुख-पाक, कण्डू युक्त आदि। 
साध्यासाध्यता 

रसगत, रक्‍्तगत, पित्तन, कफज और पित्त कफज मसूरिका साध्य है। सान्निपातिक 
मसूरिका असाध्य है। 
चिकित्सा ; 

. निम्ब, पर्पटक, पाठा, पटोल, कटुरोहिणी, श्वेत-चन्दन, रक्‍्त-चन्दन, उशीर, धात्री, 
वासा, दुरालभा-यह निंबादि क्वाथ हैं, इसे शर्करा के साथ पिलायें। 

2. कांचनार त्वकक्वाथस्वर्णमाक्षिक का प्रयोग करें। 

3. कदली बीज चूर्ण -2 माशा पानी के साथ दें। 

रोमान्तिका 

यह भी इसी प्रकार का स्फोटयुक्त रोग होता है तथा यह एक ही प्रकार का होता 
है। इसके भेद-प्रभेद नहीं होते। 

वाल्मीकि रामायण में सीता के मुख की सुंदरता एवं निर्मलता का वर्णन करते हुए 
कहा गया है- 

“जो कमल-दल के समान सुंदर, मनोहर एवं प्रशंसनीय नेत्रों से सुशोभित है, 
जिसमें मीठी-मीठी सुगन्ध निकलती रहती है, जो निर्मल तथा चेचक आदि के चिन्हों 
से रहित है। जनक-किशोरी के उस दर्शनीय मुख को देखे बिना मेरी सुध-बुध खोयी 
जा रही है ।* 

“जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदि के दाग नहीं हैं, 
जहाँ पवित्र-मुस्कान की छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमल-दल के समान 
सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलंक कलाधर के तुल्य कमनीय कान्ति से युक्त हैं, वह 
आर्या सीता का मुख मुझे कब दिखाई देगा।४ 

इस प्रकार उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में त्वचा-रोग के 
अन्तर्गत 'चेचक” का उल्लेख किया गया है। 
गण्डमाला 

गण्ड-माला गले में होने वाला रोग विशेष है, इसी को ही कण्ठ माला के नाम से 
भी जाना जाता है। गण्ड माला रोग के भेद-प्रभेद नहीं होते। गण्ड-माला की ही 
अवस्थाविशेष 'अपची” है। “अपची' रोग भी एक ही प्रकार का है। 

वाल्मीकि रामायण का गहन अध्ययन करने के पश्चात्‌ भी “गण्डमाला' या 


402 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


“कण्ठमाला” का उल्लेख कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता। 


दन्तकूमी 
सुश्रुत के अनुसार 'दन्त रोग” 8 प्रकार के होते हैं- 
. दालन 2. कूमिदन्त 
3. दन्त हर्ष 4. मज्जनक 
5. दन्त शर्करा 6. कपालिका 
7. श्यावदन्तक 8. हनुमोक्ष 
शाईधर के अनुसार 'दन्तरोग” 0 प्रकार के होते हैं- 
3. दालन 9. कृमिदन्त 
5. दन्त हर्ष 4. कराल 
5. दनन्‍त चाल 6. दन्त-शर्करा 
7. कपालिका 8. श्यावदन्‍्त 
9. दन्तभेद 0. कपालिका 


वाल्मीकि रामायण में 'दन्त रोग” के अन्तर्गत केवल एक स्थान पर 'दन्त-कर्षणा' 
का उल्लेख किया गया है। “वाल्मीकि रामायण” एक आयुर्वेदीय ग्रन्थ नहीं है तथापि 
उसमें बहुत से शरीरवाची शब्दों का प्रयोग किया गया है। दंत-रोग, मुख-रोग तथा 
जिह्‌वा-रोग आदि का मूल सम्बन्ध तत्सम्बन्धी अंगों से ही होता है जिनका रामायण 
में पर्याप्त उल्लेख प्राप्त होता है। 

दन्त-रोग सम्बन्धी अंगों का उल्लेख रामायण में इस प्रकार है- 
जीभ 

मनुष्य अपने शरीर से जो पाप करता है, उसे पहले मन के द्वारा कर्त्तव्य-रूप से 
निश्चित करता है, फिर जिहवा की सहायता से उस कर्म को वाणी द्वारा दूसरों से 
कहता है तत्पश्चात्‌ औरों के सहयोग से उसे शरीर द्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह 
एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेद से तीन प्रकार का होता है।** 

इसी प्रकार अन्य अंगों का भी उल्लेख मिलता है यथा- 

दाढ़-'उस राक्षस की दाढे बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभ से 
अपने विशाल मुख को बारम्बार चाट रहा था।# 

जबड़ा-'तब पर्वत के समान विशालकाय व्रजहनु नामक राक्षस जीभ से अपने 
जवड़े को चाटता हुआ बोला-* 

अन्य स्थल भी दृष्टव्य हैं-* 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण के आधार पर यह सिद्ध हो जाता है कि रामायण 
में 'दन्त-रोग' सम्बन्धी सभी शरीरावयवों का उल्लेख तो किया गया है किन्तु 
'दन्त-रोग” का कहीं भी उल्लेख प्राप्त नहीं होता। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 403 


पक्षाघात 
पक्षाघात में शरीर के आधे-भाग में कार्य-हानि हो जाती है। पक्ष का अर्थ शरीर 
के ऊपर से नीचे तक का आधा भाग या मध्य से नीचे का या ऊपर का भाग कहते 
हैं। वाग्मट्‌ ने इसलिये एकांग रोग या एकांगवात का समावेश पक्षाघात में किया है। 
रक्त के अधिक दबाव के कारण मस्तिष्कगत रकत-स्राव, मस्तिष्कार्बुद तथा वातवहा 
नाड़ियों की रचनात्मक विकृति से पक्षाघात हो जाता है। 
प्रकुपित वात सिरा तथा स्नायुओं में स्थान-संश्रय करके उनका शोषण करता है 
जिससे एक ओर का आधा शरीर कार्य नहीं कर पाता, इसे ही पक्षाघात कहते 
हैं। 
लक्षण 
. शरीर के आधे भाग में क्रिया हानि। 
2. सिरा-स्नायु शोष। 
3. प्रभावित भाग स्थिर, संकुचित और कृश हो जाता है। 
4. दाह-संताप-मूर्च्डा पक्षाघात में पित्त का अनुंबध बताते हैं। 
साध्यासाध्यता 
. पित्त या कफ के अनुबन्ध वाला पक्षाघात साध्य है। 
2. केवल वातज पक्षाघात कृच्छ-साध्य है। 
3. धातुक्षय जन्य पक्षाघात अलाध्य है। 
चिकित्सा 
. बलातैल द्वारा अभ्यंग करना चाहिये। घृतपान भी कराना चाहिये। 
2. पश्चातू पिग्डस्वेद या स्नेहधारा स्वेद कराना चाहिये। 
3. बात-शामक तथा बूंहणयोग देना चाहिये तथा आक्रान्त भाग के लिये कुछ व्यायाम 
का प्रबन्ध करना चाहिये। 
वाल्मीकि रामायण रूपी महासागर में पक्षाघात लक्षण, साध्यासाध्यता एवं इसकी 
चिकित्सा का कहीं भी उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
कर्ण-रोग (कर्ण-वधिरता) 
कान शरीर का संवेदन-शील अवयव है। वह सुनने तथा शारीरिक संतुलन को 
बनाये रखने का कार्य भी करता है। बहरे व्यक्ति को सुनने की क्रिया में व्याघात होने 
पर उसमें एक प्रकार की लघुता-ग्रन्थि उत्पन्न हो जाती है। 
कान की रचना 
कान के तीन विभाग होते हैं- 
. बाह्य कर्ण 
2. मध्य कर्ण 
$. अन्तः कर्ण 
404 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





(0) बाहूय-कर्ण 

इस विभाग में बाहर दिखाई देने वाला कर्ण, कर्ण-नलिका, कान के परदे का 
समावेश होता है। 
0) मध्य-कर्ण 

कान का यह भाग कर्ण-पट के पीछे होता है। खोपड़ी की कनपटी की हड्डी में 
जो छिद्र होता है उसके पोले भाग में ही वह भाग स्थित है। कर्ण-पट के कम्पन का 
असर इसी के द्वारा अन्तः कर्ण पर्दे तक पहुँचता है। 
(गा) आन्तर कर्ण 

कान का यह भाग आन्तरिक हिस्से में कनपटी की हड्डी के त्रिभुजाकार भाग 
में होता है। इसकी रचना गुफा जैसी होती है। अन्तः कर्ण की गुफा के तोन भाग होते 
हैं-मध्य-भग, शंखाकृति एवं अर्द्धयोलाकार वलय। 


« कर्ण-रोग (भेद) 
सुश्ुत” के अनुसार १४ प्रकार के कर्ण-रोग होते हैं- 
3. कर्ण-शूल 2. कर्ण-नाद 
3. कर्ण-वाधिर्य «4. कर्णक्षवेड 
5. कर्ण स्राव 6. कर्ण कण्डू 
7. कर्ण वर्चस्‌ 8. कृमिकर्ण 
9. कर्ण प्रतिनाह 0. निजकर्ण विद्रधि 
7]. आरन्तुक कर्ण विद्रधि 2. कर्ण पाक 
3. पूति कर्ण 4. वातज कर्णार्श 
5. पैत्तिक कार्श 6. श्लैष्पिक कर्णार्श 
7. सन्निपातज कर्णार्श * 8. वातज कर्णाबुद 
9. पैत्तिक कर्णार्ुद 20. कफज कर्णबिद 
8. रक्‍्तज कर्णार्बुंद 22. मांसज क़णर्बिद 
28. मेदज कर्णा्बुद 24. सर्वात्मक कर्णाुद 
25. वातज कर्ण शोफ 26. पैत्तिक कर्ण शोफ 
27. कफज कर्ण शोफ 28. सन्निपातज कर्ण शोफ 
शाईधर के अनुसार 8 प्रकार के कर्ण-रोग 

. वातिक कर्ण रोग 2. पैत्तिक कर्ण रोग 

*. 3. श्लैष्मिक कर्ण रोग 4. रक्‍तज कर्ण रोग 

* 5. सन्निपातज कर्ण रोग 6. कर्ण विद्रधि 
7. कर्ण-शोथ 8. कर्णाबुद 
9. पूति कर्ण 0. कर्णार्श 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 405 


. कर्णहल्लिका 2. बाधिर्य 


3. तन्त्रिका 4. कण्डू 

5. शष्कुली 6. कृमि कर्ण 

7. कर्ण नाद 9. कर्ण प्रतिनाह 
कर्ण रोग के कारण 


वायु-पित्त और कफ ये तीनों दोष उनके मिश्रणों को प्रकोषित करने वाले सभी 
कारण कर्ण-रोगों के कारण बनते हैं और कर्ण-शिरा में प्रविष्ट होकर विभिन्‍न प्रकार 
के रोग उत्पन्न करते हैं। 
लक्षण 

वात जन्य कर्ण-रोग में कान में विविध प्रकार की आवाजें आती हैं, पीड़ा होती 
है सूजन आ जाती है तथा बहरापन भी महसूस होता है। 

पित्त जन्य कर्ण-रोग में कान में सूजन आ जाती है, लाली दिखायी देती है, कान 
में से पीले रंग का दुर्गन्‍्धयुक्त स्राव होता है। 

कफ से होने बाले कर्ण रोग में विपरीत शब्द सुनाई देते हैं। कान में खुजली होती 
है। कान में सूजन आ जाती है। कान में चिकना गाढ़ा स्राव भी होता है। 

सन्निपातज कर्ण रोग में सब दोषों के एकत्रित होने वाले दोषों के लक्षण दिखायी 
देते हैं और जिस दोष की प्रबलता होती है, उसी के लक्षण वाला स्राव होता है। 

विशेष रूप से कर्ण-रोग निम्नलिखित होते हैं- 


. कर्ण शूल 2. कर्ण नाद 
$. कर्ण-कृमि 4. कर्ण स्राव 
5. कर्ण-कण्डू 6. कर्ण शल्य 
7. कर्ण-मल 8. बाधिर्य 


वाल्मीकि रामायण में कर्णद्य के देवता अश्विनी कुमारों को माना गया है। 
कर्ण-सम्बन्धी कुछ शब्दों का उल्लेख रामायण में इस प्रकार है- 
कर्ण 
कर्ण मूल 
शंख देश 
श्रोत 
श्रवण 
“श्री राम चन्द्र जी के इस प्रकार आदेश देने पर क्रोध में भरे हुए महाबली लक्ष्मण 
ने उनके देखते-देखते म्यान से तलवार खींच ली, और शूर्पणखा के नाक-कान काट 
लिये। 
इसी प्रकार एक अन्य स्थल पर-फिर बलपूर्वक उसे धरती पर दे मारा और बड़े 
जोर से सिंहनाद किया पृथ्वी पर गिराये जाते समय उसके दोनों कानों से खून की 
धारायें बहने लगीं।" 


406 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद हैं मु 


उसक॑ मुख, नेत्र और कानों से बहुत सा रक्त गिरने लगा और वह चक्कर 
काटता हुआ रथ के पिछले भाग में निश्चेष्ट होकर जा बैठा” 

उस जन सभा में होने वाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियों को अत्यन्त सुखद 
प्रतीत होता था ।” 

इसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी कर्ण का उल्लेख किया गया है।” 

इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण में कर्ण-रोग के 
अन्तर्गत कर्ण-विच्छेदन तथा कर्ण से रुधिर का बहना, इन दो ही रोगों का उल्लेख 
किया गया है। 
श्वास रोग 

श्वास रोग प्राणवह स्रोतस की एक मुख्य व्याधि है। इस रोग में प्राणवह स्नोतस 
में अवरोधात्मक विकृति के कारण प्राण वायु के विनिमय में बाधा उत्पन्न हो जाती 
है, जिससे श्वासोच्छवास में कष्ट होता है। प्राणवह स्रोतोदुष्टि के चार लक्षण बताये 
गये हैं-दीर्घ श्वास, रुक-रुककर श्वास लेना। श्वास रोग आमाशय समुद्भव है, और 
इनमें वात और कफ का विशेष कर्त्तव्य है। इसमें आम और आम-विष का भी महत्त्व 
है, दृष्य की दृष्टि से श्वास रसप्रदोषज विकार है, श्वास रोग की सामान्य सम्प्राप्ति 
परक वर्णन में चरक ने 'हदयस्य रसादीनां धातूनांचोपशोषणो” कहकर (0७ एचा॥०- 
॥9९ जैसी स्थिति की ओर संकेत किया है। 
श्वास रोग निदान 

. वात प्रकोपक श्वास-धूप, धूम, अनिल सेवन, शीतल जलादि। 

2. कफ-प्रकोपक श्वास-निष्पाव, माष, तिल तैल, पिष्ट आदि। 
श्वास लक्षणोदक रोग 

पाण्डु, अतिसार, ज्वर, छर्दि, प्रतिश्याय, क्षीण, क्षय, रक्‍त-पित्त, विष, .उदावर्त, 
विषूचिका अलसक, कास वृद्धि से श्वास। 
श्वास रोग की सम्प्राप्ति 

विभिन्‍न निदानों से प्रकुपित कफ-पूर्वक वात-प्राण व स्रोतों में अवरोध उत्पन्न 
करके उसी स्रोतस में विमार्गगमन करता है, तब श्वास रोग उत्पन्न होता है।” 

बात से £ 


निदान < 
दृष्टि-अग्निमांद-कफ वृद्धि-प्राणवह स्नोतोवरोध 
2 सटर ४ 


आम-रस दृष्टि-प्राण वायु विमार्ग 


+ 
श्वास रोग 
. दोष-कफानुगत वात (कफ और वात) 
2. दृष्य-रस 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 407 


3. स्रोतस-प्राणवह म्रोतस 
4. स्रोतोदुष्टिलक्षण-संग-विमार्ग-गमन 
5. आमाशयोत्य व्याधि है। 
श्वास रोग की सम्प्राप्ति बहुत स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण है। श्वास का रोगी मुख्यतः 
तीन लक्षणों को लेकर चिकित्सक के पास आता है- 
श्वास, कास और कफष्ठीवन। श्वास रोग का ऋतुओं के साथ भी सम्बन्ध है। 
वर्षा, शीत और आसमान में बादल हों या पूर्व की हवा-इनसे श्वास रोग में वेग आते 
हैं, श्वास रोग बढ़ता है।" 
श्वास रोग के भेद 
. महाश्वास 
2. ऊर्ध्वश्वास 
3. छिन्‍न श्वास 
4. तमक श्वास 
5. क्षुद्र श्वास 
लक्षण 
. जो रोगी उन्मत्त सांड की तरह गर्जना के समान शब्दयुक्त श्वास लेता हो, उसे 
महाश्वास का रोगी समझना चाहिये। 
गए. जो रोगी दीर्घ वहि; श्वसन करे लेकिन अन्तः श्वसन में कष्ट हो-उसे ऊर्ध्व श्वास 
का रोगी कहते हैं। 
!. जो रोगी रुक-रुक कर श्वास लेता हो, हृदय आदि मर्म स्थानों पर पीड़ा होने के 
कारण थोड़ी देर के लिये श्वास लेना बन्द कर देता हो, उसे छिन्‍न श्वास रोगी समझना 
चाहिये। 
५. दौर्बल्य के कारण जरा सा परिश्रम किया जाये तो स्वभावतः श्वास तेजी से चलने 
लगता है और विश्राम करने से स्वतः ठीक हो जाता है-यह क्षुद्र श्वास है। 
५. तमक श्वास में तीव्र वेग वाला श्वास होता है। श्वास कष्ट के कारण तमः प्रवेश 
तथा निश्चेष्ट हो जाना एवं प्राण व स्लोतस में रुके कफ को निकालने के लिये जोर 
से कास का होना देखा जाता है। 
चिकित्सा 
अर्क, धतूरमल, मल्ल, अभ्रक, पिप्पली, कुष्ठ, भारंगी, वासा तथा काली मिर्च का 
विभिन्‍न श्वासघ्न रोगों में बहुत प्रयोग किया जाता है। इन्हें श्वास रोग की मुख्य 
औषधियाँ कह सकते हैं। 
चरक ने शटी, पुष्कर मूल, अम्लवेतस, एला, हिह्लु, अगरु, सुरसा, आमलकी तथा 
जीवन्ती को श्वास हर गण में गिनाया है। सुश्रुत ने विदारी-गंधादिगण, सुरसादिगण 
408 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


तथा दशमूल को श्वास हर बताया है। 
वाल्मीकि रामायण में भी एक-दो स्थलों पर “श्वास रोग” का उल्लेख किया 
गया है। लक्ष्मण की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा गया है, “लक्ष्मण अपने शरीर 
में धँसे हुए वाणों से अत्यन्त पीड़ित थे, उनके अंगों में जगह-जगह घाव हो गया था। 
वे बारंबार लम्बी साँस खींचते थे, आधात जनितक्लेष से सन्तप्त हो रहे थे तथा उन्हें 
साँस लेने में भी पीड़ा होती थी' ।” 
उपरोक्त प्रसंग के आधार पर यह पुष्टि हो जाती है कि वाल्मीकि रामायण में 
श्वास-रोग का उल्लेख किया गया है। 
स्वप्नदोष 
वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
नपुंसकता 
रामायण में “नपुंसकता” का भी उल्लेख नहीं किया गया है। 
वाल्मीकि रामायण में इन रोगों के अतिरिक्त नेत्र-रोग, मधुमेंह, श्षुधा-वेग, 
पिपासा वेग, चक्कर आना, घबराहट होना, धूप से पीड़ित होना आदि का भी उल्लेख 
किया गया है। 
नेत्र-रोग हि 
नेत्र एक अत्यन्त संवेदन शील इन्द्रिय है। खोपड़ी के आगे के हिस्से में अस्थियों 
के गढ़े में आँखें सुरक्षित हैं। इन गढ़ों में चर्बी का आच्छादन होता है जिससे साधारण 
आधघात से नेत्रों को सुरक्षा प्राप्त हो सकती है। 
नेत्र-गोलक के तीन आवरण होते हैं- 
. वाह्मआवरण 
2. मध्यावरण 
3. अन्तरावरण 
"सुश्रुत' ने 76 प्रकार के नेत्र-रोग माने हैं तथा इनका वर्गीकरण दोष तथा 
अधिष्ठान के भेद से किया है। शार्डगर्धर ने 94 नेत्र-रोंगों का उल्लेख किया तथा 
इनका अधिष्ठान के अनुसार वर्गीकरण किया है। 
. वातिक नेत्र रोग 
2. पैत्तिक नेत्र रोग 
3. शलैष्मिक नेत्र रोग 
4. रक्तज नेत्र रोग 
5. सन्निपातज नेत्र रोग 
6. वाह्य (आगन्तुक) नेत्र रोग 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 409 


वाल्मीकि रामायण में नेत्र -रोग का कहीं स्पष्ट उल्लेख तो प्राप्त नहीं होता है 
किन्तु विशद्‌ दृष्टिपात करने पर कुछ ऐसे शब्द तथा वाक्य अवश्य प्राप्त होते हैं जो 
नेत्र-रोगों की ओर इंगित करते हैं- 

श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं-“इस समय मुझे पिता और यशस्वी माता के लिये 
बड़ा शोक हो रहा है, कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहने के कारण “अंधे” हो 
जायें ।”* 

राजा दशरथ कौशल्या को मुनिकुमार के वध तथा उनके असहाय माता-पिता के 
विषय में बता रहे हैं-““वहाँ पहुँच कर मैंने उनके दुबले, अंधे और बूढ़े माता-पिता को 
देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था उनकी अवस्था पंख कटे दो पक्षियों के 
समान थी।"”* 

मृत मुनिकुमार के लिये विलाप करते हुए मुनि-कुमार के पिता इस प्रकार कहते 
हैं, “बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्र के लिये उत्कण्ठित 
रहने वाली है। मैं स्वयं अंधा होकर इसका भरण-पोषण कैसे करूँगा ।"० 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में यत्र-तत्र कई स्थलों पर “अंधा” जो कि स्वयं में 
पूर्ण नेत्र-रोग है, का वर्णन हुआ है। 

रावण के क्रोध का वर्णन करते हुए कहा गया है, “वह क्रोध के वशीभूत हो 
गया। अमर्ष से उसके नेत्र घूमने लगे” ॥० 

आँसुओं का भी रामायण में वर्णन है-चिरकाल से माता के हृदय में जिस बात 
की अभिलाषा थी उसकी पूर्ति को सूचित करने वाली यह बात सुनकर कौशल्या ने 
आनन्द के आँसू बहाते हुए गदूगद कण्ठ से इस प्रकार कहा-॥"९ 

इनके अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों पर आँसू का उल्लेख प्राप्त होता है- 

अयो. 24/6-8, 79/6, कि. 8/49, 28/7, सुं. 5/24, यु. 97/24, 0/0, 
उ. 24/28, 29, 37, 24/6, 7, 47/3, 48/2, 52/6, 68/8, 9, 77/6, 96/9, 
98/2, 06/4। 

आँखें बाहर निकलने का भी उल्लेख मिलता है-“नीचे गिरते ही उसकी भुजा, 
आदि के टुकड़े हो गये, शरीर की हड़िडयाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल 
आयीं ।!*........रघुनन्दन उस ब्रह्मास्त्र को व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये 
आपने उस कौए की दाहिनी आँख फोड़ डाली ॥/" 

आँख के रोगी को रोशनी अच्छी नहीं लगती, ऐसा वर्णन भी रामायण में प्राप्त 
होता है,-श्री राम सीता के चरित्र पर शंका करते हुए कहते हैं-'तुम्हारे चरित्र में 

संदेह का अवसर उपस्थित है, फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो, जैसे-आँख के रोगी 

को दीपक की रोशनी नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अप्रिय जान पड़ती 
हो ॥7% 

“देवी के दिव्य-प्रभाव से उस समय मेरी बायीं आँख जल गयी और दूसरी धूल 


40 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


से भरी हुई सी पिज्लल वर्ण की हो गयी ।”'* “देवी पार्वती के रूप पर दृष्टिपात करने 
से देवी के प्रभाव से जो तुम्हारा बायाँ नेत्र जल गया और दायाँ भी पिड्नल वर्ण का हो 
गया, इससे सदा स्थिर रहने वाला तुम्हारा 'एकाक्ष पिज्लली' यह नाम चिरस्थायी 
होगा।/श 

इस प्रकार रामायण में आँख पीली होने का वर्णन भी प्राप्त होता है। 

रामायण में दृष्टि घूमने का भी उल्लेख प्राप्त होता है यथा-रघुनन्दन! अब मेरे 
प्राणों की गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है, और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंग के 
दिखाई देते हैं---- ॥५ 

इसी प्रकार नींद का भी अनेक स्थानों पर उल्लेख प्राप्त होता है-“ऐसा कहकर 
दिति नींद से अचेत हो गयीं!" 

इसी प्रकार उपरोक्त स्थलों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 
नेत्र-रोगों का विशद्‌ वर्णन किया गया है। 
मधुमेह 

प्रमेह को 20 प्रकार का बताया गया है और ये भेद मूत्र की विकृति के आधार 
पर किये गये हैं, इनका नाम भी मूत्र-गत लक्षणों, वर्णों, धात्वंशों के आधार पर किया 
गया है। कफज प्रमेह 0 होते हैं, पैत्तिक प्रमेह 6 होते हैं, वातिक प्रमेह 4 होते हैं और 
इस प्रकार प्रमेह'के 20 भेद होते हैं। 


कफज प्रमेह 
. उदक मेह या इक्षुमेह 2. इक्षुवालिका रस मेह 
3. सान्द्रमेह - 4. सान्द्रप्रसाद मेह 
5. शुक्ल मेह 6. शुक्रमेह 
7. शीतमेह 8. सिकता मेह 
9. शनैर्मेह 0. आलाल मेह या लाल मेह 
पित्तज प्रमेह 
3. क्षार मेह 2. काल मेह 
3. नील मेह 4. रक्त मेह 
5. मंजिष्ठामेह 6. हारिद्र मेह 
बातज प्रमेह 
. वसा मेह 2. हस्ति मेह 
3. मज्जा मेह 4. मधु मेह 
मधुमेह 


दो प्रकार के बताये गये हैं-स्वतन्त्र, परतन्त्र सभी प्रमेह अन्त में मधुमेह में 
परिवर्तित हो सकते हैं, ऐसा मधुमेह परतन्त्र मधुमेह कहलाता है। जब वात का प्रकोप 

होकर ओज मूत्र द्वारा निकले तब स्वतन्त्र मधुमेह होता है। 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 4॥] 


क्षैद्ररस वर्ण क्षौद्रमेही-सुश्रुत 
एप्॥० $0४५ -मूत्रेभिधावन्ति पिपीलिकाश्व-चरक 
माधुर्याच्च तनो रतः ।-चरक 
8॥0०4 $0;-मक्षिकोप सर्पेण शरीरमाधुर्यम्‌-चरक 
विश्व के चिकित्सा-विज्ञान के इतिहास में चरक और सुश्रुत ने सर्व-प्रथम मूत्र में 
शर्करा के निकलने का वर्णन किया तथा रक्‍तगत शर्कराधिक्य की ओर स्पष्ट संकेत 
किया। 
आयुर्वेदानुसार कफ को बल भी कहा है, और 'प्राकृतस्तु बल॑ श्लेप्मा विकृतों मल 
उच्यते, स चैवोजः स्मृतः काये” के अनुसार प्राकृत श्लेष्मा को ही अपर ओज कहते 
हैं, जिसका मधुमेह में मूत्र द्वारा निप्कासन होता है। 
मधुमेह में मूत्र-माधुर्य होता है तथा शरीर माधुर्य भी होता है इसका विभेदक 
निदान इक्षुवालिका रस मेह तथा शीतमेह से करना चाहिये, अर्थात्‌ कफज मेह जिनमें 
मूत्र-माधुर्य होता है, उनका वातिक प्रेमह-मधुमेह से विभेदक निदान करना चाहिये। 


मधुमेह इक्षुवालिका रसमेह शीत मेह 

. वातज कफज कफज 

2. रोगीकृश या स्थूल. रोगी स्थूल रोगी प्रायः स्थूल 
3. ओज: क्षय के लक्षण ओज: क्षय नहीं ओज: क्षय नहीं 
4. असाध्य या याप्य... साध्य साध्य 

5. मूत्र किंचिद उष्ण मूत्र किंचित उष्ण मूत्र शीत 

6. आविल मूत्र आविल मूत्र मूत्र आविल नहीं 
7. चिरकारी आशुकारी आशुकारी 

8. शरीर माधुर्यम्‌ - - 

मधुमेह की चिकित्सा 


जम्बूबीज चूर्ण, गुड़मार, कारवेल्लक, स्वरस, विजयसार, सप्तरंगी, मामज्जक, 
उदुम्बर, निम्ब, पलाण्डु, लशुन तथा वट इनक अच्छे परिणाम मिले हैं। इनके प्रयोग 
से मूत्र-गत शर्करा बन्द हो जाती है, परन्तु रक्तगत शर्करा पर बहुत कम प्रभाव पड़ता 
है। लक्षण शान्त हो जाते हैं तथा रोगी स्वस्थ अनुभव करता है, ये सभी निरुपद्वुत हैं। 
चन्द्रप्रभावटी, वसंत-कुसुमाकर तथा त्रिवंग-भस्म का प्रचुर प्रयोग किया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में केवल “मधुमेह” का ही उल्लेख प्राप्त होता है। 
वानरों की स्थिति का वर्णन करते हुए रामायण में उल्लिखित है-“मधुवन में 
प्रविष्ट होकर उन्होंने देखा कि समस्त वानर यूथपति जो पहले उद्दण्ड हो रहे थे, अब 
मद रहित हो गये हैं-इनका नशा उतर गया है और मधु-मिश्रित जल का मेहन 
(मूत्रेन्द्रिय द्वारा त्याग) कर रहे हैं।'!'" 
इस प्रसंग के आधार पर यह स्पप्ट हो जाता है कि रामायण में मधुमेह का 
42 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उल्लेख किया गया है। 
क्षुधावेग 

क्षुधा का वेग रोकने से कृशता, दुर्बलता, विवर्णता, अंगमर्द, अरुचि, भ्रम ये 
उपद्रव होते हैं ॥' इसमें उत्तम स्निग्ध हल्के भोजन कराना हितकारक है। 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है 'मेरे राज्य यमलोक में 
स्थित रहकर जो मानव-भूख़ से पीड़ित है, उसके पुत्रादि इस भूतल पर जब तुम्हें 
भोजन करवायेगें तब वे बन्धु-वान्धवों सहित परम्‌ तृप्त होंगे।'!* 
पिपासा वेग 

प्यास का वेग रोकने से कंठ और मुख का सूखना, कानों से न सुनना, श्रम, 
श्वास, हृदय में व्यथा, यह उपद्रव होते हैं। इसमें शीतल और तर्पण (दूध, शर्बत आदि 
पिलाना) हितकारी है।” 

वाल्मीकि रामायण में भी इसका यत्र-्तत्र उल्लेख प्राप्त होता है-“ये दोनों बहुत 
दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्यास से पीड़ित होकर मेरी प्रतीक्षा में बैठे होंगे। वे 
देर तक मेरे आगमन की आशा लगाये दुःखदायिनी-प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे।''* 
जुम्भा वेग 

जूंभा का वेग रोकने से अंगों का नँवना, आक्षेपक, संकोच, तन्द्रा या अंगों का 
सोना, कंप यह उपद्रव होते हैं। इसमें वातनाशक क्रिया करना हितकारक है।"* 

वाल्मीकि रामायण में जृम्भा का उल्लेख प्राप्त होता है- 'जो कानों को फैलाता है, 
बारम्बार जँभाई लेता है, मृत्यु से भी नहीं डरता है--।'* 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण में 
विविध शारीरिक रोगों का वर्णन किया गया है। 

द्वितीय परिच्छेद 
मानसिक रोग 

मूर्च्छा 

“चरक' तथा “वाग्भट' ने 'मूर््छा रोग' के चार भेद बताये हैं। 'सुश्रुत' ने छः 
प्रकार के मूर्च्छा रोगों का वर्णन किया है। 
चरक के अनुसार 

. वातिक 

2. पैत्तिक 

3. कफज 

4. सन्निपातज 
सुश्रुत के अनुसार 

. वातिक 

वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 43 


2. पैत्तिक 

3. कफज 

4. रक्‍्तज 

5. मधु जन्य 

6. विष जन्य 

“मूर्छा” की अवस्था का समावेश मानसिक रोगों में होता है। इसमें 'मोह' 
प्रत्यात्म लक्षण है, अथांतू रोगी बेहोश हो जाता है। यद्यपि यह मानसिक रोग है 
लेकिन इसका विशेष सम्बन्ध लक्षण या उपद्रव के रूप में शारीरिक रोगों के साथ 
है। ज्वर, विषूचिका, पाण्डु, रक्‍त-स्रावाधिक्य, अत्यधिक वेदना अवस्थाओं में यह 
उपद्रव स्वरूप उपस्थित हो सकती है। चरक ने, इस अवस्था का वर्णन 'विधि 
शोणितीय” अध्याय में किया है जो इस बात का सूचक है कि इन अवस्थाओं में 
रकत-दुष्टि का महत्त्व है और आवश्यकता पड़ने पर रक्त-मोक्षण भी कराया जा 
सकता है। / 

उन्माद, अपस्मार, अतत्वाभिनिवेश में रोग के वेग आते हैं, मूर्च्छा के वेग नहीं 
आते। 
कारण 

मलिन आहार, अशुद्ध आचार-विचार, दोष-प्रकोपक आहार से शारीरिक एवं 
मानसिक दोष प्रकुपित होकर रसवह स्रोतस, रक्तवह स्रोतस तथा संज्ञावह स्नोतस 
एवं तन्मूल हृदय में जाकर आवरण उत्पन्न कर देते हैं, तब मन कार्य नहीं कर 
पाता जिससे संज्ञा नाश हो जाता है।॥ 
लक्षण 
बातज मूर्च्छा 

आकाश का वर्ण नील, कृष्ण या रक्त दीखता है। तमः प्रदेश, शीघ्र होश आ 
जाना, हत्पीड़ा, कंप, अंग-मर्द, कार्श्य, रोगी का वर्ण श्यावारुण हो जाता है। 
पैत्तिक मूर्च्छा 

रोगी को आकाश का वर्ण रक्त, पीत या हरित दिखता है तमः प्रवेश, प्रस्वेद के 
साथ होश आता है। पिपासा, संताप, नेत्र-पीत एवं रक्त-वर्ण के अतिसार होते हैं। 
कफज मूर्च्छा 

आकाश मेघाच्छन्न दीखता है, तमः प्रवेश, विलम्ब से होश आता है, ऐसा लगता 
है जैसे शरीर पर गीला चमड़ा लपेट रखा हो। प्रसेक, हल्लास। 
सन्निपातिक मूर्च्छा 

पूर्वोक्त सभी लक्षण मिलते हैं। 
चिकित्सा 
. मूर्च्ा में शोधन चिकित्सा करनी चाहिये। 
2. अंजन, अवपीड़न, धूम, प्रधमन, नस्य, दाह, नाखून लगाना, बाल खींचना, रोगी के 

44 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


मुख में तीक्ष्ण मद्य डालना। इन उपायों से रोगी को संज्ञा लाभ होता है। 
3. रक्‍त-दुष्टि के लक्षण अधिक लगें तो रकत-मोक्षण करें। 

वाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों पर 'मूर्च्छा' का उल्लेख किया गया है, यथा-- 
१. विश्वामित्र का यह शुभ वचन सुनकर महाराजा दशरथ को पुत्र वियोग की आशंका 
से महान दुःख हुआ। वे उससे पीड़ित हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये ।* 
$- विश्वामित्र का वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ी के लिये संज्ञा शून्य से हो 
गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले 
8. इस प्रकार शाप मिलने के कारण ताटका का अमर्ष और भी बढ़ गया। वे क्रोध 
से मूच्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्य॑ जी जहाँ रहते थे, उस सुंदर देश को 
उजाड़ने लगी।' 
4. शीतेषु नामक मानवास्त्र से पीड़ित ह्वो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ 
दूर चला जा रहा है।* 
5. राजर्षि भगीरथ भी यलनपूर्वक गज्ञा जी को साथ ले वहाँ गये। उन्होंने शाप से 
भस्म हुए अपने पितामहों को अचेत सा होकर देखा ।* 

इसके अतिरिक्त और भी अनेक स्थलों पर अचेतनता तथा मूर्च्छा का उल्लेख 
मिलता है जो इस बात का सूचक है कि वाल्मीकि जी ने अपने महाकाव्य में मूर्च्छा 
का विशद्‌ वर्णन किया है तथा इसको दूर करने के लिये उशीर, चन्दन, अगरू 
आदि से युक्त जल के छींटे लगाने का भी उललेख किया है। 
उन्माद 

उन्मादं पुर्नमनो बुद्धि संज्ञा ज्ञान स्मृति भक्ति शील, चेष्टाचार विश्रमं विद्यात्‌ ।" 
यह उन्माद की व्यापक परिभाषा चरक ने बतायी है। उन्माद में मनो-विश्रम, 
बुद्धि-विभ्रम, संज्ञा-विभ्रम, ज्ञान-विश्रम, स्मृति-विभ्रम, भक्ति-विभ्रम, शील-विश्रम, 
चेष्टा-विभ्रम तथा आचार-विश्रम हो जाता है। 

इस रोग का नाम “उन्माद” इसलिये पड़ा है क्योंकि इस रोग में दोष 
उन्मार्गगामी हो जाते हैं। मन पर मद्य के प्रभाव के समान प्रभाव पड़ता है। तथा 
यह एक मानसिक व्याधि है। हि 
उन्माद रोग के कारण 

विरुद्ध भोजन, दूषित भोजन, अपवित्र-भोजन, देव-ब्राह्मण, गुरु का अपमान 
करना, मन पर आघात करने वाले कारण, अधिक भय या अधिक हर्ष उत्पन्न 
करने वाले कारण इन सबसे उन्माद रोग होता है। 
सम्प्राप्ति 

पूर्वोक्त सामान्य (शारीरिक तथा मानसिक) कारणों से प्रकुपित दोष बुद्धि 
(मन) के स्थान हृदय तथा मनोवह स्रोतों में जाकर मन को दूषित कर देते हैं 


जिससे उन्माद हो जाता है। यह रोग अल्पसत्व व्यक्तियों में अधिक होता है और 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 45 


इसमें मनो-विश्रंश (प्रमोह) हो जाता है। 
लक्षण 
उन्माद रोग के निम्नलिखित लक्षण होते हैं। 
. धीविभ्रम 2. मनो-विश्रम 
3. व्याकुल दृष्टि 4. अधीरता 
5. अबद्ध वाक्त्व 6. हृदय शून्यता प्रतीति 
उन्माद के प्रकार 
. वातज 
2. पित्तज 
3. कफज 
4. सन्निपातज 
5. आगन्तुज 
बातज उन्माद के निदान 
रुक्ष अन्न, अल्प अन्न, शीत अन्न, विरेचन, धातुक्षय, उपवास । 
सम्प्राप्ति 
पूर्वोक्त कारणों से वात का प्रकोप होता है। प्रकुपित वायु चिन्ता से आक्रान्त 
हृदय में प्रविष्ट होकर हृदय को दूषित करता है और बुद्धि तथा स्मृति को शीघ्र 
नष्ट करके उन्माद उत्पन्न करता है। 
लक्षण 
- अस्थान हास्य 
2- अस्थान मुस्कुराना 
3- अस्थान नृत्य 
4- अस्थान गीत 
5- क्‍या बोलना, इसका ध्यान न देना 
6- अंग विक्षेपण 
7- प्रत्यक्ष कारण बिना रोना 
8- पारुष्य, कार्श्य, अरुण वर्ण 
व्यवहार में वातज उन्माद रोगी अधिक मिलते हैं। 
पित्तज उन्‍्माद के निदान 
अजीर्ण, कटुरस का अधिक सेवन, अम्ल रस का अधिक सेवन, विदाही अन्न 
का अधिक सेवन, अधिक उष्ण पदार्थों का सेवन। 
सम्प्राप्ति 
पूर्वोक्त कारणों से प्रकुपित पित हृदय को दूषित करता है, परिणामतः 
चित्त-विभ्रंश होकर उन्माद हो जाता है। 
46 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लक्षण 

शीघ्र क्रुद्ध हो जाना, नंगा हो जाना, तेजी से चलना, लोगों को मारने का 
प्रयत्न करना, शीतल स्थान तथा शीतल अन्न पान में रुचि, पीत एवं रक्‍त-वर्णता। 
कफज उन्माद के निदान 

कफज आहार-विहार तथा चेप्टाहीन रहना। 
सम्प्राप्ति 

पूर्वोक्त कारणों से प्रकुपित कफ हठय को दूषित करके बुद्धि विश्रम तथा 
स्मृति-विभ्रम करके उन्माद उत्पन्न करता है। 
लक्षण 

मंदवाकू, अरोचक, कफाधिक्य, वीभन्सता, शौचद्वेष, स्वप्ननित्यता, लाल स्राव 
छर्दि। 
सन्निपातज उन्‍्माद 

पूर्वोक्त तीनों दोषों के मिश्रित निदान और लक्षणों से सन्निपातज उनन्‍्माद का 
विनिश्चय किया जाता है। 
आगन्तुज उनन्‍्माद 

आगन्तुज या देवादि प्रकोप निमितज उन्माद के कारणों को दो भागों में 
विभक्त कर सकते हैं-पूर्वजन्मकृत पाप कर्म तथा इस जन्म में कृत पाप कर्म 
यथा-देव, गुरु यक्ष, गन्धर्व, राक्ष का अपमान करना। 

आचार्य चरक ने स्पष्टतः कहा है कि देव-गन्धर्व या राक्षस स्वयं क्रुद्ध होकर 
किसी को भी उन्मत्त नहीं करते, ये उसी को उन्मत्त करते हैं जो पूर्व जन्म या इस 
जन्म में पापी हों। इसमें देवादि का दोष नहीं है, व्यक्ति के कर्मों का दोष है 

देव-यक्ष आदि भी व्यक्ति के कर्मों के अनुसार तीन प्रयोजनों से उन्‍्माद 
उत्पन्न करते हैं। ये तीन प्रयोजन हैं-हिंसा, रति तथा अभ्यर्चना। जिसमें हिंसा की 
बात आ जाये वह असाध्य और रति तथा अभ्यर्चना ये दो साध्य होते हैं। देव-यक्ष 
आदि में भी जिसका अपमान व्यक्ति ने किया हो वही देव-यक्ष आदि उस व्यक्ति 
को. उन्मत्त कर देता है। गुरु, बृद्ध, सिद्ध तथा महर्षि के शाप से भी उन्माद हो 
जाता है। गन्धर्व स्पर्श करके उन्माद उत्पन्न करता है, यक्ष शरीर में प्रविष्ट होकर 
उन्माद उत्पन्न करता है, राक्षस अपनी गन्ध से उन्माद उत्पन्न करता है, पिशाच 
शरीर पर चढ़कर उन्माद उत्पन्न करता है। इसका वर्णन निम्नलिखित शब्दों में भी 
प्राप्त होता है- 
- अवलोकयन्तो देवाः जन्यन्त्युन्मादम्‌। 
2- गुरुवृद्धसिद्ध महर्षयोषभिशपन्‌ जन्यन्त्युन्मादमू। 
3- पितरो दर्शयन्तः जन्यन्त्युन्मादमू। 
4- स्पृशन्तो गंधर्वाः जन्यन्त्युन्मादम्‌। 

वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 47 


5- समाविशन्तो यक्षाः जन्यन्त्युन्मादम्‌। 
6- राक्षसाः गंधमाप्रापयन्तः जन्यन्त्युन्मादम्‌। 
7- पिशाचाः पुनरारुद्ध बाहयन्तः जन्यन्त्युन्मादम्‌। 


जब देव, यक्ष, राक्षस आदि किसी के शरीर में प्रविष्ट होते हैं, तब वह व्यक्ति 
स्वयं को मारने का प्रयत्न करता है, तालाब में कूद जाता है, पहाड़ पर से छलांग 
मारता है, अग्नि में कूदता है। शस्त्र से अपने शरीर पर प्रहार करता है। इस बात 
का उन्माद असाध्य होता है। इस प्रकार के उन्मादी दूसरे पर भी घातक आक्रमण 
कर सकते हैं, अतः इन्हें बाँधकर या कमरे में बन्द रखना चाहिये। 


आगन्तुज उन्माद के लक्षण 


अत्यात्म वल वीर्य पौरुष पराक्रम ग्रहण, धारण, स्मरण, ज्ञान, वचन.विज्ञानानि 


अनियतश्चोन्माद कालः / 


आगन्तुज उन्माद में रोगी में उद्भूत बल, पराक्रम, ज्ञान आदि आ जाता है। 
यह रोग शरीर में प्रविष्ट देव-यक्ष आदि के कारण होता है, ऐसे उन्‍्माद का कोई 


समय निश्चित नहीं होता है। 

देवोन्माद के लक्षण 

- सौम्य दृष्टि 

2- गम्भीर 

3- अक्रोधी 

4- अल्पनिद्रा 

5- अल्प-भोजन 

6- स्वेद, मूत्र, पुरीष की अल्प प्रवृत्ति 

7- शरीर में से अच्छी गंध आना, सुगन्ध-प्रियता 
8- प्रसन्‍न वदन 

पितृ उन्माद के लक्षण 

- अप्रसन्‍न दीखना 

2- निद्राधिक्य 

$- प्रति हत वाक्‌ 

4- अन्नाभिलाषा 

5- अरोचक 

6- अविपाक 

गन्धर्वोन्माद के लक्षण 

- नृत्य, गीत, गंध-स्नान मालादि-धारण में रुचि। 
2- रक्‍्तवस्त्र, वलि, हास्यकथा में रुचि। 


48 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


यक्षोन्मत्त के लक्षण 

।- स्वप्न, रोदन, हास्य, नृत्य, गीत, वाद्य में रुचि। 

2- नेत्र विस्फारित तथा रक्त वर्ण के। 

3- जिस बात का रहस्य नहीं समझता उसे कहने लगता है। 
राक्षसोन्मत्त के लक्षण 

- रोगी शस्त्र रक्त तथा मांस की इच्छा करता है। 

2- रक्त वर्ण की माला पहनने की इच्छा करता है। 

$- बहुत गर्जना करता है। 

ब्रह्मराक्षसोन्मत्त के लक्षण 

]- स्तुति, वेद-मंत्र तथा शास्त्रों की बातें करता है। 

2- लकड़ी आदि से अपने शरीर को पीटता है। 
भूत-पिशाचोन्मत्त के लक्षण 
-- अस्थान एवं असंबद्ध गीत, नृत्य-हास्य। 

2- गन्दे वस्त्र तथा गन्दे स्थान में रुचि। 

$- रुक्ष तथा भिन्‍न स्वर। 

4- नंगे होकर दौड़ना। 

5- प्रलाप 

6- अपने दुःखों को दूसरों से कहता फिरता है। 

7- स्मृति नाश। 

इन सभी प्रकार के आगन्तुज उन्मादों के सम्बन्ध में यह भी वर्णन उपलब्ध 

होता है कि विशेषतः अमुक प्रकार का उन्‍्माद अमुक तिथि में प्रारम्भ होता है- 
यथा- 


देवोन्माद - शुक्ल प्रतिपदा या त्रयोदेशी के दिन। 
पितृउन्माद - अमावस्या या दशमी के दिन। 
गन्धर्वोन्माद -  दशमी या चतुर्दशी के दिन। 
यक्षोन्माद - शुक्ल त्रयोदशी या सप्तमी के दिन। 
राक्षसोन्माद एवं भूत पिशाचोन्माद - द्वितीय, तृतीया, अष्टमी के दिन। 
इन तथ्यों को रोग विनिश्यात्मक आधार नहीं माना जाना चाहिये। ये मात्र 
सहायक आधार है। 
चिकित्सा 
निज कारणोत्थ उन्मादों की चिकित्सा 


- कामोन्माद में सर्व-प्रथम स्नेह पान कराना चाहिये। 
2- आवृत-मार्ग की अवस्था में स्नेहनोत्तर मृदु-शोधन। 
$- कफज में वमन, पित्तज में विरेचन। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 49 


4- सभी प्रकार के उन्मादों में वस्ति एवं शिरो-विरेचन। 
5- पश्चात्‌ दोष विनिश्चय करके शमन चिकित्सा। 
6- मन को प्रकृतिस्थ करने के लिये कुछ मानसिक तथा कुछ शारीरिक उपचार 
बताये गये हैं। रोगी को मारना, डॉटना, सान्त्वना देना, डराना, आश्चर्य में डालना, 
प्रसन्‍न करना आदि मानसिक उपचार हैं, जबकि प्रदेह, धूम, घृतपान, आदि 
शारीरिक उपचार हैं, जिससे मन, बुद्धि, स्मृति, संज्ञा सभी ठीक हो जाते हैं। कारण 
के विपरीत उपचार करना चाहिये। भय कारण हो तो सान्त्वना देनी चाहिये, दुःख 
कारण हो तो हर्षण करना चाहिये आदि॥९ 
7-इष्ट-वस्तु के नाश से या धनहानि से जिस रोगी को मनो-श्रंश हुआ हो उसे वस्तु 
की प्राप्ति करा देनी चाहिये तथा सान्त्वना तथा आश्वासन देना ही चिकित्सा है। 

काम को शोक से, शोक को हर्ष से, भय को हर्ष, ईर्ष्या तथा लोभ से, ईर्ष्या 
और लोभ को सदूविचारों से जीतना चाहिये। ऐसा करने पर इन कारणों से उत्पन्न 
उन्माद ठीक हो जाता है, रोग शान्त हो जाता है। 
आगन्‍न्तुज उन्माद की चिकित्सा 
- आगस्तुज उन्माद में देव, ऋषि, पितृ तथा गन्धर्व कारण हो तो मारना डराना 
आदि क्रूर कर्म नहीं करने चाहिये। ऐसी दशा में घृत-पान, मृदु-औषध, पूजा तथा 
मंत्र का प्रयोग करें। 
2- बलि, होम, आराध्य देव का पूजन, सत्य-आचरण, तप ज्ञान, गोष्ठी, गौ, 
ब्राह्मण, गुरु एवं पूज्य व्यक्तियों का पूजन करना चाहिये। ऐसा करने से मानसिक 
तनाव की स्थिति में अन्तर आकर रोग शान्त हो जाता है। 
3- आगन्तुज उन्माद में सर्पिः, पानः, धूम, अभ्यंग आदि भी करना चाहिये। 
मंत्रोपचार भी करना चाहिये। 
औषध 

सभी प्रकार के उन्मादों में उन्‍्मादगज-केशरी-500 मियप्रा. ब्राह्मी घृत के साथ 
(उन्माद गजकेशरी में धतूर, बचा, रास्ना आदि द्रव्य पड़ते हैं)। 

वाल्मीकि रामायण में विविध मानसिक रोगों का वर्णन किया गया है। इन 
रोगों में उन्‍्माद रोग को अधिक महत्त्व देते हुए इसका अनेक स्थलों पर उल्लेख 
किया गया है। 

उन्माद रोग के अन्तर्गत रामायण में कामोन्माद, शोकोन्माद, भूतोन्‍्माद, 
पिशाचोन्माद, मधु पीकर उन्मत्त होना, रक्‍्त-गन्ध से उन्मत्त होना आदि का 
उल्लेख किया गया है यथा- ५ 

रावण काम-वश पागल हो उठा और प्रलाप करने लगा। 

इसी प्रकार राम की स्थिति भी बतायी गयी है- 

“हर्ष से भरे हुए ये झुंड के झुंड पक्षी एक-दूसरे को बुलाते हुए इच्छानुसार 
कलरव कर रहें है और मेरे मन में कामोन्माद उत्पन्न किये देते हैं।'' 


420 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


शोकोन्माद का भी वर्णन है। सीता शोक सन्तप्त होकर संज्ञा शून्य हो गयीं 
और दो घड़ी तक मूरच्छित रहीं |” एक स्थान पर वर्णन है कि वह शोकोन्माद से 
आक्रान्त हो गयीं।' रामायण में भूतोन्‍्माद का उल्लेख भी प्राप्त होता है, कैकेई 
के लिये राजा दशरथ ने कहा था कि क्या तू भूतों के वश में आ गयी है? 
रामायण में मधु पीकर उन्मत्त होना” तथा रक्त गन्ध द्वारा उन्‍्मत" होने का 
भी उल्लेख मिलता है। + 
इसकी चिकित्सा स्वरूप शीतल जल का अभिषेक तथा मीठे वचनों द्वारा 
आश्वस्त करना बताया गया है; इस प्रकार स्पप्ट है कि रामायण में उन्‍्माद रोग 
का विशद्‌ विवेचन किया गया है। 
अपस्मार 
अपस्मार रोग 4 प्रकार का होता है- 
- वातिक अपस्मार 
2- पैत्तिक अपस्मार 
3- कफज अपस्मार 
4- सन्निपातज अपस्मार 
वाल्मीकि रामायण में अपस्मार रोग का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 
मद रोग 
अष्टाह्ञ संग्रह में मद सात प्रकार के माने हैं। 
- वातिक मद 
2- पैत्तिक मद 
3- कफज मद 
4- सन्निपातज मद 
5- रक्‍्तज मद 
6- मद्यजन्य मद 
7- विषजन्य मद 
मद रोग में “मोह! प्रत्यात्म लक्षण है, अर्थात्‌ रोगी बेहोश हो जाता है। मद की 
अपेक्षा मूर्च्छा में अधिक बेहोशी, मूर्च्छ की अपेक्षा संन्यास में अधिक जोशी होती 
है। यद्यपि ये मानसिक रोग हैं, लेकिन इसका विशेष सम्बन्ध लक्षण या उपद्रद करे 
रूप में शारीरिक रोगों के साथ हैं। 
मद के लक्षण 
वबातिक मद ५ 
अस्पष्ट वाणी, लड़खड़ाना, रुक्ष-श्याव-अरुण वर्ण की आकृतियाँ दींखना। 
पैत्तिक मद 


क्रोध, कर्कश वाणी, रक्त-पीत-कृष्ण वर्ण की आकृतियाँ दीखना। 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 42। 


कफज मद 

अल्प एवं असम्बद्ध भाषण, तन्द्रा, आलस्य, पाण्डु। 
सन्निपातिक मद 

पूर्वोक्त सभी लक्षण मिलते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में भी 'मद” का उल्लेख मिलता है।” 


तृतीय परिच्छेद 
आगन्तुक रोग 

अर्दित 

“अर्दयति पीडयति इति अर्दितः अर्थात्‌ जिस रोग में (मुखार्ध में) पीड़ा हो 
उसे “अर्दित” कहते हैं 'चरक' ने “आर्दित” को मुखार्ध अथवा शरीरार्ध में होने वाला 
रोग बताया है, परन्तु सुश्रुत ने अर्दित को मुखार्ध में होने वाला रोग बताया है। 
सुश्रुत का मत स्पष्ट है ताकि अर्दित और पक्षाघात या एकाँग रोग में स्पष्ट अंतर 
समझा जा सके। अर्दित को 2८4  ?४955 समझना चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में कई स्थलों पर मुख रोग का तथा मुख शब्द का उल्लेख 
प्राप्त होता है अतः अप्रत्यक्ष रूप से आर्दित का ही उल्लेख माना जा सकता है।' 
अर्दित के निदान 
अति उच्च स्वर में भाषण करना। 
अति कठिन पदार्थों का भाषण। 
अधिक हँसना या अधिक जृम्भा। 
अधिक भार उठाना। 
ऊँची, नीची भूमि पर शयन करना। 
मुँह टेढ़ा रखकर छींक लेना। 
अति कठिन धनुष खींचने से। 
वात-वर्धक आहार-विहार से। 
गर्भवती स्त्री, सूतिका, बालक, वृद्ध और क्षीण पुरुषों में अधिक रक्तक्षय के 
कारण। हि 
सम्प्राप्ति 

पूर्वोक्त निदानों से वायु का प्रकोप होता है और वह प्रकुपित वायु, मुख, 
नासिका, ललाट, ओष्ठ, हनु तथा नेत्र की सन्धियों में जाकर उन्हें टेढ़ा कर देता 
है, तब “अर्दित” उत्पन्न होता है। 


| कप कफ डी 9७: 


>7- रोमहर्ष ह 
422 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वेपथु 
आविल नेत्रता 
वायु का ऊर्ध्व वेग * 
त्वचा में सुप्ति 
तोद एवं मन्या-हनुग्रह 
लक्षण 
. मुख एक ओर टेढ़ा हो जाता है। आँख, ललाट, गाल तथा ओष्ठ एवं जिहवा 
एक ओर वक्र हो जाते हैं। 

2. रोगी को बोलने में कष्ट, उसकी आवाज स्पष्ट नहीं होती। 
$. उसका आक्रान्त नेत्र नहीं घूमता। 
4. उसकी जीभ, बाहर निकालने को कहें तो एक ओर वक्र होकर निकलती है। 
5. रोगी खाना खाता है या पानी पीता है तो अन्न उदक आक्रान्त भाग की ओरं 
से बाहर गिर जाते: हैं| 

“वाग्भट” ने अर्दित को ही 'एकायाम” नाम से कहा है। 
चिकित्सा 
. नस्य देकर नांक में स्नेह डालें । 
2. 'वलातैल' का अभ्यज्ञ करके नाड़ी स्वेद तथा उपनाह। 
3. क्षीर बलातैल की वस्ति दें। शिरोवस्ति भी दें। 
आघात 

“आघात” का प्रयोग आगन्तुक रोग के रूप में किया जा रहा है। आघात कई 
प्रकार का होता है यथा-मानसिक आघात, शारीरिक आघात, परिस्थितिजन्य आघात । 
आधात से तात्पर्य कष्ट से है। 

वाल्मीकि रामायण में भी कई स्थानों पर “आघात” का उल्लेख दृष्टि-गोचर होता 
है। यथा- 

लक्ष्मण अपने शरीर में धँसे हुए वाणों के द्वारा अत्यन्त पीड़ित थे। उनके अज्ञों 
में जगह-जगह घाव हो गया था। वे बारंबार लम्बी साँस खींचते थे, आघात जनित 
क्लेष से सन्तप्त हो रहे थे तथा उन्हें साँस लेने में भी पीड़ा होती थी।* 

तत्पश्चात्‌ उसने काले लोहे के बने हुए और बहुसंख्यक काँटों से जड़े हुए शूल 
को लेकर भगवान की छाती में गहरा आघात किया।* 
हि कच्चे ने एक स्थान पर रावण के देह का वर्णन करते हुए उसकी छाती पर ऐरावल 

हाथी के दाँतों के आघात चिन्ह का वर्णन किया है। 

इस प्रकार सुस्पष्ट हो जाता है कि रामायण में “आघात” का पर्याप्त उल्लेख किया 

गया है। 


छ़ एमी 9 ७ 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 423 


बज्रपात, रजस्ाव, कुत्ता काटना, सर्प काटना, 
फफोले पड़ना, वमन, विरेचन स्वेदादि। 

आंगन्तुक रोगों के अन्तर्गत उपरोक्त सभी का वाल्मीकि रामायण में यत्र-तत्र 
उल्लेख प्राप्त होता है। 'कुत्ता काटना” का रामायण में कहीं भी वर्णन या उल्लेख प्राप्त 
नहीं होता है किन्तु अन्य सभी का किसी न किसी रूप में दर्शन अवश्य होता है। 

युद्धों का वर्णन करते हुए कवि ने हृदय का फटकर बिखर जाना, हदय का बिंध 
जाना, मुख से रक्‍त-वमन, सफेन रुधिर श्रावण, मुख से मांस युक्त रुधिर का प्रबहण, 
भुजा, टांग आदि का कट जाना तथा नेत्रों का बिंध जाना आदि आगन्तुक रोगों 
का वर्णन किया है। 

इसके अतिरिक्त राम-लक्ष्मण सीता के वन गमन के समय में वन में चलने 
के कारण उनके पैरों में फफोले पड़ने को भी अस्पष्ट रूप से इंगित किया गया है। 

कवि ने परदारा के उपभोग को भी एक घातक रोग माना है तथा इसकी 
निन्‍्दा की हैं-परदारा पराभवः, अड्ज विहृवल होना, बुद्धि विचेतन, नष्ट चेतना, 
दीनता, आतुरता, चक्कर आना, घबराना, आँखें लाल होना, उन्मत्तता, संज्ञा-शून्यता 
शिथिलता के कारण उठना, गिरना, दीनता आना आदि सभी आगन्तुक रोग कहे 
गये हैं। इसके अतिरिक्त स्थूलता, धूप से पीड़ित होना, रजः स्राव, वज़पात, वमन, 
विरेचन आदि आगन्तुक रोग के ही भेद हैं- 

युद्ध भूमि का वर्णन दृष्टव्य है- 

मारे गये वीरों की लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्त का प्रवाह ही जिसकी 
महान जल-राशि थी। टूटे-फूंटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षों..के 
समान जान पड़ते थे। जो यमलोक रूपी समुद्र से मिली हुई थी। सैनिकों के यकृत्‌ 
और प्लीहा (हदय के दाहिनें और बायें भाग) जिसके महान पंक थे। निकली हुई 
आँतें, जहाँ सेवार का काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य से प्रतीत 
होते थे। शरीर के छोटे-छोटे अवयुव एवं केश जिसमें घास का भ्रम उत्पन्न करते 
थे।' 

जहाँ गीध ही हंस बनकर बैंठे थे। कंकारूपी सारस जिसका सेवन करते थे। 
मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे;। पीड़ितों की कय्रह जिसकी कलकल 
ध्वनि थी और कायरों के लिये जिसे पार करना ,अत्यन्त कठिन थां, उस युंद्ध-भूमि 
रूपणी नदी को प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ढ॑ वानर वर्षा के अन्त में हंसों और 
साँरसों से सेवित सरिता की भाँति उस दुस्तर नदी को उसी तरह पार कर रहे थे, 
जैसे-गजयूथपति कमलों के पराग से आच्छादित किसी पुष्करिणी को पार करते हैं।* 

नीचे गिरते हुए राक्षसों की भुजा, जाँच, कमर व छाती के टुकड़े-टुकड़े हो 

- गये। आँखें बाहर निकल आयीं, खूर:की धारा बहने लगी, शरीर की हड्डियाँ 
चूर-चूर हो गयीं, शरीर के जोड़-जोड़ क्षत-विक्षत हो गये तथा नस-नाड़ियों के 
बज़्धन भी शिथिल हो गये। 
424 »/ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


इसके अतिरिक्त विपरीत प्रकृति, भयातुर, तेजहीन आदि मानवीय अवस्थाओं 
का जो रोग के रूप में आक्रान्त होती हैं, वर्णन किया गया है।? 

रोगी की शिथिल अवस्था में भी वह हिम्मत कर उठता है, परन्तु वह आगे 
नहीं बढ़ सकता और गिर पड़ता है, ऐसा बार-बार होता है-इस प्रकार की 
शिथिलता का वर्णन कवि ने राजा दशरथ की अंतिम अवस्था का वर्णन करते हुए 
लिखा है। ठीक इसी के साथ “जिस प्रकार एक रोगी किसी वस्तु को प्राप्त करने 
का प्रयास करता है, उसे छूना चाहता है परन्तु दुर्बलतावश वहाँ तक नहीं पहुँच 
पाता और बीच में ही अचेत होकर गिर पड़ता है” ऐसी दुर्बलता की विशेष 
अवस्था का वर्णन वहाँ किया गया है। राजा दशरथ मर्यादा का उल्लंघन करने 
वाली उस हठीली स्त्री के वश में पड़कर अनाथ- की भाँति विलाप कर रहे थे। वे 
कैकेई के चरणों को छूना चाहते थे परन्तु उन्हें न पाकर बीच में ही मूरच्छित होकर 
गिर पड़े। ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तु को छूना चाहता है, किन्तु 
दुर्बलता के कारण वहाँ तक न पहुँच कर बीच में ही अचेत होकर गिर जाता है ।”* 

आयुर्वेद में अकाल में प्राप्त जरा को भी व्याधि रूप में ही स्वीकार किया गया 
है। रामायण में भी इसे रोग के रूप में स्वीकार कर मृत्यु का कारण बताया 
है--“अवसीदन्ति नरा जरा मृत्यु वशंगता:।॥” 

रामायण में जबरदस्ती मृत्यु प्राप्त करने के निम्न कारण बताये हैं-विष 
पीकर मृत्यु को प्राप्त, आग में जलकर मृत्यु को प्राप्त होना, उपवास द्वारा, छुरा 
भौंककर तथा गला घोंटकर मृत्यु को प्राप्त होना। 

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में आगन्तुक रोगों का युद्ध काण्ड 
में विशेष रूप से विशद्‌ वर्णन किया गया है। 

चतुर्थ परिच्छेद 
स्त्री रोग एवं गर्भावक़ान्ति 
वाल्मीकि रामायण में स्त्री रोग एवं गर्भावस्‍था के रोगों का विशदू वर्णन 

मिलता है तथा उनकी चिकित्सा का भी उल्लेख किया गया है यथा- 

रामायण में एक स्थान पर सीता के मुख से कहलवाया गया है, “शल्य-चिकित्सक 
किसी विशेष अवस्था में (शिशु के अप्राकृतिक अवस्था में आ जाने पर या मूढ़ 
गर्भ बन जाने पर, गर्भ में मृत्यु हो जाने पर) गर्भस्थ शिशु को टूक-टूक कर देता 
है।”” इसी प्रकार रामायण में बिना कष्ट के प्रसव होने का भी उल्लेख है। 

गर्भ-धारण, गर्भवती, गर्भ से उत्पन्न, गर्भ-स्राव, गर्भ-पिण्ड,” गर्भ के टुकड़े 
करना, गर्भस्थ बालक, गर्भ के लक्षण, ऋतु-स्नान, ऋतुमती, रजस्वला,* योनि देश, 
रज, वीर्य, बन्ध्या, स्त्री समागम, सूतिका गार, अयोनिजा,' गर्भ-परिश्रव (400- 
४०) तेज (वीर्य, 5७॥थ॥)” आदि शब्दों के उल्लेख से यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता हैं 


कि रामायण में 'स्त्री रोग! एवं “गर्भावक्रान्ति” की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 425 


इनके अतिरिक्‍त रामायण में तो यह भी कथन प्राप्त होता है 'खच्चरी को 
गर्भस्थ शिशु नष्ट कर देता है।” 
रजस्वला 

“श्री भाव प्रकाश' में गर्भ-प्रकरण में गर्भोत्यत्ति का क्रम बताते हुए सर्व-प्रथम 
“रजस्वला” स्त्री के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है, 72 वर्ष की अवस्था 
से लेकर 50 वर्ष की अवस्था तक की स्त्रियों के भग के मार्ग से प्रत्येक माह 
आर्तव (रज) निकलता रहता है*-ऐसी स्त्री को ही रजस्वला स्त्री कहते हैं। 

वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख इस प्रकार है-राजा इसके श्रवण से 
भूमण्डल पर विजय पाता है। परदेश में निवास करने वाला पुरुष सकुशल रहता 
और “रजस्वला स्त्रियाँ' (स्नान के अनन्तर सोलह दिनों के अंदर) इसे सुनकर श्रेष्ठ 
पुत्रों को जन्म देती हैं।* 

* गर्भ-ग्रहण योग्य समय 

श्री भाव प्रकाश के अनुसार जिस दिन से रज निकलने लगता है, उस दिन 
से अर्थात्‌ मासिक धर्म के होने से लेकर 6 वीं रात्रि पर्यन्त समय को 'ऋतुकाल! 
कहते हैं, पण्डित लोगों ने इसी 6 रात्रि व्यापी “ऋतुकाल” को गर्भ-धारण करने 
के योग्य समय बताया है।" 

वाल्मीकि रामायण में सीता लक्ष्मण से कह रही हैं-मेरी ओर से सारी बातें 
तुम श्री रघुनाथ जी से कहना और आज तुस्त भी मुझे देख जाओ । मैं इस समय 
ऋतुकाल का उल्लंघन करके गर्भवती हो चुकी हूँ।' 
रजस्वला का कर्त्तव्य 

रजस्वला स्त्री ऋतुस्नान करके जिस प्रकार के पुरुष को देखती है, उसी तरह 
के पुत्र को उत्पन्न करती है।”* 

वाल्मीकि रामायण में भरत का कथन है “जिसके परामर्श से आर्य का वन 

- गमन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु स्नान-काल प्राप्त होने के कारण अपने पास आयी 

हुई सती-साध्वी, ऋतु-स्नाता पत्नी को ठुकरा दें।* 
गर्भावतरण 

काम के वश से स्त्री और पुरुष का परस्पर संयोग होने पर शुद्ध रत और वीर्य 
से उत्पन्न होकर स्त्री के गर्भ होता है, वही गर्भ उदर से बाहर निकलने पर बालक 
कहलाता है ॥* रे 

वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है-यह सुनकर वरुण ने कामदेव के वाणों 
से पीड़ित होकर कहा, “सुन्दर रंग रूप वाली सुश्रोणि ! यदि तुम मुझसे समागम करना 
नहीं चाहती तो मैं तुम्हारे समीप इंस देव निर्मित कुम्भ में अपना वीर्य छोड़ दूँगा और . 
इस प्रकार छोड़कर ही सफल मंनोरथ हो जाऊँगा"7”5 

इसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी उल्लेख मिलता है।॥९ 

426 / वाल्मीकि रामायण तथा .आयुर्वेद 


गर्भ में जीव का प्रवेश 

जिस समय शुक्र और रज का संयोग होता है उसी समय जीव उसी मिले हुए वीर्य 
और रज के अन्दर प्रवेश करता है। शुक्र के अधिक होने से पुत्र, रज के अधिक होने 
से कन्या तथा, रज का वीर्य का भाग बराबर होने से नपुंसक संतान उत्पन्न होती है।'” 

“पिताँ-जीव के जन्म में निर्मित्त कारण मात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता 
के द्वारा गर्भ में धारण किये हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही पुरुष 
का यहाँ, जन्म होता है।”/* है 
गर्भ के लक्षण कि ह 

योनि के द्वार से शुक्र और रज का ज्ञाव न होना, थकावट मालूम पड़ना, पैर का 
गहराना, प्यास का लगना, ग्लानि, भग का फड़कना ये सब गर्भ-स्थिति के लक्षण 
मैथुन कर चुकने के बाद स्त्रियों में दिखाई पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त रोंगटों का खड़ा 
हो जाना, विशेष रूप से नेत्रों की पलकों का गिरना पथ्य भोजन करने पर भी वमन 
करना, अच्छे गन्ध वाले द्रव्यों को सूंघने से भी चित का उद्विग्न हो जाना, मुख से लार 
गिरना अर्थात्‌ जी मिचलाना और शरीर का शिथिल यानि आलस्य युक्त होना ये सब 
गर्भवती स्त्रियों के लक्षण होते हैं॥* 

वाल्मीकि रामायण में गर्भ के लक्षणों का उल्लेख इस प्रकार है, “उस वेद ध्वनि 
को सुनक़र वह कन्या उसी ओर गयी और उसने तपोनिधि पुलस्त्य जी का दर्शन 
किया। महर्षि की दृष्टि पड़ते ही उसके शरीर पर पीलापन छा गया और गर्भ के लक्षण 
प्रकट हो गये।””” 

इन्हीं दिनों श्री राम चन्द्र जी ने अपनी पत्नी को गर्भ के मंगलमय चिन्हों से युक्त 
देखकर अनुपम हर्ष प्राप्त किया और कहा बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।/ 

गर्भशिय गत-शुक्र, रज, जीव और 6 विकारों से युक्त प्रकृति ये सब गर्भ-संज्ञक 
हैं अर्थात्‌ इन्हीं को गर्भ कहते हैं, काल पाकर बढ़ा हुआ गर्भ जब अज्नों और उपाज्ों 
से युक्त हो जाता है, तब लोग “शरीरी' इस नाम से कहते हैं।” 
अंग एवं उपांग 

पहला अंग सिर है, केश, मुस्तलुड (१०८४७०४७॥) ललाट, दो भौहे, दो नेत्र, दो 
पलकें, कान, ओष्ठ, मुख, तालु आदि इसके उपांग हैं। 

दूसरा अंग ग्रीवा है। तीसरा अंग दोनों बाहें हैं। चौथा अंग वक्ष स्थल है। 
पाँचवाँ अंग उंदर है तथा छठा अंग दोनों पार्श्व अर्थात्‌ पंसुली हैं। सातवाँ अंग 
पृष्ठ वंश है। आठवाँ अंग सक्थि अर्थात्‌ दोनों पैर हैं। 

शरीर के अन्य सभी अवयव इन्हीं अंगों के उपांग हैं। 
गर्भहासं 

28 सप्ताह के पूर्व यंदि गर्भ, गर्भशिय से बाहर निकल जाता है (गर्भावस्था 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 427 


समाप्त हो जाती है) तब उसको गर्भ-हास कहते हैं। गर्भ-हास प्राकृतिक करणों से 
ही होतां है। गर्भावस्‍था में प्रारम्भिक महीनों में यदि रक्त-स्राव होता है तब वह 
प्रायः गर्भपात (95%) के कारंण होता है। इनमें से अधिकतर 8 से 2 सप्ताह के 
अन्दर गर्भ-हास होता है और प्राकृत तथा अवैधानिक (0४॥7रां॥थ) गर्भपात का 
अनुपात बराबर-बराबर होता है। 

वाल्मीकि रामायण में भी गर्भस्राव का उल्लेख किया गया है-- 

देवताओं का यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वती से स्कन्दित 
(स्खलित) तथा गंगा द्वारा गर्भस्नाव होने पर प्रकट हुए अग्नि के समान उत्तम प्रभा 
से प्रकाशित होने वाले उस बालक को कृत्तिकाओं ने नहलाया।” 

काकुत्स्थकुल भूषण श्री राम ! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्नाव 
काल में स्कन्दित हुए थे, इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा ।* 
मूठगर्भ 
कारण 

स्त्री संभोग, ताँगा, रथ आदि यान तथा ऊँट, अश्व आदि वाहन पर सवारी, 
मार्ग में चलना, पाँव फिसलने से गिर पड़ना, ऊँचे से गिरना, भीड़ से दबना, जोर 
से दौड़ना, उदर पर चोट लगना, ऊँचे-नीचे बिस्तर पर सोना, उकड़ूँ बैठना, अधिक 
उपवास करना, मल-मूत्रादि के वेगों को रोकना, अत्यधिक रूक्ष, तिकक्‍्त रस वाले 
द्र॒व्यों का खाना, शोक करना, क्षारों का अधिक सेवन, मरोड़ के साथ दस्त लगना, 
वमंन और विरेचन, झूलना, अजीर्ण, गर्भ गिराने वाले द्रव्यों का सेवन करना आदि 
कारणों से गर्भ अपने बन्धन (गर्भशिय सम्बन्ध) से छूट जाता है जैसे कि लकड़ी 
या पत्थर की चोट से फल अपने वृन्त (डण्ठल) के बन्धन से छूट जाता है।” 
लक्षण 

इस कारण वश बन्धनों (गर्भ-शय्या) से मुक्त हुआ गर्भ गर्भशय से निकलकर 
माता के यकृत, प्लीहा और आन्त्र जो कि गर्भवृद्धि जन्य दबाव से ऊपर उठ गये 
थे, इनके साथ इनके विवर से नीचे की ओर गिरता हुआ कोष्ठ में संक्षोभ उत्पन्न 
करता है। उस स्त्री के जठर में प्रक्षोम से अपान वायु मूढ, (क्रियाहीन) होकर 
पार्श्व-बस्ति, शीर्ष, उदर और योनि में शूल, आनाह तथा मूत्र की रुकावट इनमें 
से किसी एक रोग को उत्पन्न कर रक्त स्राव के साथ वरुण गर्भ को गिरा देती 
है। वही गर्भ कुछ काल बाद बढ़कर अनुचित तरीके से अवतरित होकर अपत्यपथ 
(योनि नलिका) में आकर बाहर न निकले और अपान-वायु के वैगुण्य से मूरच्छित 
हो जाता है तब उसे मूढ़गर्भ कहते हैं।* 
मूढ़गर्भ के भेद 

अपान वायु की विगुणता से कील, प्रतिखुर, बीजक और परिध ये मूढ़गर्भ के 
चार भेद होते हैं।!” 

428 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


असाध्य मूढ़-गर्भ लक्षण 

जो स्त्री सिर को अधिक हिलाती हो या पटकती हो, जिसके हस्त-पादादि अंग 
शीतल हो गये हों, जो बेहोश होने से स्वाज्ञ रक्षण में असमर्थ होने से निरपत्रपा 
(लज्जा-रहित) सी मालूम पड़े तथा जिसकी नसें और उभरी हुई दीखती हों वह 
गर्भ को मार डालती है तथा मृत बालक उसको मार डालता है।* 
अन्तर्मृत गर्भ लक्षण 

उदर में गर्भ का स्पन्दन नहीं होना, आवी (प्रसव-पीड़ा) का विनाश, चेहरे 
तथा शरीर पर श्यावता (काला-पन) लिये पाण्डु-वर्णता, श्वास में बदबू आना तथा 
बस्ति, गर्भाशय एवं उदरादि में शूल ये अन्तर्मुत गर्भ के लक्षण हैं।” 

वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि शल्य-चिकित्सक किसी विशेष अवस्था में 
गर्भस्थ शिशु को टूक-टूक कर देता है।" 

यहाँ जिस विशेष अवस्था की ओर संकेत किया गया है वह शिशु के मूढ़गर्भ 
बन जाने से ही .सम्बन्धित है। 
बन्ध्यात्व 

यदि सन्‍्तान हो सकती हो, पर न हुई हो उसे | कहते हैं यदि सन्‍्तान 
हो ही न सकती हो तो उसे $(७४४॥» कहते हैं। एक संतान होने के बाद दूसरी 
सन्तति न हुई हो या एक बार गर्भपात होने के बाद सन्तान न हुई हो तो प्रायः इसका 
कारण ]6०४०॥ जनित ॥॥00-$09॥8/05 होता है अर्थात्‌ १४७८ के अन्दर मार्ग 
अवरुद्ध हो जाने से ऐसा होता है। इसे 3००४० |८४॥७ कहते हैं । ४४४॥॥8 गर्भशिय 
ट्यूब में प/७०७/४४०७ हो ८७४४ का मुख (09) सूक्ष्म हो, गर्भाशय में 80 या 
ए०।णी०पांठ॥ हो या $श9ग्रष्ठा४५ हो या 0:७76६ के कार्य की निर्बलता से आर्तव 
ठीक न होता हो या 0५०७४०॥ काल में पुरुष संग न हुआ हो तो सन्तति नहीं होती। 
इन कारणों का निश्चय करके तभी चिकित्सा होनी चाहिये। आयुर्वेद में वन्ध्या रोग 
को गर्भशिय या 0५97७ में किसी प्रकार की असमर्थता या अशक्ति से उत्पन्न होने 
वाला रोग होने से इसे वायु प्रकोप जनित रोग कहा गया है। अतः इस रोग की बल्य, 
प्राण-प्रद चिकित्सा होनी चाहिये। 
बन्ध्या रोगोपयोगी प्रयोग 
. अश्वगंधाघृत-अश्वगंधा 2 किलो, जल 6 किलो, कषाय । चौथाई, घृत किलो, 
अश्वगंधा कल्क  छटांक घृत साधन। आर्तव के बाद -2 तोला रोज दें। 
2. बला आदि चूर्ण-बला बीज, मुलैठी, अति बला, वंटाकुर, मिश्री, नाग-केशर 
समभाग चूर्ण 3 माशा मधु घृत के साथ रोज दें। 
8. सुवर्णरुप्यताम्रयोग-सुवर्ण 8, रुप्यक 6, ताम्र 30 मि. ग्रा. की एक मात्रा रोज घृत 
के साथ दें। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 429 


वाल्मीकि रामायण में भी वन्ध्या का उल्लेख मिलता है-कौशल्या राम से कह 
रही है-“बेटा रघुनन्दन ! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बात 
का शोक रहता। आज तो मुझ पर इतना भारी शोक (दुःख) आ पड़ा है, इसे वन्ध्या 
होने पर मुझे नहीं देखना पड़ता ।” बेटा वन्ध्या को एक मानसिक शोक होता है। 
उसके मन में यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संन्तान नहीं है, इसके सिवा कोई 
दूसरा दुःख उसे नहीं होता ॥११ 
औषधि से पुत्र-प्राप्ति 

वाल्मीकि रामायण में औषधि द्वारा पुत्र-प्राप्ति का विशद्‌ उल्लेख किया गया है- 

वे शत्रु सूदन महातेजस्वी नरेश पुत्र-हीन होने के कारण उस समय पुत्र-प्राप्ति के 
लिये पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे।” 

उस समय अग्नि-कुंड से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ। वह पुरुष प्रकाश 
पुंज देह वाला तथा बल-पराक्रम में भी महान था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता 
था-जैसे वह कोई वनवासी जाति का वनस्पति विशेषज्ञ था। अक्षरशः शब्दों पर गौर 
न कर यदि उसका भावार्थ ग्रहण किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है। 

उसकी आकृति सूर्य के समान तेजोमयी थी।.......उसके हाथ में तपाये हुए 
जाम्बूनद स्वर्ण की बनी हुई एक परात थी जो चाँदी के ढक्कन से ढकी थी, वह बहुत 
बड़ी एवं दिव्य खीर से भरी हुई थी॥* 

उस पुरुष ने कहा, हे राजन ! मुझे प्रजापति (आदि वैद्य) का पुरुष जानो। मैं 
उन्हीं की आज्ञा से यहाँ आया हूँ। इसके बाद उसने उस (औषध सिद्ध) खीर के गुणों 
का वर्णन करते हुए कहा*- 

“नृप श्रेष्ठ ! यह देवताओं की बनाई हुई खीर है जो सन्तान प्रदान कराने वाली 
हैं।#े 

राजन ! यह खीर अपनी योग्य पत्नियों को दो और कहो-“तुम लोग इसे 
खाओ” ऐसा करने से उनके गर्भ से आपको उनके पुत्रों की प्राप्ति होगी जिसके लिये 
तुम यज्ञ कर रहे हो।” 

दिव्य-पुरुष के इन वाक्यों को सुनकर राजा ने “बहुत अच्छा कहा। वह थाली 
अपने हाथों में लेकर अन्तःपुर में गये और कौशल्या से बोले”-देवी ! यह अपने लिये 
पुत्र-प्राप्ति कराने वाली खीर ग्रहण करो ।” 

ऐसा कहकर राजा ने उस खीर को अपनी तीनों रानियों में बाँट दिया। इस 

“ बटवारे के फलस्वरूप तीनों ही रानियाँ गर्भवती हुईं जिनके गर्भ सूर्य और अग्नि के 

समान तैजस्वी थे। राजा रानियों को गर्भवती देखकर बहुत प्रसन्‍न हुए।» 

फलस्वरूप कौशल्या के गर्भ से श्री राम, सुमित्रा के गर्भ से श्री लक्ष्मण और 
शत्रुध्न और कैकेई के गर्भ से भरत का जन्म हुआ। उक्त प्रसंग में यह स्पष्ट उल्लेख 
है कि राम का जन्म पायस के “विष्णोरर्ध महाभागं” आधे भाग से हुआ, भरत का 


430 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जन्म “विष्णोश्चतुर्भागः” तथा लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म उस विष्णु रूप पायस के 
“विष्णोरर्ध समान्वितं”” अर्धभार्ग से हुआ। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है.कि औषधि 
सिद्ध पायस के फलस्वरूप सन्‍्तान कितनी उत्तम तथा सर्वगुण सम्पन्न: उत्पन्न होती 
ह्ठै ४ 
इस प्रकार औषधि से पुत्र-प्राप्ति का उल्लेख रामायण में है। 
प्रसव का समय कट 
प्रसव की अवस्थाएँ (50886 ० |#90ए) 
परिचय 
प्रसव की सम्पूर्ण अवधि को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। यह 
विभाजन पूर्ण रूप से कृत्रिम विभाजन है- 
प्रथम भाग 
प्रसव की पीड़ा प्रारम्भ होने से जब तक गर्भशिय पूर्ण-रूप से खुल नहीं जाता है, 
तब तक की अवधि को प्रसव का प्रथम भाग माना जाता है। 
द्वितीय भाग 
इसको “गर्भ के बाहर निकलने” (छ/फ्॒ण/आ५९ 95० ०० 888०) की अवधि 
कहा जाता है। गर्भाशय ग्रीवा के पूरी तरह फैल जाने से लेकर गर्भ के बाहर निकल 
जाने की अवधि को द्वितीय भाग कहते हैं। 
तृतीय भाग 
इसको अपरा (?/8०थ॥४8| 9985९ ० 58४०) की अवधि भी कहते हैं। शिशु 
उत्पन्न होने के बाद अपरा (नाभिनाल तथा झिल्ली) में जो समय लगता है उसको 
तृतीय भाग कहते हैं। 
आयुर्वेद के अनुसार नवें या दसवें मास में गर्भिणी सन्‍्तान प्रसव करती है और 
कभी-कभी ॥7वें या 2वें मास में भी प्रसव करती है और यदि अधिक समय हो जाये 
तो यह समझना चाहिये कि किसी रोग वश विलम्ब हो रहा है अर्थात्‌ या तो गर्भ की 
जगह कोई रोग है अथवा गर्भ में कोई विकार हो गया है।“ वाल्मीकि रामायण में 
प्रसव का समय न बताकर केवल नामोल्लेख ही प्राप्त होता है।" 
सूतिका गृह 
भाव प्रकाश के मतानुसार 'सूतिका गृह आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौड़ा एवं 
पूर्व अथवा उतर मुख द्वार रख करके देखने में सुन्दर सूतिका गृह का निर्माण करना 
चाहिये ।/ 
वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख इस प्रकार है-“वाल्मीकि जी ने प्रसन्‍नचित 
होकर सूतिका गृह में प्रवेश किया और उन दोनों कुमारों को देखा तथा उनके लिये 
भूतों तथा राक्षसों का विनाश करने वाली रक्षा की व्यवस्था की /४ 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 43। 


गर्भपात 
अठूठाइस सप्ताह से पूर्व यदि गर्भ गर्भशय से बाहर निकल जाता है तो उसको 
गर्भपात कहते हैं। 
कारण 
प्रायः 66% गर्भपात निम्न कारणों से होता है- 
. हाईडैटिडी फार्ममोल 
2. अपरा का नीचे होना 
3. क्रोमोसोम की गड़वड़ी के कारण डिम्ब (गर्भ) की मृत्यु 
गर्भ की विकृति 
. गर्भ का पूर्ण विकास न होना 
2. संक्रमण 
3. 2-२५ का प्रभाव 
4. विष का प्रभाव 
माता के रोग 
. कालरा, प्लेग, गैस्ट्रो आदि 
2. सिफिलिस 
$. तीव्र ज्वर 
4. जीर्ण रोग 
5. माता को चोट लगना 
6. प्रोजेस्टेरोन की गड़बड़ी 
7. योनि-मार्ग की विकृति 
8. गर्भावस्‍था की द्वितीय तिमाही में प्रायः गर्भाशयग्रीवा की कार्य-हीनता (7 
८णाए००॥०९) के कारण गर्भपात होता है। 
9. अवैधानिक (एगंगांग् 00000) गर्भपात 
0. मैथुन 
लक्षण 
गर्भपात होने का भय 
. योनि से लाल रंग का स्राव निकलता है। 
2. पेट में प्रायः पीड़ा नहीं होती या साधारण होती है। 
: 3. योनि परीक्षा करने से श्लेष्मा व रक्‍्त-मिश्रित स्राव अंगुली पर लग जाता है। 
4. गर्भाशय मुलायम रहता है। 
निश्चित गर्भपात 
इस अवस्था में गर्भाशय ग्रीवा फैल जाता है जिससे गर्भपात निश्चित है, इसमें 


432 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गर्भपात रोका नहीं जा सकता। इसमें- 
. साधारण या गम्भीर रकत-स्राव होता है। 
2. उदर के नीचे के भाग में शूल के समान पीड़ा होती है। 
$. गर्भावस्‍था के लक्षण (मासिक न होना) मिलते हैं आदि। 
अपूर्ण गर्भपात 
इस अवस्था में गर्भपात होने पर गर्भ या अपरा का कुछ. भाग गर्भशिय के 
अन्दर रह जाता है जिसमें जीवाणुओं का संक्रमण होने की अत्यधिक सम्भावना 
रहती है इसमें-- 
. रक्‍तस्राव लगातार होता रहता है। 
2. पीड़ा का होना अनिश्चित है। 
3. अंगुली पर लाल या काला रक्‍त मिलता है। 
पूर्ण गर्भपात 
इस अवस्था में गर्भ तथा अपरा का सम्पूर्ण भाग गर्भोदक तथा जमा हुआ 
रक्‍त आदि सभी बाहर निकल जाते हैं। इसमें- 
. थोड़ी पीड़ा होती है। 
2. यह गर्भपात स्वयं ही होता है। 
3. योनि से रक्त बहता है। 
गर्भपात के पश्चात्‌ 
. कुछ दिन के बाद लोकिया (योनि से स्राव) निकलना बन्द हो जाता है, यदि 
बन्द न हो तो समझना चाहिये कि गर्भपात अपूर्ण है। 
2. साधारण मासिक प्रारम्भ हो जाता है। 
पूर्ण गर्भपात की चिकित्सा 
स्त्री की बराबर देख-रेख करनी चाहिये। उपद्रव (यदि हो) की उपयुक्त 
चिकित्सा करनी चाहिये तथा रकक्‍्ताल्पता के प्रकार के अनुसार उनकी चिकित्सा 
करें। 
गर्भपात का चूक जाना (४5५९७ 8७00) 
इस अवस्था में गर्भ मर जाता है और वह गर्भाशय के अन्दर रह जाता है। 
इसमें- 
. गर्भपात के लक्षण बार-बार होते हैं परन्तु गर्भ व अपरा आदि बाहर नहीं 
निकलते। पर 
2. योनि से भूरा स्राव निकलता है। 
3. प्रायः पीड़ा नहीं होती। 
बार-बार गर्भपात होना (प्रथआंएथ) 
कभी-कभी स्त्री को दो-तीन बार लगातार गर्भपात होता है। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 433 


गर्भाशय ग्रीवा स्थित गर्भपात (0७४००) हे 

यह एक विरल अवस्था है-इसमें रक्त-स्नाव होने से अधिक पीड़ा होती है। 
इसमें गर्भाशय ग्रीवा फूल जाती है परन्तु इसके नीचे का छिद्र (05) चौड़ा नहीं 
होता। परिणाम स्वरूप गशिय से गर्भ, अपरा आदि नीक्ते 'विसककर गर्भाशय 
ग्रीवा में आकर रुक जाते हैं। 
अवैधनिक गर्भपात 
चिकित्सा के लिये गर्भपात कराना 
गर्भपात की चिकित्स (गर्भपात के भय में) 
. शैया पर विश्राम कराना। 
2. शामक औषधियों का प्रयोग। 
5. गर्भशय को शिधिल करने की औषधियाँ। 
4. हार्मोन का प्रयोग आदि। 
निश्चित गर्भपात की चिकित्सा हि 
. अधिक रक्‍्त-स्राव होने पर सिरा द्वारा रक्‍त दें। 
2. गर्भाशय से निकलने वाले सभी पदार्थों की परीक्षा कर लें कि गर्भ के सभी 
पदार्थ बाहर निकल आये हैं या नहीं। 
3. सिरा मार्ग द्वारा ग्लूकोज आदि दें। 
अपपूर्ण गर्भपात की चिकित्सा 
. गर्भाशय को फैलाना तथा खरोंचना (0.&0.) चाहिये। 
2. रोग की प्रारम्भिक अवस्था में निश्चित गर्भपात के समान चिकित्सा करनी 
चाहिये। 
गर्भपात के साथ जीवाणुओं का संक्रमण होने पर 
. गर्भिणी को अन्य रोगियों से अलग रखना चाहिये। 
2. शैया पर विश्राम कराना चाहिये। 
3. मुख से पर्याप्त जल देना चाहिये। 
4. जीवाणुओं का संक्रमण रोकने के लिये औषधियाँ दें। 

वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख इस प्रकार है.........गंगा द्वारा गर्भस्नाव 
होने पर प्रकट हुए अग्नि के समान उत्तम प्रभा से प्रकाशित होने वाले उस बालक 
को कृत्तिकाओं ने नहलाया।“ कार्तिकेय गर्भस्नाव काल में स्कन्दित हुए थे, 
इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्‍्द कहकर पुकारा।# 

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में गर्भपात का उल्लेख मिलता है। 
उदर पाटन द्वारा गर्भ निकालना 

यह रामायण कालीन शल्य क्रिया (07९४४०॥) की ओर स्पष्ट संकेत करता 
है। रामायण में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है-“जैसे शल्यचिकित्सक 

434 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





किसी विशेष अवस्था में (शिशु के अप्राकृतिक अवस्था में आ जाने पर, गर्भ में 
मृत्यु हो जाने पर) गर्भस्थ शिशु को टूक-टूक कर देता है।” “गर्भस्थ जन्तोरिव 
शल्य कृन्तः 
इस उदाहरण से यह ज्ञात होता है कि गर्भ को विशेष अवस्था में आ जाने 
पर उदर पाटन द्वारा ही बाहर निकाला जाता होगा। 
विभिन्‍न आयुर्वेदीय संहिताओं के प्रकरण में भ्रूण का मासानुमासिक विकास 
मास विकास 
. सिर एव पुच्छ स्तर बन जाते हैं। मस्तिष्क और नेत्रों के बुद्‌ बुद्‌ सरलता से पहचाने 
जा सकते हैं। श्रोत-बुदू-बुद्‌ प्रगट हो जाते हैं तथा आकृति पहचान में नहीं आती। 
2. ऊपरी ओष्ठ बन जाते हैं तथा नासा आगे को निकल आती है। 
तालु का अच्छी तरह विकास नहीं होता। वर्त्म विद्यमान रहती है। 

बाह्य जनन अंग बन जाते हैं हस्त एवं पाद की अंगुलियाँ स्पष्ट हो जाती हैं 
(ठ०णाणा) मुकुट परिधि की लम्बाई 30 मि. मी. हो जाती है। 
5. शिर बढ़ता है, ग्रीवा लम्बी हो जाती है और शरीर के अंगों (शाखाओं) का सम्यक 
विकास हो जाता है। नस की उत्पत्ति आंरम्भ हो जाती है और मुकुट परिधि की 
लम्बाई 0 से.मी. हो जाती है। 
4. शरीर पर रोम राजी का प्रादुर्भाव तथा सक्थि सहित समस्त' शरीर की लम्बाई 22 
से.मी. हो जाती है। 
5. भ्रूण में सर्वप्रथम गति दिखाई पड़ती है । सिर पर केशों का उद्गम आरम्भ हो 
जाता है। उल्व (ए&॥ं5 2४७०१५७) एकत्र होना आरम्भ हो जाते हैं। इस प्रकार शरीर 
की लम्बाई 30 से.मी. हो जाती है। 
6. उल्वक पर्याप्त मात्रा में संचित हो. जाते हैं। त्वचा के सूक्ष्म अंकुरों का विकास तथा 
उनके अन्तः स्तर से नस कें प्ररोहों की धारा पृथक्‌ हो जाती है। शरीर की समस्त 
लम्बाई 40 से.मी. एवं भार । किलोग्राम हो जाता है। 
7: कनीतक कंला अवशेष्क, नेत्र के वर्त्म खुले हुए, अण्ड भाग का अवतरण, त्वचा 
लाल एवं झुर्रीदार हो जातीं है। शरीर की समस्त लम्बाई 40 से.मी. एवं भार .5 
किलोग्राम हो जाता है। 

-8. त्वचा पूर्णतया उल्व एवं रोम से आवृत्त होने के पश्चात्‌ उससे अलग होनी आरम्भ 
हो जाती है। भ्रूण का स्वरूप शरीर में एक लोथड़े (0००१) के रूप में प्रकट हो जाता 
है। द 
9. (7०१0 अन्तराधि से लोम॑ अधिकतर विलीन हो जाते हैं तथा नाभि शरीर के 
मध्य स्थित हो जाती है तथा अण्ड कोषों में आ जाते हैं। सम्पूर्ण शरीर की लम्बाई 50 
से.मी. तथा भार 3 से 5.5 58. तक हो जाता है। 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान ” 433 


विभिन्‍न शरीराडूगों की उत्पत्ति की निदर्शक तालिका 


अंगावयव अष्टांग संग्रह 


यकृत, प्लीहा पच्यमानशोणित के 


अच्छू भाग से 

फुफ्फुस रक्त के फेन से 

उण्डुक रक्त के किटूट भाग से 

वृक्क मेदस्‌ एवं रक्त के 
प्रसाद भाग से 

अन्त्र रक्‍त एवं मांस के 
प्रसाद भाग से 

कालेय...._ रक्त एवं अनिल के 
संयोग से 

हृदय श्लेष्म एवं रक्त के 
प्रसाद भाग से 

जिह्‌वा मांस, रक्त एवं कफ 
के प्रसाद भाग से 

वृषण मांस, रक्त कफ एवं 
मेदसू के प्रसाद भाग से 


सुश्रुत संहिता 
शोणित से 


शोणित फेन से 

शोणित किट्ट भाग से 

रक्त एवं मेदस्‌ के 

प्रसाद भाग से 

रक्त एवं श्लेष्म के 

प्रसाद भाग से अन्त्र, गुद एवं वस्ति 
का निर्माण 


शोणित एवं कफ के 
प्रसाद भाग से 

कफ शोणित एवं 

मांस के सार भाग से 
मांस, रक्त, कफ एवं 
मेदस्‌ के प्रसाद भाग से 


वाल्मीकि रामायण में गर्भावक्रान्ति विषयक समस्त सामग्री प्राप्त होती है 
किन्तु गर्भ के मासानुमासिक विकास का विशद्‌ वर्णन इसमें प्राप्त नहीं होता है।' 


मातृज पितृज एवं आत्मज भाव 
चरक संहिता 


मातृज त्वचा, रक्त, मांस, मेदसू, 
नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, 


सुश्रुत संहिता 
रक्त, मांस मेदस, मज्जा,ः 
हृदय, नाभि, यकृत, प्लीहा 


प्लीहा, वृक्क, बस्ति, पुरीषाधान, . अंत्र गुद आदि। 


आमाशय पकक्‍्वाशय उत्तर गुद 


(२०८एणा३) अधर ग़ुद (8॥05), 


ध्षुद्र अन्त्र, स्थूलान्त्र वपा 


तथा वपषा वहन 


पितृज भाव केश, श्मश्रु (दाढ़ी मूंछ) नख, 
रोम, दन्त, अस्थि सिरा, स्नायु, 


धमनी एवं शुक्र 


आत्मज भाव आयु, आतज्ञान, मन, इन्द्रिय 


436 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


 चरक सदृश 


इन्द्रिय, ज्ञान-विज्ञान 


३७७४ ७ हु 
23% ॥2॥६ 8३0 ॥॥७ 2॥8 ((॥8 


है ९॥६ /40] 
है 8४ 8. 2008 (३ ६ 20 
24% 299. ॥28॥ ३० |३॥४ ।थछ2 


क् 
।$ ॥2॥8 | 22५० 
90980 ४॥७ ५॥ ॥80२ 800 (६ ४७ 
8॥8 58-58 ५ ॥६॥४७।७ । है /2॥५ (8 
45 । है ॥॥७ ४ 2४] ७ |४॥ 202 $ 
248 (8 008 ॥६३ ।092 | ॥६॥४ ५ 
#6 (05-6/698 


4की:8७ 3 


$ 0208 (8 ॥28/2७॥8 

$ ॥2॥ (8 (४ ॥००६ ॥३९ 

$ ॥2॥8 ४ 9000९ खरे ॥080 4५.. ३ ॥2॥2 (8 ॥॥७0 

22% #0 22/8 # ॥१९ पु [2 008.... धु०॥१98 [गण 
है हा 

ह 08 ।कई है है ह॥९ (8 २५४ हैक है 8४४ 

#ख्लडे ॥0 ॥५8 298 ३ 208 28 2.0. 2%8 0008 20 

॥88 ॥४ 890 ४9% 

अशि8 ॥2.. ६8 ।08 ७ सि९ 

6 #छ हु आए ४8. 0४ ॥४५ (8 

$ ॥७ $२ 2४ 40॥9% 20% 02% 


69 '89 '99 '१9/ 8-96 


49308॥0 0 38 2७९७ 
“बैक 498॥७७॥७ ९ ॥४8 ६ ॥8%४ ९: ॥॥७॥४४३ ॥9४0॥0 ४७९), 


कजा/8 
१8 ४59 


३७७ ७७ 

48 ॥0७३३ $४ % 
है ३४९ (8 ४०४०४ 
400 ५0 209॥0 
डे सफर 8 


१ 2०७ 

॥88 (७8३ 'ढ 
200 ॥+07॥९ 
8 ओेंड 28 


46-06--56/# 
+0४/४७४४ 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 437 


है ४ ४9७ है ९६8 
४208 ७/8४ [४०४ १००) 


शड ४९ है ॥2॥६ (8 
498 ॥७०६. ४९ ४७७० 5 - 
डै ९॥८ (8 ॥0]५०४ 
है 8३९ 4 (७08): (४ 
2००७ #हे 208 206 ४६. ४ऐ (0 90 (28 
है ७२४९ 


$ 8 ४8६ & ३ ७४७ ... क8॥8 
अह है | 8०0३. (8 200९ ७08... 0008) (७४ ॥५७ ४ ॥0६ 8 


॥2,४ ॥ ॥]४४ ७४ 20 ।९॥४ ॥8% ॥०७॥६ | ड्थुटि 

- १ 8 ॥७ ७४४ 20॥.. 0७8७ ॥॥6 |गण: (४ ॥०॥७ |ैंण३े "८ 
है ३२॥६ 8 2०७ ॥३४२ 

48४ 80 (७ (2७ 3 ॥२॥५ 4908 

मे... ४ ॥00 8॥० है शक बड़. 4 ७४ 208 2४ '9 

।३ ३2॥8 (8-।8% 

॥०8॥६ ४0 ॥४४8 

20६००९।8 $॥॥६ 20४ /श5 १६ 

24% ॥92 (छ ७४४६ ह 86 ५७ फै: )० 2६6 2७ ५ श्र 


अयुणर्बछु १७8 २७४ १७ #हिठि 


४ 


438 / वाल्मीकि रामायण तथ्चा आयुर्वेद 


प्राण, अपान, प्रेरण, धारण, आयु एवं सुख-दुःख/ 
भ्राकृति, स्वर-भेद, सुख-दुःख, 
इच्छा-द्वेष, चेतना-बुद्धि, स्मृति 
अहंकार, प्रयल आदि#४ 
वाल्मीकि रामायण में मातृज पितृज एवं आत्मज भाव का कहीं भी उल्लेख 
दृष्टि-गोचर नहीं होता। 
पंचम परिच्छेद 
वाल्मीकि रामायण में विष-विधान 
आयुर्वेद के प्राचीन आर्ष ग्रन्थ “चरक संहिता” में विष की उत्पत्ति जिस प्रकार 
बतायी गयी है, ठीक उसी प्रकार का वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी उपलब्ध होता 
है। चरक के अनुसार देवों तथा दैत्यों के द्वारा अमृत के लिये समुद्र-मन्थन किये 
जाने के फल-स्वरूप ही विष उत्पन्न हुआ। इसके दर्शन से जगत्‌ को विषाद प्राप्त 
हुआ इसलिये इसे विष की संज्ञा दी गयी थी। 
मुनि वाल्मीकि ने भी विष का अवतरण ठीक इसी प्रकार माना है परन्तु 
उन्होंने ठीक उससे पूर्व सर्प-विष का भी प्रवहण स्वीकार किया है।' 
रामायण में उल्लेख मिलता है--एक हजार वर्ष के मन्थन के बाद रस्सी बने 
हुए सर्प के बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए मंदराचल पर्वत को अपने 
दाँतों से उसने लगे। तदनन्‍्तर हालाहल विष का अवतरण हुआ # अतः उस समय 
वहाँ अग्नि के समान दाहक हालाहल, नामक भयंकर विष ऊपर को उठा। उसने 
देवता, असुर और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत्‌ को दग्ध करना आरम्भ किया। 
देवों तथा भगवान विष्णु की प्रार्थना के फल स्वरूप रुद्र ने इसे अंगीकार किया।* 
ठीक इसी प्रकार का वर्णन चरक संहिता में भी उपलब्ध होता है। यहाँ विष 
का रूप वर्णन भी किया गया है। यद्यपि यह कथा एक रूपक कथा है तथापि यह 
घटना सभी ग्रन्थों में आज समान रूप से प्राप्त होती है। आज हालाहल विष कहीं 
भी उपलब्ध नहीं होता। 
वाल्मीकि रामायण तथा अन्य आयुर्वेदीय ग्रन्थों के अनुसार सर्वप्रथम अगदकर 
शंकर हैं। उन्होंने उस व्यापक 'हालाहल” विष को स्वींकार किया तथा उसके , 
प्रभावों को शामित किया है--इसीलिये तो उन्हें “आदि देव” चिकित्सक के रूप में 
स्वीकार किया गया है। जिनके प्रयत्नों से सम्पूर्ण जगत्‌ को शान्ति मिली। छुक 
अन्य स्थान पर उग्र-विष “काल कूट” का भी नामोल्लेख किया गया है। 
आयुर्वेद में विष दो प्रकार के स्वीकार किये गये हैं- 
. स्थावर विष 
2. जड्मम विष 
दोनों ही प्रकार के विषों का उल्लेख रामायण में प्राप्त होता है। 


* वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 439 


(7) सर्प-विष है 

सर्पों का उल्लेख तो रामायण में पर्याप्त रूप से आया है। सर्पों की प्रत्येक 
अवस्था का वर्णन यहाँ मिलता है। इसमें सविष सर्प, निर्विष सर्प, दो प्रकार के स्पों 
का उल्लेख किया गया है। इसके पश्चात्‌ सविष सर्प के स्वभाव तथा विभिन्‍न 
अवस्थाओं का उल्लेख भी इसमें हुआ है। तीक्ष्ण विष उक्त सर्प या नागिन कंचुकी, 
त्याग की हुई सर्पिणी विषधर सर्प (क्रुद्धावाशी विषानिव) । क्रुद्ध सर्प (सर्पदुष्टामिवागतः) 
महा-विषैला सर्प (सपांनिव महाविषान्‌) तथा बांबी में बैठा हुआ सर्प आदि। <व्यालां 
तीक्ष्ण विषां” अर्थात्‌ तीक्ष्ण विष वाली सर्पिणी। सर्प के पैरों को छूने मात्र से देह का 
क्या हाल हो जाता है, उसका वाल्मीकि ने स्पष्ट संकेत दिया है। घर में रहने वाला 
सर्प बार-बार दुःख देता है, यह वाल्मीकि ने बताया है। अत्यन्त विषैले सर्प को 
नागराज कहकर सम्बोधित किया है। महा विषैली सर्पिणी को “भुजंगी तीक्ष्ण द्रंष्टां 
महा विषान्‌ / कहा है। क्रुद्ध होने पर सर्प बालक को भी डस लेता है, वाल्मीकि ने 
स्पष्ट घोषित किया है। 

सर्प-विष के मारक प्रभाव का उल्लेख करते हुए विभीषण के मुख से रावण को 
मुनि ने यह समझाया है-हे राजन ! सीता नाम धारी विशालकाय महान सर्प को 
किसने आपके गले बाँध दिया है। उसके हृदय के भाग ही शरीर हैं। चिन्ता ही विष 
है, सुंदर मुस्कान की तीखी दाढ़ें हैं और प्रत्येक हाथ की पाँच-पाँच अंगुलियाँ ही उस 
सर्प के पाँच सिर हैं।' परन्तु मुनि का स्पष्ट मत है कि सर्प की दाढ़ों को उखाड़ दिया 
जाये तो विष अपेक्षाकृत कम हो जाता है। इसलिये उन्होंने कहा है क्या तुम विषधर 
सर्प के मुख से दाढ़ें उखाड़ देना चाहते हो? चमकदार आँखों वाला सर्प अधिक विषैला 
होता है। इसके अतिरिक्त सर्प में स्वास्तिक चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते रहे थे, इन स्थूल 
फणों से विष की भयानक आग उगलते हुए बड़े-बड़े सर्प उस पर्वत की शिलाओं को 
अपनी दाढ़ों से डसने लगे # क्रोध से भरे हुए उन विषैले सर्पों को काटने पर वे 
बड़ी-बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जल उठीं, मानों उसमें आग लग उठी हो। उस समय 
उनके सहत्नों टुकड़े हो गये * इस पर्वत पर जो बहुत सी औषधियाँ उगी थीं, वे विष 
को नष्ट करने वाली होने पर भी उन नागों के विष को शांत न कर सकीं।? 

उपरोक्त उदाहरण से यह. स्पष्ट है कि विष की ताकत से अधिक ताकत वाली 
विष शामक औषधि उस विष की चिकित्सा में काम में ली जानी चाहिये। जब तक 
ऐसा नहीं होगा तब तक विष शामित नहीं हो सकेगा तथा यह भी स्पंष्ट होता है कि 
मस्तक पर स्वास्तिक चिन्ह वाले. सर्प अधिक विष वाले होते हैं। 

उपरोक्त प्रकार के विष का रामायण में विशद्‌ वर्णन किया गया है। 
(॥) कनन्‍्द विष 

कन्द विष का रामायण में स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है तथापि रामायण में 
मुनि ने विष-विधान का पर्याप्त परिचय प्रस्तुत किया है। 


440 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


(॥7) कृत्रिम विष 

आयुर्वेद में वर्णित स्थावर तथा जंगम-दोनों ही प्रकार के विषों का रामायण में 
उल्लेख प्राप्त होता है। 

कोप-भवन में पड़ी कैकेई महाराजा दशरथ को यह कहकर भयभीत करना 
चाहती हैं कि मैं बहुत-सा विष पीकर निश्चय ही मर जाऊँगी।* इधर दशरथ भी 
अधिक त्रस्त होकर क्रोध के आवेश में यह कह बैठते हैं कि तू कोई तीक्ष्ण विष खाकर 
प्राण दे दे यदि तुझे राम का राज-तिलक अच्छा नहीं लगता हो तो और यदि तू नहीं 
मरेगी तो मैं “विषं पास्या मिचालोषय” विष घोल कर पी लूँगा। इन विषों की शक्ति 
के अनुसार वर्गीकरण भी रामायण में किया गया है जैस-साधारण विष, तीक्ष्ण विष, 
उच्च कोटि का विष, मारक विष आदि। 

विष के मारक प्रभावों का उल्लेख करते हुए रामायण में कई प्रसंग जैसे--'सम्मोहादिह 
कालेन यथा स्याद्‌ भक्षितम्‌ विषम्‌” अज्ञान वश यदि बालक विष खाले तो उसे वह 
विष मार डालता है। केवल बालक ही क्‍यों यदि बड़ा व्यक्ति भी अनजाने में विष 
मिश्रित भोजन खा ले तो वह उसे मार डालता है।" 

एक स्थान पर “अमृत विष सम्पृक्त” कहकर अमृत तथा विष के सम्मिश्रण 
की ओर इशारा किया है। विष के उग्र प्रभाव का परिचय देते हुए महर्षि ने कहा 
है कि अत्यन्त उग्र विष मिश्रित अन्न को खाकर कोई भी उसे बल-पूर्वक नहीं 
पचा सकता।! 

इस प्रकार विष भक्षण के विविध प्रकारों का भी यहाँ उल्लेख मिलता है-विष. 
खाना,” खाद्य में विष मिलाकर खाना,” पेय में विष मिलाकर पीना? 

विष का प्रभाव मानव देह में कहाँ-कहाँ होता है तथा किस प्रकार होता है 
अति संक्षेप में रामायण में बताया गया है- 

“उदरस्थ विष की भाँति सारे अंगों को दग्ध करता है” विष उदर में जाकर 
सभी अंगों-प्रत्यंगों को दग्ध करता है।” प्राचीन काल में युद्ध की परिपाटी आज 
की परिपाटी से भिन्‍न नहीं थी। उस समय भी यह भय रहता था कि कहीं शत्रु 
रास्ते में खाद्यों, फल, पेयों तथा जलाशयों आदि को दूषित नहीं कर डाले। 
इसीलिये कहा है- 

“सम्भव है दुरात्मा राक्षस रास्ते में फल-मूल और जल को विष आदि द्वारा 
दूषित करें॥* 

उपरोक्त जंगम विषों का प्रयोग जहाँ एक ओर खाद्य दूषित करण में आता 
है वहाँ दूसरी ओर इनको द्रवों द्वारा शस्त्रों को दूषित करने के लिये भी होता था। 
बाणों को विषों में बुझाकर प्रयोग में लिया जाता था “विषेण शस्त्रेण शिनेन 
वराषि! | अर्थात्‌ विषशस्त्र से प्राण त्याग दें। इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर 


हथिनी को वश में करने के लिये विष में 522] बाणों का प्रयोग करने का... 
वाल्मीकि रामायण में रोग एंवं उनको निदान / 44] 


उल्लेख भी है-'सा विद्धवा बहुमिवश्चे दिग्धोदि विगजांगना।' 

इन सभी अस्त्रों को विषैला बनाने के लिये केवल स्थावर विषों का प्रयोग 
किया जाता रहा था। ऐसी बात नहीं थी कि इस कार्य के लिये जंगम विषों का 
भी प्रयोग होता रहता था। जैसे सर्प-विष में वाणों को बुझाना, नाग-पाश या 
नाग-सिद्ध करना आदि। 
चिकित्सा (उपचार) ५ 

उपरोक्त सभी प्रकार के विष की चिकित्सा के लिये एक विशेष चिकित्सक 
का उल्लेख रामायण में किया गया है और वे गरुड़ हैं। गरुड़ “विष-चिकित्सा” और 
विशेष रूप से 'सर्प-विष की चिकित्सा” में अद्वितीय थे उनका वेग पवन के समान 
है। एक बार उन्होंने देव चिकित्सक इन्द्र के यहाँ से अमृत को भी चुरा लिया था, 
संभव है उन्होंने यह अपनी चिकित्सीय सौष्ठव के पक्ष की वृद्धि के लिये ही किया 
हो। (गुरुत्मानं ममृतं यथा) 

रामायण में सर्प-विष पर गरुड़ का प्रभाव बार-बार दर्शित किया गया है। 
सर्पों पर अधिकार दो प्रकार से किया जा सकता है- 

]. मंत्रों द्वारा 

2. औषधियों द्वारा। “मंत्रीषधि बलैः व्याधि! 

मानों कोई सर्पिणी मंत्र या औषधि या दोनों के बल से गिरायी गयी हो। श्री 
राम को विषैले वाण स्पर्श करते ही निर्विष हो जाते थे, ठीक उसी प्रकार जैसे सर्प 
गरुड़ को देखकर हो जाया करते थे। फिर भी रामायण में कुछ ऐसे प्रसंग आये 
हैं जिनमें गरुड़ की “विष नाशक चिकित्सा” के चमत्कार दिखाये गये। श्री राम 
तथा लक्ष्मण युद्ध में मेघनाद द्वारा नाग-पाश में बाँध दिये गये। इस पाश में 
कसकर बँध जाने के कारण दोनों ही वीर भाई मूर्च्छित हो गये हैं। उन्हें मूच्छित 
देखकर सभी वानर सेना व्याकुल हो उठी और हार के चिन्ह दृष्टिगत होने लगे। 
शत्रुओं ने समझ लिया कि राम लक्ष्मण मर चुके इसलिये दूसरी तरफ हर्षनाद होने 
लगा, तदन्तर यह सुनकर दो ही घड़ी में विष चिकित्सक महाबलि विनतानन्दन 
गरुड़ वहाँ आ उपस्थित हुए।” 

उन्हें आया देखकर जिन महाबली नागों ने वाण के रूप में आकर उन दोनों 
वीर राजकुमारों को बाँध रखा था, वहाँ से भाग गये, और वे दोनों ही भाई पाश 
मुक्त हो गये ॥४ 

तदनन्तर गरुड़ ने इन दोनों ही भाइयों को अपने हाथों से स्पर्श किया और 
उनके चन्द्रमा के समान कान्तिमान मुखों को पोंछा।* 

महान चिकित्सक गरुड़ द्वारा स्पर्श होते ही श्री राम तथा लक्ष्मण के घाव भर 
गये और उनके शरीर तत्काल ही सुंदर कान्तियुक्त हो गये /" उनमें तेज, बल, 
उत्साह, वीर्य, ओज, दृष्टि, शक्ति, बुद्धि और स्मरण शक्ति आदि महान गुण पहले 

442 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 





से भी दुगने हो गये ।” 

इस प्रकार की चमत्कार पूर्ण चिकित्सा से स्वस्थ हुए श्री राम ने अपने चिकित्सक 
को प्रसन्‍न करने के लिये उद्‌गार प्रकट किये-श्री राम गरुड़ से कहते हैं- 

“इन्द्रजीत के कारण हम लोगों पर जो महान संकट आ पड़ा था, उसे हम 
आपकी कृपा से लाँघ गये। आप विशिष्ट उपाय के ज्ञाता हैं अतः हम दोनों को 
शीघ्र ही पूर्ववत्‌ बल से सम्पन्न कर दिया। आपको देखकर मेरा मन अत्यधिक 
प्रसन्‍न हुआ जैसा कि अपने पिता तथा पितामह को देखकर हुआ करता है।”” 

यह देखकर गरुड़ .बहुत प्रसन्‍न हुए और विश्लेषण करते हुए बोले, “मैं 
विष-चिकित्सक गरुड़ हूँ ।” आपके इस प्रकार नाग-पाश द्वारा मूरच्छित हो जाने के 
समाचार को सुनकर बड़ी तेजी के साथ मैं यहाँ आया। श्री राम इन्द्रजीत द्वारा 
माया के बल से नाग रूपी वाणों का बन्धन तैयार किया गया था। यह कद्ू जाति 
के नाग थे इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं। यह नाग बड़े भयंकर विष वाले होते हैं। 
यह राक्षसी माया के कारण आपके शरीर में लिपट गये थे।# 

धर्म के ज्ञाता सत्य पराक्रमी श्री राम ! समराड्गण में शत्रुओं का संहार करने 
वाले अपने भाई लक्ष्मण के साथ आप बड़े सौभाग्यशाली हैं। जो अनायास ही इस 
नाग-पाश से मुक्त हो गये।“ 

मैं देवताओं के मुख से आप लोगों के नाग-पाश में बंधने का समाचार सुनकर 
बड़ी उतावली के साथ यहाँ आया हूँ। हम दोनों में जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो 
मित्र धर्म का पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ।” “आकर मैंने इस 
महाभयंकर वाण बन्धन से आप दोनों को छुड़ा दिया। अब आपको सदा ही 
सावधान रहना चाहिये ॥”* 

ऐसी बातें कहकर गरुड़ श्री राम लक्ष्मण को “निरुज” देखकर वहाँ से चले 
गये। 

“चरक” तथा "सुश्रुत” ने सर्पों की प्रधानतः दर्वीकर (फणियर), मण्डली 
(090०७) तथा राजिमान्‌ (६7०0) इन तीनों जातियों का उल्लेख किया है। 

इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 'विष 
चिकित्सा” एवं 'अंगद कर' का विशद्‌ वर्णन किया गया है। 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में वर्णित विविध रोगों तथा शारीरिक रोग, 
मानसिक रोग, आगन्तुक रोग, स्त्री रोग एवं गर्भावक्रान्ति, एवं विष-विधान का 
संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करने का सूक्ष्म प्रयास किया गया है। 
संदर्भ 

प्रथम परिच्छेद 

3. च. सू. 30/26 
2 सु, सू, /7 
3. आ. सं. सू. /0 
4. आ. ह. सू, /5 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 443 


5. 
6. 


क 
8. 
9. 
40. 
वा 
2. 


सु. सू. ॥/] > 
काय-चिकित्सेति कायस्यान्तग्नेश्चिकित्सा (गंगाधर)। कायस्यान्तरग्नेश्चिकित्सा (चक्रपाणि)। 
शिवदास सेन ने 'काय” पद का अर्थ जठराग्नि किया है। है 
सु. सू. 3507 
सु. सू. 30/40 
सु. सू., 30/40 
. सु. सू. 30/40 
- च. चि. 9 
. च. नि. /22 


3. च. नि. /23 


44. 


+ च. नि. /24 


75. च. नि. /25 


6. 


. च. नि. /26 


7. च. नि. /27 


8. 
9. 


.. च. नि. /28 
.. च. नि. /29 


20. च. नि. /30 


श्र 


22. 


23. 


24. 


25. 


26. 


श्य 
28. 
29. 


30. 
444 / 


कामजे चित्त-विश्रृशस्तन्द्राउउलस्यमरोचकः। 

हृदये वेदना चास्य गात्रज्च परिशुष्यति ।। सु. उ. 39/78 
कामाद्‌ श्रमोषरतिददाहोह्ीनिधी वृत्तिक्षय:। 

ध्याननिः श्वासबहुलं लि ज्वरे स्मृतमू।। 
मन्मथायाससम्भूतो वसन्तगुण वर्धितः।। वा. रा. कि. /32 
अयं मां धक्ष्यति क्षिप्रं शोकाग्निर्नचिरादिव। वा. रा. कि. /33 
अपश्यतस्तां वनितां पश्यतो रुचिरान्‌ द्रमान ।। कि. /33) 
मयायमात्म प्रभवो भूयस्त्वमुपयास्यति। कि. /33.5 (34) 
भयात्‌ प्रलापः शोकाच्च भवेत्‌ कोपाच्च वेपथुः। 
अभिचाराभिशापाभ्यां मोहस्तृष्णा च जायते।। 
भूताभिषज्ञादुद्देहहास्य कम्पन रोदनमू ।। सु. उ. 39/79) 
तत्राभिचारिकै्मन्त्रैहयमानस्य तप्यते। 

पूर्व चैतस्ततो देहस्ततो विस्फोट तृड्भ्रमैः ।। 
सदाहमूर्छैंग्रस्तस्य प्रत्यहं वर्धते ज्वरः।। 

यु. 40/27 

यु. वा. 

अयो. 58/3, 4 

वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपमू। 

विनिःश्वसन्त ध्यायंतमस्वस्थमिव कुज्जरम्‌।। 3।॥ 

राजा तु रजसा सूत॑ ध्वास्ताइगसमुपस्थितमू। , 

अश्रुपूर्ण मुखं दीनमुवाच परमार्तवत्‌। 4। 

.. भूत-विद्या समुदृदिष्टैर्बन्धावेशन पूजनैः। 

वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


3]. 
32. 


33. 


35. 
36. 
57: 
38. 


39. 


7] 


42. 


43. 


45. 


47. 


48. 


जयेत्‌ भूताभिषड्गोत्थं, विज्ञानायैश्व मानसमू।। सु. उ. 39/265 

“देहेन्द्रियमनसन्तापी सर्वरोगाग्रजों बली /! च. चि. अ./3 
द्विविधो विधि-भेदेन ज्वरः शारीर मानस। च. चि. अ./3 
शारीरो जायते पूर्वे देहे, मनसि मानसः। 
वैचित्यमरतिग्लानिमनस्ताप लक्षणम्‌।। 
इन्द्रियाणां च वैकृत्यं 'ज्ञेयं संताप लक्षणम्‌।। च. चि. अ./3 
“काम शोक-भय क्रौधेरभिषक्तस्य यो ज्वरः। 
सो अभिषड्ज ज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषड्ञज:॥7 च. थि. अ./3 
।. कामशोक भयाद्वायुः क्रोधातिपत्तं त्रयो मलाः। 
भूताभिषज्ञत्कुप्यन्ति भूत सामान्य लक्षणा:।। च. चि. अ./3 
“कामादू भ्रमोरुचिर्दाहो हीनिद्राधीधृतिक्षय: ॥ 
यु. 0/27। वाल्मीकि रामायण 
यु. 7/ । वाल्मीकि रामायण 
तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वहिर्महात्मनः। 
जीर्णात्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितमू।। अ. 5/40 
त॑. तु दुन्दुभिमुद्यम्य धरण्यामभ्यपातयत्‌। 
युद्धे प्राण-हरे तस्मिन्निष्पिष्टों दुन्दुभिस्तदा ।। कि. /45 
स्रोतोभ्यो बहुरक्तं तु तस्य सुस्नाव पात्यत:। 
पपात च महाबाहुः क्षितौ पजञ्चत्वमागतः।। कि. /46 
. तस्य नैवास्थि न शिरो न मांस ददूशे तदा।। उ. 27/50 
गदया भस्मतां नितं निहतस्य रणाजिरे। उ. 27/5 
ततो गिरौ पपातेष इन्द्र वज़ाभि ताडितः। 
पतमानस्य चैतस्य वामा हनुरभज्यत।। उ. 35/47 
स भग्नबाहूरुकटीपयोधरः 
क्षरत्रसृड्गनिर्मथितास्थि लोचनः। 
सम्भिन्नसंधिः प्रविकीर्णबन्धनो 
हतः क्षितौ वायु सुतेन राक्षस:।। सु. 47/36 
सतैः प्रहरणैघोरिभि्नगात्रो न विव्यथे ।। अ. 25/5 
रामः प्रदीष्तर्बहुर्भिवजैरिव महाचलः।। 25/4 
. स विद्धः क्षतजादिग्धः सर्वगात्रेषु राघवः।॥ 25/4 
तेषां बाणैर्महाबाहुः शस्त्राण्यावार्य वीर्यवान्‌। 
जहार समरे प्राणांश्चिच्छेद च शिरोधरानू।। अ. 25/28 
. ते छिन्‍न शिरसः पेतुश्छिन्नचर्मशरासनाः। 
सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा।। अ. 25/29 
निहिताः पतिताः क्षीणाश्छिन्ना भिन्ना विदारिताः। 
तत्र-तत्र सम दृश्यन्ते राक्षसास्ते सहस्नशः।। अ. 25/42, 43 
तस्याभिपतमानस्य दूषणस्य च राघवः। 
द्वाभ्यां शराभ्यां विच्छेद सहस्ता भरणौ भुजी।। अ. 26/3 
 अ. 26/20-श 

वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 445 


50. 


5. 


82: 


53. 
54. 


57. 
58. 
59. 
60. 


6 
62. 


7. 


72. 


शक 


74. 


75. 


रथस्ययुगमेकेन चतुर्भिः शबलान्‌ हयानू। 

पष्ठेन च शिरः संख्ये विच्छेद खरसारथेः॥। अ. 28/29 

तत्व॑ ब्रूहि मनोडनाज्लि केन त्वं च विरूपिता। 

इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोध-मूच्छित ।। अ. 34/4 

शरीर मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः।। अ. 44/5 

मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभः। अ. 44/6 

अ. 25/42 

अ. 26/3, सुं 32/8, 62/27, यु. 2/7, 30/9, 45/8, 67/8, 
उ. 5/35, 69/] 


+ यु. 9/9 
. त्वज्मांससिरास्नारत्रस्थिसन्धि कोष्ठमर्माणीत्यष्टौव्रण वस्तूनि। 


अत्र सर्वव्रण सन्निवेशः । सु. सं. (पू.) 22/3 

सु. सं. पू. 22/5 

सु. सं. पू. 22/6 

सु. सं. पू. 22/7 षटत्वमू- वातपित्तकफरक्तसन्न्पातागन्तुमेदतः। 
सु. सं. (पू.) 22/8 


- सु. सं. (पू.)) 22/9 
'. सु. सं. (पू.) 22/9 
68. 
(सु. सं. (पू.) 22/9) 
65. 
66. 
क्य. 
68. 
69. 
70. 


(सु. सं. (पू) 22/9) 


सु. सं. (पू.) 22/9 

सु. सं. (पू.) 22/0, ॥] 

सु. सं. (पू.) 22/2 

सु. सं. (पू.) 22/3 

सु. सं. (पू.)) 22/4 

दुःखे मे दुःखम करो व्रेणे क्षारमिवाददा:। 

राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम्‌ ।। अयो. 78/3 

तवापमान प्रभवः क्रोधोज्यमतुलो मम। 

न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ-इवोल्बणमू ।। अर. 22/2 

स तु वृक्षेण निर्मगन: सालताइनविहलः। 

गुरुभारभराक्रान्ता नौः ससार्थेव सागरे।। कि. 6/24 

भगवन्‌ व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रियः। 

परिश्रान्तो न शक्नोमि वचन परिभाषितुमू।। कि. 6/2 

स तस्य गन्धमाप्राय विशल्यः समपद्येत। 

तदा निर्वेदनश्वैव संरुत्रण एव च।। यु. 9/25 

"ब्रण'-सु. 8/24, 46/36, यु. 22/38, 54/32, 74/73, 88/55, 20/9, 4/27, 

उ. 75, 28/26 

'घायल'- यु. 24/38, 44/3, 49/4, 52/7, 59/0, 69/9, 94, 76/56, 
90/26, 


446 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


97/7, 96/24, 00/, उ. 5/28, 35, 9/22, 28/26, 29/34, 35/48 
घाव भरना- यु. 04/45 
76. सु. स. (उ.) 56/2-4 
77. अहं वां कामये सर्वाभार्या मम भविष्यथ। 
मानुषस्त्यज्यतांभावो दीर्घमायुरवाप्स्थध ।। 
चलं हि यौवन नित्य॑ मानुषेषु विशेषतः। 
अश्रय यौवन प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ ।। बा. 32/6, 7 
78. अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम्‌। प्रभावाज्ञश्चते सर्वा किमर्थमवमन्यसे कुशनाभसुता 
देवा समर्स्थास्त्वां सुरोत्तम। स्थानाच्चावयितु देवं रक्षामस्तु तपोवयम्‌ माभूत सकालो दुर्मेधः पितरं 
सत्यवादिनं। अवमन्य स्वधर्मेण स्वंयवरमुपास्यहे पिताहिप्रभुरस्माक देवतं परम्‌ू च सः। यस्य नो 
दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति। बा. 32/9 से 22 तक 
79. तासां तु वचन श्रुत्वा हरि: परमकोपनः। 
प्रविष्य सर्वगात्राणि बभज्ज भगवान प्रभु:।। 
अरलिमात्राकृतयो भिन्‍न गात्रा भयार्दिता:। 
ताः कन्या वायुना भग्ना विविशु स्वपितु: गृहम्‌। 
प्रविष्य च सुसभ्रान्ता-सलज्जाः साउश्नुलोचना:।। 
सचता दयिता दीनाः कन्या: परम शोभिना:। 
दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्ता इदमउचदश्रवीत्‌।। 
किमिदं कथ्यते पुत्र॒यः को धर्ममवमन्यते। 
कुब्जाः केन कृता: स्वश्विष्टन्त्यो नाभिषभाषथ ।। 
एवं राजा विनिश्वस्य समाधिं संदघेततः। बा. 32/23-26 
80. तस्य तदवचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य घीमतः। 
शिरोभिश्चारणौ स्पष्ट्वा कन्‍्याशतमभाषत।। 
वायु सर्वात्मको राजनू प्रधर्षयितुमिच्छति। 
अशुभ मार्गमास्थाय न धर्म प्रत्यवेक्षते ।। 
पितृमत्यः सम भद्रं ते स्वच्छन्देन वयं स्थिताः। 
तेन पापानुबन्धेन वचन नः प्रतीच्छता। 
पितर॑ नो वृणीश्व त्वं यदि नो दास्यते तव। 
एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः सम वायुनानिहता भूशम्‌।। बा. 33/-4 
8]. तासां तु वचन श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः। 
प्रत्युवाच महातेजाः कन्या शतमनुत्तमम्‌।। 
क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्य॑ कर्त्तव्यं सुमहत्‌ कृतम्‌। 
ऐकमत्यमुपागम्य कुल॑ चावेक्षितं मम।। 
अलकारोहि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्यवा। 
दुष्करं तद्धिं वैक्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः।। 
यादृशी वः क्षमा पुण्यः सर्वासाम विशेषतः। 
क्षमादानं क्षमासत्य॑ं क्षमा यज्ञश्च पुत्रिका:। 
क्षमयशः क्षमा धर्म: क्षमयाधिष्ठितं जगत्‌।। बा. 33/5-8) 
४2. तमाहूय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिम्‌। हु 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 447 


83. 


85. 


87. 


.. अरण्य 69/30 


89. 


90. 


9. 


हम 


93. 


94. 


95. 


9. 


था. 
98. 


99. 


ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना।। बा. 33/2॥ 

स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः। 

युक्ताः परमया लक्ष्यया बभी कन्याशतं तदा।। बा. 33/23 

ऊचुः प्राउ्जलयो देवा महोदरनिभोदराः। 

त्वया तु भगवनू सृष्टाः प्रजानाथ चतुर्विधाः।। 
त्वयादत्तोड्यमस्माकमायुपः पवनः पतिः। 

सोझ्स्मान्‌ प्राणेश्वरो भूत्वा कस्मादेषोद्य सतम।। उ. 35/54, 55 


.. अशरीरः शरीरेषु, वायुश्चरति पालयनू। 


शरीर हि बिना वायुं समतां याति दारुभिः॥॥ 

वायुः प्राणः सुखं वायुर्वायु: सर्वामिदं जगतू। 

वायुना सम्परित्यक्तं न सुखं विन्दते जगत ।। 

अद्यैव च परित्यक्तः वायुना जगदायुषा। 

अद्यैव ते निरुच्छवासाः काष्ठकुड्डयोपमा स्थिता:।॥॥ उ. 35/60, 6, 62 
तच्चार्वचिंत पदूमाक्षं सुगन्धि शुभमव्रणम्‌। 

अपकश्यतो मुखं तस्याः सीदतीव मर्तिमम ।। कि. /09 

तदुन्नसं पाण्डुरदल्तमव्रणं शुचिस्मितं पदूम पलाश लोचनमू। 

द्रक्ष्ये तदार्यावदनं कदान्वहं प्रसन्‍नताराधिपतुल्य वर्चसम्‌॥। सु. 3/68 
अयो. 09/श 


युद्ध १०२० 
जीभ- सु. /8, 56/47, 58/7 जबड़ा- यु. 8/श दाँत- अयो. 97/75, अर. 32/8, 
46/, सुं. 5/8, 3/68, 6/24, यु. 4/50, 44/08, 52/, 58/6, 70/65, 

उ. 35/37, 56/29, 69/2, दाढ़-सु. 49/5, यु. 2/37 

इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्या: क्रद्धों रामस्य पश्यतः। 

उद्धृत्य खड़॑विच्छेद कर्ण नासे महाबलः॥। अ. 8/श 

बलादू व्यापादयां चक्रे ननर्द च महास्वनमू। 

श्रोत्राभ्यामथ रक्त तु तस्य सुस्नाव पात्यतः।। कि. [/4ढ] 

आस्थैश्च नेत्रैः श्रवणैः पपात रुधिरं वहु। 

विघूर्णमानो निश्वेष्टो रथोपस्थ उपाविशत।। यु. 59/6 

हलादयत सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि च। 

श्रोत्राश्रय सुखं गेयं तद्‌ बभौ जनसंसदि।। बा. 4/34 

कर्ण- यु. 44/0 कर्णमूल यु. 98/7, शंखदेश यु. 97/श, प््कफ॒णथ् रव्हांथा, श्रोत्र-यु. 
6/5, श्रवण-यु. 49/6 कर्ण अबो. 45/5, 49/4, 8/48 

यदा स्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफ पूर्वकः। 

विष्वक्‌ ब्रजति संरुद्धस्तदा श्वासान्‌ करोति सः॥॥ च. थि. 7/45 

च. चि. 7/62 

शल्य सम्पीडितमू शस्तं निःश्वसन्तं तु लक्ष्मणमू। 

रामस्तु दुःखसंतप्तं तं तु निःश्वास पीडितम्‌।। यु. 9,/॥7 

पितरं चानु शोचामि मातरं च यशस्विनीमू। 


448 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अपि नान्धौ भवेतां नौ रुदन्तौ तावभीक्ष्णशः।। अयो. 46/6 
00.तत्राहं दुर्बलावन्धौ वृद्धावपरिणायकौ। 
अपश्यं तस्य पितरौ लूनपक्षाविव द्विजी।। अयो. 64/4 
0।.इमामन्धांच वृद्धां च मातरं ते तपस्विनीमू। 
कथ॑ पुत्र भरिष्यामि कृपणां पुत्रगर्धिनीमू। अयो. 64/35 
02.स बद्धवा भुकुटिं वकत्रे क्रोधस्य वशमागतः। 
अमर्षात्‌ परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाव्रवीत्‌।। यु. 34/2 
03.एतच्छुत्वा तु कौसल्या चिरकालाभिकाड्क्षितम्‌। 
हर्षवाष्पाकुलं वाक्यमिदं राममभाषत।। अयो. 4/38 
04.सभग्नबाहूरुकटीपयोधरः क्षरनन्‍नसूड्निर्मथितास्थि लोचनः। 
सम्भिन्‍्नसंधिः प्रविकीर्णबन्धनो हतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः।। सु. 47/36 
05.मोघमस्त्रं न शक्यं तु कर्तुमित्येव राघव ।। 
भवांस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति सम स दक्षिणम्‌। सु. 67/6 
06.प्राप्तचरित्र संदेहा मम प्रतिमुखेस्थिता। 
दीपोनेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि में दृढ़ा।। यु. 5/7 
0.. देव्यादिव्य-प्रभावेण दग्धं सब्यं ममेक्षणम्‌। 
रेणुध्वस्तामिव ज्योतिः पिड्ललत्व मुपागतम्‌।। उ. 3/24 
08 देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सब्यं तवेक्षणम।। 
पैड्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात्‌ ।॥ उ. 3/30 
एकाक्षपिडूगलीव्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम्‌। 
09. उपरुध्यन्ति मे प्रणा दृष्टिर्भमति राघव। 
पश्यामि वृक्षान्‌ सौवर्णानुशीर कृत मूर्धजानू।॥ अ. 68/ 
0. इलत्युकत्वा च दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे। 
निद्धयापहता देवी पादौ कत्वायाशीर्षत:।। बा. 46/6 
77. स प्रविष्टो मधुवनं ददर्श हरियूथपान्‌। 
विमदानुद्धतान्‌ सर्वान्‌ मेहमानान्‌ मधूदकम्‌।। सुं. 64/4 
2. कार्श्य दौर्बल्यं वैवर्ण्यमइमर्दोउ्रुचि््रम: । 
क्षुद्वेगनिग्रहातत्रस्निग्धोष्णंलघु भोजनमू।। च. सं. सू, 7/8 
3. ये च मद्विषयस्था वै मानवाः क्षुधयार्दिताः। 
त्वयि भुक्ते सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवाः॥। उ. 8/29 
4. कण्ठास्याशोषो वाधिर्यश्रमः श्वासोहदिव्यथा । 
पिपासानिग्रहातत्र शीत तर्पणमिष्यते।। च. स. सू. 7/9 
75. तौ नून॑ दुर्बलावन्धौ मत्रतीक्षी पिपासिती ।। अयो. 63/40 
चिरमाशां कूतां कष्टां तृष्णां संधारयिष्यत:। अयो. 63/4ा 
6. विनामाक्षेपसड्लोच: सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम्‌ | 
जृम्भायानिग्रहतत्रसर्व वातघ्न मौषधम्‌ ।। च. स. सू, 7८7 
77. यस्तु कर्णो विवृणुते जृम्भते च पुनः पुनः। 
न तु संविजते मृत्योर्न च सेनां प्रधावति।। यु. 26/38 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 449 


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2. 
43. 


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कक 


6. 
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द्वितीय परिच्छेद 
यदा तु रक्त वाहीनि रंस संज्ञावहानि च। 
पृथक्‌ पृथक्‌ समस्ता वा स्रोतांसि कुपिताः मलाः। 
मलिनाहार शीलस्य रजोमोहावृतात्मन:। 
प्रतिहव्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा। 
मद मूर्च्छाय सन्यासस्तेषां विद्याद्चिचक्षण:। 
यथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिड्गोपशान्तिषु ।। च. सू. 24/28, 24, 25 
स॒ तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्र वचः शुभम्‌।। 
शोकेन महताविष्टश्च चाल च मुमोह च। बा. 9/20 
तच्छृत्वा राजाशादूलो विश्वामित्रस्य भाषितम्‌। 
मुहूर्तमिव निः संज्ञ: संज्ञावानिदम ब्रवीत्‌।। बा. 20/ 
सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोध मूच्छिता। हि 
देशमुत्सादयत्येन मगस्त्याचरितं शुभम्‌।। बा. 25/4 
विचेतनं विधूर्णन्तं शीतेषु बलपीड़ितम्‌। 
निरस्त॑ दृश्य मारीच॑ रामो लक्ष्मणमब्रवीत्‌।। बा. 30/9 
भगीरथोंऊषि राजर्षिगड्गामादाय यलतः।। 
पितामहान्‌ भस्मकृतानपश्यद्‌ गतचेतनः ।। बा. 48/40 
च. नि. 7/2 
नैवदेवाः न गन्धर्वाः न पिशाचाः न राक्षसाः। 
न चान्ये स्वयमुत्क्लिष्टमुपक्लिश्यन्ति मानवम्‌।। 
ये त्वेनमनुवर्तन्ते क्लिश्यमान॑ स्वकर्मणा। 
न स तद्वेतुकः क्लेशो न हयस्ति कृतकृत्यया।। च. नि. 7/22, 23 
चरक निदान 7/6 


.. च. नि. 7/8 
44. 


नदन्ति काम॑ शकुना मुदिताः सड्घशः कलमू। 

आहवयन्तः इवान्योन्यम्‌ कामोन्मादकरा मम्‌।। कि. /46 
वैदेही निपपातह (उ. 48/)। सामुहूर्तमिवा संज्ञा (उ, 48/9) 
उन्मतेव प्रमत्तेव भ्रान्तचित्तेव शोचती। हे 

उपावृत्ता किशोरीव विचेष्टन्ती महीतले।। सु. 26/2 

कि नु मेष्यं दिवास्वप्नश्चितमोहोषपि वा मम। 

अनुभूतोपसर्गों वा मनसो वाप्युपद्रव:।। अयो. 2/2 
मत्तोज्यमिति यामंस्था यद्यं भीतोषसि संयुगे। 

मदोज्यं सम्प्रहारेउस्मिनू वीरपानं समर्थ्यताम्‌।। कि. /38 
शोणित गंधोन्मत्तो----(युद्ध काण्ड) 

अर. 23/7 


तृतीय परिच्छेद 


मुख की कान्ति फीकी होना- अयो. 8/0 अ. 20/24, कि. 52/0, 59/27, 65/5 
यु. 2/7, 30/3, 48/3, 50/34, 25/44, 27/50 उ. 4/30, 6/8। 


450 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


क््ज कफ फ़डी ९० ७ 


0. 


४५ 


मुख-कि. 3/30, सु. 8/7, 9/37, 58/24, 57, 62/27, 64/30, 43, यु. 8/9, उ. 
44/2, 46/ मुख सूखना- कि. 7/54 

शल्यसम्पीडितम्‌ शस्तं निःश्वसन्तं तु लक्ष्मणम्‌। 

रामस्तु दुःख सन्तप्तं त॑ तु निःश्वासपीडितम्‌।। यु. 9/ 

ततः कालायसं शूल॑ कण्टकैर्वहुभिश्चितम्‌। 

प्रगृहयाभ्यहनद्‌ देवं स्तनयोरन्तरे दृढ़मू ।॥ उ. 8/5 

हत वीरौधवप्रां तु भग्नायुधमहाद्वमाम्‌। 

शोणितोघमहातोयां यम सागर गामिनीम्‌।। यु. 58/29 
यकृतप्लीहमहापड्कां विनिकीर्णन्त्रशैवलाम्‌। 

भिन्‍न काय शिरोमीनामझूक्येव शादललाम्‌।। यु. 58/30 
गृध्नहंसवराकीर्णां कड्कसारसे सेविताम्‌। 

मेदः फेन समाकीर्णामार्तस्तनितनिः स्वनाम्‌॥। यु. 58/3 

तां का पुरुष दुस्‍्तारां युद्ध भूमिमयीं नदीम्‌। 

नदीमिव घनापाये हंस सारस सेविताम्‌।॥। यु. 58/32 

राक्षसाः कपिमुख्यास्ते तेरुस्तां दुस्तरांनदीमू। 

यथा पदूमरजोध्वस्तां नलिनीं गजयूथपा:॥। यु. 58/33 

संभग्न घाहू सकटी पयोधरः क्षरन्‍्न सूचनिर्मथितास्थि लोचनः। 
सम्भिन्‍न सन्धिः प्रविकीर्ण बन्धनो हतः क्षतो वायु पुत्रेण राक्षस:।। 
नष्टाचितो यथोन्‍्मत्तो, विपरीतो भयातुरः। 

हत तेजो, यथा सर्पो, वभूव जगती पते।। 

स भूमिपालो विलपननाथवत्‌, स्त्रिया गृहीतो हृदयेछतिमात्रया। 
पपात देव्याश्चरणौ प्रसारिता वुभावसम्प्राप्य यथाउच्तुरस्तथा ।। अयो. 2/2 


चतुर्थ परिच्छेद 


. तस्मिननागच्छति लोकनाथे, गर्भस्थ जन्तोरिव शल्यकृन्तः]॥ 


नून॑ ममाझान्यचिरादनार्य:, शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्र:।। सु. 28/6 


. बा. 37/26 
- यु. 28/6 


उ. 77/34 


. बा. 38/7 


बा. 36/4 


'. अर. 43/4) 


द्वादशाद्वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत्समा: स्त्रियः। 
मासि-मासि भगद्वारा प्रकृत्वैवार्त्तवं छ़वेत ॥। भा. प्र. 3/व पूर्व खण्ड 
विजयेत महीम्‌ राजा प्रवासी स्वस्तिमान्‌ भवेत्‌। 
स्त्रियो रजस्वलाः श्रुत्वा पुत्रान्‌ सूयुरनुत्तमान्‌।। यु. 28/6 
आर्तवश्नावदिवसादूतुः घोडश रात्रयः। 
गर्भ ग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः।। भा. प्र. पू. 3/2 
इति मद्वचनादू रामो वक्तव्यो मम संग्रहः।। 
वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 45 


निरीक्ष्य माद्य गच्छ त्वमृतुकालातिवर्तिनीम्‌। उ. 48/8.5 
2. पूर्व्व पश्येदृतुस्नाता या दृशं नरमडूगना। 
तादृशं जनयेत्‌ पुत्र॑ ततः पश्येत्पतिं प्रियम्‌ ।। भा. प्र. पू, 3/॥ 
3. ऋतुस्नातां सततीं भायमृतुकालानुरोधिनीमू। 
अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यायेज्नुमते गतः।। अयो. 75/52 
4. ऋतौस्त्रीपुंसयोयोगिमकर ध्वज वेगतः।। भा. प्र. पू. 3/28. 
5. वरुणस्त्वब्रवीद वाक्य कन्दर्पशरपीडितः। 
इदं तेजः समुत्यक्ष्ये कुम्भेषस्मिन्‌ देवनिर्मिते ।। 7 
एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यहं वरवर्णिनि। 
कृतकामो भविष्यामि यदि नेच्छसि सड्गमम्‌। उ. 56/7, 8 
6. अयो. 75/4, यु. 8/4, उ. 56/5, 23, 80/6, 89/प्रा. 
प7. भा. प्र. पू. $/34 
8. बीज मात्र पिता जन्‍्तों: शुक्र शोणितमेव च। 
संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म ततू।। अयो. 08/] . 
स्तनयोर्मुख कार्ष्प्य स्याद्रोमराज्युदूगमस्तथा। 
अक्षिपक्ष्माणि चाप्यस्याः संमील्यन्ते विशेषतः।। भा. प्र. पू. 3/43 
20. सा तु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्ट्वा वै तपसों निधिमू। 
अभवत्‌ पाण्डु देहा सा सुव्यज्जित शरीर जा।। उ. 207 
2, दृष्ट्वा तु राघवः पत्नीं कल्याणेन समन्विताम्‌। 
प्रहर्षमतुलं लेभे साधुसध्विति चाब्रवीत्‌।। उ. 42/30 
22. गरभभशियगतं शुक्रमार्तवं जीवसंज्ञकः। 
प्रकृति: सविकारा च तत्सव॑ गर्भ संज्ञकम्‌।। भा. प्र. पू. 3/68 
कालेन बर्द्धितो गर्भो यद्यडगोपाइग संयुतः। 
भवेत्तदा स मुनिर्भि: शरीरीति निगद्यते।। भा. प्र. पू. 3/64 
23. तेषां तद्‌ वर्चनम्‌ श्रुत्वा स्कन्न॑ गर्भपरिश्रवे। 
स्नापवन्‌ परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम्‌ ।। बा. 27/26 
24. स्कन्द इत्यब्रुवन देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवे। 
. कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्थ ज्वलनोपमम्‌।। बा. 37/27 
25. सु. सं. नि. 8/3 
26. सु. सं. नि. 8/4 
27. सु. सं. नि. 8/5 
28. सु. सं. नि. 08 
29. सु. सं. नि. 8/4 
30. तस्मिनननागगच्छति लोक नाथे, गर्भस्थजन्तोरिव शल्य कृन्तः। 
नून॑ ममाज्ञान्यचिरादनार्यः, शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः।। सु. 28/6 
3.. यदि पुत्र न जायेथा मम. शोकाय राघव। 
* न सम दुःखमतो भूयः पश्येयमहम प्रजाः॥। अयो. 20/36 
32. एक एव हि बन्ध्यायाः शोको भवति मानसः। 
अप्रजास्मीति संतापो न ब्यन्यः पुत्र विद्यते । अयो. 20/87 


452 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


9. 


33. 


34. 


- 
3. 


प. 


4. 


42. 


43. 


45. 


46. 
4. 


स चाप्य पुत्रो नृपतिस्तस्मिन्‌ काले महाद्युतिः। 

अयजत पुत्रियामिष्टिं-पुत्रेप्सुररि सूदन।। बा. 6/9 
दिवाकर समाकारं दीप्तानलशिखोपमम्‌। 

तप्त जाम्बूनद मयीं राजतान्तपरिच्छदाम्‌ ।। बा. 6/4 
दिव्य पायस सम्पूर्णा पात्री पत्नीमिवप्रियाम्‌। 

प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्या स्वयं मायामयीमिव ॥। बा. 6/5 
“'्रजापत्य॑ नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृपं।। बा. 6/6 
इदं तु नृप शार्दूल पायसं देवनिर्मितम्‌। 

प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्य वर्धनम्‌।। बा. 6/9 
भार्याणामनु रूपाणां मश्नीतेति प्रयच्छवै। 

तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान्‌ यदर्थ यजसे नृप ।। बा. 6/20 
...कौशल्यामिदमत्रवीत्‌ । 

पायस प्रतिगृहणीष्व पुत्रीयं त्विदमात्मगः।। बा. 6/26 





.. ततस्तु ताः प्राश्य तदुत्तम स्त्रियो, महीपतेरुत्तमपायसं पृथक्‌। 


हुताशनादित्य समानतेजसोऊ॑चिरेण गर्भान्‌ प्रतिपेदिरे तदा।। बा. 6/3 
ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ता: स्त्रियः प्रारुढगर्भा प्रतिलब्ध मानसा:। 
बभूव हष्टास्त्रिदिवे यथा हरिः सुरेन्द्रसिद्धर्षि गणाभि पूजित:।। बा. 6/32 


).. नवमोदशमे मासि नारीं. गर्भ प्रसूयते। 


एकादशे द्वादशे वा ततोषन्यत्र विकारतः।। भा. प्र. पू. 3/340 
ततोडर्धरात्रसमये बालका मुनिदारका:। 

वाल्मीके: प्रियमाचख्यु: सीताया: प्रसव॑ शुभम्‌ ।। उ. 66/2 

अष्ट हस्तायतं चारु चतुर्हस्तविशालकम्‌। 

प्राचीनद्वारम्‌ () दग्द्वारम्‌ विदध्यात्‌ सूतिका गृहम्‌।। भा. प्र. पू. 3/34॥ 
तेषां तदूवचनं श्रुत्वा महर्षि: समुपागमत्‌। 

बालचन्द्रप्रतीकाशौ देव पुत्री महौजसौ।। उ. 66/4 

जगाम तत्र हृष्टात्मा ददर्श च कुमारकौ। 

भूतष्नीं चाकरोत्‌ ताभ्यां रक्षां रक्षोविनोशिनीमू ।। उ. 66/5 


» तेषां तदू वचन श्रुत्वा स्कन्‍्न॑ गर्भपरिस्रवे । 


स्नापयनू परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम्‌।। बा. 37/26 
स्कन्द इत्यब्रुवन्‌ देवाः स्कन्न॑ गर्भपरिस्रवे। 

कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम्‌ ।। बा. 37/27 
सुंदर 28/6 

(2) रजस्वला यु. 28/6 

(७) अयोनिजा उ. 7/34 

(०) गर्भ-परिश्रव बा. 37/26 

(0) गर्भ-पिण्ड बा. 38/7 


.. च. सं. शा. स्था. 3/2-5 
49. 


सु. सं. शा. स्था. 3/3॥ 


वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान / 453 


पंचम परिछेद 
. “वमवन्तों प्रति वर्ष तत्‌ दर्दशुर्दनेः शिलाः।” बा. 45/9 
2. उत्पपाताग्नि संकांश हलाहल महा विषं। 
तेन दग्धं जगत्‌ सर्व सदेवासुर मानुषम्‌।। बा. 45/20 
3. हालाहलं विष घोरं संजग्राहामृतोपमम्‌। 
देवान्‌ विसृज्य देवेशो जगाम भगवान हरः।। बा. 46/26 
4... वृत्तोहिबाहूवत्तर भोगाराशिश्चिन्ताविषः गुस्मित तीक्ष्णदंष्ट्र:। 
पज्चाड्‌गुलीपज्वशिरोडतिकायः सीता महाहिस्तव केन राजनू।। यु. 4/2 
5... शिरोभिः पृथु भिंनागा व्यक्तस्वस्तिकलक्षणे:। 
वमन्तः पावक घोर दद॑सुर्दशनैः शिला:।। सु. /9 
6. तास्तदा सविषैर्दष्टाः कुपितै स्तैमहाँ शिलाः। सु. /20 
जज्ज्वलुः पावको द्वीप्ता विमिहुश्य सह अधा।। सु. /20 
7. यानित्वोषधाजातानि तस्मिन जातानि पर्वते। 
विषघ्नान्यपि नागानां न शेकु: शमिता विपम्‌।। सु. ॥/श 
8. * अहं हि विषमद्येव पीत्वा बहु तवाग्रतः पश्यश्च मरिष्यामि। अयो. 2/47 
9. “भक्षमेयं विष तीक्ष्णम्‌ 7?” अयो. 2/09 


0. विष मिश्रिमिश्रा मिषम्‌। यु. 3/34 
7. विष संस्पृष्ट मत्यर्थ भुक्तमन्नं भिवोजसा। सु. 5/24 
2. बा. 70/30 
3. बा. 70/34-35 
44. अयो. 2/47 
5. यु. 5/7 
6. दूषये युदुरात्मान: पथि मूल फलोदकम्‌। 
7. ततो मुहुर्ताद गरुड़ वेनतेयं महाबलम। यु. 50/36 
8. तमागत मभिप्रेक्ष्य नामास्ते विप्रदुद्रवु:। 
वैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ शरभूतैर्महाबलैः।। यु. 50/37 
9. ततः सुपर्ण: काकुत्थौ स्पृष्ट्वा प्रत्यभनन्ध च। 
विममर्श च पाणिभ्यां मुखे चन्द्र सम प्रभे।। यू, 50/38 
20. वैनतेयेन संस्पृष्टास्तयो: संरुरुह॒र््रणा: । 
सुकक्फ च तन्‌ स्निग्धे तयोराशु बभूवतुः।। यू, 50/39 
श. यू, 50/40 
22. भवद्यसादाद्‌ व्यसन रावणिप्रभवं महत्‌। 
उपायेन व्यतिक्रान्ती शीघ्रं च बलिनौ कृतौ।। यू, 50/42 
23. अहं सखा ते काकुल्थ प्रिंयः प्राणो बहिश्चरः। 
गुरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयो: साह्यकारणात्‌ ।। यू, 50/46 
नेम॑ मोक्षयितुं शक्ताः शरबन्धं सुदारुणम्‌। 
मायाबलादिन्द्रजिता निर्मितं ऋरकर्मणा ।। यू, 50/48 
एते नागाः काद्रवेयास्तीक्ष्ण दंष्ट्रा विषोल्वणाः | 


454 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


रक्षोमायाप्रभावेण शरभूतास्त्वदाश्रया:।। यू, 50/49 
24. सभाग्यश्चासि धर्मज्ञ राम सत्यपराक्रम। 
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा समरे रिपु घातिना।। यु. 50/50 
25. इम॑ श्रुत्वा तु वृत्तान्तम्‌ त्वरामाणोड्हमागतः। 
सहसैवावयोः स्नेहात्‌ सखित्वमनुपालयनू।। यु. 50/57 
26. मोक्षितौ च महाघोरादस्मात्‌ सायकबन्धनातू। 
अप्रमादश्च कर्तव्यो युवाभ्यां नित्यमेव हि।। यु. 50252 





सप्तम्‌ परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान 





अग्नि द्वारा (सूर्य-रश्मियों द्वारा) चिकित्सा 
सूर्य समस्त प्राणियों व वनस्पतियों को जीवन व गति प्रदान करता है। सूर्य न 
हो तो प्राणियों व वनस्पतियों का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। सूर्य को महान 
मान समस्त ग्रह निरन्तर सूर्य परिक्रमा में रत हैं, सूर्य किरणों से बना सतरंगी 
इन्द्रधनुष॑ सभी को आकर्षित करता है। मनुष्य शरीर के आंतरिक और वाहय 
अवयव भी विविध रंगों वाले हैं, ऐसा स्वीकार किया गया है। यदि मानव शरीर के 
अवयवों का रंग अपनी स्वाभाविकता छोड़ दे, तो मनुष्य शरीर अस्वस्थ कहा ज़ाता 
है। 
विभिन्‍न औषधियों के प्रभाव से जब अस्वस्थ अवयव अपने स्वाभाविक रंग 
को पा लेता है तो मानव शरीर स्वस्थ हो जाता है। 
भारतवासी तो आदिकाल से सूर्य-प्रकाश की स्वास्थ्य-वर्धक एवं रोग-नाशक 
शक्ति को जानते आ रहे हैं, इसका प्रमाण भारतीय आदि ग्रन्थों से प्राप्त होता है।"* 
इन मंत्रों में स्पष्ट कहा है कि भगवान सूर्य की रोचनामा दीप्ति अर्थात्‌ सुन्दर प्रभा 
शरीर के मध्य में मुख्य प्राणरप होकर रहती है। इसी से सिद्ध होता है कि शरीर का 
स्वस्थ और दीर्घ-जीवी होना भगवान सूर्य की कृपा पर निर्भर है। 
सूर्य की किरणें शरीर के स्वेद प्रवाहित करती हैं और सभी रोगों का नाश 
करती हैं, वे शरीर में चर्बी को छाँटकर शक्ति और आनन्द प्रदान करती है ॥ सूर्य 
रश्मियाँ दाद, कष्ट-पूर्ण दाने, कोढ़, जल शोथ, ज्वर अतिसार उदर शूल जैसे रोगों 
को नष्ट कर देती है। इनमें किंचित भी संदेह नहीं है सूर्य ही स्थावर जंगम की 
आत्मा है हृदय रोग एवं पीलक रोग भी सूर्य-किरणों के सम्बन्ध से चला जाता 
है ऐसा विद्वानों का मत है।* 
ड्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र सोब को कुष्ठ रोग हो गया था वह सूर्य की 
. उपासना से ही दूर हुआ था। तब सांब ने सूर्य की महिमा और उपासना सम्बन्धी एक 
ः.- पुराण की रचना की थी जो सांब पुराण के नाम से प्रसिद्ध है। 
हमारे आदि ग्रन्थ वेदों में सूर्य-उपासना सम्बन्धी अनेक ऋचाएँ विद्यमान हैं जो इस' 
456 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


बात का प्रमाण हैं कि हम भारतवासी अनादि काल से सूर्य की उपयोगिता मानते आ 
रहे हैं। हम प्रारम्भ से ही सूर्य को देवता के रूप में पूजते आ रहे हैं क्योंकि सूर्य के 
बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भारत वर्ष ही क्यों रोम, यूनान, मिस्र 
सभी जगह सूर्य को देवता माना गया है। जापान में सूर्य के अनेक मंदिर हैं, दक्षिण 
अमेरिका में भी सूर्य का एक विशाल मंदिर है। 

सूर्य नमस्कार जो हमारी प्रातः पूजा का एक अंग है, पूजा के साथ-साथ एक उत्तम 
प्रकार का व्यायाम भी है। इसमें सूर्य-नमस्कार से सूर्य के सामने जल गिराना होता 
है। इसके करने से अनेक लाभ होते हैं। 

धार्मिक रुचि के हिन्दी और पारसी आज भी सूर्य को देवता मानते हैं और 
नियम-पूर्वक उनकी पूजा:करते हैं। 

सूर्य केवल प्रकाश और गर्मी ही नहीं देता बल्कि यह बुद्धि, बल और दीर्घायु भी 
देता है।' अर्थात्‌ यह श्रेष्ठ प्रकाश जो विश्व को प्रकाशित कर रहा है, हमें सुबुद्धि और. 
दीर्घ आयुष्य प्रदान करे। 

यह सत्य है कि जो व्यक्ति सूर्य-प्रकाश का जितना अधिक सेवन करेगा उसकी 
मानसिक शक्ति उतनी ही प्रबल एवं विकसित होगी। सूर्य-प्रकाश के सेवन से 
मस्तिष्क में एक प्रकार की चुम्बकीय शक्ति आती है, जो मनुष्य को बुद्धिमान बना 
देती है। 

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि सूर्य-रश्मियों में नीलोत्तर किरणें पायी जाती हैं जो 
स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त लाभकारी हैं। 

एक प्रकार से देखा जाये तो सूर्य ही जगत्‌ का प्रसविता है। क्योंकि सृष्टि के सभी 
पदार्थों का मूल बीज-सूर्य-रश्मि-माला के विभिन्‍न प्रकार के संयोग से ही उत्पन्न होता 
है। रश्मि-भेद और विभिन्‍न रश्मियों के मिश्रण भेद से जगत्‌ के नाना प्रकार के पदार्थ 
उत्पन्न होते हैं। कहा गया है कि अपनी सतरंगी किरणों में सूर्य अपना वीर्य और 
चन्द्रमा अपना रज डालकर संसार को उत्पन्न कर देता है। संसार की सभी वस्तुएँ 
सोना, चाँदी, ताँबा, जस्ता, लोहा आदि धातुएँ हीरा, माणिक, नीलम आदि जवाहरात 
का पैदा होना इन्हीं रंगीन सूर्य रश्मियों के चमत्कार हैं। प्राण-धारियों और 
वनस्पतियों के जीवन का भी मात्र आधार सूर्य-रश्मियाँ ही हैं। जर्मन में एक 
प्राकृतिक चिकित्सक 'अर्नाल्ड रिकली” ने लिखा है कि जीवन के लिये.जल ज़रूरी 
है, वायु उससे जरूरी है और प्रकाश इन दोनों से भी जरूरी है। 

अग्नितत्व के शरीर में अभाव के कारण शरीर निर्जीव हो जाता है और कमी 
की वजह शरीर में सुस्ती, सिकुड़न, सर्दी की सूजन, वायु जनित पीड़ाएँ, पक्षाघात, 
गठिया, बुढ़ापे की कमजोरी, मन्दाग्नि, निद्रा की अधिकता, तथा ठंड आदि के 
उपद्रव आरम्भ हो जाते हैं, और आँख, नख, जिह्ना, विष्ठा तथा पेशाब लाल-पीले 
या लाल रंग की हो जाती है। मुख का स्वाद खटूटा, कड़वा, हो जाता है, स्वभाव 

वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान” 457 


छः 


उग्र एवं क्रोधी हो जाता है तथा दुर्बलता, अंग-अंग में शुष्कता एवं प्यास की 
अधिकता आदि रोग हो जाते हैं। 
सूर्य-किरणों के रंग 

सूर्य किरणों में सात रंग पाये जाते हैं। 

. लाल 2. पीला 

3. नारंगी 4. हरा 

5. नीला 6. आसमानी 

7. बैंगनी 

रंगों की अपनी-अपनी प्रकृति है तथा अपना-अपना प्रभाव है। चिकित्सा 
विशेषज्ञ सातों रंगों का भिन्न-भिन्न रोग में प्रयोग कर सकते हैं। परन्तु साधारण 
चिकित्सक के लिये निम्नलिखित तीन समूहों का. प्रयोग ही पर्याप्त हो जाता है। 

. लाल-(पीला और नारंगी) 

2. हरा 

3. नीला-(आसमानी और बैंगनी) 

सूर्य-किरण चिकित्सा को अन्य चिकित्साओं की तुलना में अधिक प्रभावशाली 
बताया गया है। यह अधिक स्वभाविक भी है। इसके अतिरिक्त एक और विशेष 

कारण इसकी आश्चर्यकारी. सूक्ष्मता हैं.। 

साधारण पानी, चीनी या तेल आदि रंगीन बोतलों में डालकर धूप में.रख देने 
से ही सूर्य किरणों द्वारा उसमें रासायनिक खनिज एवं धातुओं के सम-मात्रा में 
भिन्‍न-भिन्‍न तत्व तीनों रंगों में पृथक्‌-पृथक्‌ उत्पन्न हो जाते हैं। 

भारतीय अंथर्ववेद के अनुसार स्वास्थ्य रक्षा और स्वास्थ्य प्राप्ति के लिये 
आहार, जल और वायु का ध्यान रखंना आवश्यक है। जीवनी शक्ति देने वाली 
ऑक्सीजन की प्राप्ति के लिये रोजाना हरियाली वाले स्थानों में घूमना या बैठना 
अति आवश्यक है। जल और आहार की शुद्धता भी उतनी ही जरूरी है। पाचन 
शक्ति के बिगड़ जाने से अनेक व्याधि उत्पन्न होने की आशंका बनी रहती है। 
भूख से थोड़ा कम खाने वाला व्यक्ति जल्दी बीमार नहीं” होता और अधिक 
कार्यशील होता है। 

'सूर्य-केरण चिकित्सा में खाने-पीने-की वस्तुओं' के प्रभाव पर भी लक्ष्य रखा 
गया है, जैसे लाल-रंग की सब्जियों और फलों का प्रभाव गर्म होता है, हरे-रंग की 
सब्जियों और फलों का प्रभाव समशीतोष्ण होता है, एवं नीले रंग की सब्जियों का 
प्रभाव ठंडा 'होता है। 

यही सिद्धान्त वात-पित्त एवं कंफ इन तीनों दोषों के आधार पर साधारणतया 
लागू होता है। यधा-लाल-रंग की सब्जी पित्त-कारक, सफेद रंग की कफ-कारक 
और हरे-रंग की समशीतोष्ण होती है। 

458 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सर्दी, खाँसी आदि कफ जनित रोग वाले को गर्म-प्रकृति वाले पदार्थ देने 
चाहिये, उसके लिये, ठण्डे प्रकृति वाले पदार्थ वर्जित हैं जैसे-दही, चावल, मूली, 
शलजम, संतरा इत्यादि। इसी प्रकार पित्त-जिनत रोगों में ठंडी प्रकृति के द्रव्य देना 
चाहिये, गर्मी करने वाले द्रव्य वर्जित हैं। फलों के रस तथा सब्जियों के सूप आदि 
पीने वाले द्रव्यों पर भी यही नियम लागू होता है। 

“सूर्य-किरण-चिकित्सा” की एक और विशेषता है कि कफ-जनित रोगों में 
अनेक पेय-पदार्थ जैसे-दूध, फलों तथा सब्जियों के रस को आधा घण्टे नारंगी रंग 
की बोतल में रख कर उनको धूप में रखा जाये तो उनकी कफ बनाने वाली प्रकृति 
परिवर्तित हो जाती है। 

इस प्रकार उपरोक्त प्रकार से सूर्य-केरण द्वारा चिकित्सा का विधान विभिन्‍न 
विद्वानों एवं चिकित्सकों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। वाल्मीकि रामायण में भी अनेक 
स्थलों पर सूर्य की शक्ति एवं महत्व को प्रदर्शित एवं वर्णित किया गया है। 

रावण से युद्ध करते हुए जब श्री राम थककर अत्यन्त चिन्तित हुए तब 
अगस्त्य मुनि ने उनके पास आकर उन्हें “आदित्य हृदय” नामक अत्यन्त गोपनीय 
स्तोत्र का जप करने के लिये कहा # अगस्त्य ने बताया कि सूर्य अपनी अनन्त 
किरणों से सुशोभित, नित्य उदय होने वाले (समुद्न), देवताओं और असुरों द्वारा 
नमस्कूत विवस्वान प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और भुवनेश्वर हैं।* 
अगस्त्य ने बताया कि सम्पूर्ण देवता सूर्य के ही स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा 
अपनी किरणों से जगत्‌ को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं और ये ही अपनी 
रश्मियों का प्रसार करके देवताओं तथा असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन 
करते हैं।० 

अगस्त्य मुनि आगे भी सूर्य की महिमा का वर्णन करते हुए उसकी स्तुति करते 
हैं।! अगस्त्य॑ मुनि ने सूर्य का महत्व बताते हुए श्री राम को आदित्य हृदय का 
तीन बार जप करने का परामर्श दिया ।” मुनि विश्वामित्र का उपदेश सुनकर श्री 
राम ने प्रसन्‍न होकर शुद्ध चित्त से “आदित्य हृदय” को धारण किया और तीन बार 
आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए उसका तीन बार जप 
किया ।” सूर्य रश्मियों के ही समान “अग्नि” का भी रामायण में अनेक स्थलों पर 
उल्लेख किया गया है। अग्नि द्वारा चिकित्सा से तात्पर्य सूर्य रश्मियों द्वारा 
चिकित्सा से ही है। रामायण में प्रत्यक्ष रूप से “अग्नि! द्वारा 'चिकित्सा? का कहीं 
भी उल्लेख नहीं किया गया है तथापि इसका नामोल्लेख अवश्य दृष्टि-गोचर होता 
है श्र 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग-स्थलों पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता है 
कि सूर्य एवं अग्नि का रामायण में अनेक स्थलों पर विभिन्‍न सन्दर्भों में उल्लेख 
तो अवश्य हुआ हैं किन्तु इनके द्वारा चिकित्सा-विधान स्पष्ट परिलक्षित नहीं 

वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान/ 459 


होता। 

सूर्य से सम्बन्धित “आदित्य हृदय” नामक स्त्रोत अवश्य ही स्फूर्ति दायक 
बताया गया है जो चिकित्सा की दृष्टि से सहायक सिद्ध हो सकता है। अन्य स्थलों 
पर भी सूर्य की महिमा शक्ति एवं देवत्व का वर्णन किया गया है सूर्य के ही समान 
अग्नि का भी वर्णन रामायण में मिलता है और अग्नि को भी देवत्व प्रदान किया 
गया है तथापि यदि चिकित्सा की दृष्टि से देखा जाये तो इनका विशद्‌ उल्लेख 
प्राप्त नहीं होता । 
(॥) जल द्वारा चिकित्सा 

समस्त रोगों का मूल कारण शरीर के अन्दर विजातीय पदार्थों का एकत्र हो 
जाना ही है। जब वायु दूषित हो जाती है, शरीर मल ग्रसित हो जाता है तभी रोगों 
का आक्रमण होता है। शरीर की गन्दगियों को निकाल देने से ही शरीर स्वस्थ हो 
जाता है। कपड़े गन्दे होने पर हम जल से ही उसे साफ करते हैं, ठीक उसी प्रकार 
शरीर के भीतर एकत्र हुई गन्दगी भी जल के द्वारा ही निकाली जा सकती है, 
डाक्टरों, वैद्य, हकीमों की दवाइयों की कोई भी जरूरत नहीं है। जल की सहायता 
दो प्रकार से ली जा सकती है प्रथम जल पीकर तथा द्वितीय स्नान करके। 

जल-चिकित्सा से रोगोत्पत्ति का मूल कारण नष्ट हो सकता है क्योंकि 
जल-चिकित्सा प्राकृतिक-चिकित्सा का मुख्य अंग है। 
जल का महत्व 

जल का दूसरा नाम “जीवन” है। इसी शब्द से यह सिद्ध है कि जीवन का 
आधार जल ही है अर्थात्‌ जीवन रक्षा का प्रधान अवलम्बन जल है। 

शीतल वायु में प्रातः सायं भ्रमण करने से त्वचा में कांति आती है तथा कान, 
आँख आदि इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है। यह शीतलता जल से ही उत्पन्न होती 
है। जल से भरी हुई शीतल वायु का सेवन बड़ा लाभदायक है। प्रातः सायं तथा 
अन्य समय में भी प्रत्येक मनुष्य को इसके सेवन से लाभ उठाना चाहिये। असाध्य 
रोगियों को वृहद्‌ जलाशयों के समीप विशेषतः सागर तट पर भेजा जाता है। वेद 
के एक सूंक्त में वर्णन है कि दिव्य जलों से मनुष्य के अभीष्ट और पीने के कर्म 
होते हैं। मनुष्यों की कामनाओं को पूर्ण करके दिव्य जल चारों ओर से सुख की 
वर्षा करते हैं। दिव्य-जल वर्षा के जल हैं। वर्षा के जलों से ही खेतियाँ हरी-भरी 
दिखाई देती हैं। सभी प्रकार की वनस्पतियाँ अन्न-सम्बन्धी या औषध-सम्बन्धी 
वर्षा से ही उत्पन्न होती हैं। सारांश यह है कि मानव के खाने-पीने आदि जीवन 
की सम्पूर्ण सामग्री दिव्य-जलों पर आश्रित हैं। जल में. सम्पूर्ण भेषज विद्यमान हैं। 
जलों में एक अग्नि विद्यमान है-जिससे संसार का कल्याण होता है। 

जल शरीर की रक्षा के लिये और रोग. निवारण के लिये रक्षा के अनेक साधनों 
को और औषधियों को उत्पन्न करता है जिसके सहाय्य से मंनुष्य को दीर्घायु प्राप्त 


460 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


होती है। 
अथर्ववेद के मंत्र में कहा गया है कि जल निश्चय ही भेषज है, जल ही रोगों 
को हटाने वाले हैं। जल सब रोगों की औषधि है। उसमें असाध्य, कष्ट-साध्य 


* रोगों को दूर करने की सामर्थ्य है। 


औषधि चिकित्सा से जो रोग असाध्य कह दिये गये हैं, वे भी जल चिकित्सा 
से दूर हो सकते हैं। जल को अग्नि से तपाने से जल की वाष्प बन जाती है, जल 


फैलते हैं, व्यापक होते हैं। इसका तात्पर्य है जल-वाष्प। शरीर की अग॒तिशील-निकृष्ट 


अवस्था को पहुँचे हुए रोगी को यदि वाष्प-स्नान कराया जाये तो वे अंग शीघ्र ही 
गति करने में समर्थ हो जाते हैं। लकवा आदि भी वाष्प स्नान से अच्छे हो जाते हैं। 
जल-स्नान का महत्व 

जल स्नान शरीर को शुद्ध बनाता है, स्वास्थ्य प्रदान करता है, चित्त को 
मलिनता को दूर करता है, प्रफुल्लता का संचार करता है। रोगों को दूर करने के 
लिये प्राकृतिक स्नान ही उत्तम है। 

गरमी में 5-20 मिनट तक स्नान करने से कोई हानि नहीं होती, किन्तु 
शीत-काल में 3 मिनट में ही स्नान समाप्त कर देना चाहिये। स्नान का ठीक समय 
नहीं बताया जा सकता। अपनी शारीरिक अवस्था को समझकर स्वयं निर्णय कर 
लेना चाहिये। 

शुद्ध जल में स्नान करना स्वास्थ्य के लिये जिस प्रकार हितकर है, उसी प्रकार 
पीने का जल भी रखना वाउ्छनीय है। गन्दे जल के व्यवहार में प्राण-घातक 
महारोगों की उत्पत्ति होती है और ये ही संक्रामक रूप धारण कर असंख्य लोगों 
की प्राण हानि करते हैं। 
जल के विभिन्‍न चिकित्सकीय उपयोग 

स्नानों के भेद-जल स्नान के भेद बहुत से हैं, इनमें से लगभग सभी रोगों को 


दूर करने के लिये .उपयोग में लाये जाते हैं। 


अवगाहन स्नान 
वाष्प-स्नान 

अर्द्ध-स्नान 

फव्वारा स्नान 

उदर या कटि स्नान 

मेहन स्नान 

गीली चादर को लपेटना 

मध्य भाग पर भीगा- कपड़ा ओढ़ना 
पेडू-स्नान 

0. पाद-स्नान 

. सिर-पीठ का सिंचन 


वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान” 46 


ईछ इुच ऋ कर कु कक 


2. सीवन-स्नान 
प्राकृतिक स्नान से लाभ 

उपरोक्त प्रकार के प्राकृतिक स्नान से शरीर में बल और शांति मिलती है। 
जठराग्नि प्रदीप्त होती है। प्रायः शरीर तेजस्वी बन जाता है। मुझयि हुए चेहरे 
खिल उतते हैं। मन्दाग्नि दूर हो जाती है। इस स्नान से पेट की गर्मी दूर होती है 
और जठराग्नि इतनी प्रबल हो जाती है कि खाये हुए पदार्थों को पचा डालती है। 
शरीर के भीतर एकत्र मल-पदार्थों को बल-पूर्वक बाहर फेंक देती है। इस स्नान 
से मेदे की सफाई होती है। कब्ज की शिकायत नहीं रहती। लकवा, संग्रहणी, 
मोती-झरा, हैजा, पेट का फोड़ा, क्षय, प्रदर, हिस्टीरिया आदि रोगों में विधि-पूर्वक 
स्नान से आश्चर्य-जनक लाभ होता है। 

रामायण में जल द्वारा स्वास्थ्य प्राप्ति का पर्याप्त उल्लेख किया गया है। स्वस्थ 
रहने के लिये औषध-जल द्वारा स्नान का उल्लेख किया गया है.। जो कई विशेष 
अवसरों पर कराया जाता था। कमल के सुवासित जल का स्नान इस कार्य के 
लिये उपयोगी था। सीता तथा राम दोनों की ही शोक निमग्न अवस्था का पूर्ण 
विवरण रामायण में उपलब्ध है तथा शोक की गउग्रावस्था में मूर्च्छित होने का वर्णन 
भी रामायण में है। उग्र-शोक के कारण जब मनुष्य मूच्छित हो जाता है तब उसके 
उपचार के लिये शीतल जल का छिड़कना, उत्पल, उशीर, अगर अथवा चन्दन के 
ठंड़े जल से स्नान कराना या मुख तथा मस्तक धोना रामायण में निर्दिष्ट है (कि.) पित्त 
विभ्रम अर्थात्‌ पित्त की वृद्धि के कारण चित भ्रमित होने का उपचार भी अगर, 
चन्दन के प्रलेप के द्वारा किये जाने का निर्देश मुनि ने दिया है “परासुमिव तोयेन 
सिंचति काव्य वारिणा” अर्थात्‌ जैसे बेहोश भनुष्य को होश में लाने के लिये उस 
पर ठंडे जल के. छींटे दिये जाते हैं।+ 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग स्थलों पर दृष्टि-पात करने से यह स्पष्ट हो जाता 
है कि रामायण में जल का चिकित्सार्थ प्रयोग किया जाता था और उसके स्पष्ट 
लाभ दिखाये गये हैं। 
(गा) मृत्तिका द्वारा चिकित्सा 

मानव शरीर का निर्माण पाँच महातत्वों मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और आकाश 
से हुआ है। सृष्टि के प्रारम्भ में सर्वप्रथम परमात्मा की प्रेरणा से शब्द तन्मात्र की 
उत्पत्ति हुई, इस प्रकार आत्मा का बोध कराने वाला आकाश उत्पन्न हुआ। 
पश्चात्‌ वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार आकाश में 'ईथर” नामक तरंगायित तत्व 
हैं जो शब्द को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाता है। सबके भीतर बाहर, 
वर्तमान, प्राण, इन्द्रिय और मन का आश्रय होना आकाश के कार्य-रूप लक्षण हैं। 
आकाश से गति-शील तत्व वायु का प्रादुर्भाव हुआ। वायु शरीर का एक प्रमुख 
घटक और प्राकृतिक आहार है। भोजन और पानी के बिना मनुष्य कुछ समय 


46३ / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जीवित रह सकता है किन्तु वायु के बिना कुछ क्षण भी जीवित रहना सम्भव नहीं। 
वस्तुतः वायु ही प्राण है। वायु में मुख्यतयः प्राण वायु (ऑक्सीजन) भूयाति 
(नाइट्रोजन) और प्रांगारद्धिजा-रेय (कार्बन-डाइ-ऑक्साइड) इन तीनों तत्वों के 
अतिरिक्त वाष्प, धूल, सेन्द्रिय और खनिज द्रव्यों के कण तथा कुछ गैस भी वायु 
में रहती हैं ।,शुद्ध वायु में कोई रंग, रूप, गंध या स्वाद नहीं होता क्योंकि वायु के 
अन्य तत्व निर्गन्‍्ध और निस्वाद होते हैं। वायु के दो मुख्य गुण हैं-शब्द और 
स्पर्श । वायु से ही अग्नि की उत्पति हुई है, क्षुधा, तृषा, उत्पन्न करना तथा उनकी 
निवृति के लिये भोजन-पान कराना या पचाना ये अग्नि या तेजस के कार्य-रूप 
लक्षण हैं। पुनः अग्नि के विकृत होने पर उससे द्रव तत्व जल की उत्पत्ति हुई। 
वस्तुओं को सिक्‍त करना, ताप से निवृत्ति करना, प्यास शांत करना तथा जीवित 
रखना आदि जल के कार्य रूप लक्षण हैं। जल के चार गुण हैं-शब्द, स्पर्श, रूप 
* और रस | जल से गन्ध गुणमयी पृथ्वी अर्थात्‌ मिट्टी की उत्पत्ति हुई। दूसरे तत्वों 
का आधार लिये बिना अपने ही आधार पर स्थित रहना, जल-वृक्षादि पदार्थों को 
धारण करना, आकाशादि का अवच्छेदक होना तथा सम्पूर्ण प्राणियों के स्त्रीत्व, 
: पुरुषत्व गुणों को प्रकट करना-पृथ्वी के कार्य-रूप लक्षण हैं। 
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि पंच महाभूतों में आकाश में केवल एक 
गुण शब्द, वायु में दो गुण शब्द, स्पर्श, अग्नि में तीन गुण शब्द, स्पर्श और रूप, 
जल में चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस 
और गन्ध पाँच गुण होते हैं। इस प्रकार यह तथ्य प्रामाणित होता है कि जिन पाँच 
महातत्वों से शरीर का निर्माण हुआ है, मिट्टी उनमें सर्वोपरि प्रधान तत्व है। इसी 
तत्व में सर्वगुण समुपस्थित हैं। हमारे शरीर का अस्तित्व मिट्टी पर ही निर्भर है। 
मिट्ट्टी के गुण, धर्म, पर्याय और भेद 
सर्वद्रव्यं पज्व भौतिकमस्मिनर्थे” अर्थात्‌ निखिल विश्व के द्रव्य पाँच भौतिक 
हैं, उनके भीतर पार्थिव तत्व विद्यमान हैं। पृथ्वी सर्वगुण सम्पन्न होने के साथ ही 
सर्व-सुलभ और बिना मूल्य मिलने वाली अमूल्य गुणकारी वस्तु है। 
मिट्टी को संस्कृत में मृत्तिका, मृदा और क्षेत्रजा कहते हैं। हिन्दी में मिट्टी या माटी 
कहते हैं। लेटिन में (प्+ताएजंड आटथन० ण॑ 8ण्गंगंधा) कहा जाता है। 


देश-भेद से कई प्रकार की मिट्टी होती है- 
. काली मिट्टी 2. पीली मिट्टी 
3. लाल मिट्टी 4. मुल्तानी मिट्टी 
5. खड़िया मिट्टी 6. गेरु 

7. सज्जी मिट्टी 8. गोपी चन्दन 
9. बलुई मिट्टी 0. पिंडोल मिट्टी 
]. बालू 


उपरोक्त विभिन्‍न मिट्टियों की पड्टी बनाकर विभिन्न रोगों में प्रयोग में लाया जाता है। 
वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान 463 


वाल्मीकि रामायण में मिट्टी का चिकित्सकीय दृष्टि से कहीं भी उल्लेख प्राप्त 
नहीं होता है। तथापि एक-दो स्थलों पर 'मृत्तिका' शब्द अवश्य प्राप्त होता है" 
जिससे यह प्रमाणित हो जाता है कि महाकवि की दृष्टि से मिट्टी अछूती नहीं है। 
(7५) बायु द्वारा चिकित्सा 

पज्च महाभूतों में आकाश के बाद वायु का स्थान है और वायु में सूर्य, चन्द्रमा, 
जल एवं पृथ्वी लीन हो जाते हैं। उपनिषद्‌ में संवर्ग विद्या के उपदेश में कहा गया 
है।? 

जीवन में वायु का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। अन्न-पानी-धूप के बिना तो 
हम कुछ दिन जीवित भी रह सकते हैं पर वायु के अभाव में कुछ क्षण में ही दम 
घुटने लगता है अतः यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि “वायु ही जीवन 
है / और कहावत भी है कि “जब तक साँस तब तक आस”। वायु में जो 
ओषजन तत्व हैं, वही हमें जीवन, शक्ति एवं स्फूर्ति प्रदान करते हैं। अतः इस 
महत्वपूर्ण वायु के सम्बन्ध में प्रत्येक प्राणी को अच्छी तरह जान लेना चाहिये ताकि 
हमें अनिवार्य रूप से सदा शुद्ध वायु सेवन की प्रेरणा मिलती रहे और हम में स्फूर्ति 
एवं उत्साह का निरंतर संचार हो। 
वायु की आवश्यकता 

हम अनुभव करते हैं कि यदि नाक एवं मुँह दबाकर थोड़ी देर के लिये भी साँस 
बन्द कर लें तो तत्काल दम घुटने लगता है। अतः यह प्रत्यक्ष है कि समस्त प्राणी 
एवं वनस्पति वर्ग के जीवन के लिये निरन्तर शुद्ध वायु का मिलना अनिवार्य है। 
हमारे अन्दर धीरे-धीरे होने वाली दहन-क्रिया के लिये प्राणवायु की आवश्यकता 
होती है और यह प्राणवायु श्वास लेते समय वायु द्वारा रक्त में प्राप्त की जाती है 
और रक्त के माध्यम से ही समस्त भागों में यह पहुँचायी जाती है। अतः स्वास्थ्य 
के लिये शुद्ध वायु परमावश्यक है और यदि शुद्ध वायु के अभाव में मनुष्य को 
दूषित वायु में रहना पड़े तो उसका रोग-ग्रसित होना निश्चित है। 

स्वास्थ्य के लिये पर्याप्त मात्रा में शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है। शुद्ध 
वायु में रहने से मनुष्य का तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। अशुद्ध वायु से त्वचा के 
कार्य में रुकावट होती है। जिससे शरीर के ताप का नियमन ठीक-ठाक नहीं हो 
पाता एवं रोग-प्रतिरोधक शक्ति का ह्ास होता है। 

खुले स्थान, पर्वत, नदी, झरना, समुद्र, झील एवं तालाब आदि के किनारे, 
सुन्दर हरे-भरे सुगन्धित उद्यान में जहाँ वायु के मंद-मंद झोंकों से स्पन्दन उत्पन्न 
होता है वहाँ नंगे बदन वायु स्नान लेना चाहिये। जमीन पर पेट अथवा पीठ के 
बल लेट या यों ही बैठकर अथवा खड़े होकर भी वायु स्नान लिया जा सकता है। 
इससे धरती माता की भी चुम्बकीय शक्ति हमें प्राप्त होती है। इस प्रकार वायु 
सेवन तो प्राप्त होता ही है साथ ही साथ स्नायु संस्थान को भी पोषण मिलता है। 

464 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


यदि इसकी सुविधा न हो तो कहीं भी स्वच्छ खुली हवा में चलंते फिरते वायु स्नान 
लिया जा सकता है। 

आधुनिक मानव भौतिक उतरदायित्व तथा-कथित सभ्यता, भीड़-भाड़, संकरे 
मार्ग, बन्द कमरे, गन्दगी एवं कल-कारखाने आदि के कारण जीवन वायु ओष-जन 
से सदा वंचित रहने के कारण रोग-ग्रसित होता है। अतः यह स्वयं सिद्ध है कि 
स्वास्थ्य के लिये शुद्ध वायु का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और इसकी पूर्ति किसी 
भी प्रकार की औषधि द्वारा नहीं की जा सकती। अतः वायु दीर्घ जीवन, स्वास्थ्य 
एवं प्रसन्‍नता का स्रोत है और रोग के आक्रमण से बचाने वाला है। 

वायु धारण की विशेष विधि होती है, जिसे 'प्राणायाम” कहा जाता है। 

रामायण में चिकित्सा के साधन के रूप में वायु का उल्लेख प्राप्त होता है। 
सामान्यतः स्वस्थकर वायु का बहना, मलय तथा दुर्दर वायु का बहना तथा दिव्य 
हवा का बहना। ये तीनों ही स्वस्थकर साधन हैं। लंका के जलते समय सीता को 
ऐसी ही हवा ने स्पर्श किया था।४ 

उपरोक्त तथ्यों पर दृष्टि-पात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि महाकवि 
वाल्मीकि ने अपने महाकाब्य में प्राकृतिक चिकित्सा का भी उल्लेख किया है इसके 
अन्तर्गत उन्होंने प्राकृतिक साधनों यथा अग्नि (सूर्य-रश्मियों द्वार) चिकित्सा, जल 
द्वारा चिकित्सा, मृत्तिका द्वारा चिकित्सा एवं वायु द्वारा चिकित्सा का वर्णन किया है। 


संदर्भ 
]. आरोग्य भास्करादिच्छेत ।। श्रीमद्‌ भागवत 
2. अन्‍न्तरचरित रोचनाश्य प्राणादपानती व्याख्यनमहिषों दिवमू। ऋ0 0/89 
3. सूर्यातपः स्वेदवंलह सर्व रोग विनाशकः। 
मेदच्छेद करश्वैव बलोत्साह विवर्धन:।। ऋ. वे. 
4. दद्ग विस्फोट कुष्ठघ्न कामला शोध नाशकः। 
ज्वरातिसार शूलानां हारको नात्र संशयः।। 
5. सूर्य आत्मायतस्तस्थुषव। ऋ. वे. 
6. अनुसूर्यमुदयतां हृदद्योतो हरिमाचते। 
रोगी हितस्य वरोनि तेनत्वा परिदध्मसि।। 
7. सविता नः सुवतु सर्वातीतां सवितानोरासतांदीर्घमायु:। 
8. आदित्यहदयं पुण्य॑ सर्वशत्रुविनाशनम्‌। 
.जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमांशिवम्‌।। 
सर्वमड्ग्लमाइल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ 
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ।। यु. 05/4, 5 
9. रश्मिमन्तं समुध्न्तं देवासुरनमस्कृतम्‌। 
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्कर भुवनेश्वरम्‌।। यु. 05/6 
0. सर्वदेवात्मको ह्ेष तेजस्वी रश्मिभावनः। 
वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान/ 465 


एप देवासुरगणांल्‍लोकान्‌ पाति गर्भास्तिभि:।। यु. 05/7 
« एप ब्रह्मा च विष्णुश्व शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। 

महेन्द्रो धंनदः कालो यमः सोमो ह्वपां पतिः॥। यु. 05/8 

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः। 

वायुर्वह्निः प्रजा: प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥। यु. 05/9 

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभभस्तिमानू। 

सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः ॥। यु. 05/0 

हरिदश्वः सहस़रसार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमानू। 

तिमिरोन्मथनः शुंभस्त्वष्टामार्तण्छकोष़्शुमान्‌ ।। यु. 05/7 

हिरण्य गर्भ: शिशिरस्तपनोहस्करो रविः। 

अग्निगर्भो अदितेः पुत्र: शड्खः शिशिरनाशनः।। यु. 05/2 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुः सामपारग:। 

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवंगमः॥। यु. 05/3 

आतपी मण्डली मृत्यु: पिड्गलः सर्वत्तापन:। 

कविर्विश्वो महातेजा रक्‍तः सर्वभवों दूभवः॥। यु. 05/4 

नक्षत्र-ग्रहताराणामधिपो विश्व भावन:। 

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मननमोछस्तु ते।। यु. 05/5 

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। 

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।। यु. 05/6 

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। 

नमो नमः सहम्नांशो आदित्याय नमो नमः ।। यु. 05/7 

नमः उग्राय वीराय सारडगय नमो नमः। 

नमः पदुमप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोउस्तु ते।। यु. 05/8 

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे। 

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः।। यु. 05/9 


तमोध्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। 

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।। यु. 05/20 
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे। 
तमस्तमो5भिनिष्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।। यु. 05/श 
नाशयत्येष वैभूतं तमेव सृजति प्रभुः। 


पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:।। यु. 05/22 
2. एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः। 

एष चैवाग्निहोत्रं च फल॑ चैवाग्निहोत्रिणामू।। यु. 05/23 
देवाश्व कतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च। 
यानि कृत्यानि लोकंपु सर्वेषु परमप्रभु:॥। यु. 05/24 
एनमापस्तुक्च्छेसु कान्‍्तारंपु भयेषु च। 
कीर्तयन पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव।। यु. 05/25 
पूजयस्वैनमेकाग्रो देव देव॑ जगत्पतिम्‌। 
एतत्‌ त्रिगुणितं जला युद्धपु विजयिष्यति।। यु. 05/26 

466 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


3. 


अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावण त्वं जहिष्यसि। 

एवमुक्त्वा ततोषगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌।। यु. 05/27 

एतच्छुत्वा महातेजा नष्टशोकोज्भवत्‌ तदा। 

धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्‌।॥। यु. 05/28 वि 
आदि प्रेक्ष्य जप्ल्वेदं परं हर्षमवाप्तवानू। * $ 
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌।। यु. 05/29 


» बा. 7/3, 29/6, 36/8, 37/-2, 7, 0-।, 2, 3, 4, 5, 6, 30, 49/, 5, 


54/44, अयो. 25/24, अर. /3-5, 2/7, सु. 32/4, 53/25-28, यु. 27/20, 
8/-0, 8/5, उ. 69/36,-70/-3, 6-7, 76/5-6, 85/5-77 0 


« सु. 26/2 
.. आसामुभयतः कूलं पाण्डुमृत्तिक लेपना:। 


रम्याश्वावसथा दिव्या ब्रह्मणस्थ प्रसादजा:॥। अयो. 9/42 


'. वायुर्वावसंवर्गों यदा वा अग्नि रुद्वायति वायुमेवाप्येति 


* यदा सूर्योज्स्तयेति वायुमेवाप्येति यदा चंद्रोउस्तमेति वायुमेवाप्येति।। 


यदाप उनच्छुष्यन्त्युच्छोषमाप्नुवन्ति तदा वायु मेवापियन्ति। 
प्राकृतिक चि. डॉ. हीरालाल - पृ. नं. 49 


 युगान्तकालानल तुल्य रूपः समारुतोजग्निर्ववृधे दिवस्पृक। 


विधूमरश्मिर्भवनेषु सक्‍तो। रक्षेः शरीराज्य समर्पितार्चि:।। सु. 54/32 


वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान” 467 


अष्टम्‌ परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं भूतविद्या 
विषयक सामग्री 


भूत-विद्या आयुर्वेद का प्राचीनतम अंग है जिसका वर्णन “छान्दोग्योपनिषद्‌ 
(7//9) में भी प्राप्त होता है। चरक ने इसे उन्माद रोग के अन्तर्गत समाविष्ट किया 
है। इसमें देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच, नाग ग्रह आदि से दूषित मन 
वालों के लिये शांति कर्म बलि आदि किये जाते हैं। आज भी भूत विद्या, झाड़ना-फूँकना 
आदि अपने देश में हैं। अशिक्षित लोगों में इसका प्रचार है। आज भी वैज्ञानिक 
चिकित्सा में जो महत्व जीवाणुओं का है वही महत्व प्राचीन काल में भूतों का था। 
भूत-प्रेत, राक्षत, पिशाच, निशाचर इन सबकी प्रवृत्ति, इनका व्यवहार 
आधुनिक-जीवाणु-विज्ञान के ज्ञान के साथ ठीक-ठीक मिलता है। दोनों की रक्त, मांस 
एवं वसा से प्रीति रहती है, दोनों ही अंधकार या रात्रि को पसन्द करते हैं। ये धूप, 
सूर्य, अग्नि एवं धूम से भागते हैं।' 

चरकः* एवं सुश्रुत* ने इसे “भूत-विद्या” एवं अष्यांग-संग्रह" और अष्टांग हृदयः ने 
इसे 'गृह-चिकित्सा” नाम दिया है। सुश्रुतानुसार जिस अंग में देव, दैत्य (असुर), 
गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृ, पिशाच, नागधारि ग्रहों से पीड़ित चित वाले रोगियों के शांति 
के लिये शांति कर्म, बलि-प्रदान एवं ग्रहोपशमनार्थ वर्णन होता है वह भूत-विद्या है। 
“भूतविद्यानामदेवासुरगन्धर्वयक्षरक्ष: पितृषिशाचनागग्रहादूयुपसृष्ट चेतसां शान्ति कर्म 
बलिहरषादि ग्रहोपशमनार्थम्‌ ।* 

इसी प्रकरण में रोगों की मन्त्र, हवन चिकित्सा आदि भी प्रतिपादित है। चरक ने 
देवव्यपाश्रय,” युक्ति व्यपाश्रय एवं सत्वावजय भेद से तीन प्रकार की औषधि का 
निर्देश किया है। इनमें से दैव व्यपाश्रय के अन्तर्गत मन्त्र, औषधि, मणि-धारण, 
मंगल-कर्म, बलि-उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात, 
तीर्थ-गमन आदि का सन्निवेश होता है। युक्तिव्यपाश्रय में ओषध-चिकित्सा आती है। 
मन को ततद विषयों से हटाकर स्थिर करना सत्वावजय है। 

इसके अतिरिक्त सुश्रुत ने अमानुषोपसर्ग प्रतिषेध, अपस्मार, प्रतिषेध एवं उन्माद 
प्रतिषेध को भी भूत-विद्या के अन्तर्गत माना है।* 


468 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


प्रथम परिच्छेद 

मणि बन्धन (डोरा, गण्डा, ताबीज आदि) 

रामायण एक सागर है जिसमें विविध प्रकार के तत्व दृष्टि-गोचर होते हैं। 
चिकित्सा की दृष्टि से मणि, डोरा, गण्डा, ताबीज आदि का भी प्रयोग किया जा सकता 
है। ऐसा रामायण-कार का मत है। रामायण में बहुत से ऐसे पात्र हैं जो सामान्य पात्र 
होने के साथ-साथ युद्ध-चिकित्सक तथा अन्य चिकित्सा कार्य में कुशल भी थे जैसे- 

क्षत्राणी होने के नाते माता कौशल्या को भी यह ज्ञान था कि युद्ध में या 
आकस्मिक आघात के पश्चात्‌ कौन-सी दिव्य-औषधि उपादेय होती है। संभव है यह 
ज्ञान उन्हें राजा दशरथ के द्वारा या राजकीय अन्य सफल चिकित्सकों के द्वारा ही 
प्राप्त हुआ हो । अपने पुत्र श्री राम के वगगमन के समय उन्होंने उनके लिये हृदय से 
मंगल-कामना व्यक्त की। उस विशाल-लोचना माता ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत, 
चंदन और रोली लगायी तथा सिद्ध (सफलता) करने वाली विशल्यकरणी नामक 
शुभ-ओषधि लेकर अपने पुत्र की रक्षा के उद्देश्य से मन्त्र पढ़ते हुए उसको (दिव्य ओषधि 
को) श्री राम के हाथ में बाँध दिया और उसके गुणों में उत्कर्ष लाने के लिए मन्त्र का 
जप भी किया ।* 

रामायण में विविध मणियों का भी वर्णन किया गया है यथा-वैदूर्य-नीलम,/* 
वज्र-हीरा,” स्फटिक,” मुक्ता-मोती,” शंख,'* प्रवाल-मूंगा,” इन्द्र-नील'', महानील,” 
विद्वुम-प्रवाल,* कांचन-मणि-दिव्य-मणि,' शुक्ति,” कौस्तुभ,” स्निग्धा,” इन्द्रनील,? 
मणिवर-पुखराज*। 

रामायण में उल्लिखित सभी प्रकार के रत्न विविध धातुओं तथा अन्य स्वतंत्र रूप 
से शरीर पर धारण करने से विभिन्‍न प्रकार के रोगों में लाभकारी सिद्ध होते हैं जैसे 
अंगूठी में रलल जड़कर पहनना या हार इत्यादि के रूप में रतन धारण करना। इनकी 
रोग दूर करने की प्रक्रिया इस प्रकार है कि रत्न से निकलने वाली किरणें जब व्यक्ति 
के शरीर का स्पर्श करती हैं तो अवश्य ही अपना सकारात्मक प्रभाव डालती हैं और 
रोग को दूर करती हैं। 


द्वितीय परिच्छेद 
अभिमार्जन (झाड़ा, फूंका आदि) 
श्री राम ने प्रजाजनों के आक्षेपों से तंग आकर उनका समाधान करने की दृष्टि 
से सीता को वन में भेज दिया। इस अवसर के कुछ दिन पूर्व जब श्री राम ने गर्भिणी 
सीता से पूछा कि तुम्हारा क्या दोहद (गर्भकाल की इच्छा) है तब उन्होंने बताया कि 
मैं ऋषियों के पावन आश्रम में जाकर उनके दर्शन करना चाहती हूँ। इसका उत्तर देते 
हुए श्री राम ने कहा ऐसा ही होगा। फलतः एक दिन सीता को वाल्मीकि के आश्रम 


वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 469 


के पास लक्ष्मण छोड़ आये। मधु (राक्षस) पर विजय प्राप्त करने के लिये शत्रुघ्न मुनि 
वाल्मीकि के आश्रम में पधारे। वाल्मीकि से सत्संग तथा कथा वार्ता करते हुए उन्हें 
पर्याप्त रांत्रि बीत गयी। इसके बाद ज्यों ही शत्रुघ्न ने उस रात शयन के लिये वहाँ 
की एक पर्ण-शाला में प्रवेश किया, सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। यह संदेश कुछ 
मुनिकुमारों ने, ऋ्षषि वाल्मीकि जी को उनके पास आकर दिया और कहा,-भगवन ! 
श्री रामं-चन्द्र जी की धर्म-पत्नी सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया है। अतः महातेजस्वी 
महर्षे ! आप उनकी बाल-ग्रह जनित बाधा की निवृत्ति करें।” 
उन कुमारों की इस बात को सुनकर महर्षि उस स्थान पर गये। सीता के वे दोनों 
ही पुत्र बाल-चन्द्रमा के समान सुंदर तथा देव-कुमारों के समान तेजस्वी थे। वाल्मीकि 
मुनि ने सूतिकागार में प्रवेश किया और प्रसन्‍न-चित्त होकर उन दोनों कुमारों को देखा, 
तथा उनके लिये भूतों और राक्षसों का विनाश करने वाली रक्षा व्यवस्था की ।” महर्षि 
वाल्मीकि ने कुशाओं का मुठूठा और उनके लव लेकर उनके द्वारा उन बालकों की 
भूत-बाधा का निवारण करने-के लिये रक्षा-विधि का उपदेश किया। 
: यस्‍्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैमंत्र सत्कृतैः। 
निमर्जिनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत्‌।। 
याश्चातरो भवेत्‌ ताभ्यां लवेन सुसमाहितः। 
निर्मार्जनीयो वृद्धाभिः लवेति च से नामतः। 7 
मुनि ने कहा-“वृद्धा स्त्रियों को चाहिये कि इन दोनों ही कुमारों में जो पहले 
जन्मा है उसका मंत्रों द्वारा संस्कार किये हुए इन कुशों से मार्जन करें। ऐसा करने पर 
उस बालक का नाम कुश होगा और जो छोटा है उसका लव से मार्जन करें, उससे 
उसका नाम लव होगा। इस प्रकार वे यमज सन्तान क्रमशः कुश तथा लव के नाम 
धारण करेंगे और मेरे द्वारा निश्चित किये गये इन्हीं नामों से भूमण्डल में विख्यात 
होंगे।? 
यह सुनकर निष्पाप वृद्ध स्त्रियों ने एंकाग्रचित्त होकर मुनि के हाथ से रक्षा सांधन 
भूत उन कुशों को ले लिया और उनके द्वारा उन दोनों ही बालकों का मार्जन (शुद्धि 
करण) एवं संरक्षण किया। जब वृद्धा स्त्रियाँ इस प्रकार रक्षा करने लगीं उस समय 
आधी रात को श्री राम तथा सीता के नाम गोत्रोच्चारण की ध्वनि शत्रुघ्न के कानों में 
पड़ी। साथ ही उन्हें सीता के दो सुंदर पुत्र होने की सूचना भी प्राप्त हुई, तब वे सीता 
की पर्ण-शाला में गये और बोले-माता जी सौभाग्य की बात है ।* 
रामायण के. उपरोक्त प्रसंग से निम्न बातें स्पष्ट हो जाती हैं- 
. नवजात बालकों में बाल-ग्रहन्‍जनित बाधाएँ सहज ही उत्पन्न हो जाती हैं। 
2., इन बाल-ग्रह जनित बाधाओं का निवारण तत्काल ही आवश्यक है। 
5. उपरोक्त बाल-प्रह रोगों के अलावा भूत-बाधा तथा राक्षसी बाधा भी बालकों को 
शीघ्र ही आक्रान्त.कर सकती है। 
470 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


4. महर्षि वाल्मीकि ने उपरोक्त तीनों प्रकार की बाधाओं के रोक-थाम का प्रबन्ध 
उन मंत्र-पूत कुशों तथा लवों के मार्जन द्वारा कर दिया। 

5. इस कार्य में उन्होंने इस कार्य में अनुभव रखने वाली वृद्ध स्त्रियों का सहयोग 

लिया। 
6. उपरोक्त रक्षा व्यवस्था के बाद रोग उत्पन्न होने का बालकों में भय नहीं रहता। 

उपरोक्त प्रसंग में उल्लिखित बाल-ग्रह बाधा तो आज भी अस्पष्ट है। हाँ 
भूत-बाधा राक्षस बाधा का अर्थ रोगोत्पादक कीटाणुजनित रोगों में किया जा सकता है। 

आयुर्वेद में भूत-विद्या का स्पष्टीकरण करते हुए सुश्रुत ने कहा है- 

“अमानुषः निषेधश्च तथापस्मारिकोष्धरः। 
उन्मादः प्रतिषेधश्च भूत-विद्या निरुच्यते।।””* 

अमानुषोपसर्ग प्रतिषेध, अपस्मार प्रतिषेध, उन्माद प्रतिषेध ये भूत-विद्या हैं। इसी 
ग्रन्थ के उत्तर तन्त्र में- 

ग्रहसंज्ञानि भूतानि यस्माद्वत्यनया भिषक्‌ | यस्माद्वत्यानया विषया भूत-विद्या त्वमतएव 
निरुच्यते /” इन भूतों की संख्या अनन्त मानी गयी है-असंख्येया ग्रहगणा 
ग्रहाधिपतयेस्तुये ” परन्तु इनकी जाति निम्न मानी गयी हैं-देव, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, 
राक्षस, पितर, पिशाच, नाग, इत्यादि। इनमें ग्रह्मदि (बाल-ग्रह) रोग, बालकों पर अपना 
मारक अधिकार तुरन्त कर लेता है। देव से नाग तक के आठ ग्रह लिखे हैं, वे देव 
ग्रह मनुष्यों के स्थूल त्रिदोषादि प्रतिष्ठित शरीर को न पकड़कर '"सूक्ष्म त्रिगुणात्मक' 
मन को पकड़ते हैं और अनेक प्रकार के मानसिक विकारों को उत्पन्न करते हैं। परन्तु 
बालकों पर इनका प्रभाव पृथक्‌ विधि से होता है। 

भूत विद्या नाम देवासुर गन्धर्व यक्ष रक्ष पितर पिशाच, नाग ग्रहग्रहोपसृष्ट चेतसां 
शान्ति कर्म बलिहरणादि ग्रहोपशमनार्थम्‌ ।? 

इनका आक्रमण-अशुचिर्भिन्नं मर्यदें क्षतं वा यदि वाउक्षतम्‌। 

हिंस्यु हिंसा विहारार्थ संस्कारार्थ मथापिवा। तेतु संतापिता आत्मवन्तं न हिंस्यु:। 
विशन्ति च न दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणाम्‌। 

ब्रणों के द्वारा तथा बिना व्रणों के भी इनका आक्रमण हो सकता है। इनका प्रधान 
कारण अशुचि है। इनका विसर्पण दिखता नहीं हैं। इस प्रकार आयुर्वेद में इन भूतों के 
तथा राक्षसों के (जो रक्त पीने वाले तथा प्राण हरने वाले होते हैं) दो प्रकार माने गये 
हैं। प्रथम बड़े आदमियों के मन पर प्रभाव डालने तथा दूसरे बालकों पर आक्रमण 
करने वाले | बालकों पर आक्रमण करने वाले इन भूतों तथा बाल-पग्रहों का प्रतिकार भी 
है। इनकी चिकित्सा भी है। उपरोक्त प्रसंग में मुनि वाल्मीकि ने जो लिखा है यह सब 
उसी को समर्थन देता है। आयुर्वेद में उनके प्रतिकार के लिये मंत्र-पूत जलसे स्नान, 
धूप आदि की व्यवस्था की है-जैसा कि मुनि ने वृद्धा स्त्रियों को बुलाकर आदेश दिया 


था। उन्होंने मंत्रों द्वारा संस्कार किये हुए कुशों द्वारा नव-जात-शिशु का मार्जन 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 47 





कराया। सुश्रुत ने भी एक स्थान पर संक्रमण निषेध की औषधियों का उल्लेख करते 
हुए सिर पर धारण करने के लिये सहश्रवीर्या (श्वेत दूर्वा, दूर्वा) द्रव्य का प्रयोग किया 
है | 

आयुर्वेद में ऐसा निर्देश है कि अमुक मंत्र पढ़कर बालक के सिर पर हाथ रखते 
हुए उसे स्नान करावें। 

अनेक मंत्र-तंत्र धूप-जल आदि के उल्लेख आयुर्वेद में प्राप्त हो सकते हैं जिनके 
द्वारा बालकों को भूत-व्ययस्था, भूत-बाधा ग्रह-बाधा से म्रुक्त कराया जा सकता है। 
रामायण में भी इसी के आधार पर मुनि वाल्मीकि ने वर्णन किया है जिसके द्वारा सीता 
के नवजात शिशु लव तथा कुश की रोग-निरोधक चिकित्सा की गयी है। 


तृतीय परिच्छेद 
कृत्या (प्रयोग एवं अपहरण आदि) 
कृत्या से तात्पर्य तन्त्र-शास्त्र के विशद्‌ रूप से ही लिया जा सकता है जिसे हम 
सामान्य भाषा में जादू, टोने टोटके आदि कह सकते हैं। 
रामायण में मंत्र-तंत्र का तो कई स्थलों पर उल्लेख किया गया है तथा राक्षसी 
माया का भी उल्लेख मिलता है किन्तु इसका टोने, टोटके के रूप में कहीं भी उल्लेख 
नहीं किया गया। 
!! चतुर्थ परिच्छेद 
मंत्र 
“मंत्र” शब्द का अर्थ असीमित है। वैदिक ऋचाओं के प्रत्येक छन्द भी मंत्र कहे 
जाते हैं तथा देवी-देवताओं की स्तुतियाँ व यज्ञ हवन के निमित्त निश्चित किये गये 
शब्द-समूहों को भी म्रंत्र कहा जाता है। तन्त्र-शास्त्र में मंत्र का भिन्‍न अर्थ है। 
तन्त्र-शास्त्र के अनुसार मंत्र उसे कहते हैं-'जों शब्द पद या पद समूह जिस-जिस 
देवता या शक्ति को प्रकट करता है वह उस देवता या शक्ति को मंत्र कहा जाता है। 
दूसरे रूप में हम मंत्र की परिभाषा इस प्रकार भी कह सकते हैं कि निश्चित वर्ण-समूह 
द्वारा उच्चारित ध्वनि को मंत्र कहते हैं। जिसे हम उच्चारण करते हैं अथवा उन वर्ण 
समूहों से निर्मित वाक्य जो कि अपना प्रभाव दिखाते हैं उन्हें मंत्र कहते हैं ।॥ 
कतिपय विद्वजनों द्वारा मंत्र की परिभाषाएँ निम्नलिखित प्रकार भी की गयी हैं- 
]. धर्म, कर्म, और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं। 
2. देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्ट देव की कृपा को मंत्र कहते हैं। 
3. दिव्य शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को मंत्र कहते हैं। 
4. विश्व में व्याप्त गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या को, 
... मंत्र कहते हैं। 
* 5. गुप्त शक्ति को विकसिंत करने वाली विद्या को मंत्र कहते हैं। 


472 » वाल्मीकि रामायण्‌ तथा आयुर्वेद 


इस प्रकार से मंत्र के अनेक अर्थ हैं। 
मंत्र-तन्त्र को यदि एक दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार कहा जा संकता है- 
. जो शब्द या पद-समूह जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है वह उस देवता 
या शक्ति का मन्त्र कहा जाता है। 
2. निश्चित वर्ण-समूह द्वारा उच्चारित ध्वनि को मन्त्र कहते हैं। 
3. उन वर्ण-समूहों से निर्मित वाक्य जो कि अपना विशेष प्रभाव दिखाते हैं उन्हें मंत्र 
कहते हैं। 
4. मन्त्रों में स्थित भिन्‍न-भिन्‍न देवताओं के भिन्‍न-भिन्‍न संकेत होते हैं। 
5. एक इष्ट के लिये एक ही मन्त्र अपरिवर्तनीय होता है जबकि स्तोत्र अनेकों व 
परिवर्तित हो सकते हैं। 
6. मन्त्र सिद्धि हेतु गुरु का होना नितान्त आवश्यक है। 
7. गुरु कृपा से प्राप्त मन्त्र को गुप्त रखना चाहिये। 
8. गुरु की महानता, श्रेष्ठता, सर्वोपरि व निर्विवाद है। 
9. साधक को अपने मन तथा इन्द्रियों पर सदा ही नियन्त्रण बनाये रखना चाहिये तभी 
साधना में सफलता मिलती है अन्यथा नहीं। 
0. तन्त्र-शास्त्र, मन्त्र-शास्त्र का ही उपजीव्य है। 
7. तन्त्र का मूलाधार मन्त्र है। 
2. मन्त्र और यन्त्र के द्वारा कार्य करने की विधि को तन्‍्त्र कहते हैं। 
3. तन्त्र-विज्ञान प्रायः गुप्त रखने वाला विज्ञान बनकर रह गया है। 
4. तन्त्र-शास्त्र में मन्त्र सिद्धि के लिये तीन बातें आवश्यक होती हैं-- ।. काल 
2. द्रव्य 3. शब्द। # 
5. यन्त्र-विद्या भी मन्त्र साधना का एक अंग है। 
6. तन्त्र आराधना का मार्ग है तो यन्त्र उनका प्रभावशाली मार्ग है। 
7. मन्त्र साधक व ईश्वर को मिलाने में मांध्यम का कार्य करता है। 
8. मंत्रों की शक्ति का स्फुरण साधक की अन्तश्चेतना के माध्यम से होता है। 
9. दीक्षा एक शक्ति व तेज का समूह है। कं 
20. गुरुदीक्षा रूपी अमूल्य व महान शक्तिदान की तुलना में कोई अन्य दान नहीं 
होता। ४ 
2. कुछ विद्वानों के अनुसार (साधकों) जप काल में इन्द्रियों को संयमित रखने- 6 
साथ-साथ म॑न को भी नियंत्रित रखना अति आवश्यक है। 
22. साधक को मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भक्ति व विश्वास का होना आवश्यक है अन्यथः 
मंत्र-सिद्धि कठिन ही नहीं अपितु दुर्लभ है। 
23. साधन काल में साधक को आवश्यकं दिनचर्या का पालनीय नियम पालन करना 
आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है। 


वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 473 


वाल्मीकि रामायण में कई स्थलों पर विभिन्‍न मंत्रों का नामोल्लेख आता है। किन्तु 
यहाँ मंत्रों से तात्पर्य चिकित्सा हेतु है अर्थात्‌ मंत्र-तंत्र द्वारा किस प्रकार चिकित्सा कार्य 
सम्भव है। 

मुनि विश्वामित्र ने श्री राम को बला तथा अतिबला नाम से प्रसिद्ध मंत्र प्रदान 
किये, ये मंत्र श्री राम को श्रम, ज्वर, (रोग या चिन्ता) तथा रूप विकृति आदि से 
बचाने वाला बताया गया है।* मुनि ने कहा 'बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस 
मंत्र समुदाय को ग्रहण करो इसके प्रभाव से तुम्हें कभी श्रम का अनुभव नहीं होगा। 
ज्वर नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलट-फेर नहीं होने 
पायेगा! इसके अतिरिक्त मुनि ने इन दोनों मत्रों के गुणों का वर्णन करते हुए श्री राम 
से इस प्रकार कहा- 

सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण 
नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबंल में तुम्हारी समानता करने वाला कोई न 
होगा ।* तात ! रघुकुल नन्दन राम बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों 
लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायेगा /* अनघ! सौभाग्य, चातुर्य; ज्ञान और 
बुद्धि सम्बन्धी निश्चय में तथा.किसी के प्रश्न का उत्तर देने में भी कोई तुम्हारी तुलना 
नहीं कर सकेगा।” 

इन दोनों विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा, 
क्योंकि यह बला और अतिब॒ला नामक विद्याएँ सब प्रकार के ज्ञान की जननी हैं।* 

नरश्रेष्ठ श्री राम ! तात रघुनन्दन बला और अतिबला का अभ्यास कर लेने पर 
तुम्हें भूख-प्यात का भी कष्ट नहीं होगा। रघुकुल को आनन्दित करने वाले राम तुम 
सम्पूर्ण जगत की रक्षा के लिये इन दोनों विद्याओं को ग्रहण करो।* 

इन लेनों विद्याओं का अध्ययन कर लेने पर भूतल पर तुम्हारे यश का विस्तार 
होगा। यह दोनों विद्याएँ ब्रह्मा जी की तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं।* 

काकुत््थनन्दन ! मैंने इन दोनों को तुम्हें देने का विचार किया है। राजकुमार! 
तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्या को प्राप्त करने के बहुत से गुण 
हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबल से 
इसका अर्जन किया है अतः मेरी तपस्या से परिपूर्ण होकर यह तुम्हारे लिये बहुरूपणी 
होगी अनेक प्रकार के फल प्रदान करेगी।" " 

तब श्री राम ने पवित्र होकर यह विद्याएँ ग्रहण कीं“ विद्या से सम्पन्न होकर 
भयंकर पराक्रमी श्री राम सहम्नों किरणों से युक्त शरत्कालीन भगवान सूर्य के समान 
शोभा पाने लगे।४ 

बला और अतिबला नामक मंत्रों के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का भी रामायण में 
उल्लेख आता है जो सभी प्रकार के सुखदायक फलों का प्रदाता है।४ महर्षि का परम 
उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया 

474 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


और फिर वे परम उत्तम जपनीय मंत्र “गायत्री” का जप करने लगे। 

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रामायण में मंत्र-तंत्र द्वारा चिकित्सा का उल्लेख किया 
गया है। हे 
आशीर्वाद 

वाल्मीकि रामायण में आशीर्वाद के बल से रोगों को दूर करने का उल्लेख प्राप्त 
होता है जो वास्तव में अपनें दोहरे स्वरूप को प्रदर्शित करता है। प्रथम-आशीर्वाद के 
बल से रोग दूर होनां और द्वितीय यौन-परिवर्तन (उभयलिंगी व्यक्तित्व) एक पुरुष 
धीरे-धीरे परिवर्तन करता. हुआ स्त्री बन जाता है तथा दूसरी स्त्री दैहिक परिवर्तन को 
पार करती हुई पुरुष वन जाती है, यह विषय जिस प्रकार देखने में रोचक हैं उसी 
प्रकार पढ़ने में भी उतना ही रोचक है। 

रामायण में भी उद्ली प्रंकार की रोचक कथा उपस्थित की गयी है जो पठनीय है। 
वैज्ञानिक दृष्टि से भी इस कथा का महत्व कम नहीं है। श्री राम ने लक्ष्मण से कहा, 
“नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! पूर्व काल में प्रजापति कर्दम के पुत्र श्री मान्‌ इल्वाहीक देश के राजा 
थे। वे बड़े धर्मात्मा थे। वे महा-यशस्वी राजा सारी पृथ्वी को अपने व्यवहार से वश 
में करते हुये प्रजा का पुत्र की तरह पालन करते थे। परम-उदार देवता, महाधर्म धनी 
दैत्य, नाग, राक्षस, गन्धर्व और महामनस्वी यक्ष ये सब भयभीत होकर सदा राजा इल 
की स्तुति-पूजा करते रहते थे तथा उन महात्मा नरेश के रुष्ट हो जाने पर तीनों लोकों 
के प्राणी भय से थर्रा उठते थे, ऐसे प्रभावशाली होने पर भी वाल्हीक देश के स्वामी 
महा-यशस्वी परम उदार राजा इल धर्म और पराक्रम में दृढ़ता-पूर्वक स्थित रहते थे 
और उनकी बुद्धि भी स्थित रहती थी। एक समय सेवक, सेना और सवारियों सहित 
उन महाबाहु नरेश ने मनोरम चैत्रमास में एक सुंदर वन में शिकार खेलना आरम्भ 
किया। राजा ने उस वन में सैकड़ों हजारों हिंसक जन्तुओं का वध किया किन्तु इतने 
जन्तुओं का वध करने पर भी उन महा मनस्वी नरेश को तृप्ति नहीं हुई, फिर उन 
महामना इल के हाथ से नाना प्रकार के दस हजार हिंसक जन्‍्तु मारे गये। पश्चात्‌ ये 
उस प्रदेश में गये जहाँ स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ था। उस स्थान पर देवताओं 
के स्वामी दुर्जय देवता भगवान शिव अपने समस्त सेवकों के साथ रहकर गिरिराज 
कुमारी उमा का मनोरंजन करते थे। जिनकी ध्वजा पर वृषभ चिन्ह सुशोभित होता था, 
वे भगवान उमा-वल्लभ अपने आप को भी स्त्री रूप में प्रकट करके देवी पार्वती का 
प्रिय करने की इच्छा से वहाँ के पर्वतीय झरने के पास उनके साथ विहार करते थे। 
उस वन के विभिन्‍न भागों में जहाँ पुल्लिंग नाम धारी जन्तु अथवा वृक्ष थे वे सब के 
सब स्त्रीलिंग में परिवर्तित हो गये थे। वहाँ जो कुछ भी चराचर प्राणियों का समूह था 
वे सब स्त्री नामधारी हो गया। उसी समय कर्दम के पुत्र राजा इल सहस्नों हिंसक 
पशुओं का वध करते हुए उस देश में आ गये। वहाँ आकर उन्होंने देखा-सर्प, पशु 


और पक्षियों सहित उस वन का सारा प्राणी समुद्दाय स्त्री-रूप में हो गया है। सेवकों 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 475 


सहित अपने आपको भी उन्होंने स्त्री रूप में परिणित हुए देखा। अपने आपको उस 
अवस्था में देखकर राजा को बड़ा दुःख हुआ यह सारा कार्य उमा-वल्लभ महादेव जी 
की इच्छा से हुआ यह जानकर वह भय भीतः हो उठे। तदन्तर सेवक, ज़ेना और 
सवारियों सहित राजा इल जटा-जूट धारी मंहात्मा भगवान नील-कण्ठ की शरण में 
गये। तब पार्वती देवी के.साथ विराजमान वरदायकदेवता महेश्वर हंसकर प्रजापति इल 
से स्वयं बोले-”कर्दम कुमार महाबली राजर्षि उठो-उठो। उत्तम व्रत का पालन करने 
वाले सौम्य “नरेश! पुरुषत्व छोड़कर जो चाहो वह माँग लो / भगवान शंकर के इस 
प्रकार पुरुषत्व देने से इंकार कर देने पर स्त्री रूप हुए राजा इल शोक से व्याकुल हो 
गये। उन्होंने उन सुर श्रेष्ठ महादेव जी से दूसरा वर ग्रहण नहीं किया। तदन्तर महान्‌ 
शोक से पीड़ित राजा ने गिरि कुमारी उमा देवी के चरणों में सम्पूर्ण हृदय से प्रणाम 
करके यह प्रार्थना कि सम्पूर्ण वरों की अधीश्वरी देवी आप मानिनी हैं। समस्त लोकों 
को वर देने वाली हैं। देवि! आपका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता। अतः आप अपनी 
सौम्य दृष्टि से मुझ पर अनुग्रह कीजिये। राजर्षि इल के हृदय के अभिप्राय को जानकर 
रुद्रप्रिया देवी पार्वती ने महादेव जी के समीप यह शुभ बात कही- “राजन्‌! तुम पुरुषत्व 
प्राप्ति रूप जो वर चाहते हो, उसके आधे भाग के दाता तो महादेव जी हैं औरःआधा 
वर तुम्हें मैं दे सकती हूँ इसलिये तुम मेरा दिया हुआ आधा वर स्वीकार करो। तुम 
जितने-जितने काल तक स्त्री और पुरुष रहना चाहो, उसे मेरे सामने कहो | देवी 
पार्वती का यह परम्‌ उत्तम वर और अत्यन्त अद्भुत वर सुनकर राजा इल के मन में 
बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले, "देवी ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं एक 
मास तक भूतल पर अनुपम रूपवती स्त्री के रूप में रहकर, फिर एक मास तक पुरुष 
होकर रहूँ।” राजा के मनोभावों को जानकर सुंदर मुख वाली पार्वती देवी ने यह शुभ 
वचन कहा-ऐसा- ही होगा। राजन्‌ ! जब तुम पुरुष रूप में रहोगे उस समय तुम्हें 
अपनी स्त्री जीवन की याद नहीं रहेगी और जब तुम स्त्री रूप में रहोगे तो उस समय 
तुम्हें एक मास तक अपने पुरुष अभाव का स्मरण नहीं होगा। इस प्रकार कर्दम कुमार 
राजा इल एक मास तक पुरुष रहकर फिर एक मास त्रिलोक सुंदरी नारी इला के रूप 
में रूँचे लगे।४ 

पु सोमपुत्र बुध के यहाँ एक वर्ष तक निवास करने के पश्चात्‌ तथा 
सोमपुत्र बुध तथा इला द्वारा पुरुकुवा की उत्पत्ति होने के पश्चात्‌ इला ने क्यों किया ? 
ठीक-ठींक़ बताने की कृपा करें, यह प्रश्नं भरत और लक्ष्मण ने श्री राम से किया। श्री 
राम ने इस पर आगे कहना प्रारम्भ किया, शूरवीर इल जब एके मास के लिये पुरुष 
भाव क्रो; प्राप्त हुए तब परम्‌ बुद्धिमान, महायशस्वी बुध ने परम्‌ उदार महात्मा सम्बर्त 
को बुलाया। भूृगुपुत्र, च्यवन, अरिष्टनेमि, प्रमोदन और दुर्वासा को भी आमंत्रित 
किया.। इन सबसे बुध ने कहा, यह महाबाहु राजा इल प्रजापति कर्दम के पुत्र हैं, 
*इनक्की जैसी स्थिति है, इसे आप सब लोग जानते हैं। अतः इस विषय में ऐसा कोई 

476 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


उपाय कीजिये, जिससे इनका कल्याण हो, वे इस विषय में इस प्रकारःकी बात॑-चीत 
कर रहे थे कि महात्मा द्विजों के साथ महातेजस्वी प्रजापति कर्दम भी उस आश्रम पर 
आ पहुँचे, उनके साथ ही साथ पुलरूब, कृतु, वषटकार तथा महा तेजस्वी ओ5्मकार 
भी इस आश्रम पर आ पहुँचे। परस्पर मिलने पर वे सभी महर्षि प्रसन्‍नचित्त हो वाल्हीक 
देश के स्वामी राजा इल का हित चाहते हुए भिन्न-भिन्न प्रकार का परामर्श देने लगे। 
कर्दम ने पुत्र के लिये अत्यन्त हितकर बात कही । ब्राह्मणो ! आप लोग मेरी बात सुनो 
जो इस राजा के लिये कल्याण-कारिणी होगी। मैं भगवान शंकर के अतिरिक्त किसी 
अन्य को ऐसा नहीं देखा जो इस रोग की दवा कर सके तथा अश्वमेध यज्ञ से बढ़ 
कर कोई ऐसा यज्ञ नहीं है जो महात्मा महादेव को प्रिय हो। अतः हम सब लोग इल 
के हित के लिये उस दुष्कर यज्ञ का अनुष्ठान करें, कर्दम के ऐसा कहने पर उन सभी 
श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने भगवान रूद्व की आराधना के लिये उस यज्ञ का अनुष्ठान ही अच्छा 
समझा। साम्बर्त के शिष्य तथा शत्रु नगरी पर विजय पाने वाले सुप्रसिद्ध राजर्षि मरुत 
ने इस यज्ञ का आयोजन किया। फिर तो बुध के आश्रम के निकट वह महान यज्ञ 
सम्पन्न हुआ। तथा इससे महा-यशस्वी रुद्र देव को बड़ा संतोष प्राप्त हुआ। यज्ञ 
समाप्त होने पर परमानन्द से परिपूर्ण चित हुए भगवान उमापति ने इल के पास ही 
उन सब ब्राह्मणों से कहा, द्विज श्रेष्ठ गण ! मैं तुम्हारी भक्ति तथा इस अश्वमेघ यज्ञ 
के अनुष्ठान से बहुत प्रसन्‍न हूँ। बताओ मैं वाल्हीक नरेश इल का कौन सा शुभ एवं 
प्रिय कार्य करूँ। देवेश शिव के ऐसा कहने पर वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित होकर उन 
देवाधिपति को इस तरह प्रसन्‍न करने की चेष्टा करने लगे, इससे नारी इला को सदा 
के लिये पुरुषत्व प्रदान कर दिया, और ऐसा करके ही वे वहीं अन्तर्ध्यान हो गये। 
अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने पर जब महादेव दर्शन देकर अदृश्य हो गये तब सभी दीर्घ 
दर्शी ब्राह्मण भी जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। राजा इल ने वाल्हीक देश को दोड़कर 
मध्य प्रदेश में एक उतम एवं यशस्वी नगर बसाया जिसका नाम था प्रतिष्ठानपुर तथा 
शशबिन्दु ने वाल्हीक देश का राज्य ग्रहण किया।४ 

उपरोक्त प्रसंग को केवल धर्म तथा चमत्कार तथा केवल कहानी के रूप में 
स्वीकार न कर हमें वैज्ञानिक दृष्टि से देखना चाहिये। किसी स्थान विशेष में जलवायु 
के प्रभाव से या किसी खाद्य-औषधि के प्रभाव से मनुष्य (पुरुष) स्त्रीत्व को प्राप्त कर 
लेता है। पूर्ण नारीत्व प्राप्त न होकर वह पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व के बीच में झूलता रहता 
है, परन्तु अश्वमेध यज्ञ के प्रभाव से या आद्य-चिकित्सक महादेव के प्रताप से किसी 
विशेष प्रकार की खाद्य सामग्री द्वारा या औषधि चिकित्सा के चमत्कार से उसे पुनः 
स्थायी रूप से पुरुषत्व की प्राप्ति हो जाती है। 

वास्तव में आशीर्वाद के बल से रोग दूर करना अत्यन्त ही कठिन एवं दुष्कर कार्य 
है जहाँ तक यौन-परिवर्तन का प्रश्न है, वह भी बड़ा ही आश्चर्य जनक, कौतूहल-प्रद 


वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 477 


तथा निराशाजनक भी है। यह भी स्पष्ट है कि इसकी चिकित्सा भी उतनी ही कठिन 
तथा कृच्छ साध्य है। सुयशस्वी चिकित्सक ही इसकी चिकित्सा करने में समर्थ हो 
सकते हैं। 
पुन्रेष्टि-यज्ञ 

मनुष्य ईश्वर का एक बुद्धि प्रधान सृजन है। सृष्टि में आकर मनुष्य अपनी बुद्धि 
द्वारा जीवन यात्रा को सुगमता तथा साधन युक्त बनाता है अपने जीवन काल में 
उसकी तीन एषणाएँ मुख्य रहती हैं। इन तीनों एषणाओं को प्राणैषणा, धनैषणा तथा 
परलोकैषणा के नाम से पुकारा जाता है। पूर्व की दो एषणायें एहलौकिक होती हैं और 
अन्तिम तीसरी एषणा परलोक यात्रा से सम्बन्धित रहती है। इन तीनों ही एषणाओं 
के लिये उसे जीवन भर प्रयत्न करना पड़ता है। पूर्व दोनों ही एषणाएँ जीवन में ही 
फल देती हैं, परन्तु तीसरी एषणा (परलोक) जीवन की इस अवधि के बाद फल-प्रद 
होती है। इसके लिये मनुष्य निरन्तर प्रयत्त करता रहता है। 

उपरोक्त इच्छाओं के बाद परन्तु इससे कम महत्वपूर्ण नहीं एक इच्छा और उसमें 
रहती है और वह है पुत्रैषणा। यद्यपि पुत्रैषणा को उपरोक्त तीनों एषणाओं में नहीं 
स्वीकार किया गया है फिर भी किसी भी प्रकार इसकी प्रधानता को अस्वीकार नहीं 
किया जा सकता। हर साधन सम्पन्न तथा ऐश्वर्यशाली पिता यह चाहता है कि उसका 
उत्तराधिकारी पुत्र उसके इस साधन का लाभ उठावे तथा उसके इस विशाल ऐश्वर्य 
का भोग करे। यही इच्छा ऐश्वर्यशाली दशरथ में पैदा हुई और उन्होंने यह निश्चय 
किया कि उन्हें पुत्र-प्राप्ति के लिये प्रयलल करना चाहिये। यह निश्चय कर राजा दशरथ 
गुरु वशिष्ठ के पास गये और उनसे सलाह माँगी। राजा ने गुरु की आज्ञा का पालन 
कर उन्हीं के सहयोग से ऋष्यश्रृंग के निर्देशन में पुत्रेष्टि यज्ञ करने का निश्चय किया। 

महात्मा ऋष्यश्रृंग बड़े मेधावी और वेदों के ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देर तक ध्यान 
लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर ध्यान से विरत हो वह राजा से 
इस प्रकार बोले--/ 

"महाराज ! मैं आपको पुत्र की प्राप्ति कराने के लिये अथर्ववेद के मंत्रों से 
'पुत्रेष्टि' नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधि के अनुसार अनुष्ठान करने पर वह यज्ञ 
अवश्य सफल होगा ।४ यह कहकर उन तेजस्वी ऋषि ने पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से 
पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौत विधि के अनुसार अग्नि में आहुति 
डाली । तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधि के अनुसार अपना-अपना 
भाग ग्रहण करने के लिये उस यज्ञ में एकत्र हुये /" समस्त जीवात्माओं को वश में 
रखने वाले भगवान विष्णु ने देवताओं की यह बात सुनकर अवतार काल में राजा 
दशरथ को ही पिता बनाने की इच्छा की ।* उसी समय वे शत्नुसूदन महातेजस्वी नरेश 
पुत्र-हीन होने के कारण पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से पुत्रेष्टि-यज्ञ कर रहे थे ॥* उन्हें पिता 
बनाने का निश्चय करके भगवान विष्णु पिता-मह की अनुमति ले देवताओं और 

478 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


महर्षियों से पूजित हो वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गये ।* तत्पश्चात्‌ पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए 
राजा दशरथ के यज्ञ में अग्नि कुंड से एक विशाल-काय पुरुष प्रकट हुआ। उसके 
शरीर में इतना प्रकाश था जिसकी कहीं तुलना. नहीं थी। उसका बल-पराक्रम महान 
था ।* उसके हाथ में तपाये हुए जम्बूनद नामक स्वर्ण की बनी हुई परात थी जो चाँदी 
के ढक्कन से ढकी हुई थी। वह (परात) बहुत बड़ी थी और दिव्य खीर से भरी हुई 
थी। उसे उस पुरुष ने अपनी दोनों भुजाओं पर इस तरह उठा रखा था, मानो कोई 
रसिक अपनी प्रियतमा पत्नी को अंग में लिये हुए हो। वह अदभुत परात मायामयी 
सी जान पड़ती, थी।” उसने राजा दशरथ की ओर देखकर कहा- “नरेश्वर ! मुझे 
प्रजापति लोक का पुरुष जानो। मैं प्रजापति की आज्ञा से ही यहाँ आया हूँ।?* 

तब राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर उसंसे कहा-“भगवन्‌ ! आपका स्वागत है। 
कहिये, मैं आपकी कया सेवा करूँ ?” फिर उस प्रजापत्य पुरुष ने पुनः यह बात कही- 
“राजन तुम देवताओं की आराधना करते हो, इसलिये आज तुम्हें यह वस्तु प्राप्त हुई 
है | नृप श्रेष्ठ! यह देवताओं की बनाई हुई खीर हैं, जो सन्तान की प्राप्ति कराने 
वाली है। तुम इसे ग्रहण करो। यह धन और आरोग्य की भी वृद्धि करने वाली है“ 
राजन! यह खीर अपनी योग्य पलियों को दो और कहो- “तुम लोग इसे खाओ' ऐसा 
करने पर उनके गर्भ से आपको अनेक पुत्रों की प्राप्ति होगी, जिनके लिये तुम यह यज्ञ 
कर रहे हो ।” राजा ने प्रसन्नता पूर्वक “बहुत अच्छा” कहकर उंस दिव्य पुरुष की दी 
हुई देवान्न से परिपूर्ण सोने की थाली को लेकर उसे अपने मस्तक पर धारण किया, 
फिर उस अदूभुत एव प्रिय-दर्शन पुरुष को प्रणाम करके-बड़े आनन्द के साथ उसकी 
परिक्रमा की ।” इस प्रकार देवताओं की बनाई उस खीर को पाकर राजा दशरथ बहुत 
प्रसन्‍न हुए, मानो निर्धन को धन मिल गया हो । इसके बाद वह परम तेजस्वी अद्भुत 
पुरुष अपना वह काम पूरा करके वहीं अन्तर्धान हो गया।” उस समय राजा के 
अन्तपुुर में स्त्रियाँ हर्षोल्लास से बढ़ी हुई कान्तिमयी किरणों से प्रकाशित हो दीक 
उसी तरह शोभा पाने लगीं, जसे शरत्काल के नयनाभिराम चन्द्रमा की रम्य रश्मियों 
से उद्भासित होने वाला आकाश सुशोभित होतः है। राजा दशरथ यह खीर लेकर 
अन्तःपुर में गये और कौशल्या से बोले, “देवि! यह अपने लिये पुत्र की प्राप्ति कराने 
वाली खीर ग्रहण करो” #* ऐसा कहकर नरेश ने उस समय खीर का आधा-भाग 
महारानी कौशल्या को दे दिया। फिर बचे हुए आधे का-आधा रानी सुमित्रा को अर्पण 
किया ।“ उन दोनों को देने के बाद जितनी खीर बच रही उसका आधा भाग तो 
उन्होंने पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से कैकयी को दे दिया। तत्पश्चात्‌ उल खीर का जो 
अवशिष्ट आधा भाग था, उस अमृतोपम भाग को महाबुद्धिमान नरेश ने कुछ 
सोच-विचार कर पुनः सुमित्रा को ही अर्पित कर दिया। इस प्रकार राजा ने अपनी सभी 
रानियों को अलग-अलग खीर बाँट दी।* 

महाराजा की उन सभी साध्वी रानियों ने उनके हाथ से वह खीर पाकर अपना 


वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 479 





सम्मान समझा। उनके चित्त में अत्यन्त हर्षोल्लास छा. गया।" उस उत्तम खीर को 
खाकर महाराज की तीनों साध्वी महारानियो ने शीघ्र पृथक-पृथक गर्भ धारण किया। 
उनके वे गर्भ अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी थे।” ,तदनन्तर अपनी उन रानियों 
को गर्भवती देख राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने समझा, मेरा मनोरथ 
सफल हो गया........... | 

महामना राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त होने पर देवता लोग अपना-अपना 
भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये ।* यज्ञ समाप्ति के पश्चात्‌ जब छः ऋतुएँ बीत 
गयीं, तब 2वें मास में चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क 
लग्न में कौशल्या देवी ने दिंव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोक वन्दित जगदीश्वर श्री राम 
को जन्म दिया। उस समय (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र) ये पाँच ग्रह 
अपने-अपने उच्च स्थानों में विद्यमान थे। तथा लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति 
विराजमान थे "वे विष्णु स्वरूप हविष्य या खीर के आधे भाग से प्रकट हुए थे। ये 
समस्त सदगुणों से सम्पन्न थे।” इसके बाद रानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को 
जन्म दिया। ये दोनों भगवान के अर्धभाग से सम्पन्न थे। इस प्रकार पुत्रेष्टि यज्ञ का 
वर्णन है। 
मंत्र द्वारा सर्प पकड़ना 

मंत्रों द्वारा सर्प पकड़ने का विशद्‌ वर्णन विभिन्‍न ग्रन्थों में प्राप्त होता है, किन्तु 
रामायण में गरुड़ को सर्प विष-चिकित्सा का चिकित्सक मानते हुए विशद्‌ वर्णन प्राप्त 
होता है। 

युद्ध के समय अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता तथा लक्ष्य भेद में कुशल देवताओं को 
बार-बार वाणों से आच्छादित करते हुये दानवों ने बहुत घायल कर दिया था।* उस 
युद्ध में जो देवता अस्त्र शस्त्र से पीड़ित, अचेत और प्राण-शून्य हो जाते थे, उन 
सबकी रक्षा के लिये बृहस्पति जी मंत्र-युक्त विद्याओं तथा दिव्य-औषधियों द्वारा 
उनकी चिकित्सा करते थे।” औषधियों को लाने के लिये वहाँ वार्ता चल ही रही थी 
कि बड़े जोर से वायु प्रकट हुई, मेघों की घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं 
व वायु सागर के जल में हलचल मचा कर पर्वतों को कम्पित सी करने लगी |“ गरुड़ 
के पंख से उठी हुई प्रचण्ड वायु ने सम्पूर्ण द्वीप के बड़े-बड़े वृक्षों की डालियाँ तोड़ डाली 
और उन्हें लवण समुद्र के जल में गिरा दिया ।” लंकावासी महाक्राय सर्प भय से थर्रा 
उठे। सम्पूर्ण जल जन्तु शीघ्रता-पूर्वक समुद्र के जल में घुस गये । तदनन्तर दो ही 
घड़ी में समस्त वानरों ने प्रज्यलित अग्नि के समान तेजस्वी विनतानन्दन गरुण को 
वहाँ उपस्थित देखा ।” उन्हें आया देख जिन महाबली नागों ने वाण के रूप में आकर 
उन दोनों महापुरुषों को बांध रखा था, वे सब के सब भाग खड़े हुए ।* तत्पश्चात्‌ 

. गरुण ने उन दोनों रघुवंशी बंधुओं को स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथों 
से उनके चन्द्रमा के समान कांतिमान मुखों को पोंछा।* 
480 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


गरुण जी का स्पर्श पाते ही श्री राम और लक्ष्मण के सारे घाव भर गये और उनके 
शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्ति से युक्त एवं स्निग्ध हो गये #" उनमें तेज, वीर्य, बल, 
ओज, उत्साह, दृष्टि-शक्ति, बुद्धि और स्मरण-शक्ति आदि महान गुण पहले से भी 
दुगने हो गये” 

श्री राम से गरुण इस प्रकार बोले, “काकृत्स्थ ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुण हूँ। 
बाहर विचरने वाला आपका प्राण हूँ....... ।* क्रूरकर्मा 'इन्द्रजीत” ने माया के बल से 
जिन नाग रूपी वाणों का बन्धन तैयार किया था, वे नाग ये कद्वू के पुत्र ही थे। इनके 
दाँत बड़े तीव्र होते हैं। इन नागों का विष बड़ा भयंकर होता है। ये राक्षस की माया 
के प्रभाव से बाण बनकर आपके शरीर में लिपट गये थे ।* मैं देवताओं के मुख से 
आप लोगों के नाग पाश में बंधने का समाचार सुनफ़र बड़ी व्यग्रता के साथ यहाँ 
आया हूँ। हम दोनों में जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्र-धर्म का पालन करता हुआ 
सहसा आं पहुँचा हूँ आकर मैंने इस महाभयंकर वाण-बन्धन से आप दोनों को छुड़ा 
दिया ।5 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 
मंत्र द्वारा सर्प से मुक्ति का उपाय बताया गया है। यद्यपि इसमें सर्प पकड़ने का 
उल्लेख नहीं किया गया तथापि सर्प के बंधन से छूटने का उल्लेख अवश्य प्राप्त होता 
है। 

शिव की कृपा से घाव रहित होकर मुर्दे जी उठे, 
अमृत छिड़कने से अंग क्षत रहित होना आदि 

रामायण में विविध प्रकार के चिकित्सा स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इन 
सबसे हटकर विशेष बात रामायण में उल्लिखित है और यह है-देवताओं की कृपा 
एवं आशीर्वाद से मुर्दे जीवित होना तथा अंग क्षत-रहित होना | जिसका वर्णन रामायण 
में इस प्रकार प्राप्त होता है। 

युद्ध समाप्त हो जाने पर सभी देवताओं सहित राजा दशरथ भी वहाँ पधारे तथा 
राम, लक्ष्मण और सीता को आशीर्वाद दे, वहाँ से विदा हो गये ।४ 

महाराज दशरथ के लौट जाने पर पाक-शासन इन्द्र ने अत्यन्त प्रसन्‍न हो हाथ 
जोड़े खड़े हुए श्री रघुनाथ जी से कहा, ““नरश्रेष्ठ श्री राम! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, 
वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुम पर बहुत प्रसन्न हैं। इसलिये तुम्हारे मन में 
जो इच्छा हो वह मुझसे कहो ।” महात्मा इन्द्र ने जब प्रसन्‍न होकर ऐसी बात कही, तब 
श्री.रघुनाथ जी के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई, उन्होंने हर्ष से भरकर कहा-४४ 

“वकताओं में श्रेष्ठ देवेश्वः ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक 
प्रार्थना करूँगा। आप मेरी उस प्रार्थना को सफल करें ।* मेरे लिये युद्ध में पराक्रम 
करने वाले जो वानर यमलोक को चले गये हैं वे सब नया जीवन पाकर उठ खड़े 

(४६३ " 

9४ वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 48। 


“मानद ! जो वानर मेरे लिये अपनी स्त्री-पुरुषों से बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं 
प्रसन्‍नचित्त देखना चाहता हूँ पुरन्दर ! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्यु को 
कुछ भी नहीं गिनते थे उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयल किया है और अंत में काल के गाल 
में चले गये हैं, आप उन सबक़ो जीवित कर दें /* जो वानर सदा मेरा प्रिय करने में 
लगे रहते थे और मृत्यु को कुछे नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपा से फिर मुझसे 
मिलें यह वर मैं चाहता हूँ ।” दूसरों को मान देने वाले देवराज ! मैं उन वानर, लंगूर, 
और भालुओं को निरोग, व्रण-हीन एवं बल-पौरुष से सम्पन्न देखना चाहता हूँ।* “ये 
वानर जिस स्थान पर रहें, वहाँ असमय में भी फले-मूल और पुष्पों की भरमार रहे तथा. 
निर्मल जल वाली नदियाँ बहती रहें (४ महात्मा श्री रघुनाथ जी की बात सुनकर महेन्द्र 
ने प्रसन्‍नता पूर्वक यों उत्तर दिया-* तात ! रघुवंश विभूषण ! आपने जो वर मांगा है, 
यह बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरह की बात नहीं की है, इसलिये ग्रह वर 
अवश्य सफल होगा ।” जो युद्ध में मारे गये है। और जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट 
डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठे /* नींद टूटने पर सोकर उठे हुए 
मनुष्यों की भाँति वे सभी वानर निरोग, व्रण-हीन तथा बल-पौरुष से सम्पन्न होकर 
उठ बैठेंगे /“ सभी परमानन्द से युक्त हो अपने सुहदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा 
स्वजनों से मिलेंगे |" महाधनुर्धर वीर! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमय में भी 
वृक्ष-फल-फूलों से लद जायेंगे और नदियाँ जल से भरी रहेंगी ।'" इन्द्र के इस प्रकार 
कहने पर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अंग पहले घावों से भरे थे, उस समय घाव 
रहित हो गये और सभी सोकर जगे हुए की भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये ।'० 

इस प्रकार उपरोक्त सभी दृश्यों तथा स्थलों पर दृष्टि-पात करने से यह ज्ञात होता 
है कि रामायण में इस प्रकार के दिव्य-वर्णन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। 
वशीकरण पु 
“वशीकरण” का रामायण में कहीं स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। किन्तु जब 

रामराज्याभिषेक के समय कैकयी राजा दशरथ को अपने वशीभूत कर उनसे बर प्राप्त 
कर लेती हैं, उससे 'वशीकरण” परिभाषित होता है। 
प्रसूति गृह 

“भाव प्रकाश'-गर्भ प्रकरण में सूतिकागार की परिभाषा इस प्रकार है-“अष्टहस्तायतं 
चारु चतुर्हस्तविशालकम्‌। प्राचीद्वारमु () दग्द्वारं बिदध्यात्सूतिकागृहम्‌ ।"० 

आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौड़ा एवं पूर्व अथवा उत्तर मुख-द्वार रख करके, 
देखने में सुंदर, सूतिकागार का निर्माण करना चाहिये। 

वाल्मीकि रामायण में सूतिकागार का उल्लेख महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में वर्णित 
है “भगवान श्री रामचन्द्र जी की धर्मपत्नी सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया है। अतः 
महातेजस्वी महर्षे ! आप उनकी बाल-ग्रह जनित वाधा निवृत्त करने वाली रक्षा करें ।५ 
उन कुमारों की इस बात को सुनकर महर्षि उस स्थान पर गये। सीता के वे दोनों ही 

482 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


पुत्र बाल-चन्द्रमा के समान सुंदर तथा देंवकुमारों के समान तेजस्वी थे। वाल्मीकि मुनि 
ने 'सूतिकागार' में प्रवेश किया और प्रसन्‍नचित्त होकर उन दोनों कुमारों को देखा तथा 
उनके लिये भूतों तथा राक्षसों का विनाश करने वाली रक्षा व्यवस्था की |" 

इस प्रकार वाल्मीकि रामायण में 'सूतिकागार” का उल्लेख प्राप्त होता है। 
शकुन विज्ञान 

परम्परा से चले आ रहे भविष्य ज्ञान के सम्बन्ध में दो प्रमुख विद्याएँ प्रचलित थीं। 
उन दोनों ही विद्याओं के ज्ञान तथा अध्ययन द्वारा निकट भविष्य में होने वाली 
शुभ-अशुभ घटनाओं का परिचय प्राप्त हो सकता था। ये विद्याएँ हैं शकुन विज्ञान 
तथा स्वप्न विज्ञान। 

रामायण में भी इसको स्वतन्त्र रूप से स्वीकार किया गया है। रावण के प्रमदावन 
में सीता निराश बैठी थी। वह निरुत्साहित होकर चोटी से फाँसी खाकर मरने को उद्यत 
भी हो गयी थी कि उसी समय उन्हें शुभ-शकुन दिखाई दिये। 

तस्या विशोकानि तदा बहूनि, चैर्यार्जितानि प्रवशणिलोके । 
प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि।।'*“ 

उस समय शुभांगी सीता के समक्ष बहुत से ऐसे लोक प्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट 
हुए जो शोक-निवृत्त करने वाले तथा उन्हें ढॉँढस बँधाने वाले थे। उन शकुनों का दर्शन 
तथा उनके शुभ फलों का अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था। 

एक के बाद एक शुभ शकुन इस प्रकार प्रकट होने लगे जैसे श्री सम्पन्न पुरुष 
के पास सेवा करने वाले लोग स्वयं आ पहुँचते हैं /'” उस समय उनका बायाँ नेत्र 
फड़कने लगा'* उनकी बाँयी भुजा फड़कने लगी ।* उनकी बाँयी जाँघ फड़कने लगी, 
उनके सिर से सोने के रंग वाला मलिन रेश्मी वस्त्र तनिक सा सरक गया और भावी 
शुभ की सूचना देने लगा”" परिणाम स्वरूप उनका हृदय हर्ष से विहवल हो उठा और 
वह शुक्ल पक्ष में उदित हुए शीत रश्मि चन्द्रमा से सुशोभित रात्रि की भाँति अपने 
मनोहर मुख से शोभा पाने लगी ।”” शकुन का चमत्कार रामायण में स्थान-स्थान पर 
देखा जा सकता है। विभीषण ने रावण के पास जाकर कहा, हमें अमंगल सूचक 
अपशकुन दिखाई दे रहे हैं वे अपशकुन- 
. मंत्रों द्वारा विधि-पूर्वक धधकाने पर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं होती 
उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। 
रसोईघर में, अग्नि-शालाओं में तथा वेदाध्ययन के स्थानों में साँप दिखाई देते हैं। 
हवन सामग्री में चीटियाँ पड़ी दिखाई देती हैं। 
गायों का दूध सूख गया है। 
बड़े-बड़े गजराज मद से रहित हो गये हैं। 
घोड़े नये ग्रास से तृप्त होने के बावजूद भी दीन स्वर में हिनहिनाते हैं। 


गधों, ऊँटों तथा खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं ---। 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 483 


ज़्छ़्छ्री छछ 


8. कौवे झुण्ड के झुण्ड होकर कर्कश स्वर में काँव-काँव करने लगते है। ---। 
9. लंकापुरी के ऊपर झुण्ड के झुण्ड गीध उसका स्पर्श करते हुए मँंडरा रहे हैं। 
0. सन्ध्याओं में सियारनियें शब्द करती हैं। 
7. नगर के सभी फाटकों पर एकत्र मांसभक्षी पशुओं द्वारा किये जाने वाले चीत्कार 

बिजली की गेड़गड़ाहट के समान सुनाई पड़ते हैं॥* 

कुछ दिन बाद रावण के मंत्री माल्यवान ने भी कुछ अपशकुनों की ओर उसका 
ध्यान आकर्षित किया। 
3. घोर एवं भयंकर. मेघ प्रचण्ड गर्जन के साथ लंका पर गर्मरकक्‍्त की वर्षा कर रहे हैं। 
2. घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं। 
3. दिशाएँ धूल से भर जाने के कारण मलिन हो रही हैं। 

/ 4: गौवों से गधे और नेवले से चूहे पैदाः होते हैं। 
5. पक्षी और मृग सभी सूर्य की ओर मुँह करके रोते हैं। 
6. विकराल विकट काले और भूरे रंग के मूंड मुंडाये हुए काल-पुरुष का रूंप धारण 
कर समय-समय पर हम सबके घरों की ओर देखते हैं ॥ 

विभीषण तथा माल्यवान की तरह श्री राम भी शकुन विज्ञान के परम्‌ ज्ञाता थे। 
लंका में युद्ध से पूर्व जब वे अपनी सेना को व्यवस्थित कर रहे थे तथा सेनापतियों की 
नियुक्ति कर रहे थे उस समय उन्होंने कुछ ऐसे दृश्य देखे जो लोक संहार सूचक थे। 

लोकक्षयकरं भीम॑ भयंपश्याम्युपस्थितम्‌। 
निर्बणं प्रवीराणांमृक्ष वानर राक्षसाम्‌। ।'"* 

ये सूचनाएँ अपशकुन के रूप में थीं। श्री राम ने. कहा इससे सिद्ध होता है कि 
रीछों, वानरों और राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीरों का संहार होगा । उन्होंने बताया-प्रचण्ड 
आँधी चल रही है, प्रथ्वी काँपने लगी है, पर्वतों के शिखर हिलने लगें हैं और दिग्गज 
चीत्कार करते हैं--रात में चन्द्रमा का प्रकाश क्षीण हो जाता है, वे शीतलता की जगह 
संताप देते हैं, उनके किनारे का भाग काला और लाल दिखाई देता है। समस्त लोकों 
के संहार काल में चन्द्रमा का जैसा रूप रहता है, वैसा ही इस समय भी देखा जा रहा 
है---वे नक्षत्र अच्छी तरह प्रकाशित नहीं हो रहे हैं--कौऐ, गिद्ध और बाज नीचे गिरते 
हैं, भूतल्न पर आ बैठते हैं और गीदड़ियाँ बड़े जोर से अमंगल सूचक बोली बोलती हैं 
इससे यह सूचित होता है! कि वानरों और राक्षसों द्वारा चलाये गये,शिला खण्डों, शूलों 
खडगों से यह धरती पट जायेगी और यहाँ रक्त, मांस की कीच जम जायेगी ॥* 

रावण का भाई कुम्भकर्ण जब युद्ध के लिये आया और-उसने श्री राम पर अपना 
वाल्मीकि रामायण में तांत्राक चिकित्सा एवं....वार करना चाहा तब ही कुछ 
अपशकुन इस प्रकार हुए-गदहों के समान भूरे रंग वाले बादल घिर आये, साथ ही 
उल्कापात हुआ और बिजलियाँ गिरी । समुद्र और वनों सहित सारी पृथ्वी कॉपने लगी। 
रास्ते चलते कुम्भंकर्ण के शूल पर गिद्ध आ बैठा। उसकी बाँयीं आँख फड़कने लगी 

484 »/ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


१ 


और बाँयीं भुजा कम्पित होने लगी फिर उसी समय जलती हुई उल्का भयंकर आवाज 
के साथ गिरी सूर्य की प्रभा क्षीण हो गयी और हवा इतने वेग से चल रही थी, कि 
सुखद नहीं जान पड़ती थी ।”* इस प्रकार रोमाज्वकारी अनेक अपशकुन प्रकट हुए 
परन्तु कुम्भकर्ण एक. की भी परवाह न करके युद्ध के लिये आगे बढ़ा। परिणाम यह 
हुआ कि वह मारा गया। 

एक बार फिर ऐसे ही अपशकुन रावण के वध के पूर्व देखे गये। रावण श्री राम 
से युद्ध करने के लिये रणभूमि में लंका से बाहर आया, उस समय सूर्य की प्रभा फीकी 
पड़ गयी, समस्त दिशाओं में अंधकार छा गया। ध्वज के अग्र भाग पर गिद्ध आ बैठा 
और गीदड़ियाँ अमंगल सूचक बोलियाँ बोलने लगी। रावण की बाँयीं आँख फड़कने 
लगी बाँयी भुजा काँप उठी, उसके चेहरे, का रंग फीका पड़ गया और आवाज कुछ 
बदल गयी। राक्षस दशग्रीव ज्यों की युद्ध के लिये आगे बढ़ा त्यों ही रणभूमि में उसकी 
मृत्यु के सूचक लक्षण प्रकट होने लगे।'” परन्तु रावण ने अपने बल. अभिमान के 
कारण उसकी कोई चिन्ता नहीं की, परिणाम हुआ, कि उसका वध श्री रोमचन्द्र के 
हाथों हुआ। 

बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा भी शकुन जान लेने में पारंगत थी उसने सीता के शरीर में 
होने वाले शकुनों को भली प्रकार जान लिया था॥/* हे 

इंस प्रकार शकुनों का प्रभाव जाने-अनजाने में व्यक्ति पर समान रूप से पड़ता है 
जिस व्यक्ति के प्रति वे शक्ुन या अपशकुन होते हैं वे उसका फल उसे अवश्य ही 
देते हैं चाहे कोई उसकी परवाह करे या न करे। उसके इन शकुनों के फलों पंर कोई 
कम या अधिक असर नहीं पड़ता। रामायण का शकून विज्ञान एक वैज्ञानिक 
विचार-धारा पर अश्रित है; जो विद्वानों का ध्यान अपनी ओर"आकर्षित किये बिना 
नहीं रहता | आयुर्वेद में भी रोगी के जीवन तथा मरण की अग्रिम सूचना प्राप्त करने 
के लिये शकुनों के महत्व को स्वीकार किया गया है। 
स्वप्न-विज्ञान 4 

आयुर्वेद में निद्रा को जीवन का दूसरा स्तम्भ स्वीकार किया है। निद्रा और स्वप्न 
का सम्बन्ध एक-दूसरे से अन्योन्याश्रित है। रामायण में कवि ने उन झ्र्वप्नों का उल्लेख 
किया है जो निकट भविष्य में आने वाली शुभ तथा अशुभ घटनाओं की अग्रिम सूचना 
देते हैं। आयुर्वेद में तो स्वप्न विज्ञान का इतना महत्व है कि रोग-परिचय, साध्या-साध्यता 
तथा रोग निदान सभी बातों की सूचना इनके द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं। 

राजा दशरथ ने जब कैकई के परामर्श से श्री राम को वनवास दे दिया तब भरत 
ननिहाल गये हुए थे। इसी बीच में भरत ने एक स्वप्न देखा; इस स्वप्न के कारण भरत 
कुछ अस्वस्थ से दिखने लगे। चिन्ताग्रस्त भरत से जब उनकी उदासीनता का कारण 
पूछा गया तब उन्होंने बताया, “मैंने आज एक स्वप्न में अपने पिताजी को देखा है 


उनका मुख मलिन था, बाल जे हुए थे और वे पर्वत की चोटी से एक ऐसे गड्ढे में 
हर वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 485. 


गिर पड़े हैं; जिसमें गोबर भरा था; मैंने उन्हें उस गोबर के कुंड में तैरते देखा थीं। वे 
अंजलि में तेल लेकर पी रहे थे; और बार-बार हँसते प्रतीत होते थे। फिर उन्होंने तिल 
और भात खाया। इसके बाद उनके सारे शरीर में तेल लगाया गया और फिर वे सिर 
नीचे किये तेल में ही गोते लगाने लगे, मैंने देखा समुद्र सूख गया, चन्द्रमा, पृथ्वी उपद्रव 
से ग्रस्त और अन्धकार से आच्छादित सी हो गयी है। महाराज की सवारी में आने 
वाले हाथी का दाँत टूक-टूक हो गया है और पहले से प्रज्वलित होने वाली अग्नि 
सहसा ही बुझ गयी। मैंने यह भी देखा कि पृथ्वी फट गयी है। नाना प्रकार के वृक्ष 
सूख गये हैं; तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है काले लोहे की चौकी 
पर महाराज दशरथ बैठे हैं। उन्होंने काला वस्त्र ही पहन रखा है और काले एवं पिंगल 
वर्ण की स्त्रियाँ उन पर प्रहार कर रही हैं धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की 
माला पहने लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुये रथ पर बैठकर बड़ी तेजी के साथ दक्षिण 
दिशा की ओर गये हैं। लाल-वस्त्र धारण करने वाली एक स्त्री जो विकराल मुख वाली 
राक्षसी सी प्रतीत होती थी महाराजा को हँसती हुई सी खींचकर लिये जा रही थीं।* 

भरत ने जो स्वप्न विज्ञान के परम ज्ञाता थे उस दुःखद स्वप्न का यह अर्थ लगाया 
कि श्री राम लक्ष्मण अथवा राजा दशरथ तीनों में से एक की अवश्य मृत्यु होगी--॥* 

दूसरी स्वप्नवेता थी त्रिजटा। उसने एक स्वप्न देखा जिसे सभी राक्षसियों को 
सुनाया उसने कहा, “आज मैंने एक बड़ा भयंकर एवं रोमाज्वकारी स्वप्न देखा है जो 
राक्षस्ों के विनाश और सीता पति के अभ्युदय की सूचना देने वाला है। यह था उस 
स्वप्न का संकेत जो त्रिजटा ने ग्रहण किया ।”'” त्रिजटा के उस स्वप्न का अर्थ स्पष्ट 
है-राम की विजय, रावण और कुम्भ कर्ण का वध तथा विभीषण को राज्य-प्राप्ति। 
इस स्वप्न को सुनाकर त्रिजटा ने राक्षसियों को समझाया”? और सीता से प्रिय भाषण 
करने को कहा तथा भय दिखाया कि श्री राम तुम्हें मरवा डालेंगे। अतः सीता से अपने 
अब तक के कट व्यवहार के लिये क्षमा याचना करो। त्रिजटा ने इस स्वप्न का 
साधारण तात्पर्य बताते हुए कहा- 

यस्या हयेवं विधाः स्वप्नौ दुःखितायाः प्रदृश्यते । 
सा दुःखे बहुर्भिमुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम्‌। ॥? 

जिस दुःखिनी नारी के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है वह दुःखों से छुटकारा 
पाकर परम उत्तम प्रिय वस्तु प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार त्रिजटा ने स्वप्नों के आधार 
पर यह भविष्यवाणी की। राक्षसियाँ इस भविष्यवाणी से भयक्लान्त होकर सीता के 
अनुकूल आचरण करने लगीं। 

रावण के महामंत्री माल्यवन्त भी स्वप्न समझने में प्रवीण थे। उन्होंने राजा को 
बताया कि स्वप्न में काले रंग की स्त्रियाँ अपने पीले दाँतों को दिखाती हुई सामने 
आकर खड़ी हो जाती हैं और प्रतिकूल बातें कहकर घर के सामान चुराती हुई 
जोर-जोर से हँसती हैं। 

486./ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कालिकाः पाण्ड्रै्न्तः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिताः। 
स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्त्यो गृहाणि प्रतिभाष्यच ।।'' 
उपरोक्त स्वप्नों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि स्वप्न में श्वेत रंग, हाथी, 
घोड़े, सूर्य, चन्द्रमा, विमान, श्वेत-पुष्प, श्वेत-वस्त्र, पर्वत, शिखर, उत्तर दिशा आदि 
शुभ हैं तथा काला रंग, लाल रंग, पंक, सिर मुंडाया आदमी, तेल, ऊपर से पतन, गधा, 
हँसना, सिर नीचे पैर ऊपर, निर्वस्त्र पुरुष, शूकर, शिशुमार ऊँट आदि सवारी तथा 
दक्षिण दिशा की ओर गमन अशुभ है। 
उपरोक्त तथ्यों को यदि आयुर्वेद ग्रन्थों में वर्णित स्वप्न विज्ञान से तुलना की जाये 
तो शत-प्रतिशत सही उतरेंगे। 
इस प्रकार प्रस्तुत अध्याय में तान्त्रिक चिकित्सा एवं भूत-विद्या विषयक सामग्री 
का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है। 


संदर्भ 

. अष्टाग्वसा मांसभुजः सुभीमा, निशाविहाराश्च तमाविशन्ति....। सु. चि. 60/22 

2. चरक, सूत्र 30/26 

3. सुश्चुत, सूत्र /2 

4. सूत्र /0 

5. सूत्र /5 

6. सु. सू. !/2 

7. च. सू. /63 

8. सु. सू. 3/4 

9. इतिपुत्रस्याशिषश्च कृत्वा शिरसि भामिनी। 
गंबैश्चापि समालेप्य राम-मायत लोचना।। 


औषधिं च सुसिद्धाथां विशल्य करणी शुभाम्‌। 

चकार रक्षां कौशल्या मत्रमभिजजाप च।। अयो. 25/37, 38 
0. सु. 3/8 व. सु. 3/9 2. सु. 300 
43. सु. 7/2 44. सु. 7029 5. सु. 907 
6. सु. 907 7. सु. 3300 8. सु. 65/8 
9. यु. 2/29 20. यु. 2३/श श. यु. 75/8 
22, यु. /42._ 23. अरण्य 4206 24. अ. 29/5 


25. भगवन्‌ रामपत्नीसा प्रसूता द्वारकद्यम्‌। 
ततो रक्षां महातेज: कुरु भूतविनाशिनीमू।। उ. 66/8 
26. उ. 66/4, 5, 6 
28. उ. 66/7, 8 
29. उ. 66/0, ॥, 82 
30. सु. उ. 3/40 
3. सु. उ. 60/29 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 487 


32. सु. उ. 60/6 
33. सु. सू. अ. । 
34. मंत्र-तंत्रां गृहाणं त्वं बलामति बलां तथा। 

न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययम्‌ ।। बा. 22/5 
35. बा. 22/4 
36. बा. 22/5 
37. बा. 22/6 : 
बा. 22८7 
). बा. 22/8 
बा. 22/9 
बा. 2३२/२० 
'. बा. 2२/श 
बा. 22/22 
बा. 23/3 
. उ. 87/2 .. 





के जे के छ़े छे मे हेड 


47. बा. 5/ 
48. बा. 5/2 
49. बा. 5/3 
50. बा. 5/4 
5: बा. 5/8 
52. बा. 5/9 
53. बा. 5/0 
54. बा. ॥5/7 
55. बा. 5/4, 5 
56. बा. 75/6 
57. बा. 5/7 
58. बा. 5/8 
59. बा. 5/9 
60. बा. 5220 द 
6. बा. 5/2, 22 
62. बा. 5/23, २4 
63. बा. 5/26 

+ 64. बा. 5/श7 
65. बा. 5228, 29 
66. बा. 5/30 
67. बा. स्‍5/3 

« 68. बा. 5/32 
69. वा. 8/ 


488 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


70. बा. 8/8-0 

7. बा. 8/03 

72. यु. 50/श7 

735. यु. 50/28 

74. यु. 50/38 

75. यु. 50/34 

76. यु. 50/35 

प्राय: यु. 50/36 

१8. यु. 50/37 

79. यु. 50/38 

80. यु. 50/39 

80. यु. 50/40 

82. यु. 50/46 

83. यु. 50/48-49 

84. यु. 50/5॥ 

85. यु: 50/52 

86. यु. 204व्रा. 

87. यु. 720/ 

88. यु. 20/2 

89. यु. 20/3 

90. यु. 20/4 

9. यु. 20/5 

92. यु. 20/6 

98. यु. 20/2 

94. यु. 20/8 

95. यु. 20/9 

96. यु. 20/0 

97. यु. 204]]. 

98. यु. 20/2 

99. यु. 20/3 

00. यु. 20/4 

0. यु. 720/5 

02. यु. 20/6, 77 

303. भाव प्रकाश- गर्भ प्रकरण-3/340 

04. उ.. 66/4 

05. उ. 66/5, 6 

06. सु. 28/9 

|7. शुभनिमितानि शुभानि भेजरे, नरं श्रियाजुष्टमिवोपसेविनः सु. 29/ 

08. प्रास्पन्द तैकं नयन सुकेश्या मीनाहत॑ पद्ममिवामिताभ्रम। सुं.29/2 
वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं.... / 489 


हु 


09. चिरेण वामः समवेपताशु:। सु. 29/3 म 
70. शुभ॑ पुन्हैंम समान वर्ण ........किचित परिभ्रंसित चारुगाच्या:। सु. 29/5 
वा, सु. 29/6 
2. यु. 0 वाँ सर्ग/5, 6, 7, 8, 9, 20, श 
3. यु. 0/24, 25, 26, 27, 28, 29 
4. यु. 4/2 
यु. 4/3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 20 
यु. 66/48, 49, 50, 5. 
7. यु. 95243, 44, 45, 46, 47 
8. सु. 27/50, 5, 52, 53 
79. अयो. 69/8, 9, 0, , 2, 3, 4, 5, 6, ॥7 
20. अयो. 69/8, 9, 20 
॥श. सु. 27/9, 0, ॥, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 
22. सु. १7/22, 23, 24, 25, 26, 27, 28, 29, 30, 3, 32, 33, 34, 35, 36, 37, 38, 39,40 
23. सु. श/44 
24. यु. 35/28 


4». वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


नवम्‌ परिवर्त 
वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान 





(. शल्य एवं शल्य अवस्था 
शल्य को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में 0आ०8| - $ण829» कहा जाता है। 
शल्य शब्द 'शलू हिंसायाम' अथवा “शलू श्वलू आशुगमने धातुः” तस्य शल्यमिति 
रूपम्‌ अर्थात्‌ शलत्याशु गच्छति वेगेनान्तः शरीरमनुप्रविशतीति शल्यमू, शले्यत, औणादिको 
यत्‌ प्रत्ययः, इस प्रकार निष्पन्न हुआ है। जिससे शरीर में पीड़ा या तन्तुओं की हिंसा 
हो वह शल्य है, उसका जिससे ज्ञान हो वह शल्य तन्त्र है। चरक ने शल्य का पर्याय 
शल्यापहर्तृक दिया है सभी संहिताएँ- सुश्रुत, अष्टांग-संग्रह एवं अष्टांग-हृदय शल्य-पद 
का ही प्रयोग करती हैं।' 
सुश्रुत के अनुसार जिंस अंग में अनेक प्रकार के तृण काष्ठ, पाषाण, पांशु, लोह, 
अस्थि, बाल, नख, पूय, आश्राव, दुष्टब्रण, अन्तःशल्य, गर्भ-शल्य आदि को निकालने 
के लिये यंत्र, शस्त्र, क्षीर एवं अग्नि प्रणिधान और व्रण का विनिश्चय किया जाता है 
वह शल्य-तन्त्र है।' 
शरीर में जिससे भी पीड़ा हो वह सब शल्य है। यह पीड़ा चाहे स्वतः शरीर के 
अन्दर हो अथवा. बाहर से। इस पीड़ा या शल्य. के हटाने के उपायों का वर्णन 
शल्यतन्त्र में आता है। के 
शालाक्य तन्त्र ऊर्ध्वाक्न चिकित्सा है। चरक* एवं सुश्रुतः दोनों ने इसके लिये 
शालाक्य पद का प्रयोग किया है जबकि अष्टांग संग्रह” तथा अष्टांग हृदय इसके 
स्थान पर ऊर्ध्वाज़ पद का प्रयोग करते हैं। आयुर्वेद के जिस अंग में जन्रु के ऊर्ध्व भाग 
.स्थित वर्ण नेत्र, मुख, नासिका आदि अंगों में संश्रित व्याधियों के शान्ति का तथा रोग 
परीक्षणार्थ शलाका प्रणिधान” का उल्लेख हो वह शालाक्य तन्त्र है।* 
आकृति के अनुसार शल्य के प्रकार 
अष्टांग संग्रह के अनुसार शल्य चार प्रकार के होते हैं- 
. वृत्त (गोल) 
2. द्विकोण (दो कोणों वाला) 
3. त्रिकोण (तीन कोण वाला) 


4. चतुष्कोण (चार कोणों वाला)। इन दिखाई न पड़ने वाले शल्यों का अनुमान 
वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 49 


ब्रण के संस्थान (वाहय रूप) को देखकर ही करना चाहिये।" 

तात्पर्य यह है कि अन्तःशल्य के आकार-प्रकार का अनुमान शरीर के वाह्य सतह 
पर स्थित व्रण के आकार को देखकर लगाना चाहिये। 
शस्त्र-कर्म का विषय 

अष्टांग संग्रह निज एवं आगन्तुक दोनों ही प्रकार के रोग शांति के लिये विविध 
प्रकार के उपायों की अपेक्षा रखते हैं। इस हेतु पहले औषधियों का प्रयोग किया जाता 
है, जब ये सफल सिद्ध नहीं होतीं, तब इनकी प्रशान्ति के लिये शस्त्र कर्म किया जाता 
है और यह (शस्त्र-साध्य) रोग प्रायः श्वयथु (शोध) होने के बाद ही होता है। अतएव 
जब भी शोफ होना शुरू हो, तभी से ही वात-पित-कफ-रक्त-संसर्ग, सन्निपात आदि 
का विंचार करके यथोचित दोषानुसार उपवास, लेप, सेक, असृक्मोक्षण, कषाय एवं 
घृतपान तथा शोधन आदि का प्रयोग करें, जिससे शोफ पकने न पाये। यदि इन 
विधियों का प्रयोग करने पर भी शोफ की शांति न होने पाये, तो उसका प्रविलयन हो 
जाये, ऐसा उपाय करना चाहिये | यदि प्रविलयन भी न होने पाये, तो उपनाह (पुल्टिस) 
बाँधना चाहिये।” मै 

अर्थात्‌ औषधियों द्वारा' जो रोग शांत नहीं होते, उनकी चिकित्सा शस्त्रकर्म द्वारा 
करनी चाहिये। ये शस्त्र साध्य रोग प्रायः शोथ होने के बाद ही होते हैं। अतएव जैसे 
ही शोथ प्रारम्भ हो, वैसे ही उसकी उचित चिकित्सा प्रारम्भ कर देनी चाहिये। एतदर्थ 
पहले स्नेहन, स्वेदन, लंघन, रक्‍त-मोक्षण आदि का प्रयोग करना चाहिये। इससे भी 
शोफ दब सकता है। न दबे तो ऐसी चिकित्सा करनी चाहिये कि उसका प्रविलयन हो 
जाये। यदि इस पर भी शोफ नियंत्रित न हो तो उपनाह (पुल्टिस) बाँध देना चाहिये। 
शस्त्र-कर्म के प्रकार 

शस्त्र-कर्म आठ प्रकार का होता है जैसे-छेदन, भेदन, लेखन, वेधन, एषण, 
आहरण, विद्नावंग, सीवन। सुश्रुत ने उक्त आठ प्रकार के शस्त्र-कर्म माने हैं #? चरक 
ने एषण और आहरण को यन्त्र-कर्म मानकर शस्त्र-कर्म छः ही माने हैं-'पाटन व्यधनं 
चैव छेदनं लेखन तथा। प्रोच्छनं सीवनं चैव षड़्विधं शस्त्र कर्म ततू /” 

. छेदन (&:/०अंजा) काटकर अलग कर देना जैसे-अर्श, चर्मकील और भगन्दर। 
“छेद्या भगन्दरों ग्रन्थिःश्लैष्मिकस्तिलकालकः ।' 

2. भेदन (0०) चीरना जैसे-विद्रधि। भेद्याविद्रधयोजन्यत्र सर्व आदू ग्रन्थयस्त्रयः । 

3. लेखन (5ल८भए॥8 ण $०थ7709४०॥) खुरचना, “लेख्याचश्रतस्त्रो रोहिण्यः 
किलासमुपलिहिकां' । 

4. वेधन (?'ात्रणगंग8) नोकदार शस्त्र से छेद करना जैसे-'सिरोवेध” आदि 
4वेध्याः सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धि्दकोदरम्‌” । 

वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान5. एषण (00७8, ०फराणगांणा) 
शलाका द्वारा नाड़ी व्रणादि का पता लंगाना- “एष्या नाड्या सशल्याश्च 

492 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


ब्रणाउन्मागिंणश्चये ।” 

6. आहरण (&/४४०४०)) बाहर खीचकर निकालना। “आहार्याः 
शर्करास्तिस्नोदन्तकर्णमलोउश्मरी । शल्यानि मूढगर्भाश्च वर्चश्र निचिंतगुदे' । 

7. विश्वावण (0॥82०) रक्त, लसीका और पूय को नली आदि से बाहर 
निकालना। 'स्राव्या विद्रधयः पश्चभवेयु: सर्वलादूते ।' 

8. सीवन (5णणा॥8 $0/०7॥8) टाँके लगाना, 'सीव्या मेदः समुत्याश्च भिन्‍नाः 
सुलिखिता गदाः। सद्योव्रणाश्व ये चैव चल सन्धिव्यपाश्रिता। 

वाग्भट ने उत्पाटन, कुटूटन, मन्थन, ग्रहण और दहन ये पाँच कर्म और मानकर 
शस्त्र-कर्म के तेरह भेद माने हैं- 
* 9. कुट्टन (शांव्फाग) सुई द्वारा त्वचा में छेदन करना। 

0. मन्थन (07॥08) मथते हुए छेद करना। 

7. ग्रहण (0भगागड्ट) पकड़ना । 

]2. दहन (09ए/८५) शस्त्र-यन्त्र आदि से दाह करना।' 

आजकल (८७४०५ ।ा£) का प्रयोग शस्त्र कर्म में बहुत बढ़ गया है। सुश्रुत में 
भी इसी प्रकार का वर्णन है-“अग्नि तप्तेन शस्त्रेण छिन्दात्‌' ॥# 
उपकरण 

विविध संहिताओं में उल्लिखित उपरोक्त अष्ट-शस्त्र कर्मों में से किसी एक कर्म 
करने की इच्छा वाले वैद्य को प्रथम ही निम्नलिखित सामग्री तैयार कर लेनी 
चाहिये-यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि, शलाका, श्रृंझ, जोंक, अलाबू (तुम्बी) जाम्बवौष्ठ 
पिचु (रुई), प्रोत (वस्त्र), सूत्र, पत्र, पट, मधु, घृत, चर्बी, दुग्ध, तैल, सन्तर्पण, द्रव्य, 
क्वाथ और लेप की औषधियाँ, कल्क (लुग्दी), पंखा, ठंडा और गरम पानी, कटाह 
आदि लौह निर्मित पात्र एवं स्निग्ध (अनुरक्त) स्थिर चित्त और बलवान भूत्य सुश्रुत 
ने भी इसी प्रकार का वर्णन किया है- 

अतोडन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोपलल्पयितव्यानियन्त्र- 
शस्त्राक्षाराग्निशलाकाश्रृंग जलौकालाबू जाम्बवौष्ठापिचु प्रोतसूत्र पत्र 
पट्टमथुघृतवसापयस्तैलतर्पण कषायालेप कल्कव्यजन शीतोष्णोदक कटाहादीनि, 
परिकर्मिणश्र स्निग्धा: स्थिरा बलवन्तः 6 

शल्य जब शरीर में प्रविष्ट करके पीड़ित करने लगते हैं तब इनके आहरण हेतु जो 
उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं वे यन्त्र कहलाते हैं-“तत्र मनः शरीराबाधकराणि 
शल्यानि, तेषां आहरणोपायो यंत्राणि' /” अष्टांग हृदय ने भी यही परिभाषा बतायी 
है-'नाना विधानां शल्यानां नानादेश प्रबाधिनाम्‌। आहर्तुमभ्युपायो यस्तद्यन्त्रं तच्च 
दर्शने । /* यन्त्रों की संख्या अन्य आचार्य 0। मानते हैं, किन्तु वाग्भट्‌ ने यन्त्र छः 
प्रकार के माने हैं-. स्वास्तिक यन्त्र 2. संदंश यन्त्र 3. ताल यन्त्र 4. नाड़ी यन्त्र 


5. शलाका यन्त्र 6. अनुयन्त्र 
वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 493 


इस प्रकार यन्त्रों के छः प्रकारों का वर्गीकरण उनके आकार के आधार पर किया 
गया है। आधुनिक शल्य चिकित्सा की दृष्टि से स्वास्तिक यंत्रों को क्रूसी फार्म 
इन्स्ट्रूमेन्ट (070थिया ॥50ण7०॥७), संदंश यन्त्रों को (श॥रलाल [496 ए०००ए७) 
ताल यन्त्रों को (2०६ 7,0०६ 7/96 ॥5एण॥०॥७), और नाड़ी यन्त्रों को ट्यूबलर 
इन्स्टरूमेन्ट (॥00७॥४ ॥॥707०॥/5) और शलाका अन्त्रों को प्रोब्स (९00९४) कह 
सकते हैं। 
सुश्रुत संहिता में इन छः प्रकार के कुल 0 यन्त्रों का उल्लेख मिलता है। 
शस्त्र-कर्म से पूर्व भोजन तथा मद्यपान 
अष्टांग संग्रह के अनुसार मूढ-गर्भ, उदर रोग, अश्मरी तथा मुख रोग से पीड़ित 
व्यक्तियों को छोड़कर अन्य रोगों से पीड़ित रोगियों में शस्त्र-प्रयोग करने से पूर्व रोगी 
को इष्ट (इच्छित) भोजन तथा तीक्ष्ण मद्य का पान कराना चाहिये क्‍योंकि इष्ट अन्न 
खिलाने के बाद शस्त्र-कर्म करने से अन्न के संयोग से रोगी को मूर्च्छा नहीं उत्पन्न 
होती तथा. मद्यपान से उन्‍्मत रोगी को शस्त्र-कर्म से होने वाली पीड़ा का ज्ञान नहीं 
होता-'प्राक्‌ शस्त्राद्‌ भोजयोदिष्टमूमय्॑ तीक्ष्णं च पाययेत्‌ । 
न मूर्च्त्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्र न बुध्यते। 
अन्यत्र मूढ़-गर्भोदशश्मरी मुख रोगेभ्यः।॥* 
आचार्य सुश्रुत ने तीन प्रकार के कर्मों का उल्लेख किया है-त्रिविध कर्म-पूर्व कर्म, 
प्रधान कर्म, पश्चात्कर्मेति तत्‌ व्याधि प्रति प्रत्युपदेक्ष्याम: ।” सुश्रुत संहिता के टीकाकार 
आचार्य डल्हण ने पूर्व-कर्म के विषय में कहा है-लंघनादि विरेकान्तं पूर्वकर्म ब्रणस्यः 
च। अर्थात्‌ लंघन से विरेचन तक व्रण के सब कर्म पूर्व-कर्म हैं। वे 2 हैं- 
. अपतर्पण (६४) 
'. आलेप (0[३४था8) 
.. परिषेक (822) 
» अश्यड़ग (॥85588#78) 
स्वेद (#गालाभांणा) 
« विम्लापन (२०७७8) 
« उपनाह (?6० परं८९) 
8. पाचन ([60थंा३ $0फ्लबांगा) 
9. विस्रवण (09 क्षागंग8) 
0. स्नेह (गा2९६४४०ा ० 8855) 
. वमन (छात्तलअंड) 
2. विरेचन (एपरइथांणा) 
उपर्युक्त कथन में उल्लिखित मद्यपान आधुनिक अनीस्थीसिया के समान ही है, 
जो प्रमाणित करता है कि प्राचीन काल में भारतीय चिकित्सक भी संज्ञाहर औषधियाँ 
494 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


क्रफ़फ़ फ्री ७ ७ 


प्रयुक्त करते थे। 
शस्त्र-कर्म-विधि 

अष्टांग संग्रह के अनुसार मंगलाचरण करके यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि, जाम्बवौष्ठ, 
पिचु (रुई का फाहा), प्लोत (सूती वस्त्र की पट्टी), पत्र (विभिन्‍न वृक्षों के पते), सूत्र 
(डोरी), चर्म-पट्‌ट (चमड़े का पट्टा), मधु, स्नेह कषाय (स्वरस, कल्क आदि पंच 
कषाय अथवा कषाय रस वाले द्रव्य, आलेप, कल्क (यथांवश्यक औषधियों का 
कल्क), सेक, उद्कम्भ (जल से भरा छोटा घड़ा), शीतल जल, गर्म जल, कटाह 
(कड़ाही) तथा व्यजन (पंख) आदि व्रणोपयोगी सभी द्रव्यों को एकत्रित करना चाहिये। 
इसके पश्चात्‌ सुव्यवस्थित शैया पर रोगी को लिटाना चाहिये। स्नेहन कराकर बलवान 
पुरुषों के सहारे रोगी को स्थिरकर इष्ट दिन एवं इष्ट मुहूर्त में दधि, अक्षत, अन्न, 
पान, रुक्म (स्वर्ण) एवं रत्वादि से ब्राह्मण की पूजा करके, इष्ट देवता को प्रणाम करके 
तथा मंगल वाचक कार्य करके, रोगी को भोजन कराकर, पूर्वाभिमुख शैया पर बैठाकर 
या लिटाकर रोगी को बाँध देना चाहिये। तत्पश्चात्‌ वैद्य रोगी ने जिधर मुख किया है 
उसके विपरीत दिशा (पश्चिम) की ओर मुख करके मर्म, सिरा, स्नायु, सुंधि, अस्थि, 
धमनी, आदि को बचाते हुए शस्त्र द्वारा अनुलोम रूप से पूय, दिखाई पड़ने तक, एक 
ही बार में शीघ्रता से चीरा लगायें। बड़े शोथ-पाक में भी दो अंगुल में ही शस्त्र-पद 
(चीरा) लगायें। तत्पश्चात्‌ दो अंगुल अथवा तीन अंगुल के अन्तर पर यदि आवश्यक 
हो तो विचार करके एक व्रण और दें। शस्त्र-पद करने से विवृत हुए इस स्थान में बायें 
प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुली से पूय व्रण की प्रतीक्षा करें। यदि शस्त्र-पद करने के बाद 
ब्रण का मुख नाति विवृत (अधिक चौड़ा न हो) तथा व्रण स्थान गंभीर तथा मांसल 
हो, तो एषणी से तथा विपरीत प्रकार के (जो गंभीर तथा मांसल न हो), व्रणों में करीर 
कमल आदि के नाल से तथा अति संवृत्त (सूक्ष्म) मुख वाले व्रणों में सूअर के बाल से 
पूयव्रण की परीक्षा करनी चाहिये। 

जहाँ-जहाँ पर पूय की गति को देखें और जहाँ-जहाँ उत्सुड (उभार-उत्सेध) देखें, 
वहाँ-वहाँ पर शस्त्र द्वारा व्रण बनायें। यह ध्यान रखें कि यह व्रण सुविभक्त (एक दूसरे 
से पृथक) तथा निराशय पूय आदि के आशय से रहित हों । शस्त्र द्वारा किया गया व्रण 
आयताकार, दीर्घ और विशाल तथा ऐसा होना चाहिये, जिससे पूथ आदि विविध 
प्रकार के दोष उसमें ठहर न सकें ।” 

आचार्य डल्हण ने लिखा है कि पाटन, रोपण आदि शश्त्र-कर्म (व्रण-कर्म) के 
प्रधान कर्म हैं। 'पाटनं रोपणं यच्च प्रधान कर्म्म तत्स्मृतम्‌” | शल्य-कर्म के अन्तर्गत 
महर्षि सुश्रुत” ने आठ प्रकार के महर्षि चरक* ने छः प्रकार क॑ एवं अष्टांग हृंदयकार 
आचार्य वाग्भट ने तेरह प्रकार के प्रधान कर्मों का निरूपण किया है उत्पाट्य पाट्य 
सीव्यैष्य लेख्यप्रच्छनकुटूटनम्‌ छेद्यं भेद्यं व्यधो मन्थो ग्रहों दाहश्च तत्रियाः।।” 
रोगी 

वाल्मीकि रामायण में शल्य -क्रिया के रोगी का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 

वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 495 


शल्य-चिकित्सक के गुण 
अष्टांग संग्रहकार के.अनुसार वैद्य (शल्य-चिकित्सक) को शौर्य-शाली (शस्त्र-कर्म 
में निपुण) आशु-क्रियावान (अपने हस्त कौशल से शीघ्र शस्त्र-कर्म करने वाला), तीक्ष्ण . 
धार वाले शस्त्रों को रखने वाला, अस्वेदवेषथु (शल्य-कर्म करते समंय जिसे पसीना 
तथा कँपकँपी न हो) तथा असंमोहवान्‌ (कार्य करते समय जिसके मस्तिष्क में 
अनिश्चितता न हो) होना चाहिये। ये शल्य चिकित्सक के प्रशस्त गुण हैं- 
शौर्यमाशुक्रिया तीक्ष्णूं शस्त्रमस्वदवेषथु । 
असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्र-कर्मणि शस्यते ।” 
सुश्रुत के अनुसार 
शौर्यमाशुक्रियाशस्त्रतैक्ष्यमस्वेदवेपथु । 
असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्र-कर्मणि शस्यते।। 
अर्थात्‌ शूरता (उत्साह, निर्भयता), शस्त्रपातादि क्रियाओं में शीघ्रता (लघु-हस्तता), 
शस्त्र की धार का उचित तीक्ष्ण होना, शस्त्र कर्म करते समय वैद्य-सर्जन को पसीना 
न आना तथा हाथ का न काँपना तथा रोगोल्वणता या बड़े शस्त्र-कर्म की दिशा में या 
निकलते हुंए रक्‍्तादि को देखकर मूर्च्छित न होना ये शस्त्र चिकित्सक्‌ के गुण हैं और 
ऐसे ही सर्जन शस्त्र-कर्म में प्रशस्त होते हैं।” 
शस्त्रावचारण में पश्चात्‌ कर्म (परिचर्या) 
अष्टांग संग्रह के अनुसार शीतल जल से रोगी को आश्वासित करके, व्रण स्थान 
को अंगुलियों द्वारा चारों ओर से पीड़न करके (दबा करके), प्लोत (वस्त्र) से व्रण पर 
लगे जल को पोंछकर वेदना शामक एवं रक्षोहन गण की औषधियों-गुग्गुल, अगरु, 
सर्जरस, वचा श्वेत सर्षप, हिह्लु, सैंधव लवण निम्ब-पत्र को घी के साथ मिलाकर इनसे 
व्रण का धूपन करें। तत्पश्चात्‌ दोषानुसार वात-विकारों में तिल कल्क (डा5थ्याएया 
]70०ए॥ 7.॥7) से, पित्तज विकारों में घृत से तथा कफज विकारों में मधु से युक्त 
वर्ति को ब्रण में रखकर औषधियों के कल्क से भर दें। तत्पश्चात्‌ अधिक न भूने गये 
यव के सत में घृत मिलाकर फिर एक पत्र में रखकर दाहिनी अंगुली द्वारा उसमें पानी 
मिलाकर, उसे व्रण के ऊपर रखकर, एक मोटी कवलिका रखकर वस्त्र से पट्टी बाँध 
- दें। पट्टी को बाँये या दाँये किसी एक पार्श्व में घुमाते हुए बाँध दें। पट्टी मृदु, कोमल, 
न चुभने वाली, सलवटों से रहित तथा ऋजु होनी चाहिये तथा इसकी गाँठ दाँये या 
बाँये पार्श्व में बाँध देनी चाहिये। हि 
वात-कफ प्रधान व्रणों में दो-तीन बार, पित्त रक्त प्रधान व्रणों में तथा अभिघात 
जन्य (चोट) व्रणों में एक बार पट्टी को लपेटना चाहिये। शस्त्र-क्षत से उत्पन्न पीड़ा 
जो लगातार हो रही हो उसमें मुलैठी तथा घृत को गरम करके व्रण का सेंक करें। जल 
वाले पात्र से जल निकालकर प्रोक्षण करना चाहिये । याचक, आर्य, पर्ण-शबरी आदि से 
रोगी की रक्षा करनी चाहिये। एतदर्थ गुग्गुल आदि से धूपन करना चाहिये। इनको 
496 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


बलि भी दें। लक्ष्मी, गुह्टा अति गुहा, जटिला, ब्रह्मचारिणी, वचा, छत्रा, अतिछत्रा, दूर्वा 
एवं सिद्धार्थक को शिर पर धारण करना चाहिये गुग्गुल आदि द्रव्यों के धूपों से दिन 
में दो बार धूपन करना चाहिये।* '"सुश्रुत के अनुसार-ततः शस्त्रमवचार्य 
शीताभिरद्भिरातुरमाश्वास्य, समन्‍्तातू परिपीड्बाड़गुल्या, व्रणमभिमृद्य (ज्य), प्रक्षाल्य, 
कषायेण, प्रोतेनोदकमादाय, तिल कल्क मधुसर्पि: प्रगाढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां 
नातिरक्षां, .वर्ति प्रणिदध्यात्‌। ततः कल्केनोच्छाद्य घनां कवलिकां दत्तवा वस्त्रपटूटेन 
बध्नीयात । वेदना रक्षोष्नै धूपिर्धूपयेदू रक्षोघ्नैश्च मन्त्र रक्षां कुर्वन्ति /* अर्थात्‌ तदनन्तर 
ब्रण से शस्त्र को निकालकर रोगी को शीतल जल से (मुख-हस्तादि पर सिंचन द्वारा) 
आश्वासन या शांति देकर चारों ओर (बाहर और अंदर से) अंगुलियों द्वारा ्रण को 
धीरे-धीरे दबाकर कषाय से ब्रण का प्रक्षालन करें। पश्चात्‌ प्रोत से ्रण के भीतर के 
शेष कषाय जल को पोंछकर तिल, कल्क, शहद और घृत से लिप्त तथा न अति 
स्निग्ध और न अति रुक्ष कल्क से ढककर तथा उस पर मोटी कवलिका (गदूदी या 
स्वच्छ रुई) रखकर वस्त्र पटूट से बाँध देना चाहिये। पश्चात्‌ वेदना हर और राक्षस 
(जीवाणु) नाशक द्रव्यों की धूनी से उस स्थान को धूपित करें तथा रक्षोघ्न मंत्रों से व्रण 
की रखा करनी चाहिये। “वाग्भट” के अनुसार-शुचिसूक्ष्मेदृढा: पटाः कवल्यः सविकेशिकाः 
धूपितः भृदृवः श्लक्ष्णा निर्वलीका व्रणे हिताः। इस प्रकार स्पष्ट है कि अन्य सभी 
संहिताओं में भी यही वर्णन प्राप्त होता है। 
शस्त्र-कर्म में अपथ्य 

अष्टांग संग्रहकार के अनुसार विशेषतः दिवा स्वप्न करने से व्रण में शोफ, कण्डू, 
राग, रुक्‌ (पीड़ा), पूयवृद्धि आदि उत्पन्न हो जाती है। संसर्ग के बिना भी स्त्रियों का 
स्मरण, स्पर्श, दर्शन आदि करने से शुक्र के स्खलित हो जाने के फलस्वरूप व्यवायजन्य 
दोष उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव स्त्री का स्पर्श, स्मरण आदि निषिद्ध है।” महर्षि 
सुश्रुत ने आयास (श्रम) से ब्रण में श्वयथु की उत्पत्ति, रात्रि जागरण से शोथ एवं राग 
का प्रादुर्भाव, दिवा स्वप्न से शोथ, राग एवं वेदना की उत्पत्ति एवं मैथुन करने से शोथ, 
राग, वेदना के साथ-साथ मृत्यु की भी सम्भावना का उल्लेख किया है” इसलिये व्रण 
के रोपण काल में तथा जब तक दृढ़ता पूरी तरह प्राप्त न हो जाये, उस काल तक 
अीर्ण, व्यायाम, व्यवाय एवं हर्ष, क्रोध, भय, को भी त्याज्य माना गया है।* 
शस्त्र-कर्म में पथ्याहार 

अष्टांग संग्रह के अनुसार रोगी को जो सात्म्य भोजन हो वह करायें। समातीत 
(एक वर्ष पुराना) शालि, षष्टी धान्य, यव में से किसी भी एक एवं मूंग, मसूर, आढकी 
(अरहर), सतीन (मटर) इनमें से किसी एक से यूप अथवा जांगल मांस रस के साथ 
भोजन दें। जीवंती, सुनिष्णक, तन्दुलीयक (चौलाई), वास्तूक (वधुआ), वार्ताकु (बैंगन), 
पटोल (परवल), कारबेल्लक (करेला), बालमूली (कच्ची मूली) के साथ को दाड़िम 
(अनार), आमलक, सैन्धव लवण से युक्त करके, घी से स्निग्ध करके लघु एवं अल्प 

वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 497 


परिमाण में खाना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उष्णोदक पीना चाहिये। इस प्रकार उस रोगी 
द्वारा खाया हुआ भोजन शीघ्र पच जाता है।* 
अन्यान्य निर्देश 

वाग्भट्‌ के अनुसार बाल वाले पंखों (चंवर) अथवा उशीर (खस) के पंखों से 
व्यजन (पंखा) करना चाहिये और इसका परिघट्टन (घर्षण) नहीं करना चाहिये। स्नेही 
पुरुष, वृद्ध पुरुष एवं द्वि जातियों (ब्राह्मणों) द्वारा मनोनुकूल कथाओं का श्रवण करने 
से रोग से छुटकारा अवश्य मिल जायेगा, ऐसा मन में विश्वास रखने से व्रण का शीघ्र 
ही रोहण (रोपण डमंसपदह) होता है ।* 
पुनः प्रक्षालन 

अष्टांग संग्रह कार के अनुसार पुनः तीसरे दिन प्रक्षालल आदि कार्य करने 
चाहिये। यदि दूसरे दिन ही पट्टी खोल दी जाये तो व्रण छोटी-छोटी ग्रन्धियों से युक्त 
चिरकाल में भरने वाला तथा तीव्र पीड़ा युक्त हो जाता है।5४ 

महाकवि वाल्मीकि ने अपनी रामायण के माध्यम से प्राचीन भारत की शल्य 
व्यवस्था की स्पष्ट झाँकी प्रस्तुत की है। इसके अवलोकन से. स्पष्ट हो जाता है कि 
आदि कवि के समय से ही हमारा शल्य-चिकित्सा-शास्त्र कितना उन्‍नत था। 

रामायण में एक वाण का नाम भी शल्य बताया गया है। जिसका अग्रभाग तीक्ष्ण 
होता था वास्तव मैं प्राचीन काल में शल्य दो प्रकार से निकाले जाते थे। प्रथम 
औषधियों की सहायता से और द्वितीय यन्त्र शास्त्रों की सहायता से। रामायण में 
शल्य निष्कासन कर्त्ता वनौषधियों के उपलब्ध होने के कारण एक जनपद का नाम 
शल्याकर्षण प्रदेश रख दिया गया ।* अपने ननिहाल से अयोध्या लौटते समय भरत 
एलधान के पास की नदी को पार कर ऊपर पर्वत जनपद में पधारे। वहाँ से शिला 
नामक नदी को पार कर भरत वहाँ से आग्नेय कोण में स्थित शल्याकर्षण नामक देश 
में गये। इस प्रदेश में देह के शल्य निकालने में सहायक औषधियाँ उपलब्ध होती हैं। 

रामायण में ऐसी औषधियों का भी परिचय प्राप्त होता है जो आने वाले शल्यों 
से देह की रक्षा करने में समर्थ होती थीं। उन औषधियों में बला, अतिबला, 
विशल्यकरणी प्रमुख हैं। यहाँ भी यह स्पष्ट किया गया है कि यह चमत्कारी 
महौषधियाँ मंत्रपूर्ण होकर अपना प्रभाव और भी उग्र कर देती हैं। महर्षि विश्वामित्र 
अपने यज्ञ की रक्षा के निमित्त श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ इस प्रकार लिये 
जा रहे थे जैसे ब्रह्मा जी के पीछे दोनों अश्विनी कुमार जा रहे हैं” अयोध्या से डेढ़ 
योजन दूर आकर उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण से कहा वत्स! सरयू जल से आचमन 
करो और बला और अतिबला औषधियों को मंत्र द्वारा ग्रहण करो। इनके प्रभाव से 
तुम्हें कभी थकावट का अनुभव नहीं होगा। किसी प्रकार ज्वर (रोग) नहीं होगा और 
तुम्हारे रूप में किसी प्रकार की विकृति नहीं होने पायेगी /* सोते समय या असावधानी 
में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारी 

498 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


समानता करने वाला कोई नहीं रहेगा। तात! बला और अतिबला को मंत्र-पूत कर 
सेवन करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह पायेगा। यह चातुर्य, ज्ञान, 
बुद्धि सम्बन्धी विकास करेगी। इन्हें ग्रहण कर लेने पर तुम्हें भूख-प्यास से भी कष्ट 
नहीं होगा। इस प्रकार अनेक गुणों से युक्त श्री राम को महामुनि विश्वामित्र ने बला 
तथा अतिबला को मंत्र-पूत कर सेवन कराया। 

इसी प्रकार जब राम चौदह वर्ष के लिये वन में जाने के लिये तैयार हुए तब माता 
कौशल्या ने मंगलकामना तथा शुभाशीर्वाद प्रदान कर उनके मस्तक पर अक्षत रखकर 
चन्दन और रोली लगायी और-सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली विशल्य करणी 
नामक शुभ औषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य. से मंत्र पढ़ते हुए उसको श्री राम के हाथ 
पर बाँध दिया और फिर उसके गुणों में उत्कर्ष लाने के लिये मंत्र का जप भी किया ।* 
यह मंत्रोच्चारण माता के मुख से स्पष्ट न हो सका होगा क्योंकि वह पुत्र के होने वाले 
वियोग से दुःखी थीं। इस सब की पृष्ठभूमि में माँ का आशीर्वाद, औषधि का ज्ञान 
माता को अपने गृह परम्परा से गुरु परम्परा से या राजकीय चिकित्सकों से ही प्राप्त 
हुआ होगा। 

रामायण में शल्य चिकित्सकों का पृथक्‌ उल्लेख भी प्राप्त होता है। अन्य 
चिकित्सकों से इनको अलग माना गया है। सीता ने अशोक वन में त्रस्त होकर यह 
कल्पना की कि रावण निश्चय की अपने तीखे शस्त्रों से मेरे अंगों के टुकड़े कर डालेगा 
जैसे शल्य चिकित्सक किसी विशेष अवस्था में गर्भस्थ शिशु के टूक-टूक कर देता 
है।” यहाँ शल्य चिकित्सक के सिवाय उसके पैने शस्त्रों का तथा गर्भस्थ शिशु को 
किसी विशेष अवस्था में शल्य क्रिया द्वारा निकालने के कर्म का उल्लेख है। 

रामायण में यह स्पष्ट है कि वीर योद्धा श्री राम, लक्ष्मण, मेघनाद तथा रावण 
मानव देह के मर्मो से भली-भाँति परिचित थे। वे यह भी जानते थे कि अमुक मर्म पर 
प्रहार करने से सामने वाला योद्धा अमुक स्थिति में आ जायेगा।" भर्म को जानने 
वाला मेघनाद समर में श्री राम तथा लक्ष्मण के मर्मों को अपने वाणों द्वारा भेदने लगा 
परिणामस्वरूप वे महान धनुर्धर वीर भूपाल मर्मस्थल के भेदन से विचलित एवं 
कृशकाय होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।# सर्वप्रथम-“पपात प्रथमं रामो विद्धो मर्मसु 
मार्गणैः / राम मर्म भेदन से गिरे। इस प्रकार सद्य प्राण हर मर्म तथा कालॉन्तर प्राण 
हर मर्म का उन्हें पर्याप्त ज्ञान प्राप्त था जिसका वे अस्त्र-प्रहार के समय सदैव स्मरण 
रखते थे। 

सीता ने रावण का तिरस्कार करते हुए राम के बैर को “अक्षि सूच्या प्रभृजसि 
जिह॒वया लेढ़ि च ध्षुरम्‌” आँख में सुई चुभोना तथा जीभ से छुरे को चाटने के बराबर 
बताया है। अर्थात्‌ न तो सुई से आँख सुरक्षित रह सकती है और न छुरी को जीभ 
से चाटने पर जीभ ही फटती या कटती है। आगे पुनः उसके इसे-“अयोमुखानां 


शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि” तीक्ष्ण मुख वाले लोहे के शूलों पर चलने की अभिलाषा 
वाल्मीकि रामायण में शल्य: चिकित्सा विधान / 499 


करना बताया है। आँख एक नग्न स्थान है उसमें पीड़ा हो जाने पर दीप की ज्योति भी 
उसे सहन नहीं होती।” अंगद भी हृदय के मर्म से परिचित थे उन्होंने भी महोदर 
राक्षस के स्तनों के निकट छाती में इन्द्र के. वज़ की तरह भयंकर मुक्‍के का प्रहार 
किया। परिणामतः महोदर मृत्यु को प्राप्त हुए" शल्य-निष्कासन के समय या प्रहार 
होते-होते यदि रोगी मूरच्छित हो जाये तो रामायण में “परासुमिव तोयेन सिज्वन्ति 
वाक्यवारिणा””* ठण्डे पानी से बेहोश हुए व्यक्ति के मुख पर छीटें लगावें या “ततस्य 
जल क्लिन्नेन पाणिना”* करें। जैसा कि विभीषण ने सुग्रीव को होश में लाने के लिये 
गीले हाथ से मुख पोंछ दिया था। यदि इस क्रिया को अधिक शक्तिशाली बनाना हो 
तो “सलिलमादाय विद्या परिजप्य च”* पवित्र जल को मंत्र पूत करके उसका प्रयोग 
किया जाये। यदि शल्य-प्रहार से या चिकित्सा करते समय व्यक्ति मृत-प्रायः हो जाये 
तो वह मृत है या जीवित उसकी परीक्षा भी आदिकवि ने विभीषण के मुख से करायी 
है- “न्होनं हास्यते लक्ष्मी दुर्लभा या गतायुषम्‌””* जिनकी आयु समाप्त हो चली है 
उनके लिये जो दुर्लभ लक्ष्मी है (शोभा है) वह उनका त्याग कर देती है अर्थात्‌ उनके 
मुख पर नूर नहीं रहता। मूर्च्छित श्री राम को चेतना में लाने के लिये वानरों ने 
“असिन्चन्‌ सलिलैश्चैनं पदमोत्पल सुगन्धिभि: !”* कमल तथा उत्पल द्वारा सुगन्धित 
जल से उन पर असिंचन करने लगे। 

रामायण में 'सुद्नाव” बहने लगा घाव, “निर्व्रण' घावरहित, 'सनियांसेववल्लरी', गोंद 
से लथ-पथ बेल के समान व्रणस्राव के खून से लथ-पथ शरीर आदि व्रणों की विभिन्‍न 
अवस्थाओं का भी उल्लेख है। 'रुधिरं प्रसृतास्तत्र रस सारमिव द्वुमाः ० घाव पर 
नमक छिड़कने “धारयितुं लवणाम्भइवोल्वणम्‌”” का उल्लेख भी रामायण में है। 
अस्त्र-प्रहार से विभिन्‍न प्रकार के रक्‍्त-वमनों का उल्लेख भी रामायण में किया गया 
है--“धूम्रशोणितोद्गारी । सफेन शोणितोद्गार। आदि रुंधिरं प्रसृतास्तत्र रस सारमिव 
द्रुमाः।।”* द्रणों से रक्त, मांस तथा मेद, चरबी का स्राव भी वर्णित है। इनमें एक 
प्रकार की गंध का उल्लेख भी इस काव्य में है। 

इस प्रकार युद्ध पीड़ित योद्धाओं के शल्य-निष्कासन के लिये लक्ष्मण सहित श्री 
राम सक्रिय हो गये और उन्होंने युद्ध के मुहाने पर वानरों के शरीर से वाण निकाले। 
“हरी विशल्यान्‌ सहलक्ष्मणेन, चकार रामः परमाहवाग्रे”* रामायण में मोहनी औषधि* 
का भी उल्लेख हैं। इसी प्रकार इन्द्रजीत को हराकर लक्ष्मण जब श्री राम से मिले तो 
श्री राम ने उन्हें हृदय से लगाया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेण वैद्य को बुलाकर कहा, - 
“परम्‌ बुद्धिमान सुषेण! तुम शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे ये मित्र वत्सल सुमित्रा 
कुमार पूर्णतः स्वस्थ हो जायें और इनके शरीर से सभी वाण निकलकर घाव भर कर 
सारी पीड़ा दूर हो जाये ।” इसी प्रकार श्री राम ने उन्हें योद्धाओं तथा विभीषण को भी 
निर्व्रण स्वस्थ कर उपचार करने की आज्ञा दी- 

विशल्योज्यं महाप्राज्ञ सौमित्रिमिंत्रिवत्सलः। 
यथा भवति सुस्वस्था तथा त्व॑ं समुपाचर।* 
500 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


विशल्यः क्रियतां क्षिप्रं सौमित्रिः सविभीषणः। 
ऋक्षवानर सैन्यानां शूराणां द्रमयोधिनाम्‌।।* 
सुषेण ने आज्ञा पाकर लक्ष्मण के नाक में एक बहुत ही उत्तम औषधि लगा दी 
जिसकी गंध को सूंधते ही लक्ष्मण के शरीर के वाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा 
घाव भर कर दूर हो गयी। इसी प्रकार सुषेण ने सभी वानरों तथा विभीषण की भी 
चिकित्सा की और वे स्वस्थ तथा हर्षित हों गये ।” इस प्रकार की चिकित्सा सुषेण ने 
एक बार नहीं अनेक बार की और जब आवश्यकता पड़ी करते रहे। कई बार तो 
योद्धा स्वयं ही अपने शल्यों का निष्कासन कर लिया करते थे। 

एक बार लक्ष्मण रावण के द्वारा छोड़ी गयी महान प्रज्वलित शक्ति के प्रहार से 
अचेत होकर गिर पड़े। वह शक्ति उनके हृदय में लगी थी और पार होकर धरती तक 
पहुँच गयी थी। महाबली रघुनाथ जी ने उस शक्ति को अपने दोनों हाथों से पकड़कर 
लक्ष्मण के शरीर से निकाला और उसे तोड़ डाला। इस बार भी मृत प्रायः लक्ष्मण को 
-सुषेण ने ही जीवित किया। सुषेण ने श्री राम को स्वस्थ करते हुए कहा-आपके भाई 
शोभा-वर्धन लक्ष्मण मरे नहीं हैं। देखिये इनके मुख की आकृति अभी बिगड़ी नहीं है 
और न इनके चेहरे पर कालापन आया है, इनका मुख प्रसन्‍न एवं कांतिमान दिखाई 
दे रहा है। इनके हाथों की हथेलियाँ कमल जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं 
मरे हुए प्राणियों का ऐसा रूप नहीं होता। इनकी साँस चल रही हैं और हृदय बार-बार 

कम्पित हो रहा है। ये सभी लक्ष्मण जी के जीवित होने की सूचना दे रहे हैं।* 
फलतः सुदूर पर्वत से विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी तथा संधानी 
नामक प्रसिद्ध औषधियाँ मँगायी गयीं जिन्हें हनुमान लेकर आये थे; और उन्हें सूंघते 
ही लक्ष्मण विशल्य तथा विरुज हुए यानि वह मृत्यु के मुख से लौट आये। इसी प्रकार 
एक बार और इन्द्रजीत के अधीन राक्षसों द्वारा श्री राम, लक्ष्मण तथा अन्य सेना 
नायक मृतप्रायः हो गये उस समय भी जाम्बवान, विभीषण ने परस्पर सलाह कर 
हनुमान जी को पर्वतश्रेष्ठ हिमालय पर.जाने को कहा। जाम्बवान ने उन औषधियों का 
विस्तृत परिचय देते हुए कहा-ऋषभक़ तथा कैलाश पर्वत शिखरों के बीच में एक 
दिव्य औषधियों का पर्वत दिखाई देगा जो अत्यन्त ही प्रदीप्त है। वानर सिंह उस 
पर्वत-शिखर पर उत्पन्न चार औषधियों को तुम्हें लाना है वे हैं-मृत संजीवनी, विशल्य 
करणी, सवर्ण करणी और संधानी। हनुमान जी वहाँ गये-वे दिव्य औषधियाँ, ये 
जानकर कि कोई उन्हें लेने आया है तत्काल अदृश्य हो गयीं। फलतः शिखर को 
उखाड़कर वे उसे उठाकर ले आये। उन औषधियों के प्रयोग से सभी योद्धा स्वस्थ हो 
गये, उनमें श्री राम और लक्ष्मण भी थे। हनुमान जी ने उस पर्वत को पुनः उठा लिया 
और उसके स्थान पर ले जाकर रख दिया। इस प्रकार ये चारों औषधियाँ भिन्‍न-भिन्‍न 
स्थानों पर उपलब्ध थीं तथा इन्हें सुषेण तथा जाम्बवान भी जानते थे। क्षीर सागर के 
तट पर चन्द्र और द्रोण पर्वतों पर भी विशल्यकरणी तथा संजीवकरणी औषधियाँ प्राप्त 
वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 50। 


होती थीं। एक बार और लक्ष्मण शक्ति के प्रहार के बाद अपने विष्णु के अंश रूप का 
स्मरण कर अर्थात्‌ आत्म-विश्वास द्वारा ही स्वस्थ हो गये। 

आज के युग में विशल्य-करणी, सुवर्णकरणी, मृत संजीवनी तथा संधानी औषधियाँ 
अपने मौलिक रूप में अप्राप्य हैं। यह संभव भी है क्योंकि आदि काव्य बने 8 हजार 
वर्ष बीत चुके होंगे परन्तु उनके गुणों को यादकर आज भी उनकी दिव्यता के विषय 
में संदेह नहीं रहता। जैसाकि उनके नाम से स्पष्ट है- 

विशल्य-करणी शल्य निष्कासन में उपयोगी थी, तथा सुवर्ण-करणी मानव देह की 
वैवर्ण्यता को ठीक करती थी, मृत संजीवनी मृत व्यक्ति को जीवित करने में समर्थ थी 
तथा संधानी अस्थि संधान करने में सहायक होती थी। 

सम्पूर्ण युद्ध के बाद जब इन्द्र आदि देव श्री राम को बधाई देने आये तब इन्द्रादि 
देव ने प्रसन्न होकर श्री राम से कहा “जो इच्छा हो सो मुझसे कह दो” । श्री राम ने 
देवेश्वर को प्रसन्‍न जानकर कहा--देवेश्वर मेरे लिये युद्ध करते हुए मारे गये ये वानर, 
भालू आदि योद्धा पुनः जीवित हो उठें। मैं इन्हें निरोग, निर्द्रग तथा बलपौरुष से 
सम्पन्न देखना चाहता हूँ। 

इन्द्र के उपचार तथा उनकी कृपा से बानर, लंगूर तथा रीछ, आलू नींद टूटने से 
सोकर उठे मनुष्यों की भाँति नीरोग, व्रणहीन तथा बल-पौरुष से सम्पन्न होकर उठ 
बैठे /* वे सब वानर श्रेष्ठ जिनके सब अंग पहले घावों से भरे थे उस समय घाव रहित 
हो गये और सभी सोकर जागे हुए की भांति सहसा उठ खड़े हो गये। 

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि आज से आठ हजार वर्ष पूर्व अर्थात्‌ 
वाल्मीकि रामायण के निर्माणकाल में भारतीय-शल्य-शास्त्र (शालाक्य) पर्याप्त रूप से 
उन्नत था और उस समय ऐसी पर्याप्त औषधियाँ भी उपलब्ध थीं जो अपने चमत्कार 
द्वारा आने वाले शस्त्र-प्रहार से मनुष्य की रक्षा कर सकती थीं तथा मरणासन्न 
शल्प्राक्रान्त रोगी को भी समुचित रूप से शल्य से मुक्ति दिला सकती थीं। 

वर्तमान चिकित्सा-प्रणाली अत्यन्त विकसित मानी जाती है, आज के विज्ञान ने 
इतनी प्रगति कर ली है यदि किसी व्यक्ति का कोई अंग कट जाये या बेकार हो जाये 
तो उसके स्थान पर दूसरे अंग का प्रत्यारोपण कर दिया जाता है किन्तु यह प्रत्यारोपण 
का विचार नवीन नहीं है। रामायण काल में भी बहुत विद्वान एवं कुशल शल्य-चिकित्सक 
थे जो व्यक्ति के अंगों के कट जाने पर उसके स्थान पर अन्य किसी के अंगों का 
प्रत्यारोपण कर दिया करते थे और व्यक्ति. पुनः पूर्ववत्‌ अनुभव करने लगता था; 
रामायण में “'मेषवृषण” का उल्लेख इसका स्पष्ट उदाहरण है- 
मेषबृषण 

एक बार इन्द्र महात्मा गौतम का वेष धारण 'कर पत्नी अहिल्या के पास आश्रम 
में गये और अहिल्या ने उनको अपना पति ही मानकर वैसा ही आचरण एवं व्यवहार 
किया। यद्यपि वह यह समझ गयी थीं कि यह इन्द्र हैं तथापि 'देवेश्वर मुझ पर प्रसन्‍न 

502 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


हुए हैं! ऐसा मन में सोचकर उन्होंने इन्द्र के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और जब 
महर्षि गौतम वहाँ पधारे तो उन्हें आया देख इन्द्र वहाँ से भागने लगे। महर्षि ने उन्हें 
अपने वेष में देखा तो सारी स्थिति समझकर वह उन पर क्रोधित हो गये और श्राप 
दे दिया; “दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करने योग्य पाप-कर्म किया है, 
इसलिये तूविफल (अण्डकोषों से रहित) हो जायेगा ।" रोष में भरे हुए महात्मा गौतम 
के ऐसा कहते ही इन्द्र के दोनों अण्ड कोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े ।” तदनन्तर 
अण्डकोषों से रहित होकर वह बहुत डर गये। वे अग्नि आदि देवों से इस प्रकार 
बोले-'देवताओ ! महात्मा गौतम की तपस्या में विष्न डालने के लिये मैंने उन्हें क्रोध 
दिलाया है, मुनि ने क्रोध पूर्वक भारी श्राप देकर मुझे अण्ड कोष से रहित कर दिया 
है इन्द्र का यह वचन सुनकर मरुद्रगणों सहित अग्नि आदि समस्त देवता काव्य 
वाहन आदि पितृ-देवताओं के पास जाकर बोले,# 'पितृगण! यह आपका भैेड़ा 
अण्ड-कोष से युक्त है और इन्द्र अण्ड-कोष रहित कर दिये गये हैं। अतः इस भेड़े के 
दोनों अण्डकोषों को लेकर आप शीघ्र ही इन्द्र को अर्पित कर दें।“ अण्डकोषों से 
रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थान में आप लोगों को प्ररम संतोष प्रदान करेगा। 
अतः जो मनुष्य आप लोगों की प्रसन्‍नता के लिये अण्डकोष रहित भेड़ा दान करेंगे, 
उन्हें आप लोग उस दान का उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे । अग्नि की यह बात 
सुनकर पितृ-देवताओं ने एकत्र हो भेड़े के अण्ड कोषों को उखाड़कर इन्द्र के शरीर 
में उचित स्थान पर जोड़ दिया।४ 

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पितृ-देव-गण 
कुशल-शल्य-चिकित्सक थे जो एक-दूसरे के अंगों का प्रत्यारोपण एवं शल्य-क्रिया 
सफलतापूर्वक करने में कुशल थे। 
गर्भस्थ शिशु के अंगों को काटकर निकालना आदि 

वाल्मीकि रामायण में गर्भस्थ शिशु को शल्य-चिकित्सक द्वारा शल्य-क्रिया के 
माध्यम से टुकड़े-टुकड़े कर बाहर निकालने का भी उल्लेख मिलता है यथा-सीता. ने 
अशोक-वन में अत्यन्त दुःखी होकर यह कल्पना की, कि रावण निश्चय ही अपने तीखे 
शस्त्रों से मेरे अंगों के टुकड़े कर डालेगा जैसे शल्य चिकित्सक किसी विशेष अवस्था 
में गर्भस्थ शिशु के टूक-टूक कर देता है।” 

इस प्रकार प्रस्तुत अध्याय में रामायण में वर्णित शल्य-सामग्री का संक्षेप में परिचय 
प्रस्तुत किया गया है, जो तत्कालीन समाज की प्राचीनता के आधार पर अत्यन्त 
उत्कृष्ट एवं उच्च कोटि का है। 
संदर्भ 
4. सु. सू. 26/3 
2. च. सू. 30/26 
3. सु. सू. 9 आ. सं. सू, /0, अ. है. सू. /5 
4. शल्य॑ नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोह लोष्ठास्थिवालनखपूयास्राव दुष्टव्रणान्तर्गर्भ 

शल्योद्वाराणार्थ यन्त्र शस्त्र क्षाराग्नप्राणिधानाथ॑ व्रणविनिश्चयार्थज्व सु. सू, ]/9 


वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 503 


5. च. सू. 30/26 
6. सु. सू. 700 
7. सू. 7/0 (सु.सू) 
8. सूत्र ।/5 (सु.सू.) 
9. शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां रोगाणां श्रवण-नयन-वदन-स्राणादि संश्रितानां व्याधीनां 
प्रणिधानार्थ च । सु. सू. /0 
0. समासतश्चतुर्विधं शल्यं भवति वृत्तदित्रिचतुष्कोभेदेन। 
तददृश्यमानं व्रणसंस्यानादनुमिमीत ।। अ. सं. 37/3) 
प7. अष्टांग संग्रह 38/3 
2. तश्च शस्त्रकर्माष्टविधा। तथथा-छेद्॑, भेद, लेख्यं, वेध्यं, एण्यम्‌ आहार्यम, विव्नाव्यं 
सीव्यमिति ।॥। सुश्रुत 5/5 है 
3. च. थि. अ. 25 
4. सुश्रुत संहिता पूर्वाद्ध 5/5 
5. सुश्रुत संहिता पूर्वाद्ध 5/5 
6. सुश्रुत पूर्वाद्ध 5/6 
प7. सु. सू. 7 
38. अ. ह. सू. 25 
9. अ. सं. 34/4 
20. अष्टांग सं. 38/3, 4 
श. सु. सू. 5 
22. अष्टांग संग्रह 38/5, 6, 7 
23. तत्र शस्त्र कर्म अष्टिवधमू। सु. ॥ 
24. पाटन॑ व्यधन चैव देदनं लेचानं तथा प्रोच्छनं सीवक चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत्‌ (चरक)। 
25. अ. ह. सू. 29 
26. अष्टांग संग्रह 38/8 
श. सु. सू. 500 
28. अष्टांग संग्रह 38/20, 2, 22 23 
29. सु. सू. 5/7 
30. विशेषतश्च दिवास्वप्नादव्रणे शोफ कण्डू राग रुक पूय वृद्धि:।। 
स्त्रीणां तु स्मृति संस्पर्शदशनैश्चलिते सुते। 
शुक्रे व्यवाजयानूदोषानसंसर्गेउप्यवाप्नुयात्‌ ।। अ. सं. 38/25, 26 
- ब्रणे श्ववथु: अयासात्‌ स च रागश्च जागरातू। 
तौ च रुक्‌ च दिवास्वापात्‌ ताश्च मृत्युश्व मैथुनात्‌।। सु. सू. 9/36 
32. तस्मादू अन्तर्बहिश्वैव सुशुद्धं रोपयेद व्रणमू। 
रूढेडपि अजीर्णव्यायामव्यवायादीन्‌ विवर्जयेत्‌ ।। 
33. हर्ष क्रोधं भयं चापि यावत्‌ स्वैयोपसंभवात्‌ ।। 
सु सू. 5/38अष्टांग संग्रह 38/27 
34. बालोशीरैश्च वीज्येत न चैनं परिघट्टयेत। 
* न तुदेन्न च कण्डूयेच्चेष्टमानश्व पालयेतू।। 


504 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


६८) 


स्निग्ध वृद्धद्धिजातीनां कथा: श्रृण्वन्मनः प्रियाः। 
आशावान्यधिमोक्षाय क्षिप्रं ब्रणमपोहति ।। अ. सं. 38/3, 32 
$5. पुनश्च तृतीयेज्हनि प्रक्षालनादि पूर्ववद्ब्रणकर्म कुर्यात्‌। 
द्वितीये दिवसे मोक्षणदादी विग्रथितो व्रणश्चिरादुपरोहत्युग्ररजश्च भवति ।। अ. संग्रह 38/33 
36. वाल्मीकि रामायण अयो. 7/3 
एलधाने नदीं तीर्ल्वा प्राप्य चापरपर्वतानू। 
37. पितामह मिवाश्विन्यौ बा. 28/8 
शिलामार्कुरवती तीर्वा आग्नेयं शल्यकर्षणमू।। 
38. मंत्रग्रामं गृहाणत्वं बलामतिबलां तथा। 
न श्रमो न ज्वरो वा ते न रुपस्य विपर्ययम्‌ ।। बा. 22/3 
39. औषधिं च सुसिद्धार्था विशल्यकरणीं शुभामू। 
चकार रक्षां कौसल्या मंत्ररभिजजाप च।। अ. 25/38 
40. तस्मिन्‍ननागच्छति लोक नाथे गर्भस्थ जन्तोरिव शल्यकृन्तः। 
नून॑ मामांगान्य चिरादनार्यः शस्त्रे: शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्र:।। सु. 28/6 
47. ततो मर्मसुमर्मज्ञो। यु. 45/5 
42. तौ सम्प्रचलिती वीरौ मर्म भेदेन कर्षितौ। 
निपेततुर्महिष्वासौ जगत्यां जगती पतिः।। यु. 45/8 
43. दीपो नेत्रातुरस्येव यु. 6/7 
44. राक्षसस्य स्तनाभ्याशे मर्मज्ञो हृदयं प्रति। यु. 98/2॥ 
45. सु. 67/8 
46. यु. 46/34 
47. यु. 46/35 
48. यु. 46/40 
49. यु. 88/2 
50. यु. 69/60 
5. अर. 22/2 
52, यु. 69/60 
53. यु. 59/45 
54. मोहनेन वा. यु. 72/7 
55. यु. झ/श 
56. यु. 9/22 
57. यु. 9427 
58. नैवपंचत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धन:। 
न हास्यविकृतं वक्‍त्रं न च श्यामत्वमागतम्‌। 
सुप्रभं च प्रसन्‍न॑ च मुखमस्य निरीक्ष्यताम्‌।। यु. 0/25-26 
59. सत्रणैः प्रथम गात्रैरिदानी निर्व्रणे: समैः। 
ततः समुत्यिताः सर्वे: सुप्वैव हरिसत्तमा:।। यु. 20/7 
60. बा. 48/27 
6. बा. 48/28 


वाल्मीकि रामायण में शल्य चिकित्सा विधान / 505 


62. बा. 49/-8 
63. बा. 49/5 
64. बा. 49/6 
65. बा. 49/7 
66. बा. 49/8 
67. तसिमन्‍नगच्छति लोकनाथे गर्भस्थ जन्तोरिव शल्यकृन्तः। 
नून॑ मामांगान्य चिरादनार्थ: शस्त्रे: शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्र:।। सु. 28/6 


506 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


दशम परिवर्त 
उपसंहार 


निष्कर्ष एवं मूल्यांकन 


“वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद” नामक दस अध्यायों में विभक्त प्रस्तुत 
ग्रन्थ रामायण पर आधारित सभी आयुर्वेदिक सामग्री की समीक्षा करता है। उक्त 
कार्य के लिये वाल्मीकि रामायण के दाक्षिणात्य एवं औदीच्य संस्करणों का उपयोग 
किया गया है। इस कार्य के लिये गीता-प्रेस गोरखपुर का तीसरा संस्करण संवत्‌ 
2033 ही स्वीकार कर मुख्य रूप से उसी को मार्ग-दर्शक मानकर कार्य किया गया 
है। विवेच्य सामग्री के पाठों की शुद्धि के अनन्तर ही यह कार्य आरम्भ किया 
गया। 

लौकिक संस्कृत साहित्य में आदिकाव्य “वाल्मीकि रामायण” का एक महत्त्वपूर्ण 
स्थान है। इस महाकाव्य में ज्योतिष, तन्त्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रों का भी 
समावेश किया गया है। रामायण में राजनीति, मनोविज्ञान आदि के तत्वों को भी 
रखा गया है। 

इन सभी गुणों के आकर होने से ही यह काव्य सर्वाधिक लोक-प्रिय, अजर, 
अमर, दिव्य तथा कल्याण कर है। इसका प्रभाव अठारह पुराणों, महाभारत, 
शत्रुज्जयमहात्म्य, रघुवंश, सेतुबन्ध, भट्रिटकाव्य, महानाटक, अनर्घराघव, बाल 
रामायण, कादम्बरी एवं वृहत्संहिता पर सुस्पष्ट रूप से है। किमधिकं, सन्‍्तों के 
शब्दों में यह रामायण “श्री राम तनु! है। इसलिये अनादि काल से ही इसके 
श्रवण-पठन-अनुष्ठानादि की परम्परा है। 

प्राक्कथन, भूमिका, अध्ययन का उद्देश्य-में इस महाकाव्य के अद्यावधि 
प्रकाशित सभी संस्करणों एवं टीकाओं की चर्चा की गयी है। इसके अतिरिक्त इस 
महाकाव्य का विशिष्ट अध्ययन जिन पाश्चात्य एवं प्राच्य विद्वानों द्वारा हुआ है 
उनका भी समग्रन्थ नाम निर्देश कर दिया गया है। इस महाकाव्य के विभिन्‍न विषयों 
पर जो भी प्रकाशित एवं अप्रकाशित शोध-प्रबन्ध हैं उनका भी संकेत यहाँ कर 
दिया गया है। आयुर्वेदीय विषयों पर भी जो निबन्ध पाश्चात्य एवं भारतीय 
विद्वानों द्वारा लिखे गये उनका भी सन्निवेश कर देना यहाँ उचित समझा गया। 
उक्त ग्रन्थ महाकाव्यगत उस अध्ययन की न्यूनता की पूर्ति करता है जिस पर अभी 
तक कोई कार्य नहीं किया गया। अपने इस कार्य की उपलब्धि एवं वैशिष्ट्य का 


उपसंहार / 507 


भी यहाँ चित्रण कर दिया गया है। 
प्रथम परिवर्त का शीर्षक “विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन! 
है। यह पाँच परिच्छेदों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद में संस्कृत साहित्य की 
विशालता का वर्णन है, इसके अन्तर्गत वैदिक युग से आधुनिक तक सभी 
रचनांओं का नामोल्लेख प्रस्तुत किया गया है। इसी परिच्छेद में “वाल्मीकि 
- रामायण” का विविध-दृष्टि-कोणों से अवलोकन किया गया है। यशा-उपजीव्य 
काव्य वाल्मीकि रामायण, आदि काव्य रामायण, रामायण का आकार, विषय 
वस्तु-उत्पत्ति काल, रामायण के प्रक्षिप्ताश, रचना काल, रामायण का महाकाव्यत्व- 
रामायण कालीन समाज एवं संस्कृति, रामायण के सभी संस्करण-टीकाएँ एवं 
प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना में जिन-जिन संस्करणों का प्रयोग किया गया है। द्वितीय 
परिच्छेद में यह वर्णन प्राप्त होता है कि अब तक विविध साहित्यिक ग्रन्थों में 
आयुर्वेदिक दृष्टि से शोध कार्य हुए हैं, वे अनुमानतः कौन-कौन से हैं अर्थात्‌ उनके 
एवं उनके रचनाकारों का नामोल्लेख किया गया है साथ ही उनका शोध-दृष्टि से 
क्या महत्व है यह भी बताया गया है। तृतीय परिच्छेद आयुर्वेद का संक्षिप्त 
साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करता है-इसके अन्तर्गत काय चिकित्सा, कौमारभृत्य, 
गृह-चिकित्सा, शालाक्य तन्‍्त्र, शल्य-चिकित्सा, विष चिकित्सा, जरा-चिकित्सा एवं 
वाजीकरण चिकित्सा-इन आठ आयुर्वेदिक अष्टाज्ञों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत 
किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में आयुर्वेद-साहित्य का काल-क्रम से विभाजन 
प्रस्तुत किया गया है-यथा . संहिता काल-5 से 6 शताब्दी, 2. व्याख्या काल-7 
से 5 शताब्दी एवं विवृति काल 6 से आधुनिक काल तक। पंचम परिच्छेद में 
यह बताया गया है कि वाल्मीकि रामायण के काल में आयुर्वेदिक साहित्य की क्या 
स्थिति थी, अर्थात्‌ उसका अस्तित्व समाज में था भी या नहीं। इसके साथ ही 
तत्कालीन चिकित्सकों का सामाजिक स्तर एवं सम्मान क्‍या था? तथा इसी में 
“वैद्य! एवं 'भिषक्‌' शब्दों की व्याख्या भी प्रस्तुत की गयी है। 
द्वितीय परिवर्त का शीर्षक है-“वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण । 
यह परिवर्त 4 अध्यायों में विभक्त है तथा शरीर-विज्ञान-विषयक सामग्री का 
परिचायक है। इसके प्रथम परिच्छेद में छः उपखण्ड हैं-. “आयु और उसका 
आधार' इसके अन्तर्गत वा. रा. में आयु का कहाँ-कहाँ उल्लेख है तथा चरक, 
सुश्रुत आदि चिकित्सा ग्रन्थ इसके विषय में क्या वता रहे हैं, इसी प्रकार 2. आत्म 
बल, 3. शरीर की रचना, शरीर का प्राविभाग, त्वचा, कला, दोष, मल 4. 
अन्तःकरण, 5. इन्द्रियाँ 6. प्रकृति भेद-वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक प्रकृति आदि 
का रामायण के सन्दर्भ में उल्लेख एवं चरक संहिता आदि चिकित्सा ग्रन्थों के 
आधार पर समीक्षा भी प्रस्तुत की गयी है। द्वितीय परिच्छेद में प्रशस्त सामुद्रिक 
लक्षणों का उल्लेख किया गैया है। राजा राम, लक्ष्मण आदि का हनुमान द्वारा तथा 
508 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


सीता के शरीर में विद्यमान प्रशस्त सामुद्रिक लक्षणों की सन्दर्भ प्रस्तुति एवं 
सामुद्रिक शास्त्र के ग्रन्थों के आधार पर उनकी समीक्षा भी इसी परिच्छेद में प्रस्तुत 
की गयी है। तृतीय परिच्छेद स्वास्थ्य का महत्व एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करने 
वाले तत्वों का प्रतिपादन करता है। इसमें वंशानुक्रम, वातावरण, आहार की 
समीक्षा की गयी है तथा चतुर्थ परिच्छेद में मांस तत्व (प्रोटीन) एवं उसके कार्य 
तथा कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण, जीवनीय द्रव्य, जल, स्वस्थ वृत सदवृत 
आदि का रामायण के सन्दर्भ में उल्लेख एवं चरकादि ग्रन्थों से समीक्षा प्रस्तुत की 
गयी है। 

तृतीय परिवर्त का शीर्षक “शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थ वृत्त की सामग्री” 
है। यह भी तीन उपखण्डों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद के अन्तर्गत दिनचर्या का 
वर्णन किया गया है यथा-प्रातः जागरण, शौच, सन्‍्तोष, आचमन, दन्त-धावन, 
पूजा, सन्ध्योपासना, पादुका-धारण, छत्र-धारण, दण्ड-धारण, पुष्पाभरण धारण, 
अनुलेपन आदि तत्वों का रामायण में उल्लेख एवं शास्त्रों द्वारा उनकः ही स्थिति 
आदि के रूप में समीक्षा प्रस्तुत की गयी है। द्वितीय परिच्छेद में भक्ष्याभक्ष्य विचार 
का उल्लेख किया गया है इसमें आहार, भोजन के गुण, समय, भोजन का स्थान, 
भोक्‍्ता, पक्वान्न भोजन, फलाहार भोजन, मांसाहार भोजन, पेय भोजन, भोजनोत्तर 
कर्म, माध्यनिदनीय कर्म, शैया, शयनासन, रात्रिचर्या, आसव, मदिरापान, मधुपान 
आदि की रामायण के सन्दर्भ में समीक्षा की गयी है। तृतीय परिच्छेद ऋतुचर्या 
विषयक है। इसमें शास्त्रोक्त ग्रीष्म, वर्षा आदि षड़्ऋतुचर्या का वाल्मीकि रामायण 
के सन्दर्भ में उल्लेख किया गया है तथा उसकी समीक्षा भी विविध शास्त्रों के 
आधार पर की गयी है। 

चतुर्थ परिवर्त का शीर्षक है-“वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध-परिचय 
एवं द्रव्य-गुण-शास्त्र की सामग्री / इसके अन्तर्गत भी तीन परिच्छेद हैं जो विविध 
औषधियों का परिचय देते हैं। प्रथम परिच्छेद में भौतिक एवं प्राकृतिक औषधियों 
का उल्लेख एवं उनके गुण-दोष परक समीक्षा तथा सामान्य जन-जीवन में उनके 
एक-दो चिकित्सीय उपयोगों का भी उल्लेख किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में 
वानस्पत्य औषधियों का नामोल्लेख-विविध भाषाओं में नाम, गुण, दोष एवं कुछ 
चिकित्सीय उपयोग भी बताये गये हैं तथा रामायण में इनकी उपलब्धि भी बताई 
गयी है। इन औषधियों के साथ-साथ कुछ दिव्य औषधियों यथा- संजीवनी, 
विशल्य-करणी, संधानी आदि का भी उल्लेख किया गया है। तृतीय परिच्छेद में 
धातुज औषधियों यथा-हिरण्य, पिड़, नमः वज़ः आदि की गुण-दोष परक समीक्षा 
प्रस्तुत की गयी है। 

पञ्चम परिवर्त में रोगोत्पत्ति के कारणों का उल्लेख किया गया है-इसका 


शीर्षक है “वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण / यह परिवर्त तीन उपखण्डों 
उपसंहार / 509 





में विभक्त है। प्रथम खण्ड में शारीरिक कारण यथा- वात, पित्त, कफ, 
असाल्पेन्द्रियार्थ संयोग आदि का शास्त्रोक्त परिचय एवं वा.रा. में उसके सन्दर्भ 
का उल्लेख किया गया है। द्वितीय खण्ड में मानसिक कारण यधा-काम, क्रोध, 
मोह, ईर्ष्या आदि की समीक्षा तथा तृतीय खण्ड में आगन्तुक कारणों तथा 
आधातजन्य, ऋतु-सम्बन्धी आदि कारणों की समीक्षा प्रस्तुत की गयी है। 

घष्ठ परिवर्त में विविध रोग एवं उनका निदान प्रस्तुत किया गया है, इस 
परिवर्त का शीर्षक है, “वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान? 
यह परिवर्त पाँच परिच्छेदों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद में शारीरिक रोगों यथा 
अतिसार, ज्वर, अंग-भेदन, राजयक्ष्मा आदि विविध रोगों का रामायण के परिप्रेक्ष्य 
में वर्णन एवं उनका विविध चिकित्सा ग्रन्थों के आधार पर निदान प्रस्तुत किया 
गया है। द्वितीय परिच्छेद में मानसिक रोग यथा-मूर्च्छा, उन्‍्माद, अपस्मार आदि 
रोगों के लक्षण एवं चिकित्सा तथा प्रकार रामायण एवं चरक, सुश्रुत आदि ग्रन्थों 
के आधार पर बताये गये हैं। तृतीय परिच्छेद में आगन्तुक रोगों की समीक्षा एवं 
चिकित्सा का वर्णन है जिनमें अर्दित, आघात, वज्रपात आदि विविध रोगों का 
उल्लेख है। चतुर्थ परिच्छेद में स्त्री रोग एवं गर्भावक्रान्ति विषयक सामग्री है। 
इसके अन्तर्गत रजस्वला, गर्भहास, गर्भपात, मूढ़गर्भ, बन्ध्यात्व, औषधि से पुत्र 
प्राप्ति आदि तत्वों की समीक्षा एवं रामायण में उनकी प्राप्ति का वर्णन किया गया 
है साथ ही गर्भ में भ्रूण का मासानुमासिक विकास एवं मातृज, पितृज एवं 
आत्मजभाव आदि की समीक्षा भी की गयी है। पंचम परिच्छेद में विष-चिकित्सा 
का वर्णन है। रामायण में उल्लिखित सर्प-विष, कन्द विष आदि का प्रभाव एवं 
उनकी चिकित्सा भी यहाँ उल्लिखित है। 

सप्तम परिवर्त में प्राकृतिक चिकित्सा विधान प्रस्तुत किया गया है। यह भी 
चार उपखण्डों में विभक्त है। वाल्मीकि रामायण काल में भी प्राकृतिक चिकित्सा 
का प्रचलन था, इस तथ्य की पुष्टि प्रस्तुत परिवर्त में की गयी है। प्रथम खण्ड में 
अग्नि द्वारा या सूर्य रश्मियों द्वारा चिकित्सा का वर्णन है, द्वितीय खण्ड में जल 
द्वारा चिकित्सा तथा तृतीय खण्ड में मृतिका द्वारा चिकित्सा एवं चतुर्थ खण्ड में 
वायु द्वारा चिकित्सा का वर्णन है तथा रामायण के सन्दर्भ में इसकी समीक्षा की 
गयी है। 

अष्टम्‌ परिवर्त में तान्त्रिक चिकित्सा एवं भूतविद्या विषयक सामग्री का 
समावेश किया गया है। इसका शीर्षक है “वाल्मीकि रामायण में तान्त्रिक चिकित्सा 
एवं भूत विद्या विषयक सामग्री” यह परिवर्त भी चार परिच्छेदों में वर्णित है। प्रथम 
परिच्छेद में मणिबन्धन (डोरा, गण्डा, ताबीज) आदि द्वारा चिकित्सा, द्वितीय खण्ड 
में अभिमार्जन (झाड़ा, फूका आदि) द्वारा चिकित्सा, तृतीय खण्ड में कृत्या (प्रयोग 
एवं अपहरण) द्वारा चिकित्सा एवं चतुर्थ खण्ड में आशीर्वाद के बल से रोगों को 

50 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


दूर करने एवं पुत्रेष्टि यज्ञ, मंत्र द्वारा सर्प-पकड़ना, वशीकरण, शकुन-विज्ञान एवं 
स्वप्न-विज्ञान आदि तत्वों का उल्लेख एवं रामायण के सन्दर्भ में इनकी समीक्षा 
प्रस्तुत है। ह 

नवमू परिवर्त में शल्य-चिकित्सा विधान बताया गया है। “वाल्मीकि रामायण 
में शल्य-चिकित्सा-विधान' इसका शीर्षक है। इसके अन्तर्गत शल्य की शास्त्रोक्त 
अवस्थाओं, उपकरणों, विधियों, रोगी, परिचर्या, मेषवृषण एवं गर्भस्थ शिशु के. 
अंगों को काटकर निकालना जैसे शल्य सम्बन्धी तत्वों की रामायण के सन्दर्भ में 
समीक्षा की गयी है। 

दशम्‌ परिवर्त में सम्पूर्ण ग्रन्थ का सार स्वरूप उपसंहार है, जिसमें निष्कर्ष एवं 
मूल्यांकन निहित है। इसके अन्तर्गत दसों परिवत्तों के सार को संक्षेप में एक दृष्टि 
में विद्वत्जनों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। 

अंत में अनेक परिशिष्ट हैं जिनके माध्यम से वानस्पतिक औषधियों, औषधि 
शब्दावलि, रोग नामावलि, खनिज-द्रव्यों, जाड्म द्रव्यों, शरीर-विशेषज्ञों एवं शरीरावयवों 
की ससन्दर्भ परियोजना की गयी है। इस प्रकार परिशिष्टों की संख्या 6 है। ग्रन्थ 
के अंत में ससन्दर्भ ग्रन्थावलि भी दी गयी है। इस प्रकार लेखिका का यह पूर्ण 
प्रयास रहा है कि “आदि काव्य काल” से ही “आयुर्वेद” जगत की सेवा करता रहा 
है, इस तथ्य से “साहित्य जगत” को परिचित करा सके। 
परिशिष्ट संख्या [ 
[. वा. रामायण में उल्लिखित वानस्पतिक औषधियों की सूची 


रामायण में द्रव्य॒ हिन्दी तवा प्रसंग स्थान का प्रयोग 
का नाम लेटिन नाम 
अगरु अगर अयो. 4/28 श्री राम राज्याभिषेक के समय 
4्णोक्वां8 अयोध्या नगरी में धूप 
#8भो2ला9 7०७ अयो. 7/-2 श्री राम के अभिषेक में 
अयो. 3/6 अगरु धूप 


अयो. 6776 चिता जलाने के लिये 

अयो. 7/28 धूप के लिये 

अयो. 7647 श्मशान में चिता पर 

अयो. 76/28 बिना राजा के नगर की स्थिति 
अयो. 88/6 धूप के निमित्त 

अयो. 9/85 लेप के लिये 

अयो. 94/24 चित्रकूट में 


उपसंहार / 5 


अग्नि-मुख 


अतिबला 
अभिष्ट 


अम्बुंज 


अर्क 


अयो. 4/20, 22 धूप के निमित्त 


अर. 35/22 
कि. 38/7 
कि. 50/7 
सु. 9८2 
सु. 29/8 
यु. श/4 
यु. 75/8 
यु. 4/05 
उ. 42/9 
मल्लातक “कलिहारी' . अर. 73/5 
डिशा॥€ (हाट 
खैव३९श तंपा 
तिनिश अर. 75/24 
उशण्णाथागलाणाहए कि. शत7 
उ. 42/4 
कंघी बा. 22/3,5,8 
काला अगरु 
#फणाणा पातंटा 
कमल, समुद्र फल. कि. 30८4 
उैशाणाए00 
िपलंशिक उ. 408 
ठ्ब्यााा 
आक अयो. 94/6 
(ग०णाफां5ड 
शि०्ल्शाब 
अर्जुन अर. 60/4 
पद्ञायंगभां॥ 
खीपुंणाब 
कि. /80 
कि. 2700 


लंका के समुद्र तट पर 
किष्किन्धापुरी में 

दक्षिण गुफा में 

रावण के निवास गृह में 

शुभ शकुन 

बालक राम की बाहों पर लेप 
अगरू जल का प्रयोग (अर) 
रावण के शव को जलाने के लिये 
अयोध्या में 

पंपासर के पास 


पंपासर के पास 

तुंगभद्रा नदी के किनारे 
अयोध्या की अशोक वनिका में 
विश्वामित्र द्वारा राम को प्रदत्त 
माल्यवान पर्वत पर 


उपमा प्रयोग 

आर्क पुष्प (पुष्पाकी 
अप्रत्यक्ष सीता के विषय में 
राम का प्रश्न 


पंपासर के अरुष्य में 
प्रक्षवण गिरि पर 


कि. 28/4, 9, 34, 4]माल्यवान पर्वत पर 
52 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


अरणी 


अरविन्द 


अरिष्ट 


अलंक्त 


अश्वत्थ 


अशोक वन 
अश्व कर्ण 


कि. 30/25 
यु. 4/80 
यु. १९/७6 
यु. 39/8 
उ. १65 
उ. 42/4 
अग्निमंथ अयो. 30/23 
टाशा00ला तणा 
जाणरांगांड... अयो. 04/%5 
यु. /6 
उ. 57/8, 9 
कमल अर. 75/2 
िलणाफ0 पिपलंशिब 
ठ्थ्शाता 
रीठा, निम्ब अयो. 94/9, 0 
39005 
वु्णागिंभ्प५ 
महावर अयो. 60/8 
जाए शांगरि4 
पीपल अयो. 9/49 
कंटघ5 #गाणध॥. अर, 73/5 
अशोक वनों से युक्त सु. 58/55 
शाल भेद बा. 24/5 
फीाफाश० एकाए05 
#2०५ एफ अयो. 99/9 
अर. 75/8 
कि. 304 
यु. 22/56, 57 
यु. 48/20 
यु. 59/77 


माल्यवान पर्वत पर 

मलय पर्वत कानन में 

सेतु निर्माणार्थ 

सुवेल पर्वत से दिखने वाला 
लंका का दृश्य 

कैलाश में 

अयोध्या की अशोक वनिका में 
अग्नि उत्पन्न करने के लिये 


अग्नि उत्पन्न होकर उसे ही 
जला डालती है 

रावण की चिता जलाने के लिये 
मिथि की उत्पति के निमित्त 
पंपासर पर 


चित्रकूट में 


लाल रंग हेतु 


भारद्वाजाश्रम पर 

पंपासर के पास 

लंका का अशोक वन 
विश्वामित्र तथा श्री राम की वार्ता 


चित्रकूट में पर्णकुटी के पास 
पंचवटी में 
किष्किन्धा की राह में 


- सेतु निर्माणार्थ 


सम्पाति वानर के हाथ में आयुद्ध 
युद्ध में नील के आयुध 


उपसंहार / 53 


यु. 76/23, 66 
अशोक अशोक अर. 5/7 
$क्ला३08 वतां28 अर. 42/6 
अर. 6007 


अर. 62/3 

अर. 73/5 

अर. 75/6, 24 
कि. /59 

कि. 6/39 
कि. श7/7 

सु. 0/4 


सु. 4/3 
सु. 5/7, 75 
सु. 340 
यु. 4/72 
यु. १९५57 
यु. 39/3 


यु. 56/28 
उ. 75/6 


उ. श/34 
उ. 26/5 
उ. 32/44 
उ. 42/3, 5 
यु. 28/4 


असन असन का वृक्ष अयो. 95/8 
शिलए2श्ाए०५5 


]श्रउण्फ़ांणा कि. 30/8,62 


54 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


युद्धास्त्र के रूप में 

पंचवटी में 

दण्डकारण्य में 

वियोगी श्री राम के प्रश्न 
(“पुष्पिता शोक संकास”) 
जनस्थान में भ्रमित श्री राम 
पंपासर के पास 

पंपासर के तट पर 
पंपासरोवर के अर्य में 
ऋष्यमूक पर्वत पर बाली गिर पढ़े 
तुंग भद्रा नदी के किनारे 
लंका में मंदोदरी के अशोक 
पुष्पों की माला 

लंका के अशोक वन में 
लंका में फु्पों से झुका अशोक वृक्ष 


सह्य पर्वत के कानन में 

सेतु निर्माणार्थ 

सुवेल पर्वत से दिखने वाला 
लंका का दृश्य 

लंका के अशोक वन में सीता 
ने अशोक की शाख छोड़ दी 
जड़ से कटे अशोक वृक्ष की 
तरह कुबेर गिर पड़े 

उपमा 

कैलाश में 

पुष्पों के रंग की समानता 
अयोध्या की अशोक वनिका में 


अयोध्या की अशोक वनिका 
का राजप्रासाद 


चित्रकूट में 


सीता के लिये विरही श्री राम 
की कल्पना 


असिपत्र 


असृक चन्दन 


आजै 


अक्षत 


आगम्र 


आग्र 


आमलकी 


आमलकान्‌ 
आमलकी 


इन्दीवर 


कि. 30/56 
सु. 2/0 
उ. 42/8 
जिस बृद्ष के पत्ते लेंहे की उ. 25 
धार के समान तीक्ष्ण हों 
लाल चन्दन उ. 69/9 
शिटा0 एथ्नभए०५ 
$क्ाश्ा॥05 
अजवायण अयो. 9/67 
(गांजा 
(एफरए्णा 
चावल अयो. 7/6 
07ंट4 $फरांएब.._ अयो. 20/7 
यु. 2/20 
आम का वृक्ष बा. 502 
शक्राह्डाटि4 008 अयो. 35/6 
“आम अयो. 5029 
अयो. 63/8 
अयो. 94/8 
कि. 28/9 
आँवला बा... 3/6 
एएजाशिएशए5 अयो. 9/30 
छागराशाए4 अयो. 94/9, 0 
आँवले यु. 4/75 
(लता) अयो. 9/5॥ 
नीलकमल अर. 45/25 
शाका0९७ 
5ाला0 
काश तृण अयो. 30/2 


माल्यवान पर्वत पर 

लंका में हनुमान जी ने देखा 
अयोध्या के अशोक वन में 
यमलोक के वर्णन में 


अंग में लिप्त रक्त चन्दन 
पाक में मिश्रण 


श्री राम के अभिषेक के लिये 
देव पूजन के लिये 

रावण के शव पर 

अयोध्या पुरी में 

उदाहरण (कुल्हाड़ी से आम 
काटकर नीम बोना) 

जनपद में 

उदाहरण (आम काटकर 
पलाश बोना) 


चित्रकूट में 

माल्यवान पर्वत पर 
पाणावामलक 

भारद्वाज आश्रम में 
चित्रकूट में 

सह्य कानन में 

भारद्वाज आश्रम में भरत के 
स्वागत में 

श्री राम का रंग 
(राममिन्दीवरः श्यामः) 


वन-गमन के प्रसंग में सीता 


उपसंहार / 55 


$80शीश्ाणा की कल्पना 
5एणाक्ाल्णा 
इंगुदी हिंगोट अयो. 50/28, 30 राम वन-गमन के समय राम 
के विश्राम का स्थान 
छ्वथा।।25 अयो. 87/22 भरत का निरीक्षण 
4 ०2५9080९4 अयो. 88. पिण्याक के लिये 
एल्काढ अयो.08/20, 29, 3, 4 पिण्याक के लिये 
डक्षु इटव अबो. 9//56. भारद्वाज आश्रम में 
$0९शक्राणा 
0एीसाणणा 
इक्षु काण्ट. ईख पौर अयो. 9/5,6 भारद्वाज आश्रम में (भरत के 
स्वागत में) 
उत्तरच्छद अयो. 94/24 चित्रकूट के प्रसंग में 
उत्तराअरणी यु. 76._ रावण की चिता जलाने के लिये 
उत्पल कमल अयो. 50228. वन की शोभा 
(इर्षन्नील वर्ण) अयो. 04/25 . मुख की समानता 
अयो. 73/2श .. पंपासर में 
],आए॥0९8 52॥988 अर. 75/श पंपासर में 
कि. 3/ पंपासर में 
कि. 43/22 कुबेर के भवन में 
सु. १/१, 4 लंका में हनुमान जी ने देखा 
सु. 7574, 9 लंका के अशोक बन में चैत्य 
प्रासाद में 
सु. छत हनुमान जी की उपमा 
यु. 4/85 सह्य गिरि के जलाशय में 
यु. 54/43 हनुमान जी के आकाश गमन 
के बाद लंका में 
यु. 88/2 मूर्छा हरण के लिये उत्पन्न 
जल प्रयोग 
उ. 26/22 खृंगार वर्णन 
उ. 4श्था अयोध्या की अशोक वनिका में 
उ. 77/5 वन में सरोवर में 
उत्पल नीलकमल समान नेत्रों वाली सु. 73/6 सीता जी के नेत्रों की 


56 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


समानता हनुमान द्वारा 


उद्दालक 


उशीर 


उशीर बीज 
एणोय 


औदुम्बरी 


औषधि 


अंकुर 
अंकोल 
कर्ण 


कर्णिकार 
उत्पल 


बहुवार अर. 75/6 
(णतांब ४7७... कि. 7/8 
कि. 42८7 
सु. ॥/शा 
सु. 4/3, 36 
सु. 5/9 
ख़स अयो. 55/0 
अर. 68/8 
एलाएशांब ड्राक्षांण१९५ यु. /3 
खस के बीज उ. 8/2 
गजकन्द अयो. 56/22, 25, 
25, 26, श7, 28 
गूलर की लकड़ी... बा. 4/25 
फल (8०श।भ8 
औषधि जल अयो. 94/श 
कि. 26/6 
कि. 484॥ 
सु. ॥/श 
यव की खीलें बा. 23/2, 22 
सणकर्णा ५३४९ 
अंकोल अयो. 94/8, 0 
#चैणाशांणा कि. /80 
(शाशलतां यु. 4/73, 8 


लम्बे पते का स्वनाम वृक्ष सु. 56/24 

कणेर अयो. 92/28 
(58 
कंडण॥ अर. 49/30 
अर. 60/20 
अर. 62/05 


अर. 73/3 ' 


कि. /2,73 


अर. 42/23, 3॥ 


पंपासर में 

पंपासर के अरण्य में 
कुक्षि देश में 

लम्ब पर्वत पर 

लंका के अशोक वन में 
लंका में 

नाव बनाने हेतु 

सीता के केश की समानता 
रावण के शव की चिता 
बनाने के लिये 

देश के नाम पर 
चित्रकूट में 


लव-कुश की भेंट (रामायण 
पाठ के उपलक्ष्य में) 
चित्रकूट में 

सुग्रीव के राज्याभिषेक में 
दक्षिण प्रदेश में 

विष नाशक 

मण्डप सजाने के लिये 


चित्रकूट में 
पंपासर के अरण्य 
मलय पर्वत के कानन में 
अरिष्ट गिरि पर लंका में 
सुमित्रा को उपमा 
पंचवटी के पास 
जन स्थान में 
श्री राम का प्रलाप प्रश्न 
वियोगी श्री राम का प्रश्न 
पंपासर के पास 
पंपासर के अरण्य में दक्षिण 
भाग में 

उपसंहार / 57 


कदली 


- कदली फल 
कदली वृक्ष 
कदली वन 
कदम्ब 


कपित्थ 


कि. 40/56 पूर्व दिशा के उदय पर्वत के 
सुवर्ण शिखर का दृश्य 
कि. 50/26 लंका में हनुमान जी द्वारा दृष्ट 
सु. 2२/9 लंका के पर्वत पर 
सु. 75/8 लंका के अशोक वन में 
सु. 22/56, 57. सेतु निर्माणार्थ 
कार्णिकौरैश्चपुष्पितिः 
यु. 39/4 सुबेल शिखर से लंका में दृष्ट 
उ. 26/4 कैलाश पर्वत पर 
केले का वृक्ष अयो. 20:88. कौशल्या कटी हुई कदली के 
समान 
अरण्य २5... सीता कदली के समान 
जोर-जोर से हिलने लगी 
अर. 25/5 लंका के तट पर 
अर. 42/23 पंचवटी के पास 
अर. 47/49 सीता की तुलना 
अर. 62/4 श्री राम का श्रमित होना 
कि. 43/4 ऋष्यमक पर्वत पर 
कि. 32/6 सीता की तुलना 
उ. 42/4 अयोध्या की अशोक वनिका में 
केला फल 
केला वृक्ष अर. 205 उपमा 
केला का वन सु. 58/56 लंका के अशोक वन के पास 
कदम अर. 6022 पंचवटी में विरही श्री राम का 
प्रश्न 
शव॥0००कशा पात॑क्षा$ 
8. रत अर. 78/4 पंपासर के पास 
कि. 2770 प्रस्रवण गिरि पर 
कि. 28/8,34,42 माल्यवान पर्वत पर 
उ. 26/4 कैलाश में 
उ. 42/5 अयोध्या की अशोक वनिका में 
कैथ ५. जयो. 9/8 भारद्वाज आश्रम में 


58 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छ्ल्णांब 


छाध्माभाएिा। 
कर्पूर केशर अबो. 9/72 
कपूर कि. 28/8 
एकराशागाएा। 0ब्वाएीक्ष०ड 
कमल कमंल का पेड़ अयो. 64/70 
(कमल पत्र दल) कमल की पंखुड़ियाँ . अयो. 955/4 
(कमल पुष्प) कमल पुष्प अर. 6/2% 
(कमल पत्र). (सूर्य विकासी) आर. 52255 
फटणा॥० पिपलंशि९$ 
>. छक्ष्णाा 
अर. 72/9 * 
कि. 43/22 ; 
"सु. ॥905 
सु. 80. 
सु. 74/43 
उ. 7/48 


कमल पत्राक्षी कमल की पंछुड़ियों कें समान अर. 50/26 
तु आँखों, वालीं सु. 58/57 
कमल विलोचन कमल के समान आँखों वाली अर. 60/% 


कमलिनी करंज कुल कच यु. 473, 75 
५. रिणाइक्ागंब 0] था 
करवीरानू .. कणेर “अर. 73/4 
'किलांणा। 00७णा३ + ४ 
अरं. 75/28 
कि. /76 
सु 20 
. सु. 4/26 . 
सु. 2028. - 
४ यु. ७72... 
करीरानू कैर यु. 28/59 


भरत के स्वागत में भारद्वाज 

आश्रम में 

वर्षा वायु में सुगन्ध 
मुख कमले ४ 
मन्दाकिनी नदी के पास. 
पंचवटी में (डंठल मात्र) 
भयत्रस्त सीता की तुलना 
(घ्वस्त कमल) 

पंपासर में 

कुबेर के स्थान में 

उत्कृष्ट पर्ण कमल ४ 

'हनुंमान जी का आकाश गमन 

लंका में 

मुख से तुलना _ 

सौता के लिये: प्रयुक्त 

सीता के लिये... 


, म़ीता के.सम्बोधन 
+मलय पर्वत कानन में 


पंपासर के पास 


पंपासर के पास. 
पंपासर के अरंण्य में 


: लंका में हनुमान जी द्वारा दृष्ट 


अशोक वन में 
त्रिजटा. के स्वप्न में 
मलय पर्वत के कानन में 


- , सैतुनिर्माणार्थ 


उपसंहार / 59 


एणएथांट 54 


कल्प वृक्ष कल्प वृक्ष कि. 34/5 लक्ष्मण की उपमा 
कल्हार लाल कुमुद पुष्प. कि. 30/36 माल्यवान्‌ पर्वत पर 
उजाफराणनेणए5 
काला अगरू काला अगर सु. 4/30 लंका के परकोटे का वर्णन 
शराब 89ी0ला9 करते हुए 
कल्प वृक्ष. कल्प वृक्ष अर. 56/38.. सर्वकाम फल्ैः वृक्षेः 
कालेयक चन्दन पीत उ. 42/2 अयोध्या की अशोक वनिका में 
अश्षाशरणापा 
काश्मरी काश्मरी (गम्भारी) . अयो. 94/9॥0. . चित्रकूट में | 
९ (आला क्षाणरस्‍्ट5 
कास कास घास अयो. 28/22.. क्‍न में 
5एल्‍लाणणा $फलांिएणा 
(काश) * अयो. 30/7?9 बन में उपलब्ध होने का भय 
अर. 5/8, 22 पंचवर्टी में 
किंशुक पलास अयो. 567... चित्रकूट के पास 


804 छिणा१058 
अर. 75/8 पंचवटी में 
कि. /75, 82. पंपासर के अर्य में पत्रहीन 
सु. 75/8 लंका के अशोक वन में 
यु. 4074 सुग्रीव तथा रावण के युद्ध की 


उपज 
सु. 9८87 लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत की 
समता 
यु. 45/9 श्री राम तथा लक्ष्मण युद्धाहूत 
रूप में 
“पुष्पिताविव किशुका” 
यु. 67/29 वानरों की समानता 
यु. 73/59 इन्द्रजीत द्वारा वाण विद्ध वानर 
यु. 8/34 राम लक्ष्मण से समता 


यु. 88८77 योद्धाओं की समानता 
किंशुक फूल. सुन्दर टेसू के फूल. सु. 54/34 लंका में आग की लपटें 
520 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चूड़ फूल 


कीचका वेणवः 


कुंकुम 


कुन्द 


कुटज 


कुमुद 


कुरवक 
कुरन्ट 

कुलिप्त 
कुवलय 


कुशेशय 
कुष्ठ 


कुसुमैदूगात 


वंशी की ध्वनि वाले बाँस कि. 43/37 
छणपांगरांछ। छक्षा05 000९ 
कुटज, अर्जुन बा. 24/5 
पृ्ञागागभां३ 08३. अर, 60/5 
कि. श/शव 
कैथ अर. 75/28 
उ््रगगणा #एअंव्योांणा। कि. (/77 
कि. १7/0 
यु. 4/78 
कुन्ज कि. 28/4, 4 
कड़ा + कि. 30/25 
, सु. 2८9 
यु. 4/93 
यु. 28/56 
कमल (नीलोफर।._ अयो. 50/श 
(चन्द्रोदय विकासी) कि. 30/48 
]शाए॥088 [.005 सु. 57/2 
यु. 4/85 
रक्त फिण्टी अर. 60/श 
छत्राल्मं8 टपअग.. कि. /82 
पीली कट सरैया. कि. /80 
जताएत झफगां॥ 
कुलथी (धान्य) उ. 92/9 
ए०ांला8 छगीक्षक 
रक्‍्त कमल _ अर. 74/श 
िज्ञाए॥0९8, 500॥808 
पदूम या कर्णिका._ अयो. 94/24 
कूठ अयो. 94/24 
80580 [.8008 0]ए6 
छितवन कि. 30/35 


#[प्रणा९8 5008 8९5 २.8. 


शैलेदा नदी के दोनों तटों पर 


विश्वामित्र के साथ जाते वन में 
कुंकुमों रुहः 

प्र्वण गिरि पर 

पंपासर 

पंपासरोवर के तट पर 
प्रश्नवण गिरि पर 

सह्य पर्वत कानन में 
'माल्यवान पर्वत पर 
माल्यवान पर्वत पर 

लंका में हनुमान जी ने देखा 
सह्य पर्वत कानन में 

सेतु निर्माणार्थ 

वन की शोभा 

माल्यवान पर्वत पर 

चन्द्रमा से तुलना 

सह्य गिरि के जलाशय में 
विरही श्री राम का प्रश्न 
रक्ताकुबेरकस्तथा-पत्रा 
पंपासर के अर्य में 


रामाश्वमेध यज्ञ में प्रयोगार्थ 
शबरी के आश्रम में 


चित्रकूट में 
चित्रकूट में 


माल्यवान पर्वत पर 


उपसंहार / 52 


कुश कुश अयो. 28/22. बन में 
अयो. 30/8? .. वन का भय 
अयो. 6/77. हवि का उपयोग 
अयो. 94/24 . शैया के लिये 
अयो. 99/6, 9 चित्रकूट में 
अर. 75/8, 22 पंचवटी 
अर. 26/88.. पर्ण-शाला पंचवटी 
अर, 6027 पंचवटी में बिखरे 


सु. 38/28 लक्ष्मण द्वारा धारण 
यु, 88/70 लक्ष्मण और इन्द्रजीत के युद्ध में 
उ. /5 आसन के लिये 


उ. 60.7 मार्जन के लिये 
उ. 09/4 श्री राम के हाथों में 


कुठशालालि. काला सेमर कि. 40/39 शल्मलिद्वीप में 
ह हल्‍्लं९8 ग॑ आग 
जञए भाव (णाणा वार्ड 
केतक केवड़ा अयो. 94/ _. पुष्पार्क केतकामा रंगहेतु 
एश्लातणा5 पह्लणां।ड 7 
अ्येक्षात $ 
केतक्य अर. 5/7 पंचवटटी में 
(केतकी) अर. 60/22 .. विहही राम का प्रश्न 


अर. 75/0, 24 ऋष्यमूक पर्वत पर 

कि. /8, 77  पंपासर के अरण्य में 

कि. 27/7, 8 तुंग भद्रा नदी के किनारे 
कि. 28/8, 9, 28 मांल्यवान पर्वत पर वर्षा ऋतु 
कि. 42/8 कुक्षी देश में 

कि. 490 पश्चिमी समुद्री तट पर 


सु. /शा लम्ब पर्वत पर 
सु. 2/9 लंका में हनुमान जी ने देखा 
यु.4/78 .. सहागिरिकाननमें |. 
उ. 6/5 कैलाश, में 

कोर्योष्टिक . जलकुंकुम अर. 75/72 ... पंपात्तेट पर 


522 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कोविखार 


कंचन वृक्ष 
कर्जकिजल्क 
कंटकीनोद्र॒ुमाः 


कुन्द गुल्मा 


कृत मालक 


खण्डकानि 
खदिर 


खजूरम्‌ 


की 


लाल कचनार अयो. 84/3 
छथ्माश्रागां3 शांट्टआ8 जयो. 9678 
कि. /80 
कि. 30/62 
सु. 2२0 
यु. 4/80 
उ. 4/१5 
कचनार कि. 50/29 
छथ्रापरां3 रिएएश्वल्त 
कमल केशर अर. 4207 
काँटे वाले पेड़ अर. 30/2 
स्थल कमल कि. 8/34 
एगांलांगा ऊश्वीगाफ॑००चणा 
कुन्द लता अर. 7504 
उब्ग्राएणा ऐपॉल््थाट कि. /77 
कि. 27/0 
यु. 4/78 
अमलतास कि. 27/8 
टअं& लए 
5प2॥ उ. 92/9 
खैर बा. 4/22 
#व्बञंब 0अल्लाए. अयो. 6/7 
अर. 75/8 
खजूर अर. 7506 
अर. 6/7 


छाग्थांडऋ 5॥9४०50ं५ २० सु. 2/9 


खर्जूर पुष्पम्‌ 
गज पुष्पी 


गन्ध 


खजूर के पुष्प अर. 6/7 
(लता) कि. 2/89, 40 
(अगरु या चन्दन) बा. 4/श7 

बा. 25/37 


कोविदार ध्वज 

कोविदार ध्वंज (भरत की) 
पंपासर के अरण्य में 
माल्यवान पर्वत पर 

लंका में हनुमान जी द्वारा दृष्ट 
सह्य पर्वत कानन में 

अयोध्या के अशोक वन में 
दक्षिण प्रदेश की एक गुफा में 


माया मृग में 
वन में उपलब्ध होने का भय 
माल्यवान पर्वत पर 


पंपासर पर 

पंपासर के पास 

प्रश्रवण गिरि पर 

लंका के राह में पर्वत शिखरों पर 
प्रख्ओवण गिरि पर 


अश्वमेध यज्ञ का यूप बनाने 
के लिये 


हवि के लिये 

पंचवटी में 

पंचवटी में 

धान्य की बालों से खर्जूर पुष्प 

की समानता 

लंका में हनुमान जी ने देखा 

पंचवटी के पास 

ऋष्यमूक पंर्वत पर 

पूजा के लिये चन्दन 

सिर पर लगाने के लिये 
उपसंहार / 523 


बा. 73/श विवाह मण्डप 
अयो. 25/37 श्रीराम को विदा करने के लिये 
माता कौशल्या ने लगाया 
यु. 73/22 इन्द्रजीत के हवि के लिये 
यु. 75/57 रण-भूमि में सुगन्ध व्याप्त 
यु. 42/48 रावण की चिता पर 
उ. 32/43 नर्वदा के किनारे रावण द्वारा 
शिव पूजा के लिये प्रयुक्त 
गन्ध पूर्णा. स्वनाम वृक्ष सु. २/9 हनुमान ने लंका में देखा 
(पीपल अथवा प्रियंगु) यु. 4/78 लंका की राह में पर्वत शिखरों पर 
गोघूम गेहूँ अर. 606 पंचवटी के खेतों में 
एंत्णा। १३ 
गोशीर्षक चन्दन की जाति कि. 4/40 ऋष्यमूक पर्वत पर 
गौड़ानि गुड़ उ. 92/9 
ठ्ण 
चणक चने उ. 9309 रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 
लब्ब #ंपरवाणा 
चन्दाई चन्दन की तरह अयो. 303 राज्याभिषेक के समय 
अयो. 9/64 कैकयी का प्रण 
अयो. 7/3, 6 _ राज्याभिषेक के समय 
श्वेत चन्दन. सफेद चन्दन अयो. 77/28 .. धूप के लिये 
शुक्ल चन्दन सफेद चन्दन अयो. 7626 .. बिना राजा के स्थिति 
चन्दन वन. चन्दन वन अयो. 80/4 .. जल (चन्दन युक्त) 
रक्‍्त चन्दन लाल चन्दन अयो. 88/6 धूप के लिये 
$भाधबणा #एणा. अयो. 9/83 भारद्वाजाश्रम में 
अयो. 99/35 चित्रकूट में (पुरातन याद) 
अयो. 97/78 . आंगों पर प्रलेप 
अयो. 4/20, 22धूप के लिये 
अर. 75/8 पंचवटी में 
अर. 35/श लंका के समुद्र तट पर 
अर. 60/22 विरही राम का प्रश्न 
अर. 63/8 चन्दन चर्चित 


524 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चन्द्र 


चम्पक 


दिव्य औषधि 


चम्पा 


कि. /7 पंपासर में 

कि. /82 पंपासर के वन में 

कि. 75/8 पंचवटी में 

कि. 35/4 बाली का दाह संस्कार 

कि. श/7 तुंग भद्रा नदी के किनारे 

कि. 27/84 प्रख्वण गिरि पर 

कि. 28/6 माल्यवान पर्वत पर 

कि. 32.7... किष्किन्धा में 

कि. 404 मलय गिरि पर 

कि. 4/27 महानदी ताम्र पर्णी के 

कि. 4607 विद्वीपों में विन्ध्य पर्वत में 

कि. 50/55 दक्षिणी गुफा में 

सु. 4780 रावण के अन्तपुर में 

सु. 60 लंका वर्णन 

सु. 908 रावण के अंगों पर लेप 

सु. 0/9 रावण की देह पर लिप्त 

सु. /32, 58 पुष्पक विमान में 

सु. 74/44 लंका में अशोक वाटिका में 

सु. 29/3 अभ शकुन 

यु. 26/4 बाल्यकाल में राम पर लेप 

यु. 3/45 रावण द्वारा शिव-पूजन 

यु. 36/25 वानर राज नल का निवास स्थान 

यु. 60/34 देह पर प्रलेप 

यु. 75/8 जल (अर्क प्रयोग) 

यु. /05, 3 रावण के शव- की दाह क्रिया 

यु. 2/2 उबटन के लिये प्रयुक्त 

उ. 26/25 कैलाश में रम्भा के देह पर प्रलेप 

उ. 32/36, 48. देह प्रलेप (समानता) 

उ. 42/2 अयोध्या की अशोक वनिका में 

यु. 50/3 मूच्छित वानरों को चेत कराने 
के लिये 

अर. 60/32 सीता का रंग 


उपसंहार / 525 


रण 00)5 000कञांइआआ०५ अर, 5/7 पंचवटी में चम्पक सुपुष्पित 
कि. /78 ..-.. पंपासर के अरुण्य में 
कि. 50220. दक्षिण प्रदेश की गुफा में... 
सु. 4/3, 86, 44 लंका की अशोक बाटिका में 


सु. 570..._ लंका की अशोक बाढिका में 
यु. 4/72 सह्य तथा मलय काननों में 
यु. 39/8 सुवैल पर्वत से दिखने वाला 
लंका का दृश्य 
उ. 26/4,/5 कैलाश में रु 
उ. 42/3 अयोध्या की अशोक वनिका में 
चिरबिल्व -चिरविल्व अर. /74, 76 सुतीक्ष्ण के आश्रम से आगे 
सतगकफशंव्थ पराव्शांधिं8 कि. /78 पंपासर के अरण्य में" 
चूणाक धान्य विशेष कि. /80 पंपासर के अरुण्य में. 
सेमल (॥) यु. 4/8 सह्य पर्वत के कानन में 
छणांक्र श्राप 
चूतः ५ आम अयो. 97/80 . भारद्वाज आश्रम पर 


शभाशंटि वरात०8.. अर. ॥5/7 पंचवटी में 
अर. 42/$ पंचवरटी के पास 
अर. 60/श विरही राम के प्रश्न 
अर. 73/8 पंपासर के पास 
कि. /60, 80  पंपासर के अरण्य में 
सु. 0/23 लंका में अशोक वन में 
सु. 4/3 लंका में 
यु. 4772, 90 , सह्य पर्वत पर 
यु. १२८57 सेतु निर्माणार्थ 
यु. 59८77 युद्ध में नील का आयुध 


उ. 26/5 कैलाश में 
हे उ. 42/9 अयोध्या की अशोक वनिका 
जवा गुड़हल यु. 06/25 सन्ध्या की तुलना 
पाछाइ०्पच्भ05ब आगलाए5 हु 
(जवा कुसुम) उ. 35/28 बालू की सूर्य की तुलना 
जाम्बव, जामुन अयो. 94/8, 0 . चित्रकूट में 


526 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


जाती 


जातिफल 


तक्कोल 


तगरः 
तण्डुला 


(तण्डलै:) 
तमाल 


ताम्र पद्म 


अर. 60/9 
अर. 73/5 
कि. 28/9, 30 
यु. 47/3 
अयो. 9८4 
उ. 425 
अयो. 55/5 
चमेली अबथो. 9/5 
उबन्ागाणा। ठक्षातीणणा अर, 35/22 
(जात्याफाना) अर. 35/229 
शजरांआआ०8 पिवट्ाक्षा३ 
कंकोल वृक्ष अर. 35/22 
छंएन एफनाब 0क्रेशां8 
0करक्ाभी5 
तगर उ. १6/6 
'फबालांभा॥ प्थवतत्रांगतों 
चावल उ. 9209 
०] अर. 6/7 
तमाल अयो. 9/50 
(दालचीनी) अयो. 99/9 
(आप्रक्माणाण वा॥4 ब००७० 
छंद्ा॥ अर. 75/6 
अर. 35/3, 23 
कि. 8/95 
कि. 37/25 
कि. 40/56 
कि. 42/2 
कि. 50/9 
यु. 39/8 
उ. 0075 
लाल कमल अर. 75/20 


विरही श्री राम के पास « 
पंपासर के पास 

माल्यवान पर्वत पर 

सह्य कानन में 

“काननेलता' भारद्वाज आश्रम पर 
अयोध्या की अशोक वनिका में 
नाव निर्माणार्थ, 
भारद्वाजाश्रम में हु 
मरीचि के आश्रम में 

लंका के समुद्र तट पर 


लंका के समुद्र तट पर 


कैलाश में 


रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 
पंचवटी के पास 
भारद्वाज आश्रम में 
चित्रकूट में 


पंचवर्टी में मरिच के आश्रम से 
लंका के समुद्र तट पर 
तुंगभद्रा नदी के किनारे 
क्षीससागर के किनारे 
सुवर्ण-शिखर पर 
पश्चिमी समुद्र तट पर 
दक्षिण की एक गुफा में 
सुबैल पर्वत से दिखने वाला 
लंका का दृश्य 
भरत द्वारा बनाये गये नये नगर में 
पंपासर में 

उपसंहार / 527 


गरंताव्णा। उणाएघ॑त्तपाता 
ताल - ताल अयो. 97//50 . भारद्वाजाश्रम में चित्रकूट में 
(तालफलोपमम) अयो. 9929 श्री राम की पर्णकुटी 
छक्88$४0५ ह्िएंडि अर, 75/6 पंचवटी में 
अर. 29/4 “ताल फल यथा! 
ताल ताल अर. 35/3 लंका के समुद्र तट पर 
अर. 46/20 स्तन की तुलना" 
अर. 6078 विरही राम के प्रश्न 
कि. 3404 किष्किन्धा की राह में 
कि. 40/56 सौमनस पर्वत के पास 
कि. 40/76 सुवर्ण शिखर पर 
कि. 42/46 मेरु और अस्ताचल के बीच 
कि. 50/20 ऋष्यविल से दक्षिण 


सु. 36/34 लंका में अरिष्ट गिरि पर 

सु. 69/॥ ताल वृतान्तानि 

यु. 504 ताल फलौपमम्‌ सीता 
की समानता 


यु. 22/56, 59. सेतु निर्माणार्थ 
यु. 39/3 सुवेल पर्वत से दिखने वाला 


लंका का दृश्य 

यु. 65/39 युद्धायुद्ध के रूप में 

उ. 70/5 भरत द्वारा बसाये गये नूतन 
नगर में + 


तिनिश स्वनामख्याता तिरच्छवृक्ष अयो. 94/8, 0. चित्रकूट में 
आर. ॥/47 सुतीक्ष्ण के आश्रम के आगे 
[.28९ 50228 06 हि 
एलशा॥३९ अर. 75/6 पंचवटी में 
कि. /82 पंपासर के आर्य में" 
कि. 28/8 तुंगभद्रा नदी के किनारे 
यु. 4772, 8. सद्य पर्वत के कानन में 
यु. 20/56 सेतु निर्माणार्थ 
तिन्दुक तेन्दु का पेड़ वा0 24/75... विश्वामित्र के साथ जाते 


528 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद समय राह में 


तिमिद 


तिल 


तुंग 
तुम्ब 


दर्भ 


छांग्पृलएधा०5 छ्रा३ण्ालां$ अयो, 94/8, 0 


स्वनामख्यात वृक्ष 


तिल के पेड़ 
$०8णगएा ठंत्णा 


स्वनामख्यात वृक्ष 


'प़ल्ातभावंब छ5९80९ 


नारियल 
(०००नाएशंणिब 
लौकी 

[.0एलाक्रां8 एएणेहआं5 
डाभ 

एज०तणा एा8लजणा 


अर. /60 
अर. 73/3 
कि. 278 


उ. 29/9 


अयो. 9/50 
अयो. 94/9, 30 
अर. 5/57 
अर. 73/4, श 
अर. 75/6, 28 
कि. /58 


कि. /78, 85 
कि. श/प 
यु. 4/72, 79 


यु. 22/6 
यु. 39/4 


उ. 400/05 


उ. 42/2 


बा. 3827 


अयो. 4/25 
अयो. 99/28 
अयो. 208/29 
अयो. 04/8 
अर. /52 


चित्रकूट में 
सुतीक्षण आश्रम के निकट 
पंपासर के पास 


तुंगभद्रा नदी के किनारे 
प्रश्नवण गिरि प्र 
रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 


भारद्वाजाश्रम पर 

चित्रकूट में 

पंचवटी में 

पंपासर के पास 

पंपासर के अरण्य में 
भ्रमरलीन मंजरी पंपासर के 

अरण्य में 

पंपासर के अर्य में 

तुंगभद्रा के किनारे 

सह्य और मलय गिरि के राह 

कानन में 

सेतु निर्माणार्थ 

सुवेल पर्वत से दृष्ट लंका का 
दृश्य 

भरत द्वारा बसाये जाने वाले 

नगर में 

अयोध्या में अशोक बनिका में 


(गर्भ तुम्ब) आकार की समानता 


शैया के निमित्त 

चित्रकूट की यज्ञ वेदी पर 
पिण्डदान के लिये 
बिछाने के लिये 

दर्भ मुष्टि प्रद्धरण 


उपसंहार / 529 


सु. 476 आयुध के रूप में हनुमान जी 


ने देखा 
- सु. 38/29, 30 कौवे की आँख फोड़ने के लिए 
हु यु. शत अभिमंत्रित गर्भ का प्रयोग 
दाडिम अनार बा. 73/23, . . -विवाह मण्डप में 


शिप्रां2३ ठाभाभंणा * 
अर. 60/29 विरही राम का प्रश्न 
यु. १2/99 सेतु निर्माणार्थ 
उ. 42/5 अयोध्या की अशोक वनिका में 
दिव्य अगरु उच्च कोटि का अगर॒अयो. 9/82 . भारद्वाज आश्रम में 
दिव्य औषधि उच्च कोटि की औषधि कि. 37/3॥ हिमालय की राह में 
दिव्य चंदन. उच्च कोटि का चन्दन अयो. 9/88 .. भारद्वाज आश्रम में 
उ. 26/9 कैलाश में 
देवदारु देवंदार बा. 4/23 दशरथ के अश्वमेध यज्ञ के लिये 
 अयो. 7607 चिता जलाने के लिये 
कि. 48/3 हिमालय पर्वत पर 
सु. 56/29 लंका में अरिष्ट गिरि पर 


उ. 42/2 अवोध्या में अशोक वनिका में 
द्रोण स्वनाम दिव्य औषधि यु. 50/6 क्षीर सागर में उपलब्ध होने 
दि वाली दिव्य औषधि। मूर्च्छित 
-.. वानरों को चेतन करने के लिये 
घन्व इन्द्रयव अयो. 94/9, 0 पंपासर के पास 
[धन्वन) कुटज बीज अर. 73/4 चित्रकूट में 
'जांपं8 प.ाालगरब 
नकक्‍तमाल कर्ज वृक्ष कि. /82 पंपासर के अरण्य में 
एणाइगांंब आर. 73/4श  पंपासर के पास 
शा।र्यक चला. 
घवा घव बा. 2405 विश्वामित्र के साथ राम जाते 
है हुए बन में 


4०595 [आज अयो. 94/8, 0. चित्रकूट में 
अर. 75/8 प्रंचवटी में 
अर. 60/2 विरही राम के प्रश्न 


530 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


न्यग्रोध 


न्यूग्रोधक्षीर 
नलिनी 


नागवृक्ष 


नारिकेल 


कि. /82 
कि. 5005 


यु, 22/56- 


बड़ अयो. 53/35 
अयो. 55/6, 7 


“>जर., 3/श2 


अर. 35/27, 36 


अर. 73/85 

यु. 4/75 

यु. 82/2 
बड़दूध 
कमलिनी 
(ईषदू रक्त वर्ण) 
कांप 
अपर्ीफांर 
रड्शा कि. 0/7 . 
कि. शत 
कि. 30/55 
यु. 58/38 
माग़केशर तथा नाग दमन अर. 73/4 


कि. /78, 88 


#ण्थां4 सए.080९8 कि. 50/26 


सु. 423 
यु. 4276 
यु. 89/8 


उ. 42/4 
नारियल 
(०००४ पालंशिबे.. कि. 57/25 


कि. 4202 


अयो. 52/8 
अयो. 504 
अयो. 94/24 
अर. 3200 
अर. 6/5 


अर. 35/5 


पंपासर के अरण्य में 

दक्षिण की एक गुफा है 
(ऋष्य ॒विल में) 

सेतु निर्माणार्थ 

निर्मित शैया पर सोये वृक्ष के नीचे 
छाया में तपस्वी तप करते 
भरंद्ाज आश्रम से चित्रकूट की 
राह में लंका के समुद्र पर 
पंपासर के पास 

सह्य पर्वत कानन में 

वानर सेना की तुलना 

जटा में लगाने के लिये 
तालाब में अयोध्या 

चित्रकूट 

चैत्ररथ वन में 

पंचवटी में. 

पंपासर में 

प्रश्ववण गिरि पर 

माल्यवान पर्वत पर 
समानता 

पंपासर के पास 

पंपासर के अरण्य- में 

दक्षिण प्रदेश की गुफा 
ऋष्यविल में 

अशोक वाटिका लंका में 
सह्य कानन में 

सुवेल पर्वत से लंका का दृश्य 
(नागमाला समावृता) 
अयोध्या की अशोक वनिका 
लंका के समुद्र तट पर 

क्षीर सागर के किनारे 
पश्चिमी समुद्र तट प्र 


उपसंहार / 53] 


निम्बाः 


निवास वृक्ष: 
निर्यास 


नीचल 
निचुलैः 
नीप 
(नीपान) 


नील पदम्‌ 
नील लोहित 
मंजिष्टा 
नीलाशोक 


नीलोत्पलदल 


नीलोत्पलदल 
नीवार 


सु. 7/शा 
नीम अयो. 35/6 
बवाल अयो. 35/7 
फ़क॑ं4 यु. 22/59 
कल्पतरु कि. 5/9 
गूगल अयो. 76/6 
8.लं$थ्ा0 ठश्ाताणा 
॥४ए०। व जुल अर. 75/24 
छेश्मााशणांब 8०एशा8०8 
62लाणा कदम्ब अयो. 94/9, 0 
कजात0ल्‍्थ्ज़ीआ#०5 अर. 75/8 
टबतशा08 अर. 60/श 

. कि. 278 

कि. 28८4 

सु. 20 

यु. 39/4 

उ. 42/4 
नील कमल अर. 75/20 


वपज्राएा०ट३ हल 

लाल तथा नीली मंजीठ सु. ॥/5 
एंड 00 एणां० 
नीला अशोक आर. 73/4 
कि. /79 
अर. 42/6 
कि. /63 
कि. 27/११ 
कि. 30/24 
कि. 38/34 
सु. 54/34 
नील कमल दल स्वनाम यु. 99/35 
तृण (धान्य) 


नीलकमल 
वशाएा०लब 5ट[भ4 


532 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लम्ब पर्वत पर 

दूध सींचना 

मधु नहीं टपकता 

सेतु निर्माणार्थ 

साधुओं के लिये श्री राम तथा 
लक्ष्मण ऐसे ही वृक्ष हैं-तारा 
चिता में जलाने के लिये 


पंपासर पर 


चित्रकूट में 

पंचवटी में 

विरही श्री राम का प्रश्न 
प्रक्र॒वण गिरि पर 

माल्यवान पर्वत पर 

लंका में हनुमान जी ने देखा 
सुवेल पर्वत कानन में 
अयोध्या की अशोक वनिका 
पंपासर 


महेन्द्र गिरि पर 


पंपासर के पास 

पंपासर के कानन में 
मायावी मृग का वर्णन 
पंपासर में 

प्रख्रवण गिरि पर 
माल्यवान पर्वत पर 

रॉम को उपमा 

अग्नि की लपटों के समान 
नारद अस्त्र की कान्ति 


अर. ॥/74 
अर. 5/6 


अयो. 6/5 
यु. 4/52 
अर. 8508 


बा. 4/22 


बा. 74/86 


सु. 700 
यु. 606 
कि. 5070 
अयो. 64/9 
सु. 2050 
अर. ॥7/7 
अर. 5206 
कि. 4/67 
कि. 40/65 
यु. 9900 
अयो. 9/30 


भाव बांध ० फतंड8 

200! 
नैवार तिन्‍नी के चावल 

एब्रांटणा ॥कषै९०णा। 
पर्णधन नलिन अशोक 

$308 $भ्राटणा 
पर्णास तुलसी 

0ल्ाएा $श्ञातणा 
पर्णिन पलास 

868 #0र0054 
पतत्रिण अश्वकन्द 

'जाक््रां3 $गरागरांशि॥ 
पद्मानिस केशराणि केशर युक्त 
पदूमरेणु कमल केशर 
पदूम पत्र... कमल की पंखुड़ियाँ 
पनस कटहल 

पाएकरां$ पछतंस्शां4 


अयो. 94/8, 30 
अर. ॥/74 
अर. 5/6,8 
अर. 60/श 
जर. 78/3 
यु. 3/20 


उ. 26/6 


सुतीक्ष्ण आश्रम से आगे 
पंचवरी में 


वन में भोजन के लिये 
लंका के अशोक वन में 
पंचबटी में 


अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ का यूप 
बनाने के लिये 


दशरथ के अश्वमेध यज्ञ में 


पुष्पक विमान 

अशोक वन में लंका में 
दक्षिण में 

श्री राम की आँखों से समानता 
पदूमपत्रमिवायतम्‌ 

नेत्रों से तुलना 

माला से विखरने वाले 
पदूमपत्र विशालाक्षी 

अनन्त भगवान की आँखें 
श्री राम की आँखों से समानता 
भारद्वाज आश्रम में 

चित्रकूट में 

सुतीक्षण के आश्रम से आगे 
पंचवटी में 

विरही श्री राम के प्रश्न 
पंपासर॑ के पास 

रावण की माया में वानर 
पनस से समानता 


कैलाश 
उपसंहार / 533 


उ. 42/3 अयोध्या के अशोक वन में 


पद्म कमल ” - अयो. 50720... वन की. शोभा 
िलणा0३-३एलंटि4.. अयो. 59/7 राम के वियोग में शुष्क पदूम 
सूर्य विकासी अयो. 6/5 मुख के श्वास गंध 


अयो. 6/8 मुख के श्वास गंध 

अयो. 620 .. दशरथ के हाथ की उपमा 

अयो. 7905 लक्ष्मी का निवास 

अयो. 98/7 नेत्र की उपमा 

अयो.-04/25 . मुख से समानता 

अर. /6, 3  सुतीक्षण के आश्रम से आगे 

अर. 5/,24  पंचवरी में 

अर. 77/7 पदूमपत्रायतेक्षणम्‌ श्री राम के 

अर. 4227... सुवर्ण मृग के प्रसंग में 

अर. 55/3 सीता का मुख 

अर. 56/20 रावण का सीता की प्रशंसा 

अर. 60/26.. जनस्थान में ह 

अर. 64/ पंचवटी में 

अर. 75/श पंपासर में 

कि. /7,63, 67, पंपासर में पद्म पलासाक्षी 

76, 04 

कि. 302 चद्पत्रैक्षिणी 

कि. 45/7 ऋष्यमूक पर्वत पर 

कि. 2522, 6. पदूम माला 

कि. 30/29 ... माल्यवान पर्वेत पर 

कि. 3/49  आ 

कि. 3244 किष्किन्धा की गुफा में 

कि. 43/39 उत्तर कुरु देश में 

सु. 2/2 लंका में हनुमान जी ने देखा 

सु. 4/7 लंका में हनुमान जी ने देखा 

सु. 804 लक्ष्मी का वर्णन 

सु. 9/84,35,86.. लंका का वर्णन हु 

सु. 4/24 लंका में अशोक बनिका में 
: 534 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


पद्मकिंगल्क कमल केशर 
पद्म पीता कमल केशर 
पद्म कोश कमल कोश 

पदूम गर्भा कमल के अंदर से 
पदूमवक्‍त्राणि कमल पुष्प 
पदम्‌गंधी. कमल जल 

पदूम रज कमल रज 

पदूम केशर कमल केशर 


पदूमपलासाक्षी कमल सी आँखें 
पदमपलासाक्षी कमल सी आँखें 


पदुमाक्षी कमलगटूटा 
(पदमाक्षि) 
पदूमक पदमाख 


सु. 5/4 
सु. 29/१ 
सु. 24/6 
सु. 8/2 
सु. 44/9 
यु. 4/85 
यु. 3006 
यु. 67076 
यु. 88/2 


उ. 26/22 
उ. 42/ 
उ. 755 
उ. 09/6 
यु. 2605 
अर. 52/24 
अयो. 60/8 
कि. /7 
यु. 9/5 
अर. 52/9 
यु. 95/5 
अर. 7307 
यु. 58/38 
कि. 39/5 
कि. /72 


बा. 5/3 
सु. 38/8 
कि. /05 
कि. /48 
कि. /09 
अयो. 76/6 


अशोक वन के चैत्य प्रासाद में 

मीनाहतं पद्ममिवाभिहताभ्रम्‌ 

पदूममिवेक्षणम्‌ (सीता के) 

पदुममिवाभिताभ्रम 

हनुमान जी का मुख 

सह्यगिरि के जलाशय में 

लक्ष्मी के हाथों से गिरना 

वानरों के मुख प्रबुद्ध पद्म 

मूर्छा के निवारणार्थ शीत 

पदूम जल का प्रयोग 

रंभा का श्रृंगार 

अयोध्या अशोक वनिका में 

सरोवर में 

लक्ष्मी के हाथों में 

अंगद की तुलना 

सीता की कांति 

लाल रंग के लिये 

पदूमकोश पलाक्षणि सीता के नेत्र 

उपमा 

सीता का रंग 

वानरों की तुलना 

पंपासर का जल 

युद्ध स्थल की समता 

वानरों का रंग 

पंपासर के कमलों से वायु का 

स्पर्श 

श्री हरि के नेत्र 

सीता के नेत्र 

कमल नयनी सीता 

सीता के नेत्र 

सीता के नेत्र 

चिता जलाने के लिये 
उपसंहार / 535 


पदुमनि 


परमौपधि 


पलाश 


प्लक्ष 


पत्र-विटप 


पाटला 


कि. /79 
शिणाए5 ऐ536णा रिक्त कि. 27/7 
कि. 4/40 
कि. 43/3 
सु. 56/26 
यु. 4/8/ 


यु. /05,3 


कमलिनी अयो. 27/8 

रञाए०8 [./0०७5.. अयो. 59/7 
अर. ॥5/] 
अर. 46/06 
अर. 60/5 
अर. 6/4 
सु /35 
सु. 9/3, 5 
सु. 59/27 
सु. 6505 
उ. 26/4 


दिव्य औषधिनां यु. 5/3 


ढाक छण&# स्णा6058 अयो. 63/3 


अयो. 6308 

अयो. 58/28 
पाकर बा. 4/39 
(पिलखन) अर. 73/3 
सिल्क प्रांल8 70०७... यु. 4/75 
दुर्गन्‍्ध खैर सु. 9/25 


2३९७ स्लिवाटअंशा3 
पाटला $।९७ 5श॥णा॥ बा. 24/5 


536 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


पंपासर के अरण्य में 
तुंगभद्रानदी के तीर पर 
ऋष्यमूक पर्वत पर 

हिमालय पर्वत पर 

लंका के अरिष्ट गिरि पर 
सह्य पर्वत पर 

मृत रावण की चिता 

बनाने के लिये 

पतिव्रता सीता का वचन 
राम के वियोग से शुष्क 
पंचवटी में 

सीता का वर्णन रावण द्वारा 
हेमन्त ऋतु में ध्वस्त 
जनस्थान 

रावण की स्त्रियाँ 

अशोक वन में सीता की तुलना 
अशोक वन में सीता की तुलना 
पालापड़ी कमलिनी 

कैलाश में 

चन्द्र और द्रोण पर्वत पर 
उगने वाली 

पुष्प को देखकर फलों 

का अनुमान 

ऋषि कुमार वध के प्रसंग में 
पिता के वचन 

“पलासैरिव पुष्पितैः उपमा 
हवि के लिये 

पंपासर के पास 

सह्य पर्वत कानन में 

लंका में हनुमान जी छुपे 


विश्वामित्र के साथ राम वन 
जाते राह में 


$08४20|९०५ 00. 


पाटल शतपुष्पी अर. 5/8 
पाटलैः पाठर का वृक्ष कि. /80 
$टाए0कुशा।एा 5एए९८०श३ उ. 26/5 
पाटली पाढ़र $श००ऋला॥एणा। कि. /80 
(पाटलिका). $98४९० [25 यु. 4/80 
परिजात (क) कमल उ. 2/5 
हरसिंगार उ. 42/85 


जलक्रा।025 4फणांआं5 
पारिभद्रक. नीम, देवदारु, सहला कि. /80 


छोड़कर पट ]-80 


परिभद्र लीमया फरहद अर. 73/5 
मंदार छा 028. कि. 7/80 
पिप्पली पीपल एछएश शाहणा अर. /39,49 
प्रिय सप्तपर्ण, कदम्ब या असन कि. 30/34 
प्रियका कदम्ब या असन, प्रियंगू अयो. 7/2 
प्रियंग फूल प्रियंगू, कंगूनी 
एगाएक्षए4 कि. 2१6/श 
३टाण्ालब शक. सु. 200 
उ. 26/5 
उ. 42/5 
प्रियाल कदम्ब छेप्लाआश्ाां3.. अयो. 94/8 
एथ्रारक्षा 5जादाड़ अर. 78/8 
चिरौंजी सु. 2८9 


छण्लाभ्ाभां॥ .९ंणिंकउ, 26/2 
पुण्डीक . अति श्वेत कमल अयो. 87/2 
पिलणाएऑ० ए०लंलि4.. अयो. 99/27 
ठक्ष्यांणा अर. 9/4 
कि. 28/35 
सु. 38/4 


पंचवटी में 

पंपासर के वन में 

कैलाश में 

पंपा के पर्वतीय क्षेत्र के पृष्ठ 
भाग में 

सह्य कानन में ; 
कैलाश में रंभा के बालों का. 
खुंगार 


- अयोध्या अशोक वनिका में 


पंपासर के पर्वतीय पृष्ठ भाग में 


पंपासर के पास 

पंपा अर्य में 

अगस्त्य मुनि के आश्रम पर 
माल्यवान पर्वत पर 
उज्जिहाना नगरी पर 


सुग्रीव के राज्याभिषेक परे 
लंका में हनुमान जी ने देखा 
अयोध्या के अशोक वन. में 
कैलाश में 

चित्रकूट में 


: पंपासर के पास 


लंका में हनुमान जी ने देखा 

कैलाश में 

भरत के नेत्र कमल 

चित्रकूट में भरत 

पुण्डरीक विशाला 

वर्षा में वन की शोभा 

सीता के अश्रुपूर्ण नेत्र 
उपसंहार / 537 


पुण्डीक. कमल रूपी नेत्रों में 
पलासाभ्याम्‌ 
नाग केशर वृक्ष 


उ. 7725 
सु. 38/4 


अर. 75/6 


पुन्नाग टबकाएनाणा परकराजाणा 


पुरोड्ोल सोमरस या यवपिष्ट 
पुष्कर कमल [,005 


पुष्प वृक्ष या लता के फूल 


पुष्प पराग पुष्प केशर 

पूर्णक ताम्र चूर्ण चूड वृक्ष 
[एलंब 8क्ा।भ4 

पंकज कमल |चलणाए० 
णललिब 00लापा 


अर. 60/62 
अर. 75/6, 23 
कि. /78 
कि. 4207 
कि. 50/25 
सु. 0/25 
सु. 5/9 

उ. 26/4 

उ. 42/8 
अयो. 6/7 
अयो. 6/8 
अयो. 9/78 
अयो. 95/4 
अर. /6 
यु. 28/3 
बा. ]4/27 
बा. 73/श 
अयो. /0 
अर. 64/25, 26 
अयो. 5णश 
कि. /80 


अर. 8/4 

अर. 23/3 
अर. 52/8 
अर. 6]/2 
अर. 738/श 


538 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


नेत्रों की तुलना 
सीता के अश्रुपूर्ण नेत्र 


पंचवटी में 


विरही श्री राम का प्रश्न 
पंपासर में 

पंपासर के अर्य में 

कुक्षि प्रदेश में 

दक्षिण प्रदेश की गुफा में 
मुख से सुगनन्‍्ध 

लंका में चैत्य प्रासाद के पास 
कैलाश में हि 
अयोध्या की अशोक वनिका में 
हवि के लिये 

कमल नेत्र 

भारद्वाज आश्रम में 
मन्दाकिनी में 

सुतीक्ष्ण के आश्रम के आगे 
सुग्रीव के गले में पुष्पों की माला 
पूजा के लिये 

विवाह मण्डप में 
राज्याभिषेक के लिये 

विरही श्री राम की पहचान 
पुष्मों की पंखुड़ियाँ 

पंपासर 


सुतीक्ष्ण के आश्रम के पास 
सूखे कमल पंचवटी 
विनालमिव पंकजम्‌ 
जन-स्थान में 

पंपासर में 


बकुल 


बदरी 


अर. 75/6 


कि. /64, 67 


कि. 27/6 
कि. 28/52 
कि. 29/52 
कि. 3807 
कि. 48/7 
कि. 50/29 


मौलश्री अर. 60/22 
ल्शाए5००४ दिशड. अर, 7576 


कि. /78 
कि. 2/8 
कि. 42/7 
सु. 0/28 
सु. 4/43 
सु. 5/44 
यु. 4/79 

यु. 22/59 
यु. 39/3 


उ. 26/4 
उ. 42/5 
उ. 305/5 


बेर बा. 2475 


खबज़ाण्डनणुं००४.. अयो. 55/8 


अयो. 94/9, 0 
अयो. 03/29 


बन्युजीवा (बन्युजीव) दुपहरिया का वृक्ष कि. 80/62 


एलशा।इएल९$ शिण्शां०८8 


पंपासर में 

पंपासर में 

प्रख्ंण गिरि पर 
प्रश्नवण गिरि पर 
माल्यवान गिरि पर 
किष्किन्धा की राह में 
दक्षिण देश में 

दक्षिण की एक गुफा में 
विरही श्री राम के प्रश्न 


पंपासर के अर्य में 

तुंगभद्रा नदी के किनारे 
कुक्षि-प्रदेश में 

मुख से सुबास 

लंका के अशोक वन में 
लंका के अशोक वन में 
सह्य-गिरि कानन में 

सेतु निर्माणार्थ 

सुवेल पर्वत से दिखने वाला 
लंका का दृश्य 

कैलाश में 

अयोध्या के अशोक वन में 
भरत द्वारा बसाये गये नगर में 
विश्वामित्र के साथ वन जाते 
समय राह में 

भारद्वाज आश्रम से चित्रकूट 
की राह में 

चित्रकूट में 

पिण्डदान के लिये 

माल्यवान पर्वत पर 


उपसंहार / 539 


बाणाः सरकण्डा कि. 30/56 माल्यवान पर्वत पर 


53एशीभाण3 (भर 


5. 5 ४ 
बला एक महौषधि बा. 22/३, 5, 8 विश्वामित्र द्वारा राम को प्रदत्त 
विभीतक. 999 0०क्रॉगा4 बहेड़ा अयो. 90/49._ भारद्वाज आश्रम पर 

वल्ञागागभां॥ छलटांट4. यु. 22/49 सेतु निर्माणार्थ 

एफ. यु. 73/23 हवन में समिधा इन्द्रजीत 

यु. 80/75 हवन में सविधा इन्द्रजीत 
बिम्बफल कुकरी सु. 5/29 अशोक वनिका में सीता के ओठ 
एकलागंब वरठंट4.> सु. 2५/7 बिम्ब फलोपलोपमोष्ठं का 
लाल रंग 


बिल्वोपस्तनी बिल्वफल के समान स्तन सु. 60/3 सीता के लिये प्रयुक्त 
बीजक अनार ए्रांत६ ठक्ाभ्रणा) अयो. 94/9, 0.. चित्रकूट में 
बीजपूरक. बीजोरा 00५ ४००१७ अयो. 9./30.. भारद्वाज आश्रम में 


(बीजापुर) अर. 75/5, 23 पंपासर में 
वेल्वा बेला ५८४८ १(»70०।०५ बा. 4/22, 39 अश्वमेध यज्ञ के धूप के लिये 
(बिल्व) बा. 24/5 विश्वामित्र के साथ वन में 


बो. 56/7 चित्रकूट के पास 
बा. 9/30,49 . भारद्वाज आश्रम पर 
बा. 94/8,0 चित्रकूट में 
अर. वाला सुतीक्ष्ण के आश्रम के आगे 
यु. 2२८57 सेतु निर्माणार्थ 

भण्डीर सिरिथ या बरगद अर. 75/24 पंपासर पर 

#ीएंय्रां3 कला 

भद्गरक धान्य विशेष भोज पत्ता अयो. 94/24 चित्रकूट में 

भूर्जपत्र छल्रण१णाएं$ 0. 00. 

भल्लातक . भिलावा 57 07०६ अयो. 56/7 चित्रकूट के पास 


गा] 
निम्ब या गज पीपल अयो. 94/8,0 चित्रकूट में 
पीपल (2) $ल॥9295७5 सु. 4/4 अशोक बन में 
एकता 5काप., 

मंजिष्ठा मंजीठ अयो. 94/5 रंग के लिये 


540 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


एफ़९३ 0णरंगिं4.. सु. /5 


सु. 5777 
मंदार श्वेत आक अर. 35/23 
बकायन उ. 26/5, [5 
एव्वाज्ाणपांड श0त्श३.. उ. वश 
मधूक मुलहठी या महुआ. अयो. 9400 
अर. /74, 76 
॥(8०॥0९8 अर. 3/श 
[,णाशंणिं8 अर. 42/7 
४३० कि. /78 
छः यु. 4/79 
88559 [.९ उ. 42/3 
मधूनि एणांबद्राक्षा, शहद शंप्ं$अयो. 58/8 


जाल भर मिणाद॥ यु. 4/88 


मरिच काली मरिच अर. 35/28 
शंणगञश िशणा 

मल्लिका स्वनाम ख्यात पुष्प वृक्ष अर. 9/57 
उब्ज्ागाणा। वाहफच्ञं #0एा कि. 0/76 


महारोही कन्द-विशेष अर. 68/32 
महाद्रुम अश्वत्थ 548८8 ॥008 सु. 9/34 
माधवी स्वुनाम्र ख्वात पुष्पलता कि. /77 


(माधव्य).. माइक #्षणाव05०७६ यु. 4/78 
मालती स्वनामख्यात्‌ पुपपलता(चमेली) अयो. 9/57 


उषा] 8%णर5शा5 (०७ अर. 75/24 
कि. /76 
व कि. श70 
सा कि. 28-52 
माष उड़द |श्रा०005 उ. 92/9 
रिब्रतात05 
मुग्ध मूंग [0850005 ॥/णा8०उ. 9/9 


मुचुकन्द पुष्प वृक्ष विशेष कि. /80 


दक्षिण का पर्वतीय प्रदेश 
मेघों का रंग 

लंका के समुद्र तट पर 
कैलाश में 

अयोध्या की अशोक वानिका में 
चित्रकूट में 

सुतीक्ष्ण आश्रम के आगे 
पंचवटी की राह में 

मायावी मृग का वर्णन 
पंपासर के अरण्य में 

सद्य गिरि कानन में 

अयो. की अशोक वनिका में 
चित्रकूट की राह 

सह्य पर्वत पर “मणूनि मधु 
पिंगला” 

लंका के समुद्र तट पर 


भारद्वाजाश्रम में 
पंपासर के अरण्य में 
जटायु को पिण्डदान 
उदाहरण के रूप में 
पंपासर के अरण्य में 
सह्य गिरि कानन में 
भारद्वाजाश्रम में 
पंपासर में 

पंपासर के अरण्य में 
प्रख़्वण गिरि पर 
माल्यवान पर्वत पर 
रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 


रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 
पंपासर के अरण्य में 
उपसंहार / 54॥ 


शिश्ष०क्रथाएणा 502 


क्णांणा 
मुचुकिन्द॒ स्वनाम तिलक जाति का वृक्ष सु. 2/9 
यु. 4/90 
मृग गजकन्द अयो. 56/22 
मृणालिनी. कमलिनी सु. 7/25 
(चन्द्रविकासी) ॥४गराप्ाध्ब्सु. 9/7 
[.0ण05 
मृत संजीवनी एक दिव्य औषधि. यु. 74/38 
मूर्च्छा दूर करने के निमित 
यव जवधान अर. 6/6 
प्रदत्त, ४णे2अर 
रक्त कुरवक रकक्‍्तनन्दी वृक्ष कि. /82 
एकल प0णा३ 
रक्‍त चन्दन लाल चन्दन अयो. 9/58 
इग्राशणा ॥णणा।. सु. 0/2 
सु. 40/4 
सु. 44/4 
यु. 28/6 
यु. 28/55 
रक्‍तोत्पतल लाल कमल कि. 27/२१ 
पजाए॥0९3 9९॥2828.. यु. 28/6 
रक्तपदूमोत्पल लाल कमल अर. 42/6 
रक्ताम्बुछह लाल कमल उ. 8/9 
रजका (रंजक) यु. 4/79 
कपिलु ४०७5 शा 
एड्ञांगलाञं5ड 
राजा सोमलता बा. 4/6 
छडाए्ता३-ठशक्तीक्षा4 
राजीव कमल अयो. 98/8 
विलणा0० अर. 48/24 


एलंलिब, 0427०... अर. 6/29 
542 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


लंका में हनुमान जी ने देखा 
सह्य कानन में 

पर्ण-कुटी बनाने के लिये 
सीता की तुलना 

लंका में सीता की समानता 


हिमाचल में ऋषभ तथा कैलाश के 
बीच में प्राप्त 


पंचवटी में 
पंपासर के अरुण्य में 


भरद्वाजाश्रम में 

रावण के देह पर लिप्त 
रावण के देह पर लिप्त 
रावण के देह पर लिप्त 
संध्या की तुलना 
राज्याभिषेक 

प्रख्रवण गिरि पर 

संध्या की समानता 
मायावी मृग के वर्णन में 
नेत्र की तुलना 

सद्य गिरि कानन में 


अश्वमेध यज्ञ के लिये सोम रस 
“राजीवाक्ष” 


मायावी मृग 
नेत्र की उपमा 


लकुच बड़हर वृक्ष 
(लिकुच).. क्षाएश्षां5 [.8000०६ 
लव लामज्जकतृण 

(घास की एक जाति) 
लवण नमक 

इ््ा 
लाजा लावा धान्य 

“ब्रीहि धान्य” 
लाक्षा लाख 

(००९०५ [.8९९8 
लाक्षारस लाख रस (पानी) 
लोधा लोद 

5,फा0०८5 

(४०९०ा॥०५३ रिफए 
लेहिता चन्दन रक्त चन्दन 

लाल चन्दन 

धिगांबौणा) चएसा 
बट बड़ का पेड़ 

संट05 छल्लाहगशाओंड 
बन राजी 


अर. 5/8 


सु. 0/8 
उ. 22/2 
अर. 2२/२ 
उ. 9209 
बा. 73/25 
अयो. 3/9, ॥5 
अयो. 7/6 
अयो. 20/8 
अयो. 9/56 
यु. 73/22 
यु. 67/88 
यु. 4/20 
उ. 403 
अयो. 75/38 


यु. 7006 
अयो. 94/8, 0 
कि. /79 

कि. 43/3 
कि. 4907 

उ. 265 

उ. 42/4 

सु. 0/8 


अर. 75/23 


सेवती नील (कृष्ण राजी) सु. 56/26 


पंचवटी में 


मांस में मिश्रित 

मार्जन के लिये 

लवण जल 

रामाश्वमेध में प्रयोगार्थ 
विवाह मण्डप में 

राज्याभिषेक के लिये 
राज्याभिषेक के लिये 

देव पूजा के लिये 

भारद्वाज आश्रम पर भरत 
इन्द्रजीत द्वारा अग्नि की पूजा 
कुम्भकर्ण के स्वागत में वर्षा 
रावण के शव पर रखने के लिये 
श्री राम द्वारा पुष्पक का पूजन 
बेचना पाप है भरत 


रक्‍त की तुलना 

चित्रकूट में 

पंपासर के अरण्य 

हिमालय पर्वत पर 

विंध्य पर्वत पर 

कैलाश में 

अयोध्या की अशोक वानिका में 
रावण की देह पर लिप्त 


पंपासर के पास 


पर्वत के परिधान के रूप में 


उपसंहार / 543 


छा5$$९48 भिंशा4 


वरुण (बरण) बरणो अयो. 94/9, 0 
टा॥9८९३ िणा५३।३ 
वबानराः बांस यु. 22/56 
छिक्ा05॥ क्षणात॑शा8०९8 
वानीर वेत्रभेद कि. 27/8 
$था5 एक्ाटव 
बाराहै बाराही कन्द अयो. 9/67 
आश्रम 8००७ 389०8 
वासन्ती मालती लता (जूही). कि. 3/77 
(वासन्त्य) 3क्रापरपा #वाएणएत्था$. यु. 4/78 
विशल्या एक दिव्यमें प्रविष्ट औषधि जो देह 
(विशल्यकरणी) शल्य को आसानी यु. 50/30 
से वाहर निकाल देती है. यु. 74/85 
यु. 0/30,82 
वेणु बाँस अयो. 85/20 
छ्ा005७ भ्णातथा०८३अयो. 94/8,0 
कि. 30/50 
सु. 56/3 
वेतस बेत बा. 4/39 
(णक्षाए5 रणक्षाह अयो. 55/5 
कि. 2708 
बेग (वेत्रक) बैंत अयो. 94/9 
('ग्ैथ्रा05 तशाएं5 
बंज्जुल वेत्स, अशोक अर. ॥/74 
(बंजुल). तिनिश अर. 6/6 
वंजुला $गॉंजशब 5छथागाब २०७ कि. /78 
कि. 50/25 
यु. 4/79 


544 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


चित्रकूट में 
सेतु निर्माणार्थ 
तुंग भद्रा नदी के किनारे 


भरत के स्वागत में भारद्वाज 
के आश्रम पर 

पंपासर के अर््य में 

सह्य पर्वत कानन में 

अयो. 25/38 कौशल्या 

द्वारा राम के हाथ पर बाँधना 
क्षीर सागर में होने वाली दिव्य 
औपधि 

हिमाचल में ऋणमूक तथा 
कैलाश के बीच में प्राप्ति 
महोदय पर्वत के दक्षिण 
शिखर पर 

दुःख के पर्वत में बाँसों का वन 
चित्रकूट में 

माल्यवान पर्वत पर 

लंका के अरिष्ट गिरि पर 
चटाई के लिये 

भारद्वाज आश्रम में 

प्रश्वण गिरि पर 

भारद्वाज आश्रम में चित्रकूट 

की राह पर 

सुतीक्ष्ण के आश्रम के आगे 
पंचवटी जन स्थान में 
पंपासर के अरण्य में 

दक्षिण प्रदेश की गुफा में ऋष्यविल में 
सह्य पर्वत कानन में 


वंश बाँस अर. 5/श पंचवटी में 


छक्ला/058 ्षणात80८8 सु. 56/34 लंका से लौटते समय हनुमान 
जी की राह में 
यु. 22/56 सेतु निर्माणार्थ 
वंशी बाँस अयो. 55/8 भरद्वाज आश्रम में चित्रकूट की राह में 
छल्ला0०७३ #7घ्घाक॥३०८३ अयो. 55/4 शुष्कैर्वणैः 
सु. 56/34 हनुमान जी का लंका से लौटते 
समय राह में 
वृत्त कुन्दकली अयो. 56/24 श्वेत दाँतों की उपमा “वृत्त दंष्टो” 
उक्त एंटी] ४क्ां 
शत पत्र (त्रि) गुलाब अर. 75/2 पंपासर पर 
६२०580क्षा७80एशा॥ 
शमी. खेजड़ी अर. 5/8,22 पंचवरटी में 
ए08०फांड 5छ्ंलंहठ॒ला 
शर्करा शक्कर अयो. 9/753 .. भरत के स्वागत में भरद्वाज 
$ए2क्ा आश्रम में 
शर शरकण्डा अबो. 30क्‍2 . वन में उपलब्ध होने का भय 
58०लीभणा क्षैणाऊँ।३०टएत 
रथ अर. 5/22 पंचवटी में 
सु. 56/23 हनुमान जी के लंका से लौटते 
समय राह में 
उ. 35/22 कुमार कार्तिकेय का जन्म स्थान 
शरदीवाम्बुज॒ शरदकतु में लाल कमल सु. 44/8 जम्बु माली से युद्ध करते हुए 
पजाएजा००३ अली हनुमान जी के मुख की तुलना 
शरपत्राणि. कुश-पत्र यु. 78/23,24. हवन में प्रयोगार्थ इन्द्रजीत द्वारा 
ए०चा०ञ३ला५8 छिंज़ावा॥8 
शभए 
शर्वरी हल्दी अयो. 7727... “'शर्वयामरुणोदये” 
शरवण शरकण्डे का वन उ. 6/,2 रावण की यात्रा 
$80लोक्षणा। क्षणाक्रं॥४०८णा उ. 35/22 कार्तिकेय का जन्म स्थान 
॥ ५५८ 
श्यामतमाल श्यामतमालपत्र कि. 30/62 माल्यवान पर्वत पर 


(श्यामा) अनन्तमूलया प्रियंगू 
(रएथ्ए8 ।४३८०७॥५॥७ 


उपसंहार / 545 


श्कां 
श्यामन्यग्रोध काले पत्ते वाला बड़ अयो. 55/28 


(गहरे हरे) 
शाल वृक्ष. शाल यु. 59/77 
आग रक्राश8... यु. 39/3 
यु. 9809 
शालि चावल जाति (धान्य) अयो. 6/7 
एंड 308 अयो. 32/9 
शादला शैवाल (घास) कि. 28/24 
शिज्ञांब धा्रांगए5 सु. 2/6 
यु. 4307 
यु. 58/30 
शाल्मली द्रुमसेमल अर. 53/2 
छणा65%: |/#क्षांग्णा। कि. /82 
यु. 705 
यु. 4004 
यु. 88/7 
शिखरिणी . कुन्दकली अर. 46/8 
उबज्ांएणा। 4ैएअंत्प॑भरणा 
श्क्ञां 
शिरीष सरेस कि. /82 


#फांय्यं800००८ छ्वाए। कि. 27/0 
शिंशष स्त्री जाति का वृक्ष विशेष अयो. 9/5 


शिंशपा (शिंशप) शीशम कि. 4/82 
(शीशम) एलएथड्टां8 85500. सु. ]4/4॥ 
सु. 347 
सु. 42/9 
सु. 560 


546 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


भारद्वाज आश्रम से चित्रकूट 
की राह में 


युद्ध में नील के आयुध 
सुबैल पर्वत शिखर से दृश्य लंका 
हनुमान जी का आयुध 
हेमन्त वर्णन में 

दान के लिये 

वर्षा ऋतु वर्णन में 

लंकापुरी में 

सिर के बालों की समानता 
केशों की तुलना में 

रावण को सीता की फटकार 
पंपासर के अरण्य में 

रावण की प्रशंसा में राक्षसों 
के शब्द 

सुग्रीव रावण युद्ध की उपमा 
लक्ष्मण और इन्द्रजीत के युद्ध 
की उपमा 

सीता के दौँतों की समानता 
रावण द्वारा 


पंपासर के वन में 
प्र्वण गिरि पर 

“कानेन लता” भारद्वाज 
आश्रम में 

पंपासर के बन में 
अशोक वाठिका में 

लंका के अशोक वन में 
सीता का निवास लंका में 
अशोक वाटिका में 


शुक्ल कुमुद 


शुक्ल चन्दन 


शुल्क वृक्ष 
(शुक्ल द्वुम) 


शुक्ल पदूम 
शैवाल 
(शैवालानि) 
श्रग्विणी 


श्लेष्मान्तक 


श्लेष्मान्तक वन 
सर्ज 


सर्ज-पुष्प 


सु. 58/55,62,64 अशोक वन में यहाँ यह शब्द 


यु. 4/80 
सफेद कमल कि. 27/22 
एलणाए० पएलंलि3 

ठक्षमांणा 

श्वेत चन्दन अयो. 62/75 
इश्याश्षेणा गिणाणा 

“अर्जुन” या लोधर . अर. 75/28 
0) पल्ञाक्रगभ १एणा& 


(#) $9प्रए70००६ (२४०६४ ॥0$3 रिकए 
सफंद कमल अर. 75/20 


टाणाए0 फिएलंटि 08९7 


जलज, द्रव्य, काई सु. 57/2 

शंत्रां8 50र्मांगट5ड कि. 30/55 
यु. 58/30 
उ. 77/5 

चन्दन सु. 4/22 

एणकांब १४फए७ 

(लिसोड़े, बहेड़ा) बा. 4/25 


() 0त्रकंब 00408 
(9) पल्माग्रंक्षा8 छलशांध रण 
लिसोड़े का वन उ. 0/49 


पियासाल वृक्ष कि. श/0 


अशोक वृक्ष के लिये प्रयुक्त 
हुआ है 
सह्य कानन में 

प्रश्नवण गिरि पर तुंग भद्दा नदी में 


भारद्वाज आश्रम में 


पंपासर पर 


पंपासर में 


आकाश से तुलना 
माल्यवान पर्वत पर 
आंत्र से तुलना 

बन में सरोवर में 
अ्रग्विणस्त्वनुलिप्ताश्व 


अश्वमेध यज्ञ हेतु (दशरथ) 


रावण आदि का भ्राताओं सहित 
तपस्या के लिये वन में जाना 


.प्रख्वण गिरि पर 


झआग&4 २०00528 042८५ कि. 28/8,34माल्यवान पर्वत पर 


पियासाल वृक्ष का पुष्प कि. 27/0 
#]07ढ ण॑ आाणढब रिक्र0४8 


ठ्क्ष्यागा कि. 2878 


सन्धान करणी अस्थि संधानक दिव्य यु. 74/33 


'सन्धानी) 


औषधि 


प्राबृट्‌ प्रसंग में माल्यवान पर्वत पर 


प्र्रवण गिरि पर 
हिमालय में ऋषभ तथा कैलाश केबीच 


यु. 0/30, 32 महोद्यय पर्वत के दक्षिण शिखर पर 


उपसंहार / 547 


सप्तच्छद 


सप्तवर्ण 


#पज्जणार३ $ला0भ्ां5 २, छा. 


सरल 


सरोरुह 


सल्लकी. 


सनन्‍्तान पादमप कल्प वृक्ष 


साल 


छितवन 
#पै्अणा९३ 5ला0शां$ 
हि. छा. 
छितवन 


कि. 32/8 
सु. 2/0 
अर. 75/24 
कि. 30/62 
कि. 49/7 
सु. 4/8 
सु. 5/9 
यु. 22८57 
यु. 39/8 
यु. 42/24 
चीड़ अयो. 76/6 


एएड रठक्रणएछं $9था। अयो. 9/40 


कि. श7 
सु. 2०9 
यु. 4/8 
कमल कि. 28/42 
पिलणा00 एएलंलिब 50ला। 
चीड़ की जाति का वृक्ष अयो. 55/8 
छल लाभ र्क 
सु. 4/6 
सु. 5/2 
अयो. 20/32 
अयो. 726 
अयो. 72/२२ 


शाल वृक्ष 
(साल वृक्ष) 
स्वनाम का वृक्ष 


अयो. 96/ 
अयो. 97/28 
अयो. 99/9 
अर. 0/74 
अर. 5/6 
अर. 25/32 


जाग रिक्रए४8 


548 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


कि. 30/30, 55 माल्यवानू पर्वत पर 


किष्किन्धा में 

लंका में हनुमान जी ने देखा 
पंपासर के अरण्य में 
माल्यवान पर्वत पर 

विन्ध्य पर्वत पर 

अशोक वाटिका में 

अशोक वाटिका में 

सेतु निर्माणार्थ 

सुवैल पर्वत पर 

अयोध्या अशोक वनिका में 
राजा दशरथ के शव की दाह क्रिया 
भारद्वाज आश्रम में 


लंका में 
सह्य पर्वत पर 
माल्यवान पर्वत पर 


भारद्वाज आश्रम में 

चित्रकूट की राह में 

अशोक वाटिका में 

अशोक वन लंका में 
कौशल्या की तुलना 

कलिंग नगर के पास 

गिरते हुए मूर्च्छित भरत की 
समानता 

लक्ष्मण शाल पर चढ़े 
चित्रकूट में 

चित्रकूट में 

सुतीक्ष्ण के आश्रम से आगे 
पंचवटी में 

पंचवटी में युद्ध में प्रयुक्त 


साल साल 


सालवन (शालवन) साल कूक्षों से युक्त वन 
निर्गुण्ठी के आकार का 
एक वृक्ष 


सुरक्ता लाल चन्दन 


अर. 30/6. पंचवरटी में 

अर. 355/8 लंका के समुद्र तट पर 
आर. 60/2 .. विरही श्री राम का प्रश्न 
कि. 8/2, 34, 5ऋषभ पर्वत पर 

कि. 7/90, 9। ऋषभ पर्वत पर 

कि. 2, 3, 5 ऋपभ पर्वत पर 

कि. 27/7 .. तुंग भद्रा नदी के किनारे 
कि. 3/4 .. किप्किन्धा की राहों में 
कि. 40/5, 6 सुवर्ण शिखर पर 

कि. 50/25 . दक्षिण की गुफा में 

सु. 4/48 दक्षिण में 

सु. 4/3 अशोक वाठिका में 

सु. 44/3, 4 अशोक वाटिका में 

सु. 56784. अरिष्ट गिरि पर 

यु. 22/56 .. सेतु निर्माणार्थ प्रयुक्त 

यु. 28/2 वानर सेना की तुलना 

यु. 39/3 सुवैल शिखर पर 

यु. 4204. युद्धास्त्र के रूप में 

यु. 48/84 . युद्धास्त्र के रूप में 

यु. 59/43, 77 युद्धास्त्र के रूप में 

यु. 67/755 ._ राम के वाणों का स्वभाव 
यु. 76/55.._ अंगद का आयुध कुश्न को माले हेतु 
यु. 88275. हनुमान जी का युद्ध आयुध 
यु. 427/29 युद्ध 

उ. 9/23. उपमा 

उ. 32/4,8 सहत्वार्जुन की समानता 
यु. 727/29 .. पुष्पक विमान से दिखने वाला दृश्य 
कि. ।/77.. पंपासर में एक वृक्ष 

कि. 27/0 . प्रस्रवण गिरि पर 

यु. 47278. सह्य पर्वत कानन में 

आर. 735. पंपासर अ्प्य में 


एश्ञ०८भ्ाए०5 $थ्ाधबाणा 


बा 


उपसंहार / 549 


सुवर्णकरणी देह को सुन्दर तथा अब्रण यु. 74:33. हिमालय पर 
बनाने वाली दिव्य औषधि यु. 0/30,32 महोदय पर्वत के दक्षिण शिखर 





पर प्राप्त 
सोम सोमवल्ली अयो. 6/8 यज्ञ से सम्बन्धित 
सोमरस छज़ाव्वा8 शाइक्ां$.. अर. 32/9 . ऋषियों के यहाँ अभिमंत्रित तथा. 
संरक्षित संरक्षित सोम रस को रावण नष्ट 
कर देता था 
सौवर्चल नमक सु. 76.. मांस में दही तथा नमक मिलाकर 
रखा था 
र०ण्टर 527 
संजीवकरणी . जीवित करने वाली यु. 50/30 लंका में क्षीर सागर में पैदा होने 
वाली दिव्य औषधि 
(संजीवनी). दिव्य औषधि यु. 74:38. (मृत संजीवनी) हिमालय में ऋषभ 
तथा महोदय के बीच में होने वाली 
यु. 0/30, 32 महोदय पर्वत के दक्षिण में प्राप्त 
स्थगर स्वनाम वृक्ष अयो. 94/24 चित्रकूट में 
स्यन्दन तिनिश वृक्ष अर. 75/8 . पंचवर्टी में 
[.28०ञ्ञाप्थ्शा॥ 7000 कि. /82 पंपासर के अरण्य में 
ए०ह्ठ90 


सवीषधि औषधि वर्ग विशेष अयो. 388. राज्याभिषेक के लिये 
कूठ, जटामान्सी, हल्दी, यु. 69/8 पंपासर के वन में 
बच, छड़, छरीला, चन्दन, यु. 74/3,6॥ हिमालय में ऋषभक तथा 


कर्पूर आदि यु. 28/78 .. कैलाश के बीच 
राज्याभिषेक हेतु 
हरिचन्दन. चन्दन जाति अयो. 65/8 . दिवंगत दशरथ के लिये जल 
हरिश्याम चन्दन जाति कि. 4/40.. ऋषभक्‌ पर्वत पर 
हेम विपुला मुकुल सु. 9/57 रावण के महल में सोई 
(85अंब मंडए|8 सुंदरियों की तुलना 
हिन्ताल स्वनाम प्रसिद्ध ताड़ जाति कि. ।/88 .. पंपासर के अर्ण्य में 
का एक वृक्ष 
(हिन्ताक) छभ्ागरद्ठाणगां8४०ांभ्राएण8 कि. 27/8. प्रख्रवण गिरि पर 
यु. 48 सह्य पर्वत कानन में 
यु. 39/4 सुवैल पर्वत से लंका का दृश्य 
क्षार नमक आदि ४।८७॥॥९५ अयो. 73/3 घाव पर नमक छिड़कना 


550 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


क्षोभ (शौभी) अलसी अयो. 7/4 


[आणा एआंरांउशं।पा 


क्षीरग वृक्ष दूध निकालने वाले पेड़ कि. 26/25 
बट, गूलर, पीपल (पारस 
पिप्पली) पाखर (पाँच वृक्ष) डे 
परिशिष्ट संख्या-2 
औषधि शब्दावली 
रामायण में द्रव्य हिन्दी तथा. प्रसंग 
का नाम लैटिन नाम 
अगरु अगर अयो. 9/83 
यु. श/4 
अतिबला कंघी 
#फणां।णा पठ॑ंट्णा 
असृक चन्दन लाल चन्दन उ. 69/9 
एिश० (क्षाए05 $शा।भि।ए5 
औषधि औषधि जल. सु. 7/श 
चन्द्र दिव्य औषधि. यु. 50/3॥ 


दिव्य औषधि उच्च कोटि की औषधि कि. 37/3॥ 
द्रोण स्वनाम दिव्य औषधि यु. 50/6 


परमौषधि दिव्य औषधियाँ यु. 5/3 
मृत संजीवनी एक महाऔषधि (पूर्व दूर यु. 74/38 


करने के लिये) 
विशल्या एक दिव्य औषधि. अयो. 25/38 
(विशल्यकरणी) 
सन्धान करणी अस्थि संधानक यु. 74/85 
संधानी दिव्य औषधि यु. 0/30, 32 


सुवर्णकरणी देह को सुन्दर बनाने-वाली यु. 74/35 
संजीवकरणी ._ जीवित करने वाली यु. 50/30 
संजीवनी दिव्य औषधि यु. 74/38 
सर्वोषधि औषधि वर्ग अयो. 3/8 


श्री राम के वस्त्रों से सम्बन्धित 


सुग्रीव का राज्याभिषेक 


स्थान का प्रयोग 


लेप के लिये 
बालक राम की बाँहों पर लेप 


बा. 22/3, 5, 8 विश्वामित्र द्वारा राम को प्रदत्त 


अंग में लिप्त रक्त चन्दन 


विष नाशक 

मूच्छित वानरों को चेत कराने 
के लिये 

हिमालय की राह में 

क्षीर सागर में उपलब्ध होने वाली 
दिव्य औषधि। मूर्च्छित वानरों 
को चेतन कराने के लिये 


चन्द्र और द्रोण पर्वत पर उगने वाली 


हिमालय में ऋषभ तथा कैलाश के 
बीच में प्राप्त 


कौशल्या द्वारा राम के हाथ पर 
बाँधना 


हिमालय पर प्राप्त 


हिमालय पर प्राप्त 
क्षीर सागर में प्राप्त 
हिमालय में प्राप्त 
राज्याभिषेक के लिये 


उपसंहार / 55 


बला एक महाऔषधि बा. 22/3, 5, 9विश्वामित्र द्वारा राम को प्रदत्त 


परिशिष्ट संख्या-3 
* रोग नामावली 
अंधा अयो. 46/6, 64/4, 35 
अस्थि भंग सुंदर - 47/36 
अमर्ष से नेत्र घूममा. यु. 36/2, ढ. 93/6, 65/4, 67/6, 05/5 
अस्वस्थ उ. 507, 69/श 
आधि-व्याधि अयो. 2/2, 8/8 
आर्त एवं संतप्त अयो. 2/55, 52/43, यु. 59/39 
आग में जलना अयो. 29/2, 74/33, सु. 55/3, 22, 58/6], यु. 57/44, 
75/28 
आँखें बाहर निकलना सु. 47/36, यु. 48/28, 704 
आँख फोड़ना सु. 6776, यु. 20/32, 70/65, 66 
आपात मरण यु. 68/9 
आघात जनित क्लेष यु. 9/], उ. 805 
उन्माद अयो. 2/55, 9/44, सु. 26/, 34/23, 24, यु: 75/67, उ. 
हे 6/53, 58, 7/57, 4/, 7/5, 24/33, 29/, 47/7, 48725, 98/9 
श्री हीन सु. 59/22, 28/5 
कुब्जता बा. 32/23, 24, 33/23, अयो. 9/4], 45, 5/39, 66/6, 78/5, 
9/50, सुन्दर- 4/9, 7/8 
काम-मोहित : अयो. 7/7, कि. /32, , 43/50, 58/74, उ. 7/3, 20, 
260, 40, 30/29 उ. 32/5, 80/5, 8800, 2, 84/9 
क्लान्त अयो. 42/23 
कृश काय अयो. 59/4, 64/4, 00/, कि. 50/25, सु. 5/8, 22, 26, 


49/], 20, 28/3, 53/4], 56/6, 57/39, 59/3, 65/26, 
यु. 508, /, 42/8, 45/8, 8/9, 8/4, 25/29 
कान से खून बहना कि. /4, यु. 59/6 
काम भोग से अचेत यु. 60/6, 29 


खिन्‍न बदन कि. 50/23, सु. 36/श 
गर्भ स्राव बा. 37/26, श7 
घायल (घाव) अयो. /8, अरण्य 25/3, कि. 2/22, 22/24, 9/2, यु. 


24/38, 44/3, 49/4, 52/7, 59/0, 69/9, 94, 76/56, 
90226, 94; 46/24, 00/, 03/- उ. 75/28, 35, 
9/22, 25/26, 29/34, अयो. 73/3, अर. 22/2, 2524, कि. 
6/24, 6/2, सु. 38/24, 46/36, यु. 22/38, 54/32,74/75, 
88/55, 20/9, 4/7, उ. 7/5, 28/36 

घबराहट अयो. 30/-, कि. 5/3, 58/58, सु. 64/30, उ. 2/8, 
65/24, 8625 

552 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


घुटघुटकर मरना 
चक्कर आना 


चेतना लुप्त होना 


चित्त व्याकुल 
चेचक 
चोट 


छाती में आधात 
छटपटाना 

छींक आना 
जराशीर्ण 


ज्वर 
तेज शिथिल होना 


तड़पना 
धूप से पीड़ित 
दीन 


दुख से संतप्त 


दुर्बलता 

दृष्टि घूमना 

दिग्भ्रम से चित्त भ्रान्त 
नसों के बंधन खुलना 
पिशाचोन्माद 

पीड़ा (दर्द 


पागल 


कि. 46/8 

बा. 30/9, अयो. 2/39, अरण्य 2/26, यु. 59/6, 59/6, 
79/2 

अयो. 9/6, 2/5, 2, 37, 55, 4/24, 34/6], 64/73, 
72/8, कि. /47, 7/5, 50/20, सु. 48/38, 45, 46, यु. 
2/9, 32/7, 3/4, 40/4, 4/60, 45/6, 46/45, 59/6, 
47, 70/43, 66, 74/, 92/38, 98/4, 35/5] 

अयो. 3/4, 8/5, 34/3, 4, यु. 7/9, 30, 24/34, 44/श 
कि. /09, सु. 3/68 

कि. 34/5, सु. 47/25, यु. 44/35, 98/2, उ. 35/47, 
69/2, 85/4 

सु. 47/%, 67/7, 8, यु. 77/6, 98/9 

यु. 590॥7 

उ. 76/42 है 

अबयो. 2/8, 64/4, 35, -05/20, 24, 7/8, 67/8, 

उ. 20/9॥], 4/7[, 387/28, 89/, 2, 4, 6, 8, 0, , 
070 

अयो. 75/49, यु. 7/4, 0/27 

कि. 58/4, 64/0, 66/7, सु. 49/7, यु. 50/40, उ. 
37/6, 5/4, 50/8, 74/5, 76/44, 45, 04/8 
यु. 59/07 

अयो. 40/20, यु. 04/6 

अयों. 0/3, 64/35, सु. 58/4, 58/58, 58/59, यु. 30/9, 
34/28, उ. 48/2, 52/3, 06/ हु 
अयो. 0/22, 48/5, 34/7, १, 39/2,.42/28, 47/3, सु. 
5/22, १७/29, 40/, यु. 47724, 64/34, उ. 48/3, 6, 6, 
49/5, 74/2, 98/2, 47, 99/3, 07/, 9 

2/2, 8/5, 42/23, उ. 92/38 

अर? 68/, यु. 50/40, उ. 84/5 

सु. १6/ 

सु.47/8  * 

अयो. 0/29, 2/57, 38/0 * 

अयो. 6407, 7/54, सु. 48/39, 58/49, 54; यु. .45/9, « 
47/9, 2, 74/73, 9/4, 4/28, उ. 7/83, 7८89, 
23/32, 28/6, 43/2, 02/4 है 

अर. 39/2, सु. 272/25 


उपसंहार / 553 


पित्त प्रकोप 
बेहोश (अचेत) 


भूतोन्माद 


मुख सूखना 
मेहनर 

महारोग 

रक्‍त वमन करना 


लहूलुहान 


वात रोग 
विषाद 


वेदना 
व्न्ध्या 
व्यधित 


सु. 260, उ. 5/7 
बा. 9/20, 2, 20/, 25/4, 30/9, 20, 43/40, 46/6, 
67/9, 74/4, 5, 6, 75/5, अयो. 2/5, 2/2,3/25, 
4/, 20/33, 2/5, 55, 34/ प्रा0 6, 39/, 3, 8, 47/, 
8, 48/36, 57/26, 27, 33, 58/, 59/28, 33, 34, 60/, 
6/श7, 64/2, 27, 74, 65/24, 25, 75/7, 9, 8, 60, 65, 
77/4, 78/24, 26, 87/3, 4, 03/, अ. 32, 8/26,9/2, 
श/श, 34/4, 39/27, 56/36, .62/3, कि. 6/39, 8/, 66, 
4/2, 30/5, 49/20, 6/0, सु. 9/6, 0, 40, 33/22, 
35/39, 44, 37/45,, 48/7, 62/श7, यु. 34/2, 44/34,42/9, 
48/3, 49/3, 50/22, 5/35, 52/5, 54/25, 58/59, 59/ 
प्रा0 4, 52, 59/7, 68/6, 67/29,48, 49, 50, 67, 77, 79, 
64, 70/30, 32, 62, 52, 7/99,73/39, 4, 72, 74, 76/2, 
46, 56, 58, 84/4, 7, 85/8, 88/, 0, 92, 45, 90/57, 
92/4, 58, 95/9, 96/24, 98/7,99/42, 84/4, 7, 85/8, 
88/, 0, 92, 45, 90/57, 92/4, 58, 95/9, 96/24, 9844, 
99/42, 0/9, /86, 25/40, उ. 8/40, 29/22, 35/ 
प्रा0 40/20, 48/23, 5/5, 55/7, 8, 48/0, 55/20, 
58/7, 69/8, 2, 7/6, 6, ॥7 

अयो. 2/2, 8, 57, 58/34, 60/, सु. 26/, उ. प्रक्षिप्त 
सर्ग /7, 66/5, 6 

कि. 7/54 

सु. 6474 

यु. 9/9 

अर. 67/4, 68/5, कि. 6/22, 48/2, यु. 52/0, 

54/25, 58/6, 59/6, 67/20, 27, 9, 96, 89/50, 90/श 
यु. 24/38, 3/28, 49/4, 5/3, 53/9, 63/39, 64/25, 
66/3, 67/89, 73/4, 5, 80/30, 39, उ. 5/35, श/उ 
बा. 35/24, सु. 34/23, उ. 5/7, 35/56 

बा. 75/5., अ. 69/38, कि. 64/6, 8, 9, यु. 74/3, उ. 

29/9, 36/6, 47/5, 54/6, 72/5 

अयो. ॥4/ 

अयो. 20/36, 37 

अर. 25/3, सु. 32/8, 67/27, यु. 2/7, 30/9, 45/8, 
67/8, उ. 5/35, 69/, 


559 आल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


वियोग से कृश सु. 4/46 
सूर्य किरण. से पीड़ित कि. 58/6, 63/0 
साँस लेने में पीड़ा. यु. 94 
स्थूलता उ. 4/22 
क्षत-विक्षत अयो. 9/4, सु. 38/8, यु. 42/23, 34, 44/8, 3, 35, 
70/30, 37, 77/42, 73/4, 55, 88/30, 85/20, 49, 58, 7, 
02/9, उ. 2१3/4, 28/ 
क्षुब्ध यु. 309 
परिशिष्ट संख्या-4 
खनिज द्रव्य (धातु) 
असी लोह अयो. 75/38, अरण्य-53/9, उ. 2/5 
कृष्णायस लोह बा. 37/9 
कांचन स्वर्ण अयो. 65/4, 9, अरण्य- 35/22, 53/9, कि. 
26/28, 38/20, 43/7, 50/32, 37, 5/4, सु. 
7/2, 3, 9/62, 5/5, 54/27, 62/2, उ. 
व 3/27, 35/9, 42/, 9, 53/8, 9]/20, 92/5,6 
कांचन बिन्दु स्वर्ण जल सु. 44/9 
कालायस लोह बु. 3/5 
गैरिक गेरू यु. 4/76, अयो. 97/42, कि. 28/8, यु. 


जम्बूनद 
जातरूप 
तप्त हाटक 
ताम्र 

तप्त कांचन 
त्र्पु 
नीलांजन 
मनः शिला 
रजत 


र्प्य 

हिरण्य 

हेम जम्बूनद 
>हैमजाल 

हेम कोणे 


26/44, उ. 4/26, 7/5, कि. 67/36 
उच्चकोटि का स्वर्ण सु. 3/8 


स्वर्ण 

तपा हुआ सोना 
ताँबा 

तपा सोना 
राँगा (राजा) 
नीला सुरमा 
मेण शिल 
चाँदी 


बा. 37/9 
सु. 3/9 

सु. 37/38 

यु. 0/5 

बा. 37/9 

उ. 67/9 

कि. 26/28 

अयो. 94/5, 6, अर. 35/22, 78/6, कि. 33/20, 
50/32, सु. 3/9, 7/2, 54/27, उ. 4/24, 
9/20, 9206 

सु. 906 

बा. 37/8 

सु. 4730 

सु. 45/9 


उ. 42/34 
उपसंहार / 555 


स्वर्ण प्रति रूप पीतल 
सीसक शीशा 

रत्न 

इन्द्रनील इन्द्रनील मणि 
इन्द्रनील इन्द्रनील मणि 
कौस्तुभ कौस्तुभ मणि 
कांचन मणि दिव्य मणि 


अर, 29/20 
बा. 37/9 


यु. /42, अर. 42/6 
सु. 9/7, अर. 48/29 

यु. 2९/श 

सु. 65/8, कि. 43/42, 50/32, 5/6, सु. 


7/9, 977, 22, 0/57, /26, 5/42; यु. 
3/4, /3, 75/8, /06, उ. 39/9 


प्रवाल मूँगा 
मुक्ता मोती 
महानील मणि 
मणिवर पुखराज 
विद्वुम प्रवाल 
चैड्रय नीलम 
वज्र हीरा 
शुक्ति लि 
स्निधा स्निधा मणि 
शंख शंख 


स्फटिक स्फटिक मणि 


सु. 7/2, अयो. 9/44, अर. 35/22, कि. 50/32, 
सु. 702, 3, 9/7, 5/5, 42, 33/, 54/27, 
यु. 3/4, 7/3, 75/8, /06, उ. 39/9 

सु. 300, अर. 35/22, कि. 48/42, 45, 50/30, 
सु. 907, 057, 8/24, 54/27, यु. 3/4,75/8, 
7, 7/06, उ. 5/38, 39/9 

सु. 97 हि 

अ. 29/5 

सु. 3800 

सु. 3/8, 54/27, यु. 3/4, उ. 4/24,.. 42/3 
सु. 3/9, 54/27, उ. 39/25 हे 

यु. 2/29 

यु. 75/8 

सु. 7/2 

सु. 3/0, अयो. 94/6, अर. 73/6, कि. /36, 
सु. 00, 4/22, 49/9, उ. 3/7, 4श/ 


परिशिष्ट संख्या-5 
जक्जम द्रव्यों की सूची 
आसव बा. 53/2, सु. /23, 6/42, 9/56 
इंगुदी अयो. 50/28, 30, 87/22, 88/5, 83/20, 29, 04/8, 34 
कन्द अयो. 20/29, 36/25, 52/02, 64/34, 9/67, 96/2, अरण्य 
68/32, कि. 48/9, सु. /6, 56/37 
खीर बा. 6/26, 53, 3, अयो. 20/7-8, 50/37, 75/30, 9/4, 
69, अर. प्रा0 /22, कि. 37/29' 
खाण्डव बा. 53/4, उ. 92/0 


556 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


खील 
खिचड़ी 
ख़स 


अयो. 3/8, 55 
अयो. 20/7-8, 75/30 
अबो. 55/4, यु. 7/06 


खरगोश का रक्त यु. 40/6 


गजकन्द 
गंगाजल 

गुग्गुल 

गूदा 

गोबर 

गोंद 

गोरोचन 

गोमूत्र 

गुड़ से बने खाद्य 
घी 


चोष्य 
चूना 
चर्बी 
जड्गम 
तिल. 


तेल 


तक्र 
धव 


धूप 


दूध 


अयो. 56/22, 28, 26, 27, 28 

अयो. 65/9, सु. 0/28, यु. 2/5, उ. 42/32, 46/20 

अयो. 766 

अयो. 8470 

अयो. 99/7, सु. 27/40 

अर, 20/22, 55/2, यु. 69/7 

कि. 26/28 

यु. 40/28 

उ. 92/] 

वा. 58/3, अयो. 3/8, 4, 5, 4/35, 5/6 - 8, 2077, 8, 
24/6 - 8, 25/28, 30, 3222, 6/7, अर. 5/39, 32/5, 47/48, 
72/3, कि. 25/6, 20/23, 37/29, 40/43, सु. 54/32, यु. 0/9, 
42/5, 22/42, 57/2, 65/28, 76/80, /4, 7, उ. 9/20 
बा. 52/23, अयो. 9/20 हु 
अयो. 7/8,:80/, 3, 88/5, 9/42 

अर. 72/3, यु. 60/63, 67/8, 96, 99, 08/9 

उ. श7/2, 829, 70/26 

बा. 7/24, अयो. 69/0, सु. 2/26, 46/37, यु. 59/87, उ. 
22/20, 9/9, 

अयो. 64/73, 69/0, कि. /6, 25/6, सु. 8/22, 27/श, आ, 
3, 39, 42228, 53/8, यु. 92/23, 98/8, 07/25, /20, 
28/47, उ. 57/, 9/20 

अयो. 90/79 

बा. 24/5, अयो. 94/8, अर. 5/8, 60/22, 73/5, कि. /8], 
50/25, यु. 22/56, 57 

बा. 30/4, 73/9, 24, अयो. 3/3, 6077, 4/28, 7/6, 7/28, 
सु. 0/5, /32, यु. 60/34, उ. 4/3 

बा. 37/23, 53/3, अयो. 3/4, 5, 4/35, 5/6-8, 36/6, 


उपसंहार / 557 


दही 


फलों का गूदा 
फेन 


बकरी का दूध 


9/54, 72, 00/50, 4/5, अर. 6/7, 9/8, कि. 37/25, सु. 
2/58, 8/24, यु. 0/7, 6/9, 2205, उ. 23/2, 9/20 

बा. 53/3, अयो. 3/4, 5, 4/35, 5/6, 8, 7/6, 20/7-8, 
25/30, 26/3, 32/2, 9/72, कि. 26/23, 30/50, 40/43, सु. 
67/23, यु. 40/9, /64, 2/20, उ. 9/20 

अयो. 9/श, 52, सु. /25 

अयो. 4/7, अर. 9/2, सु. 8/24, यु. 58/83, 96/33, उ. 
8/3, 23/23 

अयो. 75/30 


बल वर्धक पेय यु. 60/9 


भिलावा 

भात 

भेड़े की खाल 
3. 


मांस- 


मैरेय 
मोदक 
मदिरा 


मिठाई 


अयो. 56/7, अर. 73/5 

अयो. 96/0, 9८67. < 

सु. 0/6, यु. 75/9 

बा. 3/39, 53/2, अयो. 4/35, 5/6, 8, 25/30, 26/3, 35/7, 
36/6, 56/8, 75238, 84/0, 9/2, 52, 56, 69, 70, 9, 4/4, 
20, अर. 74/2, कि. /34, 36, 38, 26/23, 33/45, 4/33, 
50/32, 34, 67/45, सु. /23, 5/77, 6/42, 0/23, /4, 20, 32, 
36/4, 6/0, , 2, 62/, 6, 6, 64/4, 7, 5..... 
बा. 4/22 

बा. 9/6, अयो. 48/29, 75/38, 9/70, अर. 5/40, 9/0, 

2/2, 3, 26/34, 39/5, सु. /4, 5, 6, 77, 8, श, 7/7, 
5, 24/45, 26/34, 27/4, उ. 6/70, 27/50, 34/26, 62/4, 65/श, 
25, 25, श/67/26, 77/7, 78/4, 00/22, 25 

बा. 53/2, अयो. 9/5 

अयो. 7/4, 20/7, 8 

अयो. 2/76, सु. 5/0, , 9/58, 0/0, 35, 45, /2, 
26, 27, 7/5, यु. 8/23, 60/63, 63/58 

अयो. 67/श, यु. 2/20, 28/38 





मिश्री (मल्यण्डी) अयो. 84/0 


मिश्रकेशी 
मृग चर्म 
मेदा 
रक्त 


अयो. 907 

कि. 50/34, 40, यु. /5, उ. /5, 7/2, 25/4 

यु. 58/32, 59/07, 67/99, /36 

बा. 9/6, अयो. 9/9, 0, 23/34, 56/27, 63/35, 64/27, 


558 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


रस 


रोही का गूदा 
लेह्म 

लावा 

व्याप्न चर्म 
शहद 
शक्कर 
सोमलता 
सरस पदार्थ 
सुरा 
सोमरस 
स्नेह 


96/28, अरण्य 5/40, 8/23, 24, 26, 9/9, 9, 20, 2, 


2/2, १३/7, 9, .....०-«+ 
बा. 53/2, 4, अयो. 2/3, 2/96, 54/8, 63/5, 9/5, 
अरण्य /49, कि. 28/3, 93/44. सु. 5/2, 20/23, 35, यु. 
22/42, उ. 42/6 

अरण्य 68/32 

बा. 52/23, अयो. 50/37, 9/20, सु. /23, ]/7 

बा. 58/2, 73/9, 24, अयो. 4/35, 5/6-8, 7/6 

कि. 26/28 

अयो. 3/8 

अयो. 9/72 

बा. 6/6 

बा. 52/28 

अयो. 36/2, 6/8, 9/5, सु. /2], 24/45 

अयो. 6/8, अर. 32/9 

अर. 3/5, सु. 9/6, उ. 85/4, 3, 89/9 





समुद्र का जल सु. 40/3 


हव्य-कव्य 


कौशल्या 
जाम्बवान 
दशरथ 
ब्रह्मा 
भरत 
मेघनाद 
राम 
विभीषण 
सुषेण 


यु. 6/9, उ. 300 


परिशिष्ट संख्या 
शरीर विशेषज्ञों की सूची 


अयो. 25/37, 38 

यु. 74/29, 30, 3, 33 

अयो. 0/30 

यु. 50/30 

अयो. 72/30 

यु. 45/5, 8 

अयो. 56/22, 25, श7, 28 

सु. 67/8, यु. 46/84, 35, 40, 88/2, 69/60 

यु. 50/28, 30, 9/20, 20, 24, 25, 26, 270/27, 
30, 32, 42, 44, 45 


उपसंहार / 559 


सीता 

इन्द्र 

अग्नि 

वरुण 

गरुड़ 

शिव 

विष्णु 
बृहस्पति ' 
अश्विनी कुमार 
धन्वन्तरि 


अस्थीनि 
अक्षौ 
अवीर्य 
अयोनिजा 
अवयव 
असृक 
अन्तरात्मा 
आनन * 
आंत्र 
आस्यम्‌ 
इन्द्रिय 
उभा 

उदर 

उरू 

उरस 
उरस्क 
उष्ण श्रोणित 
उत्तमांग 
णक्ष्णा 
ओष्ठ 


सु. 28/6, यु. 6/7 


बा. 49/7, 8 

बा. 49/7, 8 

बा. 45/30, 3, 32 
यु. 55/36, 37 

बा. 45/22, 23, 24 
बा. 45/22, 23, 24 
बा. 45/22, 23, 24 





बा. 49/78 
बा. 45/3, 32 
परिशिष्ट संख्या: 
शरीरावयवों की सूची 
हड्ड्डियाँ 
आँखें बा. 3/] 
बलहीन बा. 4/555 
जो गर्भ से उत्पन्न न हुई हो... उ. 7/34 
प्रत्यंग यु. 58/30 
रक्त उ. 28/37 
हृदय बा. 37/28 
मुख-मण्डल बा. 37/28 
आँतें बा. ॥4/7 
चेहरा बा. 02/36 
सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बा. 6/25 
गाँध सु. 47/36 
पेट यु. 547 
जाँघ सु. 4503 
छाती उ. 46/8 
छाती यु. 505 
गरम रक्त सु. 3024 
गला मस्तक यु. 88/25 
आँख यु. 5806 
ओठ यु. 508 


560 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


छिजारड 
8५९5 
जत्गः 


शक्ञा ण 8009 
छा009 


फ््०2 
वार्जा॥25 
छिब्ट 
रिलटकका0ा25 
कल्याण 


+. 5 णाक्ष्यी 


पका... १ 


(आब्ञ 


लिब्त 


पत्र छा0०0 
प्रशा०्ब/मट्कत 
&,6 

[95 


ओज 
अंक 
अंग 
अंजलि 
आंगुष्ठ 
अंस 
कण्ठ 
कर्ण 
कर्ण मूल 
कर 
कटि 
कबंध 
कराग्रे 
कायशिरो 
काया 
कक्षा 
केश 
कुच 

ख़रै 

गर्भ परिश्रव 
गर्भ तुम्ब 
ग्रीव 
गात्र 
गर्भ 
चश्लुषा 
चरणों 
चित्तम्‌ 
चेतसा- 
जटा 
जत्ु 
जिह्‌वा 
जिह्‌वा वाणी 
ज्योति 


ओज 


५ गोद 


देह 

हाथ 
अंगूठा 
कंधा 

गला 

कान 

गाल का एक भाग 
हाथ 

कमर 

घड़ 
अंगुलियाँ 
देह 

काँख 

केश 

स्तन 

स्तन 

गर्भ गिरना 
गर्भ पिण्ड 
गर्दन/मुख 
शरीर- 





हृदय र 
लंबे बाल 
ठोड़ी 

जीभ 

जीभ 

आँख 


यु. 36/36 
यु. 92/6 
यु. 45/7 
अ. 400 
उ. 986 
उ. 4807 
यु. 4470 
यु. 4470 
यु. 9807 
यु. 5400 
सु. 47736 
यु. 5470 
यु. 67/86 
यु. 58/30 
यु. 54/30 
उ. 4/6 
यु. 9804 
सु. 7/3 
सु. 305 
बा. 37/26 
बा. 3847 
यु. 4/89 
सु. 3075 


बा. 706 
अयो. 3/33 
अयो. 4/27 
यु. 77/9 
बा. 4/89 
बा. 2 
सु. 7/5 
यु. 67720 
उ. 43/श4 


अक्षाशा/शंर्ण 
औ #ा5$ 
छ099 

श्थाा 

गण 

5#0006/ 
वाए्ग 

छ्क्ि 


ए्राशतश्ात 
जज 


न 
68 0॥65 
8099 


सभी 
छादवह 
शो 
#फ्रणांणा 


९९०३ ४९०९ 
छ069 


छदड 

क्व्थि 

छा 
भाव 
[,णाह? मा 
शिशाणा 
गृ्णाहट 
वठ्णाह 
छर 


ज्यसंहार / 56। 


जानु 
त्रिष्यान 
तेज 
तलेन (हस्त) 
दंत 
द्दंषु 
दशन 
दृष्ट्रा 
द्न्त्या 
देह 
दृष्टि 

धी 

धृति 
नेत्राणि 
नखै 
नासापुटाभ्यां 
नयन 
नाभि 
नासिका 
प्रमुखा 
प्लीहा 
पाद 

पाद तक 
पाणि 
पार्श्व 
पाणनि 
बुद्धि 
भूकुटी 
भुजान्तर 
ञ्रूः 

भ्रुवी 
भुज 
मनः 


562 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


घुटना 
हृदय, कंठ, मुख 
वीर्य 
हथेली 
दाँत 

दाँत 

दाँत 

दाँत 

दाँत 
शरीर 
आँख 
बुद्धि 
चैर्य 
आँखें 


पद तली 
हाथ 
पँसली 
हाथ 
बुद्धि 
भौंह 
छाती 
भौंह 
भींह. 
भुजा 
मन 


बा. ॥/ 


बा. 3604 
यु. 68/28 
यु. 503 

यु. 7/39 
यु. 7/32 
बा. 55/9 
सु. 30/55 

सु. #/7 

यु. 40/6 
बा. 55/22 


यु. 4400 





यु. 67285 
बा. 49/ 
यु. 67/58 
सु. 7/6 
यु. 67/27 
चु. 58/30 
बु. 60/28 
यु. 60/29 
बा. 674 
यु. 524 
यु. 97/9 

बा. 4/9 

यु. 9208 
यु. 8/9 

यु. 30/6 

यु. 76/52 
यु. 30/3 





कार्ड 


उलाशा 
श्गा 
व्ब्गा 
वब्णा 
वर्धा 
वुल्ला 
वृल््ा 
8009 
छल श् 
9शंड्वणा 
जशंडइवणा 
छल्ड 
विश 
क्‍४०९५ 
8५65 


२०९५ 
ैण्णा 
ाह्शा 
प०8#व्ल 
क्ल्ल 
सक्ात॑5 
बा 
मक्चात॑ 
जशंडतणा 
896 छा0ण 
छाब्ड (जाएगा) 
छल छाएत़ 
छु९ छात्ण 
सात 
ए98/ला० 


मति 
मस्तक 
मध्य 
मांस 
मानस 
मुख 
मूर्धा 
मूर्धाजा 
मेद 
मेघा 
मेदस्‌ 


चकृत 
यौनदेश 
योनि 
रक्त 
रुधिर 
रोम 


रद 


रक्‍त कण्ठिनः 


ललाट 
लोचन 
लोम 
वक्ष 

व्पु 
वरागानि 
वदन 
वसा 
बसा 
बलि 
वामाहनु 
वक्त्रम्‌ 


बुद्धि 
माथा 

कटि प्रदेश 
मांस 

मन 

चेहरा 

मुख 

बाल 

मेद 

बुद्धि 

चबीं 
मस्तक 
जिगर 
प्रजनन प्रदेश 
योनि 

ख़ून 


खून 
ख्वें 


वीर्य 

दाँत 

मधुर स्वर से युक्त 
ललाट 

नेत्र 

बाल 

सीना 

अंग 

गले के ऊपर के अंग 
शरीर 

उदर के अन्दर की चर्बी 
चर्बी 

झुर्रियाँ 


बाई ठोड़ी 
मुख 


यु. 64/8 
यु. 52/34 
यु. 24८7 
यु. 59/0007 
बा. 0/25 
बा. 8/24 
यु. १९/३ 
यु. 94/97 
यु. 64/3 
यु. 750 
यु, 50/33 
यु. 36/2 
यु. 58/30 
बा. 55/3 


यु. 50728 
बा. 9/8 


यु. 62/87 
उ. 37/5 
यु. 59004 
बा. 804 
यु. ख/ 
बा. 34 
बा. 22/0 
बा. 600 
यु. 46280 


यु. 67/99 
यु. 9900 
उ. 25-47 
यु. 7:22 


जशां50णा 
कटक0 


लल्आ 
काव 
छ्ड्ण्ट 
ण्णा 
पभा 
घ््श 
जशांडकणा 
छ्श 
एणर पमट्यत 
प्लस 
जला ठंड 


छाए्ग्व 

छा00व 

कस 
कछला।आ/िला। 
उल्ला 

$छटट ५०८ 
कतार मसट्यव 
छ९ 

सभी 

शछाब्त्र 

छत्व9 

हर. 

छम्वज 
#फेवंणाला सि 
छत 

श्वा-ए5 
ली उब्वछ 


च्बण्टि 


उपसंहार / 563 


वीर्य (महा) अनन्त शक्ति 


सवा सम्पूर्ण शरीर 

स्कन्ध कन्धे 

स्तनज दूध 

स्तनाभ्याम्‌ दोनों स्तनों के बीच का भाग 
सृक्किणी जबड़े 

संज्ञा होश 

श्वास साँस/छाती 

शोणित खून 

शोणित गन्ध खून की गन्ध 
शिरसा सिर 

शरीरम्‌ देह 
शरीर क्लेद पसीना 

शिरोधरा गर्दन 

शीर्षेम्‌ सिर्‌ 

श्रवण कान. . 

हृदय मस्तिष्क न्‍ 
हस्त हाथ 

हस्त तल हयेली 

हनु ठोड़ी 

हीद ह््द्य 


564 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद 


बा. /8 
बु. 52/36 
यु. 5/22 
बा. 37/28 
यु. 99/श 
यु. 67/40 
यु. 90८7 
यु. 64८2 
यु. धयत्श 
यु. 65232 
बा. 3726 


सु. [777 
यु. कशश 
यु. 49/76 
बा. 0/23 
बा. 4/33 
यु. 59/6 
उ. १5/47 
उ. 450 


ठाय्बाव्ञ 70एथ 
जग 8099 
5॥006९ 
छाटब5 ा॥६ 
हिष्क्ा 

उ्ज5 
एटणाइलं0एशाट55 
छाध्थ्रगंए रक्षा 
8004 

जञाल। जे छा00 
सल्यव 

80999 

छत क्पांवत 
लत 

मिछ्कत 

छ्थ 

कशाव 

सिक्माव 

श्गाा 
(एफ्राए2ए 


पलक 


ऋण